PM’s address on the release of the digital version of Ramcharitmanas

Published By : Admin | August 31, 2015 | 17:18 IST
PM Narendra Modi launches digitised version of the Ramcharitmanas in New Delhi
Prime Minister Modi appreciates All India Radio's role in uniting the people and spreading awareness and information in India
Ramcharitmanas is a great epic. It contains the essence of India: PM Narendra Modi
The digital version of Ramcharitmanas will help people across the world: PM Modi

ये कार्यक्रम जहां हो रहा है, उस स्‍थान का नाम है पंचवटी और जब वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे, तब इस निवास स्‍थान में पंचवटी का निर्माण हुआ और नाम पंचवटी रखा गया था और शायद मैं मानता हूं आज का अवसर पंचवटी में होना अपने आप उसके कारण उसका एक कीर्तिमान बढ़ जाता है, क्‍योंकि रामचरितमानस की बात हो और पंचवटी न हो, तो फिर वो रामचरितमानस अधूरा लगता है और इसलिए ये अपने आप में एक सुफल संयोग है।

आज के इस अवसर को मैं अलग-अलग रूप में अनुभव करता हूं। कभी-कभी सरकार में लोग नौकरी करते-करते जीवन ऐसा बन जाता है, एक मशीनी गतिविधि बन जाती है और वही सुबह जाना, शाम को आना, वही फाइलें, वही बॉस, वहीं assistant, एक जिंदगी के बड़े महत्‍वपूर्ण 30-35 साल उसी में गुजर जाते है और ज्‍यादातर का मन बन जाता है कि चलो अब इस पाइपलाइन में घुसे है 30-35 साल के बाद उधर निकलेंगे। जिस रूप में निकलेंगे, निकलेंगे.. लेकिन यह अवसर देख करके ध्‍यान में आता है कि एक सरकार का मुलाजिम, जिसमें एक तड़प हो, कुछ करने की अदम्‍य इच्‍छा हो, वो कितनी बड़ी विरासत छोड़ करके जाता है और इसलिए सबसे पहले मैं आकाशवाणी के उस एक सामान्‍य अधिकारी जिनके परिवारजन.. ये औरों के लिए भी प्रेरक बन सकता है। हमारी जिंदगी व्‍यर्थ नहीं जा रही है। हम जो फाइलों पर साइन करते है वो बेकार नहीं होती, कभी न कभी इतिहास को वो नया मोड़ देते है। ये आज की घटना उस बात का जीता-जागता सबूत है।

दूसरी बात, करीब-करीब 20-22 साल तक लगातार इसका रिकार्डिंग हुआ है। 22 साल तक उस team को बनाए रखना, उस rhythm को बनाए रखना और उसे उतना ही प्राणवान बनाए रखना, वरना तो यार बहुत हो गया अब कितने ऐपिसोड हो गए, अब तो लोगों को आदत हो गई, चलो निकाल दो। नहीं। इससे जुड़े हुए कलाकार शायद आज हिन्‍दुस्‍तान के बड़े कलाकारों की संख्‍या में उनका नाम नहीं होगा, लेकिन संगीत के साधक के रूप में। 22 साल करीब-करीब ये साधना कम नहीं होती जी, 14 लोगों ने team बन करके काम किया, 7 लोग हमारे बीच नहीं रहे, सबको आज सम्‍मानित करने का आज अवसर मिला और ये सिर्फ संगीत नहीं है। ये संगीत की भी साधना है, संस्‍कृति की भी साधना है और संस्‍कार की भी साधना है। और ये काम, देखिए हमारे देश में कई उतार-चढ़ाव है, वैचारिक धरातल पर भी उतार-चढ़ाव आए हैं। आज अगर कोई ओम बोल दे तो हफ्तेभर विवाद चलता है कि ओम कैसे बोला जा सकता है। देश :::: सांम्‍प्रदायिक है। ऐसे देश में रामचरितमानस को किसी ने question नहीं किया, वो आज भी चल रहा है। हो सकता है आज के बाद किसी का ध्‍यान जाए और तूफान खड़ा कर दे, तो मैं नहीं जानता हूं। लेकिन कभी-कभार हम देखते है कि बहुत सालों से सुनते आए है, क्‍या बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं है हमारी। जवाब खोजने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है। यही बात है कि जिसके कारण हस्‍ती मिटती नहीं है हमारी, यही तो रामचरितमानस है, यही तो परम्‍परा है, यही संस्‍कार है।

हजारों साल से दुनिया में हमारी जो सबसे बड़ी विशेषता है जिसके लिए विश्‍व के किसी भी समाज को हमारे प्रति ईर्ष्‍या हो सकती है, वो है हमारी परिवार व्‍यवस्‍था और हम बचे हैं बने है उसका एक कारण.. जब तक हमारी परिवार व्‍यवस्‍था प्राणवान रही है, हम ताकतवर रहे है और उस परिवार व्‍यवस्‍था को प्राणवान बनाने में बहुत बड़ी भूमिका अगर किसी ने निभाई है तो रामचरितमानस और राम जी का परिवार जीवन है। मर्यादा पुरूषोत्‍तम राम.. मर्यादाओं में किसने कैसे जीना परिवार में। किसकी कैसे मर्यादा को पालन करना, कैसा व्‍यवहार करना, आचरण का उत्‍तम संस्‍कार का हमें दर्शन होता है। रामचरितमानस की क्‍या ताकत देखिए हजारों साल हो गए, पीढि़यां बीत गई लेकिन वहीं भाव, वही परम्‍परा, वही संस्‍कार, वही संदेश आज भी जीवित है। आज एक बात हम कहें, लिखित कहें लेकिन संदेश पहुंचते-पहुंचते सात दिन में उसका अर्थ अलग ही हो जाता है। ऐसा कौन सा सामर्थ्‍य होगा कि जिसमें आज भी अनेक व्‍याख्‍याएं होने के बाद भी मूल तत्‍व को कहीं पर भी खरोच नहीं आई है। ऐसी कृति मानव को इस धरती के साथ जोड़ने का इतना बड़ा काम है।

