Text of PM's address at Parivartan Rally in Muzaffarpur, Bihar

Published By : Admin | July 25, 2015 | 19:23 IST
Bihar must be free from unemployment and Goonda Raaj: PM
Bihar cannot go back to the era of loot and Jungle Raaj, says PM Modi
PM Modi urges people of Bihar to vote wisely and elect a stable BJP Government

भारत माता की जय

कुछ लोग दूसरी मंजिल पर हैं, कुछ लोग तीसरी मंजिल पर हैं, कोई गिर जाएगा तो मैं क्या जवाब दूंगा भैया। एक बार नई सरकार बनने दो आप और नई उंचाईयों पर पहुँचने वाले हो। विश्वास रखिये लेकिन अभी कम-से-कम नीचे उतर जाईये। मुझे चिंता रहेगी कुछ हो गया तो मैं बहुत दुखी हो जाऊंगा।

मंच पर विराजमान केंद्र सरकार में मेरे साथी, श्रीमान अनंत कुमार जी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, श्रीमान मंगल पांडेय जी, राज्य के पूर्व उप-मुख्यमंत्री, श्रीमान सुशील कुमार मोदी जी, विधानसभा के नेता, श्री नंद किशोर यादव जी, भाजपा के प्रभारी श्री भूपेन्द्र यादव जी, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी, श्रीमान राधामोहन सिंह जी, श्री रविशंकर प्रसाद जी, श्री धर्मेन्द्र प्रधान जी, श्रीमान राजीव प्रताप रूडी जी, श्रीमान गिरिराज जी, श्रीमान राम विलास पासवान जी, और हमारे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जिनका चेहरा सदाय हँसता रहता है, ऐसे हमारे जीतन राम मांझी जी, मेरे साथी, श्रीमान उपेन्द्र कुशवाहा जी, हम सबके मार्गदर्शक, हमारे सबसे पुराने वरिष्ठ नेता, डॉ. सी पी ठाकुर जी, हमारे पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, श्रीमान गोपाल नारायण जी, श्रीमान शकुनी चौधरी जी, सांसद श्री अरुण कुमार जी, पूर्व सांसद श्रीमान एम के सिंह, राज्य के पूर्व मंत्री डॉ. प्रेम कुमार जी। बिहार के कोना कोना से आईल हमार भाई और बहन लोग, तोहरा सबके शत शत प्रणाम।

जब मेरे से यहाँ इस कार्यक्रम के लिए समय माँगा गया, मैं कल्पना नहीं कर सकता था कि ऐसा हुजूम मुझे देखने को मिलेगा। जहाँ भी मेरी नज़र पहुँच रही है, माथे ही माथे नज़र आ रहे हैं और सबसे बड़ी बात मुझे जो आपका ज़ज्बा नज़र आ रहा है। सारे पॉलिटिकल पंडित ये एक कार्यक्रम देख लें नतीजा साफ दिखता है अगली सरकार किसकी बनने वाली है। भाईयों-बहनों, जब हम पहले सोशल मीडिया में कभी ट्वीट करते थे तो यहाँ के एक नेता बड़ा मज़ाक उड़ाते थे और वो कहते थे, चहकते हैं, चहकते हैं, और ये चहकना, बड़ा मखौल उड़ाते थे। आज उन्होंने भी चहकने का रास्ता पसंद कर लिया और आज जब मैं उतरा तो उन्होंने ट्वीट किया था कि 14 महीने के बाद आप बिहार आ रहे हैं, आपका स्वागत है। मुख्यमंत्री जी, स्वागत के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूँ। वक्त कैसे बदलता है और बदले हुए वक़्त का अंजाम कैसा होता है। वो भी एक वक़्त था, वो कहा करते थे कि हमारे पास एक मोदी है, दूसरे मोदी की क्या जरुरत है। बिहार में आपको आने की क्या आवश्यकता है। आप बिहार मत आईये और आज देखिये, अपनों का विरह कितना परेशान करता है अपनों की दूरी कैसी बेचैन बनाती है। पिछले दस साल के जो प्रधानमंत्री थे, वो दस साल में एक बार हवाई निरीक्षण करने आये थे और मेरा 14 महीने का विरह भी यहाँ के मुख्यमंत्री को परेशान कर रहा है, दुखी कर रहा है। एक-एक दिन कितना भारी गया होगा उनका। अपनों से जब इतना प्यार होता है, इतना लगाव होता है तो उनकी दूरी मुश्किल ही करती है। लेकिन आप चिंता मत कीजिये, मैं अब आ गया हूँ आपको अब ज्यादा विरह झेलना नहीं पड़ेगा।

भाईयों-बहनों, मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, आप जवाब दोगे, आपको लगता है बिहार में बदलाव होना चाहिए? हालात बदलने चाहिए? स्थिति बदलनी चाहिए? अंधेरे से उजाला होना चाहिए? बेरोजगारी से रोजगारी आनी चाहिए? गुंडागर्दी से मुक्ति चाहिए? सुख-शांति की जिंदगी चाहिए? भाईयों-बहनों, अगर ये चाहिए तो मुझे सेवा करने का अवसर दीजिए। मुझे आपकी सेवा करने का मौका दीजिए और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि देश की आजादी से बिहार के लोगों ने जो सपने सजोये हैं, मैं 60 महीने के भीतर आपको पूरे करके दूंगा। मैं आपको वादा करता हूँ हम जिम्मेवारी से भागने वाले लोग नहीं हैं, हम जिम्मेवारियों को लेने वाले लोग हैं। मैं कभी-कभार समझ सकता हूँ कि एकाध व्यक्ति के प्रति हमारी राजी-नाराजी हो, मैं यह भी समझ सकता हूँ कि किसी का चेहरा हमें पसंद न आता हो, मैं ये भी समझता हूँ कि हमारे राजनीतिक भविष्य में शायद कहीं टकराव नज़र आता हो, लेकिन भाई इतना मैं बुरा था तो एक कमरे में आकर के एक चांटा मर देते, गला घोंट देते। आपने एक व्यक्ति के प्रति गुस्से में आकर के पूरे बिहार की विकास यात्रा का गला घोंट दिया। क्या ये लोकतंत्र होता है? क्या लोकतंत्र के ये तौर-तरीके होते हैं? मैं समझता हूँ कि राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, राजी-नाराजी हो सकती है। अरे गुस्सा निकालने के लिए आकर के मेरा गला भी घोंट देते लेकिन मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि आपने हमारे साथ क्या किया। मुझे दुःख इस बात का है कि आपने बिहार की जनता के साथ क्या किया।

यहाँ के लोग जंगलराज से मुक्ति के लिए आपके पीछे खड़े हो गए, और आज फिर से आप बिहार को उसी जंगलराज की ओर घसीट रहे हो। आप मुझे बताईये मेरे भाईयों-बहनों, क्या बिहार में वो जंगलराज के दिन दोबारा चाहिए? वो मौत का खेल दोबारा चाहिए? ये गुंडागर्दी दोबारा चाहिए? ये लूट-खसोट चाहिए दोबारा? मेरे बिहार के भाईयों-बहनों को इस हालात में छोड़ा नहीं जा सकता और इसलिए भाईयों-बहनों, ये चुनाव किसकी सरकार बने, किसकी न बने, इसके लिए नहीं है। ये चुनाव बिहार के नौजवानों का भविष्य तैयार करने के लिए है, ये चुनाव बिहार के किसानों का भाग्य बदलने के लिए है, ये चुनाव बिहार की माताओं-बहनों की सुरक्षा के लिए है और इसलिए भाईयों-बहनों, विकास के रास्ते पर गए बिना बिहार का भला नहीं होगा। और इसलिए मैं आज आग्रह करने आया हूँ कि आप आईये, अपने हर किसी को आजमा लिया है, हर प्रकार के मॉडल आप देख चुके हो, एक बार हमें भी आजमा कर के देखो। एक बार हमारे एनडीए के मेरे साथियों को बिहार की जनता का सेवा करने का अवसर दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ आज देखिये, हमारी दिल्ली सरकार का जरा लेखा-जोखा लीजिये। मैं नहीं जानता हूँ कि यहाँ के पॉलिटिकल पंडितों ने कभी हिसाब लगाया है या नहीं। दिल्ली में मोदी की सरकार में सबसे ज्यादा मंत्री, सबसे महत्वपूर्ण मंत्री, सबसे महत्वपूर्ण डिपार्टमेंट अगर किसी के पास है तो मेरे इन बिहार के नेताओं के पास है। एक प्रकार से बिहार के नेता आज पूरे हिंदुस्तान को चला रहे हैं। ये ताकत बिहार को कहाँ से कहाँ ले जा सकती है, इसका आप अंदाज कर सकते हैं।

