Text of PM’s address at the launch of Pradhan Mantri MUDRA Yojana

Published By : Admin | April 8, 2015 | 14:42 IST

उपस्थित सभी महानुभाव,

हमारे देश में एक अनुभव ये आता है कि बहुत सी चीजें Perception के आसपास मंडराती रहती है। और जब बारीकी से उसकी और देखें तो चित्र कुछ और ही नजर आता है। जैसे एक सामान्य व्यक्ति को पूछो तो उसको लगेगा कि “भई, ये जो बड़े-बड़े उद्योग हैं, बड़े-बड़े उद्योग घराने हैं, उससे रोजगार ज्यादा मिलता है।“ लेकिन अगर बारीकी से देखें तो चित्र कुछ और होता है, इसमें इतनी ज्यादा पूंजी लगी है। इतने सारे ताम-झांम, हवाबाजी, ये सब हम देखते आए हैं।

लेकिन अगर बारीकी से देखें तो ultimately हम विकास में हैं। रोजगार हमारी प्राथमिकता है और भारत जैसा देश जिसके पास Demographic dividend हो, जहां पर 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 से कम आयु की हो, उस देश ने अपने विकास की जो भी नीतियां बनानी हो, उसके केंद्र में ये युवा शक्ति होना चाहिए। अगर वो बराबर match कर लिया, तो हम नई ऊंचाईयों को पार कर सकते हैं। ये जितने बड़-बड़े उद्योगों की हम चर्चा सुनते आए हैं, उसमें सिर्फ एक करोड़ 25 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। सवा सौ करोड़ देश में सवा करोड़ लोगों को रोजगार, ये जो बहुत बड़े-बड़े लोग जिसके लिए दुनिया में चर्चा रहती है, आधा अखबार जिनसे भरा पडा रहता है, वो देते हैं।

लेकिन इस देश में छोटा-छोटा काम करने वाला व्यक्ति करीब 5 करोड़ 70 लाख लोग, 12 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं। उन सवा करोड़ को रोजगार देने के लिए बहुत सारी व्यवस्थाएं सक्रिय है। लेकिन 12 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले लोगों के लिेए थोड़ी सी हम मदद करें, तो कितना बड़ा फर्क आ सकता है इसका हम अंदाज कर सकते हैं। और इस 5 करोड़ 75 लाख इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग हैं, जो स्वरोजगार एक प्रकार से हैं - दर्जी होंगे, कुम्हार होंगे, टायर का पंक्चर करने वाले लोग हैं, साइकिल की repairing करने वाले लोग हैं, अपनी एक ऑटो रिक्शा लेकर के काम करने वाले लोग हैं, सब्जी बेचने वाले, गरीब-गरीब लोग हैं। उनका पूरा जो कारोबार है, उसमें ज्यादा से ज्यादा हिसाब लगाएं जाएं, तो 11 लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा उसमें पूंजी नहीं लगी है। यानी सिर्फ 11 लाख करोड़ रुपयों की पूंजी लगी है, 5 करोड़ 75 लाख उसका नेतृत्व कर रहे हैं, और 12 करोड़ लोगों का पेट भरते हैं।

ये बातें जब सामने आईं तो लगा कि देश में स्वरोजगारी के अवसर बढ़ाने चाहिए। देश की Economy को ताकत देने वाला जो नीचे पायरी पर जो लोग हैं, उनकी शक्ति को समझना चाहिए। और उनके लिए अवसर उपलब्ध कराने चाहिए और इस मूल चिंतन में से ये मुद्रा की कल्पना आई है। मेरा अपना एक अनुभव इसमें काम कर रहा था, क्योंकि सिर्फ आर्थिक जगत के लोगों के आंकड़ों के आधार पर निर्णय करना, इतना सरल नहीं होता है। लेकिन कभी-कभी अनुभव बहुत काम आता है।

मैं गुजरात में मुख्यमंत्री रहा तो मैंने पतंग उद्योग की तरफ थोड़ा ध्यान दिया। अब गुजरात में पतंग एक बड़ा त्‍योहार के रूप में मनाया जाता है, और ज्‍यादातर, अब वो पूरा Environment Friendly Industry है, Cottage Industry है। और लाखों की तादाद में गरीब मुसलमान उस काम में लगा हुआ है 90 प्रतिशत से ज्‍यादा पतंग बनाने व कबाड़ का काम गुजरात में मुसलमान कर रहा है, लेकिन वो वही पुरानी चीजें करता था। वो पतंग अगर उसको तय तीन कलर का बनाना है तो तीन कलर के कागज लाता था पेस्टिंग करता था और फिर पतंग बनाता था। अब दुनिया बदल चुकी है तीन कलर का कागज प्रिंट हो सकता है, टाइम बच सकता है। तो मैंने चेन्‍नई की एक Institute को काम दिया कि जरा सर्वे किजिए कि इनकी मुसीबत क्‍या है, कठिनाईयां क्‍या है, अनुभव ये आया कि छोटे-छोटे लोगों को थोड़ी मदद दी जाए थोड़ा Skill Development हो जाए, थोड़ी पैकेजिंग सिखा दिया जाए, आप उसमें कितना बड़ा बदलाव ला सकते है। मुझे आज कहने से आनंद होता है कि जो करीब 35 करोड़ का पतंग का बिजनेस था थोड़ी मदद की वो पतंग का उद्योग 500 करोड़ cross कर गया था।

फिर मेरी उसमें जरा रूचि बढ़ने लगी तो मैं कई चीजे नई-नई करने लगा। बांस, बांस वो लाते थे असम से। कारण क्‍या तो पतंग में जिस बांस के पट्टे की जरूरत होती है वो साइज का बांस गुजरात में होता नहीं था तो मैंने ये जेनेटिक इंजीनियरिंग वालों को पकड़ा। मैंने कहा बांस हमारे यहां ऐसा क्‍यों न हो दो गांठ के बीच अंतर ज्‍यादा हो ताकि वो हमारा ही लोकल बांस का product उसको काम आ जाए। बांस वो बाहर से लाता है तो उसको फाइनेंस की व्‍यवस्‍था हो फिर मैंने एडवरटाइजमेंट कम्‍पनी को बुलाया। मैंने कहा जरा पतंग वालों के साथ बैठो पतंग के ऊपर कोई एडवरटाइजमेंट का काम हो सकता है क्‍या उनकी कमाई बढ़ सकती है।

छोटी-छोटी चीजों को मैंने इतना ध्‍यान दिया था और मुझे उतना आनंद आया था उस काम में - I’m Talking about 2003-04 - कहने का मेरा तात्‍पर्य यह था कि जो बिल्‍कुल उपेक्षित सा काम था उसमें थोड़ा ध्‍यान दिया गया, फाइनेंस की व्‍यवस्‍था की गई, उसने तेज गति से आगे बढ़ाया। ये ताकत सब दूर है। आप देखिए हर गांव में दो-चार मुसलमान बच्‍चे ऐसे होंगे, इतनें Innovative होते है technology में ईश्‍वरदत्‍त उनको कृपा है। वो तुरंत चीजों को पकड़ लेते है। आप एक ताला उसको रिपेयर करने को दीजिए वो दूसरे दिन वो ताला वैसा बना के दे देगा। जिनके हाथों में ये परम्‍परागत कौशल है। ऐसे लोगों को अगर हम मदद करें और वो कुछ गिरवी रखें तब मिले तो उसके पास तो गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं है - सिवाय कि उसका ईमान। उसकी सबसे बड़ी पूंजी है उसका ईमान। ये गरीब इंसान की जो पूंजी है, ईमान। उस पूंजी के साथ मुद्रा अपनी पूंजी जोड़ना चाहता है, ताकि वो सफलता की कुंजी बन जाए और उस दिशा में हम काम करना चाहते है।

कुम्‍हार है, अब बिजली गांव में पहुंच गई है। वो भी चाहता है कि मैं मटकी बनाता हूं और चीजें बनाता हूं। लेकिन अगर Electric motor लग जाए तो मेरा काम तेज हो जाएगा। लेकिन Electric motor खरीदने के लिए पैसा नहीं है। बैंक के लिए उनके पास इतना समय भी नहीं है और उतना नेटवर्क भी नहीं है। लेकिन मैं आज, यहां बैंक के बड़े-बड़े लोग बैठे है। मेरे शब्‍द लिख करके रखिए। एक साल के बाद बैंक वाले Queue लगाएगें मुद्रा वालों के यहां और कहेंगे भई 50 लाख हमको client दे दीजिए।

क्‍योंकि अब देखिए प्रधानमंत्री जन-धन योजना में हिन्‍दुस्‍तान की बैंक सेक्‍टर ने जो काम किया है, मैं जितना अभिनंदन करूं उतना कम है जी, जितना अभिनंदन करूं उतना कम है। कोई सोच नहीं सकता था, क्‍योंकि बैंक के संबंध में एक सोच बनी हुई थी कि बैंक यानी इस दायरे से नीचे नहीं जा सकते। तो बैंक के लोगों ने गर्मी के दिनों में गांव-गांव घर-घर जा करके गरीब की झोपड़ी में जा करके उसको देश की फाइनेंस की Main Stream में लाने का प्रयास किया और इस देश के 14 करोड़ लोगों को, 14 करोड़ लोगों को बैंक खाते से जोड़ दिया। तो ये ताकत हमने अनुभव की है तो उसका ये अलग एक नया step है।

आज वैसे एक ओर भी अवसर है SIDBI का रजत जयंती वर्ष है SIDBI 25 साल की उम्र हो गई और मूलतः SIDBI का कारोबार इसी काम से शुरू हुआ था, छोटे-छोटे लोगों को... लेकिन जितनी तेजी से क्योंकि भारत देश rhythmic way में progress करे तो अपेक्षाएं पूरी नहीं होंगी। हमने उस rhythm को बदलकर के jump लगाने की जरूरत है। हमने दायरा बढ़ाने की जरूरत है। हमने अधिक लोगों को इसके अंदर जोड़ने की आवश्यकता है और सामान्य मानवी का अपना अनुभव है।

आप देखिए हिंदुस्तान में जहां भी women self help group चलते हैं, पैसों के विषय में शायद ऐसी ईमानदारी कहीं देखने को मिलेगी नहीं। उनको अगर 5 तारीख को पैसा जमा करवाना है तो 1 तारीख को जाकर के जमा करवाकर आ जाती हैं। बचत हमारे यहां स्वभाव है, उसको और जरा ताकत देने की आश्यकता है। हमारी परंपरागत वो शक्ति है।

