ಶೇರ್
 
Comments 2 Comments

उपस्थित सभी महानुभाव,

हमारे देश में एक अनुभव ये आता है कि बहुत सी चीजें Perception के आसपास मंडराती रहती है। और जब बारीकी से उसकी और देखें तो चित्र कुछ और ही नजर आता है। जैसे एक सामान्य व्यक्ति को पूछो तो उसको लगेगा कि “भई, ये जो बड़े-बड़े उद्योग हैं, बड़े-बड़े उद्योग घराने हैं, उससे रोजगार ज्यादा मिलता है।“ लेकिन अगर बारीकी से देखें तो चित्र कुछ और होता है, इसमें इतनी ज्यादा पूंजी लगी है। इतने सारे ताम-झांम, हवाबाजी, ये सब हम देखते आए हैं।

लेकिन अगर बारीकी से देखें तो ultimately हम विकास में हैं। रोजगार हमारी प्राथमिकता है और भारत जैसा देश जिसके पास Demographic dividend हो, जहां पर 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 से कम आयु की हो, उस देश ने अपने विकास की जो भी नीतियां बनानी हो, उसके केंद्र में ये युवा शक्ति होना चाहिए। अगर वो बराबर match कर लिया, तो हम नई ऊंचाईयों को पार कर सकते हैं। ये जितने बड़-बड़े उद्योगों की हम चर्चा सुनते आए हैं, उसमें सिर्फ एक करोड़ 25 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। सवा सौ करोड़ देश में सवा करोड़ लोगों को रोजगार, ये जो बहुत बड़े-बड़े लोग जिसके लिए दुनिया में चर्चा रहती है, आधा अखबार जिनसे भरा पडा रहता है, वो देते हैं।

लेकिन इस देश में छोटा-छोटा काम करने वाला व्यक्ति करीब 5 करोड़ 70 लाख लोग, 12 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं। उन सवा करोड़ को रोजगार देने के लिए बहुत सारी व्यवस्थाएं सक्रिय है। लेकिन 12 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले लोगों के लिेए थोड़ी सी हम मदद करें, तो कितना बड़ा फर्क आ सकता है इसका हम अंदाज कर सकते हैं। और इस 5 करोड़ 75 लाख इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग हैं, जो स्वरोजगार एक प्रकार से हैं - दर्जी होंगे, कुम्हार होंगे, टायर का पंक्चर करने वाले लोग हैं, साइकिल की repairing करने वाले लोग हैं, अपनी एक ऑटो रिक्शा लेकर के काम करने वाले लोग हैं, सब्जी बेचने वाले, गरीब-गरीब लोग हैं। उनका पूरा जो कारोबार है, उसमें ज्यादा से ज्यादा हिसाब लगाएं जाएं, तो 11 लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा उसमें पूंजी नहीं लगी है। यानी सिर्फ 11 लाख करोड़ रुपयों की पूंजी लगी है, 5 करोड़ 75 लाख उसका नेतृत्व कर रहे हैं, और 12 करोड़ लोगों का पेट भरते हैं।

ये बातें जब सामने आईं तो लगा कि देश में स्वरोजगारी के अवसर बढ़ाने चाहिए। देश की Economy को ताकत देने वाला जो नीचे पायरी पर जो लोग हैं, उनकी शक्ति को समझना चाहिए। और उनके लिए अवसर उपलब्ध कराने चाहिए और इस मूल चिंतन में से ये मुद्रा की कल्पना आई है। मेरा अपना एक अनुभव इसमें काम कर रहा था, क्योंकि सिर्फ आर्थिक जगत के लोगों के आंकड़ों के आधार पर निर्णय करना, इतना सरल नहीं होता है। लेकिन कभी-कभी अनुभव बहुत काम आता है।

मैं गुजरात में मुख्यमंत्री रहा तो मैंने पतंग उद्योग की तरफ थोड़ा ध्यान दिया। अब गुजरात में पतंग एक बड़ा त्‍योहार के रूप में मनाया जाता है, और ज्‍यादातर, अब वो पूरा Environment Friendly Industry है, Cottage Industry है। और लाखों की तादाद में गरीब मुसलमान उस काम में लगा हुआ है 90 प्रतिशत से ज्‍यादा पतंग बनाने व कबाड़ का काम गुजरात में मुसलमान कर रहा है, लेकिन वो वही पुरानी चीजें करता था। वो पतंग अगर उसको तय तीन कलर का बनाना है तो तीन कलर के कागज लाता था पेस्टिंग करता था और फिर पतंग बनाता था। अब दुनिया बदल चुकी है तीन कलर का कागज प्रिंट हो सकता है, टाइम बच सकता है। तो मैंने चेन्‍नई की एक Institute को काम दिया कि जरा सर्वे किजिए कि इनकी मुसीबत क्‍या है, कठिनाईयां क्‍या है, अनुभव ये आया कि छोटे-छोटे लोगों को थोड़ी मदद दी जाए थोड़ा Skill Development हो जाए, थोड़ी पैकेजिंग सिखा दिया जाए, आप उसमें कितना बड़ा बदलाव ला सकते है। मुझे आज कहने से आनंद होता है कि जो करीब 35 करोड़ का पतंग का बिजनेस था थोड़ी मदद की वो पतंग का उद्योग 500 करोड़ cross कर गया था।

फिर मेरी उसमें जरा रूचि बढ़ने लगी तो मैं कई चीजे नई-नई करने लगा। बांस, बांस वो लाते थे असम से। कारण क्‍या तो पतंग में जिस बांस के पट्टे की जरूरत होती है वो साइज का बांस गुजरात में होता नहीं था तो मैंने ये जेनेटिक इंजीनियरिंग वालों को पकड़ा। मैंने कहा बांस हमारे यहां ऐसा क्‍यों न हो दो गांठ के बीच अंतर ज्‍यादा हो ताकि वो हमारा ही लोकल बांस का product उसको काम आ जाए। बांस वो बाहर से लाता है तो उसको फाइनेंस की व्‍यवस्‍था हो फिर मैंने एडवरटाइजमेंट कम्‍पनी को बुलाया। मैंने कहा जरा पतंग वालों के साथ बैठो पतंग के ऊपर कोई एडवरटाइजमेंट का काम हो सकता है क्‍या उनकी कमाई बढ़ सकती है।

छोटी-छोटी चीजों को मैंने इतना ध्‍यान दिया था और मुझे उतना आनंद आया था उस काम में - I’m Talking about 2003-04 - कहने का मेरा तात्‍पर्य यह था कि जो बिल्‍कुल उपेक्षित सा काम था उसमें थोड़ा ध्‍यान दिया गया, फाइनेंस की व्‍यवस्‍था की गई, उसने तेज गति से आगे बढ़ाया। ये ताकत सब दूर है। आप देखिए हर गांव में दो-चार मुसलमान बच्‍चे ऐसे होंगे, इतनें Innovative होते है technology में ईश्‍वरदत्‍त उनको कृपा है। वो तुरंत चीजों को पकड़ लेते है। आप एक ताला उसको रिपेयर करने को दीजिए वो दूसरे दिन वो ताला वैसा बना के दे देगा। जिनके हाथों में ये परम्‍परागत कौशल है। ऐसे लोगों को अगर हम मदद करें और वो कुछ गिरवी रखें तब मिले तो उसके पास तो गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं है - सिवाय कि उसका ईमान। उसकी सबसे बड़ी पूंजी है उसका ईमान। ये गरीब इंसान की जो पूंजी है, ईमान। उस पूंजी के साथ मुद्रा अपनी पूंजी जोड़ना चाहता है, ताकि वो सफलता की कुंजी बन जाए और उस दिशा में हम काम करना चाहते है।

