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PM Modi speaks at 87th ICAR Foundation Day Celebrations in Patna
The country now needs a second Green Revolution which must come from eastern India: PM
Scientific innovations in agriculture sector should move from lab to land for benefit of farmers: PM
India must aim to become totally self-sufficient in the agriculture sector, says PM Modi

उपस्थित सभी महानुभाव

सभी महानुभाव, आज जिनका मुझे सम्‍मान करने का अवसर मिला है। जिन्‍होंने अपने-अपने क्षेत्रों के द्वारा देश के कृषि जगत को कुछ न कुछ मात्रा में सकारात्‍मक योगदान किया है। ऐसे पुरस्‍कार प्राप्‍त करने वाले सभी महानुभावों को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। बहुत-बहुत बधाई देता हूं।



ये समारोह हर वर्ष होता है और बड़े लंबे अरसे से होता है लेकिन दिल्‍ली में ही होता है। तो पिछली बार जब मैं गया था पहली बार तो मैंने कहा था भई हम जरा दिल्‍ली से बाहर निकलें और उसका आरंभ आज बिहार में पटना की धरती से हो रहा है। मैं राज्‍य सरकार का भी आभार व्‍यक्‍त करता हूं कि उन्‍होंने इस समारोह को सफल बनाने में योगदान दिया और मैं विभाग के मित्रों का भी आभारी हूं कि उन्‍होंने एक पहल की है। तो उसके कारण उस राज्‍य के अंदर भी कुछ दिन चर्चा चलती है, अनेक लोगों के सामने नई-नई बातें आती है। देशभर से ये कृषि वैज्ञानिक यहां आते है उनको भी स्‍थानीय लोगों से बातचीत करने के कारण अपने विषय में क्‍या-क्‍या नया चल रहा है, उसकी जानकारियां मिलती है। तो एक प्रकार से ये अलग-अलग स्‍थान पर जाने से हमें स्‍वाभाविक रूप से हमें अतिरिक्‍त लाभ होता है और उसका प्रारंभ आज यहां से हुआ है और मुझे ये भी खुशी है कि ये बिहार से प्रारंभ हो रहा है। क्‍योंकि पूसा का जन्‍म इसी धरती पर हुआ और एक विदेशी व्‍यक्ति ने गुलामी के कालखंड में भारत के कृषि सामर्थ्‍य को भांपा होगा, उसको अंदाज आया होगा और Phillip USA के द्वारा बनी हुई ये कामगिरी पूसा के नाम से प्रचलित हो गई। लेकिन उन्होंने बिहार क्‍यों चुना होगा, कोई अचानक तो हुआ नहीं होगा। जब वो सोचा गया होगा तब उनको ध्‍यान आया होगा ये सबसे ऊर्वरा जगह होगी, यहां के लोग प्रयोगशील होगें, प्रगतिशील होगें, कृषि क्षेत्र में नया करने की सोच रखते होगें। हिन्‍दुस्‍तान के अन्‍य भू-भागों से यहां की कृषि की कोई न कोई extra शक्ति होगी तभी जा करके उन्‍होंने उस काम को यहां प्रारंभ करना सोचा होगा, ऐसा मैं अनुमान करता हूं। अब करीब-करीब 100 साल होने जा रहे है। इसलिए मैं पूरे record न देखूं तब तक तो मैं कह नहीं सकता कि वो क्‍या है लेकिन मैं अनुमान करता हूं। इसका मतलब ये हुआ कि ये भू-भाग और यहां के नागरिक दोनों में कृषि क्षेत्र में नई सिद्धियां प्राप्‍त कराने का सामर्थ्‍य पड़ा हुआ है।

हम कभी-कभी अपनी चीजों को भूल जाते है। चीजें कोई अचानक शुरू नहीं होती होगी किसी-न-किसी कारण विशेष कारण से शुरू हुई होगी। उसके मूल में अगर जाते है तो ध्‍यान आता है और मैं राधामोहन सिंह जी को इस बात के लिए बधाई देता हूं कि आपदा ग्रस्‍त कारणों के साथ कारण पूछा यहां से दिल्‍ली चला गया। अब दिल्ली में तो खेती होती नहीं है लेकिन पूसा वहां है और जहां खेती होती थी जो देश का पेट भरता था वहां से पूसा चला गया। तो हमने वापिस लाने की कोशिश की है और मुझे विश्‍वास है कि भले 90 साल पहले किसी को विचार आया होगा उसमें जरूर कोई न कोई दम होगा, कोई ताकत होगी। मुझे फिर से एक बार उसको तलाशना है, देखना है और देश के वैज्ञानिक मेरी इस बात से सहमत होगें कि हम इन नए क्षेत्रों में पदार्पण कैसे करें। कुछ बातें आप लोगों ने आज अच्‍छी शुरूआत कर रहे है। मैं नहीं जानता हूं कि हमारे वैज्ञानिक मित्रों को कितना पसंद आया होगा या कितनी सुविधा होगी। क्‍योंकि वैज्ञानिक अपने काम में इतना खोया हुआ होता है। करीब जिदंगी का महत्‍वपूर्ण समय उसका lab में ही चला जाता है। न वो अपने परिवार को काम आता है, न वो खुद को काम आता है। वो उसमें डूब जाता है, पागल की तरह लगा रहता है और तभी जा करके आने वाली पीढि़यों का भला होता है। एक जब अपने सपनों को खपा देता है तब औरों के सपने बन पाते हैं और इसलिए वैज्ञानिकों का जितना मान-सम्‍मान होना चाहिए, वैज्ञानिकों के योगदान की जितनी सराहना होनी चाहिए, उसको जितना बल मिलेगा, उतनी भावी पीढि़यों का कल्‍याण होगा।

दुर्भाग्‍य से हमारे देश में, हमारी अपनी कठिनाइयां हैं देश की, गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ना है और इसलिए इन क्षेत्रों में जितना बजट देना चाहिए उतना दे नहीं पाते हैं। उसके बावजूद भी छोटी-छोटी lab में बैठ करके भी हमारे scientist लगातार काम करते रहते हैं और कोई न कोई नई चीजें देते रहते हैं।

लेकिन एक और कदम की ओर जाने का मैंने पिछली बार बात कही थी आपने उसको योजना के रूप में रखा, Lab To Land. laboratory में कितना ही yield आए, laboratory में चीकू नारियल जैसा बन जाए, लेकिन अगर धरती पर नहीं होता है तो वो काम नहीं आता है। इसलिए हमारी सच्‍ची कसौटी ये है कि ये जो हम सफलता पाई है lab में, उसको हमें धरती पर भी कसना चाहिए और किसानों के द्वारा कसना चाहिए। एक प्रकार से एक scientist का fellow traveler हमारा किसान बनना चाहिए। extension of the mind of the scientist should be a farmer. ये हमें व्‍यवस्‍था खड़ी करनी चाहिए और इसलिए इस योजना के तहत देश के जितने agriculture scientist है, उनकी टोली बनाकर के उनको एक-एक block गोद लेने की योजना है। उसकी lab कहीं पर भी होगी, लेकिन उसको लगेगा भई मैं जो research कर रहा हूं, उस इलाके के किसानों में उस प्रकार की रुचि है तो वो वहां उनके साथ जुड़ेगा, progressive farmer के साथ जुड़ेगा, किसानों के साथ जुड़ेगा और उसमें जो ज्ञान की संपदा है वो जमीन पर किसानों के माध्‍यम से।