मुद्रा बैंक के माध्यम से व्यवसाय के क्षेत्र में, स्वरोजगार के क्षेत्र में, उद्योग के क्षेत्र में जो निचले तबके पर आर्थिक व्यवस्था में रहे हुए लोग हैं, वे हमारा सबसे बड़ा client, हमारा सबसे बड़ा target group है। हम उसी पर focus करना चाहते हैं। इन 5 करोड़ 75 लाख जो छोटे व्यापारी हैं... और उनका average कर्ज कितना है? पूरे हिंदुस्तान में 11 लाख करोड़ की उनके पास पूंजी है total पूरे देश में कोई ज्यादा amount नहीं है वो और average कर्ज निकाला जाए तो एक यूनिट का average कर्ज 17 thousand है सिर्फ। 17 thousand हैं, यानि कुछ नहीं है। अगर उसको एक लाख के कर्ज की ताकत दे दी जाए। उसको इतना अगर जोड़ दिया जाए और ये 11 लाख करोड़ है वो एक करोड़ तक अगर पहुंच जाए। हम कल्पना कर सकते हैं देश की economy को GDP को, नीचे से ताकत देने का इतना बड़ा force जो कि कभी untapped था।

और इसलिए जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना लेकर के आए थे तब हमने कहा था, जहां बैंक नहीं उसको बैंक से जोड़ेंगे। आज जब हम मुद्रा लेकर के आए हैं, तो हमारा मंत्र है जिसको funding नहीं हो रहा है, जो un-funded है, उसको funding करने का हम बीड़ा उठाते हैं।

ये एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें शुरू के समय में सामान्य व्यक्ति जाएगा ये संभव नहीं है क्योंकि बेचारों को अनुभव बहुत खराब है। वो कहता है भई मुझे तो साहूकार से ही पैसा लेना पड़ता है। 24 percent, 30 percent interest देना पड़ता है, वो ही मुझे आदत हो गई है। वो विश्वास नहीं करेगा कि उसको इस प्रकार से ऋण मिल सकता है। हम ये एक नया विश्वास पैदा करना चाहते हैं कि आप देश के लिए काम कर रहे हो, देश के विकास के भागीदार हो, देश आपके लिए चिंता करने के लिए तैयार है। ये message मुझे देना है।

और ये मुद्रा के concept के द्वारा, उसी दिशा में हम आगे बढ़ना चाहते हैं। हमारे देश में agriculture sector में value addition - इतनी बड़ी संभावनाएं हैं। अगर उसकी एक विधा को develop कर दिया जाए तो हमारे किसान को कभी संकटों से गुजरना नहीं पड़ेगा। और ये छोटे-छोटे entrepreneur के माध्यम से ये पूरा network खड़ा किया जा सकता है जो सामान्य किसान, जो सामान्य पैदावार करता है, उसमें value addition का काम करे। और स्थानीय स्तर पर करे। कोई बहुत बड़ी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है। अपने आप उसका काम आगे बढ़ जाएगा।

और हम देखते हैं आम उसको बेचना है, तो बेचारे को बड़ा कम पैसा मिलता है लेकिन एक अगर एक छोटा सा unit भी हो, आम में से अचार बना दे तो ज्यादा पैसा मिलता है और अचार को भी अच्छा बढ़िया bottle में packing करे और ज्यादा पैसा मिलता है और कोई नटी bottle लेकर खड़ी हो जाए तो और ज्यादा पैसा मिलता है advertising होता है तो।

यानि वक्त बदल चुका है, branding, advertising इन सारी चीजों की जरूरत पड़ गई है। हम ऐसे छोटे-छोटे लोगों को ताकत देना चाहते हैं। और उनको अगर ताकत मिलती है तो देश की economy की नीचे की धरातल, जितनी ज्यादा मजबूत होगी, उतनी देश की economy को लाभ होने वाला है। और जब मैंने ये आकड़े बताए तो आप भी चौंक गए होगे कि इतना बड़ा तामझाम सवा करोड़ लोग रोजगार पाते है। और जिसकी ओर कोई देखता नहीं है, वो 12 करोड़ लोगों के पेट भरता है। कितना बड़ा अंतर है। ये जो 12 करोड़ लोग है 25 करोड़ को रोजगार देने की ताकत देते है। वो Potential पड़ा है। और ज्‍यादा कोई शासकीय व्‍यवस्‍था में बड़े बदलाव की भी जरूरत नहीं है। थोड़ी संवदेनशीलता चाहिए, थोड़ी समझ चाहिए और थोड़ा Pro-Active role चाहिए।

मुद्रा एक ऐसा platform खड़ा किया गया है, जिस platform के साथ इसको... आज छोटी-मोटी finance की व्‍यवस्‍थाएं चल पड़ी है। दुनिया में कई जगह पर प्रयोग हुए है Micro finance के। लिए मैं चाहूंगा कि हम पूरे विश्‍व में Micro finance के जो Successful Model है हम भी उसका अध्‍ययन करें। उसकी जो अच्‍छाइयां है जो हमारे लिए suitable है, हम उसको adopt करें। और हिन्‍दुस्‍तान इतना बड़ा देश है कि जो चीज नागालैंड में चलती है वो महाराष्‍ट्र में चलेगी जरूरी नहीं है। विविधता चाहिए। और विविधताओं के अनुसार स्‍थानीय आवश्‍यकताओं के अनुसार अपने मॉडल बनाएं उसकी requirement करें। वरना हम दिल्‍ली में बैठ करके tailor के लिए ये और फिर कहेंगे कि तुमको ये मिलेगा तो मेल नहीं बैठेगा। वो वहां है उसी को पूछना पड़ेगा कि भई बताओं तुम्‍हारे लिए क्‍या जरूरत है? ये अगर हमने कर दिया तो हम बहुत बड़ी मात्रा में समाज के इस नीचे के तबके को मदद कर सकते है।

जिस प्रकार से सामान्‍य व्‍यक्ति की चिंता करना ये हमारा प्रयास है... और आपने इस सरकार के एक-एक कदम देखें होंगे, गतिशीलता तो आप देखते ही होंगे। वरना सामान्‍यत: देश में योजनाओं की घोषणा को ही काम माना जाता था और आप रोज नई योजना की घोषणा करो तो अखबार के आधार पर देश को समझने वाले जो लोग है वो तो यही मानते है कि वाह देश बहुत आगे बढ़ गया। और दो-चार साल के बाद देखते है कि वही कि वही रह गए। हमारी कोशिश है योजनाओं को धरती पर उतारना।

प्रधानमंत्री जन-धन योजना ये सीधा-सीधा दिखता है। पहल योजना - दुनिया में सबसे बड़ा Cash Transfer का काम। गैस सब्सिडी में। 13 करोड़ लोगों के गैस सब्सिडी सिलेंडर, सब्सिडी सीधी उसके बैंक खाते में चली गई। यानी अगर एक बार निर्णय करें कि इस काम पूरा करना है और हर काम को आप देखिए... जब हमने 15 अगस्‍त को प्रधानमंत्री जन-धन योजना की बात कही करीब-करीब सवा सौ दिन के अंदर उस काम को पूरा कर दिया।

जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना के बाद हम आगे बढ़े सौ दिन के भीतर-भीतर हमने पहल का काम पूरा कर दिया।

और आज जब बजट के अंदर घोषणा हुई, 50 दिन भी नहीं हुए, वो आज योजना आपके सामने रख दी। और ये Functional होगी और उसका परिणाम मैं कहता हूं एक साल मैं ज्‍यादा समय नहीं कहता। एक साल के भीतर-भीतर हमारी जो Established Banking System है, वो मुद्रा के मॉडल की ओर जाएगी मैं दावे से कहता हूं क्‍योंकि इसकी ताकत इसकी ताकत पहचान में आने वाली है। वे अपना एक लचीली बैंकिंग व्‍यवस्‍था खड़ी करेंगे, एक बहुत बड़ी ऑफिस चाहिए, कोई एयरकंडीशन चाहिए कोई जरूरत नहीं है। ऐसे Bare footed बैंकरर्स तैयार हो सकते है जो मुद्रा के मॉडल पर बड़ी-बड़ी बैंकों का काम भी कर सकते है।

आने वाले दिनों में कम से कम धन लगा करके भी ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को रोजगार देने का काम इसके साथ सरलता से हो सकता है और ये लोग जो संकट से गुजरते है, ब्‍याज के चक्‍कर में गरीब आदमी मर जाता है। उसको बचाना है और उसकी जो ताकत है उसके लिए अवसर देना है उस अवसर की दिशा में काम कर रहे है, जिस प्रकार से देश में ये जो वर्ग है उसकी जितनी चिंता करते है, उतनी ही देश के किसान की चिंता करना उतना ही जरूरी है।

किसी न किसी कारण से देश का किसान प्राकृतिक संकटों से जूझ रहा है। गत वर्ष, वर्षा कम हुई। वर्षा कम होने के कारण वैसे ही किसान मुसीबत से गुजारा कर रहा था और इस बार जितनी मात्रा में बेमौसमी वर्षा और ओले गिरना। इतनी तबाही हुई है किसान की। हमने मंत्रियों को भेजा था। खेतों में जा करके किसानों से बात करके परिस्थिति का जायजा लिया। कल इन सारे मंत्रियों से मैंने डिटेल में रिपोर्ट ली थी। इन किसानों को हम क्या मदद कर सकते हैं। और मैंने पहले दिन कहा था कि किसान को इस मुसीबत से बचाना, उसका साथ देना, उसको संकटों से बाहर लाना। ये सरकार की, समाज की, हम सबकी जिम्मेवारी है और किसान की चिंता करना ये आवश्यक है।

Natural calamity पहले भी आई है। लेकिन सरकार के जो parameter रहे हैं, उन parameters में आज के संकट में किसान को ज्यादा मदद नहीं मिल सकती है। और इसलिए ये संकट की व्यापकता इतनी है और उस समय है जबकि उसको फसल लेकर के बाजार में जाना था। एक प्रकार से उसके नोटों का बंडल ही जल गया, इस प्रकार से हम कह सकते हैं। इतना बड़ा उसका, उसका पूरा पसीना बहाया हुआ उसका, ये हालत हुई है। और इसलिए हमने insurance company को भी आदेश किया है कि बहुत ही proactive होकर के उनकी मदद की जाए। बैंकों को हमने आदेश किया है कि बैंक उनके जो कर्ज हैं, उनके संबंध में किस प्रकार से restructure करे ताकि उनको इस संकट से बाहर लाया जाए।

