ସେୟାର
 
Comments
PM Modi speaks at the 10th Annual Convention of the Central Information Commission
RTI is not only about the right to know but also the right to question. This will increase faith in democracy: PM
Govt's 'Digital India' is complimentary to RTI, putting information online brings transparency, which in turn, builds trust: PM
More openness in government will help citizens. In this day and age there is no need for secrecy: PM
Aim of RTI must be to bring about a positive change in governance: PM
The voice of people is supreme in a democracy: PM Narendra Modi

उपस्थित सभी महानुभव,

आज हम सूचना के अधिकार के संबंध में आज 10 वर्ष पूर्ण कर रहे हैं। इस व्‍यवस्‍था में विश्‍वास पैदा करने के लिए इस व्‍यवस्‍था को आगे बढ़ाने में जिन-जिन लोगों ने योगदान दिया है, उन सबको मैं धन्‍यवाद करता हूं और बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

यह बात सही है कि सूचना के अधिकार से सबसे पहली बात सामान्‍य से सामान्‍य व्‍यक्ति को जानने का अधिकार हो, लेकिन वहां सीमित न हो। उसे सत्‍ता को question करने का भी अधिकार हो। और यही लोकतंत्र की बुनियाद है। और हम उस दिशा में जितनी तेज गति से काम करेंगे, उतना लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्‍वास और बढ़ेगा। लोगों की जागरूकता, एक प्रकार से शासन को भी ताकत देती है और न सिर्फ शासन को राष्‍ट्र की भी एक बहुत बड़ी अमानत बनती, है जागरूक समाज का होना। ऐसी कुछ व्‍यवस्‍था होती है, जो इन व्‍यवस्‍थाओं को पनपाती है, पुरस्‍कृत करती है, प्रोत्‍साहित करती है और परिणाम तक पहुंचाती है।

जो जानकारी मिलती है उस हिसाब से कहते हैं कि 1766 में सबसे पहले स्‍वीडन में इसका प्रारंभ हुआ। लिखित रूप में प्रारंभ हुआ। informally तो शायद कई व्‍यवस्‍थाओं में यह चलता होगा। लेकिन यही व्‍यवस्‍था अमेरिका में आते-आते 1966 हो गया। दो सौ साल लगे। कुछ देशों ने कानून पारित किए। लेकिन पारित करने के लागू करने के बीच दो साल का फासला रखा, ताकि लोगों को educate कर पाएं। शासन व्‍यवस्‍था को aware कर सके। और एक mature way में व्‍यवस्‍था विकसित हो। हमारे देश का अनुभव अलग है। हम लोगों ने निर्णय किया और काम करते-करते उसको सुधारते गए, ठीक करते गए और empower करते गए। और यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहेगी तभी जा करके institution और अधिक strengthen होती है और आने वाले दिनों में इसके लिए निरंतर प्रयास होता है।

एक बात निश्‍चित है कि जो Digital India का सपना है वो एक प्रकार से आरटीआई की जो भावना है उसके साथ पूरक है। क्‍योंकि जब चीजें online होने लगती है, तो अपने आप transparency आती है। और शासन और जनता के बीच trust होना चाहिए और trust through transparency होता है। अगर transparency है तो trust आता ही है। और इसलिए Digital India का जो सपना है, वो चीजों को जितना online करते जाएंगे, जितना open करते जाएंगे, सवालिया निशान कम होते जाएंगे। अब अभी पिछले दिनों coal का auction हुआ।

अब हमें मालूम है कि पहले कोयले को ले करके कितना बड़ा तूफान मच गया। कितने बड़े सवाल खड़े हुए। सुप्रीम कोर्ट तक को उसमें involve होना पड़ा। RTI से जुड़े हुए लोग भी इसमें काफी मेहनत करते रहे। अभी इस सरकार के सामने विषय आया, तो हमने सारी चीजें online की, online की इतना ही नहीं, एक बड़े screen पर, एक public place पर जहां कोई भी आसकता है देख सकता है, सारी process देख रहा था। हर शाम को कहां पहुंच इसका पता करता था। मीडिया के लोग भी आ करके बैठते थे। अब इस व्‍यवस्‍था में मैं नहीं मानता हूं कि फिर कभी किसी को RTI की जरूरत पड़ेगी, क्‍योंकि मैं मानता हूं कि जो RTI से मिलने वाला था वो पहले उसके सामने था। अभी हमने FM Radio का Auction किया, वो भी उसी प्रकार से online किया। spectrum का auction किया वो भी उसी प्रकार से किया। और जब auction चल रहा था, online सब लोग आते थे। हफ्ते, दस दिन तक चलता था। मीडिया के लोग भी बैठते थे। और भी लोग बैठते थे। कोई भी व्‍यक्ति उसको कर सकता था।

क्‍यों न हम transparency proactively क्‍यों न करे। किसी को जानने के लिए प्रयास करना पड़े कि किसी को जानकारी सहज रूप से मिले। शासन लोकतंत्र में उसका प्रयास हो रहना चाहिए कि सहज रूप से उसको जानकारी मिलनी चाहिए। हमारे यहां कुछ चीजें तो ऐसी पुरानी घर कर गई थी। धीरे-धीरे उसको बदलने में समय लगता है। अब जैसे आपको कहीं apply करना है और अपने certificate का Xerox देते हैं तो वो मंजूर नहीं होता है। किसी gestated officer या किसी political leader से जब तक ठप्‍पा नहीं मरवाते हो उसको मान्‍यता नहीं मिलती है। अब यह सालों से चल रहा था। हमने आ करके निर्णय किया कि भई नागरिक पर हम भरोसा करे। वो एक बार कहता तो सच मान ले और जब final उसका होगा, तब original certificate ले करके आ जाएगा, देख लेना। और आज वो व्‍यवस्‍था लागू हो गई। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हम नागरिक पर भरोसा करके व्‍यवस्‍थाओं को चलाए। नागरिकों पर शक करके हम चीजों को चलाएंगे, तो फिर हम भी अपने आप को कहीं न कहीं छुपाने की कोशिश करते रहेंगे। एक openness, governance में जितना openness आएगा, उतना परिणाम सामान्‍य नागरिक को भी ताकतवर बनाता है।

सरकार का और भी स्‍वभाव बना हुआ है। साइलो में भी काम करना और इतना ही नहीं एक ही कमरे में चार अफसर बैठे हो, बड़ी कोशिश करता है कि बगल वाला फाइल देखें नहीं। अब यह जो secrecy की मानसिकता किसी जमाने में रही होगी, उस समय के कुछ कारण होंगे, लेकिन आज मैं यह नहीं मानता हूं कि इस प्रकार की अवस्‍था रहेगी। अगर खुलापन है, खुली बात है, भई यह चार काम करने है, चर्चा करके करने है। तो मैं समझता हूं कि उसके कारण एक सरलता भी आती है और speed भी आती है। एक-आध चीज की कमी रहती है, तो अपना साथी बताता है कि अरे भई तुम देखो यह पहलू जरा देख लो। तो एकदम से काम में.. कोई जरूर नहीं कि वो फाइल पर लिख करके कहता है, ऐसे बातों में कहता है कि देखो भई यह पहलू देखना पड़ेगा। तो अपने आप सुधार हो जाता है। तो सुधार करने के लिए हमारे मूलभूत स्‍वभाव में भी शासन थे। यह बहुत अपेक्षा रहती है कि उसमें यह बदलाव लाना चाहिए और हम उस दिशा में प्रयास कर रहे हैं। मुझे विश्‍वास है कि यह प्रयास परिणामकारी होगा।

आज मैं समझता हूं कि RTI की एक सीमा है। वो सीमा यह है कि जिसको जानकारी चाहिए, जानकारी तो मिलती है। कुछ बातें मीडिया को काम आ जाती है। कुछ बातें किसी को न्‍याय तक सीमित रह जाती है। process का पता चलता है। लेकिन अभी भी product का पता नहीं चलता। मैं इस रूप में कह रहा हूं कि मान लीजिए एक Bridge का contract दिया गया, तो RTI वाला पूछेगा तो उसको पता चलेगा फाइल कैसे शुरू हुई, tendering कैसे हुआ, noting क्‍या था, साइट कैसे select हुआ, यह सब चीजें मिलेगी। लेकिन वो Bridge कैसे बना, ठीक बना कि नहीं बना। उसमें कमियां है कि ठीक हुआ, समय पर हुआ कि नहीं हुआ। इन चीजों की तरफ अब ध्‍यान देने का समय आया है। तो हम process पर जितना ध्‍यान देते हैं RTI के द्वारा एक समय वो भी चाहिए कि जब product पर भी उतना ही transparency लाए, तब जा करके बदलाव आता है। वरना वो जानकारियां सिर्फ एक संतोष के लिए होती है। आखिरकर RTI का उपयोग Governance में बदलाव लाने के लिए सबसे पहले होना चाहिए।

और इसलिए जब विजय जी मुझे मिले थे, तो मैंने बातों-बातों में उनको कहा था कि जो लोग हमें सवाल पूछते हैं क्‍या हमने उसका Analysis किया है कि भई रेलवे के संबंध में कितने सवाल आते हैं? Home के संबंध में कितने सवाल आते हैं। फलाने विषय में कितने सवाल आते हैं। Analysis वो department है जहां हजारों की तादाद में सवाल आते हैं। यह department जहां सौ से ज्‍यादा नहीं आते हैं। फिर हमने उसका analysis करना चाहिए यह जो सवाल आते हैं, उसके मूल में कोई policy paralyses तो नहीं है। हम identify कर सकते हैं। अगर हम इस RTI को सिर्फ जवाब देने तक सीमित रखे तो शासन व्‍यवस्‍था को लाभ नहीं होता है। उस नागरिक ने सवाल पूछा है मतलब शासन व्‍यवस्‍था में कहीं न कहीं कोई बात है, जो पूछने की जरूरत पड़ी है। अगर व्‍यवस्‍था इतनी sensitive होती है। और जो सवाल आए उनका हम analysis करते हैं, तो हमें पता चलेगा कि policy matter के कारण यह समस्‍या बार-बार उठ रही है, लोग सवाल पूछ रहे हैं। तो Government को High level पर सोचना चाहिए कि policy matter में क्‍या फर्क लाना चाहिए। एक RTI क्‍या छोटा सा सवाल भी आपको policy बदलने के लिए मजबूर कर सकता है और कभी-कभार वो इतना सटीक बात पूछता है कि ध्‍यान में आता है कि यह तरफ हमारा ध्‍यान नहीं गया। इसलिए Good Governance के लिए RTI कैसे उपयोग में आए, सिर्फ जवाब देने से RTI Good Governance नहीं ला सकता है। वो सिर्फ विवादों के लिए काम आ सकता है। परिस्थिति पलटने के लिए नहीं काम आ सकता है।

दूसरा मैंने सुझाव दिया कि एक तो part यह होता है कि भई policy के कारण, दूसरा होता है person के कारण, कि भई जो व्‍यक्ति वहां बैठा है उसके nature में ही है। इसलिए ऐसी स्थिति पैदा होती है वो जवाब नहीं देता है, ढीलापन रखता है, ऐसे ही चलता है। तो फिर person पर सोचने का सवाल आएगा भई। एक ही person से संबंधित इतने सारे issue क्‍यों खड़े होते हैं, तो कहीं न कहीं कोई कमी होगी, उसको ठीक कैसे किया जाए? उस पर सोचना चाहिए। कहीं पर ऐसा होगा कि जिसे पता चलेगा कि भई लोगों ने सवाल पूछे है लेकिन finance के resource crunch के कारण वो नहीं हो पा रहा है। या कोई काम ऐसा होगा कि जिसके कारण लोकल कोई न कोई व्‍यवस्‍था होगी, जो रूकावटें डाल रही है। जब हम इन सवालों का perfect analysis करें और उसमें से सरकार की कमियां ढूंढे नागरिकों के सवालों में से ही सरकार की कमियां उजागर हो सकती है, व्‍यवस्‍था की कमियां उजागर हो सकती है, process की कमियां उजागर हो सकती है। और उसको ठीक करने के लिए उसमें से हमें एक रास्‍ता भी मिल सकता है। और इसलिए मैं चाहूंगा कि आप जब इस पर डिबेट करने वाले हैं हम RTI को एक Good Governance की ओर जाने का एक साधन के रूप में कैसे इस्‍तेमाल करें? और यह हो सकता है।

मैं इन दिनों एक कार्यक्रम करता हूं भारत सरकार में आने के बाद – प्रगति। एक साथ सभी chief secretaries और सभी secretaries भारत सरकार के और मैं 12-15 issue लेता हूं। और उससे ध्‍यान में आता है। सवाल तो मैं वो लेता हूं किसी नागरिक की चिट्ठी के आधार पर पकड़ता हूं। किसी ने मुझे लिखा कि भई फौजियों को pension में problem है। तो मैंने उस विषय को उठाया। सबको बुलाया, बिठाया, सब वीडियो पर होते हैं मीटिंग नहीं करते हैं। मैं तो एक छोटे कमरे में बैठता हूं। लेकिन उसका कारण बनता है, परिस्थिति आती है तुरंत ध्‍यान में आता है कि भई इस विषय को हैंडल करना पड़ेगा। किसी ने मुझे लिखा भी था post office में 15 दिन बीत गए, 20 दिन बीत गए टपाल नहीं आई थी। मैंने प्रगति में ले लिया, तुरंत पता चला क्‍या कारण था उनका। कहां पर यह slow process चल रहा था।