कुम्‍हार है, अब बिजली गांव में पहुंच गई है। वो भी चाहता है कि मैं मटकी बनाता हूं और चीजें बनाता हूं। लेकिन अगर Electric motor लग जाए तो मेरा काम तेज हो जाएगा। लेकिन Electric motor खरीदने के लिए पैसा नहीं है। बैंक के लिए उनके पास इतना समय भी नहीं है और उतना नेटवर्क भी नहीं है। लेकिन मैं आज, यहां बैंक के बड़े-बड़े लोग बैठे है। मेरे शब्‍द लिख करके रखिए। एक साल के बाद बैंक वाले Queue लगाएगें मुद्रा वालों के यहां और कहेंगे भई 50 लाख हमको client दे दीजिए।

क्‍योंकि अब देखिए प्रधानमंत्री जन-धन योजना में हिन्‍दुस्‍तान की बैंक सेक्‍टर ने जो काम किया है, मैं जितना अभिनंदन करूं उतना कम है जी, जितना अभिनंदन करूं उतना कम है। कोई सोच नहीं सकता था, क्‍योंकि बैंक के संबंध में एक सोच बनी हुई थी कि बैंक यानी इस दायरे से नीचे नहीं जा सकते। तो बैंक के लोगों ने गर्मी के दिनों में गांव-गांव घर-घर जा करके गरीब की झोपड़ी में जा करके उसको देश की फाइनेंस की Main Stream में लाने का प्रयास किया और इस देश के 14 करोड़ लोगों को, 14 करोड़ लोगों को बैंक खाते से जोड़ दिया। तो ये ताकत हमने अनुभव की है तो उसका ये अलग एक नया step है।

आज वैसे एक ओर भी अवसर है SIDBI का रजत जयंती वर्ष है SIDBI 25 साल की उम्र हो गई और मूलतः SIDBI का कारोबार इसी काम से शुरू हुआ था, छोटे-छोटे लोगों को... लेकिन जितनी तेजी से क्योंकि भारत देश rhythmic way में progress करे तो अपेक्षाएं पूरी नहीं होंगी। हमने उस rhythm को बदलकर के jump लगाने की जरूरत है। हमने दायरा बढ़ाने की जरूरत है। हमने अधिक लोगों को इसके अंदर जोड़ने की आवश्यकता है और सामान्य मानवी का अपना अनुभव है।

आप देखिए हिंदुस्तान में जहां भी women self help group चलते हैं, पैसों के विषय में शायद ऐसी ईमानदारी कहीं देखने को मिलेगी नहीं। उनको अगर 5 तारीख को पैसा जमा करवाना है तो 1 तारीख को जाकर के जमा करवाकर आ जाती हैं। बचत हमारे यहां स्वभाव है, उसको और जरा ताकत देने की आश्यकता है। हमारी परंपरागत वो शक्ति है।

मुद्रा बैंक के माध्यम से व्यवसाय के क्षेत्र में, स्वरोजगार के क्षेत्र में, उद्योग के क्षेत्र में जो निचले तबके पर आर्थिक व्यवस्था में रहे हुए लोग हैं, वे हमारा सबसे बड़ा client, हमारा सबसे बड़ा target group है। हम उसी पर focus करना चाहते हैं। इन 5 करोड़ 75 लाख जो छोटे व्यापारी हैं... और उनका average कर्ज कितना है? पूरे हिंदुस्तान में 11 लाख करोड़ की उनके पास पूंजी है total पूरे देश में कोई ज्यादा amount नहीं है वो और average कर्ज निकाला जाए तो एक यूनिट का average कर्ज 17 thousand है सिर्फ। 17 thousand हैं, यानि कुछ नहीं है। अगर उसको एक लाख के कर्ज की ताकत दे दी जाए। उसको इतना अगर जोड़ दिया जाए और ये 11 लाख करोड़ है वो एक करोड़ तक अगर पहुंच जाए। हम कल्पना कर सकते हैं देश की economy को GDP को, नीचे से ताकत देने का इतना बड़ा force जो कि कभी untapped था।

और इसलिए जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना लेकर के आए थे तब हमने कहा था, जहां बैंक नहीं उसको बैंक से जोड़ेंगे। आज जब हम मुद्रा लेकर के आए हैं, तो हमारा मंत्र है जिसको funding नहीं हो रहा है, जो un-funded है, उसको funding करने का हम बीड़ा उठाते हैं।

ये एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें शुरू के समय में सामान्य व्यक्ति जाएगा ये संभव नहीं है क्योंकि बेचारों को अनुभव बहुत खराब है। वो कहता है भई मुझे तो साहूकार से ही पैसा लेना पड़ता है। 24 percent, 30 percent interest देना पड़ता है, वो ही मुझे आदत हो गई है। वो विश्वास नहीं करेगा कि उसको इस प्रकार से ऋण मिल सकता है। हम ये एक नया विश्वास पैदा करना चाहते हैं कि आप देश के लिए काम कर रहे हो, देश के विकास के भागीदार हो, देश आपके लिए चिंता करने के लिए तैयार है। ये message मुझे देना है।

और ये मुद्रा के concept के द्वारा, उसी दिशा में हम आगे बढ़ना चाहते हैं। हमारे देश में agriculture sector में value addition - इतनी बड़ी संभावनाएं हैं। अगर उसकी एक विधा को develop कर दिया जाए तो हमारे किसान को कभी संकटों से गुजरना नहीं पड़ेगा। और ये छोटे-छोटे entrepreneur के माध्यम से ये पूरा network खड़ा किया जा सकता है जो सामान्य किसान, जो सामान्य पैदावार करता है, उसमें value addition का काम करे। और स्थानीय स्तर पर करे। कोई बहुत बड़ी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है। अपने आप उसका काम आगे बढ़ जाएगा।

और हम देखते हैं आम उसको बेचना है, तो बेचारे को बड़ा कम पैसा मिलता है लेकिन एक अगर एक छोटा सा unit भी हो, आम में से अचार बना दे तो ज्यादा पैसा मिलता है और अचार को भी अच्छा बढ़िया bottle में packing करे और ज्यादा पैसा मिलता है और कोई नटी bottle लेकर खड़ी हो जाए तो और ज्यादा पैसा मिलता है advertising होता है तो।