और किसान का एक स्‍वभाव है, उसको भाषण-भाषण काम नहीं आते। वो तो जब तक अपनी आंख से देखता नहीं है, वो किसी चीज को मानता नहीं है। और एक बार उसने अपनी आंख से देखा तो वो फिर अपना risk लेने के लिए तैयार हो जाता है, वो संकट उठाने के लिए तैयार हो जाता है। और इसलिए आवश्‍यकता होती है कि हमने हमारी हर lab को, हर farm को lab में कैसे convert करना है, हर किसान को scientist के रूप में कैसे convert करना है। और उस यात्रा को मैं जानता हूं, आप जिस साधना को कर रहे हैं, जिस तपस्‍या को कर रहे हैं वहां से बाहर जाना थोड़ा कठिन है, लेकिन जिस दिन आप जाओगे। कोई scientist अच्‍छे से अच्‍छी दवाई की 100-100 खोज करे और परिवार को भी पता नहीं होता है कि इसने कहां काम किया है। उनको लगता है हां यार, रात देर से आते हैं अब खाना खाएंगे, सो जाएंगे। लेकिन जब पता चलता है कि फलां व्‍यक्‍ति जिंदगी से जूझ रहा था और उसकी दवाई काम आ गई, उसकी जिन्‍दगी बच गई और जब पता चलता है इस दवाई से आने वाले दिनों में ऐसे लाखों लोगों की भी जिन्‍दगी बचने वाली है तो वो परिवार भी सीना तान करके, हां हमारे उन लोगों ने किया है, मेरे पति ने किया है, मेरे भाई ने किया है। कब होता है, जब बाहर कोई उसका achievement दिखता है। आपको भी अपने lab में किया हुआ संतोष जब तक खेत में नहीं दिखता और किसान के हाथ में नहीं दिखता है, आपको संतोष नहीं हो सकता है। और वो व्‍यवस्‍था करने की दिशा में हम काम कर रहे हैं।

भारत ने first green revolution किया, उसका फायदा हमें मिला है। लेकिन अब देश second green revolution के लिए ज्‍यादा इंतजार नहीं कर सकता है। वैसे भी late हो चुके हैं। second green revolution के लिए हमें अपने आपको सज्‍ज करना होगा। किस क्षेत्र में जाना है, कैसे जाना है। first green revolution की पहली आवश्‍यकता थी कि देश को अन्‍न बाहर से लाना न पड़े, देश का पेट भरे। second green revolution का इतना मतलब नहीं हो सकता, उसका मकसद कुछ और भी हो सकता है। क्‍यों न हमारे देश के agro-economists, हमारे देश के agro-technicians, हमारे देश के agro-scientist, food security से जुड़े हुए scientist, ये सब मिलकर के workshop करें, हर level पर workshop करें। और design workout करें कि भई हां, second green revolution का model क्‍या है, priorities क्‍या हो, हमें किन चीजों के उत्‍पादन पर जाना चाहिए। उत्‍पादकता बढ़ानी है तो किस चीजों की बढ़नी चाहिए। सारे global परिवेश में, आज विश्‍व में क्‍या-क्‍या चीजों की आवश्‍यकता है और दुनिया के बहुत देश है, जिनको आर्थिक रूप से वो कुछ चीजें करना मुश्‍किल है तो वो कहते हैं कि बाहर से ले आओ भई, यहां नहीं करो। तो ऐसे कितने देश हैं जिनको ढूंढेंगे और हम बाहर से भेजेंगे।हमें एक विस्‍तृत सोच के साथ हमारे second green revolution को इस रूप में तैयार करना चाहिए।

हमारे architecture college बहुत कुछ पढ़ाती है। building के लिए तो काफी कुछ होता है, road कैसे बने उस पर भी होता है। मैं मानता हूं कि कभी इस agro scientists ने, progressive farmers ने, government ने, architecture colleges के साथ बैठकर के उनका भी syllabus बनाने की आवश्‍यकता है कि हमारे agriculture, infrastructure का architecture क्‍या हो? हमारी canal बनती हो तो कैसी आधुनिक canal बने, किस material से बने। road बनाने के लिए तो काफी research होते हैं लेकिन canal बनाने के लिए research बहुत कम होते हैं। ये मुझे पूरा paradigm shift करना है। एक मूलभूत चीजों में बदलाव लाना है और इसलिए हमारे जो architecture colleges है, उनका भी जिम्‍मा बनता है कि agro related हमारे infrastructure कैसे हो।

पुराने जमाने में, घर में हमारे गांव के अंदर, किसान परिवारों में मिट्टी की बड़ी-बड़ी कोठियां तैयार होती थीं और उसमें क्‍या material डालना है उसकी बड़ी विशेषता रहती थी। specific प्रकार का material डाल करके वो कोठी बनाई जाती थी और उस कोठी में अन्‍न भरा जाता था। वो सालों तक खराब नहीं होता था और निकालने की technique भी ऐसी होती थी, वो ऊपर से नहीं निकालते थे, नीचे से निकालते थे ताकि पुराना माल पहले निकलता था, नया माल ऊपर आता जाता था। देखिए सामान्‍य लोगों की बुद्धि कितनी कमाल की रहती थी। ये जो कोठार बनते थे या कोठी बनती थी जिसमें सामान भरा जाता था वो कौन सी चीजों का, उनको ज्ञान था कि जिसके कारण हमारे agro-product को इतने लंबे समय तक संभाल पाते थे। preservation के संबंध में हमारे यहां technically कितना काम हुआ है। हमारे यहां अचार, अचार की जो परंपरा है। उस समय ये technology कहां थी जी। गांव की गरीब महिला भी अचार इस प्रकार से preserve करती थी कि साल भर अचार खराब नहीं होता था। मतलब कि विज्ञान उस घर की गली तक पहुंचा हुआ था। हम बदले हुए युग में, इन चीजों को और अधिक अच्‍छे तरीके से कैसे करें, ताकि हमारे agriculture sector में।



क्योंकि आज wastage एक बहुत बड़ी चिन्‍ता का विषय है। value addition पर हमें जाना पड़ेगा। किसान इतनी मेहनत करे और उसकी पकाई हुई चीजें अगर बर्बाद होती है तो कितना बड़ा नुकसान होता है। मैं agro scientists से आग्रह करता हूं कि आप एक काम करके research कीजिए और मुझे छ महीने में एक report दे सकते हैं क्‍या ? मैं एक दिशा में आगे बढ़ना चाहता हूं।

हमारे किसान फल पैदा करते हैं लेकिन फल की उम्र बहुत कम होती है। बहुत ही कम समय में खराब हो जाते हैं। उसका packaging भी बड़ा महंगा होता है क्‍योंकि एक-एक चीज को संभालना पड़ता है। अगर दब गए तो और खराब हो जाते हैं। वो फल जिसमें से juice निकलता है। ये जितने aerated water बाजार में बिकते हैं। भांति-भांति का taste होता है। मुझे तो नाम भी पूरे याद नहीं है लेकिन कई प्रकार की bottles में लोग पीते रहते हैं। coca-cola और fanta और क्‍या-क्‍या नहीं, thums-up. क्‍या हम natural fruit, उसका 1 percent, 2 percent, 5 percent natural juice उसमें mix कर सकते हैं क्‍या। अगर ने natural fruit का juice उसमें mix होता है इस aerated water में। उसका market बहुत बड़ा है। मैं विश्‍वास से कहता हूं हिन्‍दुस्‍तान में जो किसान फल पैदा करता है उसको कभी wastage की नौबत नहीं आएगी, उसका माल खेत से ही बिक जाएगा और 5 percent अगर उसमें mix हो गया। उसका माल खेत से ही बिक जाएगा और 5% उसमें अगर mix हो मेरे फल पैदा करने वाला किसान कभी दु:खी नहीं होगा। लेकिन ये साइंटिस्‍ट जब तक खोज करके नहीं बताएंगे वो कंपनियों को मनवाना जरा कठिन हो जाता है। क्‍या हम इस प्रकार की research कर सकते है, हम समझा सकते है कि these are the results । आप अगर 5% उसके अंदर natural fruit juice डालते है तो आपके market को कोई तकलीफ नहीं होगी, आपकी चीज के test में कोई तकलीफ नहीं होगी आपकी product और अच्‍छी बनेगी और उसमें आपका nutrition value भी जाएगा, जो ultimately आपके business को benefit करेगा। हम किस प्रकार से नई चीजों को करें उस पर हमें सोचने की आवश्‍यकता है।