कहने का तात्‍पर्य यह है कि हम नागरिकों की आवाज को अगर हम महत्‍व दें। जब मैं गुजरात में था तो मैंने एक प‍द्धति बनाई थी। जो MLA सवाल पूछते हैं, मेरा अनुभव है कि MLA यानी जनप्रतिनिधि किसी भी दल का क्‍यों न हो, लेकिन उसकी हर बात को तव्‍वजू देनी चाहिए, महत्‍व देना चाहिए। किसी भी दल का क्‍यों न हो। क्‍योंकि वो अपने क्षेत्र के संबंध में कोई बात बताता है मतलब वो जनहित के लिए ही बताता है, मान करके चलना चाहिए। लेकिन जब House के अंदर जवाब देते हैं, तो by and large मीडिया centric process चलता है। एक प्रकार से House में, कल मीडिया में क्‍या छपेगा, टीवी पर क्‍या दिखेगा, वही dominate करने लग गया है। और इसलिए House में तो हर कोई अपना score settle करने वाला जवाब देता है। अब क्‍या करे मजबूरी हो गई है राजनीति की कि भई दूसरे दिन मीडिया में खबर खराब न आए। तो वो अपना.... और वो कर भी लेता और जीत भी जाता है। वो बात अलग है। लेकिन मैंने एक process शुरू किया था। Assembly सत्र पूरा होने के बाद जितने भी question आते थे। हर department को कहता था हर question का Analysis करो और मुझे action taken रिपोर्ट दो। भले किसी का भी सवाल हो, House में आपने जो भी जवाब दिया ठीक है। अगर उसने कहा है कि भई वहां road नहीं बना है मुझे result चाहिए। और उसके कारण शासन में electives के प्रति एक sensitivity पैदा हुई थी। मैं मानता हूं ऐसी sensitivity RTI के सवालों के साथ हमको जोड़ती है। अगर यह पूरे देश में शासकीय व्‍यवस्‍था में प्रगति में बहुत कुछ कर सकते हैं। और उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

एक यह भी बात है कि जब हम RTI की बात करते हैं तो यह मत है कि यह सारा communication जो है, information access करने की जो प्रक्रिया है। वो एक तो transparent होनी चाहिए, Timely होनी चाहिए and Trouble fee होनी चाहिए। यह हम जितना.. क्‍योंकि समय बीतने के बाद अगर हम जानकारी देते हैं तो न वो शासन को सुधारती है और न शासन को accountable बनाती है। फिर स्थिति कि अब क्‍या करे भई, वहां तो भवन बन गया अब वो भवन कैसे तोड़ सकते हैं। क्‍या करे भई वहां तो लोग रहने के लिए आए गए। उनको कैसे निकाल सकते हैं। अगर Timely information देते तो हो सकता है कि गलत निर्णय रूक जाता, तुरंत हम ध्‍यान में आते। और इसलिए transparency भी हो, Timely भी हो, Trouble free भी हो। यह हम बल देंगे, तो हम इस कानून बनाए लेकिन उस कानून का ज्‍यादा अच्‍छे से उपयोग कर सकते। ज्‍यादा अच्‍छा परिणाम ला सकते हैं।

आज मैंने देखा है कि गांव के अंदर.. यह ठीक है हर बात में कुछ मात्रा में कोई न कोई शंका को अशंका का कारण रहता होगा लेकिन larger interest में यह बहुत उपकारक है, बहुत उपयोगी है। मैंने राज्‍य का शासन चलाया इसलिए मुझे मालूम है कि गरीब व्‍यक्ति RTI का कैसे उपयोग करता है। अगर गांव के अंदर किसी ने गलत encroachment कर दिया है और वो बड़ा दबदबा वाला इंसान है तो शासन कुछ कर नहीं पाता है। और एक गरीब आदमी RTI को एक सवाल पूछ देता है, आ जाता है, तो शासन को मजबूर हो करके encroachment हटाना पड़ता है। और जनता की या शासन की जो जमीन है वो खुली करवानी पड़ती है। ऐसे कई उदाहरण मैंने देखे हैं। गांव का भी एक छोटा व्‍यक्ति.. ।

हम जब गुजरात में थे तो एक प्रयोग किया था। और वो गुजरात मॉडल के रूप में जाना जाता था tribal के लिए। हम tribal को सीधे पैसा दे देते थे। और tribal को कहते थे तुम अपनी requirement के अनुसार एक कमिटी योजना बनाए और वो अपना काम हो, क्‍योंकि सरकार योजना बनाती गांधी नगर में बैठके। वो चाहती कि कुंआ खोदेंगे। गांवा वाला कहता है कि मुझे कुंआ नहीं चाहिए, मुझे स्‍कूल चाहिए और हम कुंए के लिए पैसा देते हैं, उसे स्‍कूल चाहिए उसके बजाय हमने गांव वालों को दिया। लेकिन गांव में ग्राम सभा के अंदर उनको सारा ब्‍यौरा देना पड़ता था और बोर्ड पर लिखकर रखना पड़ता था कि हमने इस काम के लिए इतना पैसा लगाया। गांव का सामान्‍य व्‍यक्ति भी पूछ लेता था पंच के प्रधान को कि भई तुम कह रहे हो दो सौ रुपया यहां लगाया, वो चीज तो दिखती नहीं, बताओ। और Transparency आती थी। हम जितना openness लाते हैं, उतनी Transparency की गारंटी बनती है। और इसलिए RTI एक माध्‍यम है Transparency की ओर जाने का, लेकिन At the same time RTI से सीख करके हमने शासन व्‍यवस्‍था में Transparency लाने की आवश्‍यकता है। और मुझे विश्‍वास है कि अगर गलत इरादे से कोई काम नहीं है तो कभी कोइे तकलीफ नहीं होती है, कोई दिक्‍कत नहीं होती है। सही काम सही परिणाम भी देते हैं। और जैसा मैंने कहा सिर्फ process नहीं। हमें आने वाले दिनों में product की quality पर भी ध्‍यान देना पड़ेगा। उसको भी हम किस प्रकार से सोंचे। ताकि हर चीज का हिसाब-किताब देना पड़े। क्‍योंकि जनता के पैसा से चलती है सरकार। सारे निर्माण कार्य होते हैं जनता के पैसों से होते हैं। और जनता सर्वपरि होती है लोकतंत्र में। उसके हितों की चिंता और उस व्‍यवस्‍था को मजबूत करने की दिशा में हम प्रयास करते रहेंगे। तो मैं समझता हूं कि बहुत ही उपकारक होगा।

आज पूरा दिनभर आप लोग बैठने वाले हैं। मुझे विश्‍वास है कि इस बंधन में राज्‍य के भी सभी अधिकारी यहां पर आए हुए हैं। तो उस मंथन में से जो भी अच्‍छे सुझाव आएंगे वो सरकार के ध्‍यान में आएंगे। उसमें से कितना अच्‍छा कर सकते हैं प्रयास जरूर रहेगा, लेकिन हम चाहेंगे कि जनता जितनी ताकतवर बनती है, नागरिक जितना ताकतवर बनता है वो ताकत सचमुच में देश की ही ताकत होती है। उसी को हम बल दें। इसी एक अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं। धन्‍यवाद।

Pariksha Pe Charcha with PM Modi
Explore More
ଆମକୁ ‘ଚଳେଇ ନେବା’ ମାନସିକତାକୁ ଛାଡି  'ବଦଳିପାରିବ' ମାନସିକତାକୁ ଆଣିବାକୁ ପଡ଼ିବ :ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ

ଲୋକପ୍ରିୟ ଅଭିଭାଷଣ

ଆମକୁ ‘ଚଳେଇ ନେବା’ ମାନସିକତାକୁ ଛାଡି 'ବଦଳିପାରିବ' ମାନସିକତାକୁ ଆଣିବାକୁ ପଡ଼ିବ :ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ
Nothing is further from the truth than the claim that Centre dropped ball on Covid preparedness

Media Coverage

Nothing is further from the truth than the claim that Centre dropped ball on Covid preparedness
...

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
ସେୟାର
 
Comments
At this moment, we have to give utmost importance to what doctors, experts and scientists are advising: PM
Do not believe in rumours relating to vaccine, urges PM Modi
Vaccine allowed for those over 18 years from May 1: PM Modi
Doctors, nursing staff, lab technicians, ambulance drivers are like Gods: PM Modi
Several youth have come forward in the cities and reaching out those in need: PM
Everyone has to take the vaccine and always keep in mind - 'Dawai Bhi, Kadai Bhi': PM Modi

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ନମସ୍କାର । ଆଜି ଆପଣମାନଙ୍କୁ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍‌’ ଏପରି ଏକ ସମୟରେ କହୁଛି, ଯେତେବେଳେ କରୋନା ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ସମସ୍ତଙ୍କର ଦୁଃଖ ସହିବାର ସୀମାକୁ ପରଖୁଛି । ଅନେକ ନିଜ ଲୋକ ଆମକୁ ଅସମୟରେ ଛାଡ଼ି ଚାଲିଯାଇଛନ୍ତି । କରୋନାର ପ୍ରଥମ ଲହରକୁ ସଫଳତାର ସହିତ ମୁକାବିଲା କରିବା ପରେ ଦେଶ ଉତ୍ସାହରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା, ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସରେ ଭରି ରହିଥିଲା, କିନ୍ତୁ ଏହି ଝଡ଼ ଦେଶକୁ ଦୋହଲାଇ ଦେଇଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ବିଗତ ଦିନରେ ଏହି ସଙ୍କଟର ମୁକାବିଲା ପାଇଁ, ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ କ୍ଷେତ୍ରର ବିଶେଷଜ୍ଞମାନଙ୍କ ସହ ମୋର ଦୀର୍ଘ ଆଲୋଚନା ହୋଇଛି । ଆମର ଔଷଧ ପ୍ରସ୍ତୁତି ଶିଳ୍ପ ସହ ଜଡ଼ିତ ଲୋକ ହୁଅନ୍ତୁ, ଟିକା ନିର୍ମାତା ହୁଅନ୍ତୁ, ଅମ୍ଳଜାନ ପ୍ରସ୍ତୁତି ସହ ଜଡ଼ିତ ଲୋକ ହୁଅନ୍ତୁ କିମ୍ବା ଚିକିତ୍ସା କ୍ଷେତ୍ରର ବିଶେଷଜ୍ଞମାନେ ହୁଅନ୍ତୁ, ସେମାନେ ନିଜ ନିଜର ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ପରାମର୍ଶ ସରକାରଙ୍କୁ ଦେଇଛନ୍ତି । ଏବେ ଆମକୁ ଏହି ସଂଗ୍ରାମରେ ବିଜୟ ଲାଭ କରିବାକୁ ହେଲେ ବିଶେଷଜ୍ଞ ଏବଂ ବୈଜ୍ଞାନିକମାନଙ୍କ ପରାମର୍ଶକୁ ଅଗ୍ରାଧିକାର ଦେବାକୁ ହେବ । ରାଜ୍ୟ ସରକାରମାନଙ୍କର ପ୍ରଚେଷ୍ଟାକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ ଭାରତ ସରକାର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶକ୍ତି ସହ ଲାଗିପଡ଼ିଛନ୍ତି । ରାଜ୍ୟ ସରକାରମାନେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଦାୟିତ୍ୱ ନିର୍ବାହ କରିବାର ପୂର୍ଣ୍ଣ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, କରୋନା ବିରୁଦ୍ଧରେ ବର୍ତମାନ ଦେଶର ଡାକ୍ତର ଏବଂ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟକର୍ମୀମାନେ ସଂଗ୍ରାମ ଚଳାଇଛନ୍ତି । ଗତବର୍ଷ ଏହି ବ୍ୟାଧିକୁ ନେଇ ସେମାନେ ଅନେକ ଅନୁଭୂତି ସାଉଁଟିଛନ୍ତି । ଆମ ସହ ବର୍ତମାନ ମୁମ୍ବାଇରୁ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଡାକ୍ତର ଶଶାଙ୍କ ଜୋଷୀ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଛନ୍ତି ।

କରୋନା ଚିକିତ୍ସା ଏବଂ ତା’ସହ ସମ୍ପୃକ୍ତ ଗବେଷଣା କ୍ଷେତ୍ରରେ ଡାକ୍ତର ଶଶାଙ୍କ କ୍ଷେତ୍ରୀୟ ସ୍ତରରେ ଗଭୀର ଅନୁଭବ ଲାଭ କରିଛନ୍ତି । ସେ ଇଣ୍ଡିଆନ୍ କଲେଜ ଅଫ୍ ଫିଜିସିଆନ୍ସର ଡିନ୍ ଥିଲେ । ଆସନ୍ତୁ, କଥା ହେବା ଡା. ଶଶାଙ୍କଙ୍କ ସହ –

ମୋଦି ଜୀ - ନମସ୍କାର ଡା. ଶଶାଙ୍କ ।

ଡା. ଶଶାଙ୍କ - ନମସ୍କାର ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - କିଛିଦିନ ତଳେ ଆପଣଙ୍କ ସହ କଥା ହେବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା । ଆପଣଙ୍କ ମତାମତର ସ୍ପଷ୍ଟତା ମୋତେ ବହୁତ ଭଲ ଲାଗିଥିଲା । ଦେଶର ସମସ୍ତ ନାଗରିକ ଆପଣଙ୍କ ମତାମତ ଜାଣିବା ଉଚିତ ବୋଲି ମୋର ମନେ ହେଲା । ଯାହା ସବୁ ଶୁଣିବାକୁ ମିଳୁଛି, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ମୁଁ ପ୍ରଶ୍ନ ରୂପେ ଆପଣଙ୍କ ଆଗରେ ଉପସ୍ଥାପିତ କରୁଛି । ଡା. ଶଶାଙ୍କ, ଆପଣମାନେ ଏବେ ଦିନରାତି ଜୀବନରକ୍ଷା କାର୍ଯ୍ୟରେ ଲାଗିଛନ୍ତି । ସର୍ବପ୍ରଥମେ ଏହି ଦ୍ୱିତୀୟ ଲହର ବିଷୟରେ ଲୋକଙ୍କୁ ଜଣାନ୍ତୁ ବୋଲି ମୁଁ ଚାହୁଁଛି । ଚିକିତ୍ସା ଦୃଷ୍ଟିରୁ ଏହା କିପରି ଭିନ୍ନ ଏବଂ ଏଥିପାଇଁ କି କି ସତର୍କତାର ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି?

