Our focus is all-round development of India & North east cannot stay behind in this journey: PM Modi
We want to ensure that youth here gets the opportunities to fulfil their dreams: PM
We would set up Central Institute of Technology for better technical education, Kokrajhar to get deemed university status: PM
Assam gave a PM for 10 years, Congress ruled here for 15 years, still the state faces problems: PM
We want to Act East. Be it rail, roads or waterways, we want to connect our North east with entire India: PM
Our aim is housing for all by 2022 & 24/7 electricity and water: PM Modi during rally in Assam
I assure our Govt would leave no stone unturned in developing the North east region: PM Modi

मंच पर विराजमान बीटीसी के चीफ़ श्रीमान अग्रमा मोहिलरी, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी और जनप्रिय नेता श्रीमान सर्वानंद जी सोनमल, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी और डोनर के मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह जी, बीटीसी के डिप्टी चीफ़ श्रीमान खम्पा जी, श्रीमान हेमंत विश्व शर्मा जी, सांसद श्रीमान विश्वजीत और विशाल संख्या में पधारे हुए मेरे भाईयों एवं बहनों।

मैं सबसे पहले आप सबसे क्षमा मांगता हूँ क्योंकि मुझे आने में विलंब हुआ। मैं सिक्किम में था मुझे निकलने में देर हुई और आपको काफ़ी इंतज़ार करना पड़ा लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मुझे इतनी देरी नहीं हुई है जिस कारण आपको विकास के लिए इंतज़ार करना पड़े, आपको अपने हक़ के लिए लड़ाई करनी पड़े। मैं आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर यहाँ के लोगों की भलाई करने आया हूँ, आपके शक्ति, सामर्थ्य, सपनों, यहाँ के युवाओं को अवसर मिले और वे विकास की नई ऊंचाईयों को प्राप्त करें।

मैं आपके बीच में एक ऐसे समय आया हूँ जब यहाँ पर एकता और सद्भावना का माहौल है। यहाँ के राजनीतिक गुट भी अपने वाद-विवादों को पीछे रखते हुए यहाँ के लोगों की भलाई और उनके विकास के लिए आगे आए हैं। मैं इसके लिए यहाँ के नेतृत्व को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ और जो लोग जुड़ रहे हैं, उनका मैं तहे दिल से स्वागत करता हूँ। अग्रमा जी, खम्पा जी मेरे घर पर आये थे, दिल खोलकर बातें हुई थी। उनसे मिलकर मुझे यहाँ की समस्याओं को समझने का अवसर मिला तभी उन्होंने कहा कि मोदी जी, जो देना है, वो दिल खोलकर दे दीजिए क्योंकि बातें भी तो दिल खोलकर हुई थीं। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि दिल में आप समा गए हैं।

12-15 साल से जो वादे आपको किये गए, उन वादों का भी निपटारा नहीं हुआ। मैं यह तो मान सकता हूँ कि इसमें कुछ समय लग सकता है लेकिन आप हर बार वादे करें और फ़िर वादों को भुला दें, नए-नए वादें करें इस तरह के वादाखिलाफी से गुस्सा आता है, ये आपकी नाराजगी का प्रदर्शन है।

मैं आपको इतना ही कहने आया हूँ कि जो बात मैं कर रहा हूँ, उसे पूरा करने के लिए मैं जी-जान से जुड़ जाता हूँ, खप जाता हूँ। मैं हैरान हूँ कि एक पार्टी जिसने यहाँ 15 साल राज किया, ये असम प्रदेश जिसने 10 साल के लिए देश को प्रधानमंत्री दिया, 15 साल कांग्रेस ने लगातार राज किया; देखा जाए तो 60 साल तक वो ही सरकार चलाते रहे, मैं तो यह सोच रहा था कि असम में तो अब कोई समस्या हो ही नहीं सकती क्योंकि 10 साल यहाँ से प्रधानमंत्री रहे हैं और 15 साल से एक मुख्यमंत्री यहाँ सरकार चला रहे हैं। जिन्हें अपने काम का हिसाब देना चाहिए, वे सवाल पूछ रहे हैं तो फिर उन्होंने किया क्या? ये सब विफलताओं की दस्तक है। उन्हें यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि उनका अपना प्रधानमंत्री था, असम से मनमोहन सिंह जी को भेजा था लेकिन अभी समस्याओं की लंबी लिस्ट है आपकी।

भाईयों-बहनों, वे 15 साल में कुछ नहीं कर पाए और मुझसे अपेक्षा करते हैं कि मैं 15 दिन में सबकुछ कर दूँ। मुझे बताईये कि क्या ये मेरे साथ न्याय है? ये आपलोगों को गुमराह करने के लिए है लेकिन मेरा आप पर भरोसा है कि आप गुमराह नहीं होंगे। आपने उनके 15 साल देखे हैं और आपने हमारे 15 महीने भी देखे हैं। मेरे सामने कुछ बातें रखी गई थीं और आज मैं बड़े संतोष के साथ कहना चाहता हूँ कि असम के कार्बी मिकिर जनजाति को मैदानी इलाके में अनुसूचित जनजाति के रूप में और असम के बोडो काछारी जनजाति को ट्राइब आंगलोंग और एनसी हिल ऑटोनोमस काउंसिल के इलाके में अनुसूचित जनजाति के रूप में घोषित किये जाने का मुद्दा काफ़ी समय से लंबित है। अब दोनों ही मसलों की रजिस्ट्रार सेंट्रल ऑफ़ इंडिया और अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग द्वारा सिफ़ारिश कर दी गई है। आने वाले कुछ समय में ये मामला कैबिनेट में अप्रूव हो जाएगा और उसके बाद संसद में इसे पारित किया जाएगा। वर्षों से आपकी इस समस्या का समाधान निकाला जा रहा है।