यानि वक्त बदल चुका है, branding, advertising इन सारी चीजों की जरूरत पड़ गई है। हम ऐसे छोटे-छोटे लोगों को ताकत देना चाहते हैं। और उनको अगर ताकत मिलती है तो देश की economy की नीचे की धरातल, जितनी ज्यादा मजबूत होगी, उतनी देश की economy को लाभ होने वाला है। और जब मैंने ये आकड़े बताए तो आप भी चौंक गए होगे कि इतना बड़ा तामझाम सवा करोड़ लोग रोजगार पाते है। और जिसकी ओर कोई देखता नहीं है, वो 12 करोड़ लोगों के पेट भरता है। कितना बड़ा अंतर है। ये जो 12 करोड़ लोग है 25 करोड़ को रोजगार देने की ताकत देते है। वो Potential पड़ा है। और ज्‍यादा कोई शासकीय व्‍यवस्‍था में बड़े बदलाव की भी जरूरत नहीं है। थोड़ी संवदेनशीलता चाहिए, थोड़ी समझ चाहिए और थोड़ा Pro-Active role चाहिए।

मुद्रा एक ऐसा platform खड़ा किया गया है, जिस platform के साथ इसको... आज छोटी-मोटी finance की व्‍यवस्‍थाएं चल पड़ी है। दुनिया में कई जगह पर प्रयोग हुए है Micro finance के। लिए मैं चाहूंगा कि हम पूरे विश्‍व में Micro finance के जो Successful Model है हम भी उसका अध्‍ययन करें। उसकी जो अच्‍छाइयां है जो हमारे लिए suitable है, हम उसको adopt करें। और हिन्‍दुस्‍तान इतना बड़ा देश है कि जो चीज नागालैंड में चलती है वो महाराष्‍ट्र में चलेगी जरूरी नहीं है। विविधता चाहिए। और विविधताओं के अनुसार स्‍थानीय आवश्‍यकताओं के अनुसार अपने मॉडल बनाएं उसकी requirement करें। वरना हम दिल्‍ली में बैठ करके tailor के लिए ये और फिर कहेंगे कि तुमको ये मिलेगा तो मेल नहीं बैठेगा। वो वहां है उसी को पूछना पड़ेगा कि भई बताओं तुम्‍हारे लिए क्‍या जरूरत है? ये अगर हमने कर दिया तो हम बहुत बड़ी मात्रा में समाज के इस नीचे के तबके को मदद कर सकते है।

जिस प्रकार से सामान्‍य व्‍यक्ति की चिंता करना ये हमारा प्रयास है... और आपने इस सरकार के एक-एक कदम देखें होंगे, गतिशीलता तो आप देखते ही होंगे। वरना सामान्‍यत: देश में योजनाओं की घोषणा को ही काम माना जाता था और आप रोज नई योजना की घोषणा करो तो अखबार के आधार पर देश को समझने वाले जो लोग है वो तो यही मानते है कि वाह देश बहुत आगे बढ़ गया। और दो-चार साल के बाद देखते है कि वही कि वही रह गए। हमारी कोशिश है योजनाओं को धरती पर उतारना।

प्रधानमंत्री जन-धन योजना ये सीधा-सीधा दिखता है। पहल योजना - दुनिया में सबसे बड़ा Cash Transfer का काम। गैस सब्सिडी में। 13 करोड़ लोगों के गैस सब्सिडी सिलेंडर, सब्सिडी सीधी उसके बैंक खाते में चली गई। यानी अगर एक बार निर्णय करें कि इस काम पूरा करना है और हर काम को आप देखिए... जब हमने 15 अगस्‍त को प्रधानमंत्री जन-धन योजना की बात कही करीब-करीब सवा सौ दिन के अंदर उस काम को पूरा कर दिया।

जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना के बाद हम आगे बढ़े सौ दिन के भीतर-भीतर हमने पहल का काम पूरा कर दिया।

और आज जब बजट के अंदर घोषणा हुई, 50 दिन भी नहीं हुए, वो आज योजना आपके सामने रख दी। और ये Functional होगी और उसका परिणाम मैं कहता हूं एक साल मैं ज्‍यादा समय नहीं कहता। एक साल के भीतर-भीतर हमारी जो Established Banking System है, वो मुद्रा के मॉडल की ओर जाएगी मैं दावे से कहता हूं क्‍योंकि इसकी ताकत इसकी ताकत पहचान में आने वाली है। वे अपना एक लचीली बैंकिंग व्‍यवस्‍था खड़ी करेंगे, एक बहुत बड़ी ऑफिस चाहिए, कोई एयरकंडीशन चाहिए कोई जरूरत नहीं है। ऐसे Bare footed बैंकरर्स तैयार हो सकते है जो मुद्रा के मॉडल पर बड़ी-बड़ी बैंकों का काम भी कर सकते है।

आने वाले दिनों में कम से कम धन लगा करके भी ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को रोजगार देने का काम इसके साथ सरलता से हो सकता है और ये लोग जो संकट से गुजरते है, ब्‍याज के चक्‍कर में गरीब आदमी मर जाता है। उसको बचाना है और उसकी जो ताकत है उसके लिए अवसर देना है उस अवसर की दिशा में काम कर रहे है, जिस प्रकार से देश में ये जो वर्ग है उसकी जितनी चिंता करते है, उतनी ही देश के किसान की चिंता करना उतना ही जरूरी है।

किसी न किसी कारण से देश का किसान प्राकृतिक संकटों से जूझ रहा है। गत वर्ष, वर्षा कम हुई। वर्षा कम होने के कारण वैसे ही किसान मुसीबत से गुजारा कर रहा था और इस बार जितनी मात्रा में बेमौसमी वर्षा और ओले गिरना। इतनी तबाही हुई है किसान की। हमने मंत्रियों को भेजा था। खेतों में जा करके किसानों से बात करके परिस्थिति का जायजा लिया। कल इन सारे मंत्रियों से मैंने डिटेल में रिपोर्ट ली थी। इन किसानों को हम क्या मदद कर सकते हैं। और मैंने पहले दिन कहा था कि किसान को इस मुसीबत से बचाना, उसका साथ देना, उसको संकटों से बाहर लाना। ये सरकार की, समाज की, हम सबकी जिम्मेवारी है और किसान की चिंता करना ये आवश्यक है।

Natural calamity पहले भी आई है। लेकिन सरकार के जो parameter रहे हैं, उन parameters में आज के संकट में किसान को ज्यादा मदद नहीं मिल सकती है। और इसलिए ये संकट की व्यापकता इतनी है और उस समय है जबकि उसको फसल लेकर के बाजार में जाना था। एक प्रकार से उसके नोटों का बंडल ही जल गया, इस प्रकार से हम कह सकते हैं। इतना बड़ा उसका, उसका पूरा पसीना बहाया हुआ उसका, ये हालत हुई है। और इसलिए हमने insurance company को भी आदेश किया है कि बहुत ही proactive होकर के उनकी मदद की जाए। बैंकों को हमने आदेश किया है कि बैंक उनके जो कर्ज हैं, उनके संबंध में किस प्रकार से restructure करे ताकि उनको इस संकट से बाहर लाया जाए।