भाईयों-बहनों, आपने मुझे पांच साल के लिए चुनकर के भेजा है और बिहार ने तो भारी समर्थन किया है। मैं बिहार की जनता को शत-शत वंदन करता हूँ, आपने मुझे जो समर्थन दिया है। मुझे बताईये, जो लोग यह कहते रहे हैं कि हम मोदी को बिहार में घुसने नहीं देंगे, हम मोदी को बिहार आने नहीं देंगे, हमें मोदी की बिहार में जरुरत नहीं है, अगर ऐसे लोग सरकार बनाएंगे और केंद्र से कोई नाता ही नहीं रखेंगे तो बिहार का भला होगा क्या? क्या इस देश में एक सरकार दूसरी सरकार से लड़ती रहे? इससे किसी राज्य का भला होगा क्या? ये लड़ाई वाली सरकारें चाहिए या कंधे-से-कंधा मिलाकर चलने वाली सरकार चाहिए? भाईयों-बहनों, मैं दिल्ली में बैठकर के, जो भी पूरे देशभर में संसाधन है, एक बार सेवा का अवसर दीजिए आपके काम आते हैं कि नहीं आते, आप देख लीजिये।

मैं तो यहाँ हैरान हूँ मेरा जन्म गुजरात की धरती पर हुआ था। द्वारकाधीश गुजरात में है, भगवान श्रीकृष्ण गुजरात के लोगों के आराध्य हैं। यदुवंश की उत्तम परंपरा को निभाने का काम गुजरात की धरती पर सदियों से होता आया है लेकिन हम जिस कृष्ण के पुजारी हैं, मैं जरा पूछना चाहता हूँ, मुझे श्रीकृष्ण की एक बात बराबर याद रहती है जब वो बालक थे और कालीनाग के कारण लोग परेशान थे तो बालक कृष्ण ने ताकत दिखाकर के कालीनाग का शिरच्छेद कर दिया था। कालीनाग को ख़त्म किया था कि नहीं किया था और आज यदुवंश की बातें करने वाले लोग रो रहे हैं कि उन्हें जहर पीना पड़ रहा है। अरे कृष्ण का वंशज जहर पीता नहीं, बल्कि कालीनाग के वंश को ही ख़त्म कर देता है। यही तो उसकी ताकत होती है और आपने तो जहर पीया क्योंकि आपका स्वार्थ है। अपने बेटे-बेटियों के लिए आपको कुछ इंतजाम करना है लेकिन आपने सभी यदुवंशियों को जहर पीने के लिए मजबूर क्यों किया? उनको जहर पीने के लिए मजबूर क्यों किया? क्या गुनाह है उनका? और इसलिए मैं तो हैरान हूँ, अख़बारों में पढ़ते हैं, यहाँ पर क्या चर्चा चल रही है, यहाँ के किसानों का भला होगा कि नहीं होगा, चर्चा नहीं हो रही है; नौजवानों को रोजगार मिलेगा कि नहीं मिलेगा, चर्चा नहीं हो रही है; गुंडागर्दी खत्म होगी कि नहीं होगी चर्चा नहीं हो रही है; उद्योग-कारखाने लगेंगे कि नहीं लगेंगे, चर्चा नहीं हो रही है; गाँव में बिजली आएगी कि नहीं आएगी, चर्चा नहीं हो रही है; किसानों को पानी मिलेगा कि नहीं मिलेगा, चर्चा नहीं हो रही है। चर्चा क्या हो रही है, कौन सांप है, कौन सांप नहीं है, कौन जहर पीता है, कौन जहर पिलाता है। अरे भाई ये तुम दोनों तय कर लो कि सांप कौन है, जहर कौन है, कौन जहर पिलाता है, कौन जहर पीता है। आप दोनों का अंदरूनी मामला है एक कमरे में बैठकर के तय कर लो। बिहार की जनता को जहर पीने के लिए मजबूर मत करो। ये आपको अंदरूनी मामला है बिहार की जनता को तो पीने का पानी चाहिए। बिहार के नौजवान को रोजगार चाहिए। बिहार में उद्योगों का विकास चाहिए। बिहार में सड़कें चाहिए।

भाईयों-बहनों, बिहार में चुनाव तो अब आया है। ये पिछले चुनाव में जब वोट लेने निकले थे, अभी राम विलास जी बता रहे थे, उन्होंने अपने भाषण में भी कहा। उन्होंने आपको कहा था कि 2015 में अगर मैं आपको बिजली न पहुंचाऊं तो मैं वोट मांगने के लिए नहीं आऊंगा ऐसा कहा था? याद करो कहा था? बिजली नहीं दूंगा तो वोट नहीं मांगूंगा, ऐसा कहा था? उन्होंने कहा था ना? बिजली आई? बिजली आई? नहीं आई न, वो वोट मांगने आये कि नहीं आये? आपका भरोसा तोड़ा कि नहीं तोड़ा? आपकी पीठ में छूरा भोंका कि नहीं भोंका? अरे हमारी छोडो, आपकी पीठ में छूरा भोंकना जिन लोगों के कारनामे रहे हैं, ऐसे लोगों पर दोबारा भरोसा नहीं किया जा सकता। और इसलिए भाईयों-बहनों, मैं आज आपसे आग्रह करने आया हूँ, बिहार का भाग्य बदलने के लिए। बिहार के पास न सिर्फ़ बिहार का भाग्य बदलने का बल्कि पूरे हिंदुस्तान का भाग्य बदलने की ताकत है। इतने प्राकृतिक संसाधन हैं, इतने उत्तम प्रकार का मानव बल है, इतनी महान शक्ति का स्त्रोत है। जो सदियों पहले पूरा देश जिस धरती के लिए गर्व करता था, उस धरती के संतानों में आज भी वो ताकत है हिंदुस्तान को गर्व दिलाने की और इसे मुझे पुनः वापस लाना है और इसलिए मैं आपके पास आया हूँ।

भाईयों-बहनों, ये सब परेशानियां ज्यादा-से-ज्यादा 100 दिन हैं। 100 दिन के बाद बिहार की जनता इनकी छुट्टी कर देगी। बिहार की जनता अब इस प्रकार के लोगों को कभी स्वीकार नहीं करेगी। मैं तो हैरान हूँ। एक बार मैं पटना आया था। हमारी पार्टी की कार्यसमिति की मीटिंग थी और यहाँ के मुख्यमंत्री ने हमको खाने पर बुलाया था। अब हमारी थाली उन्होंने छीन ली। भोजन पर बुला कर के कभी कोई थाली छीन लेता है क्या? ये लालू जी कह रहे हैं, मैं आज जहर पी रहा हूँ, मैंने तो उस दिन भी जहर पीया था और तब मेरे मन को जरा चोट पहुंची थी। क्या राजनीति में इतनी छुआछूत? सार्वजनिक जीवन के ये संस्कार कि टेबल पर परोसी हुई थाली खींच लेना, मेरे मन को बड़ी चोट पहुंची थी, मैंने कभी बोला नहीं न ही मैंने कभी मन में इसका मलाल रखा, चलो ठीक है भाई लेकिन जब जीतन राम मांझी पर जुल्म हुआ तो मैं बेचैन हो गया। मुझे लगा कि अरे मोदी की क्या औकाद है, उसकी तो थाली खींच ली, एक चाय वाले के बेटे की थाली खींच लें, एक गरीब के बेटे की थाली खींच लें लेकिन एक महादलित की तो सारी की सारी पूँजी ले ली, सारा पुण्य खींच कर के ले लिया। भाईयों और बहनों, तब मुझे लगा कि शायद डीएनए में ही कुछ गड़बड़ है क्योंकि लोकतंत्र का डीएनए ऐसा नहीं होता है। लोकतंत्र का डीएनए अपने विरोधियों को भी आदर और सत्कार देने का होता है लेकिन इन्होंने जो लोकतंत्र सीखा और चलाया है, उसमें जॉर्ज फ़र्नान्डिस का क्या हुआ? इसी धरती से जुड़े थे, उनके साथ क्या किया गया? सुशील मोदी जो कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे उनके साथ क्या किया? ये सारे नेता जो कभी न कभी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले, उनके साथ क्या किया? क्या आप अब भी लोकतंत्र के इस डीएनए को नहीं समझ पाएंगे क्या? क्या ऐसे लोगों को माफ़ करेंगे क्या?

