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उपस्थित सभी महानुभाव,

हमारे देश में एक अनुभव ये आता है कि बहुत सी चीजें Perception के आसपास मंडराती रहती है। और जब बारीकी से उसकी और देखें तो चित्र कुछ और ही नजर आता है। जैसे एक सामान्य व्यक्ति को पूछो तो उसको लगेगा कि “भई, ये जो बड़े-बड़े उद्योग हैं, बड़े-बड़े उद्योग घराने हैं, उससे रोजगार ज्यादा मिलता है।“ लेकिन अगर बारीकी से देखें तो चित्र कुछ और होता है, इसमें इतनी ज्यादा पूंजी लगी है। इतने सारे ताम-झांम, हवाबाजी, ये सब हम देखते आए हैं।

लेकिन अगर बारीकी से देखें तो ultimately हम विकास में हैं। रोजगार हमारी प्राथमिकता है और भारत जैसा देश जिसके पास Demographic dividend हो, जहां पर 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 से कम आयु की हो, उस देश ने अपने विकास की जो भी नीतियां बनानी हो, उसके केंद्र में ये युवा शक्ति होना चाहिए। अगर वो बराबर match कर लिया, तो हम नई ऊंचाईयों को पार कर सकते हैं। ये जितने बड़-बड़े उद्योगों की हम चर्चा सुनते आए हैं, उसमें सिर्फ एक करोड़ 25 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। सवा सौ करोड़ देश में सवा करोड़ लोगों को रोजगार, ये जो बहुत बड़े-बड़े लोग जिसके लिए दुनिया में चर्चा रहती है, आधा अखबार जिनसे भरा पडा रहता है, वो देते हैं।

लेकिन इस देश में छोटा-छोटा काम करने वाला व्यक्ति करीब 5 करोड़ 70 लाख लोग, 12 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं। उन सवा करोड़ को रोजगार देने के लिए बहुत सारी व्यवस्थाएं सक्रिय है। लेकिन 12 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले लोगों के लिेए थोड़ी सी हम मदद करें, तो कितना बड़ा फर्क आ सकता है इसका हम अंदाज कर सकते हैं। और इस 5 करोड़ 75 लाख इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग हैं, जो स्वरोजगार एक प्रकार से हैं - दर्जी होंगे, कुम्हार होंगे, टायर का पंक्चर करने वाले लोग हैं, साइकिल की repairing करने वाले लोग हैं, अपनी एक ऑटो रिक्शा लेकर के काम करने वाले लोग हैं, सब्जी बेचने वाले, गरीब-गरीब लोग हैं। उनका पूरा जो कारोबार है, उसमें ज्यादा से ज्यादा हिसाब लगाएं जाएं, तो 11 लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा उसमें पूंजी नहीं लगी है। यानी सिर्फ 11 लाख करोड़ रुपयों की पूंजी लगी है, 5 करोड़ 75 लाख उसका नेतृत्व कर रहे हैं, और 12 करोड़ लोगों का पेट भरते हैं।

ये बातें जब सामने आईं तो लगा कि देश में स्वरोजगारी के अवसर बढ़ाने चाहिए। देश की Economy को ताकत देने वाला जो नीचे पायरी पर जो लोग हैं, उनकी शक्ति को समझना चाहिए। और उनके लिए अवसर उपलब्ध कराने चाहिए और इस मूल चिंतन में से ये मुद्रा की कल्पना आई है। मेरा अपना एक अनुभव इसमें काम कर रहा था, क्योंकि सिर्फ आर्थिक जगत के लोगों के आंकड़ों के आधार पर निर्णय करना, इतना सरल नहीं होता है। लेकिन कभी-कभी अनुभव बहुत काम आता है।

मैं गुजरात में मुख्यमंत्री रहा तो मैंने पतंग उद्योग की तरफ थोड़ा ध्यान दिया। अब गुजरात में पतंग एक बड़ा त्‍योहार के रूप में मनाया जाता है, और ज्‍यादातर, अब वो पूरा Environment Friendly Industry है, Cottage Industry है। और लाखों की तादाद में गरीब मुसलमान उस काम में लगा हुआ है 90 प्रतिशत से ज्‍यादा पतंग बनाने व कबाड़ का काम गुजरात में मुसलमान कर रहा है, लेकिन वो वही पुरानी चीजें करता था। वो पतंग अगर उसको तय तीन कलर का बनाना है तो तीन कलर के कागज लाता था पेस्टिंग करता था और फिर पतंग बनाता था। अब दुनिया बदल चुकी है तीन कलर का कागज प्रिंट हो सकता है, टाइम बच सकता है। तो मैंने चेन्‍नई की एक Institute को काम दिया कि जरा सर्वे किजिए कि इनकी मुसीबत क्‍या है, कठिनाईयां क्‍या है, अनुभव ये आया कि छोटे-छोटे लोगों को थोड़ी मदद दी जाए थोड़ा Skill Development हो जाए, थोड़ी पैकेजिंग सिखा दिया जाए, आप उसमें कितना बड़ा बदलाव ला सकते है। मुझे आज कहने से आनंद होता है कि जो करीब 35 करोड़ का पतंग का बिजनेस था थोड़ी मदद की वो पतंग का उद्योग 500 करोड़ cross कर गया था।

फिर मेरी उसमें जरा रूचि बढ़ने लगी तो मैं कई चीजे नई-नई करने लगा। बांस, बांस वो लाते थे असम से। कारण क्‍या तो पतंग में जिस बांस के पट्टे की जरूरत होती है वो साइज का बांस गुजरात में होता नहीं था तो मैंने ये जेनेटिक इंजीनियरिंग वालों को पकड़ा। मैंने कहा बांस हमारे यहां ऐसा क्‍यों न हो दो गांठ के बीच अंतर ज्‍यादा हो ताकि वो हमारा ही लोकल बांस का product उसको काम आ जाए। बांस वो बाहर से लाता है तो उसको फाइनेंस की व्‍यवस्‍था हो फिर मैंने एडवरटाइजमेंट कम्‍पनी को बुलाया। मैंने कहा जरा पतंग वालों के साथ बैठो पतंग के ऊपर कोई एडवरटाइजमेंट का काम हो सकता है क्‍या उनकी कमाई बढ़ सकती है।