आज भी अगर हम मॉरिशस में जाए दुनिया के कई देशों में, जो लोग गुलामी के कालखंड में मजदूर के रूप में उनको उठा करके ले जाया गया, कुछ नहीं था, निर्धन थे। लेकिन तुलसीकृत रामायण साथ ले जाना नहीं भूले, हनुमान चालीसा ले जाना नहीं भूले और डेढ़ सौ साल अलग जीवन, भाषा भूल गए, पहनावा बदल गया, नाम में बदलाव आया, लेकिन एक अमानत उनके पास बची जिससे आज भी भारत के साथ उनका नाता जुड़ा रहा है और कैसे जुड़ता है मुझे बहुत साल पहले की घटना याद है। वेंस्‍टइंडिज की एक क्रिकेट टीम भारत में खेलने के लिए आई थी। बहुत साल पहले की बात कर रहा हूं और उसके मैनेजर का मेरे यहा फोन आया। अब आज से 30-35, 40 साल पहले मुझे कोई पहचानता नहीं था, न कोई नाम न कोई जान। उनका टेलीफोन आया मुझे आश्‍चर्य हुआ, कि बोले वेंस्‍टइंडिज के क्रिकेटर के मैनेजर आप से बात करना चाहते है, मिलना चाहते है। तो किसी ने नाम दिया होगा, कही परिचय निकला होगा। मैंने कहा वेंस्‍टइंडिज टीम से मेरा तो वैसे भी क्रिकेट के खेल से.. मैं कोई खिलाड़ी तो हूं नहीं, तो पता चला तो बोले रामरिखीनाम है इनका और वो अपनी पत्‍नी के साथ आए है। मूल भारतीय है, तो मैं उनको मिलने गया तो वहां एचआरडी मिनिस्‍ट्री में काम करते थे और टीम मैनेजर के रूप में आए थे। तो मैंने कहा ये ऋषि शब्‍द कहा से आया तो बोले ऋषि में से आया हुआ होगा, फिर उनकी पत्‍नी का नाम पूछा तो बोले सीता। वो भारत पहली बार आए थे। लेकिन उनको अपना और मैं जब गया तो specially वो भारतीय परिवेश पहन करके बैठे थे। यानी एक प्रकार से एक ग्रंथ डेढ़ सौ साल के बाद भी अपनेपन से जोड़ करके रखता है] इसका ये उत्‍तम अनुभव.. और इस अर्थ में रामचरितमानस आज digital form में ये सबके सामने जा रहा है।

आकाशवाणी की ताकत बहुत बड़ी है, कितनी ही चीजें क्‍यों न बदल जाए, लेकिन कुछ मूलभूत चीजें होती है, जो अपनी.. बुलंदी कभी खोती नहीं है। हिन्‍दुस्‍तान के जीवन में आकाशवाणी की ये बहुत बड़ी ताकत है। लोगों को भले एहसास न होता, हो मुझे तो एहसास है। हम लोग भली-भांति समझते है आकाशवाणी की ताकत क्‍या है। ये मेरा एक ऐसा अनुभव है जो मैं कभी भूल नहीं सकता। मैं हिमाचल में भारतीय जनता पार्टी के संगठन का काम करता था। अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। और मैं हिमाचल में काम करता था, तो एक दिन मैं अपने दौरे पर जा रहा था तो ऐसे ही पहाड़ों में एक ढाबे पर रूक करके चाय पीने की सोचा, तो गाड़ी को रोकी। जब मैं नीचे उतरा तो जो ढाबे वाला था, चाय वाला उसने मुझे लड्डू खिलाया। मैंने कहा भई मुझे चाय पीनी है। अरे बोले साहब लड्डू खाओ पहले, मौज करो। मैंने कहा क्‍या बात है। बोले अरे आज अटल जी ने बम फोड़ दिया, मैंने कहा अटल जी ने बम फोड़ दिया। अरे बोले अभी-अभी रोडियो पर सुना है कि भारत ने बम फोड़ा है। न्‍यू‍क्लियर टेस्‍ट हुआ था। मुझे वो पहली खबर आकाशवाणी के माध्‍यम से एक चाय वाले, ढाबे वाले ने दी।

यानी हम जिन चीजों का कभी-कभी महत्‍व नहीं समझते, वो कितना बड़ा होता है ओर सिर्फ खबर नहीं, सिर्फ खबर नहीं। हिमायल की पहाडि़यों में दूर-सुदूर अकेला चाय के ढाबे वाला, इस समाचार से अपने आपको इतना गौरवान्वित महसूस कर रहा है कि गरीब होने के बावजूद भी अपनी दुकान की मिठाई मुफ्त में बांट रहा है। संदेश की ताकत क्या है, देखिए और समय ज्‍यादा नहीं हुआ होगा, ये 5 बजे declare हुआ होगा शाम को और मैं करीब 6 सवा 6 बजे वहां से गुजर रहा हूं। कहने का तात्‍पर्य ये कि हमारे ये communication अपने आप में इतने बड़े देश में बहुत अनिवार्य है, बहुत आवश्‍यक है और आज के competition के युग में आकाशवाणी को स्‍पर्धा में फंसने की जरूरत नहीं है जी। उसने तो अपनी मूलभूत धाराओं को पकड़ करके जन-जन के दिलों तक जुड़े रहना ओर देश को जोड़ के रखना और भविष्‍य के साथ उनको उत्‍साहित करते रहना ये उसका काम है। और उस काम को हम कैसे निभाएं।

युग बदलता जाए वैसे बदलाव आवश्‍यक होता है कायाकल्प जरूरी होते है ओर जब कायाकल्प की बात करता हूं तब आत्‍मा वही रहता है, समयाकूल बदलाव आता है। ये डिजिटल रूप उसका एक सही कदम है। हम लोग, अब मुझे बताया गया आकाशवाणी के पास 9 लाख घंटों का recording material उपलब्‍ध है, 9 लाख घंटे। शायद दुनिया में किसी एक ईकाई के पास इतना खजाना नहीं होगा जी और उस समय आकाशवाणी का जो रूप-रंग था बाद में जो हमारे यहां जो चला माहौल, अलग बात है, मैं जरूर मानता हूं कि आ‍काशवाणी के पास भारत की मूल आवाज, भारत का मूल चिंतन, भारत की मूल undiluted ये उसमें उपलब्ध होगा। ये 9 लाख घंटों का जब digital version तैयार होगा फिर उसमें भाषाओं का उपयोग किया जा सकता है कि नहीं कितनी बड़ी सेवा होगी, कितना बड़ा खजाना ओर एक प्रकार से digital history का ये सबसे बड़ा resource material बन सकता है। जो शायद आने वाले दिनों में जो पीएचडी करना चाहते होगे उनके लिए एक बहुत अवसर बनेगा। और भारत का दूरदर्शन का काम तो ऐसा है कि हिन्‍दुस्तान की सभी यूनिवर्सिटी में एकाध-एकाध विद्यार्थी ने सिर्फ आकाशवाणी के योगदान पर पीएचडी करनी चाहिए, रिसर्च करनी चाहिए। हम लोगों के स्‍वभाव नहीं है। एक एकाध प्रेमचंद की कथा पर तो रिसर्च कर लेते है, लेकिन इतना बड़ा खजाना। आगे चल करके Human Resource Department के लोग, Culture Department के लोग सोचें कि हमारे नौजवान इस खजाने का research करके क्‍या दे सकते है दुनिया को। हम आगे के लिए क्‍या सोचे। विश्‍व के लोग भी अंतर्राष्‍ट्रीय योगा दिवस ने सिद्ध कर दिया है कि दुनिया भारत को जानने-समझने के लिए आतुर है, तैयार है। वे अंतर्राष्‍ट्रीय योगा दिवस ने ये message दिया है कि भारत के पास कुछ है जो हमें जानना है, पाना है ये मूढ़ बना है तब हमारा कर्तव्‍य बनता है कि हम इसको कैसे पहुंचाए और ये अगर हम कर सकते है तो हम कितनी बढ़ी सेवा कर सकते है।