सरकार की तरफ से भी एक बहुत बड़ा अहम निर्णय हम करने जा रहे हैं। अब तक खेत में 50 प्रतिशत से ज्यादा अगर नुकसान हुआ हो, तभी वो उस मदद पाने की list में आता है। 50 प्रतिशत से ज्यादा अगर नुकसान हुआ होगा तभी आपको मदद मिल सकती है। अगर 50 प्रतिशत से कम हुआ है तो मदद नहीं मिल सकती है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी ये एक सुझाव था कि साहब ये norms बदलना चाहिए। हमारे मंत्री अभी जाकर के आए, उन्होंने प्रत्यक्ष देखा, और ये सब देखने के बाद एक बहुत बड़ा हमने एक महत्वपूर्ण निर्णय किया है कि अब किसान के वो जो 50 प्रतिशत के नुकसान वाला दायरा था उसको बदलकर के 33 percent भी अगर नुकसान हुआ है तो भी वो किसान हकदार बनेगा।

उसके कारण मुझे मालूम है बहुत बड़ा बोझ आने वाला है, बहुत बड़ा बोझ आने वाला है लेकिन किसान को 50 प्रतिशत वाले हिसाब में रखने से उसको ज्यादा लाभ नहीं मिलेगा। 33 percent जो कि कईयों की मांग थी, उसको हमने स्वीकार किया है।

दूसरा विषय है उसको जो मुआवजा दिया जाता है। देश में आजादी के बाद सबसे बड़ा निर्णय पहली बार हुआ है 50 प्रतिशत को 33 प्रतिशत लाना। और दूसरा महत्वपूर्ण आजादी के बाद इतना बड़ा jump नहीं लगाया है, किसानों को मदद करने में हम इतना बड़ा jump इस बार लगा रहे हैं। और आज उसको जो मदद करने के सारे parameters हैं, उसको अब डेढ़ गुना कर दिया जाएगा। अगर उसको नुकसान में पहले 100 रुपया मिलता था, 150 मिलेगा, लाख मिलता था तो डेढ़ लाख मिलेगा, उसकी मदद डेढ़ गुना कर दी जाएगी।

कभी हमारे यहां incremental होता था 5 percent, 2 percent, 50 प्रतिशत वृद्धि। और ये किसान को तत्काल मदद मिले। राज्यों ने सर्वे का काम किया है। भारत सरकार और राज्य सरकार मिलकर के उसको आगे बढ़ाएगी लेकिन मैं चाहता हूं हमारे देश के किसानों को जितनी मदद हो सके, उतनी मदद करने के लिए ये सरकार संकल्पबद्ध है। क्योंकि आर्थिक विकास की यात्रा में किसान का भी बहुत बड़ा योगदान है और हमारी जीवन नैया चलाने में भी किसान का बहुत बड़ा योगदान है। बैंक हो, insurance company हो, भारत सरकार हो, राज्य सरकार हो, हम सब मिलकर के किसान को इस संकट की घड़ी से हम बाहर लाएंगे। ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।

फिर एक बार मैं SIDBI की इस रजत जयंती वर्ष के प्रारंभ पर उनको मैं बहुत-बहुत शुभकामना देता हूं और SIDBI आने वाले दिनों में नए लक्ष्य को लेकर के और नई ऊंचाइयों को पार करने में सफल होगा, ऐसी मेरी शुभकामनाएं हैं।

और मुद्रा platform प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आने वाले दिनों में देश की आर्थिक, जो पक्की धरोहर है उसको जानदार बनाना, शानदार बनाने के काम में मुद्रा बहुत बड़ा role play करेगी। और ये पूंजी उसकी सफलत की कुंजी बने, ये मंत्र को हम चरितार्थ करेंगे। इसी एक शुभ आशय के साथ आज इस महत्वपूर्ण योजना को प्रारंभ करते हुए मुझे खुशी हो रही है, मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद।

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ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ନମସ୍କାର ।

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ପୁଣିଥରେ ଆପଣମାନଙ୍କ ସହ ଯୋଡ଼ିହୋଇ ମୋତେ ବହୁତ ଖୁସି ଲାଗୁଛି । ଦେଶର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳରେ ଆମ ଦେଶର ଲୋକେ ଦେଶ ହିତ, ସମାଜର ହିତ ପାଇଁ ଏଭଳି ଚମତ୍କାର କରୁଛନ୍ତି ଯେ ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଶୁଣିଲେ ଆମକୁ ନୂତନ ପ୍ରେରଣା ମିଳୁଛି । ଆଜିର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଆରମ୍ଭ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସରେ ଦେଶର ଏଭଳି ଗୋଟିଏ ଉପଲବ୍ଧିରୁ କରୁଛି । କିଛିଦିନ ପୂର୍ବେ ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡର ରାଞ୍ଚିରେ ଜାତୀୟ ସିନିୟର ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଫେଡେରେସନ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୋଇଥିଲା । ଏଥିରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ପ୍ରାୟ ୮୦୦ ଖେଳାଳି ଅଂଶଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ । ଏଥିରେ ଚାରୋଟି ଭିନ୍ନ ଇଭେଣ୍ଟରେ ଚାରୋଟି ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ସିଂ, ବିଶାଳ ଟିକେ, ତେଜସ୍ୱୀନ ଶଙ୍କର, ଦେବ୍ ମୀଣା ଏବଂ କୂଲଦୀପ କୁମାର । ଏହି ବନ୍ଧୁମାନେ ବିଭିନ୍ନ ଶ୍ରେଣୀରେ ନୂତନ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କଲେ । ସର୍ବପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗୋଟିଏ ଘଟଣା, ଯାହା ସାରାଦେଶରେ ଚର୍ଚ୍ଚିତ ହୋଇଛି ତାହା ହେଉଛି ୧୦୦ ମିଟର ରେସ୍ । ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତା । ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ପୁରୁଷ ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଯେଉଁ ଦୁଇ କ୍ରୀଡ଼ାବିତ୍ ଏହି ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଲେ ସେମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ଗୁରିନ୍ଦରବୀର୍ ସିଂ ଏବଂ ଅନିମେଷ କୁଜୁର । ମୁଁ ଭାବିଲି, ଏଥର ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହି ଦୁଇ ଖେଳାଳିଙ୍କ ସହ କଥା ହେବା ।

(ଫୋନ୍ କଲ୍)

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ: ଅନିମେଷ ଜୀ ନମସ୍କାର । ଗୁରୀନ୍ଦରବୀର ଆପଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନମସ୍କାର । ସତଶ୍ରୀ ଅକାଲ୍ ।

ଅନିମେଷ, ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର, ନମସ୍କାର ସାର ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଚ୍ଛା ଭାଇ ଆପଣମାନେ ତ ବହୁତ ବଡ଼ ଉପଲବଧି ହାସଲ କରିଛନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ଯୋଡ଼ି ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି । ଆମେ ସଙ୍ଗୀତରେ ତ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ଦେଖିଥିଲୁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ତ ଆହ୍ୱାନରେ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ହେଉଛି । ଜଣେ ଗୋଟିଏ ଆହ୍ୱାନ ଦେଉଛି, ଅନ୍ୟ ଜଣକ ଏହାକୁ ଗ୍ରହଣ କରୁଛି । ପୁଣି ତୃତୀୟ ଥର ହେଉଛି । ଆପଣଙ୍କ ବିଷୟଟି ଖୁବ୍ କୌତୁହଳପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଚାହୁଁଛି ଯେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ଆପଣମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣନ୍ତୁ । ଆପଣମାନେ କରିଦେଖାଇଥିବା ପରାକ୍ରମ ସମ୍ପର୍କରେ ଜାଣନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର ନମସ୍କାର । ମୋ ନାଁ ଅନିମେଷ କୁଜୁର୍ । ମୁଁ ୨୦୦ ମିଟର ଓ ୪୦୦ ମିଟରର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡଧାରୀ ଏବଂ ମୁଁ ଛତିଶଗଡ଼ର ବାସିନ୍ଦା ଆଉ ଏବେ ମୁଁ ଓଡ଼ିଶା ତରଫରୁ ଖେଳୁଛି । ଗତବର୍ଷ ମୁଁ ଏସୀୟ ପଦକ ଆଉ ବିଶ୍ୱ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ ଖେଳ ପଦକ ପାଇଥିଲି ଆଉ ସ୍କୁଲ ଛାଡ଼ିବା ପରେ ୨୦୨୧ରେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ସ୍କୁଲରୁ ପାସ୍ କରିଥିଲି । ମୁଁ ସୈନିକ ସ୍କୁଲ ଅମ୍ବିକାପୁରରୁ ପାସ୍ କରିଛି ଆଉ ଆଗରୁ ମୁଁ ଫୁଟବଲ ଖେଳୁଥିଲି । ମୋ ବାପା ମା’ କୋଭିଡ୍ ସମୟରେ ମୋତେ ଖେଳକୁଦ ପାଇଁ ଟିକିଏ ଅନୁମତି ଦେଉଥିଲେ କି ମୁଁ ଟିକେ ବାହାରେ ଯାଇ ଖେଳାବୁଲା କରିବି । କୋଭିଡ୍ ସରିବା ପରେ ମୋ ସହିତ ଫୁଟବଲ୍ ଖେଳୁଥିବା ସାଙ୍ଗମାନେ ମୋତେ କହିଲେ ଯେ, “ରାଜ୍ୟ ସମ୍ମିଳନୀ ହେଉଛି, ତୁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କର” ଆଉ ମୁଁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କଲି, କିନ୍ତୁ ସେଠି ଜାତୀୟ ସ୍ତର ପାଇଁ ଚୟନ ହେବ ସେକଥା ମୁଁ ଜାଣିନଥିଲି । ସେଠୁ ମୁଁ ଜାତୀୟକୁ ସିଲେକ୍ଟ ହେଲି ଆଉ ଆଜି ମୁଁ ଆନ୍ତର୍ଜାତିକ ସ୍ତରରେ ଭାରତର ପ୍ରତିନିଧିତ୍ୱ କରୁଛି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଉ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଜୀ ? ଆପଣଙ୍କ ଖବର କ’ଣ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର୍ । ମୋ ନାଁ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଆଉ ମୁଁ ଭାରତୀୟ ନୌସେନାର ଜଣେ Patty Officer। ମୁଁ ଭାରତର ସବୁଠାରୁ ଦ୍ରୁତ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟର । ଏଥର ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟରରେ ୧୦.୦୯ର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କରିଛି । ୧୦.୧୦ର ସୀମା ତଳକୁ ଯିବାରେ ମୁଁ ପ୍ରଥମ ଭାରତୀୟ । ମୁଁ ଉଭୟ ଟ୍ରାକ୍ ଓ ୟୁନିଫର୍ମରେ ନିଜ ଦେଶର ସେବା କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛି । ମୋ ବାପା ଓ ଜେଜେବାପା ଦୁହେଁ ଖେଳାଳି ଥିଲେ । ଆମ ଭାରତୀୟ ସଂସ୍କୃତିରେ ପର୍ବପର୍ବାଣୀ ଯେମିତିକି ଦୀପାବଳୀ, ନୂଆବର୍ଷ ଆଦି ସମୟରେ ଆମେ ନିଜ ଘରକୁ ସଫାସୁତୁରା କରିଥାଉ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ମୋ ବାପାଙ୍କ ଟ୍ରଫି ଓ ମେଡ଼ାଲଗୁଡ଼ିକ ମୁଁ ସଫା କରୁଥିଲି ମୋତେ ବହୁତ ଭଲ ଲାଗୁଥିଲା । ମୁଁ ବହୁତ ଖୁସି ହେଉଥିଲି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ କୌଣସି ଟ୍ରଫି ବା ମେଡାଲ ସଫା କରୁଥିଲି କିମ୍ବା କୌଣସି ଫଟୋ ଦେଖୁଥିଲି ତାହା ବିଷୟରେ ମୁଁ ବାପାଙ୍କୁ ପଚାରୁଥିଲି ସେତେବେଳେ ସେ ତାଙ୍କ କାହାଣୀ ଶୁଣାଉଥିଲେ । “ମୁଁ ସେଠିକି ଖେଳିବାକୁ ଯାଇଥିଲି । ସେଇଠି ମୁଁ ଏହି ଜାତୀୟ ପଦକ ପାଇଲି, ଏଥିରେ ମୁଁ ମୋ ଦଳକୁ ଜିତାଇଥିଲି ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ମୁଁ ବି କିଛି ଗୋଟେ ଖେଳ ଖେଳିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ସେ ସକାଳୁ ସକାଳୁ ଦୌଡ଼ିବାକୁ ଯାଉଥିଲେ । ମୋତେ ତାଙ୍କ ସାଙ୍ଗରେ ନେଇଯିବାକୁ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଲି । ସେ ମୋତେ ବି ସାଙ୍ଗରେ ନେବା ଆରମ୍ଭ କରିଦେଲେ । ଖେଳ ବିଷୟରେ ସେ ଯାହାସବୁ ଶିଖିଥିଲେ ସେସବୁ ସେ ମୋତେ ଶିଖାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ । ତେଣୁ ମୋର ଆଗ୍ରହ ବଢ଼ିଚାଲିଲା । ମୁଁ ଉସେନ ବୋଲ୍ଟଙ୍କର ବିଶ୍ୱରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବା ଦେଖିଲି । ଗୋଟିଏ କୌତୁକିଆ କାହାଣୀ ରହିଛି । ଥରେ ମୁଁ ଟିଭି ଦେଖୁଥିଲି, ମା’ ଟିଭି ବନ୍ଦ କରି କହିଲେ “ପୁଅ, ପାଠ ପଢ଼ିବା ସମୟ ହେଲାଣି, ତୁ ପାଠ ପଢ଼ ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଥିଲି ଯେ ଆପଣ ସିନା ମୋତେ ଟିଭି ଦେଖିବାକୁ ଦେଉନାହାଁନ୍ତି କିନ୍ତୁ ଦିନେ ଆପଣ ଟିଭିରେ ମୋତେ ଖୋଜି କହିବେ ହେଇ ଦେଖ ଗୁରିନ୍ଦର ଦୌଡ଼ୁଛି । ତେଣୁ ମୋ ମା’ ଯେତେବେଳେ ଟିଭି ପରଦାରେ ମୋତେ ଦୌଡ଼ୁଥିବା ଦେଖନ୍ତି ସେତେବେଳେ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଖୁସି ଲାଗେ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବାଃ ବାଃ ବାଃ । ଆପଣଙ୍କ କଥା ତ ବଡ଼ ଚମତ୍କାର!