भाईयों-बहनों, और इसलिए आज मैं आग्रह से कहने आया हूँ कि बिहार को हम ऐसे तत्वों के भरोसे नहीं छोड़ सकते। बिहार में दोबारा जंगलराज नहीं आने देंगे ये बिहार की जनता को शपथ लेनी चाहिए। आरजेडी का पूरा अर्थ मालूम है क्या? आरजेडी का पूरा अर्थ मालूम है क्या? आरजेडी का पूरा अर्थ होता है – रोजाना जंगलराज का डर, आरजेडी का मतलब होता है – रोजाना जंगलराज का डर। क्या ये रोजाना जंगलराज का डर चाहिए आपको? इस डर से मुक्ति चाहिए कि नहीं चाहिए? और इसलिए भाईयों-बहनों, ये चुनाव रोजाना जंगलराज के डर से मुक्ति का चुनाव है और इसलिए मैं यह कहने आया हूँ। आप देखिये पहले भी सरकारें हुईं, बिहार के साथ क्या हुआ है और हम बिहार के साथ क्या करेंगे। आज मैं अनेक कार्यक्रमों का उद्घाटन करके आया हूँ, शिलान्यास करके आया हूँ, हज़ारों-करोड़ की सौगात बिहार की धरती को देकर के आया हूँ।

भाईयों-बहनों, एक झूठ फैलाया जा रहा है तेरहवें फाइनेंस कमीशन और चौदहवें फाइनेंस कमीशन के संबंध में। 2010 से 2015, किसकी सरकार थी आपको मालूम है, उस सरकार ने बिहार को फाइनेंस कमीशन के माध्यम से जो पैसा दिया, वो था करीब-करीब ढेढ़ लाख करोड़। अब 2015 से 2020, हमारी बारी है, हमने क्या देना तय किया, पौने चार लाख करोड़ रुपये। पहले क्या मिलता था - ढेढ़ लाख करोड़, अब कितना मिलेगा - पौने चार लाख करोड़ रुपये। बिहार की जनता की झोली में पौने चार लाख करोड़ रुपये आएंगे। मुझे बताईये कि विकास के काम आगे बढ़ेंगे कि नहीं बढ़ेंगे? इन्होने वादा किया था कि बिजली नहीं तो वोट नहीं। उन्होंने तो कुछ किया नहीं और न कभी मेरे पास आकर के कहा। लेकिन मेरी सरकार बनने के बाद मैं जब विदेश यात्रा के लिए गया तो सबसे पहले मैं भूटान गया। बहुत छोटा देश है बिहार से तो बहुत कम आबादी है, बहुत कम पटना से भी कम। भूटान में जाकर कौन सा करार किया – भूटान के अन्दर भारत सरकार धन लगाएगी और पानी से पैदा होने वाली बिजली, जल विद्युत् के लिए करार किया, शिलान्यास किया और इस तरह भूटान में जो बिजली पैदा होगी, उसका सबसे ज्यादा हिस्सा ये मेरी बिहार की जनता को मिलेगा। ये निर्णय हमने किया और सरकार बनने के बाद मेरी पहली विदेश यात्रा में हमने यह काम किया। दूसरी विदेश यात्रा मेरी नेपाल की थी। नेपाल में भी जल विद्युत् का करार किया और वहां से बिजली बन करके कहाँ आएगी, इसी इलाके में आएगी। मुझे बताईये, आज इतना बड़ा बिहार, 300 मेगावाट बिजली के भी आप मालिक नहीं हो जबकि आपको 5000 मेगावाट बिजली की जरुरत है। इन सरकारों ने केवल 300 मेगावाट बिजली बनाई है, बाकि बिजली ये बना पाएंगे क्या? इतने सालों में जो बिजली नहीं दे पाए, वो अब दे पाएंगे क्या? मैं वादा करता हूँ, मेरा अनुभव है और मैंने करके दिखाया है। मैं बिहार में 24 घंटे घरों में बिजली देने का वादा करने आया हूँ। और बिजली आती है तो अकेली बिजली नहीं आती। बिजली आती है तो सिर्फ़ घर में रोशनी आती है, ऐसा नहीं है। बिजली आती है तो इसके साथ जीवन बदलना शुरू हो जाता है। अगर बच्चों को पढ़ाई करनी है, कंप्यूटर सीखना है तो बिजली आने के साथ वो भी शुरू हो जाता है। अरे मोबाइल फ़ोन चार्ज करना हो तो भी दूसरे गाँव जाना पड़ता है। जाना पड़ता है ना? मोबाइल फ़ोन कितना ही महंगा क्यों न लाए हो लेकिन आपके काम नहीं आता है क्योंकि पटना में बैठी हुई सरकार आपको बिजली नहीं देती है। मुझे बताईये, आपको भी अच्छे टीवी शो देखने का मन करता है कि नहीं करता है? सास भी कभी बहू थी, देखने को मन करता है कि नहीं करता है; टीवी पर अच्छे गाने सुनने का मन करता है कि नहीं करता है? अगर बिजली नहीं होगी तो कहाँ से देखोगे? इन्होने आपको पिछली सदी में धकेल करके रखा है। बिहार को उन्होंने आधुनिक नहीं बनने दिया है। बिजली आएगी, कारखाने लगेंगे। हम कारखाने लगाना चाहते हैं, हम उद्योग लगाना चाहते हैं।

आज बिहार का एक संतान, एक युवा मेरी सरकार में मंत्री है और मैंने उसे इतना बड़ा काम दिया है, स्किल डेवलपमेंट का। ये स्किल डेवलपमेंट बिहार का भाग्य बदलने वाला है, यह मैं आपको कहने आया हूँ। यहाँ उद्योग लगे, यहाँ के नौजवानों का स्किल डेवलपमेंट हो और यहाँ का जीवन बदल जाए, बिहार के नौजवान को बिहार में अपने बूढ़े मां-बाप को छोड़कर रोजी-रोटी कमाने कहीं जाना न पड़े, ऐसा बिहार बनाने का मेरा इरादा है और उसके लिए मुझे आपको आशीर्वाद चाहिए और वो आशीर्वाद लेने के लिए मैं आया हूँ। भाईयों-बहनों, आज वक़्त इतना बदल चुका है, रोड कनेक्टिविटी चाहिए, रेल कनेक्टिविटी चाहिए, एयर कनेक्टिविटी चाहिए। लेकिन अब जैसे-जैसे युग बदला है लोग कहते हैं हमें तो गैस ग्रिड चाहिए। चाहिए कि नहीं चाहिए? सूरत में मेरे यहाँ बिहार के लोग रहते हैं, वो जब यहाँ वापिस आते हैं तो यहाँ झगड़ा होता है जब वो कहते हैं कि जैसे यहाँ नलके में पानी आता है ना वैसे गुजरात में नलके में गैस आता है। यहाँ के लोग भरोसा नहीं करते। बिहार के लोग जब मुझे मिलते है तो बताते हैं कि मोदी जी मेरे गाँव के लोग तो मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि ऐसा भी होता है। बिहार के भाईयों-बहनों, वो दिन अब दूर नहीं है जब मैं पटना तक शुरुआत करूँगा और सैंकड़ों किमी गैस की लंबी पाइपलाइन लगा करके पटना में घरों में गैस देना प्रारंभ कर दूंगा और आगे बिहार के और स्थानों पर भी गैस जाएगा। रसोईघर में टैब चालू करते ही गैस आएगा। अब गैस का सिलिंडर लेने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। किसी दलाल को पैसा नहीं देना पड़ेगा। ये काम हम करते हैं और हजारों करोड़ रूपया लगता है इन कामों के लिए। आज मैं इसका शिलान्यास करके आया हूँ। काम शुरू हो जाएगा, बजट मंजूर कर दिया है। आपके यहाँ बरौनी में फ़र्टिलाइज़र का कारखाना बंद पड़ा हुआ है। यहाँ के नौजवानों को रोजगार चाहिए कि नहीं चाहिए? रोजगार मिलने चाहिए कि नहीं मिलने चाहिए? अगर कारखाने नहीं होंगे तो रोजगार कहाँ से मिलेगा और इसलिए हमने उस फ़र्टिलाइज़र का कारखाना, जो बंद पड़ा था, उसको चालू करने का निर्णय किया है ताकि यहाँ के किसानों को सस्ता खाद मिल जाए और यहाँ के नौजवान को रोजगार मिल जाए। और करीब 5 हजार करोड़ रूपया लगने वाला है, कोई कम पैसा नहीं है यह।

भाईयों-बहनों, कुछ लोग होते हैं जो वादे की खातिर वादे करते हैं, फिर वादे भुला देने की कोशिश करते हैं और इनको वादे की याद दिला दें तो मुकर जाने की आदत रहती है। जैसे आपको कहा गया था कि बिजली दूंगा तभी तो वोट मांगने आऊंगा। मैं भी चुनाव के समय यहाँ आया था। मैंने भी वादे किये थे लेकिन मैं वादे भुलाने के लिए नहीं आया हूँ। मैंने जो वादे किये थे, उन वादों को मैं खुद दोबारा याद करने यहाँ आया हूँ और मुकर जाने का तो सवाल ही नहीं उठता है। लोकसभा के चुनाव में पटना की धरती पर जब बम धमाके चल रहे थे, लोग मौत के घाट उतार दिये जा रहे थे, हिंसा के मातम से लोकतंत्र का गला दबोचा जा रहा था, उस समय बम धमाकों के बीच डरे बिना, विचलित हुए बिना, गुस्सा व्यक्त किये बिना, नाराजगी व्यक्त किये बिना पूरे शांत मन से उस सभा को मैंने संबोधित किया था। मौत अंगड़ाई ले रहा था उस मैदान में, लेकिन पूरी स्वस्थता के साथ मैंने बिहार की जनता से संवाद किया था और ऐसे संकट की घड़ी में भी मैंने कहा था कि दिल्ली में जब हमारी सरकार बनेगी और जब पूरी योजना बनने लगेगी, हम बिहार को 50 हजार करोड़ रुपये का पैकेज देंगे। आपको याद है, नहीं है न? मैंने ये वादा किया था और आज जब मैं बिहार की धरती पर आया हूँ तो मैं आपको मैं कहता हूँ, वो वादा मैं निभाऊंगा और सिर्फ़ 50 हजार करोड़ से बात बनेगी नहीं अब तो क्योंकि दिल्ली सरकार में बैठने के बाद बिहार को मैंने बारीकी से अध्ययन किया है। बिहार में क्या अच्छा हो सकता है, उस पर मैं सोचने लगा, बिहार के सभी नेताओं से बातचीत करने लगा, सुझाव लेने लगा और मेरे मन में धीरे-धीरे एक समृद्ध बिहार का चित्र बनने लगा, एक विकास वाले बिहार का चित्र खड़ा होने लगा। मुझे लगा ये अगर सपना मुझे पूरा करना है तो 50 हजार करोड़ से पूरा नहीं होगा और इसलिए मैंने उससे भी ज्यादा बड़ा पैकेज देने का विचार कर लिया है। लेकिन अभी पार्लियामेंट चालू है मेरे जुबान पर थोड़ा ताला लगा हुआ है। मैं बोल नहीं पा रहा हूँ लेकिन जैसे ही पार्लियामेंट समाप्त हो जाएगी, मैं आपको खुद आकर बता दूंगा कि कितना बड़ा पैकेज आपको मिलने वाला है।