हमने जो initiatives लिए है कुछ चीजों पर हम ये मान के चले के दुनिया में, बहुत बड़ी मात्रा में उत्‍पादकता पर बल दिया जाता है। हमें भी जमीन कम होती जा रही है, परिवार विस्‍तृत होते जा रहे हैं, एक-एक परिवार में जमीन के टुकड़े बंटते चले जा रहे हैं। हमें पर एकड़ उत्‍पादकता कैसे बड़े, उस पर बल दिए बिना हमारा किसान सुखी नहीं हो सकता है। हमें वो देना पड़ेगा।

पिछली बार मैंने मेरे मन की बात में कहा था किसानों से कि देश को pulses और oil seeds की बड़ी आवश्‍यकता है। तिलहन और दलहन... देखिए मैं इस देश के किसानों को जितना नमन करूं उतना कम है। उस बात को उन्‍होंने माना और इस बार अभी तक जो खबर आई हैं कि record-break showing दलहन और तिलहन का हमारे किसानों ने दिया है। वरना वो crop change करने को तैयार नहीं था लेकिन उसने माना कि भई देश को जरूरत है चलिए हम बाकि छोड़ देते है इस बार दलहन और तिलहन में चले जाते है और बहुत बड़ी मात्रा में शायद मुझे लगता है डेढ़ गुना हो जाएगा, दो गुना अब ये-ये मैं समझता हूं कि अपने-आप में और भारत को import करना पड़ता है।

हमारे agriculture साइंटिस्‍टों ने और progressive farmers ने और government ने बैठ करके तय करना चाहिए। भारत चूंकि कृषि प्रधान देश है। हम तय करें कि agriculture sector की कितनी चीजें अभी भी हम import करते है और हम तय करें कि फलाने-फलाने वर्ष के बाद हमें agriculture sector में कम से कम कुछ भी import नहीं करना पड़ेगा। हम स्‍वयं आत्‍मनिर्भर बनेंगे, हमारे किसान को इस काम के लिए प्रेरित करना पडेगा। हमें targeted काम करना पड़ेगा जी तब जा करके हमारे किसान को आर्थिक रूप से लाभ होगा। अगर वो नहीं करेगे तो लाभ नहीं होगा। आज भी अगर कृषि प्रधान देश को five star होटलों में कुछ सब्जियां विदेश से मंगवानी पड़ती है। हमारा किसान भी तो तैयार कर सकता है, उसको जरा ज्ञान मिल जाए, पद्धति मिल जाए वो कर सकता है। देश की आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता किसान में है, आवश्‍यकता है कि ज्ञान का भंडार और किसान का सामर्थ्‍य इसको जोड़ना और उसको जोड़ने की दिशा में हमने प्रयास किया है। कुछ चीजें बड़ी सरल है जिसको हम कर सकते है और करना चाहिए।

कभी-कभार हमारे किसान को जीवन में ज्‍यादातर हमारे यहां कोई उतना irrigation network तो है नहीं ज्‍यादातर हमारा किसान परमात्‍मा की कृपा पर निर्भर है, बारिश हुई तो अच्‍छी बात ,है नहीं हुई तो मुसीबत है। उसकी extra income के जो रास्‍ते है। उसमें पशुपालन हो, poultry farm हो, मतस्‍य उद्योग हो ये थोड़ा बहुत प्रचलित है। लेकिन हमारा एक बात पर ध्‍यान नहीं गया है और वो है शहद पर.. honey bee.. globally बहुत बड़ा market है और कम-से-कम मेहनत वाला काम है और उसमें बिगड़ने का कोई chance नहीं है और उत्‍पादन भी बिकेगा अगर शहद bottle में भर दिया तो 2-5-10 साल तक तो उसको कुछ नहीं होता है। आज देश में, मुझे बताया गया शायद 5 लाख किसान शहद की activity से जुड़े हैं। ये हम target करके 5 करोड़ पर पहुंचा सकते हैं। एक साल, दो साल, तीन साल में। उसकी income कितनी बढ़ेंगी आप कल्‍पना नहीं कर सकते और दुनिया में market है। ऐसा नहीं कि market नहीं है। हमारे किसान को हम इस प्रकार से नई-नई चीजों के साथ कैसे.. और उसके खेत में वैसे ही होने वाला है।

मैं नहीं जानता हूं कि हमारे scientist मित्र मेरी इन बातों को स्‍वीकार करेंगे कि नहीं करेंगे क्‍योंकि मैं न तो ऐसे ही किसानों के साथ बैठते-उठते सुनी हुए बातें मैंने जो भी ज्ञान अर्जित किया है, उसी की बात मैं कर रहा हूं।

हमारे जिस इलाके में elephants, हाथियों के कारण खेती को बड़ा नुकसान होता है जिन-जिन इलाकों में हाथी है। मैंने सुना भी है, पढ़ा भी है और मेरा मानना है कि उसमें सच्‍चाई भी है। ऐसे खेतों में अगर honey bee हो तो honey bee की आवाज़ से हाथी भाग जाता है। वो आता नहीं है। अब मुझे बताइए farmer का protection होगा कि नहीं होगा। अब ये इसको कौन समझाएगा, उससे बात कौन करेगा और कम से कम investment से इतनी बड़ी चीज को बचाता है और international science magazine इस बात को स्‍वीकार कर चुके है कि हाथी उस आवाज़ को सहन नहीं कर सकता है तो वहीं से आते ही चला जाता है पीछे। हमारे कई इलाके ऐसे हैं जहां हाथियों के कारण किसानों को परेशानी हो रही है। हम ऐसे व्‍यवहार्य चीजें और उसके साथ-साथ उसको शहद का व्‍यापार भी मिल जाएगा, उसकी आर्थिक संपदा को भी फायदा होगा।

दूसरा काम है, जो मेरे स्‍वच्‍छ भारत मिशन से भी जुड़ा हुआ है और organic farming से भी जुड़ा हुआ है। अब ये मान के चलिए कि दुनिया में organic चीजों का एक बहुत बड़ा बाजार खुल गया है। holistic health care ये by and large समाज का स्‍वभाव बना है।