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ହଁ ସାର୍ । ଆମର ହେଉଛି ଏକ ମଧ୍ୟବିତ୍ତ ପରିବାର, ମୋ ବାପା ଭଲିବଲ ଖେଳୁଥିଲେ ହେଲେ ଘରର ସମସ୍ୟାଗୁଡ଼ିକ ଯୋଗୁଁ ସେ ନିଜର ଖେଳାଖେଳି ଛାଡ଼ିଦେଲେ । ତାଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନ ଅସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ରହିଗଲା । ତେଣୁ ସେ ମୋ ଭିତରେ ସେହି ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିଲେ ଯେ, ସେହି ସ୍ୱପ୍ନକୁ ମୋ ପୁଅ ପୂରଣ କରିବ । ମୁଁ ତାଙ୍କ ସହିତ ଅନେକ ଥର କଥା ହୋଇଥିଲି । ତାଙ୍କଠୁ ଶୁଣୁଥିଲି ମିଲଖା ସିଂ କେତେ ପରିଶ୍ରମ କରୁଥିଲେ, ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ଦିନେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନକୁ ପୂରଣ କରିବି । ସେତେବେଳେ ସେ କହୁଥିଲେ ଯେ ସ୍ୱପ୍ନ ସେମିତି ପୂରଣ ହୋଇଯାଏନି, ତାହାପାଇଁ କଠିନ ପରିଶ୍ରମ କରିବାକୁ ପଡିଥାଏ । ମିଲଖା ସିଂ ଜୀ ରକ୍ତବାନ୍ତି କରୁଥିଲେ, ଖରାରେ ଦୌଡ଼ୁଥିଲେ । ଦିନସାରା ତାଲିମ ନେଉଥିଲେ । ଏହି କଥାଗୁଡ଼ିକ ମୋତେ ପ୍ରେରିତ କରୁଥିଲା । ମୋ ବାପା ମୋତେ ପ୍ରେରଣା ଦେଉଥିଲେ ଯେ, ଏହାଦ୍ୱାରା ମୁଁ ମୋ ଦେଶ ପାଇଁ ପଦକ ଆଣିପାରିବି । ଆଉ ପୁଣି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟର ରେସକୁ ନିଜ ଇଭେଣ୍ଟ ଭାବେ ଚୟନ କଲି ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତେ ମୋତେ ସେଥିପାଇଁ ମନା କରି କହିଥିଲେ ଯେ ୧୦୦ ମିଟର ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଇଭେଣ୍ଟ ନୁହେଁ । ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ୧୦୦ ମିଟର ପାଇଁ ତିଆରି ହୋଇନାହିଁ । ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଉ ମୋ ବାପା କହୁଥିଲୁ ଯେ, ଏବେ ଗୁରିନ୍ଦର ଆଉ ମୁଁ ଏହାକୁ ବାଛିଛୁ ଆଉ ଏଥିରେ ପଛଘୁଞ୍ଚା ଦେବାର ନାହିଁ । ଆମେ ଯାହାକୁ ଅସମ୍ଭବ ବୋଲି ଭାବୁଛୁ ତାହା ଆମେ କରି ଦେଖାଇବୁ । ବାପା କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହା କରି ଦେଖାଇବୁ, ତୋ ଉପରେ ମୋର ବିଶ୍ୱାସ ରହିଛି । ବାପା ଯେତେବେଳେ ମୋ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ କଲେ ତାଙ୍କର ସେହି ବିଶ୍ୱାସକୁ ମୁଁ ନିଜର ସାହସରେ ପରିଣତ କରିଦେଲି । ଆଉ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟ କହୁଛି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରନ୍ତୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ, ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛନ୍ତି ଆଉ ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣ ଦୁହେଁ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଛନ୍ତି । ୧୦୦ ମିଟର ରେସରେ ଦୌଡ଼ିବା, ଯାହା ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କହିଲେ ଯେ ଲୋକେ କହନ୍ତି ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ଏଥିପାଇଁ ଗଢ଼ା ହୋଇନାହିଁ । ଏତେ କଷ୍ଟ ହୋଇଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ଆପଣ ଏହି କାମ କରି ଦେଖାଇଲେ । ଆପଣ ଦୁଇଜଣଙ୍କଠାରୁ ମୁଁ ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଆଉ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହିଁବେ ଯେ, ଏହା କିଭଳି ଉତ୍ସାହ ଥିଲା, କ’ଣ ଜିଦ୍ଦି ଥିଲା, କ’ଣ ଭାବିଥିଲେ, ଆଉ କ’ଣ କରୁଥିଲେ? ଏହା କେତେ କଷ୍ଟ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆଜ୍ଞା, ମୁଁ ଗୁରିନ୍ଦର, ଆରମ୍ଭରେ ଏହା ଖୁବ୍ ସଂଘର୍ଷପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ କରୁଛି କି ନାହିଁ ସେ ବିଷୟରେ ବହୁତ ଥର ସନ୍ଦେହ ମଧ୍ୟ ହେଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ ଜିନିଷକୁ ବାଛିଲି କାରଣ ସବୁବେଳେ ଆପଣ ଜିଣିନଥାନ୍ତି, ବେଳେବେଳେ ଆପଣ ଶିଖିଥାନ୍ତି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ହାରୁଥିଲି, ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଠିକ୍ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିପାରୁନଥିଲି, କୌଣସି ଆଘାତ ଲାଗୁଥିଲା ସେତେବେଳେ ମୋ ଘର ଲୋକେ ମୋତେ ସହଯୋଗ କରି କହୁଥିଲେ ଯେ ଦିନେଅଧେ ବେଳ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା କିମ୍ବା ବର୍ଷେ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା ସେଥିରେ ସାରାଜୀବନ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ ନାହିଁ । ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିବା ବନ୍ଦ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ । ମୋ କୋଚ୍ ବି ମୋତେ ଏହି କଥା କହିଲେ ଯେ ଯଦି ତୁ ନ କରିପାରିବୁ ତାହାଲେ ଆଉ କେହି ପାରିବ ନାହିଁ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ଆମ ନିଜ ଲୋକ, ଆମ ଆଖପାଖର ଲୋକ ଆମକୁ ଉତ୍ସାହିତ କରନ୍ତି ତେବେ ମନୋବଳ କେବେହେଲେ ଭାଙ୍ଗେନାହିଁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଅନିମେଷ ଜୀ ...