आजकल कुछ ऐसे झूठ फैलाये जाते हैं, किसी ने हमसे माँगा नहीं था लेकिन जब बजट आया तो हमारा सपना था बिहार को आगे ले जाने का, बिहार में औद्योगिक क्रांति लाने का, बिहार के नौजवानों को रोजगार मिले, इसलिए हमने बजट के अन्दर एक योजना बनाई स्पेशल स्टेटस वाला राज्य, उसमें सबसे फायदा होने वाली बातें कौन सी हैं और हमने पाया कि स्पेशल स्टेटस में दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें हैं। हमने तय किया कि जो सबसे बड़ा फायदा है, वो बिहार को मिलना चाहिए और इसलिए हमने बिहार के लिए, नए इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट करने के लिए 15% इन्वेस्टमेंट अलाउंस और 15% का एडिशनल डेप्रिसिएशन अलाउंस इसमें रिडक्शन की हमने घोषणा कर दी और मैं समझता हूँ कि हिंदुस्तान में स्पेशल केटेगरी का इतना बड़ा लाभ, बिहार अगर दम हो तो ले सकता है। कितना बड़ा लाभ मिलेगा, इसका आप अंदाज कर सकते हो। बिहार के नौजवानों को कितना रोजगार मिल सकता है, इसका आप अंदाज कर सकते हो।

भाईयों-बहनों, अभी तो ये शुरुआत है लेकिन मैं जो ये नजारा देख रहा हूँ इससे मुझे साफ लगता है कि जैसे लोकसभा में अपने मेरा साथ दिया, विधानसभा में उससे भी बढ़कर आप मेरा साथ दोगे। बिहार में इस बार आप निर्णय कर लीजिये कि दो-तिहाई बहुमत के साथ ही सरकार बनाएंगे। दो-तिहाई बहुमत के साथ ही एक मजबूत सरकार बनाईये। मुझे बताईये कि किसी ट्रेक्टर को एक इंजन लगा हो तो ज्यादा तेज चलता है कि दो इंजन लगा हो तो ज्यादा तेज चलता है? बताईये, कितने इंजन चाहिए? आपने दिल्ली में तो आपने इंजन दे दिया है अब बिहार में इंजन दे दीजिए। दो इंजन से बिहार की गाड़ी ऐसी तेज चलेगी भाईयों कि पिछले 60 सालों में जो नहीं हुआ, वो तेज गति से हमारी विकास की यात्रा आगे बढ़ेगी। इसी एक संकल्प के साथ मैं एक बार फिर एनडीए के मेरे सभी साथियों का हृदय से अभिनन्दन करता हूँ और बिहार का भाग्य बदलेगा इस विश्वास के साथ आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।                  

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माझ्या प्रिय देशवासीयांनो, नमस्कार

‘मन की बात’ मध्ये पुन्हा एकदा तुमच्याशी संवाद साधताना मला अतिशय आनंद होत आहे. देशाच्या वेगवेगळ्या भागांत आपल्या देशातले लोक देशहितासाठी, समाजहितासाठी अशा काही अद्भूत गोष्टी करत आहेत की, जेव्हा त्यांच्याबद्दल आपण ऐकतो तेव्हा आपल्याला एक नवीन प्रेरणा मिळते. आज कार्यक्रमाची सुरुवात मी ऍथलेटिक्समधील  देशाच्या अशाच एका कामगिरीने करणार आहे. काही दिवसांपूर्वीच झारखंडच्या रांची येथे नॅशनल सिनियर ऍथलेटिक्स फेडरेशन स्पर्धा झाली. यामध्ये देशभरातून आलेल्या जवळजवळ 800 खेळाडूंनी भाग घेतला होता. यादरम्यान चार वेगवेगळ्या क्रीडाप्रकारांमध्ये चार राष्ट्रीय विक्रम मोडीत निघाले. गुरिंदरवीर सिंह, विशाल टीके, तेजस्विन शंकर, देव मीणा आणि कुलदीप कुमार. या खेळाडूंनी वेगवेगळ्या श्रेणींमध्ये नवीन विक्रम प्रस्थापित केले. मी सर्वात आधी या सर्वांचे खूप खूप अभिनंदन करतो.

मित्रांनो,

देशभरात ज्या एका स्पर्धेची खूपच चर्चा होत आहे, ती म्हणजे – 100 meter Race, शंभर मीटरची धावण्याची शर्यत. अवघ्या दोन दिवसांत पुरुषांच्या 100 मीटर धावण्याच्या शर्यतीचा राष्ट्रीय विक्रम तीन वेळा मोडीत निघाला. ज्या दोन खेळाडूंनी ही किमया करून दाखवली आहे ते आहेत - गुरिंदरवीर सिंह आणि अनिमेष कुजूर. मी असा विचार केला की या वेळी ‘मन की बात’ मध्ये या दोन्ही खेळाडूंशी संवाद साधावा.

(दूरध्वनी)

पंतप्रधान: अनिमेष जी नमस्कार. गुरिंदरवीर तुम्हालाही नमस्कार, सत श्री अकाल.

अनिमेष, गुरिंदरवीर: नमस्कार सर, नमस्कार सर.

पंतप्रधान: वा भाऊ, तुम्ही तर खूप मोठे यश संपादन केले आहे. तुमच्या जोडीनेही मोठी कमाल केली आहे. आपण संगीतात तर जुगलबंदी पाहिली होती, पण आव्हानांमध्ये अशी जुगलबंदी आता पाहायला मिळत आहे की, एकानं आव्हान द्यावं आणि दुसऱ्यानं ते आव्हान स्वीकारावं. मग तिसऱ्यांदा पुन्हा तसंच करावं. तुमचा हा विषय खूपच रंजक राहिला आहे. ‘मन की बात’ च्या श्रोत्यांना तुमच्याबद्दल माहिती मिळावी, तुम्ही जे पराक्रम गाजवले आहेत ते त्यांना समजावेत, अशी माझी इच्छा आहे.

अनिमेष जी: नमस्ते सर, माझे नाव अनिमेष कुजूर. मी 200 मीटर आणि 400 मीटरचा नॅशनल रेकॉर्ड होल्डर( राष्ट्रीय विक्रमवीर) आहे आणि मी छत्तीसगडचा रहिवासी आहे सर. आणि सध्या मी ओदिशाकडून खेळतो. मी गेल्या वर्षी आशियायी पदक आणि जागतिक विद्यापीठ स्पर्धांमध्ये पदक मिळवलं आहे आणि  2021 मध्ये माझं शालेय शिक्षण पूर्ण झाल्यावर मी ऍथलेटिक्सला सुरुवात केली. मी सैनिक स्कूल अंबिकापूरमधून उत्तीर्ण झालो आहे, आणि मी आधी फूटबॉल खेळायचो. कोविडच्या काळात माझे आई-वडील मला थोडीफार मोकळीक द्यायचे की तू बाहेर जाऊन धाव किंवा खेळ. मग जेव्हा कोविड संपू लागला, तेव्हा माझ्या फूटबॉल संघातल्या मित्रांनी मला सांगितलं की राज्यस्तरीय स्पर्धा होणार आहे, तू जाऊन त्यात भाग घे. मी त्यात भाग घेतला आणि मला हे माहीत नव्हतं की तिथे राष्ट्रीय स्तराच्या खेळाडूंची निवड होणार आहे. मी तिथून नॅशनलसाठी निवडला गेलो आणि आज मी आंतरराष्ट्रीय स्तरावर भारताचं प्रतिनिधित्व करत आहे.

पंतप्रधान: आणि गुरिंदरवीर जी, तुम्ही काय सांगाल?