आपके नेता ने जब मुझे इस समस्या के बारे में बताया तो मैंने कहा कि मैं पहले इसका समाधान निकालूँगा, फ़िर आऊंगा। इस क्षेत्र के छात्रों को उच्च गुणवत्ता की तकनीकी शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने के लिए, औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने के लिए सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, कोकराझार को एक वर्ष की अवधि में डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाएगा। इस कार्य से यूनिवर्सिटी को और अधिक अकादमिक तथा प्रशासनिक अधिकार प्राप्त होंगे।

मेरे सामने एक मसला आया था, एयरपोर्ट का बहुत पहले एक एयरपोर्ट सेना के साथ मिलकर काम कर रहा था, फ़िर वो बंद हो गया। अब राज्य सरकार ज़मीन नहीं दे रही है मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जैसे ही ज़मीन का मसला पूरा हो जाएगा, रूपसी एयरपोर्ट को भारतीय वायुसेना और आम जनता के लिए संयुक्त रूप से विकसित किया जाएगा।

कंचनजंघा एक्सप्रेस ट्रेन के रूट का बराक वेली में सिलचर तक विस्तार किया जाएगा और मैं आने वाले दिनों में बहुत जल्द उस ट्रेन को आरंभ करने जा रहा हूँ। मुझे एक और कठिनाई बताई गई कि हमारे लिए बजट में इतना आवंटन होता है लेकिन पता नहीं कहाँ जाता है। जनता की पाई-पाई जनता के ही पास जानी चाहिए; जो अब तक लूटा गया है और अब लूटने का अवसर नहीं मिल रहा है इसलिए ये लोग हमसे परेशान हैं। दिल्ली आजकल हिसाब मांगता है।

दिल्ली में अटल जी के समय में नार्थ-ईस्ट के विकास के लिए एक विशेष मंत्रालय - डोनर बना था। अटल जी की सरकार के जाने के बाद इनकी सरकार में क्या-क्या होता है, ये आप सभी को मालूम ही है। हमने डोनर मंत्रालय को एक नया काम दिया है जिससे यहाँ के कुछ नेता लोग काफ़ी परेशान हैं। पहले यहाँ के लोगों को दिल्ली जाना पड़ता था, मिनिस्ट्री खोजनी पड़ती थी, सामान्य लोग वहां जा नहीं पाते थे, शिकायत पहुंचाई नहीं जा सकती थी, क्या चल रहा है, सच-झूठ का पता ही नहीं चलता था। रुपये तो आते थे लेकिन ज़मीन पर कोई काम दिखाई नहीं देता था।

राजीव गाँधी सही कहते थे कि दिल्ली से एक रुपया निकलता है और गाँव में जाते-जाते 15 पैसे हो जाता है। इसलिए हमने तय किया कि डोनर मिनिस्ट्री, उसके अधिकारी महीने में एक बार नार्थ-ईस्ट के राज्यों में जाएंगे, पूरा सचिवालय दिल्ली से गुवाहाटी जाएगा। दिनभर वहां बैठेंगे, सरकार ने जो पैसे दिये, उसका हिसाब मांगेंगे, रुपये कहाँ जा रहे हैं, उसकी पूछताछ होगी और यह काम डॉ. जितेन्द्र सिंह की टीम बखूबी कर रही है। इसके कारण यहाँ लोगों को परेशानी हो रही है कि मोदी हिसाब मांग रहे हैं और आजकल फैशन हो गया है, अपने काम का हिसाब नहीं देना। जब हिसाब मांगते हैं तो कोई और ही आरोप लगाना शुरू कर देते हैं इसलिए नार्थ-ईस्ट की सभी सरकारों को पैसे का हिसाब देना पड़ेगा क्योंकि ये जनता का पैसा है और ये जनता के काम आना चाहिए और इसलिए मैं इन लोगों को बुरा लगता हूँ।

मैं अपना समय इस लिए बर्बाद नहीं करता कि मैं अच्छा लगूं यां बुरा लगूं; मैं अपना समय खपाता हूँ ताकि मेरा देश अच्छा बने। हमारे देश का भविष्य बदलने के लिए मेरा तीन सूत्रीय कार्यक्रम है – विकास, विकास और सिर्फ़ विकास। सारी समस्याओं का समाधान विकास में ही है। पिछले दिनों आपने देखा होगा कि जब दिल्ली में पुलिस की भर्ती हुई तो मैंने आग्रह रखा कि नार्थ-ईस्ट राज्यों के नौजवानों को दिल्ली में पुलिस में भर्ती करना चाहिए और आज बहुत बड़ी संख्या में यहाँ के नौजवानों को दिल्ली में रक्षा के लिए ले जाया गया। एक बार जो बात कही, उसे लागू करने के लिए जी-जान से लगे रहते हैं, पूरी कोशिश करते हैं।

हमें अगर विकास करना है तो इस इलाके की सबसे पहली ज़रूरत है – इंफ्रास्ट्रक्चर, चाहे सड़क हो, रेल हो, या जलमार्ग हो और इसलिए हमारी सरकार ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी बनाई है। इस पॉलिसी के माध्यम से नार्थ-ईस्ट राज्यों को भारत की विकासधारा में जोड़ना है, रास्तों का नेटवर्क बनाना है। पिछले बजट में आपने देखा होगा कि जैसा आवंटन हुआ था, वैसा पहले कभी नहीं किया गया होगा, उतने रुपये हम नार्थ-ईस्ट में सड़क और रेल में लगा रहे हैं।

देश की आज़ादी के इतने साल बीत गए और मैं सोच रहा था कि अब तक तो देश के सभी गांवों में बिजली पहुँच गई होगी लेकिन मुझे हिसाब मिला कि अभी भी 18,000 गाँव ऐसे हैं जहाँ बिजली का खंभा भी नहीं है। हमने बीड़ा उठाया, 15 अगस्त को लाल किले से हमने घोषणा की कि मेरी सरकार जी-जान से काम करेगी और 1,000 दिन में 18,000 गाँव में बिजली पहुंचाऊंगा। आप अपने मोबाइल पर इसका पूरा विवरण देख सकते हैं। इसके लिए एक अलग वेबसाइट बनाई है कि कहाँ-कहाँ बिजली पहुंची और दिन-प्रतिदिन का हिसाब रखा जाता है और हर दिन किसी-न-किसी गाँव में बिजली पहुँच रही है। गाँव में बिजली पहुँचने के बाद लोगों को अहसास होता होगा कि आज़ादी किसे कहते हैं। मैं तो मीडिया के मित्रों को भी कहता हूँ कि बिजली पहुँचने के बाद गाँव में जो लोगों का उत्साह है, उसे लोगों को दिखाएं। इससे देश के साथ-साथ काम करने वालों का भी हौसला बुलंद होगा।

बिजली पहुँचने से शिक्षा और जीवन-व्यवस्था में सुधार होगा और हमारा सपना है 2022 में भारत की आज़ादी के 75 साल होने पर सब जगह लोगों को 24 घंटे बिजली मिले जो आज नहीं मिल रही है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि 2022 तक हम यह काम करके रहेंगे।

हमारा एक और सपना यह है कि देश के गरीब परिवारों को अपना घर मिले। हमने ठान लिया है कि 2022 में देश के गरीब से गरीब व्यक्ति के पास भी ख़ुद का रहने का घर हो और घर भी ऐसा जिसमें बिजली हो, पानी आता हो, शौचालय भी हो और बच्चों के लिए नजदीक में स्कूल भी हो। जब इतने मकान बनेंगे, रास्ते बनेंगे, रेल का काम होगा तो बहुत सारे लोगों को रोजगार भी मिलेगा, काम के अवसर बढ़ेंगे।

हमने तय किया था कि हम गरीब से गरीब व्यक्ति का बैंक खाता खोलेंगे; प्रधानमंत्री जन-धन योजना शुरू की। लोगों को लगता था कि जो काम 70 साल में नहीं हुआ, वो मोदी जी कैसे करेंगे। आज बताते हुए मुझे ख़ुशी हो रही है कि जन-धन योजना के अंतर्गत हमने 20 करोड़ लोगों के खाते खोल दिए हैं। हमने उन्हें अर्थव्यवस्था के धारा में जोड़ा, बैंक तक उनका रास्ता खोला। मैंने कहा था कि पैसे नहीं होंगे तो भी खाते खुलेंगे लेकिन मुझे ख़ुशी है कि गरीबों ने भी सोच लिया कि मुफ़्त में नहीं करना है, बैंक में कुछ तो जमा करेंगे और लोगों ने करीब-करीब 30 हज़ार करोड़ रुपये जमा किये। ये ताकत है देश के आम जन की और इस ताकत को लेकर हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

मेरा एक ही इरादा है कि हिन्दुस्तान में और जगहों पर जितना विकास हुआ है, यहाँ भी उतना ही विकास होना चाहिए। ये काम मुझे करना है और इसलिए मैं आपके पास आशीर्वाद लेने आया हूँ। आज लाखों की तादाद में मैं यह जनसैलाब देख रहा हूँ। मैंने असम में बहुत दौरे किये हैं। लोकसभा के चुनाव में भी आपने भरपूर आशीर्वाद दिया है लेकिन ऐसा नज़ारा मैंने पहले कभी नहीं देखा, ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा। आपके इसी आशीर्वाद से मुझे ताकत मिलती है, आपके लिए दिन-रात दौड़ने की मुझे प्रेरणा मिलती है। मुझे ख़ुशी है कि मुझे नए साथियों के साथ काम करने का मौका मिला है और मैं विश्वास दिलाता हूँ कि यहाँ की जितनी रुकी समस्याएं हैं, उनके समाधान के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। मैं आप सभी का आभारी हूँ, बहुत-बहुत धन्यवाद!       

            

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ਸਾਬਕਾ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਸ਼੍ਰੀ ਰਾਮਨਾਥ ਕੋਵਿੰਦ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਦੇ ਰਿਲੀਜ਼ ਦੇ ਮੌਕੇ 'ਤੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਸੰਬੋਧਨ ਦਾ ਪੰਜਾਬੀ ਅਨੁਵਾਦ
August 12, 2026
ਅੱਜ ਸਾਨੂੰ ਸ਼੍ਰੀ ਰਾਮ ਨਾਥ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਦਾ ਉਦਘਾਟਨ ਕਰਨ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲਿਆ ਹੈ; ਮੈਨੂੰ ਇਸ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਬਣ ਕੇ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਹੋ ਰਹੀ ਹੈ: ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ
ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜੀਵਨ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਸੇਵਾ ਅਤੇ ਰਾਸ਼ਟਰ ਦੀ ਤਰੱਕੀ ਪ੍ਰਤੀ ਸਮਰਪਿਤ ਰਿਹਾ ਹੈ: ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ
ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨਾਲ ਮੇਰੀ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਦੀ ਸਾਂਝ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਤੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਪਿਆਰ ਅਤੇ ਨਿੱਘ ਮੇਰੇ ਲਈ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਪੂੰਜੀ ਰਹੀ ਹੈ: ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ
ਮਹਾਤਮਾ ਗਾਂਧੀ, ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਦਕਰ, ਜਯੋਤੀਬਾ ਫੂਲੇ ਅਤੇ ਸਾਵਿਤਰੀਬਾਈ ਫੂਲੇ ਨੇ ਇੱਕ ਨਵੇਂ ਭਾਰਤ ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਦਾ ਸੁਪਨਾ ਦੇਖਿਆ ਸੀ, ਜਿੱਥੇ ਸਭ ਤੋਂ ਗ਼ਰੀਬ ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵਾਂਝੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਸਰਬਉੱਚ ਥਾਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲ ਸਕੇ: ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ
ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਵਰਗੇ ਵਿਅਕਤੀਆਂ ਨੇ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਲਗਨ ਅਤੇ ਯੋਗਤਾ ਨਾਲ ਆਪਣਾ ਜੀਵਨ ਬਦਲਿਆ, ਸਗੋਂ ਸਦੀਆਂ ਪੁਰਾਣੇ ਉਸ ਸੁਪਨੇ ਅਤੇ ਵਿਜ਼ਨ ਨੂੰ ਸਾਕਾਰ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਈ ਹੈ: ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ
ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਸੇਵਾਮੁਕਤ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ, ਉਹ 'ਇੱਕ ਰਾਸ਼ਟਰ, ਇੱਕ ਚੋਣ' ’ਤੇ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ; ਇਹ ਸੰਕਲਪ ਲੋਕਤੰਤਰ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਅਧਿਆਇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ: ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ

ਸਾਡੇ ਸਾਬਕਾ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਸ਼੍ਰੀਮਾਨ ਰਾਮਨਾਥ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ, ਲੋਕ ਸਭਾ ਦੇ ਸਪੀਕਰ ਸਤਿਕਾਰਯੋਗ ਓਮ ਬਿਰਲਾ ਜੀ, ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਸਵਿਤਾ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ, ਹਾਲ ਵਿੱਚ ਸਾਰੇ ਸੀਨੀਅਰ ਸੱਜਣ ਬੈਠੇ ਹਨ, ਸਭ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਾਂਗਾ, ਪਰ ਮੇਰੇ ਲਈ ਬਹੁਤ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਦੀ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਇੱਕ ਪਰਿਵਾਰਕ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਲੱਗ ਰਿਹਾ ਹੈ।

ਭਰਾਵੋ ਅਤੇ ਭੈਣੋ,

ਅੱਜ ਸਾਨੂੰ ਸ਼੍ਰੀ ਰਾਮਨਾਥ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਦੇ ਰਿਲੀਜ਼ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲਿਆ ਹੈ। ਮੈਨੂੰ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਹੈ ਕਿ ਮੈਨੂੰ ਵੀ ਇਸ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਬਣਨ ਦਾ ਸੁਭਾਗ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨਾਲ ਮੇਰੀ ਬਹੁਤ ਲੰਬੀ ਸਾਂਝ ਰਹੀ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਨੇੜਿਓਂ ਜਾਣਨ ਦਾ ਵੀ ਮੌਕਾ ਮਿਲਿਆ ਅਤੇ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਵਜੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮਾਰਗਦਰਸ਼ਨ ਅਤੇ ਇਸ ਸਭ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਤੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਪਿਆਰ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਆਪਣਾਪਣ, ਇਹ ਮੇਰੀ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਪੂੰਜੀ ਰਹੀ ਹੈ। ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਜਿੰਨਾ ਸਮਝਿਆ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਕਾਰਜ-ਕੁਸ਼ਲਤਾਵਾਂ ਨੂੰ ਜਿੰਨਾ ਜਾਣਿਆ ਹੈ, ਮੈਂ ਪੂਰੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਨਾਲ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਸ਼੍ਰੀ ਰਾਮਨਾਥ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਭਾਰਤੀ ਲੋਕਤੰਤਰ ਅਤੇ ਭਾਰਤੀ ਸਮਾਜ ਲਈ ਇੱਕ ਵਿਰਾਸਤ ਬਣੇਗੀ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਜੀਵਨ ਯਾਤਰਾ, ਸਮਾਜ ਅਤੇ ਰਾਸ਼ਟਰ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਯੋਗਦਾਨ, ਅਜਿਹਾ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਹੈ ਜਿਸ ਬਾਰੇ ਮੈਂ ਵਿਸਥਾਰ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹਾਂ, ਪਰ ਬੁੱਕ ਰਿਲੀਜ਼ ਵਿੱਚ ਸਿਰਫ਼ 'ਕਰਟਨ ਰੇਜ਼ਰ' ਹੀ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਤੁਸੀਂ ਸਾਰੇ ਕਿਤਾਬ ਦਾ ਪੂਰਾ ਲਾਭ ਪੜ੍ਹ ਕੇ ਹੀ ਲਵੋ, ਤਾਂ ਹੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਚੰਗਾ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਜੀਵਨ ਯਾਤਰਾ ਨੂੰ ਤੁਸੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਜਾਣੋ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਲੇਖਣੀ ਨੂੰ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਤਜਰਬਿਆਂ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਪੜ੍ਹੇ, ਇਸ ਨਾਲ ਹਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਸਿੱਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲੇਗਾ। ਮੈਂ ਰਾਮਨਾਥ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੂੰ ਇਸ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਲਈ ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਵਧਾਈ ਦਿੰਦਾ ਹਾਂ।