ଡା. ଶଶାଙ୍କ - ଧନ୍ୟବାଦ ସାର୍‌, ଇଏ ଯେଉଁ ଦ୍ୱିତୀୟ ଲହର ଆସିଛି, ଏହା ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଆସିଛି । ପ୍ରଥମେ ଯେଉଁ ଲହର ଚାଲିଥିଲା, ତା’ ଅପେକ୍ଷା ଏଥର ଭାଇରସ ଅଧିକ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ବ୍ୟାପୁଛି । କିନ୍ତୁ, ଭଲ କଥା ଯେ, ତା’ଠାରୁ ଅଧିକ ବେଗରେ ଲୋକେ ସୁସ୍ଥ ମଧ୍ୟ ହେଉଛନ୍ତି ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁହାର ଯଥେଷ୍ଟ କମ ରହିଛି । ଏଥିରେ ୨-୩ଟି ପାର୍ଥକ୍ୟ ରହିଛି । ପ୍ରଥମତଃ, ଏହା ଯୁବଗୋଷ୍ଠୀ ଏବଂ ଶିଶୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବି କିଛି ମାତ୍ରାରେ ଦେଖାଯାଉଛି । ଏହାର ଲକ୍ଷଣ ପୂର୍ବ ଥରର ଲକ୍ଷଣ ଯେମିତିକି ନିଃଶ୍ୱାସ-ପ୍ରଶ୍ୱାସରେ କଷ୍ଟ ହେବା, ଶୁଖିଲା କାଶ ହେବା, ଜ୍ୱର ହେବା, ଏସବୁ ତ ରହିଛି, ତା’ ସାଙ୍ଗକୁ ଗନ୍ଧ ବାରି ନ ପାରିବା, ସ୍ୱାଦ ଜାଣି ନ ପାରିବା ଭଳି ଲକ୍ଷଣ ମଧ୍ୟ ରହିଛି । ଲୋକେ ମଧ୍ୟ କିଛି ମାତ୍ରାରେ ଭୟଭୀତ ହୋଇଛନ୍ତି । ଭୟ କରିବାର କୌଣସି ଆବଶ୍ୟକତା ନାହିଁ। ଶତକଡ଼ା ୮୦ରୁ ୯୦ ଭାଗ ଲୋକଙ୍କଠାରେ ଏହାର କୌଣସି ଲକ୍ଷଣ ପ୍ରକାଶ ପାଏ ନାହିଁ । ଯେଉଁ ମ୍ୟୁଟେସନ୍ କଥା କହୁଛନ୍ତି, ସେଥିରେ ଡରିବାର କୌଣସି କାରଣ ନାହିଁ । ଏହି ମ୍ୟୁଟେସନ ଏକ ନିରନ୍ତର ପ୍ରକ୍ରିୟା । ଆମେ ପୋଷାକ ପରିବର୍ତ୍ତନ କରିବା ଭଳି, ଭାଇରସ୍ ନିଜ ରୂପ ପରିବର୍ତନ କରୁଛି । ତେଣୁ ଭୟ କରିବାର କୌଣସି କାରଣ ନାହିଁ । ଏହି ଲହରର ମୁକାବିଲା କରିବାରେ ଆମେ ସଫଳତା ଲାଭ କରିବା । ଲହର ଏମିତି ଚାଲିଥାଏ । ଭାଇରସ୍ ମଧ୍ୟ ଏମିତି ଆସୁଥାଏ-ଯାଉଥାଏ । ସେଥିପାଇଁ ଏମିତି ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଲକ୍ଷଣ ପ୍ରକାଶ ପାଇଥାଏ । ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ଦୃଷ୍ଟିରୁ ଆମେ ସତର୍କ ରହିବା ଉଚିତ । ଏହା ୧୪ରୁ ୨୧ ଦିନର ଗୋଟିଏ କୋଭିଡ ଟାଇମ-ଟେବୁଲ । ଏଥିରେ ଡାକ୍ତରମାନଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ନେବା ଆବଶ୍ୟକ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଡା. ଶଶାଙ୍କ, ଆପଣ ଯେଉଁ ବିଶ୍ଲେଷଣ କଲେ, ତାହା ମୋ ପାଇଁ ବହୁତ କୌତୂହଳପ୍ରଦ । ମୁଁ ଅନେକ ଚିଠି ପାଇଛି, ଯେଉଁଥିରେ ଚିକିତ୍ସା ବିଷୟରେ ଲୋକଙ୍କ ମନରେ ଅନେକ ଆଶଙ୍କା ରହିଛି । କେତେକ ଔଷଧର ଚାହିଦା ବହୁତ ବଢ଼ିଛି । ଏଥିପାଇଁ ମୁଁ ଚାହୁଁଛି ଯେ, ଆପଣ କୋଭିଡ୍‌ର ଚିକିତ୍ସା ସମ୍ପର୍କରେ ଲୋକଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ କିଛି କୁହନ୍ତୁ ।

ଡା. ଶଶାଙ୍କ- ହଁ ସାର୍‌, ଲୋକେ ଚିକିତ୍ସା ପାଇଁ ବିଳମ୍ବରେ ଡାକ୍ତରଖାନା ଆସୁଛନ୍ତି । ରୋଗ ଆପେ ଆପେ ଭଲ ହୋଇଯିବ ବୋଲି ଭାବୁଛନ୍ତି । ମୋବାଇଲରେ ଆସୁଥିବା କଥାଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ କରୁଛନ୍ତି । ଯଦି ସେମାନେ ସରକାରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦିଆଯାଉଥିବା ସୂଚନାକୁ ପାଳନ କରିଥାନ୍ତେ, ତାହେଲେ ଏଭଳି କଠିନ ପରିସ୍ଥିତି ଉପୁଜି ନ ଥାନ୍ତା । କୋଭିଡ୍‌ରେ କ୍ଲିନିକ୍ ଟ୍ରିଟମେଣ୍ଟ ପ୍ରୋଟୋକଲ୍ ରହିଛି । ସେଥିରେ ତିନି ପ୍ରକାର ତୀବ୍ରତା କଥା କୁହାଯାଇଛି – ହାଲ୍‌କା ବା ମାଇଲ୍ଡ କୋଭିଡ୍‌, ମଧ୍ୟମ ବା ମଡ୍‌ରେଟ୍ କୋଭିଡ୍ ଏବଂ ତୀବ୍ର ବା ସିଭିୟର୍ କୋଭିଡ୍। ମାଇଲ୍ଡ୍ କୋଭିଡ୍ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଆମେ ଅକ୍ସିଜେନ୍ ମନିଟରିଂ ବା ଅମ୍ଳଜାନର ମାତ୍ରାକୁ ତଦାରଖ କରିଥାଉ, ଜ୍ୱର ବଢ଼ିଗଲେ ବେଳେବେଳେ ପାରାସିଟାମଲ୍ ଭଳି ଔଷଧ ବ୍ୟବହାର କରିଥାଉ । ଏଭଳି ପରିସ୍ଥିତିରେ ନିଜର ଚିକିତ୍ସକଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ନେବା ଉଚିତ । ମଧ୍ୟମ ଏବଂ ତୀବ୍ର କୋଭିଡ୍ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଡାକ୍ତରଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ନେବା ନିହାତି ଜରୁରୀ । ଭଲ ଔଷଧ ସୁଲଭ ମୂଲ୍ୟରେ ଉପଲବ୍ଧ । ସେଥିରେ ରହିଥିବା ଷ୍ଟେରଏଡ୍ ଜୀବନ ରକ୍ଷା କରିପାରେ । ଇନ୍‌ହେଲର୍ ଏବଂ ଟ୍ୟାବଲେଟ୍ ମଧ୍ୟ ଦିଆଯାଇପାରେ । ତା’ସହିତ ଅମ୍ଳଜାନ ମଧ୍ୟ ଦେବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ । ଏଥିପାଇଁ ଛୋଟ ଛୋଟ ଚିକିତ୍ସାମାନ ରହିଛି, କିନ୍ତୁ, ପ୍ରାୟତଃ ଦେଖାଯାଇଥାଏ ଯେ, ଗୋଟିଏ ନୂଆ ପ୍ରୟୋଗାତ୍ମକ ଔଷଧ ରହିଛି, ଯାହାର ନାଁ ରେମ୍‌ଡେସିଭିର୍ । ଏହି ଔଷଧ ଯୋଗୁଁ ଗୋଟିଏ କଥା ନିଶ୍ଚିତ ହୋଇଥାଏ ଯେ ଡାକ୍ତରଖାନାରେ ୨-୩ ଦିନ କମ୍ ରହିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ ଏବଂ କ୍ଲିନିକାଲ୍ ରିକଭରିରେ ଏହା ଟିକିଏ ସାହାଯ୍ୟ କରିଥାଏ । ଏ ଔଷଧ ପୁଣି କେତେବେଳେ କାମ କରେ? ଯଦି ଏହି ଔଷଧକୁ ପ୍ରଥମ ୯-୧୦ ଦିନରେ ଦିଆଯାଏ ତାହେଲେ ଏହା ଭଲ କାମ କରିଥାଏ । ଆଉ ଏହାକୁ ପାଂଚଦିନ ଦେବାକୁ ହୋଇଥାଏ। ତେଣୁ ଲୋକେ ରେମ୍‌ଡେସିଭିର ପଛରେ ଯେମିତି ଧାଇଁଛନ୍ତି, ତାହା ଉଚିତ ନୁହେଁ । ଏହି ଔଷଧକୁ ଅତି ଜରୁରୀ ନ ଥିଲେ ଦିଆଯାଏ ନାହିଁ । ଯେଉଁମାନଙ୍କର ଅମ୍ଳଜାନ ଦରକାର ହୋଇଥାଏ, ଯେଉଁମାନଙ୍କୁ ଡାକ୍ତରଖାନାରେ ଭର୍ତି ହେବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ, ସେହିମାନେ ହିଁ ଡାକ୍ତରଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ଅନୁସାରେ ଏହି ଔଷଧ ପ୍ରୟୋଗ କରିବା ଉଚିତ। ସମସ୍ତେ ଏକଥା ବୁଝିବା ନିହାତି ଆବଶ୍ୟକ । ଯଦି ଆମେ ପ୍ରାଣାୟାମ କରିବା, ଆମର ଶରୀରର ଫୁସ୍‌ଫୁସ୍‌କୁ ପ୍ରସାରିତ କରିବା ଏବଂ ରକ୍ତକୁ ପତଳା କରିବା ପାଇଁ ଯେଉଁ ଇଞ୍ଜେକସନ ଦିଆଯାଇଥାଏ, ଯାହାକୁ ଆମେ ହେପାରିନ୍ କହୁଁ, ଏହି ଛୋଟ ଛୋଟ ଔଷଧରେ ହିଁ ଶତକଡ଼ା ୯୮ ଭାଗ ଲୋକେ ଭଲ ହୋଇଯାଆନ୍ତି । କିନ୍ତୁ ମନରେ ସକାରାତ୍ମକ ଭାବନା ରହିବା ବହୁତ ଜରୁରୀ । ଟ୍ରିଟମେଣ୍ଟ ପ୍ରୋଟୋକଲ୍ ଚିକିତ୍ସକଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ଅନୁଯାୟୀ ହେବା ନିହାତି ଆବଶ୍ୟକ । ଦାମିକା ଔଷଧ ପଛରେ ଗୋଡ଼ାଇବାର କୌଣସି ଆବଶ୍ୟକତା ନାହିଁ । ସାର୍‌, ଆମ ନିକଟରେ ଉତମ ଚିକିତ୍ସାର ଉପଲବ୍ଧତା ଅଛି, ଅମ୍ଳଜାନ ରହିଛି, ଭେଣ୍ଟିଲେଟର୍‌ର ସୁବିଧା ରହିଛି - ସବୁ କିଛି ଅଛି ସାର୍‌, ଆଉ ଯଦି କେବେ କେବେ ଏହି ଔଷଧ ମିଳେ ତାହେଲେ ଯୋଗ୍ୟ ରୋଗୀଙ୍କୁ ହିଁ ଦିଆଯିବା ଉଚିତ । ଏହି କ୍ଷେତ୍ରରେ ବହୁତ ଭୁଲ ଧାରଣା ରହିଛି । ତେଣୁ ଏକଥା ସ୍ପଷ୍ଟ କରିଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛି ସାର୍‌, ଯେ ଆମ ପାଖରେ ବିଶ୍ୱର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଚିକିତ୍ସା ଉପଲବ୍ଧ । ଆପଣ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରିବେ ଯେ, ଭାରତରେ ଆରୋଗ୍ୟ ହାର ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ । ଆପଣ ଯଦି ଇଉରୋପ କିମ୍ବା ଆମେରିକା ସହ ତୁଳନା କରିବେ ତାହେଲେ ଦେଖିବେ ଯେ, ତାଙ୍କ ଅପେକ୍ଷା ଆମ ଟ୍ରିଟମେଣ୍ଟ ପ୍ରୋଟୋକଲ୍‌ରେ ଅଧିକ ରୋଗୀ ଭଲ ହେଉଛନ୍ତି ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ -ଡା. ଶଶାଙ୍କ, ଆପଣଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ । ଡା. ଶଶାଙ୍କ ଆମକୁ ଯାହା ସୂଚନା ଦେଲେ, ସେସବୁ ନିହାତି ଜରୁରୀ ଏବଂ ଆମମାନଙ୍କ କାମରେ ଲାଗିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ମୁଁ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କରୁଛି, ଯଦି ଆପଣଙ୍କର କୌଣସି ସୂଚନା ଦରକାର ହୁଏ, ଯଦି କୌଣସି ଆଶଙ୍କା ଥାଏ, ତାହେଲେ ଉଚିତ ସ୍ରୋତରୁ ହିଁ ସୂଚନା ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ, ଯେମିତିକି ଆପଣଙ୍କ ଫ୍ୟାମିଲି ଡାକ୍ତର ହୁଅନ୍ତୁ, ପାଖରେ ଥିବା ଡାକ୍ତର ହୁଅନ୍ତୁ, ଆପଣ ସେମାନଙ୍କୁ ଟେଲିଫୋନରେ ଯୋଗାଯୋଗ କରି ତାଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ । ମୁଁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରୁଛି, ଆମର ଅନେକ ଡାକ୍ତର ସ୍ୱୟଂ ଏହି ଦାୟିତ୍ୱ ଗ୍ରହଣ କରୁଛନ୍ତି । ଅନେକ ଡାକ୍ତର ସାମାଜିକ ଗଣମାଧ୍ୟମ ଜରିଆରେ ଲୋକଙ୍କୁ ସୂଚନା ପ୍ରଦାନ କରୁଛନ୍ତି । ଫୋନରେ, ହ୍ୱାଟ୍ସଆପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ବି ପରାମର୍ଶ ଦେଉଛନ୍ତି । ଅନେକ ଡାକ୍ତରଖାନାର ୱେବ୍‌ସାଇଟ୍ ରହିଛି, ଯେଉଁଠି ସୂଚନା ଉପଲବ୍ଧ ହେଉଛି । ସେଠାରେ ଆପଣ ଡାକ୍ତରଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ମଧ୍ୟ ନେଇପାରିବେ । ଏହା ବହୁତ ପ୍ରଶଂସନୀୟ ।