छोटी-छोटी चीजों को मैंने इतना ध्‍यान दिया था और मुझे उतना आनंद आया था उस काम में - I’m Talking about 2003-04 - कहने का मेरा तात्‍पर्य यह था कि जो बिल्‍कुल उपेक्षित सा काम था उसमें थोड़ा ध्‍यान दिया गया, फाइनेंस की व्‍यवस्‍था की गई, उसने तेज गति से आगे बढ़ाया। ये ताकत सब दूर है। आप देखिए हर गांव में दो-चार मुसलमान बच्‍चे ऐसे होंगे, इतनें Innovative होते है technology में ईश्‍वरदत्‍त उनको कृपा है। वो तुरंत चीजों को पकड़ लेते है। आप एक ताला उसको रिपेयर करने को दीजिए वो दूसरे दिन वो ताला वैसा बना के दे देगा। जिनके हाथों में ये परम्‍परागत कौशल है। ऐसे लोगों को अगर हम मदद करें और वो कुछ गिरवी रखें तब मिले तो उसके पास तो गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं है - सिवाय कि उसका ईमान। उसकी सबसे बड़ी पूंजी है उसका ईमान। ये गरीब इंसान की जो पूंजी है, ईमान। उस पूंजी के साथ मुद्रा अपनी पूंजी जोड़ना चाहता है, ताकि वो सफलता की कुंजी बन जाए और उस दिशा में हम काम करना चाहते है।

कुम्‍हार है, अब बिजली गांव में पहुंच गई है। वो भी चाहता है कि मैं मटकी बनाता हूं और चीजें बनाता हूं। लेकिन अगर Electric motor लग जाए तो मेरा काम तेज हो जाएगा। लेकिन Electric motor खरीदने के लिए पैसा नहीं है। बैंक के लिए उनके पास इतना समय भी नहीं है और उतना नेटवर्क भी नहीं है। लेकिन मैं आज, यहां बैंक के बड़े-बड़े लोग बैठे है। मेरे शब्‍द लिख करके रखिए। एक साल के बाद बैंक वाले Queue लगाएगें मुद्रा वालों के यहां और कहेंगे भई 50 लाख हमको client दे दीजिए।

क्‍योंकि अब देखिए प्रधानमंत्री जन-धन योजना में हिन्‍दुस्‍तान की बैंक सेक्‍टर ने जो काम किया है, मैं जितना अभिनंदन करूं उतना कम है जी, जितना अभिनंदन करूं उतना कम है। कोई सोच नहीं सकता था, क्‍योंकि बैंक के संबंध में एक सोच बनी हुई थी कि बैंक यानी इस दायरे से नीचे नहीं जा सकते। तो बैंक के लोगों ने गर्मी के दिनों में गांव-गांव घर-घर जा करके गरीब की झोपड़ी में जा करके उसको देश की फाइनेंस की Main Stream में लाने का प्रयास किया और इस देश के 14 करोड़ लोगों को, 14 करोड़ लोगों को बैंक खाते से जोड़ दिया। तो ये ताकत हमने अनुभव की है तो उसका ये अलग एक नया step है।

आज वैसे एक ओर भी अवसर है SIDBI का रजत जयंती वर्ष है SIDBI 25 साल की उम्र हो गई और मूलतः SIDBI का कारोबार इसी काम से शुरू हुआ था, छोटे-छोटे लोगों को... लेकिन जितनी तेजी से क्योंकि भारत देश rhythmic way में progress करे तो अपेक्षाएं पूरी नहीं होंगी। हमने उस rhythm को बदलकर के jump लगाने की जरूरत है। हमने दायरा बढ़ाने की जरूरत है। हमने अधिक लोगों को इसके अंदर जोड़ने की आवश्यकता है और सामान्य मानवी का अपना अनुभव है।

आप देखिए हिंदुस्तान में जहां भी women self help group चलते हैं, पैसों के विषय में शायद ऐसी ईमानदारी कहीं देखने को मिलेगी नहीं। उनको अगर 5 तारीख को पैसा जमा करवाना है तो 1 तारीख को जाकर के जमा करवाकर आ जाती हैं। बचत हमारे यहां स्वभाव है, उसको और जरा ताकत देने की आश्यकता है। हमारी परंपरागत वो शक्ति है।

मुद्रा बैंक के माध्यम से व्यवसाय के क्षेत्र में, स्वरोजगार के क्षेत्र में, उद्योग के क्षेत्र में जो निचले तबके पर आर्थिक व्यवस्था में रहे हुए लोग हैं, वे हमारा सबसे बड़ा client, हमारा सबसे बड़ा target group है। हम उसी पर focus करना चाहते हैं। इन 5 करोड़ 75 लाख जो छोटे व्यापारी हैं... और उनका average कर्ज कितना है? पूरे हिंदुस्तान में 11 लाख करोड़ की उनके पास पूंजी है total पूरे देश में कोई ज्यादा amount नहीं है वो और average कर्ज निकाला जाए तो एक यूनिट का average कर्ज 17 thousand है सिर्फ। 17 thousand हैं, यानि कुछ नहीं है। अगर उसको एक लाख के कर्ज की ताकत दे दी जाए। उसको इतना अगर जोड़ दिया जाए और ये 11 लाख करोड़ है वो एक करोड़ तक अगर पहुंच जाए। हम कल्पना कर सकते हैं देश की economy को GDP को, नीचे से ताकत देने का इतना बड़ा force जो कि कभी untapped था।