ଅନିମେଷ : ସାର, ୨୦୨୧ରେ ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କଲି ମୋତେ ତ ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ, ଦେଖ୍ ଇଏ ଗୋଟିଏ ନୂଆ କ୍ଷେତ୍ର ତୁ କରିପାରିବୁ କି ନାହିଁ? ସେତେବେଳେ ମୁଁ କହୁଥିଲି ଯେ ଯଦି ଏ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ବାଛିଛି ତାହାଲେ ଯେମିତି ହେଲେ ବି କରିବି । ମୋ ବାପା ମଧ୍ୟ କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହି କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେଣୁ କେବେହେଲେ ପଛକୁ ଚାହିଁବୁ ନାହିଁ । କାରଣ ଅନେକ ଲୋକ ବହୁତ କଥା କରିବା ଭାବନ୍ତି କିନ୍ତୁ ବହୁତ କମ ଲୋକ କରିଦେଖାନ୍ତି । ତୁ ଏ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେବେ ଏଥିରେ ଦୃଢ଼ ହୋଇ ରହିବୁ, ଏଥିରେ ଆଗେଇ ଚାଲିବୁ । ତୋତେ ଆମେ ପରିବାର ତରଫରୁ ଆର୍ଥିକ ଆଉ ଅନ୍ୟ ସବୁ ପ୍ରକାର ସହଯୋଗ ଓ ସୁବିଧାସୁଯୋଗ ଯୋଗାଇବୁ, କେବଳ ତୁ ପରିଶ୍ରମ କର ଆଉ ଭାରତକୁ ଦେଖାଇଦେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୌଡ଼ିପାରନ୍ତି କାରଣ ମୋତେ ବି ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଜିନ୍ ୧୦ କିମ୍ବା ୧୦.୧ରୁ କମ୍ ଦୌଡ଼ିବା କିମ୍ବା ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରିବା ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ଆମେ ଦୁହେଁ ପ୍ରମାଣିତ କରିଦେଇଛୁ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମପାଇଁ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ କଠିନ ନୁହେଁ । ଆମେ ସବୁକିଛି କରିପାରୁ । ତେଣୁ ସାର୍ ଏହି ସବୁକଥା ମୋତେ ବହୁତ ପ୍ରେରଣା ଯୋଗାଇଥାଏ ଆଉ ଆମେ ଯେମିତି ତାଲିମ ଗ୍ରହଣ କରିଚାଲିଛୁ ଆଉ ସମୟ ଭଙ୍ଗ କରିଚାଲିଛୁ ଏହାଦେଖି ଅନ୍ୟମାନେ ଅନୁଭବ କରୁଛନ୍ତି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମେ ଆହୁରି ପରିଶ୍ରମ କରିବା । ଏବେ ଆମ ଦୁହିଁଙ୍କ ଚୟନ ରାଜ୍ୟଗୋଷ୍ଠୀ ଖେଳ ପାଇଁ ହୋଇଛି । ସେଠାରେ ହେବାକୁ ଥିବା ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ଆମେ ଆହୁରି ଭଲ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିବୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଠିକ୍ ଅଛି, ଶୁଣ । ମୋ ମନରେ ବି କୌତୁହଳ ରହିଛି । ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ମନରେ ବି ଥିବ । ମୁଁ ଶୁଣିଛି ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଭଲ ସାଙ୍ଗ । ଆପଣ ଉଭୟ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିଛନ୍ତି ଯେ ଯଦି ତୁ ମୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବୁ ତେବେ ମୁଁ ବି ତୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବି । କଥା କ’ଣ, ପ୍ରଥମେ ଅନିମେଷ କୁହନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର୍, ପ୍ରଥମ ୧୦.୧୮ ରେକର୍ଡ ଥିଲା ଯାହା ମୁଁ ହିଁ କରିଥିଲି । ଏବଂ ତା’ପରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ରେ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଭାଇ ୧୦.୧୭ କରି ତାହାକୁ ଭାଙ୍ଗିଥିଲେ । ତା’ପରେ ପୁଣିଥରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍-୨ରେ ୧୦.୧୫ କରି ମୁଁ ତାଙ୍କର ସେହି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲି । ତା’ପରେ ଯେତେବେଳେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ ହେଲା ସେତେବେଳେ ଆମେ ଦୁହେଁ ଖୁସି ଥିଲୁ । ଯାହାହେଉ ଠିକ୍ ଅଛି, ଆଜି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲା ଏବଂ ଆମେ ଦୁହେଁ ଏହା ଭାଙ୍ଗିଲୁ । ପ୍ରତିଯୋଗିତା ସମୟରେ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା ରହେ କିନ୍ତୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଆମେ ବହୁପୂର୍ବରୁ କରିଥିଲୁ । ଏହାପୂର୍ବରୁ ଆମେ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ପାଇଁ ସାଉଦି ଆରବ ଯାଇଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ ରୁମମେଟ୍ ଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ କଥାହେଉଥିଲୁ ଯେ ଇଣ୍ଡିଆର ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟିଂକୁ ବହୁ ଆଗକୁ ନେବାର ଅଛି ଏବଂ ଏସବୁ ଜିନିଷ ଆମ ହାତରେ ହିଁ ଅଛି । ଆମେ ଯାହା କରିବା ତାହା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା କରିବ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କିଛି କହିବେ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆମେ ଦୁହେଁ ନିଷ୍ପତ୍ତି କରିଥିଲୁ ଯେ ଆମେ ଖୁବ୍ ଭଲ ଦୌଡ଼ିବୁ । ସାର୍ ଯେତେବେଳେ ବି ଜଣଙ୍କୁ ଅନ୍ୟ ଜଣଙ୍କର ସାହାଯ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ ହୁଏ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପର ସହ ଛିଡ଼ାହେଉ । ଯେମିତିକି ଏବେ ରେକର୍ଡ କରିବା ପୂର୍ବରୁ ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ରେକର୍ଡ କଲି, ତା’ପରେ ଅନିମେଷ କହିଲେ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରୁଥିଲୁ ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଅନିମେଷକୁ ବତାଉଥିଲି, ଅନିମେଷ, ଏବେ ସେହି ବ୍ଲକଟି ଠିକ୍ ଅଛି । ସେଇଠି ଯାଇ ବସ । ସେଠାରେ ଯାଇ ଷ୍ଟ୍ରାଇଡ୍ କର । ଆମେ ଦୁହେଁ ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରିବା । ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ ଠିକ୍ ହେବ । ତେବେ ଜଣେ ଅନ୍ୟଜଣକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ । ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କଲେ, ଜଣେ ଉନ୍ନତ କଲେ ଅନ୍ୟଜଣେ ମଧ୍ୟ ଉନ୍ନତ କରିଥାନ୍ତି । ହଁ, ସାଙ୍ଗ ବି ଦରକାର । କିନ୍ତୁ ସାର୍ ଆମେ ଯେତେବେଳେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ବାହାରେ ଥାଉ, ପ୍ରତିଯୋଗିତାରୁ ବାହାରେ ଥାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ସାଙ୍ଗ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ଭିତରକୁ ଯାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପରର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀ ହୋଇଯାଉ । ସେତେବେଳେ ଭାବୁ ଯେ ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି, ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଯେଉଁ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା କରିଛନ୍ତି ତାହା ଦେଶର ସମ୍ମାନ ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଭବିଷ୍ୟତରେ ଦେଶକୁ ସେହି ଜାଗାରେ ପହଞ୍ଚାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଆଉ ଏକ ସକାରାତ୍ମକ ସ୍ପିରିଟ୍ ସହ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ମତରେ ଆପଣଙ୍କର ଏ ଯେଉଁ ସ୍ପୋର୍ଟସମ୍ୟାନ ସ୍ପିରିଟ୍ ଅଛି, ଖେଳିବା ହେଉ, ପରସ୍ପରକୁ ଚୁନୌତି ଦେବା ହେଉ, ଆଉ ପୁଣି ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉ, ଅବା ଆଗକୁ ଯିବାପାଇଁ ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବା ହେଉ, ସତରେ ଆପଣମାନେ ଅଦ୍ଭୁତ କାମ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ତରଫରୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ, ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା। ମୋର ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱାସ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଦେଶର ନାଁ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ କରିବେ । ଆପଣ ଏପରି ପରିଶ୍ରମ କରିଚାଲନ୍ତୁ । ବହୁତ ଉନ୍ନତି କରିବେ । ମୋର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର

ଅନିମେଷ : ଧନ୍ୟବାଦ ସାର୍, ଆପଣଙ୍କୁ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ସମ୍ପ୍ରତି ଦେଶର ଅଧିକାଂଶ ଭାଗରେ ବହୁତ ଗ୍ରୀଷ୍ମପ୍ରବାହ ହେଉଛି । ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଖରା, ଗରମ ପବନ ଏପରି ପାଣିପାଗରେ ନିଜର ଧ୍ୟାନ ରଖିବା ଖୁବ୍ ଜରୁରୀ । ପାଣି ପିଅନ୍ତୁ । ଖରାରେ ଯଦି ଯିବାର ହୁଏ ତେବେ ଦେଖିଚାହିଁ ବାହାରନ୍ତୁ । ଖରାକୁ ଆଖି ଆଗରେ ରଖି ସରକାରଙ୍କର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ବିଭାଗର ଯେଉଁ ମାର୍ଗଦର୍ଶିକା ଜାରି କରିଛନ୍ତି ତାକୁ ଆଦୌ ଭୁଲନ୍ତୁ ନାହିଁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମର ଏଠି ଗରମ ସହ ଲଢ଼ିବାର ଉପାୟ ଅନେକ ଥର ରୋଷେଇରେ ବି ମିଳିଥାଏ । ଆପଣମାନେ ଦେଖିଥିବେ ଯେମିତି ଗରମ ବଢ଼ି ବଢ଼ି ଚାଲେ, ସେମିତି ଘରର ରୋଷେଇର ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ରୋଷେଇର ପ୍ରକାର ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । କେଉଁଠି ମାଠିଆରୁ ପାଣି ଆସେ, କେଉଁଠି ଦହି ବସାହୁଏ, ଆଉ କେଉଁଠି କଞ୍ଚା ଆମ୍ବକୁ ଶିଝାଯାଏ - ଆଉ ତା’ପରେ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ସମୟ । ଦେଶୀ ପାନୀୟ ସହ ଆପଣମାନେ ବି ପରିଚିତ । ଯଦି ଆପଣ ଉତ୍ତର-ଭାରତ ଯିବେ ତେବେ ଆପଣଙ୍କୁ ଅନେକ ସ୍ଥାନରେ ଆମ୍ବପଣା, କଞ୍ଚା ଆମ୍ବର ସ୍ୱାଦ ମିଳିବ ଏବଂ ଏହାଛଡ଼ା ଗରମରୁ ନିସ୍ତାର ମଧ୍ୟ ମିଳିବ । ପଞ୍ଜାବ-ହରିୟାଣା ଗଲେ ଲସି ପାଇବେ । ବଡ଼ ବଡ଼ ଗିଲାସବାଲା ଲସି । ରାଜସ୍ଥାନ ଓ ଗୁଜରାଟରେ ଘୋଳଦହି ସତେଯେମିତି ସବୁ ଭୋଜନର ସାଥୀ ହୋଇଯାଏ । ବିହାର, ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡ ଓ ପୂର୍ବ ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶରେ ସତ୍ତୁ ସରବତ – ତା’ କଥା ତ ନିଆରା – ପେଟ ପୁରିବ, ବଳ ବି ଦେବ । କୋଙ୍କଣ ଓ ଗୋଆରେ କୋକମ ସରବତ, ସୋଲ କଢ଼ି । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତରେ ପାନକମ, ନୀର ମୋର, ସାମ୍ବରମ୍ ଓ ଓଡ଼ିଶାରେ ବେଲପଣା । ଏସବୁ କେବଳ ପାନୀୟ ନୁହେଁ, ଏହା ହେଉଛି ଭାରତର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳର ପରମ୍ପରାର ଅଂଶବିଶେଷ ମଧ୍ୟ । ଆଉ ଏହାରି ଭିତରେ ‘ଏକ ଭାରତ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’ର ଝଲକ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଆଉ ଗୋଟିଏ କଥା ନିଶ୍ଚୟ ମନେରଖିବେ, ଏଥିରୁ ଅଧିକାଂଶ ଜିନିଷ ଆମ ରୋଷେଇଘରୁ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଛି, ଆମ ବିଲବାଡ଼ିରୁ ବାହାରିଛି । ଏହା କୌଣସି ବଡ଼ ବ୍ରାଣ୍ଡିଂ ନୁହେଁ । କିନ୍ତୁ ପିଢ଼ୀ ପିଢ଼ୀର ଅନୁଭବ ଏହା ଭିତରେ ସମାହିତ ହୋଇରହିଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଗରମରେ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ଖୁବ୍ ଆନନ୍ଦ ଉଠାନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଆସିବା ସମୟ ଆଉ ଏକ ଚର୍ଚ୍ଚା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଘରେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଏ, ଆଉ ତାହା ହେଉଛି ଆମ୍ବ । ଆମ୍ବ ସାଧାରଣ ଚର୍ଚ୍ଚାର ବିଷୟ ପାଲଟିଯାଏ । ଭାରତରେ ବୋଧହୁଏ ଏପରି କୌଣସି ଘର ନ ଥିବ ଯେଉଁଠି ଗରମ ଦିନେ ଆମ୍ବର କଥା ପଡୁନଥିବ । ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅଞ୍ଚଳର ନିଜସ୍ୱ ଆମ୍ବ, ନିଜସ୍ୱ ସ୍ୱାଦ ଓ ନିଜସ୍ୱ ସୁଗନ୍ଧ ରହିଛି । ମହାରାଷ୍ଟ୍ର ଓ କୋଙ୍କଣର ହାପୁସ୍, ଆଲଫୋନ୍ସୋ । ଗୁଜୁରାଟର କେସର, ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ଦଶହରି, ଓ ମୋ କାଶିର ଲଙ୍ଗଡା – ଏମାନେ ତ ଆମ୍ବ ଭିତରେ ରାଜା । ଦେଖିବାକୁ ଗଲେ ଲଙ୍ଗଡା ଆମ୍ବର ଏକ ବିଶେଷତ୍ୱ ରହିଛି - ପାଚିବା ପରେ ମଧ୍ୟ ତା’ର ରଙ୍ଗ ସବୁଜ ଦେଖାଯାଏ । ବିହାରର ଜର୍ଦ୍ଦାଲୁ – ବାସ୍ନାରୁ ଯାହାକୁ ଦୂରରୁ ଥାଇ ଚିହ୍ନିହୁଏ । ଚୌଷା, ମାଲଦା - ପ୍ରତ୍ୟେକ ନାଁ ସହ ଲୋକମାନଙ୍କ ସ୍ମୃତି ଜଡ଼ିତ । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତ ଯାଆନ୍ତୁ, ସେଠି ବେଗନ୍ ପଲ୍ଲୀ, ତୋତାପୁରୀ, ନିଲମ୍, ମଲଗୋବା, ବେଙ୍ଗଲରେ ହିମସାଗର, ଓଡ଼ିଶା ଓ ଆନ୍ଧ୍ରପ୍ରଦେଶରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେଖା ପାଇବେ । ଅର୍ଥାତ୍ ସ୍ଥାନ ବଦଳିବା ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ଆମ୍ବର ରଙ୍ଗ, ରୂପ ଓ ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ଆଉ ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ୍ବର ଏହି ଯାତ୍ରା ଏବେ ଗାଁରୁ ବିଶ୍ୱ ବଜାର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଂଚିପାରିଛି । ଆଜି ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଜରିଆରେ ଆମ୍ବ ଚାଷ ସହ ଜଡ଼ିତ ମୋ କୃଷକ ଭାଇଭଉଣୀଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରିବି । ଆପଣ ଦେଶର କୃଷିଭିତ୍ତିକ ଅର୍ଥନୀତି ପାଇଁ ଜଣେ ସାଧାରଣ ଚାଷୀ ନୁହଁନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ସ୍ଥାନ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର । ଏହିପରି ଲାଗି ରୁହନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗରମ ଦିନେ ଏମିତି ତ ସ୍କୁଲ ଛୁଟି ହୋଇଥାଏ । କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏପରି ଏକ କ୍ଲାସର କଥା କହିବି ଯେଉଁଠି ଆପଣ ପ୍ରବେଶ ନେବାପାଇଁ ମନ କରିବେ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏପରି ଏକ ସ୍ଥିତିର କଳ୍ପନା କରନ୍ତୁ – ଏପରି ଏକ ସ୍କୁଲ ଯେଉଁଠି ପିଲା ବି ଆସନ୍ତି, ଯୁବକମାନେ ବି ଆସନ୍ତି ଓ ବୟସ୍କମାନେ ବି ଆସନ୍ତି । ଯେଉଁଠି କିଛି ଫିସ ନାହିଁ । କୌଣସି ବଡ କୋଠା ନାହିଁ, କୌଣସି ଶ୍ରେଣୀଗୃହ ମଧ୍ୟ ନାହିଁ । ଆଉ ସବୁଠାରୁ ମଜାକଥା ହେଲା ଏହି କ୍ଲାସ ନଦୀରେ ହିଁ ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହା କୌଣସି କାହାଣୀ ନୁହେଁ । ଏହା ହେଉଛି ଏକ ସତପ୍ରୟାସ । କେରଳମର ଆଲୁୱାରେ, ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀ ଏପରି ଏକ ସ୍ବିମିଂଗ କ୍ଲବ ଚଳାଉଛନ୍ତି ଯେଉଁଠାରେ ବର୍ତ୍ତମାନ ସୁଦ୍ଧା ୧୫ ହଜାରରୁ ଊର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ଲୋକ ପହଁରା ଶିଖିସାରିଲେଣି । ସାଜି ଜୀ ଦିବ୍ୟାଙ୍ଗ ପିଲାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପହଁରା ଶିଖାଇଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ପଛରେ ଏକ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଲୁଚିରହିଛି । କିଛିବର୍ଷ ତଳେ ଏକ ନୌକା ଦୁର୍ଘଟଣାରେ ଅନେକ ଛାତ୍ର ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରିଥିଲେ । ଏହି ଘଟଣା ସାଜି ଜୀଙ୍କୁ ଖୁବ୍ ଆନ୍ଦୋଳିତ କରିଥିଲା । ସେ ଚିନ୍ତା କଲେ, ଯଦି ପିଲାମାନେ ପହଁରା ଜାଣିଥାନ୍ତେ, ତେବେ ବୋଧହୁଏ କିଛି ଜୀବନ ବଞ୍ଚିଯାଇଥାନ୍ତା, ବାସ୍, ଏହିଠାରୁ ଆରମ୍ଭ ହେଲା ଏହି ଅଭିଯାନ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀଙ୍କ ଜୀବନ ଆମକୁ ବହୁତ ବଡ଼ ଶିକ୍ଷା ଦିଏ । ସେବା କରିବା ପାଇଁ ବହୁତ ବଡ଼ ସାଧନ ଦରକାର ହୁଏନାହିଁ । ଦରକାର ହୁଏ ସଦିଚ୍ଛା ଓ ନିରନ୍ତର ପ୍ରୟାସ । ଏହା ବଳରେ ହଜାର ହଜାର ଲୋକଙ୍କ ଜୀବନରେ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଅଣାଯାଇପାରେ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ବିଗତ ଦିନରେ ମୋତେ ୟୁରୋପର ନେଦରଲାଣ୍ଡସ୍ ଯିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା । ସେଠି ମୁଁ ଅନେକ ମିଟିଂରେ ସାମିଲ ହେଲି । ଆଉ ସେତେବେଳେ ଏପରି ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଆସିଲା, ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କୁ ଗର୍ବିତ କରିଥିଲା । ନେଦରଲାଣ୍ଡସରେ ଆୟୋଜିତ ଏକ ବିଶେଷ ସମାରୋହରେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ପ୍ରାଚୀନ ତାମ୍ରଫଳକ ଭାରତକୁ ଫେରାଇ ଦିଆଗଲା । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ନେଦରଲାଣ୍ଡର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକକୁ ନେଇ ଦେଶବିଦେଶରୁ ମୋ ପାଖକୁ ନିରନ୍ତର ବାର୍ତ୍ତା ଆସିବାରେ ଲାଗିଛି । ଲୋକମାନେ ଆନନ୍ଦ ପ୍ରକାଶ କରୁଛନ୍ତି । ଗର୍ବ ବ୍ୟକ୍ତ କରୁଛନ୍ତି । ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର ତାମିଲ ସମୁଦାୟ ମଧ୍ୟରେ ଏହାକୁ ନେଇ ଖୁବ୍ ଉତ୍ସାହ ପରିଲକ୍ଷିତ ହେଉଛି।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଖୁବ ଜିଜ୍ଞାସା ରହିଛି । ସେଥିପାଇଁ ଆଜି ମୁଁ ଏହାସହ ଜଡ଼ିତ କିଛି କଥା ଆପଣମାନଙ୍କୁ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରୁ ୨୧ଟି ବଡ଼ ଓ ୩ଟି ଛୋଟ ତାମ୍ରଫଳକ ରହିଛି । ଏହା ମୁଖ୍ୟତଃ ରାଜା ରାଜେନ୍ଦ୍ର ଚୋଳ-ପ୍ରଥମଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ନିଜ ପିତା ରାଜା ରାଜରାଜା ଚୋଳଙ୍କ ଏକ ବଚନକୁ ପୂରଣ କରିବା ସହ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିରେ ଆନଇମଙ୍ଗଲମ୍ ଗାଁକୁ ଏକ ବୌଦ୍ଧବିହାରକୁ ଦାନ ଦେଇଥିବାର ଉଲ୍ଲେଖ ରହିଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକରେ ଚୋଳବଂଶର ଉପଲବଧିର ବର୍ଣ୍ଣନା ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଏଥିରୁ ଜଣାପଡ଼େ ଯେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସାମୁଦ୍ରିକ ଶକ୍ତି କେତେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଥିଲା । ଏଥିରୁ ଦକ୍ଷିଣ ପୂର୍ବ ଏସିଆ ଦେଶମାନଙ୍କ ସହ ଚୋଳ ଶାସକଙ୍କ ସମ୍ପର୍କ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଜଣାପଡ଼େ ।

ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସମୃଦ୍ଧ ଇତିହାସ ଓ ସଂସ୍କୃତିକୁ ନେଇ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଗର୍ବିତ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ ସରକାର ଭାରତର ଏପରି ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟର ସଂରକ୍ଷଣ ପାଇଁ ନିରନ୍ତର ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରତ । ଏହି କ୍ରମରେ ‘ଜ୍ଞାନଭାରତମ୍ ଅଭିଯାନ’ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଛତିଶଗଡ଼ର ମହ୍ଲାରରେ ମଧ୍ୟ ଏକ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଅନୁସନ୍ଧାନ କରାଯାଇଛି । ସେଠାରୁ ତିନୋଟି ଦୁର୍ଲ୍ଲଭ ତାମ୍ରଫଳକ ମିଳିଛି । ଏଗୁଡ଼ିକ ପାଣ୍ଡୁବଂଶୀ ରାଜବଂଶର ମହର୍ଷି ବାଲାର୍ଜୁନଙ୍କ ଶାସନକାଳ ସହ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ମତ ପ୍ରକାଶ ପାଉଛି । ବିଶେଷଜ୍ଞଙ୍କ ମତରେ ଏହି ଶିଳାଲେଖ ଷଷ୍ଠ-ସପ୍ତମ ଶତାବ୍ଦୀର । ୧୪୦୦-୧୫୦୦ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରାଚୀନ ବ୍ରାହ୍ମୀଲିପି ଓ ପାଲି ଭାଷାରେ ଲିଖିତ । ଏଥିରୁ ସେ ସମୟର ଶାସନ ବ୍ୟବସ୍ଥା, ଧର୍ମ ଓ ସଂସ୍କୃତି ବିଷୟରେ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ତଥ୍ୟ ମିଳୁଛି । 

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଅଥବା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ପ୍ରତି ବିଶେଷ ଆକର୍ଷଣ ଥାଏ । ଆଜି ବି ଆମ ଦେଶରେ ଶହଶହ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣାଗାର ରହିଛି । ଏଠାରେ ଅଦ୍ଭୁତ ଗାଣିତିକ ଉଦ୍ଭାବନ ହୋଇଛି । ନାଭିଗେସନ୍ ହେଉ, ପଞ୍ଜିକା ହେଉ କିମ୍ବା ଆମର ପର୍ବପର୍ବାଣୀ, ଏସବୁର ସମ୍ପର୍କ ଆକାଶ ଏବଂ ତାରାମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି । ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଆମ ଦେଶରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁଗରେ କୌତୂହଳ ସୃଷ୍ଟି କରିଆସିଛି ତାକୁ ଆବିଷ୍କାର କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରେରିତ କରିଛି ତଥା ଆଜିର ଯୁବକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ ନେଇ ବହୁତ ଉତ୍ସାହ ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଥିବେ ଆଜିକାଲି ସାରାଦେଶରେ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଦ୍ରୁତ ବେଗରେ ଲୋକପ୍ରିୟ ହେଉଛନ୍ତି । ବଡ଼ ସହରଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଛୋଟ ପଡ଼ା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ, ସ୍କୁଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ପାର୍କ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହାର ଗତିବିଧି ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ମୋତେ ବାଙ୍ଗାଲୋର ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମିକାଲ୍ ସୋସାଇଟି ସମ୍ପର୍କରେ ସୂଚନା ମିଳିଛି । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଅଧିବେଶନ ଆୟୋଜିତ ହେଉଛି । ଏହି ସଂସ୍ଥା ଗ୍ରାମାଞ୍ଚଳରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନକୁ ଲୋକପ୍ରିୟ କରିବାର ଅଭିଯାନ ଆରମ୍ଭ କରିଛି । ‘ଖଗୋଳ ମଣ୍ଡଳ’ ନାମକ ଏକ ଦଳ ୩୦ ଘଣ୍ଟାର ଗୋଟିଏ ଅଭିନବ ପାଠ୍ୟକ୍ରମ ଆରମ୍ଭ କରିଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ରାତିରେ ତାରାମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବା ସ୍ୱତଃ ଗୋଟିଏ ଅଦ୍ଭୁତ ଅନୁଭବ ହୋଇଥାଏ । ଆଷ୍ଟ୍ରୋ କେରଳ ନାମକ ଗୋଟିଏ ସଂସ୍ଥା ରାତ୍ରି ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଶିବିର ଏବଂ କର୍ମଶାଳା ଆୟୋଜିତ କରେ । ଏଠାରେ ଯୁବବନ୍ଧୁମାନେ ଟେଲିସ୍କୋପ ତିଆରି କରିବା ଏବଂ ତାରା ମାନଚିତ୍ରର ପ୍ରୟୋଗ ଶିଖନ୍ତି । ରାଜକୋଟର ବିଗ୍ ବ୍ୟାଙ୍ଗ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଗିରର ଜଙ୍ଗଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି କଚ୍ଛର ରଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅନେକ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଇଭେଣ୍ଟ ଆୟୋଜିତ କରିଛନ୍ତି । ‘ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଦ୍ୟା ପରିସଂସ୍ଥା’ ମଧ୍ୟ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନର ପୁରୁଣା ସଂସ୍ଥାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗୋଟିଏ । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ସୁବିଧା ସହିତ ବହି, ଲାଇବ୍ରେରୀ ଏବଂ ଟେଲିସ୍କୋପ ଲାଇବ୍ରେରୀର ସୁବିଧା ମଧ୍ୟ ଅଛି । ମୁଁ ଆଇଏସଏଏସି (ଆଇସାକ୍) ସମ୍ପର୍କରେ ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହେଁ । ଏହା ଏକ ଛାତ୍ର-ନେତୃତ୍ୱାଧୀନ ଦେଶବ୍ୟାପୀ ନେଟୱାର୍କ,, ଯାହା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଏବଂ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ କ୍ଲବକୁ ପରସ୍ପର ମଧ୍ୟରେ ଯୋଡ଼ିଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ ନିଜର ହବି ପାଇଁ ସମୟ ବାହାର କରିବା ଏବଂ ସବୁବେଳେ କିଛି ନା କିଛି ନୂଆ ଶିଖିବା ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ । ମୁଁ ଯୁବକମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କରିବି ଯେ ସେମାନେ କୌଣସି ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ସହିତ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ, ଏବଂ ଏହି ଛୁଟିରେ କୌଣସି ପ୍ଲାନେଟୋରିୟମ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ଯାଆନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମକୁ ଯେଉଁମାନେ ଟିଭିରେ ଦେଖୁଛନ୍ତି, ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ କହିବି – ଗୋଟିଏ ଭିଡିଓକୁ ନିଶ୍ଚିତ ଦେଖନ୍ତୁ । ଏହି ଭିଡିଓ ବିଗତ ଦିନରେ ଖୁବ୍ ଚର୍ଚ୍ଚାରେ ଥିଲା । ଏଥିରେ କିଛି ଲୋକ ଖୁବ୍ ଧୈର୍ଯ୍ୟର ସହିତ, ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଇବାର ଚେଷ୍ଟା କରୁଥିଲେ । ଏହା ଜାଣି ଆପଣ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହେବେ ଯେ ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରେ ପାଖାପାଖି ୧୩ ଘଣ୍ଟା ଲାଗିଲା ଏବଂ ପରିଶେଷରେ ସେହି ଡଲଫିନ୍ ବଞ୍ଚିଗଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରଥମ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ନେଇଥିଲା । ଘଟଣାଟି ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର । ସେଠାରେ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ କେନାଲରେ ଫଶିଯାଇଥିଲା । ଏହି ସମୟରେ ‘ନମାମି ଗଙ୍ଗେ ଅଭିଯାନ’ରେ ତିଆରି ହୋଇଥିବା ଏହି ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ତା’ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ଆଶାର କିରଣ ନେଇ ପହଞ୍ଚିଲା । ତା’ପରେ ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ତାକୁ ବାହାରକୁ ଅଣାଗଲା । ତା’ର ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟପରୀକ୍ଷା କରାଗଲା, ତା’ର ଚିକିତ୍ସା କରାଗଲା ଏବଂ ଏହାପରେ ତାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ଭାବେ ରାପ୍ତି ନଦୀରେ ଛାଡ଼ିଦିଆଗଲା । ଯଦି କହିବା ଏହିଭଳି ଭାବରେ ଗୋଟିଏ ଜୀବନ ପୁଣି ନିଜ ଘରକୁ ଫେରିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ବହୁତ ଅନନ୍ୟ । ଏହାକୁ ଗୋଟିଏ ଚଳମାନ ଚିକିତ୍ସାଳୟ ଭଳି ତିଆରି କରାଯାଇଛି । ଏଥିରେ ଡଲଫିନ୍କୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖିବାର ବ୍ୟବସ୍ଥା ଅଛି । ଅମ୍ଳଜାନର ସୁବିଧା ଅଛି, ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଷ୍ଟ୍ରେଚର ଅଛି, ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ଉପକରଣ ଅଛି, ଅର୍ଥାତ୍ ଯଦି କୌଣସି ଡଲଫିନ୍ ଆହତ ହୋଇଯାଏ, କେନାଲରେ ଫଶିଯାଏ ବା ନଦୀରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ, ତେବେ ଯଥାଶୀଘ୍ର ତାକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରାଯାଇପାରିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି, ତେବେ ଆମେ ଖାଲି ଗୋଟିଏ ପ୍ରଜାତିକୁ ବଞ୍ଚାଉନାହୁଁ, ଆମେ ଗଙ୍ଗାର ଜୈବ ବିବିଧତାକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । ନଦୀର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନତନ୍ତ୍ରକୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ଆଗାମୀ ପିଢ଼ୀ ପାଇଁ ପ୍ରକୃତିର ଗୋଟିଏ ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । 