सरकार की तरफ से भी एक बहुत बड़ा अहम निर्णय हम करने जा रहे हैं। अब तक खेत में 50 प्रतिशत से ज्यादा अगर नुकसान हुआ हो, तभी वो उस मदद पाने की list में आता है। 50 प्रतिशत से ज्यादा अगर नुकसान हुआ होगा तभी आपको मदद मिल सकती है। अगर 50 प्रतिशत से कम हुआ है तो मदद नहीं मिल सकती है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी ये एक सुझाव था कि साहब ये norms बदलना चाहिए। हमारे मंत्री अभी जाकर के आए, उन्होंने प्रत्यक्ष देखा, और ये सब देखने के बाद एक बहुत बड़ा हमने एक महत्वपूर्ण निर्णय किया है कि अब किसान के वो जो 50 प्रतिशत के नुकसान वाला दायरा था उसको बदलकर के 33 percent भी अगर नुकसान हुआ है तो भी वो किसान हकदार बनेगा।

उसके कारण मुझे मालूम है बहुत बड़ा बोझ आने वाला है, बहुत बड़ा बोझ आने वाला है लेकिन किसान को 50 प्रतिशत वाले हिसाब में रखने से उसको ज्यादा लाभ नहीं मिलेगा। 33 percent जो कि कईयों की मांग थी, उसको हमने स्वीकार किया है।

दूसरा विषय है उसको जो मुआवजा दिया जाता है। देश में आजादी के बाद सबसे बड़ा निर्णय पहली बार हुआ है 50 प्रतिशत को 33 प्रतिशत लाना। और दूसरा महत्वपूर्ण आजादी के बाद इतना बड़ा jump नहीं लगाया है, किसानों को मदद करने में हम इतना बड़ा jump इस बार लगा रहे हैं। और आज उसको जो मदद करने के सारे parameters हैं, उसको अब डेढ़ गुना कर दिया जाएगा। अगर उसको नुकसान में पहले 100 रुपया मिलता था, 150 मिलेगा, लाख मिलता था तो डेढ़ लाख मिलेगा, उसकी मदद डेढ़ गुना कर दी जाएगी।

कभी हमारे यहां incremental होता था 5 percent, 2 percent, 50 प्रतिशत वृद्धि। और ये किसान को तत्काल मदद मिले। राज्यों ने सर्वे का काम किया है। भारत सरकार और राज्य सरकार मिलकर के उसको आगे बढ़ाएगी लेकिन मैं चाहता हूं हमारे देश के किसानों को जितनी मदद हो सके, उतनी मदद करने के लिए ये सरकार संकल्पबद्ध है। क्योंकि आर्थिक विकास की यात्रा में किसान का भी बहुत बड़ा योगदान है और हमारी जीवन नैया चलाने में भी किसान का बहुत बड़ा योगदान है। बैंक हो, insurance company हो, भारत सरकार हो, राज्य सरकार हो, हम सब मिलकर के किसान को इस संकट की घड़ी से हम बाहर लाएंगे। ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।

फिर एक बार मैं SIDBI की इस रजत जयंती वर्ष के प्रारंभ पर उनको मैं बहुत-बहुत शुभकामना देता हूं और SIDBI आने वाले दिनों में नए लक्ष्य को लेकर के और नई ऊंचाइयों को पार करने में सफल होगा, ऐसी मेरी शुभकामनाएं हैं।

और मुद्रा platform प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आने वाले दिनों में देश की आर्थिक, जो पक्की धरोहर है उसको जानदार बनाना, शानदार बनाने के काम में मुद्रा बहुत बड़ा role play करेगी। और ये पूंजी उसकी सफलत की कुंजी बने, ये मंत्र को हम चरितार्थ करेंगे। इसी एक शुभ आशय के साथ आज इस महत्वपूर्ण योजना को प्रारंभ करते हुए मुझे खुशी हो रही है, मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद।

20 ವರ್ಷಗಳ ಸೇವಾ ಮತ್ತು ಸಮರ್ಪಣದ 20 ಚಿತ್ರಗಳು
Mann KI Baat Quiz
Explore More
ಜಮ್ಮು ಮತ್ತು ಕಾಶ್ಮೀರದ ನೌಶೇರಾದಲ್ಲಿ ಭಾರತೀಯ ಸಶಸ್ತ್ರ ಪಡೆಗಳ ಸೈನಿಕರ ಜೊತೆ ದೀಪಾವಳಿ ಆಚರಣೆ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ ಅವರ ಸಂವಾದ

ಜನಪ್ರಿಯ ಭಾಷಣಗಳು

ಜಮ್ಮು ಮತ್ತು ಕಾಶ್ಮೀರದ ನೌಶೇರಾದಲ್ಲಿ ಭಾರತೀಯ ಸಶಸ್ತ್ರ ಪಡೆಗಳ ಸೈನಿಕರ ಜೊತೆ ದೀಪಾವಳಿ ಆಚರಣೆ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ ಪ್ರಧಾನ ಮಂತ್ರಿ ಅವರ ಸಂವಾದ
India achieves 40% non-fossil capacity in November

Media Coverage

India achieves 40% non-fossil capacity in November
...

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
Text of PM’s address at inauguration & laying the foundation stone of multiple projects in Dehradun, Uttarakhand
December 04, 2021
ಶೇರ್
 
Comments
“Today, India is moving ahead with the intention of investing more than Rs 100 lakh crore on modern infrastructure. India's policy is of ‘Gatishakti’, to work twice or thrice as fast.”
“Our mountains are not only strongholds of faith and our culture, they are also the fortresses of our country's security. One of the top priorities of the country is to make life easier for the people living in the mountains”
“The government today cannot come under pressure from any country in the world. We are people who follow the mantra of nation first, always first”
“Whatever schemes we bring, we will bring it for everyone, without discrimination. We did not make vote bank politics the basis but gave priority to the service of the people. Our approach has been to strengthen the country”

उत्तराखंड का, सभी दाणा सयाणौ, दीदी-भूलियौं, चच्ची-बोडियों और भै-बैणो। आप सबु थैं, म्यारू प्रणाम ! मिथै भरोसा छ, कि आप लोग कुशल मंगल होला ! मी आप लोगों थे सेवा लगौण छू, आप स्वीकार करा !

उत्तराखंड के गवर्नर श्रीमान गुरमीत सिंह जी, यहां के लोकप्रिय, ऊर्जावान मुख्यमंत्री श्रीमान पुष्कर सिंह धामी जी, केंद्रीय मंत्रिपरिषद के मेरे सहयोगी प्रह्लाद जोशी जी, अजय भट्ट जी, उत्तराखंड में मंत्री सतपाल महाराज जी, हरक सिंह रावत जी, राज्य मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यगण, संसद में मेरे सहयोगी निशंक जी, तीरथ सिंह रावत जी, अन्य सांसदगण, भाई त्रिवेंद्र सिंह रावत जी, विजय बहुगुणा जी, राज्य विधानसभा के अन्य सदस्य, मेयर श्री, जिला पंचायत के सदस्यगण, भाई मदन कौशिक जी और मेरे प्‍यारे भाइयों और बहनों,

आप सभी इतनी बड़ी संख्या में हमें आशीर्वाद देने आए हैं। आपके स्नेह, आपके आशीर्वाद का प्रसाद पाकर हम सभी अभीभूत हैं। उत्तराखंड, पूरे देश की आस्था ही नहीं बल्कि, कर्म और कर्मठता की भूमि है। इसीलिए, इस क्षेत्र का विकास, यहां को भव्य स्वरूप देना डबल इंजन की सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी भावना से सिर्फ बीते 5 वर्षों में उत्तराखंड के विकास के लिए केंद्र सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की हैं। यहां की सरकार इनको तेज़ी से ज़मीन पर उतार रही है। इसी को आगे बढ़ाते हुए, आज 18 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं का लोकापर्ण और शिलान्यास किया गया है। इनमें कनेक्टिविटी हो, स्वास्थ्य हो, संस्कृति हो, तीर्थाटन हो, बिजली हो, बच्चों के लिए विशेष तौर पर बना चाइल्ड फ्रेंडली सिटी प्रोजेक्ट हो, करीब-करीब हर सेक्टर से जुड़े प्रोजेक्ट इसमें शामिल हैं। बीते वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, अनेक जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद, आखिरकार आज ये दिन आया है। ये परियोजनाएं, मैंने केदारपुरी की पवित्र धरती से कहा था, आज मैं देहरादून से दोहरा रहा हूं। ये परियोजनाएं इस दशक को उत्तराखंड का दशक बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी। इन सभी प्रोजेक्ट्स के लिए उत्तराखंड के लोगों का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं, बहुत-बहुत बधाई देता हूं। जो लोग पूछते हैं कि डबल इंजन की सरकार का फायदा क्या है, वो आज देख सकते हैं कि डबल इंजन की सरकार कैसे उत्तराखंड में विकास की गंगा बहा रही है।

भाइयों और बहनों,

इस शताब्दी की शुरुआत में, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत में कनेक्टिविटी बढ़ाने का अभियान शुरू किया था। लेकिन उनके बाद 10 साल देश में ऐसी सरकार रही, जिसने देश का, उत्तराखंड का, बहुमूल्य समय व्यर्थ कर दिया। 10 साल तक देश में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर घोटाले हुए, घपले हुए। इससे देश का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई के लिए हमने दोगुनी गति से मेहनत की और आज भी कर रहे हैं। आज भारत, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश के इरादे से आगे बढ़ रहा है, आज भारत की नीति, गतिशक्ति की है, दोगुनी-तीन गुनी तेजी से काम करने की है। सालों-साल अटकी रहने वाली परियोजनाओं, बिना तैयारी के फीता काट देने वाले तौर-तरीकों को पीछे छोड़कर आज भारत नव-निर्माण में जुटा है। 21वीं सदी के इस कालखंड में, भारत में कनेक्टिविटी का एक ऐसा महायज्ञ चल रहा है, जो भविष्य के भारत को विकसित देशों की श्रंखला में लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। इस महायज्ञ का ही एक यज्ञ आज यहां देवभूमि में हो रहा है।

भाइयों और बहनों,

इस देवभूमि में श्रद्धालु भी आते हैं, उद्यमी भी आते हैं, प्रकृति प्रेमी सैलानी भी आते हैं। इस भूमि का जो सामर्थ्य है, उसे बढ़ाने के लिए यहां आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर अभूतपूर्व काम किया जा रहा है। चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना के तहत आज देवप्रयाग से श्रीकोट और ब्रह्मपुरी से कौड़ियाला, वहां के प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण किया गया है। भगवान बद्रीनाथ तक पहुंचने में लाम-बगड़ लैंड स्लाइड के रूप में जो रुकावट थी, वो भी अब दूर हो चुकी है। इस लैंड स्लाइड ने देशभर के न जाने कितने तीर्थ यात्रियों को बद्रीनाथ जी की यात्रा करने से या तो रोका है या फिर घंटों इंतज़ार करवाया है और कुछ लोग तो थक कर के वापस भी चले गए। अब बद्रीनाथ जी की यात्रा, पहले से ज्यादा सुरक्षित और सुखद हो जाएगी। आज बद्रीनाथ जी, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में अनेक सुविधाओं से जुड़े नए प्रोजेक्ट्स पर भी काम आरंभ हुआ है।

भाइयों और बहनों,

बेहतर कनेक्टिविटी और सुविधाओं से पर्यटन और तीर्थाटन को कितना लाभ होता है, बीते वर्षों में केधारधाम में हमने अनुभव किया है। केदारनाथ त्रासदी से पहले, 2012 में 5 लाख 70 हजार लोगों ने दर्शन किया था और ये उस समय का एक रिकॉर्ड था, 2012 में यात्रियों की संख्या का एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड था। जबकि कोरोना काल शुरू होने से पहले, 2019 में 10 लाख से ज्यादा लोग केदारनाथ जी के दर्शन करने पहुंचे थे। यानि केदार धाम के पुनर्निर्माण ने ना सिर्फ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ाई बल्कि वहां के लोगों को रोजगार-स्वरोजगार के भी अनेकों अवसर उपलब्ध कराए हैं।

साथियों,

पहले जब भी मैं उत्तराखंड आता था, या उत्तराखंड आने-जाने वालों से मिलता था, वो कहते थे- मोदी जी दिल्ली से देहरादून की यात्रा गणेशपुर तक तो बड़ी आसानी से हो जाती है, लेकिन गणेशपुर से देहरादून तक बड़ी मुश्किल होती है। आज मुझे बहुत खुशी है कि दिल्ली-देहरादून इकॉनॉमिक कॉरिडोर का शिलान्यास हो चुका है। जब ये बनकर तैयार हो जाएगा तो, दिल्ली से देहरादून आने-जाने में जो समय लगता है, वो करीब-करीब आधा हो जाएगा। इससे न केवल देहरादून के लोगों को फायदा पहुंचेगा बल्कि हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत और मेरठ जाने वालों को भी सुविधा होगी। ये आर्थिक गलियारा अब दिल्ली से हरिद्वार आने-जाने के समय को भी कम कर देगा। हरिद्वार रिंग रोड परियोजना से हरिद्वार शहर को जाम की बरसों पुरानी समस्या से मुक्ति मिलेगी। इससे कुमांऊ क्षेत्र के साथ संपर्क भी और आसान होगा। इसके अलावा ऋषिकेश की पहचान, हमारे लक्ष्मण झूला पुल के समीप, एक नए पुल का शिलान्यास भी आज हुआ है।

भाइयों और बहनों,

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर्यावरण सुरक्षा के साथ विकास के हमारे मॉडल का भी प्रमाण होगा। इसमें एक तरफ उद्योगों का कॉरिडोर होगा तो इसी में एशिया का सबसे बड़ा elevated wildlife corridor भी बनेगा। ये कॉरिडोर यातायात तो सरल करेगा ही, जंगली जीवों को भी सुरक्षित आने-जाने में मदद करेगा।

साथियों,

उत्तराखंड में औषधीय गुण वाली जो जड़ी-बूटिया हैं, जो प्राकृतिक उत्पाद हैं, उनकी मांग दुनिया भर में है। अभी उत्तराखंड के इस सामर्थ्य का भी पूरा उपयोग नहीं हो सका है। अब जो आधुनिक इत्र और सुगंध प्रयोगशाला बनी है, वो उत्तराखंड के सामर्थ्य को और बढ़ाएगी।

भाइयों और बहनों,

हमारे पहाड़, हमारी संस्कृति-हमारी आस्था के गढ़ तो हैं ही, ये हमारे देश की सुरक्षा के भी किले हैं। पहाड़ों में रहने वालों का जीवन सुगम बनाना देश की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है। लेकिन दुर्भाग्य से दशकों तक जो सरकार में रहे, उनकी नीति और रणनीति में दूर-दूर तक ये चिंतन कहीं नहीं था। उनके लिए उत्तराखंड हो या हिन्‍दुस्‍तान के और क्षेत्र, उनका एक ही इरादा रहता था, अपनी तिजोरी भरना, अपने घर भरना, अपनों का ही खयाल रखना।

भाईयों और बहनों,

हमारे लिए उत्तराखंड, तप और तपस्या का मार्ग है। साल 2007 से 2014 के बीच जो केंद्र की सरकार थी, उसने सात साल में उत्तराखंड में केवल, हमारे पहले जो सरकार थी उसने 7 साल में क्‍या काम किया? पहले की सरकार ने 7 साल में उत्तराखंड में केवल 288, 300 किलोमीटर भी नहीं, केवल 288 किलोमीटर नेशनल हाईवे बनाए थे। जबकि हमारी सरकार ने अपने सात साल में उत्तराखंड में 2 हजार किलोमीटर से अधिक लंबाई के नेशनल हाईवे का निर्माण किया है। आज बताइए भाईयों-बहनों, इसे आप काम मानते हैं या नहीं मानते हैं? क्‍या इसमें लोगों की भलाई है कि नहीं है? इससे उत्तराखंड का भला होगा कि नहीं होगा? आपकी भावी पीढ़ियों का भला होगा कि नहीं होगा? उत्तराखंड के नौजवानों का भाग्‍य खुलेगा कि नहीं खुलेगा? इतना ही नहीं, पहले की सरकार ने उत्तराखंड में नेशनल हाईवे पर 7 साल में 600 करोड़ के आसपास खर्च किया। अब जरा सुन लीजिए जबकि हमारी सरकार इन सात साढ़े सात साल में 12 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर चुकी है, कहां 600 करोड़ और कहां 12000 करोड़ रुपया। आप मुझे बताइए, हमारे लिये उत्तराखंड प्राथमिकता है कि नहीं है? आपको विश्‍वास हो रहा है कि नहीं हो रहा है? हमने करके दिखाया है कि नहीं दिखाया? हम जी-जान से उत्तराखंड के लिये काम करते हैं कि नहीं करते हैं?

और भाइयों और बहनों,

ये सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है। जब इंफ्रास्ट्रक्चर के इतने बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम होता है, तो कितनी चीजों की जरूरत होती है। सीमेंट चाहिए, लोहा चाहिए, लकड़ी चाहिए, ईंट चाहिए, पत्‍थर चाहिए, मजदूरी करने वाले लोग चाहिए, उद्यमी लोग चाहिए, स्थानीय युवाओं को अनेक प्रकार का लाभ का अवसर पैदा होता है। इन कामों में जो श्रमिक लगते हैं, इंजीनियर लगते हैं, मैनेजमेंट लगता है, वो भी अधिकतर स्थानीय स्तर पर ही जुटाए जाते हैं। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर के ये प्रोजेक्ट, अपने साथ उत्तराखंड में रोजगार का एक नया इकोसिस्टम बना रहे हैं, हजारों युवाओं को रोजगार दे रहे हैं। आज मैं गर्व से कह सकता हूं, पांच साल पहले मैंने कहा था, जो कहा था उसको दोबारा याद कराने की ताकत राजनेताओं में जरा कम होती है, मुझ में है। याद कर लेना मैंने क्‍या कहा था और आज मैं गर्व से कह सकता हूं उत्तराखंड क पाणी और जवनि उत्तराखंड क काम ही आली !

साथियों,

सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी पहले की सरकारों ने उतनी गंभीरता से काम नहीं किया, जितना करना चाहिए था। बॉर्डर के पास सड़कें बनें, पुल बनें, इस ओर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वन रैंक वन पेंशन हो, आधुनिक अस्त्र-शस्त्र हो, या फिर आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देना हो, जैसे उन लोगों ने हर स्तर पर सेना को निराश करने की, हतोत्साहित करने की मानो कसम खा रखी थी। लेकिन आज जो सरकार है, वो दुनिया के किसी देश के दबाव में नहीं आ सकती। हम राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम के मंत्र पर चलने वाले लोग हैं। हमने सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में सैकड़ों किलोमीटर नई सड़कें बनाई हैं। मौसम और भूगोल की कठिन परिस्थितियों के बावजूद ये काम तेजी से किया जा रहा है। और ये काम कितना अहम है, ये उत्तराखंड का हर परिवार, फौज में अपने बच्चों को भेजने वाला परिवार, ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है।

साथियों,

एक समय पहाड़ पर रहने वाले लोग, विकास की मुख्य धारा से जुड़ने का सपना ही देखते रह जाते थे। पीढ़ियां बीत जाती थीं,वो यही सोचते थे हमें कब पर्याप्त बिजली मिलेगी, हमें कब पक्के घर बनकर मिलेंगे? हमारे गांव तक सड़क आएगी या नहीं? अच्छी मेडिकल सुविधा मिलेगी या नहीं और पलायन का सिलसिला आखिरकार कब रुकेगा? जाने कितने ही प्रश्न यहां के लोगों के मन में थे।

लेकिन साथियों,

जब कुछ करने का जूनून हो तो सूरत भी बदलती हैं और सीरत भी बदलती हैं। और आपका ये सपना पूरा करने के लिए हम दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। आज सरकार इस बात का इंतजार नहीं करती कि नागरिक उसके पास अपनी समस्या लेकर आएंगे तब सरकार कुछ सोचेगी और कदम उठाएगी। अब सरकार ऐसी है जो सीधे नागरिकों के पास जाती हैं। आप याद करिए, एक समय था जब उत्तराखंड में सवा लाख घरों में नल से जल पहुंचता था। आज साढ़े 7 लाख से भी अधिक घरों में नल से जल पहुंच रहा है। अब घर में किचन तक नल से जल आए हैं तो ये माताएं-बहनें मुझे आशीर्वाद देंगी कि नहीं देंगी? हम सबको आशीर्वाद देंगे कि नहीं देंगे? नल से जल आता है तो माताओं-बहनों का कष्ट दूर होता है कि नहीं होता है? उनको सुविधा मिलती है कि नहीं मिलती है? और ये काम, जल जीवन मिशन शुरू होने के दो साल के भीतर-भीतर हमने कर दिया है। इसका बहुत बड़ा लाभ उत्तराखंड की माताओं को बहनों को, यहां की महिलाओं को हुआ है। उत्तराखंड की माताओं-बहनों-बेटियों ने हमेशा हम सभी पर इतना स्नेह दिखाया है। हम सभी दिन रात परिश्रम करके, ईमानदारी से काम करके, हमारी इन माताओं-बहनों का जीवन आसान बनाकर, उनका ऋण चुकाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

साथियों,

डबल इंजन की सरकार में उत्तराखंड के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी अभूतपूर्व काम हो रहा है। उत्तराखंड में 3 नए मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए गए हैं। इतने छोटे से राज्‍य में तीन नए मेडिकल कॉलेज आज हरिद्वार मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास भी किया गया है। ऋषिकेश एम्स तो सेवाएं दे ही रहा है, कुमाऊं में सैटेलाइट सेंटर भी जल्द ही सेवा देना शुरु कर देगा। टीकाकरण के मामले में भी उत्तराखंड आज देश के अग्रणी राज्यों में है और इसके लिये मैं धामी जी को, उनके साथियों को पूरी उत्तराखंड की सरकार को बधाई देता हूं। और इसके पीछे भी बेहतर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की बहुत बड़ी भूमिका है। इस कोरोना काल में उत्तराखंड में 50 से अधिक नए ऑक्सीजन प्लांट्स भी लगाए गए हैं।

साथियों,

बहुत से लोग चाहते हैं, आप में से सबके मन में विचार आता होगा, हर कोई चाहता होगा उसकी संतान डॉक्टर बने, उसकी संतान इंजीनियर बने, उनकी संतान मैनेजमेंट के क्षेत्र में जाए। लेकिन अगर नए संस्थान बने ही नहीं, सीटों की संख्या बढ़े ही नहीं, तो आपका सपना पूरा हो सकता है क्‍या, आपका बेटा डॉक्‍टर बन सकता है क्‍या, आपका बेटी डॉक्‍टर बन सकती है क्‍या? आज देश में बन रहे नए मेडिकल कॉलेज, नई IIT, नए IIM, विद्यार्थियों के लिए प्रोफेशनल कोर्स की बढ़ रही सीटें, देश की वर्तमान और भावी पीढ़ी के भविष्य को मजबूत करने का काम कर रही हैं। हम सामान्य मानवी के सामर्थ्य को बढ़ाकर, उसे सशक्त करके, उसकी क्षमता बढ़ाकर, उसे सम्मान के साथ जीने के नए अवसर दे रहे हैं।

साथियों,

समय के साथ हमारे देश की राजनीति में अनेक प्रकार की विकृतियां आ गई है और आज इस बारे में भी मैं उत्तराखंड की पवित्र धरती पर कुछ बात बताना चाहता हूं। कुछ राजनीतिक दलों द्वारा, समाज में भेद करके, सिर्फ एक तबके को, चाहे वो अपनी जाति का हो, किसी खास धर्म का हो, या अपने छोटे से इलाके के दायरे का हो, उसी की तरफ ध्‍यान देना। यही प्रयास हुए हैं और उसमें ही उनको वोटबैंक नजर आती है। इतना संभाल लो, वोटबैंक बना दो, गाड़ी चलती रहेगी। इन राजनीतिक दलों ने एक और तरीका भी अपनाया है। उनकी विकृतियों का एक रूप ये भी है और वो रास्‍ता है जनता को मजबूत नहीं होने देना, बराबर कोशिश करना कि जनता कभी मजबूत ना हो जाए। वे तो यही चाहते रहे, ये जनता-जनार्दन हमेशा मजबूर बनी रहे, मजबूर बनाओ, जनता को अपना मोहताज बनाओ ताकि उनका ताज सलामत रहे। इस विकृत राजनीति का आधार रहा कि लोगों की आवश्यकताएं पूरी ना करो। उन्‍हें आश्रित बनाकर रखो। इनके सारे प्रयास इसी दिशा में हुए कि जनता-जनार्दन को ताकतवर नहीं बनने देना है। दुर्भाग्य से, इन राजनीतिक दलों ने लोगों में ये सोच पैदा कर दी कि सरकार ही हमारी माई-बाप है, अब जो कुछ भी मिलेगा सरकार से ही मिलेगा, तभी हमारा गुजारा होगा। लोगों के मन में भी ये घर कर गया। यानि एक तरह से देश के सामान्य मानवी का स्वाभिमान, उसका गौरव सोची-समझी रणनीति के तहत कुचल दिया गया, उसे आश्रित बना दिया गया और दुखद ये कि ये सब करते रहे और कभी किसी को भनक तक नहीं आने दी। लेकिन इस सोच, इस अप्रोच से अलग, हमने एक नया रास्ता चुना है। हमने जो रास्‍ता चुना है वो मार्ग कठिन है, वो मार्ग मुश्किल है, लेकिन देशहित में है, देश के लोगों के हित में है। और हमारा मार्ग है - सबका साथ-सबका विकास। हमने कहा कि जो भी योजनाएं लाएंगे सबके लिए लाएंगे, बिना भेदभाव के लाएंगे। हमने वोटबैंक की राजनीति को आधार नहीं बनाया बल्कि लोगों की सेवा को प्राथमिकता दी। हमारी अप्रोच रही कि देश को मजबूती देनी है। हमारा देश कब मजबूत होगा? जब हर परिवार मजबूत होगा। हमने ऐसे समाधान निकाले, ऐसी योजनाएं बनाईं जो भले वोटबैंक के तराजू में ठीक नहीं बैठें लेकिन वो बिना भेदभाव आपका जीवन आसान बनाएंगी, आपको नए अवसर देंगी, आपको ताकतवर बनाएंगी। और आप भी नहीं चाहेंगे कि आप अपने बच्चों के लिए एक ऐसा वातावरण छोड़ें जिसमें आपके बच्चे भी हमेशा आश्रित जीवन जीएं। जो मुसीबतें आपको विरासत में मिलीं, जिन कठिनाइयों में आपको जिन्‍दगी गुजारनी पड़ी आप भी नहीं चाहेंगे कि आप वो विरासतें, वो मुसीबतें बच्चों को वैसे ही देकर के जाएं। हम आपको आश्रित नहीं, आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। जैसे हमने कहा था कि जो हमारा अन्नदाता है, वो ऊर्जादाता भी बने। तो इसके लिए हम खेत के किनारे मेढ पर सोलर पैनल लगाने की कुसुम योजना लेकर के आए। इससे किसान को खेत में ही बिजली पैदा करने की सुविधा हुई। ना तो हमने किसान को किसी पर आश्रित किया और ना ही उसके मन में ये भाव आया कि मैं मुफ्त की बिजली ले रहा हूं। और इस प्रयास में भी उसको बिजली भी मिली और देश पर भी भार नहीं आया और वो एक तरह से आत्मनिर्भर बना और ये योजना देश के कई जगह पर हमारे किसानों ने लागू की है। इसी तरह से हमने देशभर में उजाला योजना शुरू की थी। कोशिश थी कि घरों में बिजली का बिल कम आए। इसके लिए देशभर में और यहां उत्तराखंड में करोड़ों LED बल्ब दिए गए और पहले LED बल्ब, 300-400 रुपए के आते थे, हम उनको 40-50 रुपए तक लेकर के आ गए। आज लगभग हर घर में LED बल्ब इस्तेमाल हो रहे हैं और लोगों का बिजली का बिल भी कम हो रहा है। अनेकों घरों में जो मध्‍यम वर्ग, निम्‍न मध्‍यम वर्ग के परिवार हैं, हर महीने 500-600 रुपए तक बिजली बिल कम हुआ है।

साथियों,

इसी प्रकार से हमने मोबाइल फोन सस्ता किया, इंटरनेट सस्ता किया, गांव-गांव में कॉमन सर्विस सेंटर खोले जा रहे हैं, अनेक सुविधाएं गांव में पहुंची हैं। अब गांव के आदमी को रेलवे का रिजर्वेशन कराना हो तो उसे शहर नहीं आना पड़ता, एक दिन खराब नहीं करना पड़ता, 100-200-300 रुपया बस का किराया नहीं देना पड़ता। वो अपने गांव में ही कॉमन सर्विस सेंटर से ऑनलाइन रेलवे का बुकिंग करवा सकता है। उसी प्रकार से आपने देखा होगा अब उत्तराखंड में होम स्टे, लगभग हर गांव में उसकी बात पहुंच चुकी है। अभी कुछ समय पहले मुझे उत्तराखंड के लोगों से बात करने का मौका भी मिला था, जो बहुत सफलता के साथ होम स्टे चला रहे हैं। जब इतने यात्री आएंगे, पहले की तुलना में दोगुना-तीन गुना यात्री आना शुरू हुआ है। जब इतने यात्री आएंगे, तो होटल की उपलब्धता का सवाल भी स्वाभाविक है और रातों रात इतने होटल भी नहीं बन सकते लेकिन हर घर में एक कमरा बनाया जा सकता है अच्छी सुविधाओं के साथ बनाया जा सकता है। और मुझे विश्वास है, उत्तराखंड, होमस्टे बनाने में, सुविधाओं के विस्तार में, पूरे देश को एक नई दिशा दिखा सकता है।

साथियों,

इसी तरह का परिवर्तन हम देश के हर कोने में ला रहे हैं। इस तरह के परिवर्तन से देश 21वीं सदी में आगे बढ़ेगा, इसी तरह का परिवर्तन उत्तराखंड के लोगों को आत्मनिर्भर बनाएगा।

साथियों,

समाज की जरूरत के लिए कुछ करना और वोटबैंक बनाने के लिए कुछ करना, दोनों में बहुत बड़ा फर्क होता है। जब हमारी सरकार गरीबों को मुफ्त घर बनाकर देती है, तो वो उसके जीवन की सबसे बड़ी चिंता दूर करती है। जब हमारी सरकार गरीबों को 5 लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा देती है, तो वो उसकी जमीन बिकने से बचाती है, उसे कर्ज के कुचक्र में फंसने से बचाती है। जब हमारी सरकार कोरोना काल में हर गरीब को मुफ्त अनाज सुनिश्चित करती है तो वो उसे भूख की मार से बचाने का काम करती है। मुझे पता है कि देश का गरीब, देश का मध्यम वर्ग, इस सच्चाई को समझता है। तभी हर क्षेत्र, हर राज्य से हमारे कार्यों को, हमारी योजनाओं को जनता जनार्दन का आशीर्वाद मिलता है और हमेशा मिलता रहेगा।

साथियों,

आज़ादी के इस अमृत काल में, देश ने जो प्रगति की रफ़्तार पकड़ी है वो अब रुकेगी नहीं, अब थमेगी नहीं और ये थकेगी भी नहीं, बल्कि और अधिक विश्वास और संकल्पों के साथ आगे बढ़ेगी। आने वाले 5 वर्ष उत्तराखंड को रजत जयंती की तरफ ले जाने वाले हैं। ऐसा कोई लक्ष्य नहीं जो उत्तराखंड हासिल नहीं कर सकता। ऐसा कोई संकल्प नहीं जो इस देवभूमि में सिद्ध नहीं हो सकता। आपके पास धामी जी के रूप में युवा नेतृत्व भी है, उनकी अनुभवी टीम भी है। हमारे पास वरिष्‍ठ नेताओं की बहुत बड़ी श्रृंखला है। 30-30 साल, 40-40 साल अनुभव से निकले हुए नेताओं की टीम है जो उत्तराखंड के उज्‍जवल भविष्‍य के लिए समर्पित है।

और मेरे प्‍यारे भाईयों-बहनों,

जो देशभर में बिखर रहे हैं, वो उत्तराखंड को निखार नहीं सकते हैं। आपके आशीर्वाद से विकास का ये डबल इंजन उत्तराखंड का तेज़ विकास करता रहेगा, इसी विश्वास के साथ, मैं फिर से आप सबको बधाई देता हूं। आज जब देव भूमि में आया हूँ, वीर माताओ की भूमि में आया हूँ, तो कुछ भाव पुष्प, कुछ श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ, मैं कुछ पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं-

जहाँ पवन बहे संकल्प लिए,

जहाँ पर्वत गर्व सिखाते हैं,

जहाँ ऊँचे नीचे सब रस्ते

बस भक्ति के सुर में गाते हैं

उस देव भूमि के ध्यान से ही

उस देव भूमि के ध्यान से ही

मैं सदा धन्य हो जाता हूँ

है भाग्य मेरा,

सौभाग्य मेरा,

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

और धन्य धन्य हो जाता हूँ।

तुम आँचल हो भारत माँ का

जीवन की धूप में छाँव हो तुम

बस छूने से ही तर जाएँ

सबसे पवित्र वो धरा हो तुम

बस लिए समर्पण तन मन से

मैं देव भूमि में आता हूँ

मैं देव भूमि में आता हूँ

है भाग्य मेरा

सौभाग्य मेरा

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

और धन्य धन्य हो जाता हूँ।

जहाँ अंजुली में गंगा जल हो

जहाँ हर एक मन बस निश्छल हो

जहाँ गाँव गाँव में देश भक्त

जहाँ नारी में सच्चा बल हो

उस देवभूमि का आशीर्वाद लिए

मैं चलता जाता हूँ

उस देवभूमि का आशीर्वाद लिए

मैं चलता जाता हूँ

है भाग्य मेरा

सौभाग्य मेरा

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मंडवे की रोटी

हुड़के की थाप

हर एक मन करता

शिवजी का जाप

ऋषि मुनियों की है

ये तपो भूमि

कितने वीरों की

ये जन्म भूमि

में देवभूमि में आता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मेरे साथ बोलिये, भारत माता की जय ! भारत माता की जय ! भारत माता की जय !

बहुत-बहुत धन्यवाद !