ମୋ ସହିତ ଶ୍ରୀନଗରରୁ ଡାକ୍ତର ନାୱିଦ୍ ନଜିର ଶାହ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଛନ୍ତି । ଡାକ୍ତର ନାୱିଦ୍ ହେଉଛନ୍ତି ଶ୍ରୀନଗରର ଗୋଟିଏ ସରକାରୀ ଭେଷଜ ମହାବିଦ୍ୟାଳୟର ଜଣେ ପ୍ରଫେସର । ଡା. ନାୱିଦ୍ ନିଜ ଉଦ୍ୟମରେ ଅନେକ କରୋନା ରୋଗୀଙ୍କୁ ସୁସ୍ଥ କରିସାରିଛନ୍ତି, ତା’ଛଡ଼ା ରମଜାନ୍‌ର ଏହି ପବିତ୍ର ମାସରେ ବି ଡା. ନାୱିଦ୍ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଚାଲିଛନ୍ତି । ସେ ଆମ ସହିତ କଥା ହେବାପାଇଁ ସମୟ ମଧ୍ୟ ବାହାର କରିଛନ୍ତି । ଆସନ୍ତୁ ତାଙ୍କରି ସହ କଥା ହେବା ।

ମୋଦି ଜୀ - ନାୱିଦ୍ ଜୀ ନମସ୍କାର ।

ଡା. ନାୱିଦ୍‌ - ନମସ୍କାର ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଡା. ନାୱିଦ୍‌, ଆମ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍‌’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ଏହି କଠିନ ସମୟରେ ପାନିକ୍ ମାନେଜ୍‌ମେଣ୍ଟ ସମ୍ପର୍କରେ ପ୍ରଶ୍ନ ଉତ୍‌ଥାପନ କରିଛନ୍ତି । ଆପଣ ନିଜ ଅନୁଭୂତିରୁ ସେମାନଙ୍କୁ କ’ଣ ଉତର ଦେବେ?

ଡା. ନାୱିଦ୍‌- ଦେଖନ୍ତୁ, କରୋନା ଆରମ୍ଭ ହେବା ସମୟରେ କାଶ୍ମୀରର ଯେଉଁ ହସପିଟାଲକୁ ପ୍ରଥମ କୋଭିଡ ହସ୍‌ପିଟାଲ୍ ଭାବରେ ରୂପାନ୍ତରିତ କରାଯାଇଥିଲା, ତାହାଥିଲା ଆମର ସିଟି ହସପିଟାଲ୍ । ସେହି ହସ୍‌ପିଟାଲ ଭେଷଜ ମହାବିଦ୍ୟାଳୟ ଅଧିନରେ ହିଁ ରହିଛି । ସେତେବେଳେ ଗୋଟିଏ ଭୟର ବାତାବରଣ ଥିଲା । ଲୋକଙ୍କ ମନରେ ତ ଏହା ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ ରହିଥିଲା, ଯେ ଯଦି କେହି କରୋନା ସଂକ୍ରମିତ ହେଲା, ତାହେଲେ ତାହାକୁ ମୃତ୍ୟୁଦଣ୍ଡ ବୋଲି ଧରି ନିଆଯାଉଥିଲା । ଆମ ଚିକିତ୍ସାଳୟରେ ଯେଉଁ ଡାକ୍ତରମାନେ କିମ୍ବା ପାରା-ମେଡିକାଲ ଷ୍ଟାଫ୍ କାମ କରୁଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କ ମନରେ ବି ଗୋଟିଏ ଭୟର ବାତାବରଣ ଥିଲା ଯେ, ଏଭଳି ରୋଗୀଙ୍କୁ ଆମେ କେମିତି ଚିକିତ୍ସା କରିବା? ଏଥିରେ ଆମ ପ୍ରତି ସଂକ୍ରମଣର ଭୟ ନାହିଁ ତ? କିନ୍ତୁ ସେହି ସମୟରେ ଆମେ ଅନୁଭବ କଲୁ ଯେ, ଯଦି ଆମେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ସୁରକ୍ଷା ପୋଷାକ (ପ୍ରୋଟେକ୍ଟିଭ୍ ଗିୟର୍‌) ପରିଧାନ କରିବା, ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ସାବଧାନତା ଅବଲମ୍ବନ କରିବା, ତାହେଲେ ଆମେ ନିଜେ ସୁରକ୍ଷିତ ରହିବା ସହ ଆମର ଅନ୍ୟ କର୍ମଚାରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁରକ୍ଷିତ ରହିପାରିବେ । ଆଗକୁ ଆମେ ଏ କଥା ମଧ୍ୟ ଲକ୍ଷ୍ୟ କଲୁ ଯେ, କିଛି ରୋଗୀଙ୍କଠାରେ କୌଣସି ଲକ୍ଷଣ ପ୍ରକାଶ ପାଉନଥିଲା । ଆମେ ଦେଖିଲୁ ଯେ, ପ୍ରାୟଃ ଶତକଡ଼ା ୯୦ରୁ ୯୫ ଭାଗରୁ ଅଧିକ ରୋଗୀ ବିନା ଚିକିତ୍ସାରେ ମଧ୍ୟ ଆରୋଗ୍ୟ ଲାଭ କରୁଛନ୍ତି । ତେଣୁ ସମୟକ୍ରମେ ଲୋକଙ୍କ ମନରୁ କରୋନା ପ୍ରତି ରହିଥିବା ଭୟ ବହୁ ମାତ୍ରାରେ ଦୂର ହେଇଗଲା । ଏବେ ଇଏ ଯେଉଁ ଦ୍ୱିତୀୟ ଲହର ଆସିଛି, ଏଥିରେ ମଧ୍ୟ ଭୟଭୀତ ହେବା ଦରକାର ନାହିଁ । ଏଥର ମଧ୍ୟ ଯେଉଁ ସବୁ ସୁରକ୍ଷା ଉପାୟ ରହିଛି, ଯାହା ଏସ୍‌.ଓ.ପି. ରହିଛି, ସେଗୁଡ଼ିକ ଅବଲମ୍ବନ କଲେ – ଯେମିତିକି ମାସ୍କ ପିନ୍ଧିବା, ହ୍ୟାଣ୍ଡ ସାନିଟାଇଜର ବ୍ୟବହାର କରିବା, ସାମାଜିକ ଦୂରତା ରକ୍ଷା କରିବା କିମ୍ବା ସାମାଜିକ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଏକାଠି ହେବା ଆଦିକୁ ଏଡ଼ାଇ ଦେଲେ, ଆମ ଦୈନନ୍ଦିନ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ଆମେ ସୁଚାରୁ ରୂପେ କରିପାରିବା ଏବଂ ଏହି ବ୍ୟାଧିରୁ ସୁରକ୍ଷା ମଧ୍ୟ ପାଇପାରିବା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଡା. ନାୱିଦ୍‌, ଟିକାକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଲୋକଙ୍କ ମନରେ ଅନେକ ପ୍ରଶ୍ନ ରହିଛି, ଯେମିତିକି - ଟିକା କେତେ ସୁରକ୍ଷା ପ୍ରଦାନ କରିପାରିବ, ଟିକା ନେବା ପରେ ଆମେ ସୁରକ୍ଷିତ ବୋଲି ଆଶ୍ୱସ୍ତ ହୋଇପାରିବା କି? ଏ ବିଷୟରେ ଆପଣ ଏଠାରେ କିଛି କୁହନ୍ତୁ । ଶ୍ରୋତାମାନେ ବହୁତ ଉପକୃତ ହେବେ ।