ਸਾਥੀਓ,

ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੇ ਆਪਣੀ ਇਸ ਕਿਤਾਬ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਹੀ ਢੁਕਵਾਂ ਨਾਂ ਦਿੱਤਾ ਹੈ- “Triumph of the Indian Republic: My Life, My Struggles” ਕਹਿਣ ਦਾ ਭਾਵ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਨਿੱਜੀ ਹਨ, ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਮਿਲੀ ਜਿੱਤ, ਭਾਰਤ ਦੇ ਗਣਰਾਜ ਦੀ ਹੈ, ਭਾਰਤ ਦੇ ਲੋਕਤੰਤਰ ਦੀ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਅਸੀਂ ਸਾਰੇ ਅਕਸਰ ਅਨੁਭਵ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਮਨੁੱਖ ਦਾ ਇੱਕ ਸੁਭਾਅ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਲੋਕ ਆਪਣੀ ਸਫ਼ਲਤਾ ਦਾ ਸਿਹਰਾ ਖ਼ੁਦ ਸਿਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਜੀਵਨ ਦੀਆਂ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਲਈ, ਔਕੜਾਂ ਲਈ ਸਮਾਜ ਨੂੰ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰ ਠਹਿਰਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਪਰ, ਜਦੋਂ ਦਿਲ ਉਦਾਰ ਹੋਵੇ, ਭਾਰਤੀ ਸੰਸਕਾਰ ਹੋਣ, ਉਦੋਂ ਵਿਅਕਤੀ ਸਮਾਜ ਦੀਆਂ ਕਮੀਆਂ ਕੱਢਣ ਵਿੱਚ ਸਮਾਂ ਨਹੀਂ ਗੁਆਉਂਦਾ, ਉਹ ਉਸ ਦੇ ਸਕਾਰਾਤਮਿਕ ਪੱਖ 'ਤੇ ਧਿਆਨ ਕੇਂਦਰਿਤ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪਣੀ ਸਫ਼ਲਤਾ ਵਿੱਚ ਸਮਾਜ ਨੂੰ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਭਾਈਵਾਲ ਮੰਨਦਾ ਹੈ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਅਤੇ ਉਸ ਦਾ ਸਿਰਲੇਖ ਇਸ ਦੀਆਂ ਮਿਸਾਲਾਂ ਹਨ। ਤੁਸੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜੀਵਨ ਦੇਖੋ, ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸਾਧਾਰਨ ਪਰਿਵਾਰ ਵਿੱਚ, ਕਾਨਪੁਰ ਦਿਹਾਤੀ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਜਨਮ ਹੋਇਆ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੇ ਅਜੇ ਵੀ ਕੁਝ ਜ਼ਿਕਰ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਆਪਣੀ ਕਿਤਾਬ ਵਿੱਚ ਵੀ ਲਿਖਿਆ ਹੈ, ਕਿਵੇਂ ਗਰਮੀ ਦੇ ਮੌਸਮ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਦਿਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਘਰ ਵਿੱਚ ਅੱਗ ਲੱਗ ਗਈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮਾਂ ਆਪਣੀ ਚਿੰਤਾ ਛੱਡ ਕੇ ਘਰ ਦੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਬਚਾ ਰਹੀ ਸੀ। ਆਖ਼ਰ, ਇੱਕ ਸਾਧਾਰਨ ਪਰਿਵਾਰ ਵਿੱਚ, ਮਾਂ ਲਈ ਇੱਕ-ਇੱਕ ਚੀਜ਼ ਬੱਚਿਆਂ ਦੇ ਪਾਲਣ-ਪੋਸ਼ਣ ਦਾ ਜ਼ਰ੍ਹੀਆ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਉਸੇ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਵਿੱਚ, ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਫਸ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮਾਤਾ ਜੀ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ। ਤੁਸੀਂ ਕਲਪਨਾ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ, ਛੋਟੀ ਜਿਹੀ ਉਮਰ ਵਿੱਚ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਘਟਨਾ, ਮਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਗੁਆ ਦੇਣਾ, ਇਹ ਕਿੰਨਾ ਦਰਦਨਾਕ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇਗਾ। ਮੈਂ ਤਾਂ ਕਿਸਮਤ ਵਾਲਾ ਰਿਹਾ ਹਾਂ, ਮੇਰੀ ਮਾਂ 100 ਸਾਲ ਤੋਂ ਵੀ ਵੱਧ ਜਿਊਂਦੀ ਰਹੀ ਅਤੇ ਮੈਨੂੰ ਅਸ਼ੀਰਵਾਦ ਦਿੰਦੀ ਰਹੀ। ਉਸ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ, ਅੱਜ ਵੀ ਮੈਂ ਮਾਂ ਦੀ ਕਮੀ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦਾ ਹਾਂ।