इनदिनों आकाशवाणी एक अच्‍छा काम भी किया है.. आकाशवाणी नहीं, रेडियों के कारण धीरे-धीरे जो आज एफएम चैनल वगैरह सब जो दुनिया चलती है। लोग कहते है भ्रष्‍टाचार के लिए क्‍या किया? हमारे यहां FM चैनल सारी पहले सरकारी खजाने में 80 सौ करोड़ रुपया देती थी। अभी आक्‍शन चल रहा है, आक्‍शन से देंगे ट्रांसपैरेंसी, परिणाम क्‍या आया मालूम है अब तक करीब-करीब साढ़े 11 सौ करोड़ की बोली बोल चुके है, अभी तो बोली चल रही है और उसके जो rules and regulations है उसके हिसाब से सरकार के खजाने में जो 80 सौ करोड़ आते थे एक स्थिति आएंगी 27 सौ-28 सौ करोड़ रुपए आएगे। व्‍यवस्‍थाओं को transparent करने से व्‍यवस्‍थाओं को आधुनिक टेक्‍नोलोजी से जोड़ करके भ्रष्‍टाचार से मुक्ति कैसे पाई जा सकती है। कोई नया आर्थिक बोझ डाले बिना भी देश के विकास में धन कैसे उपलब्‍ध किया जो सकता है इसका एक बेहतरीन नमूना.. ये आकाशवाणी और रेडियो के संबंध में जो भारत सरकार ने अरुण जी के नेतृत्‍व में किया है, उसका ये परिणाम है।

तो हर दिशा में हम इस काम को आगे बढ़ा रहे है और मुझे आशा है कि ये digital version के कारण विश्‍व के लोग जो जानना चाहते है, समझना चाहते है उनके लिए उपकारक होगा। भोपाल केंद्र के लोगों ने गौरवपूर्ण काम किया है; आने वाले दिनों में भोपाल में एक विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन हो रहा है। आकाशवाणी सोचे विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन में जो delegate आने वाले है भोपाल में ही हो रहा है तो ये उनको गिफ्ट के रूप में दिया जाए, ताकि एक souvenir..एक सच्चा souvenir ये बनेगा, जो विश्‍वभर से गरीब, काफी बड़ी तादात में लोग आ रहे है तो एक बहुत बड़ा अवसर बनेगा।

मैं फिर एक बार विभाग को, प्रसार भारती को, आकाशवाणी को ये बहुमूल्य चीजें संभाले रखने के लिए बधाई देता हूं। और देशवासियों को ये नजराना देते हुए मैं गर्व महसूस करता हूं। मैं आभारी हूं डॉ. कर्ण सिंह जी का और मैंने देखा है कि हमारे कर्ण सिंह जी इन चीजों से ऐसे जुड़े हुए है, इसका इतना महामूल्‍य मानते है वो, कि उनको कोई राजकीय विचारधारा कभी बाधा नहीं बनती है और हमेशा ऐसी चीजों को वो आर्शीवाद देते रहें, प्रोत्‍साहन देते रहें। आज विशेषरूप आए इसलिए मैं उनका आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद!

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‘ବିକଶିତ ଭାରତ ସଙ୍କଳ୍ପ ପାଇଁ ନିଶାମୁକ୍ତ ଯୁବ’ ଅଭିଯାନର ଶୁଭାରମ୍ଭ ଅବସରରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଅଭିଭାଷଣର
August 02, 2026
I urge every citizen, especially our youth, to join this movement: PM
Today, as the nation has set the goal of a Viksit Bharat, it is imperative that the country's youth remain fit, brimming with self-confidence and permanently steer clear of drugs: PM
We must protect every youth from falling into the trap of addiction: PM
Society’ support, yoga and meditation give strength to our inner selves against addiction and today facilities like rehabilitation centers also help quit addiction: PM
Even if a youth has mistakenly fallen into the trap of addiction, it absolutely does not mean that all doors are closed for them: PM
We must always remember that if a child in the house falls victim to addiction, we must not hide it but seek medical help to free the child from addiction: PM
We should also create a culture of open communication with children in the family, so that you can hold their hand before they get caught in such a whirlpool: PM
I appeal to our professors to discuss the perils of drug abuse with their students and spearhead a movement against addiction on campuses to achieve significant results: PM

ନମସ୍କାର!

ଆଜି, ଆମେ ସମସ୍ତ ଦେଶବାସୀ ଏକ ମହାନ ଏବଂ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ସଙ୍କଳ୍ପ ସାକାର ପାଇଁ ଏକତ୍ରିତ ହୋଇଛୁ। ଏହି ପବିତ୍ର ଅବସରରେ, ଏହି ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ନେଇ ଆୟୋଜିତ ଏବଂ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ସହ ଜଡିତ ସମସ୍ତ ପୂଜ୍ୟ ସନ୍ଥମହାତ୍ମାମାନଙ୍କୁ, ବିଭିନ୍ନ ରାଜ୍ୟର ପ୍ରତିନିଧିତ୍ୱ କରୁଥିବା ସମସ୍ତ ରାଜ୍ୟପାଳ, ସମସ୍ତ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ, ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ଜନପ୍ରତିନିଧିବୃନ୍ଦ ଏବଂ ଦେଶର ୨୮ ହଜାରରୁ ଅଧିକ ସ୍ଥାନରୁ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ଯୋଡ଼ିହୋଇଥିବା ଏକ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଯୁବ ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ହାର୍ଦ୍ଦିକ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି। ଆଜି ଆମେ ସମସ୍ତେ ଯେଉଁ ଅଭିଯାନର ସାକ୍ଷୀ ହୋଇଛୁ, ସେହି ଅଭିଯାନ କେବଳ ଜଣେ ବ୍ୟକ୍ତି ପାଇଁ ନୁହେଁ; ଏହା ପରିବାର ପାଇଁ, ସମାଜ ପାଇଁ ଏବଂ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ କଥା ହେଉଛି, ଏହା ସମଗ୍ର ରାଷ୍ଟ୍ର ପାଇଁ ଉତ୍ସର୍ଗୀକୃତ ଏକ ଅଭିଯାନ।