ଡା. ନାୱିଦ୍‌-କରୋନା ସଂକ୍ରମଣ କଥା ଯେବେଠାରୁ ଆମ ସାମ୍‌ନାକୁ ଆସିଲା, ସେଦିନଠାରୁ ଆଜି ଯାଏ ଆମ ପାଖରେ କୋଭିଡ୍‌-୧୯ ପାଇଁ କୌଣସି ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ଚିକିତ୍ସା ନାହିଁ । ତେଣୁ, ଆମେ କେବଳ ଦୁଇଟି ଉପାୟରେ ଏହି ସମସ୍ୟାକୁ ପ୍ରତିହତ କରିପାରିବା । ପ୍ରଥମତଃ ସୁରକ୍ଷା ଉପାୟ ଏବଂ ଦ୍ୱିତୀୟରେ ଯଦି କୌଣସି ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ଟିକା ଆମକୁ ମିଳିଯାଏ, ତାହା ଆମକୁ ଏହି ରୋଗରୁ ମୁକ୍ତି ଦେଇପାରିବ । ଆମ ଦେଶରେ ଏବେ ଦୁଇଟି ଟିକା ଉପଲବ୍ଧ - କୋଭାକ୍ସିନ ଓ କୋଭିସିଲ୍ଡ, ଯାହା ଆମରି ଦେଶରେ ତିଆରି ହୋଇଥିବା ଟିକା । କମ୍ପାନୀମାନେ କରିଥିବା ପ୍ରୟୋଗରେ ଦେଖାଯାଇଛି ଯେ, ଏହାର କାର୍ଯ୍ୟକାରିତା ୬୦ ପ୍ରତିଶତରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ । ଆଉ, ଜାମ୍ମୁ-କାଶ୍ମୀର କଥା କହିବାକୁ ଗଲେ, ଆମ କେନ୍ଦ୍ରଶାସିତ ଅଞ୍ଚଳରେ ଏ ଯାଏ ୧୫ରୁ ୧୬ ଲକ୍ଷ ଲୋକ ଏହି ଟିକା ନେଇସାରିଛନ୍ତି । ହଁ, ସାମାଜିକ ଗଣମାଧ୍ୟମରେ ଏହାକୁ ନେଇ କିଛି ଭ୍ରମଧାରଣା ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଛି ଯେ ଏହାର ଏ ସବୁ ପାର୍ଶ୍ଵ ପ୍ରତିକ୍ରିୟା ରହିଛି । କିନ୍ତୁ ଆମ ପାଖରେ ଯେଉଁମାନେ ଏ ଟିକା ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କଠାରେ କୌଣସି ପାର୍ଶ୍ଵ ପ୍ରତିକ୍ରିୟା ଦେଖାଯାଇନି । କେବଳ ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଟିକା କ୍ଷେତ୍ରରେ ଦେଖାଯାଏ, କାହାକୁ ଟିକିଏ ଜ୍ୱର ହୋଇଥାଏ, କାହାକୁ ସାରା ଶରୀର ଦରଜ ବା କାହାକୁ ଇଂଜେକ୍ସନ ଦିଆଯାଇଥିବା ସ୍ଥାନରେ ଦରଜ ହେବାଭଳି ସାମାନ୍ୟ ପାଶ୍ୱର୍ ପ୍ରତିକ୍ରିୟା ଆମେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ରୋଗୀଙ୍କଠାରେ ଦେଖିବାକୁ ପାଇଛୁ, କିନ୍ତୁ ମୋଟାମୋଟି ସେମିତି କୌଣସି ବଡ଼ ଧରଣର ପାର୍ଶ୍ଵ ପ୍ରତିକ୍ରିୟା ଆମେ ଦେଖିବାକୁ ପାଇନୁ । ଆଉ ହଁ, ଦ୍ୱିତୀୟ କଥା, ଲୋକଙ୍କ ମନରେ ଯାହା ଆଶଙ୍କା ଥିଲା ଯେ, କିଛି ଲୋକ ଟିକା ନେବାପରେ ମଧ୍ୟ ପଜେଟିଭ୍ ହୋଇଗଲେ, ସେ କ୍ଷେତ୍ରରେ କମ୍ପାନୀର ଗାଇଡ୍‌ଲାଇନ୍ ରହିଛି ଯେ, ଟିକା ନେବାପରେ ଯଦି କୌଣସି ବ୍ୟକ୍ତି ସଂକ୍ରମିତ ହୁଅନ୍ତି, ତା ହେଲେ ସେ ପଜିଟିଭ୍ ହୋଇପାରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ରୋଗର ସିଭିୟରିଟି ବା ସେହି ରୋଗୀମାନଙ୍କଠାରେ ଏହା ସେତେଟା ଘାତକ ହେବନି । ତେଣୁ ଟିକା ବିଷୟରେ ଆମ ମନରେ ଯାହା କିଛି ଭ୍ରମଧାରଣା ରହିଛି, ତାହା ଆମେ ମନରୁ ଦୂର କରିଦେବା ଉଚିତ ଏବଂ ଆଉ ଯାହାର ପାଳି ଆସିବ ମଇ ୧ ତାରିଖରୁ ଆମ ଦେଶରେ ଯେଉଁମାନଙ୍କ ବୟସ ୧୮ ବର୍ଷରୁ ଉର୍ଦ୍ଧ୍ୱ, ସେମାନଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆଯିବାର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ଆରମ୍ଭ ହେବ । ତେଣୁ, ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଏହାହିଁ ଅନୁରୋଧ କରିବୁ ଯେ, ଆପଣମାନେ ଆସନ୍ତୁ – ଟିକା ନିଅନ୍ତୁ ଏବଂ ନିଜକୁ ସୁରକ୍ଷିତ କରନ୍ତୁ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଆମର ସମଗ୍ର ସମାଜ କୋଭିଡ-୧୯ର ସଂକ୍ରମଣରୁ ସୁରକ୍ଷିତ ହୋଇଯିବ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଡା. ନାୱିଦ୍‌, ଆପଣଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କୁ ରମଜାନ ମାସ ଉପଲକ୍ଷେ ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭେଚ୍ଛା ।

ଡା. ନାୱିଦ୍‌- ଅନେକ ଅନେକ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, କରୋନାର ଏହି ସଙ୍କଟ ସମୟରେ ଟିକାର ଗୁରୁତ୍ୱ ସମସ୍ତେ ଉପଲବ୍ଧି କରୁଛନ୍ତି । ତେଣୁ, ଟିକାକୁ ନେଇ କୌଣସି ଗୁଜବରେ ବିଶ୍ୱାସ ନ କରିବା ପାଇଁ ମୁଁ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କରୁଛି । ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ଜାଣିଥିବେ ଯେ, ଭାରତ ସରକାରଙ୍କ ତରଫରୁ ସମସ୍ତ ରାଜ୍ୟ ସରକାରଙ୍କୁ ମାଗଣା ଟିକା ଯୋଗାଇ ଦିଆଯାଇଛି । ଯାହାର ଲାଭ ୪୫ ବର୍ଷରୁ ଉର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ବୟସର ସମସ୍ତ ବ୍ୟକ୍ତି ନେଇପାରିବେ । ଏବେ ତ ମଇ ୧ ତାରିଖରୁ ଦେଶରେ ୧୮ ବର୍ଷ ବୟସରୁ ଉର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କ ପାଇଁ ଟିକା ଉପଲବ୍ଧ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଏବେ ଦେଶର କର୍ପୋରେଟ୍ ସେକ୍ଟର, କମ୍ପାନୀମାନେ ମଧ୍ୟ ନିଜ କର୍ମଚାରୀମାନଙ୍କୁ ଟିକା ଦେବାର ଅଭିଯାନରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କରିପାରିବେ । ମୁଁ ଏ କଥା ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି ଯେ, ଭାରତ ସରକାରଙ୍କ ତରଫରୁ ମାଗଣା ଟିକା ଦେବାର ଯେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ଏବେ ଚାଲିଛି, ତାହା ଆଗକୁ ମଧ୍ୟ ଜାରି ରହିବ । ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମୋର ଅନୁରୋଧ ଯେ, ସେମାନେ ଭାରତ ସରକାରଙ୍କର ଏହି ମାଗଣା ଟିକା ଅଭିଯାନର ଲାଭ ନିଜ ରାଜ୍ୟର ଅଧିକାଂଶ ଲୋକଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚାନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମେ ସମସ୍ତେ ଜାଣିଛୁ ଯେ, ରୋଗ ହେଲେ ଆମ ପାଇଁ ଆମର, ନିଜ ପରିବାରର ଯତ୍ନ ନେବା – ମାନସିକ ସ୍ତରରେ କେତେ କଠିନ କାର୍ଯ୍ୟ । କିନ୍ତୁ, ଆମ ଚିକିତ୍ସାଳୟର ନର୍ସିଂ ଷ୍ଟାଫ୍‌ମାନଙ୍କୁ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ନିରନ୍ତର ଭାବେ ଅନେକ ରୋଗୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ । ଏହି ସେବା ଭାବନା ଆମ ସମାଜର ଗୋଟିଏ ବହୁତ ବଡ଼ ଶକ୍ତି । ନର୍ସିଂ ଷ୍ଟାଫ୍‌ଙ୍କ ଦ୍ୱାରା କରାଯାଉଥିବା ସେବାକାର୍ଯ୍ୟ ଏବଂ ପରିଶ୍ରମ ସମ୍ପର୍କରେ ସବୁଠୁ ଭଲ ଭାବେ କୌଣସି ନର୍ସ ହିଁ କହିପାରିବେ । ତେଣୁ ମୁଁ ରାୟପୁରର ଡ. ବି.ଆର୍‌. ଆମ୍ବେଦକର୍ ମେଡିକାଲ କଲେଜ ହସ୍ପିଟାଲରେ ନିଜର ସେବା ପ୍ରଦାନ କରୁଥିବା ସିଷ୍ଟର ଭାବ୍‌ନା ଧୃବଙ୍କୁ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍‌’ରେ ନିମନ୍ତ୍ରିତ କରିଛି । ସେ ଅନେକ କରୋନା ରୋଗୀଙ୍କ ଯତ୍ନ ନେଉଛନ୍ତି । ଆସନ୍ତୁ, ତାଙ୍କରି ସହ କଥା ହେବା ।

ମୋଦି ଜୀ - ନମସ୍କାର ଭାବନା ଜୀ ।

ଭାବନା - ଆଦରଣୀୟ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମହୋଦୟ ନମସ୍କାର ।

ମୋଦି ଜୀ - ଭାବନା ଜୀ . . .

ଭାବନା - ୟେସ୍ ସାର୍ . . .

ମୋଦି ଜୀ - ‘ମନ୍ କି ବାତ୍‌’ର ଶ୍ରେତୋମାନଙ୍କୁ ଆପଣ ନିଶ୍ଚୟ କୁହନ୍ତୁ ଯେ, ଆପଣଙ୍କ ପରିବାରର ଦାୟିତ୍ୱ ଓ ବିଭିନ୍ନ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଙ୍ଗକୁ ଆପଣ କରୋନା ରୋଗୀମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଯତ୍ନ ନେଉଛନ୍ତି । କରୋନା ରୋଗୀମାନଙ୍କ ସହିତ ଆପଣଙ୍କ ଅନୁଭୂତି କିଭଳି ଥିଲା, ତାହା ଦେଶବାସୀ ନିଶ୍ଚୟ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହିଁବେ କାରଣ, ସିଷ୍ଟର୍‌ମାନେ, ନର୍ସମାନେ ରୋଗୀଙ୍କ ଅତି ନିକଟ ସଂସ୍ପର୍ଶରେ ଆସନ୍ତି ଏବଂ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଧରି ସେମାନଙ୍କ ନିକଟରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରନ୍ତି । ସେମାନେ ପ୍ରତ୍ୟେକ କଥାକୁ ସୂକ୍ଷ୍ମ ଭାବେ ବୁଝିପାରନ୍ତି । ତେଣୁ କୁହନ୍ତୁ –

ଭାବନା - ଆଜ୍ଞା, କୋଭିଡ୍‌କୁ ନେଇ ମୋର ଦୁଇମାସର ଅନୁଭୂତି ରହିଛି । ଆମେ ୧୪ ଦିନ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛୁ ଏବଂ ୧୪ ଦିନ ପରେ ଆମକୁ ବିଶ୍ରାମ ଦିଆଯାଇଥାଏ । ସାର୍ ପୁଣି ଦୁଇ ମାସ ପରେ ଆମର ଏହି କୋଭିଡ୍ ଡ୍ୟୁଟି ରିପିଟ୍ ହୋଇଥାଏ । ଯେତେବେଳେ ପ୍ରଥମେ ମୋର କୋଭିଡ୍ ଡ୍ୟୁଟି ପଡ଼ିଲା, ସେତେବେଳେ ମୁଁ ନିଜ ପରିବାର ଲୋକଙ୍କୁ ଏ କଥା ଜଣାଇଲି । ଏହା ଗତବର୍ଷ ମଇ ମାସର କଥା । ମୁଁ କହିବା ମାତ୍ରେ ପରିବାରର ସମସ୍ତେ ଭୟଭୀତ ହୋଇଯାଇଥିଲେ । ବ୍ୟସ୍ତହୋଇ କହିଥିଲେ, ଝିଅ, ସୁରକ୍ଷିତ ହୋଇ କାମ କରିବୁ। ଗୋଟେ ଇମୋସ୍‌ନାଲ୍ ପରିସ୍ଥିତି ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଥିଲା । ମଝିରେ ଯେତେବେଳେ ମୋ ଝିଅ ମୋତେ ପଚାରିଲା – ମା’ ତମେ କୋଭିଡ୍ ଡ୍ୟୁଟି କରିବାକୁ ଯାଉଛ? ତାହା ମୋ ପାଇଁ ସବୁଠୁ ବଡ଼ ଇମୋସନାଲ ମୋମେଂଟ ଥିଲା । କିନ୍ତୁ, ମୁଁ ଯେତେବେଳେ କୋଭିଡ୍ ରୋଗୀ ପାଖକୁ ଗଲି, ମୁଁ ଗୋଟିଏ ଦାୟିତ୍ୱ ଘରେ ଛାଡ଼ିଦେଇ ଯାଇଥିଲି ଆଉ ସାର୍ ମୁଁ ଯେତେବେଳେ କୋଭିଡ୍‌ରୋଗୀଙ୍କ ସହ ମିଶିଲି, ମୋ ଝିଅ ଆହୁରି ଅଧିକ ବ୍ୟତିବ୍ୟସ୍ତ ହୋଇପଡ଼ିଲା । ସାର୍‌, କୋଭିଡ୍ ନାଁରେ ସବୁ ରୋଗୀ ଏତେ ଭୟଭୀତ ଥିଲେ ଯେ, ସେମାନଙ୍କ ସହ କ’ଣ ଚାଲିଛି, ଆଗକୁ ଆମେ କ’ଣ କରିବାକୁ ଯାଉଛୁ - ତାହା ସେମାନେ ବୁଝିପାରୁ ନ ଥିଲେ । ଆମେ ତାଙ୍କ ଭୟକୁ ଦୂର କରିବା ପାଇଁ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ଖୁବ୍ ଭଲ ବ୍ୟବହାର କରିବା ସହ ତାଙ୍କୁ ଗୋଟିଏ ଉତମ ସୁସ୍ଥ ବାତାବରଣ ଦେଲୁ । ଯେବେଠାରୁ ଆମକୁ ଏହି କୋଭିଡ୍ ଡ୍ୟୁଟି କରିବାକୁ କୁହାଗଲା, ସେତେବେଳେ ସର୍ବପ୍ରଥମେ ଆମକୁ ପି.ପି.ଇ. କିଟ୍ ପିନ୍ଧିବାକୁ କୁହାଗଲା, ଯାହା ବହୁତ କଷ୍ଟଦାୟକ । ପି.ପି.ଇ. କିଟ୍ ପିନ୍ଧି ଡ୍ୟୁଟି କରିବା ଆମମାନଙ୍କ ପାଇଁ ବହୁତ କଠିନ ଥିଲା । ସାର୍‌, ଦୁଇ ମାସର କାର୍ଯ୍ୟରେ ମୁଁ ୱାର୍ଡ଼ରେ, ଆଇ.ସି.ୟୁ.ରେ, ଆଇସୋଲେସନ୍‌ରେ – ଏହିଭଳି ପ୍ରତ୍ୟେକ ସ୍ଥାନରେ ୧୪-୧୪ ଦିନ ଡ୍ୟୁଟି କଲି ।