गुरिंदरवीर: नमस्ते सर, माझे नाव गुरिंदरवीर आहे आणि मी भारतीय नौदलात  पेटी ऑफिसर(Petty Officer) आहे. मी भारताचा सर्वात वेगवान धावपटू आहे आणि नुकताच मी 100 मीटरमध्ये 10.09 सेकंदांचा राष्ट्रीय विक्रम केला आहे. 10.1 सेकंदांच्या टप्प्याच्या खाली येत या वेळेपेक्षा कमी वेळेत धावणारा मी पहिला भारतीय आहे. ट्रॅकवर आणि गणवेशातही आपल्या देशाची सेवा करण्याचा मी प्रयत्न करत आहे. माझे वडील आणि आजोबा दोघेही खेळाडू होते, त्यामुळे आपल्या भारताची एक संस्कृती आहे की ज्यावेळी दिवाळी किंवा नवीन वर्षासारखा कोणताही सण असतो, तेव्हा आपण आपलं घर स्वच्छ करतो. त्या वेळी मी माझ्या वडिलांच्या ट्रॉफी  आणि पदकं स्वच्छ करायचो, हे काम मला खूप आवडायचं आणि मला खूप आनंद व्हायचा. मग जेव्हा मी एखादी ट्रॉफी स्वच्छ करायचो, तेव्हा मी विचारायचो की ही ट्रॉफी कुठे जिंकली, हे पदक कुठे जिंकलं, हा फोटो कधीचा आहे; मग ते मला त्यांची गोष्ट सांगायचे की मी या ठिकाणी खेळायला गेलो होतो, मी हे राष्ट्रीय पदक जिंकलं, मी माझ्या संघाला यामध्ये जिंकवून दिले. मग मीसुद्धा त्यांना म्हणायचो की मलाही कोणता तरी खेळ खेळायचा आहे. ते सकाळी धावायला जायचे, तेव्हा मी त्यांना सांगू लागलो की मलाही तुमच्यासोबत घेऊन जात जा. मग ते मला सोबत घेऊन जाऊ लागले आणि त्यांनी आपल्या क्रीडा कारकीर्दीत जे काही शिक्षण घेतले होते, ते मला शिकवू लागले. त्यामुळे मला त्याची आवड निर्माण होऊ लागली. मी उसेन बोल्टचा जागतिक विक्रम मोडीत निघताना पाहिला. मग अशीच एक मजेशीर गोष्ट आहे. मी एकदा टीव्ही पाहत होतो, तर माझ्या मम्मीने(आईने) टीव्ही बंद केला की, "बेटा, आता अभ्यासाची वेळ झाली आहे, तू अभ्यास कर." तेव्हा मी म्हणालो की ठीक आहे, तुम्ही मला टीव्ही पाहू देत नाही ना, एक दिवस असा येईल की तुम्ही मला टीव्हीवर शोधाल की "बघा, तो गुरिंदर धावत आहे." त्यामुळे जेव्हा माझी आई मला टीव्हीवर धावताना पाहते, तेव्हा मलाही खूप आनंद होतो.

पंतप्रधान: वाह वाह वाह! खूपच छान गोष्ट आहे तुमची.

गुरिंदर वीर: हो सर. मध्यमवर्गीय कुटुंब  आहे सर, नंतर माझे वडील, ते पण व्हॉलीबॉल खेळायचे. कौटुंबिक अडचणींमुळे त्यांनी आपले खेळ सोडून दिले. त्यांचे जे स्वप्न पूर्ण करायचे राहिले होते, ते स्वप्न त्यांनी माझ्यामध्ये पाहिले की माझा मुलगा ते स्वप्न पूर्ण करेल. मग मी त्यांच्याशी बोलायचो, तेव्हा ऐकायचो की मिल्खा सिंग इतकी मेहनत करायचे. मी त्यांना सांगायचो की मी पण एक दिवस तुमचे स्वप्न पूर्ण करेन. तेव्हा ते म्हणायचे की स्वप्न इतक्या सहज पूर्ण होत नाही, त्यासाठी खूप कठोर परिश्रम करावे लागतात. मेहनत करावी लागते. मिल्खा सिंगजी रक्ताच्या उलट्या करायचे, उन्हात धावायचे. दिवस-दिवसभर प्रशिक्षण घ्यायचे, तर त्या गोष्टी मला प्रेरित करायच्या. माझे वडील मला प्रेरित करायचे की मी धावेन तर आपल्या देशासाठी, देशासाठी मेडल आणेन, जिंकेन. आणि हे पण होते की जेव्हा मी 100 मीटर हा क्रीडाप्रकार निवडला, त्यावेळी सगळे मला सांगायचे की बाबा रे 100 मीटर नको घेऊ, 100 मीटर हा भारतीयांचा क्रीडाप्रकार नाही आहे. भारतीयांचे शरीर 100 मीटरसाठी बनलेलेच नाही आहे. तेव्हा मी आणि माझे वडील नेहमी सांगायचो की गुरिंदर, आता आपण हे निवडलेच आहे, तर आपण यातून मागे हटायचे नाही. जे आपल्याला म्हणतात की आपण हे करू शकत नाही, आपण त्यांना ते करून दाखवू. आणि तू करून दाखवशील, माझा तुझ्यावर विश्वास आहे. तर तो विश्वास, जेव्हा माझ्या वडिलांनी माझ्यावर दाखवला, तेव्हा मी त्या विश्वासाला आपली हिंमत बनवून पुढे गेलो आणि आज प्रत्येक भारतीय म्हणतो की भारतीयांनी स्प्रिंट करावी. 

पंतप्रधान: बघा, तुम्ही दोघांनी खूप मोठी कमाल केली आहे, आणि अवघ्या 2 दिवसांच्या आत तुम्ही दोघांनी 3 राष्ट्रीय विक्रम मोडले आहेत. 100 मीटर शर्यतीत धावणे, जसे गुरिंदरवीरने सांगितले की लोक म्हणतात की भारताच्या लोकांचे शरीर तर या प्रकारासाठी बनलेलेच नाही. इतके कठीण असूनही तुम्ही हे काम केले, तर मला या दोन्ही गोष्टी तुमच्याकडून जाणून घ्यायला आवडतील, आणि 'मन की बात' च्या श्रोत्यांनाही ऐकायची इच्छा असेल की ती कोणती भावना होती, कोणती जिद्द होती, काय विचार केला होता आणि तुम्ही हे कसे करत होता? हे किती कठीण असते? 

गुरिंदरवीर: जी सर, मी गुरिंदर, सर सुरुवातीला खूप संघर्ष होता, मनात बऱ्याचदा संभ्रम देखील निर्माण झाला की मी जे करत आहे ते योग्य आहे का, मी योग्य निवड केली आहे का, कारण प्रत्येक वेळी तुम्ही जिंकत नाही, कधी कधी तुम्ही शिकता. जेव्हा मी हरायचो, जेव्हा माझी कामगिरी चांगली व्हायची नाही, किंवा एखादी दुखापत व्हायची, तेव्हा माझ्या घरचे मला पाठिंबा द्यायचे की काही हरकत नाही, एक दिवस वाईट गेला किंवा एक वर्ष वाईट गेले तर त्याने आयुष्य वाया जात नाही. स्वप्ने पाहणे सोडू नये. तसच माझ्या प्रशिक्षकांनी देखील मला हे शिकवलं की जर तू हे नाही केलंस, तर दुसरं कोणीही करू शकणार नाही. अशा प्रकारे जेव्हा आपला समुदाय आणि आपल्या आसपासचे लोक आपल्याला प्रोत्साहित करतात, तेव्हा आपल्याला मिळालेली ती प्रेरणा कधीच कमी होत नाही.

पंतप्रधान : अनिमेष जी… 

अनिमेष : सर, मला तर सगळे लोक बोलायचे की जेव्हा मी 2021 मध्ये ऍथलेटिक्स सुरू केले, तेव्हा मला बोलायचे की बघ हे नवीन क्षेत्र  आहे, तू करू शकशील की नाही. तेव्हा मी म्हणालो की आता मी या क्षेत्रात उतरलो आहे तर करणारच. माझे पप्पा पण नेहमी मला बोलायचे की तू या क्षेत्रात उतरला आहेस तर कधीही मागे वळून बघू नकोस, कारण विचार तर सगळेच करतात की हे करायचे आहे, ते करायचे आहे, पण प्रत्यक्षात काही तरी करून खूप कमी लोक दाखवतात. तू फक्त या क्षेत्रात उतरला आहेस तर यावर ठाम राहा, यात पुढे वाढायचे आहे. तुला सर्व सुविधा, प्रत्येक गोष्टीत आम्ही पाठबळ देऊ; कुटुंबाचे पाठबळ, आर्थिक पाठबळ, सर्व गोष्टी आम्ही करू, बस तू मेहनत कर आणि भारताला दाखवून दे की भारतीय देखील धावू शकतात. कारण मलाही लोक बोलायचे की भारतीयांची जनुके अशी नाहीत की ते सब 10 (Sub 10) किंवा सब 10 पॉइंट1 (Sub 10.1) च्या आत धावू शकतील किंवा कोणी स्प्रिंट करू शकेल. पण आता आम्हा दोघांनी हे सिद्ध  केले आहे की भारतीय देखील हे करू शकतात. आमच्यासाठी असे काही फार अवघड नाहीये, आम्ही देखील सर्व काही करू शकतो. तर सर, या सर्व गोष्टी मला खूप प्रेरित  करतात आणि जसजसे आम्ही प्रशिक्षण घेत आहोत, आम्ही आमचे टायमिंग अजून मोडीत काढत आहोत आणि बाकी भारतीयांनाही ही गोष्ट दिसत आहे की भारतीय देखील करू शकतात आणि आम्ही आणखी चांगली कामगिरी करू सर आता. आणि आता आम्हा दोघांची निवड राष्ट्रकुल क्रीडा स्पर्धांसाठी (कॉमनवेल्थ गेम्ससाठी)  देखील झाली आहे, तर तिथे आगामी स्पर्धेत  आम्ही अजून चांगली कामगिरी करू.

पंतप्रधान: बरं, हे बघा, माझ्या मनातही एक कुतूहल आहे आणि लोकांनाही असेल. मी ऐकलं आहे की तुम्ही दोघे खूप चांगले मित्रही आहात. तुम्ही दोघांनी काही ठरवून ठेवलं होतं का की तू माझा विक्रम मोडलास तर मी तुझा विक्रम मोडेन? आधी अनिमेष, तुम्ही सांगा.

अनिमेष: सर, आधीचा 10 पूर्णांक 18 शतांशाचा जो विक्रम होता तो माझाच होता, आणि नंतर तो गुरिंदरवीर भैय्यांनी सेमीफायनलमध्ये 10 पूर्णांक 17 शंताश करून तो मोडला. मी पुन्हा दुसऱ्या सेमीफायनमध्ये 10 पूर्णांक 15 करून तो विक्रम मोडीत काढला. मग त्या वेळी जेव्हा माझी सेमीफायनल झाली, तेव्हा आम्ही दोघेही खूप खूष होतो की, हा बुवा ठीक आहे, आज विक्रम मोडीत निघाला आणि चला आपण दोघांनी मिळून तोडला असं. कारण त्या वेळी स्पर्धेत एकमेकांसोबत एक प्रतिस्पर्धा तर असतेच, पण आम्ही आधीपासूनच हे ठरवून ठेवलं होतं. यापूर्वी आम्ही सौदी अरेबियालाही स्पर्धेसाठी गेलो होतो, तिथेही आम्ही दोघे रूममेट्स  होतो. तिथेही आम्ही दोघे बोलायचो की भारताच्या स्प्रिंटिंगला पुढे घेऊन जायचं आहे आणि ती गोष्ट आमच्याच हातात आहे, आम्ही जे करू तेच इतरांना प्रेरित  करेल.


पंतप्रधान: गुरिंदरवीर तुम्ही काय सांगाल ?

गुरिंदरवीर : आम्ही दोघांनी ठरवलं होतं की आम्ही दोघे चांगलं धावू. सर, कधीही एकमेकांना गरज भासली तर आम्ही एकमेकांच्या पाठीशी उभे राहतो. जसं की आता विक्रम करण्यापूर्वी, जेव्हा मी विक्रम केला आणि नंतर अनिमेषने केला, तेव्हा आम्ही जेव्हा वॉर्म-अप करत होतो, तेव्हा मी अनिमेषला सांगत होतो की, 'अनिमेष, तो ब्लॉक  योग्य आहे, तिथे जाऊन बस, तिथे स्ट्राईड करून घे, आपण वॉर्म-अप इथे करू, इथे वॉर्म-अप चांगलं होईल.' आम्ही एकमेकांना मदत करतो. एकमेकांना मदत केली की समोरचाही कामगिरीत सुधारणा करतो आणि आपणही प्रगती करतो. मैत्रीही हवी, पण सर, जोपर्यंत आम्ही मैदानाच्या बाहेर आहोत, स्पर्धेच्या बाहेर आहोत, तोपर्यंत आम्ही मित्र आहोत. जेव्हा आम्ही मैदानात जातो, तेव्हा आम्ही एकमेकांचे प्रतिस्पर्धी बनतो. मग मनात हे असतं की मी याच्यापेक्षा वेगात धावेन, मी याच्यापेक्षा वेगाने धावेन. 

पंतप्रधान: हे बघा, तुम्ही लोकांनी जी स्पर्धा केली आहे ना, ती देशाचा मान वाढवण्यासाठी केली आहे. देशाला भविष्यात या स्थानावर पोहोचवण्यासाठी केली आहे आणि एका सकारात्मक भावनेने  केली आहे. मला असं वाटतं की तुमची ही जी खिलाडूवृत्ती आहे—खेळायचंही आहे, एकमेकांना आव्हानही द्यायचं आहे, मग पुढे जाण्यासाठी प्रयत्न करायचा आहे आणि पुन्हा पुढे जाण्यासाठी एकमेकांना मदत करायची आहे—हे अद्भुत काम तुम्ही लोकांनी केलं आहे. माझ्याकडून तुम्हा दोघांचं खूप खूप अभिनंदन आणि खूप खूप शुभेच्छा! तुम्ही देशाचं नाव नक्कीच उज्ज्वल कराल, याचा मला पूर्ण विश्वास आहे. तुम्ही अशीच मेहनत करत राहा, खूप प्रगती होईल. माझ्या खूप खूप शुभेच्छा.

गुरिंदरवीर / अनिमेष: आभारी आहे सर, तुमचे खूप खूप धन्यवाद.

पंतप्रधान: खूप खूप धन्यवाद.

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प्रिय देशवासियांनो, 
सध्या देशातल्या बहुतांश भागात उष्णता वाढली आहे. कडक ऊन, गरम हवा, अशा वातावरणात स्वत:ची काळजी घेणं महत्त्वाचं आहे. सतत पाणी पीत रहा. ऊन्हात बाहेर पडणं गरजेचंच असेल, तर काळजी घेऊन बाहेर पडा. या संदर्भात सरकारच्या विवध विभागांनी जारी केलेल्या मार्गदर्शक सुचनांचं  पालन करा. ते विसरू नका. 

मित्रांनो,

आपल्या देशात उष्णतेशी लढण्याचा उपाय बहुतेकवेळा आपल्या स्वयंपाकघरातही सापडतो. जसजशी उष्णता वाढत जाते,तसतशी स्वयंपाकघरातली चव आणि जेवणाचे प्रकारही बदलत जातात. काही ठिकाणी माठातलं पाणी पिण्याचं प्रमाण वाढते, तर काही ठिकाणी दह्याच्या सेवनाकडे कल वाढतो. काही ठिकाणी कच्च्या कैऱ्या उकळल्या जातात आणि देशी पेय तयार केली जातात. देशी पेय सर्वांनाच परिचित आहेत. जर तुम्ही उत्तर भारतात गेलात तर कच्च्या कैऱ्यांपासून तयार केलेल्या पन्ह्यांचा स्वाद चाखता येईल. उष्णतेपासून आराम आणि कच्च्या कैऱ्यांचा स्वादही.पंजाब मध्ये गेलात तर, मोठ्या ग्लासातून दिली जाणारी मधूर लस्सी, आणि गुजरात, राजस्थान मध्ये गेलात, तर थंडगार ताक प्रत्येक जेवणाचे सोबती ठरतो. आणि इतकेच नाही तर, बिहार, झारखंड आणि पूर्व उत्तर प्रदेशातील सातुच्या पिठापासून तयार केलेलं सरबत, तर पोटभरण्याचे आणि ऊर्जा देणारे मुख्य स्रोत आहे. कोकण आणि गोव्यात मिळणारे स्वादीष्ट कोकम सरबत आणि सोलकढी. दक्षिण भारतातले प्रसिद्ध पानकम, नीर मोर, संबारम आणि ओडिशामधले बेलपना ही केवळ पेये नाहीत, तर ती भारताच्या विविध प्रदेशांच्या परंपरांचा एक एक अविभाज्य भाग आहेत. आणि त्यातून 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' ही भावनाही प्रतिबिंबित होते. आणि यामध्येच एक भारत श्रेष्ठ भारताच्या भावना प्रतिबिंबित होतात. आणि एक गोष्ट लक्षात ठेवा, यातल्या बहुतांश वस्तू आपल्या घरात आणि शेतातूनच येतात. कसलाच गाजावाजा नाही, पण पिढ्यांपिढ्याचा अनुभव त्यात एकवटलेला आहे. आपणही उन्हाळ्यात घरगुती पेयांचा मोठ्या प्रमाणात आनंद लुटा. 

मित्रांनो, 
उन्हाळा सुरू झाला की प्रत्येक घरात चर्चेचा एक नवीन विषय सुरू होतो आणि तो म्हणजे आंबा. आंबा हा एक सर्वसामान्य चर्चेचा विषय आहे, भारतात असे क्वचितच एखादे घर असेल, जिथे उन्हाळ्यात आंब्यावर चर्चा होत नाही. प्रत्येक प्रदेशाचा स्वतःचा आंबा, त्याची स्वतःची चव, त्याचा स्वतःचा सुगंध असतो. महाराष्ट्र आणि कोकणचा हापूस, अल्फान्सो, गुजरातचा केसर, हा तर आमरसचा जीव आहे, उत्तर प्रदेशचा दशहरी आणि माझ्या काशीचा लंगडा. तसे, लंगडा आंब्यामध्ये एक विशेष गोष्ट आहे - पिकल्यानंतरही त्याचा रंग अनेकदा हिरवाच राहतो. बिहारचा जर्दाळू, अगदी लांबूनच त्याच्या सुगंधामुळे तो ओळखता येतो. चौसा, मालदा प्रत्येक नावानेच लोकांच्या आठवणी जोडलेल्या आहेत. दक्षिण भारतात गेलात तर बंगनपल्ली, तोतापुरी, नीलम, मलगोवा, बंगालचा हिमसागर, ओदिशा आणि आंध्र प्रदेशचा सुवर्णरेखा, म्हणजेचा प्रदेशानुरुप त्याचं नाव, स्वरुप, रंग आणि चव बदलते. आणि मित्रांनो आंब्याचा हा प्रवास आता गावाखेड्यातून जागतिक बाजारात पोहोचला आहे. आज मन की बातच्या माध्यमातून आंब्याचे उत्पादन करणाऱ्या माझ्या शेतकरी बंधू – भगिनिंची प्रशंसा करणार. देशाच्या कृषी अर्थव्यवस्थेसाठी तुम्ही सर्वसाधारण नाही, तर विशेष आहात.

मित्रांनो, उन्हाळ्याच्या दिवसांमध्ये शाळांना सहसा सुट्टी असते, पण मी तुम्हाला अशा एका वर्गाबद्दल सांगणार आहे, ज्यात तुम्हाला प्रवेश घ्यायला नक्कीच आवडेल. मित्रांनो, अशा एका शाळेची कल्पना करा जिथे लहान मुले, तरुण आणि वृद्ध एकत्र शिकतात, जिथे कोणतेही शुल्क नाही, मोठ्या इमारती नाहीत, वर्गखोल्या नाहीत आणि सर्वात मनोरंजक गोष्ट म्हणजे, वर्ग चक्क नदीत भरतात.

मित्रांनो, 

ही केवळ एक गोष्ट नाही. हा एक प्रामाणिक प्रयत्न आहे. केरळमधील अलुवा येथे साजी वलाशेरिल असाच एक जलतरण क्लब चालवतात. आतापर्यंत येथे 15 हजारांहून अधिक लोक पोहायला शिकले आहेत. साजींनी दिव्यांग मुलांनाही पोहायला शिकवले आहे. या प्रयत्नांमागे एक खोल दुःख दडलेले आहे. काही वर्षांपूर्वी, एका बोटीच्या अपघातात अनेक विद्यार्थ्यांचा मृत्यू झाला. त्या घटनेने साजींना आतून हादरवून सोडले. त्यांना वाटले की, जर मुलांना पोहायला आले असते, तर कदाचित अनेक जीव वाचवता आले असते—आणि येथूनच त्यांच्या मोहिमेची सुरुवात झाली.

मित्रांनो, 

लोकांची सेवा करण्यासाठी प्रचंड संसाधनांची गरज नसते—त्यासाठी फक्त एक चांगला हेतू आणि सातत्यपूर्ण प्रयत्न पुरेसे असतात. या गोष्टींनी हजारो लोकांचे जीवन बदलता येते. साजी वलाशेरील यांचे जीवन आपल्याला हा मोठा धडा शिकवते.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो, 

अलीकडेच मला युरोपमधल्या नेदरलँड्सला भेट देण्याची संधी मिळाली. मी तिथे अनेक बैठकींना उपस्थित राहिलो. यादरम्यान एक असा क्षण आला, ज्याने प्रत्येक भारतीयाला अभिमानाने भारून टाकले. नेदरलँड्समध्ये आयोजित एका विशेष समारंभात, चोला काळातील प्राचीन ताम्रपट भारताला परत करण्यात आले. त्या कार्यक्रमात नेदरलँड्सचे पंतप्रधानही उपस्थित होते. मला या ताम्रपटांविषयी भारत आणि परदेशातून सतत संदेश येत आहेत. लोक आनंद आणि अभिमान व्यक्त करत आहेत. जगभरातल्या तमिळ समाजातही याबद्दल विशेष उत्साह आहे.

मित्रांनो, 

या ताम्रपटांबद्दल बरीच उत्सुकता आहे. म्हणून आज मी तुम्हाला त्याबद्दल काही माहिती देऊ इच्छितो. यामध्ये २१ मोठे आणि तीन छोटे ताम्रपट समाविष्ट आहेत. ते प्रामुख्याने राजा राजेंद्र चोल प्रथम यांनी त्यांचे वडील, राजा राजाराजा चोल यांनी दिलेले वचन पूर्ण करण्याशी संबंधित आहेत. त्यांमध्ये आनाईमंगलम गाव एका बौद्ध मठाला दान केल्याचा उल्लेख आहे.

चोल साम्राज्याच्या समृद्ध इतिहासाचा आणि संस्कृतीचा आम्हा सर्वांना खूप अभिमान आहे. मित्रांनो, आमचे सरकार भारताच्या या अमूल्य वारसा स्थळांचे जतन करण्यासाठी सातत्याने प्रयत्न करत आहे. याच संदर्भात, 'ज्ञान भारतम अभियाना'अंतर्गत छत्तीसगडमधील मल्हार इथे एक महत्त्वाचा शोध लागला आहे. इथे तीन दुर्मिळ ताम्रपट सापडले आहेत. हे शिलालेख पांडुवंशी राजवंशातील महर्षी बालार्जुन यांच्या कारकिर्दीतील असल्याचे मानले जाते. तज्ञांच्या मते हे शिलालेख सहाव्या आणि सातव्या शतकातील आहेत, म्हणजेच चौदाशे ते पंधराशे वर्षे जुने असलेले हे ताम्रपट प्राचीन ब्राह्मी लिपी आणि पाली भाषेत लिहिलेले आहेत. त्यांतून त्या काळातले शासन, धर्म आणि संस्कृतीबद्दल महत्त्वाची माहिती मिळते.

मित्रांनो,
 
आम्हा भारतीयांना खगोलशास्त्राबद्दल नेहमीच एक विशेष आकर्षण राहिले आहे. आपल्या देशात अनेक शतकं जुन्या वेधशाळा आजही अस्तित्वात आहेत. इथे आश्चर्यकारक गणितीय शोध लागले आहेत. नौकानयन असो, पंचांग असो किंवा आपले सण असोत, या सर्वांचा संबंध आकाश आणि ताऱ्यांशी राहिला आहे. इथे खगोलशास्त्राने प्रत्येक पिढीमध्ये कुतूहल निर्माण केले आहे. त्याने संशोधनाला प्रेरणा दिली आहे आणि आजची तरुण पिढीसुद्धा त्याबद्दल प्रचंड उत्साह दाखवते. तुमच्या लक्षात आलंच असेल की आजकाल देशभरात खगोलशास्त्र क्लब अधिकाधिक लोकप्रिय होत आहेत. त्यांचे उपक्रम मोठ्या शहरांपासून ते लहान गावांपर्यंत, शाळांपासून ते उद्यानांपर्यंत सर्वत्र दिसतात. मला बंगळूरु खगोलशास्त्रीय संस्थेबद्दल माहिती मिळाली, जिथे निरीक्षण सत्रे आयोजित केली जातात. या संस्थेने ग्रामीण भागात खगोलशास्त्र लोकप्रिय करण्यासाठी एक मोहीमही सुरू केली आहे. ‘खगोल मंडळ' नावाच्या एका चमूने एक अतिशय नाविन्यपूर्ण 30 तासांचा अभ्यासक्रम सुरू केला आहे.

मित्रांनो, रात्री ताऱ्यांचे दर्शन घेणे हा स्वतःच एक अद्भुत अनुभव आहे. 'ॲस्ट्रो केरळ' नावाची एक संस्था रात्रीच्या निरीक्षणासाठी शिबिरे आणि कार्यशाळा आयोजित करते. तिथे तरुण मुले दुर्बिणी बनवायला आणि ताऱ्यांचे नकाशे वापरायला शिकतात. राजकोटच्या 'बिग बँग ॲस्ट्रॉनॉमी क्लब'ने गीरच्या जंगलांपासून ते कच्छच्या रणापर्यंत अनेक खगोलशास्त्रीय कार्यक्रमांचे आयोजन केले आहे. ज्योतिर्विद्या परिसंघ ही खगोलशास्त्राच्या सर्वात जुन्या संस्थांपैकी एक आहे. इथे निरीक्षणाच्या सुविधा, तसेच एक ग्रंथालय आणि एक दुर्बिण ग्रंथालय उपलब्ध आहे. मला आयझॅकचाही उल्लेख करायचा आहे. हे विद्यार्थ्यांच्या नेतृत्वाखालील एक देशव्यापी नेटवर्क आहे, जे खगोलशास्त्र आणि खगोलभौतिकशास्त्र क्लबना जोडते.

मित्रांनो, 

आपला  छंद जोपासण्यासाठी वेळ काढणे आणि सतत काहीतरी नवीन शिकणे अत्यंत महत्त्वाचे आहे. मी तरुणांना आग्रह करतो की, त्यांनी या सुट्ट्यांमध्ये खगोलशास्त्र क्लबमध्ये सामील व्हावे आणि तारांगणाला भेट द्यावी.


मित्रांनो, 

टीव्हीवर 'मन की बात' कार्यक्रम पाहणाऱ्यांना मी सांगू इच्छितो की, तुम्ही हा व्हिडिओ नक्की पाहा. हल्ली या व्हिडिओची खूप चर्चा होत आहे. यामध्ये काही लोक मोठ्या संयमाने आणि काळजीपूर्वक गंगेतल्या एका डॉल्फिनला वाचवण्याचा प्रयत्न करत आहेत. तुम्हाला हे जाणून आश्चर्य वाटेल की, या संपूर्ण प्रयत्नाला अंदाजे 13 तास लागले आणि अखेरीस त्या डॉल्फिनला वाचवण्यात आले.
          

मित्रांनो, यात भारताच्या पहिल्या गंगा डॉल्फिन बचाव रुग्णवाहिकेने महत्त्वाची भूमिका बजावली. ही घटना उत्तर प्रदेशात घडली. तिथल्या एका कालव्यात एक गंगा डॉल्फिन अडकला होता. त्यावेळी, 'नमामि गंगे अभियान' अंतर्गत तयार करण्यात आलेल्या या रुग्णवाहिकेने त्याला आशेचा किरण म्हणून घरी आणले. त्यानंतर त्याची काळजीपूर्वक सुटका करण्यात आली. त्याची तपासणी करून, त्याच्यावर उपचार करण्यात आले आणि मग त्याला सुरक्षितपणे राप्ती नदीत सोडण्यात आले. एक प्रकारे, एक जीव घरी परतला.
       
मित्रांनो, 

ही डॉल्फिन बचाव रुग्णवाहिका खूप खास आहे. तिची रचना एका फिरत्या रुग्णालयाप्रमाणे करण्यात आली आहे. यामध्ये डॉल्फिनना सुरक्षित ठेवण्याची व्यवस्था आहे. यामध्ये ऑक्सिजनची सोय, विशेष स्ट्रेचर्स आणि बचाव साहित्य आहे. याचा अर्थ असा की, जर एखादा डॉल्फिन जखमी झाला, कालव्यात अडकला किंवा नदीपासून दुरावला, तर त्याला तात्काळ मदत केली जाऊ शकते.

मित्रांनो, 
जेव्हा आपण गंगा डॉल्फिनला वाचवतो, तेव्हा आपण केवळ एक प्रजातीच वाचवत नाही, तर आपण गंगेची जैवविविधता वाचवतो. आपण नदीची संपूर्ण जीवनप्रणाली वाचवतो आणि त्याचबरोबर आपल्या भावी पिढ्यांसाठी निसर्गाचा एक अमूल्य वारसाही वाचवतो.

माझ्या प्रिय देशवासियांनो, 

तुमच्यापैकी अनेकांच्या आठवणी नदी, तलाव किंवा विहिरीच्या पाण्याशी निगडित असतील. काहींना तलावात पोहल्याचं आठवत असेल, काहींना तलावाच्या काठावर मित्रांसोबत खेळल्याचं आठवत असेल, तर काहींना त्या चिखलाचा वास आठवत असेल. अशा बालपणीच्या आठवणी आयुष्यभर मनात राहतात.

मित्रांनो, 

उत्तर प्रदेशातील बस्ती जिल्ह्यातून अशा आठवणी जपण्याची एक प्रेरणादायी कहाणी समोर आली आहे. बस्ती इथल्या आकाश गुप्ता यांना आपल्या गावातील मनोरमा नदी पाहून खूप वाईट वाटायचे. कारण जी नदी त्यांनी लहानपणी स्वच्छ आणि जिवंत पाहिली होती, त्याच नदीत काळाच्या ओघात प्लास्टिक जमा होऊ लागले होते. घाण वाढत होती. श्री. आकाश यांनी ठरवले की ते तक्रार करणार नाहीत, तर एक नवी सुरुवात करतील. तक्रार नाही, सुरुवात हाच त्याच मूलमंत्र बनला. त्याने आपल्या मित्रांना एकत्र केले. त्यांच्याकडे फक्त एक जाळी, एक फावडे, एक टोपली आणि सर्वात मोठी शक्ती होती - काहीतरी बदल घडवण्याचा दृढनिश्चय. हे तरुण नदीत उतरून जलपर्णी, प्लास्टिक आणि कचरा बाहेर काढत असत. कधीकधी, एका दिवसात नदीतून 50-60 किलो कचरा काढला जात असे. हळूहळू, मनोरमा नदीचा तो भाग पुन्हा स्वच्छ दिसू लागला. या कामाने आजूबाजूच्या लोकांचेही लक्ष वेधून घेतले. लोकांमध्ये स्वच्छतेबद्दलची जागरूकता वाढली.

मित्रांनो, 
अशीच एक प्रेरणादायी कहाणी गोव्यातून समोर आली आहे. गोव्याचे बाळकृष्ण अय्याजी हे एक सेवानिवृत्त शिक्षक आहेत. पण समाजसेवेबद्दलचा त्यांचा उत्साह आजही तसाच आहे. मड्डी-तोलाप भागातील पाण्याच्या समस्येमुळे ते खूप व्यथित झाले होते. त्यांनीही यावर तोडगा काढण्यासाठी काम सुरू केले. पाईपलाईन टाकण्यात बाळकृष्णजींनी महत्त्वाची भूमिका बजावली. यामुळे अनेक घरांना पाणी मिळाले. पाण्यासाठी रोज संघर्ष करणाऱ्या कुटुंबांसाठी हा एक मोठा दिलासा होता.

मित्रांनो, 

गेल्या महिन्यात मला एक अद्भुत अनुभव आला. त्याचा संबंध 'मन की बात' बरोबर सुद्धा आहे. म्हणूनच आज मी तुमच्याशी त्याबद्दल बोलणार आहे. मी तामिळनाडूतल्या नागरकोविलमध्ये एका शिक्षिकेला भेटलो. मी त्यांना जवळपास तीन दशकांपूर्वी भेटलो होतो. मी गिरिजा अम्मा यांच्याबद्दल बोलत आहे. या भेटीदरम्यान त्यांच्यासोबत काही तरुण विद्यार्थीसुद्धा होते.

मित्रांनो, 

गिरिजा अम्मा सुमारे 15 शाळा चालवतात. यापैकी चेन्नईमधले जयगोपाल गारोडिया हिंदू विद्यालय विशेष उल्लेखनीय आहे. त्यांची देशभक्तीची भावना प्रत्येक भारतीयाला प्रेरणा देते. 'मन की बात' पासून प्रेरित होऊन, त्यांनी देशाच्या अनेक सैनिकांसाठी योगदान देण्याची प्रतिज्ञा केली. यासाठी त्यांनी आपल्या सर्व शाळांमधील विद्यार्थ्यांना प्रेरित केलं. त्यांनी मुलांना शूर सैनिकांसाठी दररोज एक रुपया योगदान देण्यास सांगितलं. याचा अर्थ असा की, एका वर्षात प्रत्येक विद्यार्थ्याकडून 365 रुपये जमा झाले. या छोट्या योगदानांमधून अंदाजे 40 लाख रुपये जमा झाले. गिरिजा अम्मा यांनी मला संपूर्ण रकमेचा चेक सुपूर्द केला. त्यांच्याशी बोलताना मला भारतमातेप्रती असलेल्या त्यांच्या समर्पणाची खोली जाणवली. गेल्याच वर्षी, चेन्नईच्या पहिल्या हिंदू शाळेने 50 वर्षे पूर्ण केली. देशाचा शिक्षण आणि सांस्कृतिक अभिमान वाढवण्यात या शाळांच्या शाखांची भूमिका प्रशंसनीय आहे. मी यात सहभागी असलेल्या सर्वांचे अभिनंदन करतो आणि विशेषतः आपल्या शूर सैनिकांसाठी योगदान देणाऱ्या विद्यार्थ्यांचे कौतुक करतो.

मित्रांनो, 
भारतातील प्रत्येक गावात आणि शहरात असे काही घडत आहे जे आपल्याला प्रेरणा देते. अनेकदा या प्रयत्नांची फारशी चर्चा होत नाही, पण जेव्हा आपल्याला त्यांची जाणीव होते, तेव्हा आपला हा विश्वास अधिक दृढ होतो, की देश आपल्या लोकांच्या सामर्थ्याने पुढे जात आहे. मी तुम्हाला आवाहन करतो की, तुम्ही तुमच्या आजूबाजूला असे प्रयत्न नक्की शोधा. जे समाजासाठी चांगलं काम करत आहेत, त्यांना ओळखा, त्यांचं कौतुक करा, त्यांच्याकडून शिका आणि शक्य असल्यास, तुम्हीही काही चांगल्या कामात सहभागी व्हा. पुढच्या महिन्यात 'मन की बात' मध्ये मी आणखी काही प्रेरणादायी कथा घेऊन पुन्हा तुमच्या भेटीला येईन. खूप खूप धन्यवाद. नमस्कार.