अभी हमने देखा योगा दिवस पर दुनिया ने क्‍या इसको महत्‍व दिया है। वो इसी बात का परिचायक है कि holistic health care की तरफ पूरी दुनिया जागरूक हुई, उसमें युवा पीढ़ी ज्‍यादा जागृत है। कुछ लोग तो यहां तक exchange ला रहे हैं कि वो chemical से color किए हुए कपड़े पहनने के बजाए colored cotton से बना हुआ कपड़ा ही पसंद करते हैं और अब तो cotton भी कई colors में आना शुरू हुआ है। natural grow हो रहा है, genetic engineering के कारण। लेकिन organic requirement दुनिया में बहुत बढ़ रही है। हमारा किसान जिस पैदावार से एक रुपया कमाता है अगर वो organic है तो उसका एक डॉलर मिल जाता है। economically बहुत viable हो रहा है। लेकिन, उसके कुछ नियम है, कुछ आवश्‍यकताएं हैं। लेकिन एक काम हम कर सकते हैं क्‍या? आज मान लीजिए देश में vermin-composting . मान लीजिए आज 50 मिलियन टन होता है।

मैं आपको अनुमान कहता हूं। क्‍या vermin-composting हम 500 मिलियन टन कर सकते हैं क्‍या? आज अगर केंचुएं, earth warms . ये मान लीजिए देश में 10 मिलियन टन है। ये 100 मिलियन टन हो सकते हैं क्‍या। आपको कुछ नहीं करना है। सिर्फ लोगों को ज्ञान देना है, बाकी काम तो वो केंचुएं खुद कर लेंगे। और कोई भी छोटे नगर के बगल में ये काम चलता है, तो उस शहर आधा कूड़ा-कचरा वो ही साफ कर देंगे। स्वच्‍छता का काम भी चल जाएगा, composed fertilizer भी तैयार हो जाएगा और जो केंचुए का काम करते हैं उनके केंचुएं भी बिकते हैं। बहुत बड़ी मात्रा में केंचुएं बिकते हैं। एक ऐसा क्षेत्र है कि जो organic farming को बढ़ावा दे सकता है, हमारा कूड़ा-कचरा साफ हो सकता है, हमारे chemical fertilizer की requirement कम होती है, किसान की खेती सस्‍ती हो सकती है। इन चीजों को साथ लेकर के हम सब वैज्ञानिक जगत के लोग। क्‍योंकि ये बात आपके level पर आएगी तो गले उतरेगी और उसको स्‍वीकार करेगा। आप प्रयोग करके कहीं लगाओगे वो करेगा। कुछ लोग कर रहे हैं। स्‍वच्‍छता अभियान का सबसे बड़ा दूत केंचुआ बन सकता है और हमारा बहुत बड़ा काम वो कर सकता है और उससे organic farming को एक बहुत बड़ा बढ़ावा मिल सकता है। हमारी जमीन बर्बाद हो रही है। chemical के कारण उसकी उर्वरा ताकत कम होती रही है, उसकी हमें चिन्‍ता करने की आवश्‍यकता है। ये काम हो सकता है सहज रूप से। ये चीजें प्राकृतिक व्‍यवस्‍थाओं का उपयोग करते हुए की जा सकती हैं। मैं आग्रह करता हूं कि हम हमारे कृषि जीवन में जो second green revolution की ओर जा रहे है। उसको एक नए दायरे पर ले जा सकते है।

कई वर्षों से pulses में yield में भी बढ़ावा नहीं हो पा रहा है और pulses में सबसे बड़ी challenge है कि उसके protein content कैसे बढ़े? क्‍योंकि भारत जैसा देश जहां दलहन से ही protein प्राप्‍त होता है गरीब को, protein content ज्‍यादा हो इस प्रकार का दलहन का निर्माण कैसे हो? ये हमारे scientist lab के अंदर mission के रूप में काम करें। हम उसमें achieve कर सकते है परिणाम मिल सकता है।

हमारे देश का तिरंगा झंडा और उसमें blue colour का चक्र। मैं मानता हूं देश में चर्तुर क्रांति की आवश्‍यकता है। तिरंगें झंडे के तीन रंग जो है और blue colour का चक्र है उन चार रंगों की चर्तुर क्रांति की आवश्‍यकता है।



एक तो saffron revolution, अब saffron revolution का अर्थ पता है भांति-भांति के लोग अलग-अलग करेंगे। ऊर्जा का रंग है saffron और कहने का मेरा तात्‍पर्य है ऊर्जा क्रांति। ऊर्जा क्रांति बहुत आवश्‍यक है। अब आप देखिए बिहार इतना बड़ा प्रदेश। सिर्फ 250-300 मेगावाट बिजली का उत्‍पादन का होता है। अभी मैं भूटान गया, भूटान के अंदर hydropower project का मैंने काम शुरू किया है, उसकी maximum बिजली बिहार को मिलने वाली है...Maximum बिजली।

बिहार को आगे ले जाने के लिए आज मैंने अभी एक पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय ग्राम ज्‍योति योजना का आरंभ किया गांव में 24 घंटे बिजली। हमारे किसानों को भी अगर value addition के लिए जाना है तो उसको इस प्रकार की बिजली की सुविधा सबसे पहले चाहिए तब जा करके वो technology introduce करेगा और इसलिए हम भूटान से नेपाल से ऊर्जा के द्वारा कैसे बिजली बिहार को पहुंचे, बहुत बड़ी मात्रा में बिजली कैसे मिलें उस दिशा में काम में लगे है आज बिहार की अपनी बिजली है उसे तीन गुना का काम मैंने भूटान में जा करके कर दिया है। लेकिन उससे काम होने वाला नहीं है उसकी और जरूरत है।

दूसरा है green revolution जिसकी मैंने चर्चा की, हरा रंग है, तीसरा है white colour, white revolution और white revolution में हम जानते है। हमारा दूध उत्‍पादन, हमारे पशुओं की तुलना में दूध की quantity बहुत कम है। ये हमारी quantity कैसे बढ़े, पशुओं की संख्‍या बढ़ने से काम होना नहीं है। पशु के द्वारा ज्‍यादा दूध उत्‍पादन..... और हमारे पशुपालन को भी आधुनिक बनाना पड़ेगा। हमारे यहां जो sheeps है...भेड़े। मैंने एक छोटा प्रयोग किया था जब गुजरात में था। हमारा जो भेड़ पालने वाला होता है वो जब उसका ऊन निकालता है, उसके बाल निकालता है तो उसके पास एक कैंची होती है । उसके टुकड़े हो जाते है। टुकड़े होने के कारण जो income होती है वो इतनी income होती नहीं है। दाम कम हो जाता है। मैंने क्या किया ऐसे जितने भेड़ वाले थे उनको जो five star hotel में और नीतिश कुमार जी जिस मशीन का उपयोग करते है trimming का। मैंने सभी जो भेड़ पालक है उनको मशीन दिया और battery वाला दिया। तो आज वो क्‍या करता है साल में दो बार उस मशीन से उसके बाल निकालता है। उसकी लंबाई ज्‍यादा होने के कारण उसकी income बढ़ गई। छोटी-छोटी चीजे होती हैं जी, लेकिन सामन्‍य प्रयोगों से भी हम कितना बड़ा बदलाव ला सकते है।

हम हैरान है जी, हमारा देश इतनी सारी हम आज भी मैं नहीं मानता हूं कि हमारे यहां पशुओं के hospital में dentist की व्‍यवस्‍था नहीं होगी पशुओं के लिए। अगर हमारे दांत खराब होते हैं तो पशुओं के होते नहीं है। पशु खाता नहीं है या loose motion कर देता है। कोई पूछने को तैयार नहीं, देखने को तैयार नहीं कि उसका dental problem है। मैं जब गुजरात में था मैंने एक बड़ा अभियान चलाया था पशुओं की dental treatment का। हमारा मोतीबिंदु होता है पशु का मोतिबिंदु होता था मैं पशुओं का मोतिबिंदु का ऑपरेशन करता था बहुत बड़ी मात्रा में। मैंने अमेरिका हमारे कुछ डॉक्‍टरों को भेजा था lager technology सीखने के लिए और पशुओं का bloodless surgery कैसे हो और मैं पशुओं के bloodless surgery में सफलतापूर्वक हमारे यहां लोगों को काम पर लगाया था। हमारे पशुपालन को वैज्ञानिक तरीकों में हमें लाना पड़ेगा। उसकी भी पीड़ा को हमें समझना होगा और मैं मानता हूं, तब जा करके हम white revolution की ओर आगे बढ़ सकते हैं।

और मैंने चौथा कहा वो, blue revolution. आज भी बिहार में इतना पानी है, लेकिन बिहार, आंध्र से 400 करोड़ रुपए की मछली लाकर के खाता है। अगर हम blue revolution करें। गरीब से गरीब किसान, जहां छोटे-मोटे तालाब हैं। अगर हम उसको मत्‍स्‍य उद्योग और उसमें भी कई अब तो विशेषताएं हैं। even ornamental fish का revolution इतना बढ़ आया है। बहुत बड़ा market है, global market है, ornamental fish का। हम अगर इस blue revolution की ओर भी उतना ही ध्‍यान दें और ये सारी चीजें हैं जो ultimately गांव-गरीब किसान का भला करती है और इसलिए हम इन बातों को लेकर के हमारे वैज्ञानिक तौर-तरीकों के साथ ये जो हमारा तिरंगे झंडे का तीनों रंग है और चौथा हमारा blue अशोक चक्र है, उन चतुर्थ क्रान्‍ति की दिशा में कैसे आगे बढ़े और हमारे किसान भाइयों के भलाई के लिए और एक सुरक्षित आर्थिक व्‍यवस्‍था किसानों को मिले, उस दिशा में कैसे काम करे।

मैं फिर एक बार राधामोहन सिंह जी का अभिनन्‍दन करता हूं कि आज पटना में। क्‍योंकि मुझे लगता है जी हिन्‍दुस्‍तान का green revolution, second green revolution को पूर्वी उत्‍तर प्रदेश, बिहार, पश्‍चिम बंगाल, असम से ही आने वाला है। ये मैं साफ देख पा रहा हूं। और यही बिहार की धरती हिन्‍दुस्‍तान में कृषि क्रान्‍ति लाकर रहेगी और जिसका प्रारंभ आज इस कार्यक्रम से हो रहा है।

मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

Modi Govt's #7YearsOfSeva
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When science, government and society work together, results are better: PM Modi
September 28, 2021
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PM dedicates the newly constructed campus of the National Institute of Biotic Stress Management, Raipur to the Nation
PM also distributes the Green Campus Award to the Agricultural Universities
“Whenever farmers and agriculture get a safety net, their growth becomes rapid”
“When science, government and society work together, results are better. Such an alliance of farmers and scientists will strengthen the country in dealing with new challenges”
“Efforts are being made to take the farmers out of the crop based income system and encourage them for value-addition and other farming options”
“Along with our ancient farming traditions, marching towards the future is equally important”

नमस्कार जी! केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्रीमान नरेंद्र सिंह तोमर जी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्रीमान भूपेश बघेल जी, मंत्रिमंडल के मेरे अन्य सहयोगी श्री पुरुषोत्तम रुपाला जी, श्री कैलाश चौधरी जी, बहन शोभा जी, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह जी, नेता विपक्ष श्री धर्म लाल कौशिक जी, कृषि शिक्षा से जुड़े सभी वीसी, डायरेक्टर्स, वैज्ञानिक साथी और मेरे प्यारे किसान बहनों और भाइयों !

हमारे यहां उत्तर भारत में घाघ और भड्डरी की कृषि संबंधी कहावतें बहुत लोकप्रिय रही हैं। घाघ ने आज से कई शताब्दी पहले कहा था-

जेते गहिरा जोते खेत,

परे बीज, फल तेते देत।

यानि खेत की जुताई जितनी गहरी की जाती है, बीज बोने पर उपज भी उतनी ही अधिक होती है। ये कहावतें, भारत की कृषि के सैकड़ों साल पुराने अनुभवों के बाद बनी हैं। ये बताती हैं कि भारतीय कृषि हमेशा से कितनी वैज्ञानिक रही है। कृषि और विज्ञान के इस तालमेल का निरंतर बढ़ते रहना, 21वीं सदी के भारत के लिए बहुत जरूरी है। आज इसी से जुड़ा एक और अहम कदम उठाया जा रहा है। हमारे देश के आधुनिक सोच वाले किसानों को ये समर्पित किया जा रहा है और छोटे-छोटे किसानों की जिन्दगी में बदलाव की आशा के साथ ये बहुत बड़ी सौगात आज मैं मेरे देश के कोटि-कोटि किसानों के चरणों में समर्पित कर रहा हूँ। अलग-अलग फसलों की 35 नई वैरायटीज आज जारी हुई हैं। आज रायपुर में National Institute of Biotic Stress Management का लोकार्पण भी हुआ है। चार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटीज को ग्रीन कैंपस अवार्ड भी दिए गए हैं। मैं आप सभी को, देश के किसानों को, कृषि वैज्ञानिकों को बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

बीते 6-7 सालों में साइंस और टेक्नॉलॉजी को खेती से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए प्राथमिकता के आधार पर उपयोग किया जा रहा है। विशेष रूप से बदलते हुए मौसम में, नई परिस्थितियों के अनुकूल, अधिक पोषण युक्त बीजों, इस पर हमारा फोकस बहुत अधिक है। हाल के वर्षों में अलग-अलग फसलों की ऐसी 1300 से अधिक Seed Varieties, बीज की विविधताएं तैयार की गई है। इसी श्रंखला में आज 35 और Crop Varieties देश के किसानों के चरणों में समर्पित की जा रही हैं। ये Crop Varieties, ये बीज, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से खेती की सुरक्षा करने और कुपोषण मुक्त भारत के अभियान में बहुत सहायक होने वाला ये हमारे वैज्ञानिकों की खोज का परिणाम है। ये नई Varieties, मौसम की कई तरह की चुनौतियों से निपटने में सक्षम तो हैं हीं, इनमें पौष्टिक तत्व भी ज्यादा हैं। इनमें से कुछ Varieties कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए हैं, कुछ crop गंभीर रोगों से सुरक्षित हैं, कुछ जल्दी तैयार हो जाने वाली हैं, कुछ खारे पानी में हो सकती हैं। यानि देश की अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, इन्हें तैयार किया गया है। छत्तीसगढ़ के National Institute of Biotic Stress Management के तौर पर देश को एक नया राष्ट्रीय संस्थान मिला है। ये संस्थान, मौसम और अन्य परिस्थितियों के बदलाव से पैदा हुई चुनौतियों-Biotic stress इससे निपटने में देश के प्रयासों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन मिलेगा, वैज्ञानिक सहायताएं मिलेंगी और वो बहुत बल देगा। यहां से जो मैनपावर ट्रेन होगा, जो हमारा युवाधन तैयार होंगे, वैज्ञानिक मन-मस्तिष्क के साथ जो हमारा वैज्ञानिक तैयार होगा, जो यहां पर समाधान तैयार होंगे, जो solution निकलेंगे, वो देश की कृषि और किसानों की आय बढ़ाने में कारगर सिद्ध होंगे।

साथियों,

हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में फसलों का कितना बड़ा हिस्सा, कीड़ों की वजह से बर्बाद हो जाता है। इससे किसानों का भी बहुत नुकसान होता है। पिछले वर्ष ही कोरोना से लड़ाई के बीच में हमने देखा है कि कैसे टिड्डी दल ने भी अनेक राज्यों में बड़ा हमला कर दिया था। भारत ने बहुत प्रयास करके तब इस हमले को रोका था, किसानों का ज्यादा नुकसान होने से बचाने का भरपूर प्रयास किया गया था। मैं समझता हूं कि इस नए संस्थान पर बहुत बड़ा दायित्व है और मुझे विश्वास है कि यहां काम करने वाले वैज्ञानिक देश की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे।

साथियों,

खेती-किसानी को जब संरक्षण मिलता है, सुरक्षा कवच मिलता है, तो उसका और तेजी से विकास होता है। किसानों की जमीन को सुरक्षा देने के लिए, उन्हें अलग-अलग चरणों में 11 करोड़ Soil Health Card दिए गए हैं। इसकी वजह से किसानों को अपनी जो जमीन है उसकी क्या मर्यादाएं हैं, उस जमीन की क्या शक्ति है, इस प्रकार के बीज बोने से किस प्रकार की फसल बोने से अधि‍क लाभ होता है। दवाईयां कौन सी जरूरी पड़ेगी, fertilizer कौन सा जरूरी पड़ेगा, ये सारी चीजें उस Soil Health Card के कारण जमीन की सेहत का पता चलने के कारण, इसकी वजह से किसानों को बहुत लाभ हुआ है, उनका खर्चा भी कम हुआ है और उपज भी बढ़ी है। उसी प्रकार से, यूरिया की 100 परसेंट नीम कोटिंग करके, हमने खाद को लेकर होने वाली चिंता को भी दूर किया। किसानों को पानी की सुरक्षा देने के लिए, हमने सिंचाई परियोजनाएं शुरू कीं, दशकों से लटकी करीब-करीब 100 सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने का अभियान चलाया, बहुत बड़ी मात्रा में बजट लगा दिया इसके लिए, उसके कारण किसानों को पानी मिल जाए तो वो पानी से पराक्रम करके दिखाता है। उसी प्रकार से पानी बचाने के लिए हमने micro irrigation, sprinkler इन चीजों के लिए भी बड़ी आर्थि‍क मदद करके किसानों तक ये व्यवस्थाएं पहुंचाने का प्रयास किया। फसलों को रोगों से बचाने के लिए, ज्यादा उपज के लिए किसानों को नई-नई वैरायटी के बीज दिए गए। किसान, खेती के साथ-साथ बिजली पैदा करे, अन्नदाता उर्जादाता भी बने, अपनी खुद की जरूरतें भी पूरी कर सके, इसके लिए पीएम कुसुम अभियान भी चलाया जा रहा है। लाखों किसानों को सोलर पंप भी दिए गए हैं। उसी प्रकार से, आज तो मौसम के विषय में तो हमेशा दुनिया भर में चिंता का विषय बना हुआ है। अभी हमारे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री जी कितने प्रकार के प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं, climate change के कारण क्या-क्या मुसीबतें आती हैं। बड़े अच्छे ढंग से उन्होंने वर्णन किया। अब आप जानते हैं, ओलावृष्टि और मौसम की मार से किसानों को सुरक्षा देने के लिए हमने कई चीजों में परिवर्तन किये, पहले के सारे नियमों में बदलाव लाये ताकि किसान को सर्वाधि‍क लाभ हो, इस नुकसान के समय उसको दिक्कत ना आए, ये सारे परिवर्तन किये। पीएम फसल बीमा योजना, इससे भी किसानों को बहुत लाभ हो और सुरक्षा मिले, इसकी चिंता की। इस परिवर्तन के बाद किसानों को करीब-करीब ये जो प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में जो परिवर्तन लाए उसके कारण किसानों को करीब-करीब एक लाख करोड़ रुपए की क्लेम राशि का भुगतान किया गया है। एक लाख करोड़ रुपया इस संकट की घड़ी में किसान के जेब में गया है।

साथियों,

MSP में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ हमने खरीद प्रक्रिया में भी सुधार किया ताकि अधिक-से-अधिक किसानों को इसका लाभ मिल सके। रबी सीजन में 430 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा गेंहूं खरीदा गया है। इसके लिए किसानों को 85 हजार करोड़ से अधिक का भुगतान किया गया है। कोविड के दौरान गेहूं खरीद केंद्रों की संख्या 3 गुना तक बढ़ाई है। साथ ही दलहल-तिलहन इन खरीद केन्द्रों की संख्या भी तीन गुना बढ़ाई गई है। किसानों की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए किसान सम्मान निधि के तहत 11 करोड़ से अधिक हमारे हर किसान को और उसमें ज्यादातर छोटे किसान हैं। 10 में से 8 किसान हमारे देश में छोटे किसान हैं, बहुत छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े पर पल रहे हैं। ऐसे किसानों को करीब-करीब 1 लाख 60 हजार करोड़ से भी ज्यादा रुपए सीधे उनके बैंक अकाउंट के पास भेजे गए हैं। इसमें से एक लाख करोड़ रुपए से अधिक राशि तो इसी कोरोना काल में भेजी गई है। किसानों को टेक्नोलॉजी से जोड़ने के लिए हमने उन्हें बैंकों से मदद की और उस मदद की पूरी प्रक्रिया को बहुत आसान बनाया गया है। आज किसानों को और बेहतर तरीके से मौसम की जानकारी मिल रही है। हाल ही में अभियान चलाकर 2 करोड़ से ज्यादा किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दिए गए हैं। मछली पालन करने वाले और डेयरी सेक्टर से जुड़े किसानों को भी KCC से जोड़ा गया है। 10 हजार से ज्यादा किसान उत्पादक संगठन हों, e-Nam योजना के तहत ज्यादा से ज्यादा कृषि मंडियों को जोड़ना हो, मौजूदा कृषि मंडियों का आधुनिकिकीकरण हो, ये सारे कार्य तेज गति से किए जा रहे हैं। देश के किसानों और देश की कृषि से जुड़े जो काम बीते 6-7 वर्षों में हुए हैं, उन्होंने आने वाले 25 वर्षों के बड़े राष्ट्रीय संकल्पों की सिद्धि के लिए क्योंकि 25 साल के बाद हमारा देश आजादी की शताब्दी मनाएगा, आज हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, 25 साल के बाद आजादी की शताब्दी मनाएंगे और इसके लिए इन 25 वर्षों के बड़े राष्ट्र संकल्पों की सिद्ध‍ि के लिए एक बड़ा मजबूत आधार बना दिया है। बीज से लेकर बाजार तक हुए ये कार्य एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में भारत की प्रगति की गति को सुनिश्चित करने वाले हैं।