ମୋଦି ଜୀ - ମାନେ, କହିବାକୁ ଗଲେ ଆପଣ ଗତ ଏକବର୍ଷ ଧରି ଏହି କାମ କରୁଛନ୍ତି ।

ଭାବନା - ହଁ ସାର୍‌, ସେଠି ଯିବା ଆଗରୁ ମୁଁ ଏକଥା ଜାଣି ନ ଥିଲି ଯେ, କେଉଁମାନେ ମୋ ସହକର୍ମୀ । ଆମେ ଗୋଟିଏ ଟିମ୍ ମେମ୍ବର ଭାବେ କାମ କଲୁ । ତାଙ୍କର ଯାହା ସମସ୍ୟା ଥିଲା, ସେସବୁକୁ ଶେୟାର କଲୁ । ଆମେ ରୋଗୀଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣିଲୁ ଏବଂ ତାଙ୍କର ମନରେ ଥିବା ଭ୍ରାନ୍ତିକୁ ଦୂର କଲୁ । ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଅନେକ ଏଭଳି ଥିଲେ, ଯେଉଁମାନେ କୋଭିଡ୍ ନାଁ କୁ ହିଁ ଭୟ କରୁଥିଲେ । ସେମାନଙ୍କ ହିଷ୍ଟ୍ରି ଲେଖିବା ବେଳକୁ ସେମାନଙ୍କଠାରେ ମଧ୍ୟ ସେହି ଲକ୍ଷଣମାନ ଦେଖାଦେଉଥିଲା । କିନ୍ତୁ ଭୟରେ ସେମାନେ ନିଜର ଟେଷ୍ଟ କରାଇ ପାରୁନଥିଲେ । ସେତେବେଳେ, ଆମେ ତାଙ୍କୁ ବୁଝାଉଥିଲୁ, ଆଉ ସାର୍‌, ଯେତେବେଳେ ରୋଗୀର ଅବସ୍ଥା ଗୁରୁତର ହେଉଥିଲା, ସେତେବେଳେ ତାଙ୍କ ଫୁସ୍‌ଫୁସ୍ ସଂକ୍ରମିତ ହୋଇସାରିଥିଲା । ସେତେବେଳେ ସେମାନଙ୍କୁ ଆଇ.ସି.ୟୁ.ର ଆବଶ୍ୟକତା ପଡ଼ୁଥିଲା । ସେତେବେଳେ ସେମାନେ ଡାକ୍ତରଖାନାକୁ ଆସୁଥିଲେ ଏବଂ ସାଙ୍ଗରେ ତାଙ୍କର ପୁରା ପରିବାର ଆସୁଥିଲେ । ଆମେ ସେହିଭଳି ଗୋଟିଏ ଦୁଇଟି କେସ୍ ଦେଖିଥିଲୁ । ଆମେ ସବୁ ବୟସର ଲୋକଙ୍କ ସଂସ୍ପର୍ଶରେ ଆସିଲୁ – ଯେଉଁଥିରେ ଛୋଟ ପିଲା, ମହିଳା, ପୁରୁଷ, ବୟସ୍କ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କ ଭଳି ସବୁ ଶ୍ରେଣୀର ରୋଗୀ ଥିଲେ ସାର୍ । ଆମେ ସେମାନଙ୍କ ସହ କଥା ହେଲୁ । ସମସ୍ତେ ଏ କଥା କହିଲେ ଯେ, ଆମେ ଭୟଭୀତ ହୋଇପଡ଼ିଥିବାରୁ ଆଗରୁ ଆସିପାରିଲୁନି । ସମସ୍ତଙ୍କଠାରୁ ଏହି ଉତ୍ତର ମିଳିଲା ସାର୍ । ଆମେ ତାଙ୍କୁ ବୁଝାଇଲୁ ଯେ, ଭୟ କରିବାର କିଛି ନାହିଁ । ଆପଣ ଆମକୁ ସହଯୋଗ କରନ୍ତୁ, ଆମେ ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କୁ ସହଯୋଗ କରିବୁ । ଆପଣ କେବଳ ପ୍ରୋଟୋକଲ୍‌କୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତୁ । ଆମେ ଏତିକି ମାତ୍ର କଲୁ ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଭାବନା ଜୀ, ଆପଣଙ୍କ ସହ କଥାହୋଇ ମୋତେ ବହୁତ ଭଲ ଲାଗିଲା । ଆପଣ ନିଜ ଅନୁଭୂତିରୁ ଖୁବ ଉପାଦେୟ ସୂଚନା ଦେଇଛନ୍ତି । ତେଣୁ ଏହାଦ୍ୱାରା ଦେଶବାସୀଙ୍କ ନିକଟକୁ ନିଶ୍ଚୟ ଗୋଟିଏ ସକାରାତ୍ମକ ବାର୍ତା ଯିବ । ଆପଣଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ, ଭାବନା ଜୀ ।

ଭାବନା - ଥାଙ୍କ୍ ୟୁ ସୋ ମଚ୍ ସାର୍ . . . ଥାଙ୍କ୍ ୟୁ ସୋ ମଚ୍‌, ଜୟହିନ୍ଦ ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଜୟହିନ୍ଦ ।

ଭାବନା ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କଭଳି ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ନର୍ସିଂ ଭାଇ-ଭଉଣୀ ଖୁବ୍ ସୁନ୍ଦର ଭାବେ ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ସମ୍ପାଦନ କରୁଛନ୍ତି । ଏହା ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଖୁବ୍ ପ୍ରେରଣାଦାୟକ । ଆପଣ ନିଜ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ବହୁତ ସଚେତନ ରୁହନ୍ତୁ । ନିଜ ପରିବାରର ମଧ୍ୟ ଯତ୍ନ ନିଅନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ ସହ ଏବେ ବେଙ୍ଗାଲୁରୁରୁ ସିଷ୍ଟର ସୁରେଖା ଜୀ ମଧ୍ୟ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଛନ୍ତି । ସୁରେଖା ଜୀ, କେ.ସି. ଜେନେରାଲ ହସ୍ପିଟାଲ୍‌ରେ ସିନିୟର ନର୍ସିଂ ଅଫିସର ଭାବେ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି । ଆସନ୍ତୁ, ତାଙ୍କ ଅନୁଭୁତି ବି ଜାଣିବା –

ମୋଦି ଜୀ - ନମସ୍ତେ ସୁରେଖା ଜୀ ।

ସୁରେଖା - ଆମ ଦେଶର ମାନ୍ୟବର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ସହ କଥାହେବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିବାରୁ ମୁଁ ଖୁବ୍ ଆନନ୍ଦିତ ଓ ଗର୍ବିତ ଅନୁଭବ କରୁଛି ।

ମୋଦି ଜୀ - ସୁରେଖା ଜୀ, ଆପଣ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ସାଥୀ ନର୍ସ ଓ ହସପିଟାଲ୍ କର୍ମଚାରୀମାନେ ଖୁବ୍ ସୁନ୍ଦର କାମ କରୁଛନ୍ତି । ଦେଶ ଆପଣମାନଙ୍କ ନିକଟରେ କୃତଜ୍ଞତା ପ୍ରକାଶ କରୁଛି । କୋଭିଡ୍‌-୧୯ ବିରୋଧରେ ଲଢ଼ିବା ପାଇଁ ଆପଣ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ କି ବାର୍ତ୍ତା ଦେବେ?

ସୁରେଖା- ହଁ ସାର୍ ... ଜଣେ ଦାୟିତ୍ୱବାନ ନାଗରିକ ଭାବେ ମୁଁ ପ୍ରଥମେ କିଛି କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଦୟାକରି ନିଜ ପଡ଼ୋଶୀଙ୍କ ସହ ସହାନୁଭୂତିଶୀଳ ହୁଅନ୍ତୁ ଏବଂ ଆଗୁଆ ପରୀକ୍ଷା ଓ ଠିକ୍ ଅନୁସନ୍ଧାନ ଆମକୁ ମୃତ୍ୟୁହାର କମାଇବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ । ଯଦି ଆପଣ ନିଜଠାରେ କୌଣସି ଲକ୍ଷଣ ଦେଖିବାକୁ ପାଆନ୍ତି, ତେବେ ପାଖ ଡାକ୍ତରଙ୍କୁ ଦେଖାନ୍ତୁ ଓ ଯଥାଶୀଘ୍ର ଚିକିତ୍ସିତ ହୁଅନ୍ତୁ । ତେଣୁ ଲୋକେ ଏହି ରୋଗ ସମ୍ପର୍କରେ ସଚେତନ ହେବା ଦରକାର । ସକାରାତ୍ମକ ହୁଅନ୍ତୁ, ଡରନ୍ତୁ ନାହିଁ ଏବଂ ଚିନ୍ତା କରନ୍ତୁ ନାହିଁ । ତା'ଦ୍ୱାରା ରୋଗୀର ଅବସ୍ଥା ଅଧିକ ଖରାପ ହେବ । ଆମେ ଆମ ସରକାରଙ୍କ ନିକଟରେ କୃତଜ୍ଞ । ଟିକା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଆମେ ଗର୍ବିତ ଏବଂ ମୁଁ ନିଜେ ଟିକା ନେଇସାରିଛି । ମୋ ଅଭିଜ୍ଞତାରୁ ମୁଁ ଭାରତର ସବୁ ନାଗରିକଙ୍କୁ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି ଯେ କୌଣସି ଟିକା ୧୦୦ ପ୍ରତିଶତ ସୁରକ୍ଷା ସାଂଗେସାଂଗେ ଦିଏ ନାହିଁ । ପ୍ରତିରୋଧକ ଶକ୍ତି ତିଆରି କରିବା ପାଇଁ ଏହା ସମୟ ନେଇଥାଏ । ଟିକା ନେବାପାଇଁ ଭୟ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ । ଦୟାକରି ନିଜେ ଟିକା ନିଅନ୍ତୁ; ଏହାର ବହୁତ କମ୍ ପାଶ୍ୱର୍ ପ୍ରତିକ୍ରିୟା ରହିଛି ଏବଂ ମୁଁ ଏହି ବାର୍ତା ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛି ଯେ ଘରେ ରୁହନ୍ତୁ, ସୁସ୍ଥ ରହନ୍ତୁ; ଯେଉଁମାନେ ଅସୁସ୍ଥ ଅଛନ୍ତି ସେମାନଙ୍କ ସଂସ୍ପର୍ଶରେ ଆସନ୍ତୁ ନାହିଁ; ନାକ, ଆଖି ପାଟିକୁ ଆବଶ୍ୟକ ନ ଥିଲେ ଛୁଅଁନ୍ତୁ ନାହିଁ । ଦୟାକରି ସାମାଜିକ ଦୂରତା ରଖନ୍ତୁ, ମାସ୍କ ପିନ୍ଧନ୍ତୁ, ସର୍ବଦା ହାତ ଧୁଅନ୍ତୁ ଏବଂ ଘରୋଇ ଉପଚାର କରନ୍ତୁ । ଦୟାକରି ଆୟୁର୍ବେଦିକ କାଢା ପିଅନ୍ତୁ, ବାମ୍ଫ ଆଘ୍ରାଣ କରନ୍ତୁ ଏବଂ ପ୍ରତିଦିନ ପାଟିରେ ପାଣି ଗଳଗଳ କରନ୍ତୁ ଏବଂ ପ୍ରାଣାୟାମ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରନ୍ତୁ । ହଁ, ଶେଷରେ ଆଉ ଗୋଟିଏ କଥା ଦୟାକରି ଆଗଧାଡ଼ିର କର୍ମୀମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସହାନୁଭୂତିଶୀଳ ହୁଅନ୍ତୁ । ଆମକୁ ଆପଣଙ୍କ ସହଯୋଗ ଦରକାର । ଆମେ ମିଳିମିଶି ଲଢ଼େଇ କରିବା । ଆମେ ଏହି ମହାମାରୀକୁ ହରାଇ ଆଗକୁ ଯିବା । ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ଏହାହିଁ ମୋର ବାର୍ତ୍ତା ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଧନ୍ୟବାଦ ସୁରେଖା ଜୀ ।

ସୁରେଖା - ଧନ୍ୟବାଦ ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - ସୁରେଖା ଜୀ, ସତରେ ଆପଣ ବହୁତ କଠିନ ସମୟରେ ନିଜ କର୍ତବ୍ୟ କରିଚାଲିଛନ୍ତି । ଆପଣ ନିଜର ଯତ୍ନ ନିଅନ୍ତୁ । ଆପଣଙ୍କ ପରିବାରକୁ ମଧ୍ୟ ମୋର ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା । ମୁଁ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ଏକଥା ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହେଁ ଯେଉଁଭଳି ଭାବନା ଜୀ ଏବଂ ସୁରେଖା ଜୀ ନିଜ ନିଜର ଅନୁଭବ ବାଣ୍ଟିଛନ୍ତି ସେଥିରେ କରୋନା ସହ ଲଢ଼ିବା ପାଇଁ Positive Spirit ବହୁତ ଜରୁରୀ ଏବଂ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ଏହା ସର୍ବଦା ବଜାୟ ରଖିବାକୁ ପଡ଼ିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଡାକ୍ତର ଓ ନର୍ସିଂ ଷ୍ଟାଫ୍‌ଙ୍କ ସହିତ ଏବେ Lab-Technicians ଏବଂ Ambulance Drivers ଭଳି ସମ୍ମୁଖ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ମଧ୍ୟ ଭଗବାନଙ୍କ ଭଳି କାମ କରୁଛନ୍ତି । ଯେତେବେଳେ କୌଣସି ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ କୌଣସି ରୋଗୀ ନିକଟରେ ପହଂଚୁଛି, ସେତେବେଳେ ତାଙ୍କୁ ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଚାଳକ ଦେବଦୂତ ପରି ହିଁ ମନେହୁଏ । ଏମାନଙ୍କ ସେବା ସମ୍ପର୍କରେ, ଏମାନଙ୍କ ଅଭିଜ୍ଞତା ସମ୍ପର୍କରେ ଦେଶ ନିହାତି ଜାଣିବା ଆବଶ୍ୟକ । ମୋ ସହ ଏବେ ଏପରି ଜଣେ ସଜ୍ଜନ ଅଛନ୍ତି - ଶ୍ରୀମାନ ପ୍ରେମ ବର୍ମା, ଯିଏକି ଜଣେ ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଚାଳକ । ତାଙ୍କ ନାମଭଳି, ଶ୍ରୀ ପ୍ରେମ ବର୍ମା ନିଜର କାମ ଏବଂ କର୍ତବ୍ୟକୁ ସଂପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରେମ ଓ ନିଷ୍ଠାର ସହ କରିଥାନ୍ତି । ଆସନ୍ତୁ ତାଙ୍କ ସହ କଥା ହେବା-

ମୋଦି ଜୀ - ନମସ୍ତେ ପ୍ରେମ୍ ଜୀ ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ନମସ୍ତେ ସାର୍ ।

ମୋଦୀ ଜୀ - ଭାଇ ପ୍ରେମ୍ ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଆପଣ ନିଜ କାମ ସମ୍ପର୍କରେ ବିସ୍ତୃତ ଭାବେ କିଛି କୁହନ୍ତୁ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କର ଯେଉଁ ଅଭିଜ୍ଞତା ରହିଛି ତାହା ବି ଆମକୁ ଜଣାନ୍ତୁ ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ହଁ ସାର୍ । ମୁଁ CATS Ambulanceରେ ଡ୍ରାଇଭର କାମ କରୁଛି ଏବଂ ୧୦୨କୁ ଯୋଉଠୁ କଲ୍ ଆସେ ସେଠାକୁ ଯାଇ ରୋଗୀଙ୍କୁ ଆଣିବାକୁ ପଡ଼େ । ଏହି କାମ ମୁଁ ଦୁଇବର୍ଷ ହେଲା କରିଆସୁଛି। ସୁରକ୍ଷାକିଟ୍‌, ଗ୍ଲୋଭ୍‌ସ, ମାସ୍କ ପିନ୍ଧି ରୋଗୀଙ୍କୁ ଯେଉଁଠି ଡ୍ରପ୍ କରିବାକୁ କୁହାଯାଇଥାଏ କିମ୍ବା ଯେଉଁ ଡାକ୍ତରଖାନାରେ ପହଂଚାଇବାକୁ କୁହାଯାଇଥାଏ ସେଠି ଶୀଘ୍ର ଶୀଘ୍ର ସେମାନଙ୍କୁ ପହଂଚାଇବାକୁ ପଡିଥାଏ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଆପଣ ତ ଟିକାର ଦୁଇଟି ଡୋଜ୍ ନେଇସାରିବେଣି ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ନିଶ୍ଚୟ ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - ତ ଅନ୍ୟ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦେବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରନ୍ତୁ । ଏଥିପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ବାର୍ତା କ'ଣ?

ପ୍ରେମ ଜୀ - ସାର୍ ନିଶ୍ଚୟ । ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଏହି ଟିକା ନେବା ଉଚିତ ଆଉ ପରିବାର ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଭଲ । ଏବେ ମୋତେ ମୋ ମାଆ କହନ୍ତି ଯେ ଏହି ଚାକିରି ଛାଡ଼ିଦେ । ମୁଁ କହିଲି, ମାଆ, ଯଦି ମୁଁ ବି ଚାକିରି ଛାଡ଼ି ବସିଯିବି ତ ଅନ୍ୟ ରୋଗୀମାନଙ୍କୁ କିଏ କେମିତି ଛାଡ଼ିବାକୁ ଯିବ? କାହିଁକିନା ଏହି କରୋନା ସମୟରେ ସମସ୍ତେ ଛାଡ଼ି ପଳାଉଛନ୍ତି । ସମସ୍ତେ ଚାକିରି ଛାଡ଼ିଛୁଡ଼ି ଯାଉଛନ୍ତି । ମାଆ ବି ମୋତେ କହନ୍ତି ଯେ ପୁଅ ସେ ଚାକିରି ଛାଡ଼ିଦେ । ମୁଁ କହିଲି- ନା ମାଆ, ମୁଁ ଚାକିରି ଛାଡ଼ିବିନି ।

ମୋଦି ଜୀ - ପ୍ରେମ୍‌ଜୀ ମାଆଙ୍କୁ ଦୁଃଖୀ କରିବେନି । ମାଆଙ୍କୁ ବୁଝାଇଦେବେ ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ହଁ ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଆପଣ ଯେଉଁ ମାଆଙ୍କ ସହ କଥାବାର୍ତ୍ତା କଥା କହିଲେ ନା ଏହା ବହୁତ ମନଛୁଆଁ ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ହଁ ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଆପଣଙ୍କ ମାଆଙ୍କୁ ମୋର ପ୍ରଣାମ ଜଣାଇଦେବେ ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ନିଶ୍ଚୟ ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଆଉ ପ୍ରେମ୍ ଜୀ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ମାଧ୍ୟମରେ ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଚଳାଉଥିବା ଆମର ଡ୍ରାଇଭର୍ ଭାଇମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି ଯେ ସେମାନେ କେତେ ବଡ଼ କ୍ସସଗ୍ଦଳ ନେଇ କାମ କରୁଛନ୍ତି ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ହଁ ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଆଉ ପ୍ରତ୍ୟେକ ମାଆ କ'ଣ ଭାବିଥାନ୍ତି - ଏକଥା ଯେତେବେଳେ ଶ୍ରୋତାଙ୍କ ପାଖରେ ପହଞ୍ଚିବ ମୁଁ ନିଶ୍ଚିତ କହିବି ଯେ ସେମାନଙ୍କ ହୃଦୟକୁ ଏକଥା ଛୁଇଁଯିବ ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ହଁ ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ପ୍ରେମ୍ ଜୀ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ । ଆପଣ ଏକପ୍ରକାର ପ୍ରେମର ଗଙ୍ଗା ବୁହାଇ ଚାଲିଛନ୍ତି ।

ପ୍ରେମ୍ ଜୀ - ଧନ୍ୟବାଦ ସାର୍ ।

ମୋଦି ଜୀ - ଧନ୍ୟବାଦ ଭାଇ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ପ୍ରେମ୍ ବର୍ମା ଜୀ ଓ ତାଙ୍କପରି ହଜାର ହଜାର ଲୋକ ଆଜି ନିଜର ଜୀବନକୁ ବାଜି ଲଗାଇ ଲୋକଙ୍କର ସେବା କରୁଛନ୍ତି । କରୋନା ବିରୋଧରେ ଚାଲିଥିବା ଏହି ଲଢ଼େଇରେ ଯେତିକି ଜୀବନ ବି ବଞ୍ଚୁଛି ସେଥିରେ ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଚାଳକମାନଙ୍କର ବହୁତ ବଡ଼ ଯୋଗଦାନ ରହିଛି । ପ୍ରେମ୍ ଜୀ ଆପଣଙ୍କୁ ଆଉ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ଥିବା ଆପଣଙ୍କ ସାଥୀମାନଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ସାଧୁବାଦ ଦେଉଛି । ଆପଣ ଠିକ୍ ସମୟରେ ପହଂଚୁଥାନ୍ତୁ, ଜୀବନ ବଞ୍ଚାଉଥାନ୍ତୁ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଏହା ଠିକ୍ ଯେ କରୋନାରେ ବହୁତ ଲୋକ ସଂକ୍ରମିତ ହେଉଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ କରୋନାରୁ ସୁସ୍ଥ ହେଉଥିବା ଲୋକଙ୍କ ସଂଖ୍ୟା ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ବହୁତ ଅଧିକ । ଗୁରୁଗ୍ରାମର ପ୍ରୀତି ଚତୁର୍ବେଦୀ ମଧ୍ୟ ନିକଟରେ କରୋନାକୁ ହରାଇଛନ୍ତି । ପ୍ରୀତି ଜୀ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍‌'ରେ ମୋ ସହ ସଂଯୁକ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି । ତାଙ୍କର ଅଭିଜ୍ଞତା ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର ବେଶ୍ କାମରେ ଆସିବ ।

ପ୍ରୀତି - ନମସ୍କାର ସାର୍ । ଆପଣ କେମିତି ଅଛନ୍ତି?

ମୋଦି ଜୀ - ମୁଁ ଠିକ୍ ଅଛି ଆଜ୍ଞା । ସର୍ବପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ କୋଭିଡ-୧୯ ସହ ସଫଳତାପୂର୍ବକ ଲଢ଼ିଥିବାରୁ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛି ।

ପ୍ରୀତି - Thank you so much sir

ମୋଦି ଜୀ - ମୋର କାମନା ଆପଣଙ୍କ ଶୀଘ୍ର ସୁସ୍ଥ ହୁଅନ୍ତୁ ।

ପ୍ରୀତି - ଧନ୍ୟବାଦ ସାର ।

ମୋଦି ଜୀ - ଏହି ଦ୍ୱିତୀୟ ଲହରରେ ଆପଣ ଏକା ସଂକ୍ରମିତ ହୋଇଛନ୍ତି ନା ପରିବାରର ଅନ୍ୟ କେହି?