ਸਾਥੀਓ,

ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜੀਵਨ ਦੀ ਇੱਕ ਅਜਿਹੀ ਦਰਦਨਾਕ ਇਹ ਘਟਨਾ ਸੀ, ਕੋਈ ਵੀ ਇਸ ਨਾਲ ਟੁੱਟ ਸਕਦਾ ਸੀ, ਪਰ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਨੇ ਮਜ਼ਬੂਤ ਕੀਤਾ। ਗੁਆਂਢ ਦੀ ਇੱਕ ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪਾਲਣ-ਪੋਸ਼ਣ ਵਿੱਚ ਮਦਦ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਮਾਜ ਦੀ ਏਕਤਾ ਅਤੇ ਭਾਈਚਾਰਕ ਸਾਂਝ ਦੀ ਤਾਕਤ ਨੂੰ ਸਮਝਿਆ। ਇਸ ਘਟਨਾ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੇ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪਿਤਾ ਦੀ ਭੂਮਿਕਾ ਹੋਰ ਵੀ ਵੱਡੀ ਹੋ ਗਈ ਅਤੇ ਜਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲਿਆ, ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਸੰਸਕਾਰ ਦਿੱਤੇ, ਇਸੇ ਲਈ, ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਹੀਰੋ ਮੰਨਦੇ ਹਨ।

ਸਾਥੀਓ,

ਬਚਪਨ ਦੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੇ ਸਿੱਖਿਆ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਤਾਕਤ ਨੂੰ ਵਧਾਉਣ ਦਾ ਮਾਰਗ ਬਣਾਇਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮਿਹਨਤ ਕੀਤੀ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਾਧਨਾਂ ਦੀ ਘਾਟ ਨੂੰ ਕਮਜ਼ੋਰੀ ਨਹੀਂ ਬਣਨ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਇੱਕ ਅਜਿਹੇ ਮੁਕਾਮ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚੇ, ਜਿਸ ਦੀ ਕਲਪਨਾ ਵੀ ਉਦੋਂ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਸੀ। ਉਹ ਭਾਰਤ ਵਰਗੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਬਣੇ।

ਸਾਥੀਓ,

ਇੰਨੇ ਵੱਡੇ ਅਹੁਦੇ 'ਤੇ ਪਹੁੰਚਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਨਿਮਰ ਸ਼ਖ਼ਸੀਅਤ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸਾਦਗੀ ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹੀ ਕਾਇਮ ਰਹੀ। ਮੈਨੂੰ ਯਾਦ ਹੈ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਮੈਂ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਭਵਨ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਪ੍ਰੋਟੋਕੋਲ ਦੇ ਹਿਸਾਬ ਨਾਲ ਜੋ ਗੱਲਾਂ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀਆਂ, ਉਹ ਗੱਲਾਂ ਉਹ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਉਹ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਨੂੰ ਛੱਡਣ ਲਈ ਗੱਡੀ ਦੇ ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਤੱਕ ਆਉਂਦੇ ਸਨ। ਮੈਂ ਸ਼ੁਰੂ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਬੇਨਤੀ ਕਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਸੀ, ਕਿਰਪਾ ਕਰਕੇ ਤੁਸੀਂ ਅਜਿਹਾ ਨਾ ਕਰੋ, ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਅੰਤ ਤੱਕ ਆਪਣੀ ਉਸ ਨਿਮਰਤਾ ਨੂੰ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਛੱਡਿਆ। ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਬਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਦੋਂ ਉਹ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡ ਪਰੌਂਖ ਗਏ, ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਉੱਥੇ ਆਪਣੇ ਗੁਰੂਆਂ ਦੇ ਪੈਰ ਛੂਹ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਣਾਮ ਕੀਤਾ। ਪਿੰਡ ਦੀ ਮਿੱਟੀ ਨੂੰ ਨਮਨ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪਿੰਡ ਦੇ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਧੰਨਵਾਦ ਕੀਤਾ। ਪੂਰੇ ਦੇਸ਼ ਨੇ ਉਹ ਭਾਵੁਕ ਦ੍ਰਿਸ਼ ਦੇਖਿਆ ਸੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਇਸ ਵਿਵਹਾਰ ਨੇ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਭਾਰਤ ਦੇ ਸੰਸਕਾਰਾਂ ਦੀ ਅਜਿਹੀ ਤਸਵੀਰ ਸਾਹਮਣੇ ਰੱਖੀ, ਜਿਸ 'ਤੇ ਹਰ ਭਾਰਤੀ ਮਾਣ ਕਰਦਾ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਗ਼ੁਲਾਮੀ ਦੇ ਸੈਂਕੜੇ ਸਾਲਾਂ ਵਿੱਚ ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਨੇ ਆਰਥਿਕ ਅਤੇ ਸਮਾਜਿਕ ਤੌਰ 'ਤੇ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਗੁਆਇਆ ਸੀ। ਸਾਡੇ ਪੂਰਵਜਾਂ ਨੇ ਸਦੀਆਂ ਤੱਕ ਸੰਘਰਸ਼ ਕੀਤਾ। ਮਹਾਤਮਾ ਗਾਂਧੀ, ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਦਕਰ, ਜਯੋਤੀਬਾ ਫੁਲੇ, ਸਾਵਿਤਰੀਬਾਈ ਫੁਲੇ, ਅਜਿਹੀਆਂ ਕਿੰਨੀਆਂ ਹੀ ਮਹਾਨ ਸ਼ਖ਼ਸੀਅਤਾਂ ਨੇ ਭਾਰਤ ਦੇ ਨਵ-ਨਿਰਮਾਣ ਦਾ ਸੁਪਨਾ ਦੇਖਿਆ ਸੀ। ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਭਾਰਤ ਜਿੱਥੇ ਗ਼ਰੀਬ ਤੋਂ ਗ਼ਰੀਬ, ਵਾਂਝੇ ਤੋਂ ਵਾਂਝੇ ਵਿਅਕਤੀ ਨੂੰ ਸਿਖਰ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਣ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲ ਸਕੇ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਵਰਗੀਆਂ ਸ਼ਖ਼ਸੀਅਤਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਮਿਹਨਤ ਅਤੇ ਕਾਬਲੀਅਤ ਨਾਲ ਕੇਵਲ ਖ਼ੁਦ ਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਬਦਲਿਆ, ਇੰਨਾ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਦੀਆਂ ਦੇ ਉਸ ਸੁਪਨੇ ਨੂੰ, ਉਸ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀਕੋਣ ਨੂੰ ਵੀ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਆਪਣੀ ਅਹਿਮ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਈ ਹੈ। ਅਤੇ ਇਸ ਦਿਸ਼ਾ ਵਿੱਚ ਸਾਡੇ ਸਭ ਦੇ ਯਤਨ ਅਜੇ ਵੀ ਜਾਰੀ ਹਨ। ਸਾਨੂੰ ਭਵਿੱਖ ਵਿੱਚ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਵਰਗੇ ਅਨੇਕਾਂ ਨੌਜਵਾਨ ਚਾਹੀਦੇ ਹਨ, ਜੋ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀਆਂ ਤੋਂ ਹਾਰ ਨਾ ਮੰਨਣ, ਜੋ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਨਿਰਾਸ਼ ਨਾ ਹੋਣ, ਸਗੋਂ ਆਪਣੀ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਹਰ ਮੰਜ਼ਿਲ ਨੂੰ ਆਸਾਨ ਬਣਾਉਣ ਦਾ ਹੌਸਲਾ ਰੱਖਣ। ਇਸੇ ਬਦਲਾਅ ਨਾਲ ਸਸ਼ਕਤ ਭਾਰਤ ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਦਾ ਸੰਕਲਪ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇਗਾ। ਇੱਥੋਂ ਹੀ ਆਤਮਨਿਰਭਰ ਅਤੇ ਵਿਕਸਿਤ ਭਾਰਤ ਦਾ ਰਾਹ ਬਣੇਗਾ।

ਸਾਥੀਓ,

ਅਜਿਹੀ ਯੁਵਾ ਸ਼ਕਤੀ ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਲਈ ਜੋ ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ, ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਉਸ ਦਾ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਰੋਤ ਬਣ ਸਕਦੀ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੇ ਆਪਣੀ ਜੀਵਨੀ ਵਿੱਚ ਮੋਰਾਰਜੀ ਭਾਈ ਦੇਸਾਈ ਦੇ ਨਾਲ ਆਪਣੇ ਤਜਰਬਿਆਂ ਦੇ ਬਾਰੇ ਵੀ ਇਸ ਵਿੱਚ ਵਿਸਥਾਰ ਨਾਲ ਦੱਸਿਆ ਹੈ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੇ ਅੰਦਰ ਦੇਸ਼ ਸੇਵਾ ਦੀ ਜੋ ਭਾਵਨਾ ਸੀ, ਮੋਰਾਰਜੀ ਭਾਈ ਨਾਲ ਕੰਮ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜੋ ਸਿੱਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲਿਆ, ਜੋ ਰਸਤਾ ਮਿਲਿਆ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੇ ਰਾਜਨੀਤੀ ਅਤੇ ਸਮਾਜ ਸੇਵਾ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਮਾਰਗ ਬਣਾਇਆ। ਉਹ ਆਪਣੇ ਫ਼ਰਜ਼ਾਂ ਲਈ ਸਮਰਪਿਤ ਰਹੇ। ਸੇਵਾ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣਾ ਟੀਚਾ ਬਣਾ ਕੇ ਕੰਮ ਕੀਤਾ। ਸੰਸਦ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਕਾਰਜਕਾਲ ਗਵਾਹ ਹੈ। ਰਾਜਪਾਲ ਵਜੋਂ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇੱਕ ਮਿਸਾਲ ਕਾਇਮ ਕੀਤੀ। ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਵਜੋਂ ਵੀ ਸਾਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਇਹੋ ਫ਼ਰਜ਼ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਦਿਖਾਈ ਦਿੰਦੀ ਰਹੀ। ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਵਰਗੇ ਸਰਵਉੱਚ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਸੇਵਾਮੁਕਤ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਰਾਮ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਉਹ ਅਜੇ ਵੀ ‘ਇੱਕ ਦੇਸ਼, ਇੱਕ ਚੋਣ’ (One Nation, One Election) ਵਰਗੇ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਵਿਸ਼ੇ 'ਤੇ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਜਗਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਹ ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਵਿਸ਼ਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਦਾ ਹੱਲ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਲੋਕਤੰਤਰ ਦਾ ਨਵਾਂ ਅਧਿਆਇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਮੈਂ ਮੰਨਦਾ ਹਾਂ, ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਇਸ ਫ਼ਰਜ਼ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਅਤੇ ਸੇਵਾ-ਭਾਵਨਾ ਤੋਂ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਲੋਕ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਸਿੱਖ ਸਕਦੇ ਹਨ।

ਸਾਥੀਓ,

ਸਮਾਜਿਕ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਸਰਗਰਮ ਰਹਿੰਦੇ ਹੋਏ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਲਈ ਸਮਾਂ ਕੱਢ ਸਕਣਾ ਬਹੁਤ ਔਖਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੇ ਇਹ ਕੰਮ ਸਾਡੇ ਸਾਰਿਆਂ ਲਈ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਅਜਿਹਾ ਕਿੰਨਾ ਕੁਝ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਗ਼ਰੀਬ ਵਾਂਝੇ ਤਬਕੇ ਤੋਂ ਆਏ ਤਮਾਮ ਲੋਕ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਦਾ ਪਰਛਾਵਾਂ ਦੇਖ ਸਕਦੇ ਹਨ। ਕਿਵੇਂ ਇੱਕ ਸਾਧਾਰਨ ਪਰਿਵਾਰ ਔਖੇ ਹਾਲਾਤਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਜੀਵਨ ਦੀ ਪਵਿੱਤਰਤਾ ਅਤੇ ਇਮਾਨਦਾਰੀ ਨਾਲ ਸਮਝੌਤਾ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ, ਕਿਵੇਂ ਉਹੀ ਆਦਰਸ਼ ਅੱਗੇ ਚੱਲ ਕੇ ਸਾਡੇ ਜੀਵਨ ਦਾ ਆਧਾਰ ਬਣਦੇ ਹਨ, ਸਾਡੇ ਔਖੇ ਸਮੇਂ ਦੀਆਂ ਕਦਰਾਂ-ਕੀਮਤਾਂ ਕਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜੀਵਨ ਭਰ ਸਾਨੂੰ ਰੋਸ਼ਨੀ ਦਿੰਦੀਆਂ ਹਨ, ਕਿਵੇਂ ਇਸ ਪਵਿੱਤਰਤਾ ਤੋਂ ਸਾਨੂੰ ਰਾਸ਼ਟਰ ਸੇਵਾ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਵੱਖ-ਵੱਖ ਅਹੁਦਿਆਂ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨਿਭਾਉਂਦੇ ਹੋਏ, ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਨੇ ਸਮਾਜ ਨੂੰ ਲਗਾਤਾਰ ਇਸ ਦੀ ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਦਿੱਤੀ ਹੈ।

ਸਾਥੀਓ,

ਮੈਨੂੰ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਹੈ, ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ, ਇਸ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜੀਵਨ ਦੀਆਂ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਸਾਡੇ ਲੋਕਤੰਤਰ ਦੀਆਂ ਵੀ ਅਹਿਮ ਯਾਦਾਂ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਹੋਣਗੀਆਂ। ਮੈਂ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਲਈ ਸ਼ੁਭਕਾਮਨਾਵਾਂ ਦਿੰਦਾ ਹਾਂ। ਅਤੇ ਮੈਂ ਖ਼ਾਸ ਕਰਕੇ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜ੍ਹੀ ਨੂੰ ਅਪੀਲ ਕਰਾਂਗਾ, ਰੀਲ ਦਾ ਜ਼ਮਾਨਾ ਹੈ, ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਵਿੱਚ ਇਨਫਲੂਐਂਸਰ ਤੁਹਾਨੂੰ ਖਿੱਚ ਕੇ ਕਿਤੇ ਦਾ ਕਿਤੇ ਲੈ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਸ਼ਾਰਟਕੱਟ ਦੇ ਯੁੱਗ ਵਿੱਚ ਵੀ ਇੱਕ ਗੱਲ ਅਸੀਂ ਜ਼ਰੂਰ ਯਾਦ ਰੱਖੀਏ, ਰੇਲਵੇ ਸਟੇਸ਼ਨ 'ਤੇ ਲਿਖਿਆ ਹੋਇਆ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਕੁਝ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਪਟੜੀ ਟੱਪ ਕੇ ਜਾਣ ਦੀ ਆਦਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਪੁਲ਼ ਤੋਂ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੇ ਤਾਂ ਉੱਥੇ ਲਿਖਿਆ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਸ਼ਾਰਟਕੱਟ ਤੁਹਾਨੂੰ ਛੋਟਾ ਕਰ ਦੇਵੇਗਾ ਅਤੇ ਜੇ ਸ਼ਾਰਟਕੱਟ ਦੇ ਰਸਤੇ ਤੋਂ ਵੀ ਕਿਤੇ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲਣਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਕਹਾਂਗਾ ਤੁਹਾਨੂੰ ਜਿਸ ਦੀ ਵੀ ਪਸੰਦ ਹੋਵੇ ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਜ਼ਰੂਰ ਪੜ੍ਹੋ। ਸਵੈ-ਜੀਵਨੀ ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੇ ਇਤਿਹਾਸ ਦੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਨੂੰ ਇੱਕ ਵੱਖਰੇ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਸਮਝਣ ਦਾ ਮੌਕਾ ਦਿੰਦੀ ਹੈ। ਇਤਿਹਾਸ ਦੇ ਬਹੁਤ ਨੇੜੇ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਉਹ ਸਮਾਂ-ਕਾਲ ਜੀਵਨੀ ਦਾ ਅਤੇ ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਜ਼ਰੂਰ ਚਾਹਾਂਗਾ ਕਿ ਕੋਵਿੰਦ ਜੀ ਦੀ ਜੋ ਮਿਹਨਤ ਹੈ, ਉਹ ਆਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਪੀੜ੍ਹੀਆਂ ਦੇ ਕੰਮ ਆਵੇ, ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜ੍ਹੀ ਦੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਕੰਮ ਆਵੇ। ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਸ਼ੁਭਕਾਮਨਾਵਾਂ। ਬਹੁਤ-ਬਹੁਤ ਧੰਨਵਾਦ।