और इसलिए जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना लेकर के आए थे तब हमने कहा था, जहां बैंक नहीं उसको बैंक से जोड़ेंगे। आज जब हम मुद्रा लेकर के आए हैं, तो हमारा मंत्र है जिसको funding नहीं हो रहा है, जो un-funded है, उसको funding करने का हम बीड़ा उठाते हैं।

ये एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें शुरू के समय में सामान्य व्यक्ति जाएगा ये संभव नहीं है क्योंकि बेचारों को अनुभव बहुत खराब है। वो कहता है भई मुझे तो साहूकार से ही पैसा लेना पड़ता है। 24 percent, 30 percent interest देना पड़ता है, वो ही मुझे आदत हो गई है। वो विश्वास नहीं करेगा कि उसको इस प्रकार से ऋण मिल सकता है। हम ये एक नया विश्वास पैदा करना चाहते हैं कि आप देश के लिए काम कर रहे हो, देश के विकास के भागीदार हो, देश आपके लिए चिंता करने के लिए तैयार है। ये message मुझे देना है।

और ये मुद्रा के concept के द्वारा, उसी दिशा में हम आगे बढ़ना चाहते हैं। हमारे देश में agriculture sector में value addition - इतनी बड़ी संभावनाएं हैं। अगर उसकी एक विधा को develop कर दिया जाए तो हमारे किसान को कभी संकटों से गुजरना नहीं पड़ेगा। और ये छोटे-छोटे entrepreneur के माध्यम से ये पूरा network खड़ा किया जा सकता है जो सामान्य किसान, जो सामान्य पैदावार करता है, उसमें value addition का काम करे। और स्थानीय स्तर पर करे। कोई बहुत बड़ी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है। अपने आप उसका काम आगे बढ़ जाएगा।

और हम देखते हैं आम उसको बेचना है, तो बेचारे को बड़ा कम पैसा मिलता है लेकिन एक अगर एक छोटा सा unit भी हो, आम में से अचार बना दे तो ज्यादा पैसा मिलता है और अचार को भी अच्छा बढ़िया bottle में packing करे और ज्यादा पैसा मिलता है और कोई नटी bottle लेकर खड़ी हो जाए तो और ज्यादा पैसा मिलता है advertising होता है तो।

यानि वक्त बदल चुका है, branding, advertising इन सारी चीजों की जरूरत पड़ गई है। हम ऐसे छोटे-छोटे लोगों को ताकत देना चाहते हैं। और उनको अगर ताकत मिलती है तो देश की economy की नीचे की धरातल, जितनी ज्यादा मजबूत होगी, उतनी देश की economy को लाभ होने वाला है। और जब मैंने ये आकड़े बताए तो आप भी चौंक गए होगे कि इतना बड़ा तामझाम सवा करोड़ लोग रोजगार पाते है। और जिसकी ओर कोई देखता नहीं है, वो 12 करोड़ लोगों के पेट भरता है। कितना बड़ा अंतर है। ये जो 12 करोड़ लोग है 25 करोड़ को रोजगार देने की ताकत देते है। वो Potential पड़ा है। और ज्‍यादा कोई शासकीय व्‍यवस्‍था में बड़े बदलाव की भी जरूरत नहीं है। थोड़ी संवदेनशीलता चाहिए, थोड़ी समझ चाहिए और थोड़ा Pro-Active role चाहिए।

मुद्रा एक ऐसा platform खड़ा किया गया है, जिस platform के साथ इसको... आज छोटी-मोटी finance की व्‍यवस्‍थाएं चल पड़ी है। दुनिया में कई जगह पर प्रयोग हुए है Micro finance के। लिए मैं चाहूंगा कि हम पूरे विश्‍व में Micro finance के जो Successful Model है हम भी उसका अध्‍ययन करें। उसकी जो अच्‍छाइयां है जो हमारे लिए suitable है, हम उसको adopt करें। और हिन्‍दुस्‍तान इतना बड़ा देश है कि जो चीज नागालैंड में चलती है वो महाराष्‍ट्र में चलेगी जरूरी नहीं है। विविधता चाहिए। और विविधताओं के अनुसार स्‍थानीय आवश्‍यकताओं के अनुसार अपने मॉडल बनाएं उसकी requirement करें। वरना हम दिल्‍ली में बैठ करके tailor के लिए ये और फिर कहेंगे कि तुमको ये मिलेगा तो मेल नहीं बैठेगा। वो वहां है उसी को पूछना पड़ेगा कि भई बताओं तुम्‍हारे लिए क्‍या जरूरत है? ये अगर हमने कर दिया तो हम बहुत बड़ी मात्रा में समाज के इस नीचे के तबके को मदद कर सकते है।

जिस प्रकार से सामान्‍य व्‍यक्ति की चिंता करना ये हमारा प्रयास है... और आपने इस सरकार के एक-एक कदम देखें होंगे, गतिशीलता तो आप देखते ही होंगे। वरना सामान्‍यत: देश में योजनाओं की घोषणा को ही काम माना जाता था और आप रोज नई योजना की घोषणा करो तो अखबार के आधार पर देश को समझने वाले जो लोग है वो तो यही मानते है कि वाह देश बहुत आगे बढ़ गया। और दो-चार साल के बाद देखते है कि वही कि वही रह गए। हमारी कोशिश है योजनाओं को धरती पर उतारना।

प्रधानमंत्री जन-धन योजना ये सीधा-सीधा दिखता है। पहल योजना - दुनिया में सबसे बड़ा Cash Transfer का काम। गैस सब्सिडी में। 13 करोड़ लोगों के गैस सब्सिडी सिलेंडर, सब्सिडी सीधी उसके बैंक खाते में चली गई। यानी अगर एक बार निर्णय करें कि इस काम पूरा करना है और हर काम को आप देखिए... जब हमने 15 अगस्‍त को प्रधानमंत्री जन-धन योजना की बात कही करीब-करीब सवा सौ दिन के अंदर उस काम को पूरा कर दिया।

जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना के बाद हम आगे बढ़े सौ दिन के भीतर-भीतर हमने पहल का काम पूरा कर दिया।

और आज जब बजट के अंदर घोषणा हुई, 50 दिन भी नहीं हुए, वो आज योजना आपके सामने रख दी। और ये Functional होगी और उसका परिणाम मैं कहता हूं एक साल मैं ज्‍यादा समय नहीं कहता। एक साल के भीतर-भीतर हमारी जो Established Banking System है, वो मुद्रा के मॉडल की ओर जाएगी मैं दावे से कहता हूं क्‍योंकि इसकी ताकत इसकी ताकत पहचान में आने वाली है। वे अपना एक लचीली बैंकिंग व्‍यवस्‍था खड़ी करेंगे, एक बहुत बड़ी ऑफिस चाहिए, कोई एयरकंडीशन चाहिए कोई जरूरत नहीं है। ऐसे Bare footed बैंकरर्स तैयार हो सकते है जो मुद्रा के मॉडल पर बड़ी-बड़ी बैंकों का काम भी कर सकते है।

आने वाले दिनों में कम से कम धन लगा करके भी ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को रोजगार देने का काम इसके साथ सरलता से हो सकता है और ये लोग जो संकट से गुजरते है, ब्‍याज के चक्‍कर में गरीब आदमी मर जाता है। उसको बचाना है और उसकी जो ताकत है उसके लिए अवसर देना है उस अवसर की दिशा में काम कर रहे है, जिस प्रकार से देश में ये जो वर्ग है उसकी जितनी चिंता करते है, उतनी ही देश के किसान की चिंता करना उतना ही जरूरी है।

किसी न किसी कारण से देश का किसान प्राकृतिक संकटों से जूझ रहा है। गत वर्ष, वर्षा कम हुई। वर्षा कम होने के कारण वैसे ही किसान मुसीबत से गुजारा कर रहा था और इस बार जितनी मात्रा में बेमौसमी वर्षा और ओले गिरना। इतनी तबाही हुई है किसान की। हमने मंत्रियों को भेजा था। खेतों में जा करके किसानों से बात करके परिस्थिति का जायजा लिया। कल इन सारे मंत्रियों से मैंने डिटेल में रिपोर्ट ली थी। इन किसानों को हम क्या मदद कर सकते हैं। और मैंने पहले दिन कहा था कि किसान को इस मुसीबत से बचाना, उसका साथ देना, उसको संकटों से बाहर लाना। ये सरकार की, समाज की, हम सबकी जिम्मेवारी है और किसान की चिंता करना ये आवश्यक है।

Natural calamity पहले भी आई है। लेकिन सरकार के जो parameter रहे हैं, उन parameters में आज के संकट में किसान को ज्यादा मदद नहीं मिल सकती है। और इसलिए ये संकट की व्यापकता इतनी है और उस समय है जबकि उसको फसल लेकर के बाजार में जाना था। एक प्रकार से उसके नोटों का बंडल ही जल गया, इस प्रकार से हम कह सकते हैं। इतना बड़ा उसका, उसका पूरा पसीना बहाया हुआ उसका, ये हालत हुई है। और इसलिए हमने insurance company को भी आदेश किया है कि बहुत ही proactive होकर के उनकी मदद की जाए। बैंकों को हमने आदेश किया है कि बैंक उनके जो कर्ज हैं, उनके संबंध में किस प्रकार से restructure करे ताकि उनको इस संकट से बाहर लाया जाए।

सरकार की तरफ से भी एक बहुत बड़ा अहम निर्णय हम करने जा रहे हैं। अब तक खेत में 50 प्रतिशत से ज्यादा अगर नुकसान हुआ हो, तभी वो उस मदद पाने की list में आता है। 50 प्रतिशत से ज्यादा अगर नुकसान हुआ होगा तभी आपको मदद मिल सकती है। अगर 50 प्रतिशत से कम हुआ है तो मदद नहीं मिल सकती है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी ये एक सुझाव था कि साहब ये norms बदलना चाहिए। हमारे मंत्री अभी जाकर के आए, उन्होंने प्रत्यक्ष देखा, और ये सब देखने के बाद एक बहुत बड़ा हमने एक महत्वपूर्ण निर्णय किया है कि अब किसान के वो जो 50 प्रतिशत के नुकसान वाला दायरा था उसको बदलकर के 33 percent भी अगर नुकसान हुआ है तो भी वो किसान हकदार बनेगा।

उसके कारण मुझे मालूम है बहुत बड़ा बोझ आने वाला है, बहुत बड़ा बोझ आने वाला है लेकिन किसान को 50 प्रतिशत वाले हिसाब में रखने से उसको ज्यादा लाभ नहीं मिलेगा। 33 percent जो कि कईयों की मांग थी, उसको हमने स्वीकार किया है।

दूसरा विषय है उसको जो मुआवजा दिया जाता है। देश में आजादी के बाद सबसे बड़ा निर्णय पहली बार हुआ है 50 प्रतिशत को 33 प्रतिशत लाना। और दूसरा महत्वपूर्ण आजादी के बाद इतना बड़ा jump नहीं लगाया है, किसानों को मदद करने में हम इतना बड़ा jump इस बार लगा रहे हैं। और आज उसको जो मदद करने के सारे parameters हैं, उसको अब डेढ़ गुना कर दिया जाएगा। अगर उसको नुकसान में पहले 100 रुपया मिलता था, 150 मिलेगा, लाख मिलता था तो डेढ़ लाख मिलेगा, उसकी मदद डेढ़ गुना कर दी जाएगी।

कभी हमारे यहां incremental होता था 5 percent, 2 percent, 50 प्रतिशत वृद्धि। और ये किसान को तत्काल मदद मिले। राज्यों ने सर्वे का काम किया है। भारत सरकार और राज्य सरकार मिलकर के उसको आगे बढ़ाएगी लेकिन मैं चाहता हूं हमारे देश के किसानों को जितनी मदद हो सके, उतनी मदद करने के लिए ये सरकार संकल्पबद्ध है। क्योंकि आर्थिक विकास की यात्रा में किसान का भी बहुत बड़ा योगदान है और हमारी जीवन नैया चलाने में भी किसान का बहुत बड़ा योगदान है। बैंक हो, insurance company हो, भारत सरकार हो, राज्य सरकार हो, हम सब मिलकर के किसान को इस संकट की घड़ी से हम बाहर लाएंगे। ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।

फिर एक बार मैं SIDBI की इस रजत जयंती वर्ष के प्रारंभ पर उनको मैं बहुत-बहुत शुभकामना देता हूं और SIDBI आने वाले दिनों में नए लक्ष्य को लेकर के और नई ऊंचाइयों को पार करने में सफल होगा, ऐसी मेरी शुभकामनाएं हैं।

और मुद्रा platform प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आने वाले दिनों में देश की आर्थिक, जो पक्की धरोहर है उसको जानदार बनाना, शानदार बनाने के काम में मुद्रा बहुत बड़ा role play करेगी। और ये पूंजी उसकी सफलत की कुंजी बने, ये मंत्र को हम चरितार्थ करेंगे। इसी एक शुभ आशय के साथ आज इस महत्वपूर्ण योजना को प्रारंभ करते हुए मुझे खुशी हो रही है, मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद।

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The source of our faith, inspiration and energy is our Constitution: PM Modi
November 26, 2021
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“We all may have different roles, different responsibilities, different ways of working, but the source of our faith, inspiration and energy is the same - our Constitution”
“Sabka Saath-Sabka Vikas, Sabka Vishwas-Sabka Prayas, is the most powerful manifestation of the spirit of the Constitution. Government dedicated to the Constitution, does not discriminate in development”
“India is the only country on course to achieve the goals of the Paris Agreement ahead of time. And yet, in the name of environment, various pressures are created on India. All this is the result of a colonial mentality”
“On the strong foundation of separation of power, we have to pave the path of collective responsibility, create a roadmap, determine goals and take the country to its destination”

नमस्कार !

चीफ जस्टिस एन.वी. रमन्ना जी, जस्टिस यू.यू. ललित जी, कानून मंत्री श्री किरण रिजिजू जी, जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड़ जी, अटॉर्नी जनरल श्री के.के. वेणुगोपाल जी, सुप्रीम कोर्ट बार असोशिएशन के अध्यक्ष श्री विकास सिंह जी, और देश की न्याय व्यवस्था से जुड़े देवियों और सज्जनों!

आज सुबह मैं विधायिका और कार्यपालिका के साथियों के साथ था। और अब न्यायपालिका से जुड़े आप सभी विद्वानों के बीच हूं। हम सभी की अलग-अलग भूमिकाएं, अलग-अलग जिम्मेदारियां, और काम करने के तरीके भी अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी आस्था, प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत एक ही है - हमारा संविधान! मुझे खुशी है कि आज हमारी ये सामूहिक भावना संविधान दिवस पर इस आयोजन के रूप में व्यक्त हो रही है, हमारे संवैधानिक संकल्पों को मजबूत कर रही है। इस कार्य से जुड़े सभी लोग, अभिनंदन के अधिकारी है।

माननीय,

आजादी के लिए जीने-मरने वाले लोगों ने जो सपने देखे थे, उन सपनों के प्रकाश में, और हजारों साल की भारत की महान परंपरा को संजोए हुए, हमारे संविधान निर्माताओं ने हमें संविधान दिया। सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने, भारत को अनेक मुसीबतों में झोंक दिया था। किसी युग में सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत, गरीबी-भुखमरी और बीमारी से जूझ रहा था। इस पृष्ठभूमि में, देश को आगे बढ़ाने में संविधान हमेशा हमारी मदद करता रहा है। लेकिन आज दुनिया के अन्य देशों की तुलना में देखें, तो जो देश भारत के करीब-करीब साथ ही आजाद हुए, वो आज हमसे काफी आगे हैं। यानि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, हमें मिलकर लक्ष्य तक पहुंचना है। हम सभी जानते हैं, हमारे संविधान में Inclusion पर कितना जोर दिया गया है। लेकिन ये भी सच्चाई रही है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी बड़ी संख्या में देश के लोग exclusion को भोगने के लिए मजबूर रहे हैं। वो करोड़ों लोग, जिनके घरों में शौचालय तक नहीं था, वो करोड़ों लोग जो बिजली के अभाव में अंधेरे में अपनी जिंदगी बिता रहे थे, वो करोड़ों लोग जिनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष, घर के लिए थोड़ा सा पानी जुटाना था, उनकी तकलीफ, उनका दर्द समझकर, उनका जीवन आसान बनाने के लिए खुद को खपा देना, मैं संविधान का असली सम्मान मानता हूं। और इसलिए, आज मुझे संतोष है कि देश में, संविधान की इसी मूल भावना के अनुरूप, exclusion को inclusion में बदलने का भागीरथ अभियान तेजी से चल रहा है। और इसका जो सबसे बड़ा लाभ क्या हुआ है, ये भी हमें समझना होगा। जिन 2 करोड़ से अधिक गरीबों को आज अपना पक्का घर मिला है, जिन 8 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को उज्जवला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन मिला है, जिन 50 करोड़ से अधिक गरीबों को बड़े से बड़े अस्पताल में 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज सुनिश्चित हुआ है, जिन करोड़ों गरीबों को पहली बार बीमा और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं मिली हैं, उन गरीबों के जीवन की बहुत बड़ी चिंता कम हुई है, ये योजनाएं उनके लिए बड़ा संबल बनी हैं।

इसी कोरोना काल में पिछले कई महीनों से 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त अनाज सुनिश्चित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना पर सरकार 2 लाख 60 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके गरीबों को मुफ्त अनाज दे रही है। अभी कल ही हमने इस योजना को अगले वर्ष मार्च तक के लिए बढ़ा दिया है। हमारे जो Directive Principles कहते हैं - “Citizens, men and women equally, have the right to an adequate means of livelihood” वो इसी भावना का ही तो प्रतिबिंब हैं। आप सभी ये मानेंगे कि जब देश का सामान्य मानवी, देश का गरीब, विकास की मुख्यधारा से जुड़ता है, जब उसे equality और equal opportunity मिलती है, तो उसकी दुनिया पुरी तरह बदल जाती है। जब रेहड़ी, ठेले, पटरी वाला भी बैंक क्रेडिट की व्यवस्था से जुड़ता है, तो उसको राष्ट्र निर्माण में भागीदारी का ऐहसास होता है। जब दिव्यांगों को ध्यान में रखते हुए पब्लिक प्लेसेस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और दूसरी सुविधाओं का निर्माण होता है, जब उन्हें आजादी के 70 साल बाद पहली बार कॉमन साइन लैंग्वेज मिलती है, तो उनमें आत्मविश्वास जागता है। जब ट्रांसजेंडर्स को कानूनी संरक्षण मिलता है, ट्रांसजेंडर को पद्म पुरस्कार मिलते हैं, उनकी भी समाज पर, संविधान पर आस्था और मज़बूत होती है। जब तीन तलाक जैसी कुरीति के विरुद्ध कड़ा कानून बनता है, तो उन बहनों-बेटियों का संविधान पर भरोसा और सशक्त होता है, जो हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थीं।

महानुभाव,

सबका साथ-सबका विकास, सबका विश्वास-सबका प्रयास, ये संविधान की भावना का सबसे सशक्त प्रकटीकरण है। संविधान के लिए समर्पित सरकार, विकास में भेद नहीं करती और ये हमने करके दिखाया है। आज गरीब से गरीब को भी क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर तक वही एक्सेस मिल रहा है, जो कभी साधन संपन्न लोगों तक सीमित था। आज लद्दाख, अंडमान और निकोबार, नॉर्थ ईस्ट के विकास पर भी देश का उतना ही फोकस है, जितना दिल्ली और मुंबई जैसे मेट्रो शहरों पर है। लेकिन इन सबके बीच, मैं एक और बात की तरफ आपका ध्यान दिलाउंगा। आपने भी ज़रूर अनुभव किया होगा कि जब सरकार किसी एक वर्ग के लिए, किसी एक छोटे से टुकड़े के लिए कुछ करती है, तो बड़ी उदारवादी कहलाती है, उसकी बड़ी प्रशंसा होती है। कि देखो उनके लिए कुछ किया लेकिन मैं हैरान हूँ कभी कभी हम देखते हैं कोई सरकार एक राज्य के लिए कुछ करे, राज्य का भला हो, तो बड़ी वाहवाही करते हैं। लेकिन जब सरकार सबके लिए करती, हर नागरिक के लिए करती है, हर राज्य के लिए करती है, तो इसे उतना महत्व नहीं दिया जाता, उसका जिक्र तक नहीं होता। सरकार की योजनाओं से कैसे हर वर्ग का, हर राज्य का समान रूप से भला हो रहा है, इस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। पिछले सात वर्षों में हमने बिना भेदभाव के, बिना पक्षपात के, विकास को हर व्यक्ति, हर वर्ग, और देश के हर कोने तक पहुंचाने का प्रयास किया है। इस साल 15 अगस्त को मैंने गरीब कल्याण से जुड़ी योजनाओं के सैचुरेशन की बात कही और इसके लिए हम मिशन मोड पर जुटे भी हैं।

सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, इस मंत्र को लेकर के कार्य करने का हमारा प्रयास है I आज इससे देश की तस्वीर कैसे बदली है ये हमें हाल के National Family Health Survey report में भी दिखाई देता है। इस रिपोर्ट के बहुत से तथ्य, इस बात को सिद्ध करते हैं कि जब नेक नीयत के साथ काम किया जाए, सही दिशा में आगे बढ़ा जाए, और सारी शक्ति जुटाकर लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया जाए तो, सुखद परिणाम अवश्य आते हैं। Gender Equality की बात करें तो अब पुरुषों की तुलना में बेटियों की संख्या बढ़ रही है। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में डिलिवरी के ज्यादा अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। इस वजह से माता मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर कम हो रही है। और भी बहुत सारे इंडिकेटर्स ऐसे हैं जिस पर हम एक देश के रूप बहुत अच्छा कर रहे है। इन सभी इंडिकेटर्स में हर परसेंटेज पॉइंट की बढ़ोतरी सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है। ये करोड़ों भारतीयों को मिल रहे उनके हक का प्रमाण है। ये बहुत आवश्यक है कि, जन कल्याण से जुड़ी योजनाओं का पूरा लाभ लोगों को मिले, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाएं समय पर पूरी हों। किसी भी कारण से हुई अनावश्यक देरी, नागरिक को उसके हक से वंचित रखती है। मैं गुजरात का रहने वाला हूँ तो मैं सरदार सरोवर डैम का उदाहरण देना चाहता हूं। सरदार पटेल ने मां नर्मदा पर इस तरह के डैम का सपना देखा था। पंडित नेहरू ने इसका शिलान्यास किया था। लेकिन ये परियोजना दशकों तक अपप्रचार में फंसी रही। पर्यावरण के नाम पर चले आंदोलन में फंसी रही। न्यायालय तक इसमें निर्णय लेने में हिचकिचाते रहे। वर्ल्ड बैंक ने भी इसके लिए पैसे देने से मना कर दिया था। लेकिन उसी नर्मदा के पानी से कच्छ में जो विकास हुआ, विकास का कार्य हुआ, आज हिन्‍दुस्‍तान के तेज गति से आगे बढ़ रहे district में कच्‍छ जिला है। कच्‍छ तो एक प्रकार से रेगिस्‍तान जैसा इलाका है, तेज गति से विकसित होने वाले क्षेत्र में उसकी जगह बन गयी। कभी रेगिस्तान के रूप में जाने वाला कच्छ, पलायन के लिए पहचाना जाने वाला कच्छ, आज एग्रो-एक्सपोर्ट की वजह से अपनी पहचान बना रहा है। इससे बड़ा ग्रीन अवार्ड और क्या हो सकता है?