ପ୍ରୀତି - ନା ସାର୍ କେବଳ ମୁଁ ସଂକ୍ରମିତ ହୋଇଛି ।

ମୋଦି ଜୀ - ଯାହାହେଉ, ଭଗବାନଙ୍କ କୃପା ଥିଲା । ଆଚ୍ଛା ମୁଁ ଚାହିଁବି ଯଦି ଆପଣଙ୍କ ଅସୁସ୍ଥ ଅବସ୍ଥାର କିଛି ଅଭିଜ୍ଞତା କହନ୍ତେ ତାହାଲେ ବୋଧହୁଏ ଶ୍ରୋତାମାନେ ଏଭଳି ସମୟରେ ନିଜକୁ କିପରି ସମ୍ଭାଳିହେବ ସେ ଦିଗରେ କିଛିଟା ମାର୍ଗଦର୍ଶନ ପାଆନ୍ତେ ।

ପ୍ରୀତି - ଆଜ୍ଞା ନିଶ୍ଚିତ । ସାର୍ ... ଆରମ୍ଭରେ ମୋତେ ବହୁତ ଅବଶ ଲାଗିଲା ଆଉ ତା'ପରେ ମୋ ତଣ୍ଟିରେ କିଛି ଗୋଟେ ଅଟକିବା ଭଳି ମନେହେଲା । ତା'ପରେ ମୋତେ ଜଣାପଡ଼ିଲା ଏଇ ହୁଏତ କରୋନାର ଲକ୍ଷଣ ହୋଇଥାଇପାରେ ତେଣୁ ପରୀକ୍ଷା କରାଇଲି । ତା'ପରଦିନ ରିପୋର୍ଟ ଆସିବାରୁ ଜଣାପଡ଼ିଲା ଯେ ମୁଁ କୋଭିଡ୍ ପଜିଟିଭ, ତେଣୁ ମୁଁ ନିଜେ ନିଜେ ସଂଗରୋଧରେ ରହିଲି । ଗୋଟିଏ କୋଠରିରେ ନିଜକୁ ଏକାନ୍ତବାସରେ ରଖି ଡାକ୍ତରଙ୍କ ସହ ପରାମର୍ଶ କଲି । ତାଙ୍କ ପରାମର୍ଶରେ ଔଷଧ ଖାଇବା ଆରମ୍ଭ କଲି ।

ମୋଦି ଜୀ -ଆପଣଙ୍କର ତ୍ୱରିତ ପଦକ୍ଷେପ ଯୋଗୁଁ ଆପଣଙ୍କ ପରିବାର ବଞ୍ଚିଗଲା ।

ପ୍ରୀତି- ଆଜ୍ଞା ସାର୍ । ସେମାନଙ୍କର ସମସ୍ତଙ୍କର ମଧ୍ୟ ପରେ ପରୀକ୍ଷା କରାଗଲା, ସମସ୍ତେ negative ବାହାରିଲେ, ମୋର ହିଁ positive ଥିଲା । ତା’ପୂର୍ବରୁ ଗୋଟିଏ କୋଠରି ଭିତରେ ମୁଁ ନିଜକୁ ନିଜେ ଅଲଗା ରଖିନେଇଥିଲି । ମୋର ଜରୁରୀ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ସେଇ କୋଠରିରେ ନିଜକୁ ସଂଗରୋଧ କରି ରଖିଥିଲି । ଆଉ ତା'ସହିତ ମୁଁ ପୁଣି ଡାକ୍ତରଙ୍କ ସହିତ ପରାମର୍ଶ କରି ଔଷଧ ଖାଇବା ଆରମ୍ଭ କଲି । ସାର୍‌, ମୁଁ ଔଷଧ ସହ ଯୋଗ, ଆୟୁର୍ବେଦିକ କାଢ଼ା ସେବନ କଲି । ରୋଗ ପ୍ରତିରୋଧକ ଶକ୍ତି ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ ମୁଁ ଖାଇଲା ବେଳେ ଭୋଜନରେ ପ୍ରୋଟିନ୍‌ଯୁକ୍ତ ସୁଷମ ଖାଦ୍ୟ ଖାଇଲି । ପ୍ରଚୁର ପାଣି ଏବଂ ଫଳରସ ପିଇଲି; steam ନେଲି, gargle କଲି, ଆଉ ଉଷୁମ ପାଣି ପିଇଲି । ମୁଁ ସାରାଦିନ ଏହିଭଳି ଭାବେ ଅସୁସ୍ଥତା ସମୟ ବିତାଉଥିଲି । ଆଉ ସାର୍ ଏ ସମୟରେ ସବୁଠୁ ବଡ଼କଥା ହେଲା ଆଦୌ ଭୟଭୀତ ନ ହେବା । ମାନସିକ ଭାବେ ଦୃଢ଼ ରହିବା ପାଇଁ ମୁଁ ବହୁତ ଯୋଗାଭ୍ୟାସ ଏବଂ ପ୍ରାଣାୟାମ କରୁଥିଲି ।

ମୋଦି ଜୀ - ହଁ । ଆଚ୍ଛା ପ୍ରୀତି ଜୀ ... ଏବେ ଯେତେବେଳେ ଆପଣଙ୍କ process ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଇଛି ଆପଣ ସଙ୍କଟରୁ ବାହାରିଆସିଛନ୍ତି?

ପ୍ରୀତି - ହଁ ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଏବେ ପରୀକ୍ଷାରେ negative ଆସିଛି?

ପ୍ରୀତି - ହଁ ଆଜ୍ଞା ।

ମୋଦି ଜୀ - ଏବେ ଆପଣ ନିଜ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟର ଯତ୍ନ ନେବାପାଇଁ କ'ଣ କରୁଛନ୍ତି?

ପ୍ରୀତି - ସାର୍ ଏକରେ ତ ମୁଁ ଯୋଗ କରିବା ବନ୍ଦ କରିନି, କାଢ଼ା ବି ପିଉଛି ଆଉ ନିଜର ରୋଗ ପ୍ରତିରୋଧକ ଶକ୍ତି ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ ସୁଷମ ଖାଦ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଖାଉଛି ।

ମୋଦି ଜୀ - ହଁ ହଁ ।

ପ୍ରୀତି - ଯେଉଁସବୁରେ ମୁଁ ନିଜକୁ ନିଜେ ଅବହେଳା କରୁଥିଲି ସେଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ବେଶୀ ଧ୍ୟାନ ଦେଉଛି।

ମୋଦି ଜୀ - ଧନ୍ୟବାଦ ପ୍ରୀତି ଜୀ ।

ପ୍ରୀତି - Thank you so much sir

ମୋଦି ଜୀ - ଆପଣ ଯେଉଁ ସୂଚନା ଦେଲେ ମୋତେ ଲାଗୁଛି ଯେ ଏହା ବହୁତ ଲୋକଙ୍କର କାମରେ ଆସିବ । ଆପଣ ସୁସ୍ଥ ରୁହନ୍ତୁ । ଆପଣଙ୍କ ପରିବାରର ଲୋକ ସୁସ୍ଥ ରୁହନ୍ତୁ । ମୋର ଆପଣଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଆଜି ଯେମିତି ଆମର Medical Field ଲୋକ Frontline Workers ଦିନରାତି ସେବା କାର୍ଯ୍ୟରେ ଲାଗିଛନ୍ତି ସେହିପରି ସମାଜର ଅନ୍ୟ ଲୋକେ ମଧ୍ୟ ଏବେ ପଛରେ ନାହାନ୍ତି । ଦେଶ ପୁଣିଥରେ ଏକଜୁଟ ହୋଇ କରୋନା ବିରୋଧରେ ଲଢ଼େଇ ଲଢ଼ୁଛି । ଏବେ ମୁଁ ଦେଖୁଛି Quarantineରେ ରହୁଥିବା ପରିବାର ପାଇଁ କିଏ ଔଷଧ ନେଇ ଦେଉଛି ତ ଆଉ କିଏ ପନିପରିବା, କ୍ଷୀର, ଫଳ ଆଦି ନେଇ ଦେଇଆସୁଛନ୍ତି । କିଏ ରୋଗୀଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଯୋଗାଇ ଦେଉଛି । ଦେଶର ବିଭିନ୍ନ କୋଣଅନୁକୋଣରେ ଏହି ଆହ୍ୱାନଭରା ସମୟରେ ସ୍ୱେଚ୍ଛାସେବୀ ସଂଗଠନ ଆଗକୁ ଆସି ଅନ୍ୟର ସାହାଯ୍ୟ ପାଇଁ ଯାହା କରିପାରିବେ ତାହା କରିବାର ପ୍ରୟାସ କରୁଛନ୍ତି । ଏଥର ଗାଁଗୁଡ଼ିକରେ ବି ନୂଆ ସଚେତନତା ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । କୋଭିଡ଼ ନିୟମର କଡ଼ାକଡ଼ି ପାଳନ କରିବା ସହ ଲୋକେ ନିଜ ଗାଁକୁ କରୋନାରୁ ରକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି । ଯେଉଁ ଲୋକେ ବାହାରୁ ଆସୁଛନ୍ତି ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଠିକ୍ ବ୍ୟବସ୍ଥାର ବନ୍ଦୋବସ୍ତ କରାଯାଉଛି । ସହରଗୁଡ଼ିକରେ ମଧ୍ୟ ଅନେକ ଯୁବକ ଆଗକୁ ବାହାରିଛନ୍ତି, ଯେଉଁମାନେ ନିଜ ଅଂଚଳରେ କିପରି କରୋନା ମାମଲା ନ ବଢ଼ିବ ସେଥିପାଇଁ ସ୍ଥାନୀୟ ଲୋକଙ୍କ ସହ ମିଶି ପ୍ରୟାସ କରୁଛନ୍ତି । ଅର୍ଥାତ୍‌, ଗୋଟିଏ ପଟେ ଦେଶ ଦିନରାତି ଡାକ୍ତରଖାନା, ଭେଣ୍ଟିଲେଟର ଆଉ ଔଷଧ ପାଇଁ କାମ କରୁଛି ତ ଅନ୍ୟପଟେ ଦେଶବାସୀ ମଧ୍ୟ କରୋନାର ମୁକାବିଲା ପାଇଁ ପ୍ରାଣପଣେ ଲାଗିପଡ଼ିଛନ୍ତି । ଏହି ଭାବନା ଆମକୁ ଖୁବ୍ ଶକ୍ତି ଦେଉଛି, ବିଶ୍ୱାସ ଦେଉଛି । ଏସବୁ ଯାହାବି ପ୍ରୟାସ ହେଉଛି ସେସବୁ ସମାଜର ବହୁତ ବଡ଼ ସେବା । ଏହା ସମାଜର ଶକ୍ତି ବଢ଼ାଇଥାଏ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଆଜି "ମନ୍ କୀ ବାତ୍‌'ର ସମଗ୍ର ଆଲୋଚନାକୁ ମୁଁ କରୋନା ମହାମାରୀ ଉପରେ ହିଁ ରଖିଥିଲି; କାରଣ ଆଜି ଆମର ସବୁଠୁ ବଡ଼ ପ୍ରାଥମିକତା ହେଉଛି ଏହି ମହାମାରୀକୁ ପରାଜିତ କରିବା । ଆଜି ଭଗବାନ ମହାବୀରଙ୍କ ଜୟନ୍ତୀ । ଏହି ଅବସରରେ ମୁଁ ସମସ୍ତ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ଶୁଭକାମନା ଜଣାଉଛି । ଭଗବାନ ମହାବୀରଙ୍କ ଦର୍ଶନ ଆମକୁ ତପ ଏବଂ ଆତ୍ମସଂଯମର ପ୍ରେରଣା ଦିଏ । ଏବେ ରମଜାନର ପବିତ୍ର ମାସ ବି ଚାଲୁରହିଛି । ଆଗକୁ ଅଛି ବୁଦ୍ଧ ପୂର୍ଣ୍ଣିମା । ଗୁରୁ ତେଗ୍ ବାହାଦୁରଙ୍କର ୪୦୦ତମ ପ୍ରକାଶ ପର୍ବ ବି ପାଳନ କରାଯିବ । ଗୋଟିଏ ମହତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଦିନ ହେଉଛି ‘ପୋଚିଶ ବୈଶାଖ୍‌’ – ବିଶ୍ୱକବି ରବୀନ୍ଦ୍ରନାଥ ଟାଗୋରଙ୍କ ଜୟନ୍ତୀ । ଏସବୁ ଆମକୁ ପ୍ରେରଣା ଦେଇଥାଏ ନିଷ୍ଠାର ସହ ନିଜର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ସମ୍ପାଦନ କରିବା ପାଇଁ। ଜଣେ ନାଗରିକ ଭାବରେ ଆମେ ଜୀବନରେ ନିଜର ଯେତିକି କୁଶଳତା କାମନା କରିଥାଉ ନିଜର କର୍ତବ୍ୟକୁ ବି ସେହିଭଳି ସମ୍ପାଦନ କରିବା ଆବଶ୍ୟକ । ସଙ୍କଟରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ଭବିଷ୍ୟତ ରାସ୍ତାରେ ସେତିକି ହିଁ ଦ୍ରୁତଗତିରେ ଅଗ୍ରସର ହେବା ଜରୁରୀ । ଏହି କାମନା ସହ ମୁଁ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପୁଣିଥରେ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି ଯେ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଟିକା ନେବାକୁ ହେବ ଆଉ ସାବଧାନତା ମଧ୍ୟ ଅବଲମ୍ବନ କରିବାକୁ ପଡ଼ିବ । "ଦୱାଇ ଭି-କଡ଼ାଇ ଭି' - ଏହି ମନ୍ତ୍ରକୁ କେବେ ଭୁଲିବା ନାହିଁ । ଆମେ ଖୁବ୍‌ଶୀଘ୍ର ମିଳିମିଶି ଏହି ବିପଦରୁ ମୁକୁଳିବା । ଏହି ବିଶ୍ୱାସର ସହ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ନମସ୍କାର ।