PM Modi speaks at the 46th Indian Labour Conference
The country cannot be happy, if the worker is unhappy. As a society, we need to respect the Dignity of Labour: PM
If we want to move ahead, we need to give opportunities to our youth. Giving opportunities to apprentices is the need for the hour: PM Modi

केंद्र और राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न सरकारों के प्रतिनिधि बंधु गण,

ये भारत की श्रम-संसद है और एक लंबे अरसे से हमारे देश में त्रिपक्षीय वार्ता का सिलसिला चला है। एक प्रकार से ये त्रिपक्षीय वार्ता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ये अपने आप में एक उज्‍ज्‍वल इतिहास है कि 75 साल का हमारे पास एक गहरा अनुभव है। उद्योग जगत सरकार एवं श्रम संगठन गत 75 वर्ष से लगातार बैठ करके विचार-विमर्श करके मत भिन्‍नताओं के बीच भी मंथन करके अमृत निकालने का प्रयास करते रहे हैं। और उसी संजीवनी से देश को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और उसी कड़ी में आज यह श्रम संसद हो रहा है। हम सबके लिए प्रेरणा की बात है कि यह वो समारोह है जहां कभी बाबा साहेब अंबेडकर का मार्ग दर्शन मिला था। यह वो समारोह है जिसे कभी भारत के भूत-पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमान वीवी गिरि जी का मार्ग दर्शन मिला था। अनेक महानुभावों के पद चिन्‍हों पर चलते-चलते आज हम यहां पहुंचे हैं। समय का अपना एक प्रभाव होता है। आज से 70-75 साल पहले जिन बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होती थी वो आज जरूरत नहीं होगी और आज जिन बिंदुओं पर विचार करने की आवश्‍यकता है हो सकता है 25 साल बाद वह भी काल बाह्य हो जाए, क्‍योंकि एक जीवंत व्‍यवस्‍था का यह लक्षण होता है, नित्‍य नूतन, नित्‍य परिवर्तनशील और अच्‍छे लक्षण की पूर्ति के लिए एकत्र होकर आगे बढ़ना है। इस बात में कोई दुविधा नहीं है। इस बात में कोई मत-मतांतर नहीं है कि राष्‍ट्र के निर्माण में श्रमिक का कितना बड़ा योगदान होता है, चाहे वो किसान हो मजदूर हो, वो unorganized लेबर का हिस्‍सा हो, और हमारे यहां तो सदियों से इन सबको एक शब्‍द से जाना जाता है- विश्‍वकर्मा। विश्‍वकर्मा के रूप में जिसको जाना जाता है, माना जाता है और इसलिए अगर श्रमिक रहेगा दुखी , तो देश कैसे होगा सुखी? और मैं नहीं मानता हूं कि इन मूलभूत बातों में हममें से किसी में कोई मतभेद है। मैं श्रम को एक महायज्ञ मानता हूं जिसमें कोटि अवधि लोग अपनी आहूति देते हैं। सिर्फ श्रम की नहीं, कभी-कभार तो सपनों की भी आहूति देते हैं और तब जा करके किसी ओर के सपने संजोए जा सकते हैं। अगर एक श्रमिक अपने सपनों को आहूत न करता तो किसी दूसरे के सपने कभी संजोए नहीं जा सकते। इतना बड़ा योगदान समाज के इस तबके का है और इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करते हुए हमने आगे किस दिशा में जाना है उस पर हमें आगे सोचना होगा। जब तक श्रमिक, मालिक- उनके बीच परिवार भाव पैदा नहीं होता है, अपनेपन का भाव पैदा नहीं होता है। मालिक अगर यह सोचता है कि वो किसी का पेट भरता है और श्रमिक यह सोचता है कि मेरे पसीने से ही तुम्‍हारी दुनिया चलती है तो मैं नहीं समझता कि कारोबार ठीक से चलेगा। लेकिन अगर परिवार भाव हो, एक श्रमिक का दुख मालिक को रात को बैचेन बना देता हो, और फैक्‍टरी का हुआ कोई नुकसान श्रमिक को रात को सोने न देता हो, यह परिवार भाव जब पैदा होता है तब विकास की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता | और यह जिम्‍मेवारी जब हम निभाएंगे तब जाकर के, मैं तो चाहूंगा कभी यह भी सोचा जा सकता है क्‍या। इन सारी चर्चाओं का कभी वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन होने की आवश्‍यकता है। ऐसे बड़े उद्योग और ऐसे छोटे उद्योग या मध्‍यम दर्जे के उद्योग 50 साल पुराने है, लेकिन कभी हड़ताल नहीं हुई है क्‍या कारण होगा। उसको चलाने वाले लोगों की सोच क्‍या रही होगी। उन्‍होंने उनके साथ किस प्रकार से नाता जोड़ा है, क्‍या हम आज नए उद्योगकारों को, establish उद्योगकारों को , उनको यह नमूना दिखा सकते हैं कि हमारे सामने, हमारे ही देश में, इसी धरती में ये 50 उद्योग ऐसे हैं जो 50 साल से चल रहे हैं। हजारों की तादाद में श्रमिक है। लेकिन न कभी संघर्ष हुआ है, न कभी हड़ताल हुई है, न उनकी कोई शिकायत, न इनकी कोई शिकायत। एक मंगलम माहौल जिन-जिन इकाईयों में है, कभी उनको छांटकर निकालना चाहिए और उस मंगलम का कारण क्‍या है, इस मंगल अवस्‍था को प्राप्‍त करने के उनके तौर तरीके क्‍या है। अगर इन चीजों को हम श्रमिकों के सामने ले जाएंगे, इन चीजों को हम उद्योगकारों के सामने ले जाएंगे तो उनको भली-भांति समझा सकते हैं और मंगलम का माहौल जहां होगा, वहां यह भी नजर आया होगा कि सिर्फ श्रमिक का असंतोष है, ऐसा नहीं है। वहां यह भी ध्‍यान में आया होगा कि उस उद्योग का विकास भी उतना ही हुआ होगा और उन श्रमिकों का विकास भी उतना ही हुआ होगा। जब तक हम इस भावनात्‍मक अवस्‍था को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास नहीं करते और जो सफल गाथाएं हैं और उन सफल गाथाओं को हम उजागर नहीं करते, मैं नहीं मानता हूं कि हम सिर्फ कानूनों के द्वारा बंधनों को लगाते-लगाते समस्‍याओं का समाधान कर पाएंगे। हां, कानून उनके लिए जरूरी है कि जो किसी चीज को मानने को तैयार नहीं होते, श्रमिक को इंसान भी मानने को तैयार नहीं होते। उनकी सुख-सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उसकी minimum आवश्‍यकताओं की ओर भी देखने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों को कानूनों की उतनी ही जरूरत होती है और इसलिए हम इस व्‍यवस्‍था को उस रूप में समझकर चलाएं। एक सामाजिक दृष्‍टि से भी हमारे यहां सोचने की बहुत आवश्‍यकता है। किसी न किसी कारण से हमारे भीतर एक बहुत बड़ी बुराई पनप गई है। हमारी सोच का हिस्‍सा बन गई है। हर चीज को देखने के हमारे तरीके की आदत सा बन गयी है और वो है हम कभी भी श्रम करने वाले के प्रति आदर के भाव से देखते ही नहीं। कोई बढ़िया कपड़े पहन करके हमारे दरवाजे की घंटी बजाए, दोपहर दो बजे हम आराम से सोए हों, कोट-पैंट सूट पहनकर आए और घंटी बजाए तो नींद खराब होगी ही होगी, दरवाजा खोलेंगे और जैसे ही उसको देखेंगे तो कहेंगे आइए आइए कहां से आए हैं, क्‍या काम था, बैठिए-बैठिए। और कोई ऑटो रिक्‍शा वाले ने घंटी बजाई, पता नहीं चलता है दोपहर दो बजे हम सोते हैं, इस समय घंटी बजा दी। क्‍यों भई यह फर्क क्‍यों?



यह जो हमारी सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी कमी आई है सदियों के कारण आई हुई है। लेकिन कभी न कभी dignity of labour , श्रम की प्रतिष्‍ठा, श्रमिक का सम्‍मान ये समाज के नाते अगर हम स्‍वभाव नहीं बनाएंगे तो हम हमारे श्रमिकों के प्रति जो कि उसके बिना हमारी जिन्‍दगी नहीं है, अगर कोई धोबी बढ़िया सा iron नहीं करता तो मैं कुर्ता पहनकर कहां से आता यहां और इसलिए जिनके भरोसे हमारी जिन्‍दगी है उनके प्रति सम्‍मान का भाव यह सामाजिक चरित्र कैसे पैदा हो, उसके लिए हम किस प्रकार से व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करे। हमारे बच्‍चों की पाठ्य पुस्‍तकों में उस प्रकार के syllabus कैसे आए ताकि सहज रूप से आनी वाली पीढ़ियां हमारे श्रमिक के प्रति सम्‍मान के भाव से देखने लगे। आप देखिए माहौल अपने आप बदलना शुरू हो जाएगा। हमारी सरकार को सेवा करने का अवसर मिला है, श्रम संगठनों के साथ लगातार बातचीत चल रही है और त्रिपक्षीय बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं। कई पुरानी-पुरानी गुत्‍थियां हैं, सुलझानी है और मुझे विश्‍वास है कि देश के श्रमिकों के आशीर्वाद से इन गुत्‍थियों को सुलझाने में हम सफल होंगे और समस्‍याओं का समाधान करने में हम कोई न कोई रास्‍ते खोजते चलेंगे। और सहमति से कानूनों का भी परिवर्तन करना होगा। कानूनों में कोई कुछ जोड़ना होगा, कुछ निकालना होगा वो भी सहमति से करने का प्रयास, प्रयास करते ही रहना चाहिए और निरंतर प्रक्रिया चलती रही है, आगे भी चलती रहने वाली है। कोई भी सरकार आए, ये कोई आखिरी कार्यक्रम कभी होता नहीं है और इसलिए मैं समझता हूं कि इस प्रक्रिया का अपना महत्‍व है। मेरा विश्‍वास रहा है- ‘minimum government , maximum governance’ और इसलिए ये जो कानूनों के ढेर हैं कानूनों का ऐसा कहीं खो जाए इन्‍सान। पता नहीं इतने कानून बनाये कर रखे हुए और हरेक को अपने फायदे वाला कानून ढूंढ सकते हैं ऐसी स्थिति है। हर कोई उद्योगकार एक ही कानून में से उद्योगकार को अपने मतलब का कानून निकलाना है तो वो भी निकाल सकता है सामाजिक संगठन को निकालना है तो वो भी निकाल सकता है, सरकार को निकालना है तो वो भी निकाल सकती है। क्‍योंकि टुकड़ों में सब चीजें चलती रही हैं | जब तक हम एक एकत्रित भाव से, composite भाव से, हमें जाना कहां है उसको ले करके , और इसीलिए मैंने एक कमेटी भी बनाई है के इन सबमें जो पुराने कानूनों को जरा देखरेख में सही कैसे किया जाए। और सच्‍चे अर्थ में जिनके लिए बनाए गए हैं कानून उनको लाभ हो रहा है या नहीं हो रहा। वरना कोई और जगह पर ऐसा कानून बनके बैठा हुआ है जो इसको आगे ही नहीं जाने देता। अब श्रमिक कहां लड़ेगा, कहां जाएगा। वो क्‍या कोर्ट कचहरी में इतने महंगे वकील रखेगा क्‍या। और इसलिए मेरा यहा आग्रह है और मैं ये कोशिश कर रहा हूं कि ये कानूनों का एक बहुत बड़ा जाल हो गया है उसका सरलीकरण हो, गरीब से गरीब व्‍यक्ति भी अपने हकों को भली भांति समझ पाएं, हकों को प्राप्‍त कर पाएं। ऐसी व्‍यवस्‍थाओं को हमने विकसित करने की दिशा में हमारा प्रयास है और मेरा विश्‍वास है कि हम उसको कर पाएंगे। मैं कभी-कभी उद्योग जगत के मित्रों से भी कहना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कभी हमारे इस Forum में एक और पहलू पर भी हम सोच सकते हैं क्‍या, क्‍योंकि हमने अपने एजेंडे को बड़ा सीमित कर दिया है। और जब तक उसका दायरा नहीं बढ़ाऐंगे पूरे माहौल में बदलाव नहीं आएगा। कितने उद्योगार हैं जिन्‍होंने अपने उद्योग चलाते-चलाते ऐसा माहौल बनाया, ऐसी व्‍यवस्‍था बनाई कि खुद का ही काम करने वाला एक मजदूर आगे चल करके Entrepreneur बना। कभी ये ऐसे ही तो खोज के निकालना चाहिए क्‍या उद्योगकार का यही काम है क्‍या। क्‍या 18-20 साल की उम्र में उसके यहां आया वो 60 साल का होने के बाद किसी काम का न रहे तब तक उसी के यहां फंसा पड़ा रहे। क्‍या ऐसा माहौल कभी उसने बताया कि हां मेरे यहां मजदूर के यहां पे आया था लेकिन मैंने देखा भई उसमें बहुत बड़ी क्षमता है, टेलैंट है, थोड़ा मैं उसको सहारा दे दूं वो अपने-आप में एक Entrepreneur बन सकता है और मैं ही एक-आध पुर्जा बनाएगा तो मैं खुद खरीद लूंगा जो मेरी फैक्‍टरी के लिए जरूरी है तो एक अच्‍छा Entrepreneur तैयार हो जाएगा।



कभी न कभी हमें सोचना चाहिए हमारे देश में छोटे और मध्‍यम एवं बड़े उद्योगकार कितने हैं कि जो हर वर्ष अपने ही यहां काम करने वाले कितने मजदूरों को उद्योगकार बनाया हो, Entrepreneur बनाया हो, Supplier बनाया हो, कितनों को बनाया कभी ये भी तो हिसाब लगाया जाए। उसी प्रकार से हमने देखा है कि आईटी फर्म, उसके विकास का मूल कारण क्‍या है, IT Firm के विकास का मूल कारण यह है कि उन्‍होंने अपन employee को कहा कि कुछ समय तुम्‍हारा अपना समय है। तुम खुद सॉफ्टवेयर‍ विकसित करो, तुम अपने ‍दिमाग का उपयोग करो और ये motivation के कारण सॉफटेवयर की दुनिया में नई-नई चीजें वो लेकर के आए फिर वो कम्‍पनी की बनी और बाद में जा करके वो बिकी। अवसर दिया गया, हमारे इतने सारे उद्योग चल रहे हैं, मैन्‍युफैक्‍चरिंग का काम करते हैं, कैमिकल एक्टिविटी का काम करते हैं, क्‍या हमने हमारे यहां इस टैलेंट को innovation के लिए अवसर दिया है क्‍या? क्‍या उद्योगकारों को पता है कि जिसको आप अनपढ़ मानते हो, जिसको आप unskilled labour मानते हो, उसके अंदर भी वो ईश्‍वर ने ताकत दी है, वो आपकी फैक्‍टरी में एकाध चीज ऐसी बदल देता है, कि आपके प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी इतनी बढ़ जाती है, बाजार में बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हो जाता है, आप फायदा तो ले लेते हो लेकिन उसके innovation skill को recommend नहीं करते हो। मैं मानता हूं हमारे उद्योगकारों ने अपने जीवन में, सरकारों ने भी और श्रम संगठनों ने भी पूछना चाहिए कि कितने उद्योगकार हैं, कितने उद्योग हैं कि जहां पर इनोवेशन को बल दिया गया है। हर वर्ष कम से कम एक नया इनोवेटेड काम निकलता है क्‍या? हमारे यहां सेना के विशेष दिवस मनाए जाते हैं,आर्मी का, एयरफोर्स का, नेवी का। राष्‍ट्रपति जी, प्रधानमंत्री सब जाते हैं, एट-होम करते हैं वो, तो मैं पिछली बार जब हमारे सेना के लोगों के पास गया तो मैंने उनको कहा भई ठीक है ये आपका चल रहा है कि ये ही चलाते रहोगे क्‍या? हम आते हैं, 30-40 मिनट वहां रुकते हैं, चायपान होता है, फिर चले जाते हैं। मैंने कहा मेरा एक सुझाव है अगर आप कर सकते हो तो, तो बोले क्‍या है सर? मैंने कहा क्‍या फौज में ऐसे छोटे-छोटे लोग हैं क्‍या, सिपाही होंगे, छोटे-छोटे लोग हैं, लेकिन उन्‍होंने काम करते-करते कोई न कोई इनोवेशन किया है जो देश की सुरक्षा के लिए बहुत काम आता है। उसमें नया आइडिया, क्‍योंकि वो फील्‍ड में है, उसे पता रहता है कि इसके बजाय ऐसा करो तो अच्‍छा रहेगा। मैंने ये कहा तो फिर हमारे आर्मी के लोगों ने ढूंढना शुरू किया।

बहुत ही कम समय मिला था लेकिन कोई 12-15 लोगों को ले आए वो और जब उनकी innovations मैंने देखा, मैं हैरान था सेना के काम आनेवाली टेक्‍नोलॉजी के संदर्भ में, कपड़ों के संदर्भ में, इतने बारीक छोटी-छोटी चीजों में उन्‍होंने बदलाव लाकर के बताया था अगर इसको हम मल्‍टीप्‍लाई करें तो सेना के कितना बड़ा काम आएगा और भारत की रक्षा के लिए कितना बड़ा काम आएगा। लेकिन उस आखिरी इन्‍सान की तरफ देखता कौन है जी? उसकी क्षमता को कौन स्‍वीकार करता है? मुझे ये माहौल बदलना है कि मेरे उद्योगकार मित्र बहुत बड़ी डिग्री लेकर आया हुआ व्‍यक्ति ही दुनिया को कुछ देता है ऐसा नहीं है। छोटे से छोटा व्‍यक्ति भी दुनिया को बहुत कुछ दे करके जाता है, सिर्फ हमारी नजरों की तरफ नहीं होता है और इसलिए हम एक कल्‍चर विकसित कर सकते हैं, व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं कि जिसमें उन, और मैं तो चाहता हूं श्रमिक संगठन भी ऐसे लोगों को सम्‍मानित करें, उद्योग भी सम्‍मानित करें और सरकार भी श्रम संसद के समय सामान्‍य मजदूर ने की हुई इनोवेशन जिसने देश का भला किया हो, उसमा सम्‍मान करने का कार्यक्रम करके हम श्रम की प्रतिष्‍ठा कैसे बढ़ाएं उस दिशा में हमें आगे बढ़ना चाहिए। हमें एक नए तरीके से चीजों को कैसे सोचना चाहिए, नई चीजों में कैसे बदलाव लाना चाहिए, उस पर सोचने की आवश्‍यकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर हमेशा मजदूर क्‍यों रहे? उसी प्रकार से कुछ लोग ऐसे होते हैं कि पिताजी एक कारखाने में काम करते हैं, बेटा भी साथ जाना शुरू कर दिया, और वहीं काम करते, करते, करते एकाध चीज सीख लेता है और अपनी गाड़ी चला लेता है। उसके पास ऑफिशियल कोई डिग्री नहीं होती है, कोई सर्टिफिकेट नहीं होता है और उसके लिए वो हमेशा उस उद्योगकार की कृपा पर जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे बड़ा शोषणा क्‍या हो सकता है कि उसको जो जिसके यहां उसके पिताजी काम करते थे, अब उसको वहीं पर काम करना पड़ रहा है, क्‍यों, क्‍योंकि उसके पास स्किल है लेकिन स्किल को दुनिया के अंदर ले जाने के लिए एक जो सर्टिफिकेट चाहिए वो नहीं है तो कोई घुसने नहीं देता है और वो भी कहीं जाने की हिम्‍मत नहीं करता है, उसको लगता है चलिए ये ही मेरे मां-बाप हैं उन्‍होंने ही मेरे बाप को संभाला था, मुझे भी संभाल लिया, चलिए भई जो दें मैं काम कर लूंगा। इससे बड़ी कोई अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती हमारी। और इसको बदलने का मेरे भीतर एक दर्द बढ़ा था और उसी में से हमने एक योजना बनाई है और मैं मानता हूं ये योजना श्रमिक के जीवन को और मैं नहीं मानता किसी श्रमिक संगठनों ने इस पर ध्‍यान गया होगा। कभी उसने सोचा नहीं होगा कि कोई सरकार श्रमिकों के लिए सोचती है तो कैसे सोचती है? हमने कहा कि जो परम्‍परागत इस प्रकार के शिक्षा पाए बिना ही चीजों को करता है भले ही उसकी उम्र 30 हो, 40 हो गई, 50 हो गई होगी, सरकार ने उसको सर्टिफाई करना चाहिए,official recognition देना चाहिए, official government का सर्टिफिकेट देना चाहिए ताकि उनका confidence लेवल बढ़ेगा, उसका मार्केट वैल्‍यू बढ़ेगा और वो एक उद्योगकार के यहां कभी अपाहिज बन करके जिन्‍दगी नहीं गुजारेगा। हमने officially ये decision लिया है।



कहने का तात्‍पर्य ये है कि हमें इन दिशाओं में सोचने की आवश्‍यकता है। हमें बदलाव करने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं। इसी प्रकार से एक बात की ओर ध्‍यान देने की मैं आवश्‍यकता समझता हूं, इसको कोई गलत अर्थ न निकाले, कोई बुरा न माने। कभी-कभार, जब चर्चा होती है कि उद्योग की भलाई, ये बात ठीक है कि देश की भलाई के लिए उद्योगों का विकास आवश्‍यक है, उद्योग की भलाई और उद्योगपति की भलाई, इसमें बहुत ही बारीक रेखा होती है। देश की भलाई और सरकार की भलाई इसमें बहुत बारीक रेखा होती है। श्रम संगठन की भलाई और श्रमिक की भलाई, बहुत बारीक रेखा होती है। और इसलिए इस बारीक रेखा की नजाकत को कभी-कभार उद्योग बचाना चाहते हैं लेकिन उनमें कभी-कभार हम उद्योगपति को बचा लेते हैं। कभी-कभार हम बात तो कर लेते हैं देश को बचाने की लेकिन कोशिश सरकार को बचाने की करते हैं। और उसी प्रकार से कभी-कभार हम बात श्रमिक की करते हैं लेकिन हम कोशिश हमारे श्रम संगठन की सुरक्षा की करते हैं। हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं, हम तीनों पार्टनर यहां बैठे हैं और तीनों ने इस बारीक रेखा की मर्यादाओं को स्‍वीकार करना होगा, letter and spirit को स्‍वीकार करना होगा तब मैं मानता हूं श्रमिक का भी भला होगा, देश के उद्योग के विकास की यात्रा भी चलेगी और देश का भी भला होगा, सरकारों की भलाई के लिए नहीं चलता होगी। और इसलिए इन मूलभूत बातों की ओर हम कैसे मिल-बैठ करके एक सकारात्‍मक माहौल बनाने के भी दस कदम हो सकते हैं, श्रमिक की भलाई के दस कदम हो सकते हैं आवश्‍यक है तो राष्‍ट्र को आगे बढ़ाने की भी दस कदम हो सकते हैं वो भी इसके साथ-साथ आना चाहिए। जब तक हम इन बातों को संतुलित रूप से आगे नहीं ले जाएंगे, तब तक हम माहौल बदलने में सफल नहीं होंगे। और मुझे विश्‍वास है कि आज की श्रम संसद में बैठ करके हम लोग उस माहौल को निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़गे। भारत में 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 साल से कम आयु की है। हमारा देश एक प्रकार से विश्‍व का सबसे नौजवान देश है। आज दुनिया को skilled workforce की आवश्‍यकता है। Skill Development और Skill India ये मिशन हमारे नौजवानों को रोजगार कैसे मिले, अगर हम जो आज रोजगारी में है जो हमारे संगठन के सदस्‍य हैं, उनकी चिन्‍ता कर-करके बैठेंगे तो हो सकता है कि उनके हितों का भी भला हो जाएगा, उनकी रक्षा भी हो जाएगी, दो-चार चीजें हम उनको दिलवा भी देंगे लेकिन यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्ति ऐसी सीमित सोच वाला नहीं है ये मेरा विश्‍वास है। यहां बैठा हुआ हर व्‍यक्ति जो आज श्रमिक है उनकी तो चिन्‍ता करता ही करता है, लेकिन जो नौजवान बेरोजगार हैं जिनको कहीं न कहीं काम मिल जाए, इसकी उसको तलाश है, हमें उनके दरवाजे बंद करने का कोई हम नहीं है। जब तक हम हमारे देश के और नौजवानों कोरोजगार देने के लिए अवसर उपलब्‍ध नहीं कराएंगे तो हम जाने-अनजाने में गरीब का कहीं नुकसान तो नहीं कर देंगे। हो सकता है वो आज गरीब है श्रमिक नहीं बन पाया है, वो दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है और इसीलिए सरकार ने एक initiative लिया है apprenticeship को प्रोत्‍साहन देना। हमें जान करके हैरानी होगी, हम सबको लगता है हमारा देश आगे बढ़ना चाहिए और कभी पीछे रहता है तो हमीं लोग कहते हैं देखो बातें बड़ी करते थे,वो तो वहां पहुंच गया ये यहां रह गया, ये हम करते ही हैं। लेकिन जो पहुंचे हैं, आज चीन के अंदर जो भी साम्‍यवादी विचार से चलने वाले मूलभूत तो लोग हैं। चीन के अंदर दो करोड़ apprenticeship पर लोग काम कर रहे हैं,चीन के अंदर। जापान में एक करोड़ apprenticeship में काम कर रहे हैं। जर्मनी बहुत छोटा देश है, हमारे देश के किसी राज्‍य से भी छोटा देश है वहां पर तीस लाख लोग apprenticeship के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे आज दुख के साथ कहना चाहिए, सवा सौ करोड़ का हिन्‍दुस्‍तान,सिर्फ तीन लाख लोग apprenticeship पर काम कर रहे हैं। मेरे नौजवानों का क्‍या होगा मैं पूछना चाहता हूं।मैं सभी श्रमिक संगठनों से पूछना चाहता हूं कि इन नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए। इन नौजवानों के लिए अवसर खुलने चाहिए कि नहीं खुलने चाहिए। और भारत को आगे बढ़ाना है तो हमारे skill को काम में लाने के लिए ये हमें अवसर देना पड़ेगा। सरकारों ने, उद्योगकारों ने भी सोचना होगा इसलिए कि कानून के दायरे में फंस जाएंगे इसलिए कोई apprenticeship किसी को देनी नहीं, किसी नौजवान को अवसर नहीं देना, ये उद्योगकार जो दरवाजे बंद करके बैठे हैं, मैं नहीं मानता हूं ये लम्‍बे अरसे तक दरवाजे बंद करके बैठ पाएंगे। देश का नौजवान लम्‍बे अरसे तक इन्‍तजार नहीं करेगा। और इसलिए मैं उद्योगकारों को विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि आपका दायित्‍व बनता है, मुनाफा कम होगा, होगा लेकिन अगर इतनी मात्रा में आपके यहां श्रमिक हैं तो इतनी मात्रा में apprenticeship, ये आपकी social responsibility का हिस्‍सा बनना चाहिए। और इस प्रकार से क्‍या हम सपना नहीं दे सकते। दो करोड़ कर न पायें ठीक है, जब कर पाएंगे, कर पाएंगे अभी कम से कम तीन लाख में से 20 लाख apprenticeship पर जा सकते हैं हम क्‍या। कम से कम इतना तो करें। करोड़ों नौजवानों को रोजगार चाहिए, कहीं से तो शुरू करें। और इसलिए मैं चाहूंगा कि जो श्रमिक आज हैं उनकी चिन्‍ता करने वाले लोगों का ये भी दायित्‍व है कि जिनकी श्रमिक बनने की संभावना है उनकी जिन्‍दगी की भीचिन्‍ता उस नौजवान की भी करने की आवश्‍यकता है जो गरीब है। पिछले 16 अक्‍टूबर को हमने श्रमेव जयते के अभियान की शुरुआत की थी। ये सर्वांगीण प्रयास है हमारा। जिन सुविधाओं की शुरुआत हमने की उनकी प्रगति आप सबकी नजर में है। यूनिवर्सल एकाउंट नम्‍बर (यूएएन) इसके माध्‍यम से प्रोविडेंट फंड के एकाउंट पोर्टेबल हो गए हैं बल्कि लगभग 4 करोड़ 67 लाख मजदूरों को digital network platform का already लाभ मिलना शुरू हो गया है। पीएफपी ऑनलाईन लाभ ले रहा है ये चीजें नहीं थीं, इन चीजों का वो लाभ ले रहा है ये ही तो श्रमिक को empower करने के लिए टेक्‍नोलॉजी का सदुपयोग करने का प्रयास किया है। जब हम सरकार में आए हमारे देश में कई लोग ऐसे थे कि जिनको पचास रुपये पेंशन मिलता था, अस्‍सी रुपये पेंशन मिलता था, सौ रुपये पेंशन मिलता था,कुछ लोग तो पेंशन लेने के लिए जाते नहीं थे क्‍योंकि पेंशन से ऑटोरिक्‍शा का खर्चा ज्‍यादा होता था। इस देश में करीब-करीब बीस लाख से अधिक ऐसे श्रमिक थे जिनको पचास रुपया, सौ रुपया, दौ सौ रुपया पेंशन मिलता था। हमने आ करके, बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लगा है, सबके लिए minimum पेंशन एक हजार रुपया कर दिया है। मैं आशा करता हूं कि हमारे श्रमिक संगठन, ये हमारा जो pro-active initiative है उसके प्रति भी उस भाव से देखें ताकि हम सबको मिल करके दौड़ने का आनंद आ जाए,चार नई चीजें करने का उमंग आ जाए क्‍योंकि हमें चलना नहीं है और मुझे मैं मानता हूं, अगर इस देश में इतने सारे प्रधानमंत्री हो गए होंगे लेकिन श्रमिकों पर किसी एक प्रधानमंत्री पर सबसे ज्‍यादा हक है तो मुझ पर। क्‍योंकि मैं उसी बिरादरी से निकल कर आया हूं, मैंने गरीबी देखी है और इसलिए गरीब के हाल को समझने के लिए मुझे कैमरामैन को लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।मैं उसको भली-भांति समझता हूँ और इसलिए जो बातें मैं बता रहा हूं। भीतर एक आग है, कुछ करना है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, वंचित, दलित, पीड़ित शोषित उनके लिए कुछ करना है। लेकिन हरेक के करने की सोच अलग होगी, रास्‍ते अलग होंगे। हमारी एक अलग सोच है, अलग रास्‍ते है लेकिन लक्ष्‍य यही है कि मेरे देश के मजदूर का भला हो, मेरे देश के गरीब का भला हो, मेरे देश के किसानों का भला हो, ये सपने लेकर के हम चल पड़े हैं। और इसलिए जैसा मैंने कहा हमने apprentice sector में सुधार किया। हमने on the job training के मौके बढ़ गए हैं, उस दिशा में हमने काम किया है। आज हमने हेल्‍थ को सेक्‍टर को ESIC 2.0 स्‍कीम को लांच किया है। हम कभी-कभार ये तो देखते हैं कि भई काम मिलना चाहिए, लेकिन कैसे मिले, मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है। उसके लिए न सरकारों को फुरसत है, न श्रमिक संगठनों को फुरसत है। उनको तो लगता है देखो यार, कागज पर दिखा दे, ये तुमको दिलवा दिया या नहीं दिलवा दिया। वो श्रमिक भी बड़ा खुश है, यार मैं इसका मेम्‍बर बन गया हूं मेरा काम हो गया। मैं इस स्‍थिति को बदलना चाहता हूं। मैं श्रमिक संगठन और सरकार की पाटर्नरशिप से आगे बढ़ना चाहता हूं। कंधे से कंधा मिलाकर के आगे चलना चाहता हूं और अगर हमने ये अस्‍पतालों की व्‍यवस्‍था को बदलने की दिशा में काम किया, अब छोटा निर्णय है कि भई हर दिन चद्दर बदलो। अब मुझे बताइए health की दृष्‍टि से, hygiene की दृष्‍टि से, ये सब जानते हैं कि बदलनी चाहिए और लोग मानते होंगे कि बदलें, लेकिन हमको मालूम है कि लोग नहीं बदलते। ठीक है, आया है patient पड़ा है। आखिरकार मुझे रास्‍ता खोजना पड़ा, मैंने कहा हर दिन की चद्दर का कलर ही अलग होगा, patient को पता चलेगा कि चद्दर बदली कि नहीं बदली। हमारे देश के बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है वो मुझे सवाल करते रहते हैं कि मोदी कुछ बड़ा ले आओ, कुछ बड़ा। बहुत सरकारें बड़ा-बड़ा ले आईं। मुझे तो मेरे गरीब के लिए जीना है, मेरे गरीब के लिए कुछ काम करना है इसलिए मेरा दिमाग इसी में चलता रहता है। यही, यही मैं सोच, और मैं दिल से बातें कर रहा हूं कि ये अन्‍य जो कई चीजें लाए हैं। हम चाहते हैं कि श्रमिक की हेल्‍थ को लेकर के चिन्‍ता होनी चाहिए, होनी चाहिए। और हमने उस दिशा में हमने एक तो उसके सारे हेल्‍थ रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए ताकि अब उसको अपना ब्‍लड टेस्‍ट का क्‍या हुआ, यूरिन टेस्‍ट का क्‍या हुआ, दुनिया भर में चक्‍कर नहीं काटना पड़ेगा। अपने मोबाइल फोन पर सारी चीजें उपलब्‍ध हो जाएं ये व्‍यवस्‍था की है ताकि श्रमिक को सुविधा कैसे हो, हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। और मैं मानता हूं कि उस काम के कारण उसको लाभ होगा।



आज हमारे देश में असंगठित मजदूर कुल मजदूरों का 93 पर्सेंट है। इस सरकार ने असंगठित मजदूरों के संबंध में बहुत ही constructive way में और well planned way में योजनाएं बनाई हैं और हम आगे बढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा कैसे मिले। न उसे स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा है, न जीवन बीमा है और न हीं पेंशन है और बड़ी संख्‍या में असंगठित ग्रामीण मजदूर अनपढ़ हैं, जिन्‍हें अपनी बात कहां कहना है, कैसे पहुंचे, इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। ऐसे मजदूर के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में सरकार का उत्‍तरदायित्‍व मानता हूं। देश के गरीब, असंगठित वर्गों को ध्‍यान में रख करके हमने तीन महत्‍वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं । और ये योजनाएं गरीब के लिए हैं। अमीर का उससे कोई लेना-देना नहीं है। और मैं मानता हूं, सभी श्रमिक संगठनों से मैं आग्रह करूंगा कि आप भी इस बात में मदद कीजिए। अगर किसी के घर में, हम कई यहां संगठन है जो असंगठित मजदूरों का काम करते हैं। कुछ लोग हैं जो घरों में बर्तन साफ करने वाले लोग होते हैं, उनका संगठन चलाते हैं। क्‍या हम कोशिश नहीं करे तो उसके मालिकों को मिल करके कहे कि भई आपके यहां ये लड़का कपड़े धोता है, बर्तन साफ करता है या खाना पकाता है या गाड़ी चलाता है। या आपका धोबी है। इसके लिए ये-ये सरकार की स्‍कीम है। आप एक मालिक हो, इसके लिए इतना पैसा बैंक में डालो, उसका जीवन भरा हो जाएगा। मैं मानता हूं हर कोई इसको करेगा। हम मध्‍यम वर्ग के लोगों को भी अगर समझाएंगे कि भई तुम्‍हारे साथ काम करने वाले जो गरीब लोग है उनको इन स्‍कीम का फायदा तुम दो। तुमको कोई महंगा नहीं पड़ने वाला है, तुम्हारे लिए तो एक फाइव स्‍टार होटल का एक खाने से ज्‍यादा का खर्च नहीं है। लेकिन उस गरीब की तो जिन्‍दगी बदल जाएगी और इसलिए हमने अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन जयोति बीमा योजना और मैं बताऊं यानी एक महीने का एक रुपया,12 महीने का 12 रुपया। एक स्‍कीम ऐसी है एक दिन का सिर्फ 80-90 पैसा। साल भर का 330 रुपया। लेकिन उसको जीवन भर उसकी व्‍यवस्‍था मिल सकती है। ये काम उसके मालिक, जिसके वहां वह काम करता है, वो कर सकते हैं और श्रमिक संगठन एक सामाजिक काम के तौर पर इस बात को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार से कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। मुझे लगता है कि इसका उसको फायदा होगा और हमने यह फायदा दिलवाना चाहिए। व्‍यवस्‍थाएं हैं, योजनाएं हैं। अटल पेंशन योजना। अगर आज से उसको जोड़ दिया जाए, समझा दिया जाए उसका तो जीवन धन्‍य हो जाएगा कि भई चलो 60 साल के बाद मुझे ये लाभ मिलेगा। मैं समझता हूं कि हम एक सामाजिक चेतना जगाने का भी काम करें, सामाजिक बदलाव का भी काम करें और उस काम को आगे बढ़ाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत सारी बातें हम कर पाएंगे। कई विषय है जिसको मैं आपके सामने रखता ही चला जाता हूं। लेकिन मुझे विश्‍वास है कि इस श्रम संसद के अंदर जो कुछ भी महत्‍वपूर्ण चर्चाएं हो रही है। हमारे वित्‍त मंत्री और उनकी एक कमेटी बनी है जो उनको सुन रही है। और बातचीत से ही अच्‍छे नतीजे निकलते हैं, सुखद परिणाम निकलेंगे। कल भी मेरी श्रम संगठन के प्रमुख लोगों के साथ मुझे मिलने का अवसर मिला था, उनको सुनने का अवसर मिला था और मैं भली-भांति उनकी बात को, उनकी भावनाओं को समझता हूं। मिल-बांट करके हमें आगे बढ़ना है और हम देश को आगे बढ़ाने में कैसे काम आएं, देश को आर्थिक नई ऊंचाइयों पर कैसे ले जाएं, देश में नौजवानों को अधिकतम रोजगार के अवसर कैसे उपलब्‍ध कराएं।

आज भारत के सामने मौका है विश्‍व के परिदृश्‍य में भारत के सामने मौका है। यह मौका अगर हमने खो दिया तो फिर पता नहीं हमारे हाथ में कब मौका आएगा और उस काम को लेकर आगे बढ़ें इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस श्रम सांसद को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, उत्‍तर परिणाम निकलेंगे इस भरोसे के साथ और साथ मिल करके आगे चलेंगे इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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The government stands firmly with the youth in the fight against drugs: PM Modi
August 02, 2026
I urge every citizen, especially our youth, to join this movement: PM
Today, as the nation has set the goal of a Viksit Bharat, it is imperative that the country's youth remain fit, brimming with self-confidence and permanently steer clear of drugs: PM
We must protect every youth from falling into the trap of addiction: PM
Society’ support, yoga and meditation give strength to our inner selves against addiction and today facilities like rehabilitation centers also help quit addiction: PM
Even if a youth has mistakenly fallen into the trap of addiction, it absolutely does not mean that all doors are closed for them: PM
We must always remember that if a child in the house falls victim to addiction, we must not hide it but seek medical help to free the child from addiction: PM
We should also create a culture of open communication with children in the family, so that you can hold their hand before they get caught in such a whirlpool: PM
I appeal to our professors to discuss the perils of drug abuse with their students and spearhead a movement against addiction on campuses to achieve significant results: PM

Namaskar!

Today, all of us citizens of India have united for a great and important resolve. Saints from across the country, governors representing different states, chief ministers, other public representatives, and more than one crore young companions connected from over 28,000 locations are part of this program. On this auspicious occasion, I especially welcome and congratulate the millions of youth who have joined for this noble pledge. This campaign is for the individual, for the family, for society, and most importantly, for the nation.