माननीय,

भारत के लिए, और विश्व के अनेक देशों के लिए, हमारी अनेक पीढ़ियों के लिए, उपनिवेशवाद की बेड़ियों में जकड़े हुए जीना एक मजबूरी थी। भारत की आज़ादी के समय से, पूरे विश्व में एक post-Colonial कालखंड की शुरुआत हुई, अनेकों देश आज़ाद हुए। आज पूरे विश्व में कोई भी देश ऐसा नहीं है जो प्रकट रूप से किसी अन्य देश के उपनिवेश के रूप में exist करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उपनिवेशवादी मानसिकता, Colonial Mindset  समाप्त हो गया  है। हम देख रहे हैं कि यह मानसिकता अनेक विकृतियों को जन्म दे रही है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हमें विकासशील देशों की विकास यात्राओं में आ रही बाधाओं में दिखाई देता है। जिन साधनों से, जिन मार्गों पर चलते हुए, विकसित विश्व आज के मुकाम पर पहुंचा है, आज वही साधन, वही मार्ग, विकासशील देशों के लिए बंद करने के प्रयास किए जाते हैं। पिछले दशकों में इसके लिए अलग-अलग प्रकार की शब्दावली का जाल रचाया जाता है। लेकिन उद्देश्य एक ही रहा है - विकासशील देशों की प्रगति को रोकना। आजकल हम देखते हैं, कि पर्यावरण के विषय को भी इसी काम के लिए हाईजैक करने के प्रयास हो रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले हमने COP-26 समिट में इसका जीवंत उदाहरण देखा है। अगर absolute cumulative emissions की बात करें, तो, विकसित देशों ने मिलकर 1850 से अब तक, भारत से 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अगर हम per capita basis की बात करें तो भी विकसित देशों ने भारत के मुकाबले 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मिलकर भारत की तुलना में 11 गुना अधिक absolute cumulative emission किया है। इसमें भी per capita basis को आधार बनाएं तो अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भारत की तुलना में 20 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। फिर भी आज, आज हमें गर्व है भारत जिसकी सभ्यता और संस्कृति में ही प्रकृति के साथ जीने की प्रवृति है, जहाँ पत्थरों में, पेड़ों में, और प्रकृति के कण-कण में, जहां पत्‍थर में भगवान देखा जाता है, उसका स्वरुप देखा जाता है, जहाँ धरती को माँ के रूप में पूजा जाता है, उस भारत को पर्यावरण संरक्षण के उपदेश सुनाए जाते हैं। और हमारे लिए ये मूल्य सिर्फ़ किताबी नहीं हैं, किताबी बातें नहीं हैं। आज भारत में Lion), Tiger, Dolphin आदि की संख्या, और अनेक प्रकार की biodiversity के मानकों में लगातार सुधार हो रहा है। भारत में वन क्षेत्र बढ़ रहा है। भारत में Degraded Land का सुधार हो रहा है। गाड़ियों के ईंधन के मानकों को हमने स्वेच्छा से बढ़ाया है।

हर प्रकार की renewable ऊर्जा में हम विश्व के अग्रणी देशों में हैं। और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त करने की ओर अग्रसर अगर कोई है तो एकमात्र हिन्‍दुस्‍तान है। G20 देशों के समूह में अच्‍छे से अच्‍छा काम करने वाला कोई देश है, दुनिया ने माना है वो हिन्‍दुस्‍तान है और फ़िर भी, ऐसे भारत पर पर्यावरण के नाम पर भाँति-भाँति के दबाव बनाए जाते हैं। यह सब, उपनिवेशवादी मानसिकता का ही परिणाम है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में भी ऐसी ही मानसिकता के चलते अपने ही देश के विकास में रोड़े अटकाए जाते है। कभी freedom of expression के नाम पर तो कभी किसी और चीज़ का सहारा लेकर। हमारे देश की परिस्थितियाँ, हमारे युवाओं की आकांक्षाओ, सपनों को बिना जाने समझे, बहुत सी बार दूसरे देशों के benchmark पर भारत को तौलने का प्रयास होता है और इसकी आड़ में विकास के रास्ते बंद करने की कोशिशें होती हैं। इसका नुकसान, ये जो करते हैं ऐसे लोगों को भुगतना नहीं पड़ता है। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस माँ को, जिसका बच्चा बिजली प्लांट स्थापित न होने के कारण पढ़ नहीं पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस पिता को, जो रुके हुए सड़क प्रोजेक्ट के कारण अपनी संतान को समय पर अस्पताल नहीं पहुँचा पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस मध्यम वर्गीय परिवार को जिसके लिए आधुनिक जीवन की सुविधाएं पर्यावरण के नाम पर उसकी आमदनी से बाहर पहुंचा दी गई हैं। इस कोलोनियल माइंडसेट की वजह से, भारत जैसे देश में, विकास के लिए प्रयास कर रहे देश में, करोड़ों आशाएं टूटती हैं, आकांक्षाएं दम तोड़ देती हैं। आजादी के आंदोलन में जो संकल्पशक्ति पैदा हुई, उसे और अधिक मजबूत करने में ये कोलोनियल माइंडसेट बहुत बड़ी बाधा है। हमें इसे दूर करना ही होगा। और इसके लिए, हमारी सबसे बड़ी शक्ति, हमारा सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत, हमारा संविधान ही है।