साथियों,

हम सब जानते हैं कि Agriculture एक प्रकार से राज्य का विषय है और इसके विषय में अनेक बार लिखा भी जाता है कि ये तो राज्य का विषय है, भारत सरकार को इसमें कुछ नहीं करना चाहिए, ऐसा भी कहा जाता है क्योंकि State subject है और मैं जानता हूं क्योंकि मुझे भी कई वर्षों तक गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का अवसर मिला था, गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए क्योंकि राज्य की भी विशेष जिम्मेवारी है, ये मैं जानता था और इस जिम्मेवारी को मुझे निभाना चाहिए, ये मुख्यमंत्री होने के नाते मैं पूरी कोशि‍श करता था। गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए मैंने कृषि व्यवस्था को, कृषि नीतियों और उनके खेती पर प्रभावों को बहुत निकट से अनुभव किया और अभी हमारे नरेंद्र सिंह तोमर जी, मेरे गुजरात के कार्यकाल में मैं क्या काम कर रहा था उसका भी ये बड़ा वर्णन कर रहे थे। एक समय था जब गुजरात में खेती कुछ फसलों तक ही सीमित थी। गुजरात के एक बड़े हिस्से में पानी के अभाव में किसान खेती छोड़ चुके थे। उस समय एक ही मंत्र को लेकर हम चले, किसानों को साथ लेकर के चले और मंत्र था- स्थिति बदलनी चाहिए, हम मिलकर स्थितियां ज़रूर बदलेंगे। इसके लिए उस दौर में ही हमने साइंस और आधुनिक टेक्नॉलॉजी का व्यापक उपयोग शुरू कर दिया था। आज देश के Agriculture और Horticulture में गुजरात की एक बड़ी हिस्सेदारी है। अब आज गुजरात में 12 महीने खेती होती है। कच्छ जैसे क्षेत्रों में भी आज वो फल-सब्जियां पैदा होती हैं, जिनके बारे में कभी सोच नहीं सकते थे। आज कच्छ के रेगिस्तान में से वहां की कृषि‍ पैदावार विदेशों में export होना शुरू हुआ है।

भाईयों और बहनों,

सिर्फ पैदावार पर ही फोकस नहीं किया गया, बल्कि पूरे गुजरात में कोल्ड चेन का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार किया गया। ऐसे अनेक प्रयासों से खेती का दायरा तो बढ़ा ही, साथ ही खेती से जुड़े उद्योग और रोज़गार भी बड़ी मात्रा में तैयार हुए और क्योंकि एक मुख्यमंत्री होने के नाते राज्य सरकार की सारी जिम्मेवादी होती है तो मुझे उस समय इन सारे कामों को करने का एक अच्छा सा अवसर भी मिला और मैंने पूरी मेहनत भी की।

भाइयों और बहनों,

खेती में हुए ऐसे ही आधुनिक परिवर्तनों को आज़ादी के इस अमृतकाल में और विस्तार देने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन खेती ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे इकोसिस्टम के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। मौसम में बदलाव से हमारा मत्स्य उत्पादन, पशुओं का स्वास्थ्य और उत्पादकता बहुत अधिक प्रभावित होती है। इसका नुकसान किसानों को, मछुआरे साथियों को उठाना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के कारण जो नए प्रकार के कीट, नई बीमारियां, महामारियां आ रही हैं, इससे इंसान और पशुधन के स्वास्थ्य पर भी बहुत बड़ा संकट आ रहा है और फसलें भी प्रभावित हो रही है। इन पहलुओं पर गहन रिसर्च निरंतर ज़रूरी है। जब साइंस, सरकार और सोसायटी मिलकर काम करेंगे तो उसके नतीजे और बेहतर आएंगे। किसानों और वैज्ञानिकों का ऐसा गठजोड़, नई चुनौतियों से निपटने में देश की ताकत बढ़ाएगा। जिला स्तर पर साइंस आधारित ऐसे कृषि मॉडल खेती को अधिक प्रोफेशनल, अधिक लाभकारी बनाएंगे। आज जलवायु परिवर्तन से बचाव करने वाली तकनीक और प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करने के लिए जो अभियान आज लॉन्च किया गया है, उसके मूल में भी यही भावना है।

भाइयों और बहनो,

ये वो समय है जब हमें बैक टू बेसिक और मार्च फॉर फ्यूचर, दोनों में संतुलन साधना है। जब मैं बैक टू बेसिक कहता हूं तब, मेरा आशय हमारी पारंपरिक कृषि की उस ताकत से है जिसमें आज की अधिकतर चुनौतियों से जुड़ा सुरक्षा कवच था। पारंपरिक रूप से हम खेती, पशुपालन और मत्स्यपालन एक साथ करते आए हैं। इसके अलावा, एक साथ, एक ही खेत में, एक ही समय पर कई फसलों को भी उगाया जाता था। यानि पहले हमारे देश की Agriculture, Multiculture थी, लेकिन ये धीरे-धीरे Monoculture में बदलती चली गई। भिन्न भिन्न परिस्थितियों की वजह से किसान एक ही फसल उगाने लग गया। इस स्थिति को भी हमें मिलकर बदलना ही होगा। आज जब Climate Change की चुनौती बढ़ रही है, तो हमें अपने कार्यों की गति को भी बढ़ाना होगा। बीते वर्षों में इसी भावना को हमने किसानों की आय में बढ़ोतरी करने के लिए भी प्रोत्साहित किया है। किसान को सिर्फ फसल आधारित इनकम सिस्टम से बाहर निकालकर, उन्हें वैल्यू एडिशन और खेती के अन्य विकल्पों के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है और छोटे किसानों को इसकी बहुत जरूरत है और हमने पूरा ध्यान 100 में से 80 जो छोटे किसान हैं, उन पर लगाना ही है और हमारे किसानों के लिए, इसमें पशुपालन और मत्स्यपालन के साथ-साथ मधुमक्खी पालन, खेत में सौर ऊर्जा उत्पादन, कचरे से कंचन- यानि इथेनॉल, बायोफ्यूल जैसे विकल्प भी किसानों को दिए जा रहे हैं। मुझे खुशी है कि छत्तीसगढ़ समेत देश के किसान इन्हें तेज़ी से इन सारी नई-नई बातों को अपना रहे हैं। खेती के साथ-साथ में दो-चार और चीजों का विस्तार कर रहे हैं।

साथियों,

मौसम की स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसलों का उत्पादन, हमारी पारंपरिक कृषि की एक और ताकत है। जहां सूखा रहता है, वहां उस प्रकार की फसलों का उत्पादन होता है। जहां बाढ़ रहती है, पानी ज्यादा रहता है, जहां बर्फ रहती है, वहां उस प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। मौसम के हिसाब से उगाई जाने वाली इन फसलों में न्यूट्रिशन वैल्यू भी ज्यादा रहती है। विशेषरूप से जो हमारे मोटे अनाज- मिलेट्स हैं, उनका बहुत महत्व है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ये हमारे स्वास्थ्य को मज़बूती देते हैं। इसलिए आज की लाइफ स्टाइल से जिस प्रकार की बीमारियां बढ़ रही हैं, उनको देखते हुए हमारे इन मिलेट्स की डिमांड बहुत अधिक बढ़ रही है।

मेरे किसान भाईयों-बहनों,

आपको जानकर खुशी होगी भारत के प्रयासों से ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने अगले वर्ष यानि 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स घोषित किया है। ये मिलेट्स की खेती की हमारी परंपरा, हमारे अनाज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर showcase करने का और नए बाज़ार तलाशने का बहुत बड़ा अवसर है। लेकिन इसके लिए अभी से काम करना पड़ेगा। आज इस अवसर पर मैं देश के सभी सामाजिक और शैक्षि‍क संगठनों से कहूंगा कि मिलेट्स से जुड़े फूड फेस्टिवल लगाएं, मिलेट्स में से नई-नई food varieties कैसे बनें, इसकी स्पर्धाएं करें क्योंकि 2023 में अगर दुनिया में हमें अपनी बात लेकर के जाना है तो हमें इन चीजों में नयापन लाना पड़ेगा और लोगों में भी जागरुकता बढ़ाएं। मिलेट्स से जुड़ी नई वेबसाइट्स भी बनाई जा सकती हैं, लोग आएं मिलेट्स से क्या-क्या बन सकता है, क्या कैसे बन सकता है, क्या फायदा हो सकता है, एक जागरुकता अभि‍यान चल सकता है। मैं मानता हूं कि इसके फायदे क्या होते हैं, इससे जुड़ी रोचक जानकारी हम इस वेबसाइट पर रख सकते हैं ताकि लोग उसके साथ जुड़ सकते हैं। मैं तो सभी राज्यों से भी आग्रह करूंगा कि आपका राज्य का एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट, आपकी एग्रीकल्चरल यूनिवर्स्‍िटीज, आपके साइंटिस्ट और प्रोग्रेसिव किसान इनमें से कोई टास्क फोर्स बनाईए और 2023 में जब विश्व मिलेट्स ईयर मनाता होगा तब भारत को उसे कैसे योगदान करे, भारत कैसे लीड करे, भारत के किसान उसमें कैसे फायेदा उठाएं, अभी से उसकी तैयारी करनी चाहिए।

साथियों,

साइंस और रिसर्च के समाधानों से अब मिलेट्स और अन्य अनाजों को और विकसित करना ज़रूरी है। मकसद ये कि देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग ज़रूरतों के हिसाब से इन्हें उगाया जा सके। आज जिन Crops की वैरायटी लॉन्च हुई हैं, उनमें इन प्रयासों की झलक भी हमें दिख रही है। मुझे ये भी बताया गया है कि इस समय देश में डेढ़ सौ से अधिक क्लस्टर्स में वहां की परिस्थितियों के मुताबिक कृषि तकनीकों पर प्रयोग चल रहे हैं।

साथियों,

खेती की जो हमारी पुरातन परंपरा है उसके साथ-साथ मार्च टू फ्यूचर भी उतना ही आवश्यक है। फ्यूचर की जब हम बात करते हैं तो उसके मूल में आधुनिक टेक्नॉलॉजी है, खेती के नए औज़ार हैं। आधुनिक कृषि मशीनों और उपकरणों को बढ़ावा देने के प्रयासों का परिणाम आज दिख रहा है। आने वाला समय स्मार्ट मशीनों का है, स्मार्ट उपकरणों का है। देश में पहली बार गांव की प्रॉपर्टी के दस्तावेज़ तैयार करने में ड्रोन की भूमिका हम देख रहे हैं। अब खेती में भी आधुनिक ड्रोन्स और सेंसर्स के उपयोग को बढ़ाना है। इससे खेती से जुड़ा हाई क्वालिटी डेटा हमें मिल सकता है। ये खेती की चुनौतियों से जुड़े रियल टाइम समाधान तैयार करने में भी मदद करेगा। हाल में लागू की गई नई ड्रोन नीति इसमें और सहायक सिद्ध होने वाली है।

साथियों,

बीज से लेकर बाज़ार तक का जो पूरा इकोसिस्टम है, देश उसे जो तैयार कर रहा है, उसे हमें लगातार आधुनिक बनाते रहना है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, डेटा एनालिटिक्स और ब्लॉक चेन टेक्नॉलॉजी, डिमांड और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों को दूर करने में बहुत मदद कर सकती हैं। हमें ऐसे innovations, ऐसे startups को प्रमोट करना है जो इन तकनीकों को गांव-गांव तक पहुंचा सकें। देश का हर किसान, विशेष रूप से छोटा किसान, इन नए उपकरणों, नई टेक्नॉलॉजी का उपयोग करेगा, तो कृषि सेक्टर में बड़े परिवर्तन आएंगे। किसानों को कम दाम में आधुनिक टेक्नॉलॉजी उपलब्ध कराने वाले startups के लिए भी ये बेहतरीन अवसर है। मैं देश के युवाओं से इस अवसर का लाभ उठाने का आग्रह करूंगा।

साथियों,

आज़ादी के इस अमृतकाल में हमें कृषि से जुड़े आधुनिक विज्ञान को गांव-गांव, घर-घर तक पहुंचाना है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसके लिए कुछ बड़े कदम उठाए गए हैं। हमें अब कोशिश करनी है कि मिडिल स्कूल लेवल तक कृषि से जुड़ी रिसर्च और टेक्नॉलॉजी हमारे स्कूली पाठयक्रम का भी हिस्सा बने। स्कूलों के स्तर पर ही हमारे विद्यार्थियों के पास ये विकल्प हो कि वो कृषि को करियर के रूप में चुनने के लिए खुद को तैयार कर सकें।

साथियों,

आज जो अभियान हमने शुरु किया है, इसको जनआंदोलन में बदलने के लिए हम सभी को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी है। देश को कुपोषण से मुक्ति देने के लिए जो अभियान चल रहा है, राष्ट्रीय पोषण मिशन को भी ये अभियान सशक्त करेगा। अब तो सरकार ने ये भी फैसला लिया है कि सरकारी योजना के तहत गरीबों को, स्कूलों में बच्चों को, फोर्टिफाइड चावल ही दिया जाएगा। हाल में ही मैंने अपने ओलंपिक चैंपियंस से कुपोषण को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए हर एक खि‍लाड़ी से मैने आग्रह किया था, कि आप कम से कम आने वाले एक-दो साल में कम से कम 75 स्कूलों में जाने का आग्रह किया था, वहां विद्यार्थि‍यों से पोषण के संबंध में बाते करें, खेल-कूद के संबंध में बाते करें, physical exercise के संबंध में बाते करें। आज मैं सभी शिक्षाविदों, सभी कृषि वैज्ञानिकों, सभी संस्थानों को कहूंगा कि आप भी आज़ादी के अमृत महोत्सव के लिए अपने लक्ष्य तय करें। 75 दिन का अभि‍यान उठा ले कोई, 75 गांवों को गोद लेकर के परिवर्तन का अभि‍यान उठा लें, 75 स्कूलों को जागरुक करके हर एक स्कूल को कोई काम में लगा दे, ऐसा एक अभियान अगर देश के हर जिले में अपने स्तर पर भी और संस्थानों के स्तर पर भी चलाया जा सकता है। इसमें नई फसलों, फोर्टिफाइड बीजों, जलवायु परिवर्तन से बचाव को लेकर किसानों को जानकारी दी जा सकती है। मुझे विश्वास है कि हम सबका प्रयास, ये सबका प्रयास बहुत महत्वूपर्ण है, हम सबका प्रयास मौसम के बदलाव से देश की खेती को बचाएगा, किसान की समृद्धि और देश के स्वास्थ्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगा। एक बार फिर सभी किसान साथियों को, नई क्रॉप वैरायटी और नए राष्ट्रीय रिसर्च संस्थान के लिए मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई। फिर से एक बार जो जिन यूनिवर्सिटियों ने आज पुरस्कार पाए ताकि वैज्ञानिक व्यवस्था ही, वैज्ञानिक मन ही, वैज्ञानिक तरीका ही चुनौतियों से मुक्ति पाने के उत्तम रास्ते दे सकता है, उन सबको मेरी तरफ से बहुत-बहुत शुभकामनाएं !

बहुत-बहुत धन्यवाद !