Friends,

For the Viksit Bharat Sankalp Abhiyan, the name Nasha Mukt Yuva itself makes the resolve clear. As India sets the goal of becoming a developed nation, it is essential that our youth remain healthy in body and mind, full of self-confidence, and always free from the deadly habit of drugs. This is the purpose of the campaign. We must all resolve that our youth understand the dangers of addiction, remain aware, and stay away from it. The National Nasha Mukt Yuva Abhiyan now plays a major role in this resolve.

Friends,

As the MP from Kashi, I am proud that this campaign began last year as a pilot project on its sacred soil. Along with scientific clarity, it carries spiritual energy, blessings of saints, and our great cultural heritage. It embodies the cultural dedication that has rejected intoxication for centuries. That is why more than 125 spiritual organizations have joined us for the welfare of millions. Social organizations and NGOs have also taken this pledge. Together, through the Kashi Declaration, a roadmap was prepared. Today, the idea that arose from Kashi has become a national project. From today, the Nasha Mukt Yuva campaign begins across the country.

Friends,

Some efforts, when done individually, can feel tiring or discouraging. But when they become collective movements, when millions walk shoulder to shoulder, even those who could not act alone gain new energy. Collective strength is powerful, and today this campaign will touch every young heart. Just a short while ago, millions of youth across the country took the pledge of freedom from addiction. You resolved to keep your lives free from drugs, and to spread the message of de-addiction in your schools, colleges, and communities.

Friends,

This pledge taken today will continue for 100 weeks. Every Sunday, activities related to art, culture, sports, meditation, spirituality, and service will be organized. The message of de-addiction will reach new people. These 100 Sundays will be 100 strong steps toward a drug-free India.

Friends,

Today, lakhs of students from thousands of schools, colleges, and universities are connected online with this program. Lakhs of volunteers from My Bharat are also participating. Our NSS youth are with us too. From different regions, institutions, and backgrounds, more than one crore youth are united today. You are the leaders of this great movement. You have strengthened my belief in how aware, intelligent, and responsible India’s youth are toward their duties. I extend my best wishes to all of you for this campaign.

My young friends,

You are the Amrit Peedhi of India. In the next 20–25 years, you will shape your own lives, and it is you who will carry the nation to its goal of becoming a developed India by 2047. You will be the ones sitting at the summit, enjoying the fruits of that achievement. The country needs your energy, imagination, and talent. That is why, for the sake of the nation and for your own lives, it is essential to remain free from addiction. Drugs distract focus and gradually pull youth away from their dreams. The short play performed just now beautifully conveyed the problem, the crises it creates, and the collective path to overcome it. Though brief, it was not just a play - it was a powerful message, awakening us and inspiring us to fight.

Friends,

Today we see our youth excelling in startups, leading in AI, raising the tricolor in sports, and setting new records from space to science. But when a young person falls into drug addiction, it is not just one youth who loses - a dream dies, a family breaks, society suffers. Addiction robs a mother’s smile, shatters a father’s hopes, weakens a sister’s bond, steals a younger brother’s role model, and leaves elders watching their child waste away before their eyes. When this happens in families and society, the nation’s strength also weakens. Enemies exploit this, conspiring to trap our youth in addiction as part of their terror designs, flooding drugs to earn money and destroy countries like ours. That is why we must protect every youth from falling into this trap.

Friends,

By staying free from addiction, you must protect your potential. Remember, drugs may give a temporary “high,” but they bring your career and family life “low.” We must never give addiction any acceptance.

Friends,

Our society has always seen addiction as evil. Saints and gurus have warned us against it. Even the Guru Granth Sahib says: “Jitu peetai mati doori hoi baralu pavai vichi ai. Aapna paraia na pachhanai khasmahu dhake khai.” - meaning, when a substance clouds wisdom and discernment, when one forgets the difference between self and others, such intoxication leads only to downfall.

Friends,

Our culture has always given warnings and shown ways to escape addiction. Social support, the strength of yoga and meditation, all empower our inner self against drugs. Today we also have rehabilitation centers. So if a youth falls into addiction, it does not mean all doors are closed. Families must not hide it out of social prestige. Seek help, talk openly, consult experts, and use medical support to free your child. Build a culture of open dialogue at home, so you can notice early signs - withdrawal, secrecy, late nights, unusual demands for money - and intervene before it is too late.

Friends,

I appeal to professors in colleges and universities: along with academics, talk to students about the dangers of drugs. Start a movement in your campuses. Your efforts can bring big results. And remember, those who fight and overcome addiction are not weak - they are true warriors. Society must respect them, embrace them, and give them a second chance. Their courage, not their past, defines them.

Friends,

The government stands firmly with the youth in this campaign. Strict action is being taken against drug traffickers. Arrests have multiplied, and drugs worth thousands of crores have been seized. This shows how tough our government is against drugs. I am confident that the central and state governments will continue this mission in full force. I believe our youth will remain free from addiction, preserve their energy, and advance the resolve of a developed India. Seeing so many revered saints before me today, I bow to them with respect. Spiritual and social organizations across the country, with their devotees and youth, can take this campaign forward. In the coming 100 weeks, if each organization takes responsibility for one week, leads activities nationwide, and organizes major events every Sunday, imagine the scale of the movement we can build. I thank the saints, acharyas, and leaders of organizations for blessing this noble cause. I especially congratulate the more than one crore youth who have joined today. I commend the volunteers of My Bharat - whatever they resolve, they achieve. Recently, I met some of them who spent a week in India’s border villages, once called the “last villages,” now proudly called the “first villages.” Their experiences were inspiring. Today, they have organized this massive program, a symbol of their awareness and dedication to the nation. I congratulate and salute them. I am confident that through your collective efforts, this movement will reach every home, every young heart, and become a great deterrent to drug traffickers. Let us all move forward together. My best wishes to you all!

Thank you very much!