माननीय,

सरकार और न्यायपालिका, दोनों का ही जन्म संविधान की कोख से हुआ है। इसलिए, दोनों ही जुड़वां संतानें हैं। संविधान की वजह से ही ये दोनों अस्तित्व में आए हैं। इसलिए, व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो अलग-अलग होने के बाद भी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

हमारे यहाँ शास्त्रों में भी कहा गया है-

ऐक्यम् बलम् समाजस्य, तत् अभावे स दुर्बलः।

तस्मात् ऐक्यम् प्रशंसन्ति, दॄढम् राष्ट्र हितैषिण:॥

अर्थात्, किसी समाज की, देश की ताकत उसकी एकता और एकजुट प्रयासों में होती है। इसलिए, जो मजबूत राष्ट्र के हितैषी होते हैं, वो एकता की प्रशंसा करते हैं, उस पर ज़ोर देते हैं। राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि रखते हुये यही एकता देश की हर संस्था के प्रयासों में होनी चाहिए। आज जब देश अमृतकाल में अपने लिए असाधारण लक्ष्य तय कर रहा है, दशकों पुरानी समस्याओं के समाधान तलाशकर नए भविष्य के लिए संकल्प ले रहा है, तो ये सिद्धि सबके साथ से ही पूरी होगी। इसीलिए, देश ने आने वाले 25 सालों के लिए जब देश आजादी की 25वीं शताब्‍दी मनाता होगा और इसलिए ‘सबका प्रयास’ इसका देश ने आह्वान किया है। निश्चित तौर पर इस आह्वान में एक बड़ी भूमिका judiciary की भी है।

महोदय,

हमारी चर्चा में बिना भूले हुए एक बात लगातार सुनने को आती है, बार-बार उसे दोहराया जाता है - Separation of power । Separation of power की बात, न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका, अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण रही है। इसके साथ ही, आजादी के इस अमृत काल में, भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक, ये जो अमृत काल है, ये अमृत कालखंड में, संविधान की भावना के अनुरूप, Collective Resolve दिखाने की आवश्यकता है। आज देश के सामान्य मानवी के पास जो कुछ है, वो उससे ज्यादा का हकदार है। जब हम देश की आज़ादी की शताब्दी मनायेंगे, उस समय का भारत कैसा होगा, इसके लिए हमें आज ही काम करना है। इसलिए, देश की उसकी आकांक्षाओं  को पूरा करने की collective responsibility के साथ चलना बहुत ज़रूरी है। Separation of Power के मज़बूत अधिष्ठान पर हमें collective responsibility का मार्ग निर्धारित करना है, Roadmap बनाना है, लक्ष्य तय करने है और मंज़िल तक देश को पहुंचना है।

माननीय,

कोरोना काल ने justice delivery में technology के इस्तेमाल को लेकर नया भरोसा पैदा किया है। डिजिटल इंडिया के मेगा मिशन में न्यायपालिका की सहभागिता है। 18 हजार से ज्यादा कोर्ट्स का computerize होना, 98 प्रतिशत कोर्ट कॉम्प्लेक्स का वाइड एरिया नेटवर्क से जुड़ जाना, रियल टाइम में judicial data के transmission के लिए national judicial data grid का functional होना, e-court platform का लाखों लोगों तक पहुँचना, ये बताता है कि आज technology हमारे जस्टिस सिस्टम की कितनी बड़ी ताकत बन चुकी है, और आने वाले समय में हम एक advanced judiciary को काम करते हुये देखेंगे। समय परिवर्तनीय है, दुनिया बदलती रहती है, लेकिन ये बदलाव मानवता के लिए evolution का जरिया बने हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मानवता ने इन बदलावों को स्वीकार किया, और साथ ही मानवीय मूल्यों को शाश्वत बनाए रखा। न्याय की अवधारणा इन मानवीय मूल्यों का सबसे परिष्कृत विचार है। और, संविधान न्याय की इस अवधारणा की सबसे परिष्कृत व्यवस्था है। इस व्यवस्था को गतिशील और प्रगतिशील बनाए रखने का दायित्व हम सभी पर है। अपनी इन भूमिकाओं का निर्वहन हम सब पूरी निष्ठा से करेंगे, और आज़ादी के सौ साल से पहले एक नए भारत का सपना पूरा होगा। हम लगातार इन बातों से प्रेरित हैं, जिस बात के लिए हम गर्व करते हैं और वो मंत्र हमारे लिये है- संगच्छध्वं, संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। हमारे लक्ष्य समान हों, हमारे मन समान हों और हम साथ मिलकर उन लक्ष्यों को प्राप्त करें। इसी भावना के साथ मैं आज संविधान दिवस के इस पवित्र माहौल में आप सबको, देशवासियों को भी अनेकअनेक शुभकामनाएं देते हुए मेरी बात को समाप्‍त करता हूं। फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई।

बहुत बहुत धन्यवाद!