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ଆପଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଅନେକ ଲୋକଙ୍କର ନଦୀ, ପୋଖରୀ ଅଥବା କୂଅ ପାଣି ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସ୍ମୃତି ନିଶ୍ଚୟ ଥିବ । କାହାକୁ ପୋଖରୀରେ ପହଁରିବା ମନେଥିବ, କେହି ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ସହିତ ପୋଖରୀ କୂଳରେ ଖେଳିବା ବା କାହାର ସେହି ମାଟିର ସୁଗନ୍ଧ ମଧ୍ୟ ମନେପଡୁଥିବ । ବାଲ୍ୟକାଳର ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିଗୁଡ଼ିକ ସାରାଜୀବନ ମନରେ ସାଇତା ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିକୁ ବଞ୍ଚାଇ ରଖିବାର ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରକ କଥା ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ବସ୍ତୀ ଜିଲ୍ଲାରୁ ଆସିଛି । ବସ୍ତୀର ଆକାଶଗୁପ୍ତା ନିଜ ଗାଁର ମନୋରମା ନଦୀକୁ ଦେଖି ବହୁତ ଦୁଃଖୀ ହେଉଥିଲେ । କାରଣ ଯେଉଁ ନଦୀକୁ ସେ ବାଲ୍ୟକାଳରୁ ସଫା ଏବଂ ଜୀବନ୍ତ ଦେଖିଥିଲେ, ସମୟ ପରିବର୍ତ୍ତନ ସଙ୍ଗେସଙ୍ଗେ ସେ ନଦୀରେ ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଜମା ହେବାରେ ଲାଗିଛି । ଆବର୍ଜନା ବଢ଼ିଚାଲିଥିଲା । ଶ୍ରୀମାନ ଆକାଶ ସ୍ଥିର କଲେ ଯେ ସେ ଅଭିଯୋଗ କରିବେ ନାହିଁ, ଗୋଟିଏ ନୂତନ ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିବେ । ଅଭିଯୋଗ ନୁହେଁ, ଶୁଭାରମ୍ଭ ଏକ ମନ୍ତ୍ର ହୋଇଗଲା । ସେ ନିଜର ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ସାଥୀରେ ନେଲେ । ଖାଲି ଜାଲ ଥିଲା, ଫାଉଡା ଥିଲା, ଟୋକେଇ ଥିଲା ଆଉ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଶକ୍ତି ଥିଲା କିଛି ପରିବର୍ତ୍ତନର ସଂକଳ୍ପ । ଏ ଯୁବକମାନେ ନଦୀରେ ବୁଡ଼ି ଦଳ ବାହାର କରୁଥିଲେ । ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଆବର୍ଜନା ବାହାରକୁ ଆଣୁଥିଲେ । ଅନେକ ଥର ଦିନକୁ ପ୍ରାୟ ୫୦-୬୦ କିଲୋ ଆବର୍ଜନା ନଦୀରୁ ବାହାର କରାଗଲା । ଧିରେ ଧିରେ ମନୋରମା ନଦୀର ସେହି ଅଂଶ ପୁଣି ସଫା ଦେଖାଯିବାକୁ ଲାଗିଲା । ଏହି କାମ ପ୍ରତି ଆଖପାଖର ଲୋକମାନଙ୍କ ଧ୍ୟାନ ମଧ୍ୟ ଆକର୍ଷିତ ହେଲା । ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ପ୍ରତି ସଚେତନତା ବଢ଼ିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରଣାଦାୟୀ କଥା ଗୋଆରେ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଛି । ଗୋଆର ବାଳକୃଷ୍ଣ ଅଇୟା ଜଣେ ଅବସରପ୍ରାପ୍ତ ଶିକ୍ଷକ । କିନ୍ତୁ ସମାଜ ପାଇଁ କାମ କରିବା ପାଇଁ ଆଜି ବି ତାଙ୍କର ଉତ୍ସାହ ସେହିଭଳି ରହିଛି । ତାଙ୍କୁ ମଡ୍ଡୀ-ତୋଲାପ୍ ଅଞ୍ଚଳର ପାଣିର ସମସ୍ୟା ବହୁତ କଷ୍ଟ ଦେଉଥିଲା । ସେ ମଧ୍ୟ ସମାଧାନ ପାଇଁ କାମ ଆରମ୍ଭ କଲେ । ବାଳକୃଷ୍ଣ ଜୀ ପାଇପଲାଇନ୍ ବିଛାଇବାରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କଲେ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଅନେକ ଘର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପାଣି ପହଂଚିପାରିଲା । ଯେଉଁ ପରିବାରକୁ ପାଣି ପାଇଁ ପ୍ରତିଦିନ ସଂଘର୍ଷ କରିବାକୁ ପଡୁଥିଲା, ସେମାନେ ଏହାଦ୍ୱାରା ବହୁତ ଉପକୃତ ହେଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗତ ମାସରେ ମୋର ଗୋଟିଏ ବହୁତ ଭଲ ଅନୁଭୂତି ହୋଇଥିଲା । ତା’ର ସମ୍ପର୍କ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ସହିତ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିପାଇଁ ଆଜି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସେ ବିଷୟ ଚର୍ଚ୍ଚା କରିବାକୁ ଚାହେଁ । ତାମିଲନାଡୁର ନାଗରକୋଇଲରେ ଜଣେ ଶିକ୍ଷକଙ୍କ ସହିତ ମୋର ସାକ୍ଷାତ ହୋଇଥିଲା । ପ୍ରାୟ ତିନିଦଶକ ପୂର୍ବେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ଭେଟିଥିଲି । ମୁଁ ଗିରିଜା ଅମ୍ମାଙ୍କ କଥା କହିବାକୁ ଯାଉଛି । ଏହି ସାକ୍ଷାତ ସମୟରେ କିଛି ଯୁବଛାତ୍ର ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ସହିତ ଥିଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ପ୍ରାୟ ୧୫ଟି ସ୍କୁଲ ଚଳାଉଛନ୍ତି । ସେଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ ଚେନ୍ନାଇର ଜୟଗୋପାଲ ଗରୋଡିଆ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ବହୁତ ପ୍ରମୁଖ । ତାଙ୍କର ଦେଶଭକ୍ତିର ଭାବନା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତବାସୀ ପାଇଁ ପ୍ରେରଣାଦାୟକ । ସେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଦେଶର ଅନେକ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ କିଛି କରିବାର ସଂକଳ୍ପ ନେଲେ । ସେଥିପାଇଁ ସେ ନିଜ ସମସ୍ତ ସ୍କୁଲର ପିଲାମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା ଦେଲେ । ସେ ପିଲାମାନଙ୍କୁ କହିଲେ ଯେ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସେମାନେ ପ୍ରତିଦିନ ଗୋଟିଏ ଟଙ୍କା ଦିଅନ୍ତୁ । ଅର୍ଥାତ୍ ଗୋଟିଏ ବର୍ଷରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ପିଲା ଦ୍ୱାରା ୩୬୫ ଟଙ୍କା ଜମା ହେଲା । ଏହିଭଳି ଛୋଟ ଛୋଟ ଅଂଶଦାନ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାୟ ୪୦ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ଏକତ୍ର ହେଲା । ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ଏହି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟଙ୍କାର ଚେକ୍ ମୋତେ ଅର୍ପଣ କଲେ । ତାଙ୍କସହିତ କଥାବାର୍ତ୍ତା ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ଅନୁଭବ କଲି ଯେ ମା’ ଭାରତୀଙ୍କ ପାଇଁ ତାଙ୍କର ସମର୍ପଣ ଭାବ କେତେ ଗଭୀର । ଗତବର୍ଷ ହିଁ ଚେନ୍ନାଇର ପ୍ରଥମ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ତା’ର ୫୦ ବର୍ଷ ପୂରଣ କଲା । ଦେଶର ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ସାଂସ୍କୃତିକ ଗୌରବକୁ ଆଗେଇନେବାରେ ଏହି ସ୍କୁଲ ନେଟୱାର୍କର ଭୂମିକା ବହୁତ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ମୁଁ ଏହା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେଉଛି । ଏବଂ ସେହି ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବିଶେଷ ଭାବେ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛି । ଯେଉଁମାନେ ଦେଶର ବୀର ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହିଭଳି ଯୋଗଦାନ ଦେଇଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗାଁରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସହରରେ, କିଛି ନା କିଛି ଏଭଳି ଘଟୁଛି ଯାହା ଆମକୁ ପ୍ରେରଣା ଦିଏ । ଅନେକ ଥର, ଏହି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକର ବିଶେଷ ଚର୍ଚ୍ଚା ହୁଏନାହିଁ । କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଜାଣନ୍ତି ସେତେବେଳେ ଆମର ଏହି ବିଶ୍ୱାସ ଆହୁରି ଦୃଢ଼ ଏବଂ ମଜଭୁତ ହୁଏ ଯେ ଆମର ଦେଶ ଲୋକମାନଙ୍କ ଶକ୍ତିରେ ଆଗକୁ ଚାଲିଛି । ମୋର ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ ନିଜ ଆଖପାଖର ଏହିଭଳି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକୁ ଦେଖନ୍ତୁ । ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ସମାଜ ପାଇଁ ଭଲ କାମ କରୁଛନ୍ତି ତାଙ୍କୁ ଚିହ୍ନନ୍ତୁ, ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତୁ, ତାଙ୍କଠାରୁ ଶିଖନ୍ତୁ ଏବଂ ହେଇପାରେ ତ ନିଜେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଏକ ଭଲ କାମରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ । ଆସନ୍ତା ମାସ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହିଭଳି ଆଉକିଛି ପ୍ରେରକ କଥା ସହିତ ପୁଣି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସାକ୍ଷାତ ହେବ । ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ । ନମସ୍କାର ।