 ବନ୍ଧୁଗଣ,

‘ବିକଶିତ ଭାରତ ସଙ୍କଳ୍ପ ଅଭିଯାନ’ ପାଇଁ ‘ନିଶା ମୁକ୍ତ ଯୁବ’ ଆନ୍ଦୋଳନର ନାମ ହିଁ ଏହାର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବରେ ପ୍ରତିଫଳିତ କରୁଛି। ଦେଶ ଏକ ବିକଶିତ ଭାରତର ଲକ୍ଷ୍ୟ ହାସଲ କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରୁଥିବାରୁ, ଆମର ଯୁବପିଢ଼ି ଶାରୀରିକ ଏବଂ ମାନସିକ ଭାବରେ ସୁସ୍ଥ ରହିବା, ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ହେବା ଏବଂ ନିଶା ସେବନ ଭଳି ଘାତକ ଅଭ୍ୟାସର କବଳରୁ ସର୍ବଦା ମୁକ୍ତ ରହିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଜରୁରୀ। ଏହା ହେଉଛି ଅଭିଯାନର ମୂଳ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ। ସେଥିପାଇଁ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଏହି ସଙ୍କଳ୍ପ ନେବାକୁ ହେବ ଯେ, ଆମର ଯୁବପିଢ଼ି ନିଶା ଓ ଡ୍ରଗ୍ସର କୁପ୍ରଭାବକୁ ଭଲଭାବରେ ବୁଝିବେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ କ୍ଷେତ୍ରରେ ସଚେତନ ରହିବେ ଏବଂ ଏହାଠାରୁ ଦୂରେଇ ରହିବେ। ଏହି ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ସାକାର କରିବାରେ ‘ଜାତୀୟ ନିଶା ମୁକ୍ତ ଯୁବ ଅଭିଯାନ’ ଏକ ବଡ଼ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କରିବ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

କାଶୀର ସାଂସଦ ଭାବରେ, ମୁଁ ଖୁସି ଯେ, ଏହି ଅଭିଯାନ ଗତ ବର୍ଷ କାଶୀର ପବିତ୍ର ଭୂମିରୁ ଏକ ପାଇଲଟ୍ ପ୍ରକଳ୍ପ ଭାବରେ ଆରମ୍ଭ କରାଯାଇଥିଲା। ସେଥିପାଇଁ ଏହି ଅଭିଯାନରେ ବୈଜ୍ଞାନିକ ସ୍ପଷ୍ଟତା ସହିତ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଶକ୍ତି, ସନ୍ଥମହାତ୍ମାମାନଙ୍କର ଆଶୀର୍ବାଦ ଏବଂ ଆମର ମହାନ ସାଂସ୍କୃତିକ ଐତିହ୍ୟର ପ୍ରେରଣା ମଧ୍ୟ ନିହିତ ରହିଛି। ଏଥିରେ ସେହି ସାଂସ୍କୃତିକ ସମର୍ପଣର ଭାବନା ମଧ୍ୟ ଜଡିତ ରହିଛି, ଯାହା ଶତାବ୍ଦୀ ଶତାବ୍ଦୀ ଧରି ନିଶାକୁ ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ କରିଆସିଛି। ଏହି କାରଣରୁ ଦେଶର ୧୨୫ରୁ ଅଧିକ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ସଂଗଠନ କୋଟି କୋଟି ଦେଶବାସୀଙ୍କ କଲ୍ୟାଣ ପାଇଁ ଆଜି ଆମ ସହ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଛନ୍ତି। ସାମାଜିକ ସଂଗଠନ ଏବଂ ବିଭିନ୍ନ ଏନ୍‌ଜିଓ ମଧ୍ୟ ଏହି ଦିଗରେ ସଙ୍କଳ୍ପବଦ୍ଧ ହୋଇଛନ୍ତି। ସମସ୍ତେ ମିଶି ‘କାଶୀ ଘୋଷଣାନାମା’ ମାଧ୍ୟମରେ ଏକ ରୋଡମ୍ୟାପ୍ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରିଛନ୍ତି। ଆଜି ଆମେ ଦେଖୁଛୁ, କାଶୀରୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିବା ସେହି କଲ୍ୟାଣକାରୀ ପଦକ୍ଷେପ ଏବେ ଏକ ଜାତୀୟ ପ୍ରକଳ୍ପରେ ପରିଣତ ହୋଇଛି। ଆଜିଠାରୁ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ‘ନିଶାମୁକ୍ତ ଯୁବ’ ଅଭିଯାନର ଶୁଭାରମ୍ଭ ହେଉଛି।

 ବନ୍ଧୁଗଣ,

କିଛି କାମ ଏପରି ଥାଏ, ଯାହାକୁ କୌଣସି ବ୍ୟକ୍ତି ଏକାକୀ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ ବେଳେବେଳେ ନିରାଶ ହୋଇଯାଏ, ଥକ୍କାପଣ ଅନୁଭବ କରେ ଏବଂ ଦୀର୍ଘ ଯାତ୍ରା କରିବା ପାଇଁ ମନ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇପାରେ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ସେହି କାମ ଯେତେବେଳେ ଏକ ସାମୂହିକ ଅଭିଯାନର ରୂପ ନିଏ, କୋଟି କୋଟି ଲୋକ କାନ୍ଧକୁ କାନ୍ଧ ମିଳାଇ ଏକାଠି ଆଗକୁ ବଢ଼ନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ଯେଉଁମାନେ ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ଭାବେ କିଛି କରିପାରୁ ନଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଏକ ନୂତନ ଶକ୍ତି ମିଳିଥାଏ। ସାମୂହିକ ପ୍ରୟାସର ଏକ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଶକ୍ତି ଥାଏ ଏବଂ ଆଜି ସେହି ଶକ୍ତିକୁ ନେଇ ଏହି ଅଭିଯାନ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁବ ହୃଦୟକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରିବାକୁ ଯାଉଛି। କିଛି ସମୟ ପୂର୍ବରୁ ଦେଶର ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ଯୁବକ ଓ ଯୁବତୀ ନିଶାମୁକ୍ତିର ଶପଥ ନେଇଛନ୍ତି। ଆପଣମାନେ ନିଜ ଜୀବନକୁ ନିଶାଠାରୁ ଦୂରେଇ ରଖିବାର ସଙ୍କଳ୍ପ ନେଇଛନ୍ତି। ଆପଣମାନେ ନିଜ ବିଦ୍ୟାଳୟ, ନିଜ ମହାବିଦ୍ୟାଳୟ ଏବଂ ନିଜ ସମାଜରେ ନିଶାମୁକ୍ତିର ବାର୍ତ୍ତା ପହଞ୍ଚାଇବା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ସଙ୍କଳ୍ପବଦ୍ଧ ହୋଇଛନ୍ତି।

 ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆଜି ନିଆଯାଇଥିବା ଏହି ସଙ୍କଳ୍ପ ଆଗାମୀ ୧୦୦ ସପ୍ତାହ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏଭଳି ନିରନ୍ତର ଆଗକୁ ବଢ଼ିଚାଲିବ। ପ୍ରତ୍ୟେକ ରବିବାର କଳା, ସଂସ୍କୃତି, କ୍ରୀଡ଼ା, ଧ୍ୟାନ, ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକତା ଏବଂ ସମାଜ ସେବା ସହ ଜଡ଼ିତ ବିଭିନ୍ନ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ଆୟୋଜିତ ହେବ। ନିଶାମୁକ୍ତ ଜୀବନର ବାର୍ତ୍ତା ନୂତନ ଲୋକଙ୍କ ପାଖରେ ପହଞ୍ଚିବ। ଆଗାମୀ ୧୦୦ଟି ରବିବାର ନିଶାମୁକ୍ତ ଭାରତ ଦିଗରେ ୧୦୦ଟି ସୁଦୃଢ଼ ପଦକ୍ଷେପ ପ୍ରମାଣିତ ହେବ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆଜି ହଜାର ହଜାର ବିଦ୍ୟାଳୟ, ମହାବିଦ୍ୟାଳୟ ଏବଂ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟର ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ସହ ଅନଲାଇନ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଛନ୍ତି। ‘ମାଇ ଭାରତ’ର ସ୍ୱେଚ୍ଛାସେବକମାନେ ମଧ୍ୟ ଲକ୍ଷାଧିକ ସଂଖ୍ୟାରେ ଆଜି ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ସାମିଲ ହୋଇଛନ୍ତି। ମୋର ଏନ୍‌ଏସ୍‌ଏସ୍‌’ର ଯୁବ ବନ୍ଧୁମାନେ ମଧ୍ୟ ଆଜି ଆମ ସହ ଉପସ୍ଥିତ ଅଛନ୍ତି। ଦେଶର ବିଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳରୁ, ବିଭିନ୍ନ ଅନୁଷ୍ଠାନରୁ ଏବଂ ବିଭିନ୍ନ ପୃଷ୍ଠଭୂମିରୁ ଏକ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଯୁବପିଢ଼ି ଆଜି ଏକାଠି ହୋଇଛନ୍ତି। ମୋର ଆପଣମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନୁରୋଧ, ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ଏହି ବିଶାଳ ଆନ୍ଦୋଳନର ନେତୃତ୍ୱ ନିଅନ୍ତୁ। ଆପଣମାନେ ମୋର ଏହି ବିଶ୍ୱାସକୁ ଆହୁରି ଦୃଢ଼ କରିଛନ୍ତି ଯେ, ଭାରତର ଯୁବପିଢ଼ି କେତେ ସଚେତନ, କେତେ ସମବେଦନାପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ନିଜର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପ୍ରତି କେତେ ଗମ୍ଭୀର। ଏହି ଅଭିଯାନର ସଫଳତା ପାଇଁ ମୁଁ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାମନା ଜଣାଉଛି।

 ମୋର ଯୁବ ବନ୍ଧୁମାନେ,

ଆପଣମାନେ ଭାରତର ଅମୃତ ପିଢ଼ି (ଅମୃତ ଭଳି ଯୁଗର ପିଢ଼ି)। ଆସନ୍ତା ୨୦-୨୫ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣମାନେ ନିଜ ଜୀବନକୁ ଦିଗ୍‌ଦର୍ଶନ ଦେବେ ଏବଂ ଆପଣମାନେ ହିଁ ୨୦୪୭ ମସିହା ସୁଦ୍ଧା ଦେଶକୁ ବିକଶିତ ଭାରତର ଲକ୍ଷ୍ୟରେ ପହଞ୍ଚାଇବେ। ସେହି ବିକଶିତ ଭାରତର ଶିଖରରେ ଆପଣମାନେ ହିଁ ରହିବେ ଏବଂ ତାହାର ସମସ୍ତ ସଫଳତା ଓ ଗୌରବର ଫଳ ଉପଭୋଗ କରିବାର ସୁଯୋଗ ମଧ୍ୟ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ହିଁ ମିଳିବ। ଦେଶକୁ ଆପଣମାନଙ୍କର ଶକ୍ତି, ଆପଣମାନଙ୍କର କଳ୍ପନାଶକ୍ତି ଏବଂ ଆପଣମାନଙ୍କର ପ୍ରତିଭାର ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି। ସେଥିପାଇଁ ଦେଶର ସ୍ୱାର୍ଥରେ ଏବଂ ନିଜ ଜୀବନର ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଭବିଷ୍ୟତ ପାଇଁ, ନିଜକୁ ନିଶାମୁକ୍ତ ରଖିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଜରୁରୀ। ନିଶା ମଣିଷର ଲକ୍ଷ୍ୟରୁ ଧ୍ୟାନକୁ ବିଚ୍ୟୁତ କରିଦିଏ ଏବଂ ଧୀରେ ଧୀରେ ଜଣେ ଯୁବକଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ନିଜ ସ୍ୱପ୍ନଠାରୁ ଦୂରକୁ ନେଇଯାଏ। କିଛି ସମୟ ପୂର୍ବରୁ ଯେଉଁ ଯୁବ ବନ୍ଧୁମାନେ ନାଟ୍ୟ ପରିବେଷଣ କରିଥିଲେ, ସେମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କମ୍ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ ଖୁବ ସୁନ୍ଦର ଭାବରେ ସମସ୍ୟାକୁ ଉପସ୍ଥାପନ କରିଥିଲେ। ସେମାନେ ଏହି ସମସ୍ୟାରୁ ସୃଷ୍ଟି ହେଉଥିବା ସଙ୍କଟକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖାଇଥିଲେ ଏବଂ ଏଥିରୁ ମୁକ୍ତି ପାଇବା ପାଇଁ ସାମୂହିକ ପ୍ରୟାସର ପଥ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଥିଲେ। ନାଟ୍ୟ ପରିବେଷଣଟି ସଂକ୍ଷିପ୍ତ ଥିଲା, କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ଯେପରି କହିଥିଲେ- “ଆସନ୍ତୁ, ଆମେ ନାଟକ ଦେଖିବା!” ଏହା କେବଳ ଏକ ନାଟକ ନଥିଲା; ଏହା ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଏକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ବାର୍ତ୍ତା ଥିଲା। ଏହା ଆମକୁ ସଚେତନ କରୁଥିଲା, ଆମକୁ ଜାଗ୍ରତ କରୁଥିଲା ଏବଂ ଏହି ସମସ୍ୟା ବିରୋଧରେ ସଂଘର୍ଷ କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରେରଣା ଯୋଗାଉଥିଲା।

 ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆଜିକାଲି ଆମେ ଦେଖୁଛୁ, ଆଜିର ଯୁବପିଢ଼ି ଷ୍ଟାର୍ଟଅପ୍ ଜଗତରେ ନିଜର ଛାପ ଛାଡ଼ୁଛନ୍ତି, କୃତ୍ରିମ ବୁଦ୍ଧିମତ୍ତା (ଏଆଇ) କ୍ଷେତ୍ରରେ ନେତୃତ୍ୱ ନେଉଛନ୍ତି, କ୍ରୀଡ଼ା କ୍ଷେତ୍ରରେ ତ୍ରିରଙ୍ଗାକୁ ଗର୍ବର ସହ ଉଡ଼ାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ମହାକାଶରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ବିଜ୍ଞାନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ନୂଆ ନୂଆ କୀର୍ତ୍ତିମାନ ସ୍ଥାପନ କରୁଛନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ବନ୍ଧୁଗଣ, ଯେତେବେଳେ କୌଣସି ଯୁବକ ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟର ଶିକାର ହୋଇଥାଏ, ସେତେବେଳେ କେବଳ ଜଣେ ଯୁବକ ପରାଜିତ ହୁଏ ନାହିଁ; ଏକ ସ୍ୱପ୍ନ ପରାଜିତ ହୁଏ। ସେହି ସ୍ୱପ୍ନର ଅକାଳ ମୃତ୍ୟୁ ଘଟେ। ଏକ ପରିବାର ଭାଙ୍ଗିପଡ଼େ। ସମଗ୍ର ପରିବାର ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ ଏବଂ ସମାଜରେ ମଧ୍ୟ ଅବହେଳା ଓ ଘୃଣାର ଶିକାର ହୁଏ। ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ କେବଳ ଶରୀରକୁ କ୍ଷତି ପହଞ୍ଚାଏ ନାହିଁ; ଏହା ଜଣେ ମାଆଙ୍କ ମୁହଁରୁ ହସ ଛଡ଼ାଇ ନେଇଥାଏ। ଏହା ଜଣେ ବାପାଙ୍କର ସ୍ୱପ୍ନକୁ ଚୂର୍ଣ୍ଣବିଚୂର୍ଣ୍ଣ କରିଦିଏ। ଏହା ଜଣେ ଭଉଣୀଙ୍କ ରାକ୍ଷୀର ଆଶାକୁ ଦୁର୍ବଳ କରିଦିଏ। ଏହା ଜଣେ ସାନ ଭାଇଙ୍କ ଆଦର୍ଶକୁ ଛଡ଼ାଇ ନେଇଥାଏ। ଘରର ବୟୋଜ୍ୟେଷ୍ଠମାନେ ପ୍ରତିଦିନ ଏହି ଯନ୍ତ୍ରଣାକୁ ଅନୁଭବ କରନ୍ତି ଯେ, ସେମାନଙ୍କର ନିଜ ସନ୍ତାନ ଧୀରେ ଧୀରେ ନିଜକୁ ହରାଇ ଚାଲିଛି, ନିଜକୁ ଧ୍ୱଂସ କରୁଛି, ତିଳ ତିଳ କରି କ୍ଷୟ ହେଉଛି ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ଆଖି ଆଗରେ ହିଁ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଉଛି। ଯେତେବେଳେ ପରିବାର ଓ ସମାଜରେ ଏପରି ଘଟଣା ଘଟେ, ସେତେବେଳେ କେଉଁଠି ନା କେଉଁଠି ରାଷ୍ଟ୍ରର ଶକ୍ତି ମଧ୍ୟ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇପଡ଼େ। ଏହି କାରଣରୁ ଶତ୍ରୁ ଦେଶମାନେ ମଧ୍ୟ ଷଡଯନ୍ତ୍ର କରି ଆମ ଦେଶର ଯୁବପିଢ଼ିଙ୍କୁ ନିଶାର କବଳକୁ ଟାଣି ନେବା ପାଇଁ କୌଣସି ଉଦ୍ୟମ ବାକି ରଖନ୍ତି ନାହିଁ। ଡ୍ରଗ୍ସ ଯୋଗାଣ ଦ୍ୱାରା ଅର୍ଥ ଉପାର୍ଜନ କରିବା ଏବଂ ଭାରତ ଭଳି ଏକ ଦେଶକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିବା ସେମାନଙ୍କ ଆତଙ୍କବାଦୀ ଷଡଯନ୍ତ୍ରର ଏକ ଅଂଶ। ସେଥିପାଇଁ ଆମକୁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁବକଙ୍କୁ ନିଶାର କବଳରେ ପଡ଼ିବାରୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖିବାକୁ ହେବ।

 ବନ୍ଧୁଗଣ,

ନିଶାମୁକ୍ତ ରହି ଆପଣମାନଙ୍କୁ ନିଜର ସାମର୍ଥ୍ୟର ସୁରକ୍ଷା କରିବାକୁ ହେବ। ଆପଣମାନେ ସବୁବେଳେ ମନେ ରଖିବେ ଯେ, ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ କିଛି ସମୟ ପାଇଁ ହୁଏତ ନିଶାର ‘ଉଚ୍ଚ’ ଉନ୍ମାଦ ଅନୁଭୂତି ଦେଇଥାଏ, କିନ୍ତୁ ଏହା ଆପଣଙ୍କ କ୍ୟାରିୟର ଏବଂ ପାରିବାରିକ ଜୀବନକୁ ‘ନିଚ’ ସ୍ତରକୁ ଟାଣି ନେଇଯାଏ। ତେଣୁ କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ମଧ୍ୟ ଆମେ ନିଶାକୁ ସାମାଜିକ ସ୍ୱୀକୃତି ଦେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମ ସମାଜରେ ସବୁବେଳେ ନିଶାକୁ ଏକ ସାମାଜିକ କୁପ୍ରଥା ଭାବେ ଦେଖାଯାଇଛି। ଆମ ସନ୍ଥ ଓ ଗୁରୁମାନେ ସଦାସର୍ବଦା ଏହାଠାରୁ ଦୂରେଇ ରହିବା ପାଇଁ ଆମକୁ ସତର୍କ କରିଆସିଛନ୍ତି। ଶ୍ରୀ ଗୁରୁ ଗ୍ରନ୍ଥ ସାହିବରେ ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଇଛି-

“ଜିତୁ ପୀତୈ ମତି ଦୂରି ହୋଇ, ବରଲୁ ପବୈ ବିଚି ଆଇ।

ଆପଣା ପରାଇଆ ନ ପଛାଣଇ, ଖସମହୁ ଧକେ ଖାଇ॥”

 ଅର୍ଥାତ୍, ଯେଉଁ ପଦାର୍ଥର ସେବନ ଦ୍ୱାରା ମଣିଷର ବୁଦ୍ଧି ଓ ବିବେକ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ, ସେ ନିଜ-ପରର ଭେଦଭାବ ଭୁଲିଯାଏ, ସେହିପରି ନିଶା ତାକୁ ଅଧୋଗତି ଓ ପତନର ପଥକୁ ନେଇଯାଏ।

 ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମ ସଂସ୍କୃତିରେ ନିଶାରୁ ବଞ୍ଚିବା ପାଇଁ ସଚେତନବାଣୀ ଦିଆଯାଇଛି ଏବଂ ଯଦି କେହି ନିଶାର କବଳରେ ପଡ଼ିଯାଆନ୍ତି, ତାହାରୁ ମୁକ୍ତି ପାଇବାର ଉପାୟ ମଧ୍ୟ ବତାଇ ଦିଆଯାଇଛି। ସମାଜର ସହଯୋଗ, ଯୋଗ ଓ ଧ୍ୟାନର ଶକ୍ତି ନିଶା ବିରୋଧରେ ଆମର ଅନ୍ତରାତ୍ମାକୁ ଦୃଢ଼ କରିଥାଏ। ଆଜି ନିଶା ଛାଡ଼ିବା ପାଇଁ ପୁନର୍ବାସ କେନ୍ଦ୍ର ପରି ସୁବିଧା ମଧ୍ୟ ଉପଲବ୍ଧ ଅଛି। ତେଣୁ ଯଦି କୌଣସି ଯୁବକ ଅଜାଣତରେ ନିଶାର ଶିକାର ହୋଇଯାଏ, ତାହାର ଅର୍ଥ ଏହା ନୁହେଁ ଯେ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ସମସ୍ତ ରାସ୍ତା ବନ୍ଦ ହୋଇଗଲା। ଆମେ ସର୍ବଦା ଏହି କଥା ମନେ ରଖିବା ଉଚିତ ଯେ, ଘରର କୌଣସି ପିଲା ଯଦି ନିଶାର ଶିକାର ହୋଇଥାଏ, ତେବେ ସାମାଜିକ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କ୍ଷୁର୍ଣ୍ଣ ହେବାର ଭୟରେ ଏହାକୁ ଲୁଚାଇବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଯେଉଁଠି ସହାୟତାର ଆବଶ୍ୟକତା ଅଛି, ସେଠାରେ ସହଯୋଗ ମାଗନ୍ତୁ, ତାଙ୍କ ସହ ଖୋଲାଖୋଲି କଥା ହୁଅନ୍ତୁ ଏବଂ ବିଶେଷଜ୍ଞମାନଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ନିଅନ୍ତୁ। ଚିକିତ୍ସା ସହାୟତା ନେଇ ନିଜ ସନ୍ତାନଙ୍କୁ ନିଶାମୁକ୍ତ କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରନ୍ତୁ। ଆମ ପରିବାରରେ ପିଲାମାନଙ୍କ ସହ ଖୋଲାଖୋଲି ଆଲୋଚନାର ଏକ ସଂସ୍କୃତି ଗଢ଼ି ତୋଳିବା ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ସେମାନେ ଏପରି ବିପଦର ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବା ପୂର୍ବରୁ ଆମେ ସେମାନଙ୍କର ମାର୍ଗଦର୍ଶନ କରିପାରିବା। ଅଭିଭାବକମାନେ ଟିକେ ସତର୍କ ରହିଲେ ଏହାର ସଙ୍କେତ ସହଜରେ ପାଇପାରିବେ। ଯଦି ପିଲାର ବ୍ୟବହାରରେ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଆସୁଛି, ସେ ସବୁବେଳେ ଅନ୍ୟମନସ୍କ ରହୁଛି, ମୁହଁ ଲୁଚାଉଛି, ନିଜକୁ କୋଠରୀରେ ବନ୍ଦ ରଖୁଛି, ବିଳମ୍ବିତ ରାତିରେ ଘରକୁ ଫେରୁଛି କିମ୍ବା ବାରମ୍ବାର ଅସ୍ୱାଭାବିକ ଭାବେ ଟଙ୍କା ମାଗୁଛି, ତେବେ ଏସବୁ ସଙ୍କେତରୁ ବୁଝିହେବ ଯେ, କିଛି ନା କିଛି ଅସୁବିଧା ହେଉଛି। ଏପରି ସମୟରେ ସଚେତନ ହୋଇ ଠିକ୍ ସମୟରେ ପଦକ୍ଷେପ ନେବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଜରୁରୀ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ମୁଁ ଆମ କଲେଜ ଓ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟର ପ୍ରଫେସର ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଏକ ନିବେଦନ କରିବାକୁ ଚାହୁଚି। ଆପଣମାନେ ପାଠ୍ୟକ୍ରମର ପାଠପଢା ସହିତ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟର କୁପ୍ରଭାବ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଆଲୋଚନା କରନ୍ତୁ। ନିଶା ବିରୋଧରେ ନିଜ ଶିକ୍ଷାନୁଷ୍ଠାନ ପରିସରରେ ଏକ ସଚେତନତା ଆନ୍ଦୋଳନ ଆରମ୍ଭ କରନ୍ତୁ। ଆପଣମାନଙ୍କର ପ୍ରୟାସ ବହୁତ ବଡ଼ ବଡ଼ ପରିଣାମ ଆଣିପାରିବ। ଏଥିସହିତ ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମକୁ ଆଉ ଏକ କଥା ମଧ୍ୟ ମନେ ରଖିବାକୁ ହେବ। ଯେଉଁ ଯୁବକ-ଯୁବତୀମାନେ ନିଶା ବିରୋଧରେ ସଂଘର୍ଷ କରି ସେଥିରୁ ମୁକ୍ତି ପାଇଛନ୍ତି, ସେମାନେ ଦୁର୍ବଳ ନୁହନ୍ତି; ବରଂ ଯିଏ ନିଶାକୁ ପରାସ୍ତ କରି ବାହାରି ଆସିଛି, ସେ ହିଁ ପ୍ରକୃତ ଯୋଦ୍ଧା। ସମାଜ ସେମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦେବା ଉଚିତ, ଆପଣାର କରିବା ଉଚିତ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କୁ ଜୀବନରେ ଦ୍ୱିତୀୟ ସୁଯୋଗ ଦେବା ଉଚିତ। କାରଣ ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ ସହ ଜଡ଼ିତ କାହାରି ଅତୀତ ତାଙ୍କର ପରିଚୟ ହୋଇପାରିବ ନାହିଁ; ତାଙ୍କର ସାହସ ହିଁ ତାଙ୍କର ପ୍ରକୃତ ପରିଚୟ।

 ବନ୍ଧୁଗଣ,

ନିଶା ବିରୋଧୀ ଅଭିଯାନରେ ଆଜି ସରକାର ମଧ୍ୟ ଦୃଢ଼ତାର ସହ ଯୁବପିଢ଼ିଙ୍କ ସହ ଛିଡ଼ା ହୋଇଛନ୍ତି। ଦେଶରେ ନିଶା ବ୍ୟବସାୟୀ ଓ ଚୋରାଚାଲାଣକାରୀଙ୍କ ବିରୋଧରେ କଠୋର କାର୍ଯ୍ୟାନୁଷ୍ଠାନ ନିଆଯାଉଛି। ପୂର୍ବ ତୁଳନାରେ ଗିରଫଦାରୀଙ୍କ ସଂଖ୍ୟା ବହୁଗୁଣିତ ହୋଇଛି। ହଜାର ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କା ମୂଲ୍ୟର ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଜବତ କରାଯାଇଛି। ଏହା ପ୍ରମାଣ କରୁଛି ଯେ, ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ ବିରୋଧରେ ଆମ ସରକାର କେତେ କଠୋର ଆଭିମୁଖ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି। ମୋର ବିଶ୍ୱାସ ଯେ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର, ରାଜ୍ୟ ସରକାର ଏବଂ ସମସ୍ତ ସମ୍ପୃକ୍ତ ପକ୍ଷ ଏହାକୁ ମିଶନ ମୋଡ୍‌ରେ ଆଗେଇ ନେବେ। ମୋର ଏହା ମଧ୍ୟ ବିଶ୍ୱାସ ଯେ, ଆମ ଦେଶର ଯୁବପିଢ଼ି ନିଶାମୁକ୍ତ ରହି ନିଜର ଯୁବଶକ୍ତିକୁ କେବଳ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖିବେ ନାହିଁ, ବରଂ ବିକଶିତ ଭାରତର ସଂକଳ୍ପକୁ ସାକାର କରିବା ଦିଗରେ ମଧ୍ୟ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇବେ। ଆଜି ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଅନେକ ମହାନ ସନ୍ଥ-ମହାତ୍ମାଙ୍କୁ ଦେଖି ମୁଁ ଦୂରରୁ ସେମାନଙ୍କୁ ଆନ୍ତରିକ ପ୍ରଣାମ ଜଣାଉଛି। ଦେଶର କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଥିବା ସମସ୍ତ ସାମାଜିକ ସଂସ୍ଥା, ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ସଂସ୍ଥା ଏବଂ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଗୁରୁଜନଙ୍କୁ ମୁଁ ଏକ ବିନମ୍ର ଅନୁରୋଧ କରୁଛି। ଆପଣମାନଙ୍କର ଦେଶବ୍ୟାପୀ ସଂଗଠନ ରହିଛି, ଆପଣମାନଙ୍କ ସହ ଯୁବ ସ୍ୱେଚ୍ଛାସେବକ ଓ ଭକ୍ତମାନେ ମଧ୍ୟ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଛନ୍ତି। ଆସନ୍ତା ୧୦୦ ଦିନ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସଂଗଠନ ଗୋଟିଏ ସପ୍ତାହର ଦାୟିତ୍ୱ ନେଇପାରିବ। ସେହି ସପ୍ତାହରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ସେହି ସଂଗଠନ ନେତୃତ୍ୱ ନେଉ, ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ସଂଗଠନ ତାହା ସହ ଯୋଡ଼ି ହୁଅନ୍ତୁ ଏବଂ ରବିବାର ଦିନ ଏକ ବିଶାଳ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଆୟୋଜନ କରନ୍ତୁ। ପରବର୍ତ୍ତୀ ସପ୍ତାହରେ ଅନ୍ୟ ଏକ ସଂଗଠନ ଏହି ଦାୟିତ୍ୱ ନେଉ, ସପ୍ତାହବ୍ୟାପୀ ବିଭିନ୍ନ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ କରାଯାଉ ଏବଂ ରବିବାର ଦିନ ଏକ ବୃହତ୍ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ହେଉ। ଯଦି ଆମ ଦେଶର ଏଭଳି ୧୦୦ଟି ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ, ସାମାଜିକ ଓ ଯୁବ ସଂଗଠନ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗୋଟିଏ ସପ୍ତାହର ଦାୟିତ୍ୱ ନିଅନ୍ତି ଏବଂ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ଶକ୍ତି ସେମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି ରବିବାର ଦିନ ସାମୂହିକ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ କରନ୍ତି, ତେବେ ଆପଣମାନେ କଳ୍ପନା କରିପାରିବେ ଯେ, ଦେଶରେ କେତେ ବିରାଟ ଜନଆନ୍ଦୋଳନ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇପାରିବ। ଆପଣମାନେ ସମୟ ବାହାର କରି ଏହି ପବିତ୍ର କାର୍ଯ୍ୟରେ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ କରିଛନ୍ତି। ଏଥିପାଇଁ ମୁଁ ସମସ୍ତ ସନ୍ଥ, ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଏବଂ ବିଭିନ୍ନ ସଂଗଠନର ନେତୃବୃନ୍ଦଙ୍କୁ ସହୃଦୟତାର ସହିତ କୃତଜ୍ଞତା ଜଣାଉଛି। ଏହି ଅଭିଯାନରେ ସାମିଲ ହୋଇଥିବା ଏକ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଯୁବକ-ଯୁବତୀଙ୍କୁ ମୁଁ ବିଶେଷ ଭାବରେ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି। ଆପଣମାନେ ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ କାମ କରିଛନ୍ତି। ମୁଁ ‘ମାଇ ଭାରତ’ର ସମସ୍ତ ସ୍ୱେଚ୍ଛାସେବୀଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି। ସେମାନେ ଯେଉଁ କାମ କରିବାକୁ ସଂକଳ୍ପ କରନ୍ତି, ତାହାକୁ ଆଜିକାଲି ସଫଳତାର ସହ କରି ଦେଖାଉଛନ୍ତି। କିଛିଦିନ ପୂର୍ବରୁ ମୋତେ ‘ମାଇ ଭାରତ’ର ସ୍ୱେଚ୍ଛାସେବୀମାନଙ୍କ ସହ ସାକ୍ଷାତ କରିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା। ସେମାନେ ଭାରତର ସୀମାନ୍ତ ଗ୍ରାମଗୁଡ଼ିକୁ ଯାଇ ସେଠାରେ ଏକ ସପ୍ତାହ ରହିଥିଲେ। ଯେଉଁ ଗ୍ରାମକୁ କେବେ ଦେଶର ସୀମାନ୍ତ ଗ୍ରାମ ବୋଲି କୁହାଯାଉଥିଲା, ଆଜି ଆମେ ତାହାକୁ ଦେଶର ପ୍ରଥମ ଗ୍ରାମ ବୋଲି କହୁଛୁ। ସେଠାରୁ ଫେରିବା ପରେ ସେମାନଙ୍କ ଅନୁଭୂତି ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରେରଣାଦାୟକ ଥିଲା। ଆଜି ‘ମାଇ ଭାରତ’ର ସ୍ୱେଚ୍ଛାସେବୀମାନେ ଏତେ ବଡ଼ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଆୟୋଜନ କରିପାରୁଛନ୍ତି, ଏହା ସେମାନଙ୍କର ରାଷ୍ଟ୍ର ପ୍ରତି ସଚେତନ, ସମର୍ପିତ ଭାବନାର ଏକ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ପ୍ରତୀକ। ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ହାର୍ଦ୍ଦିକ ଅଭିନନ୍ଦନ ଓ ଶୁଭେଚ୍ଛା ଜଣାଉଛି। ମୋର ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱାସ ଯେ, ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସାମୂହିକ ପ୍ରୟାସ ଦ୍ୱାରା ଏହି ଆନ୍ଦୋଳନ ଘରେ ଘରେ ପହଞ୍ଚିବ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁବପିଢ଼ିର ହୃଦୟରେ ସ୍ଥାନ ପାଇବ ଏବଂ ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ ବ୍ୟବସାୟୀଙ୍କ ପାଇଁ ଏକ ବଡ଼ ସଂଶୟର କାରଣ ପାଲଟିବ। ଆସନ୍ତୁ, ଆମେ ସମସ୍ତେ ମିଳିମିଶି ଏହି ଅଭିଯାନକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇବା। ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୋର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାମନା।

 ଆପଣଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ!