Film and society are a reflection of each other: PM Modi

Published By : Admin | January 19, 2019 | 17:24 IST
Film and society are a reflection of each other: PM Modi
New India is confident and capable of taking issues head on and resolving them: PM Modi
Indian Cinema has a big role in enhancing India’s soft power: PM Modi

यहां उपस्थित सिने जगत से जुड़े हुए सभी रथी, महारथी। इस शानदार स्‍वागत के लिए आप सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

आज मुझे सिनेमा जगत के दिग्‍गजों के बीच आना, creative world से बात करने का अवसर मिला है; मेरे जीवन का शायद ये पहला अवसर है। कभी-कभार किसी से नमस्‍ते-नमस्‍ते हो जाती है, लेकिन मिलने का कभी मुझे अवसर नहीं आया। गुजरात में लम्‍बे समय तक मुख्‍यमंत्री के रूप में काम किया, लेकिन फिर भी कभी नहीं आया मौका। लेकिन आज मौका मिल गया।

आपके direction में guidance में, आपके talent की वजह से भारत में सिनेमा निरन्‍तर नए आयाम छू रहा है। और मेरी कामना है कि ये सिलसिला आगे भी जारी रहे, इस वर्ष विशेष रूप से जारी रहे। आप सभी को National Museum of Indian Cinema के लिए भी मैं बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

बीते दो दशक से इस म्‍यूजियम के बारे में किसी न किसी रूप में चर्चा चल रही है। आज इसके लोकार्पण के साथ हमारे सिनेमा के सुनहरे अतीत को एक जगह संजोने का सपना पूरा हुआ है। और मैं अनुभव करता हूं कि बहुत अच्‍छे काम ऐसे हैं मेरे पूर्व के लोगों ने मेरे लिए खाली छोड़े हुए हैं तो वो मौका मुझे ही मिलता रहा है।

आज जब आप सभी नए भारत के नए सिनेमा को गढ़ने में जुटे हैं, तो मेरा आपसे एक सवाल है क्‍योंकि सभी पीढ़ियां हैं इसमें काफी - पुरानी पीढ़ी के लोग भी हैं और बिल्‍कुल नई पीढ़ी के लोग भी हैं; और इसलिए मेरे मन में एक सवाल है। और आप ही के बीच आया हूं तो शायद वो ज्‍यादा उसी तरीके से अच्‍छा रहेगा।

हाऊ इज द जोश - हाऊ इज द जोश

हाऊ इज द जोश - हाऊ इज द जोश

आजकल आपके इस जोश की देश में बहुत चर्चा है। नए भारत के निर्माण के लिए आपका ये जोश बहुत मायने रखता है।

साथियो, फिल्‍मों की दुनिया बहुरंगी होती है और उसके कई पहलू होते हैं। और नेशनल फिल्‍म म्‍यूजियम इन्‍हीं पहलुओं के दर्शन देशवासियों को, या इस विषय में रुचि रखने वाले लोगों के लिए एक अवसर बन करके काम करेगा। नेशनल फिल्‍म म्‍यूजियम में entertainment industry के गौरवशाली इतिहास के बारे में विस्‍तार से जानकारी मिलेगी, प्रसिद्ध फिल्‍म हस्तियों के बारे में पता चलेगा और उनके संघर्षों के स्‍वर्णिम किस्‍से-कहानियों की झलक सामान्‍य मानवी जान पाएगा, देख पाएगा।

मैं समझता हूं कि नेशनल फिल्‍म म्‍यूजियम से हमारी युवा पीढ़ी को काफी कुछ देखने, सीखने और समझने का अवसर मिलेगा।कुछ देर पहले मैंने भी इस म्‍यूजियम की व्‍यवस्‍थाओं को देखा है। पहले दो मंजिल जाना था, फिर मन कर गया तो तीसरी पर चले गए। मन में हो रहा था कि आप बैठे होंगे, इंतजार करते होंगे; लेकिन बना ऐसा है कि मन कर गया तो आखिर तक चले गए और इसके कारण आपके बीच आने में देर भी हो गई, आपको इंतजार भी करना पड़ा। आपको इंतजार करना पडा, इसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं।

ये म्‍यूजियम हमारी फिल्‍मों की तरह ही समृद्ध है। इसमें इतिहास का गौरव भी है और भविष्‍य की ऊर्जा भी है। इसमें प्राचीनता का मान भी है, इसमें आधुनिकता का सम्‍मान भी है। यहां गुलशन बहल का हिस्‍साहमारे इतिहास की गवाही दे रहा है तो दूसरी अत्‍याधुनिक इमारत हमारे दूरदर्शी होने का प्रणाम देती है। गुलशन बहल की इमारत में सिनेमा की शुरूआत की गौरव-गाथा है और मुझे बताया गया है कि म्‍यूजियम के इसी हिस्‍से में 30 घंटे की ऐसी फुटेज है जिसमें दूसरे विश्‍वयुद्ध में हमारी सेना के शौर्य को दिखाया गया है।

मैं फिल्‍म डिवीजन को बधाई देना चाहता हूं कि उन्‍होंने इसे सेना से ले करके इसे digitisation करने का काम किया है। और इस digitisation के माध्‍यम से द्वितीय विश्‍वयुद्ध में हमारे देश के 20 लाख सैनिक और अधिकारियों का शौर्य अब हमारी आने वाली पीढ़ी जान पाएगी, उनके लिए प्रेरणा होगी। बहुत कम लोगों को मालूम है- न हमें उस जमीन से लेना-देना था, न किसी के झंडे के लिए मरना था, न हमारे लिए मर रहे थे, लेकिन मेरे देश के डेढ़ लाख जवान पहले और दूसरे विश्‍वयुद्ध में शहीद हुए हैं। उन चीजों को भुला दिया गया है।

उसको एक बार शायद इस स्‍थान पर से इस नए formमें उस असलियत को शायद देश जान पाएगा, नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी और विश्‍व को- मैं जब दुनिया के लोगों से बात करता हूं तो मैं कहता हूं कि आप मुझे peace मत सिखाइए। हमने शांति के लिए दुनिया में, डेढ़ लाख जवानों को शहीद किया है, हम वो लोग हैं। ये हमारा इतिहास, हमारी गाथा है, आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती है।

और साथियो वास्‍तव में फिल्‍म और समाज, दोनों एक-दूसरे के reflections होते हैं। समाज में क्‍या हो रहा है वो फिल्‍मों में देखने को मिलता है, और जो फिल्‍मों में हो रहा है, वो समाज में भी आपको नजर आता है। कई बार आपने ये भी देखा होगा कि समाज में आता हुआ परिवर्तन लोगidentifyकर रहे हैं। उससे पहले ही उसकी झलक फिल्‍मों में मिल जाती है, और मैं मानता हूं ये बहुत बड़ी बात है। कला जगत आने वाले कल को परख लेता है। हम सबको याद है कि आजादी के बाद 60-70 के दशक में श्रीमान मनोज कुमार जी की देशभक्ति से भरी फिल्‍मों का दौर था। इसके पीछे आजादी के लंबे संघर्ष ने बड़ी भूमिका निभाई होगी।

उसी तरह 70-80 के दशक में angry young man की एंट्री होती है। लेकिन जब समाज में काफी सुधार हुआ, गुस्‍सा कम हुआ तो आशाएं और आकांक्षाएं बढ़ने लगीं। फिल्‍मों में भी ये reflection देखने को मिला। समाज में बदलाव के साथ हर दौर में फिल्‍में भी बदलती रहीं। आज हम लोग एक नया trend देख रहे हैं।

एक समय हुआ करता था कि जब मैं mainstream cinema में हीरो हमेशा बड़े शहर से, बड़े परिवार से, मुम्‍बई से, दिल्‍ली से, चिकनी सूरत-शक्‍ल के साथ नजर आया करता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ये सिलसिला बदला है। टीयर-2, टीयर-3 शहर के कस्‍बों से और सामान्‍य परिवार से ऐसे होनहार नौजवान आ रहे हैं जो पूरी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को एक नई जान दे रहे हैं- अपनी कला के माध्‍यम से, अपने कौशल्‍य के माध्‍यम से। और वैसे भी, और ये जो मैं कह रहा हूं ये कि टीयर-2, टीयर-3 सिटी, छोटे-छोटे स्‍थान से – ये भी एक बदलते भारत का रूप है; जो हमने देखा है और हमने अनुभव किया है।

आज sports हो, startups हो, even 10th, 12thके रिजल्‍ट आप देखेंगे तो बड़े शहर के बड़े नामाकिंत स्‍कूल के बच्‍चे नहीं होते हैं; छोटे स्‍थान से होते हैं। यानी देश की वो ताकत उभर करके बाहर आ रही है। हमने भारत की गरीबी पर तो बहुत फिल्‍में देखी हैं, भारत की बेबसी पर भी हमने फिल्‍में देखी हैं। और मेरा मानना है कि ये एक बदलते समाज की निशानी है कि अब problem के साथ-साथ solutions भी फिल्‍म में देखने को मिल रहे हैं; वरना हम स्‍वभाव से वो लोग हैं जिसने गरीबी को virtue माना है। फटे कपड़े हों, क्‍योंकि हम सत्‍यनारायण की कथा सुनते हैं तो शुरू होता है, एक बेचारा गांव का गरीब ब्राह्मण, वहीं से शुरू होता है। यानी गरीबी को virtue मानकर ही हमारी psyche बन गई है।

लेकिन अब बदलता हुआ हिन्‍दुस्‍तान अलग तरीके से सोचता है, अलग तरीके से देखता है, दिखाता भी है। और साफ है- आज समाज के साथ फिल्‍मों में भी ये बदलाव दिख रहा है। समस्‍याएं तो हैं अब उसका solution भी है। अड़चन है तो उसे दूर करने का जुनून भी है। भारत बदल रहा है, भारत अपना हल खुद ढूंढ रहा है।

अगर million problem हैं तो billion solutions भी हैं। हम बदल सकते हैं, ये आत्‍म्‍बल दिख रहा है। और यही वो confidence है जिसकी वजह से अब समाज को झकझोरने वाले विषयों को उठाने में झिझक नहीं हो रही है। हम परेशानियों से घबराते नहीं हैं, न ही छिपाते हैं उसे। बल्कि सामने लाकर उसे दूर करने का प्रयत्‍न कर रहे हैं। और न्‍यू इंडिया का यही वो नया विश्‍वास है जो एक भारतीय को गर्व से भर देता है।

साथियो, आपने एक और ट्रेंड पर गौर किया होगा। पहले फिल्‍में बनती थीं तो आठ साल, दस साल, 10-10, 15-15 साल लग जाते थे। और बहुत मशहूर फिल्‍मों की पहचान ये होती थी कि उसे बनने में कितना समय लगा। यानी वो उसका criteriaमाना जाता थाकि 8 साल बनी, 9 साल बनी, 12 साल बनी और उसकी चर्चा हुआ करती थी।अब फिल्‍मेंबनती हैं कुछ ही महीने के टारगेट के अंदर तैयार हो करके आ जाती हैं।

अब आप सोचिए देख की योजनाओं के साथ भी क्‍या पहले व‍हीं नहीं होता था। 30 साल, 40 साल; म्‍यूजियम को भी 20 साल हो गए। और अब कैसे सरकार की योजनाएं एक तय समय में पूरी करने की कोशिश हो रही है। और ये आप सब देख रहे हैं। अगर मैं कहूं कि देश की young aspirations को भांपकर आपने पहले ही खुद को विकसित कर लिया तो शायद मेरी बात गलत नहीं होगी। आप दो कदम आगे हैं, आपकी यही शक्ति nation building में बहुत बड़ा काम करती है।

साथियो, हमारी entertainment industry के contextमें मानवीय भावनाओं, संवेदनाओं, action-reaction, comedy, tragedy का वो हल पहलू दिखता है जो दुनिया को connect करता है। आखिर देश कोई भी हो, मानवी भावनाएं तो वही होती हैं और Indian entertainment industry ने इस मर्म को महसूस किया है।

मैं एक बार विदेश जा रहा था, हवाई जहाज में हमारे साथी यात्री एक बैठे थे। बड़ा अजब सा सवाल उन्‍होंने मुझसे पूछा। बोले- मैं भारत आता रहता हूं, मैं भारत की फिल्‍में भी देखता हूं। बोले- आपके यहां ये कलाकार पैर को लिपट करके रोते क्‍यों हैं। मंदिर में जा करके रोते क्‍यों हैं, चिल्‍लाते क्‍यों हैं? यानी उसके लिए ये अजूबा था कि हिन्‍दुस्‍तान में ये कौन की परम्‍परा है कि आदमी तुरंत relax हो जाता है। उनके लिए अजूबा था। लेकिन हमारी फिल्‍मों ने उस महारत के द्वारा सामान्‍यमानवी की भावनाओं को बड़ी सहजता से प्रवाहित किया है। और मैं मानता हूं ये छोटी चीज नहीं है। लेकिन वो तब होता है जब कला, कलाकार और साहित्‍यकार जमीन से जुड़े होते हैं, तब वहीं से ये बीज अंकुरित होता है, तब वो होता है।

बात चाहे fun पैदा करने की हो या फैन बनाने की, हम यहां भी अपना असर डालते हैं। मैं फिल्‍म जगत को इस उपलब्धि के लिए मैं सच में हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। और मैं देख रहा हूं कि आज हमारा युवान अगर बैटमैन का फैन है तो साथ में बाहुबली का भी फैन है। हमारे किरदारें की भी अब ग्‍लोबल अपील है।

साथियो, भारत के soft power की शक्ति, मैं समझता कि उसमें हमारी फिल्‍मों की बहुत बड़ी भूमिका है। ये फिल्‍में ही हैं जो पूरे विश्‍व में भारतीयता का प्रतिनिधित्‍व करती हैं। भारतीय फिल्‍में भारतीयता का आईना रही हैं। दुनिया को भी वो अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। हमारी फिल्‍में बॉक्‍स ऑफिस पर तो धूम मचाती रहती हैं साथ ही पूरे विश्‍व में भारत की साख बढ़ाने, भारत का brand बनाने में भी बहुत बड़ा रोल प्‍ले करती हैं।

हम सब जानते हैं‍ कि राजकपूर साहब की फिल्‍मों को लेकर देश ही नहीं, विदेशों में भी गजब की दीवानगी होती है। और मैं ये प्रत्‍यक्ष अनुभव करता हूं जब मैं जाता हूं, लोगों से मिलता हूं। मैंने कुछ देश के राष्‍ट्रपति देखे हैं जो पूरी हिन्‍दी फिल्‍म के गाने बढ़िया ढंग से गाते हैं जी।

मैं अभी इजरायल गया था तो रात को इजरायल के प्रधानमंत्रीजी के घर में खाना खाने गया, हम दो ही लोग थे। ऐसे ही हमारा जरा दोस्‍ताना ज्‍यादा रहता है, थोड़ा तामझाम वाला कम रहता है। तो ऐसे ही बातें चल पड़ीं। अब‍ हम इतना travelling करके गए थे, लेकिन रात दो-ढाई बजे तक हम बैठे, गप्‍पे चलती रहीं हमारी, काफी बातें हुईं। तो उन्‍होंने मुझे इचक दाना-इचक दाना- पूरा गीत सुनाया जी। अब इजरायल के प्रधानमंत्री- हमारी भाषा नहीं जानते, उसका अर्थ क्‍या होता है, मालूम नहीं है; मुझे भी इचकदाना का अर्थ मालूम नहीं है, और यही तो फिल्‍म इंडस्‍ट्री की ताकत है जी।

और मुझे याद है कि जब कुछ समय पहले मैं दक्षिण कोरिया गया था, साउथ कोरिया, तो वहां राष्‍ट्रपति जी ने भोजन दिया था। तो भोजन के समय बच्‍चों के performance का एक कार्यक्रम रखा था। तो स्‍कूल के बच्‍चे, हाथी-मेरे साथी उसका गाना गाया और एक्‍शन के साथ गाया। तो बाद में मैं बच्‍चों को मिला, मैंने कहा ये आपको मालूम है क्‍या गया रहे थे आप? कुछ बच्‍चेबता पाए हाथी का मतलब क्‍या होता है, बाकी को मालूम नहीं था। तो मैंने कहा भई इतना बढ़िया आपने किया, इतने कम समय में कैसे मेहनत करके किया।

देखिए प्रभाव है हमारी इंडस्‍ट्री का। फिर मेरा भी मन कर गया तो मैंने आ करके उस गीत को कोरियन लेंग्‍वेज में डबिंग करवाया और मैंने उसको वापस भेजा स्‍कूल के बच्‍चों को। देखिए, ये ताकत है आपकी, और इसी तरह फिल्‍मों के साथ-साथ इन दिनों हमारे टीवी सीरियल्‍स में भी अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। सास भी कभी बहु थी- हमको लगता होगा ये हिन्‍दुस्‍तान में चलती होगी, ऐसा नहीं है जी। मैं दुनिया के जिन देशों में गया हूं और खास करके मैंने अफगानिस्‍तान में देखा- शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा कि जो इस सीरियल को नहीं देखता हो।

यानी हमारे आसपास के देश के लोगों को भारत के सामान्‍य जीवन को देखने की रुचि नजर आती है और उसकी चर्चा करते हैं, खुल करके करते हैं। मैं एक बार वियतनाम के प्रधानमंत्री के साथ बैठा था तो ऐसे ही मैंने कहा तो सबको परिवार के साथ बुलाया, आप अकेले क्‍यों आए हैं? अब वो पूरी तरह कम्‍युनिस्‍ट हैं- देश कम्‍युनिस्‍ट, नेता भी कम्‍युनिस्‍ट। और कम्‍युनिस्‍टों को तो जानते हैं, यहां कुछ लोग होंगे। तो उन्‍होंने कहा कि... कुछ लोगों को धक्‍का लगेगा।

उन्‍होंने कहा कि...मैंने कहा आपकी श्रीमती जी को लाना चाहिए था, ये बड़ा ही अच्‍छा ये जो 26 जनवरी को मैंने सब देश के लोगों को बुलाया था, तब बात हुई थी। तो बोले भई मेरे घर में एक problem है। मैंने कहा क्‍या? उनकी आयु भी बड़ी है। बोले- मेरी पत्‍नी रामायण सीरियल, हमारी लेंग्‍वेज में डबिंग हुई है, तो वो घंटों तक रामायण सीरियल देखती रहती है, छोड़ने को तैयार नहीं होती है। बोले-उसके कारण उसने मेरे साथ आने से मना कर दिया। आप कल्‍पना कर सकते हैं कैसा impact है हम लोगों का। अगर हम हमारी इस ताकत को न पहचानें तो मैं समझता हूं कि दोष हम किसी और को नहीं दे सकते हैं।

साथियो, सिनेमा की एक मूक ताकत, silent power ये भी है कि वो लोगों को बिना बताए, बिना ये जताए कि हम आपको ये सिखा रहे हैं, बता रहे हैं; एक नया विचार, एक नया thought जगाने में वो अपने-आपcatalyst agent का रोल कर देता है, चीज चल पड़ती है जी। अनेक ऐसी फिल्‍में होती हैं जिन्‍हें देखकर जब लोग निकलते हैं तो अपने thought process के लिए कुछ नए seeds कुछ नए ideas ले करके निकलते हैं।

अब आप देखिए, इन दिनों toilet जैसा विषय हो, women empowerment जैसा विषय हो, sports हों, बच्‍चों की समस्‍याओं से जुड़े पहलू हों, गंभीर बीमारियों के प्रति जागरूकता का विषय हो, या‍ फिर हमारे सैनिकों के शौर्य- आज एक से एक बेहतरीन फिल्‍में आप सबके माध्‍यम से देश तक पहुंच रही हैं। एक विचार पहुंच रहा है, एक आंदोलन पहुंच रहा है।

इन फिल्‍मों की सफलता ने सिद्ध किया है कि सामाजिक विषयों को लेकर भी अगर बेहतर vision के साथ फिल्‍म बने तो वो बॉक्‍स ऑफिस पर भी सफल हो सकती है। और nation building में अपना योगदान भी दे सकती है।

साथियो, आपके फिल्‍मों और फिल्‍म के production की प्रक्रिया में जिस तरह देश की विविधता का, देश की diversity का सम्‍मान होता है, वो ‘एक भारत श्रेष्‍ठ भारत’ की भावना को मजबूत करता है। और मैं मानता हूं फिल्‍म जगत के लोगों को इन विषयों को कहीं न कहीं reflect कर-करके जागृत प्रयास करना चाहिए।

हमारी हिन्‍दी फिल्‍मों मेंनेपाली भाषा का और नेपाली कलाकार का तो हर किसी ने लाभ लिया है मनोरंजन के लिए, लेकिन भारत के हर राज्‍य की अपनी विशेषता है। एकाध कलाकार दो-चार वाक्‍य भी फिल्‍म में किसी और भाषा के बोले, देश की एकता का संदेश लेके जाता है, उसे अपना लगता है। कोई नागालैंड का व्‍यक्ति दिखाई दे और नागा भाषा में बोले तो लगता है भई, जिस देश के पासhundred languages हों, seventeen hundred dialogues हों; कितना richness है हमारा।

हम इसको कैसे समेटें, एकता की ताकत को कैसे प्रकट करें। एक कलाकार अगर एक राज्‍य की एक कहावत बोले तो दूसरा तुरंत उसी कहावत को अपनी भाषा में बोले, तो देश की एकता का सूत्र अपने-आप प्रकट हो ज ाता है। ये ताकत, ये communication की ताकत इसमें है।

देश में कितने ही tourist spot, अभी राजवर्धनजी बता रहे थे, फिल्‍मों की वजह से जाने जाते हैं, और हमारी भी कोशिश रहनी चाहिए! आज भी जैसे हर जगह‍ पर जाएं तो लोग हमें कहेंगे कि यहां ये फिल्‍म बनी थी, यहां वो फिल्‍म बनी थी। उसको मालूम भी नहीं होगा, उसका जन्‍म भी नहीं हुआ होगा, लेकिन वो बताएगा कि हां फिल्‍म बनी थी और देवानंद साहब यहां आए थे, ढिकना आए थे, वो बताएगा।

भारत की अलग-अलग तस्‍वीर को इतने खूबसूरत तरीके से देश के लोगों के सामने रखकर, और मैं मानता हूं कि टूरिज्‍म को बढ़ाने में बहुत बड़ा रोल हमारी ये इंडस्‍ट्री कर सकती है, बहुत बड़ा रोल। और इन दिनों हिन्‍दुस्‍तान का tourism का growth बहुत अच्‍छा है लेकिन फिर भी दुनिया को ताजमहल से आगे बहुत ज्‍यादा जानकारी नहीं है, और ये कुल मिला करके हमारा जो स्‍वभाव है, हमारा देश बेकार है। ये जो हमारा मूड बना हुआ है ना उसी का reflection है ये।

हमारे पास भी दुनिया को दिखाने के लिए बहुत कुछ है। ये जो आन-बान-शान से आंख से आंख मिला करके बात करने को जो मिजाज चाहिए, वो लाने में आप बहुत बड़ा रोल कर सकते हैं। और मैं मानता हूं कि हमने टूरिज्‍म को भी बढ़ावा और टूरिज्‍म एक ऐसा क्षेत्र है जो गरीब से गरीब को रोजगार देता है, चाय वाला भी कमाता है।

और मैं मानता हूं कि हिन्‍दुस्‍तान के अलग-अलग हिस्‍सों में, ये बात सही है थोड़ा-बहुत राजवर्धन जी ने उल्‍लेख किया और मुझे भी कुछ लोग पिछले दिनों मिले थे, उन्‍होंने भी कुछ बातें कही थीं कि भई हम अलग-अलग जगह पर जाते हैं तो हमें permission के लिए परेशानी होती है, ढिकना होता है, ब‍हुत चक्‍कर काटने पड़ते हैं, हमारा टाइम टेबल लड़खड़ा जाता है। हम सब तैयार किए जाएं और एक म्‍युनिसिपल कमीश्‍नर की permission मिल जाए, हमारा सारा..., एक कठिनाई है। मेरे सामने विषय आया, मैं ज्‍यादा तो आप लोगों की दुनिया जानता नहीं था, लेकिन जब बताया तो मेरा भी ध्‍यान गया। मैंने मेरे अफसरों को कहा कि भई इसका क्‍या किया जा सकता है? उनसे पूछा, और मैंने उनसे कहा कि कोई तरीका निकालना चाहिए।

आज जब मैं आपके बीच आया हूं तो मुझे ये कहते हुए प्रसन्‍नता हो रही है कि देश में अलग-अलग हिस्‍सां में फिल्‍म की शूटिंग से जुड़ी मंजूरियों के लिए एक single window clearance की नई व्‍यवस्‍था बनाने का काम शुरू किया जा चुका है और इसके लिए एक विशेष portal बनाया जा रहा है, जिसमें आपको सारी जानकारी देनी होगी, फिर NFDC के संबंधित अफसर इस काम के लिए नियुक्‍त किए जाएंगे, वो तय समय से इस प्रक्रिया को वहीं से कर-करके आपको दे देंगे; यानी सरकार खुद इसकी चिंता कर रही है। और मुझे लगता है कि सरकार के इस प्रयास से ये आपकी एक बहुत बड़ी कठिनाई जो मेरे सामने, जिन नौजवानों ने मेरे सामने रखी थी, तो मुझे लगता है कि उसका solution कुछ न कुछ निकलना चाहिए।

भविष्‍य में आपको शूटिंग की permission के लिए मैं नहीं मानता हूं कि ज्‍यादा अलग-अलग जगह पर पचासों लोगों का आपको सलाम नहीं करनी पड़ेगी और कभी-कभी तो वो कहता होगा कि आपके जो हीरो हैं उनसे हाथ मिलवा कर फोटो निकलवाओ, तब मैं permission दूंगा, ऐसा भी होता होगा। आप बताते नहीं होंगे, लेकिन ऐसे सारे अनुभव आते होंगे आपके सामने। और आपको भी लगता होगा कि ये सस्‍ता रास्‍ता ही है, ले चलो इसको। यानी ease of doing business के साथ ही ease of filming की सुविधा आपको मिले, उसके लिए सरकार जागृत है और मेरा भरपूर प्रयास रहेगा, आप विश्‍वास कीजिए।

साथियो, भारतीय सिनेमा को और सशक्‍त करने के लिए, देश में सकारात्‍मकता के लिए, एक व्‍यापक विमर्श तैयार करने के लिए सरकार पूरी शक्ति से आपके साथ है। मुझसे कुछ साथियों ने कुछ समय पहले जीएसटी को ले करके चिंता जताई थी। यहीं राजभवन में मुझे मिले थे तो उन्‍हें यही चिंता थी कि साहब हम इतनी मेहनत कर रहे हैं लेकिन देखने वाला ही नहीं आएगा तो क्‍या करेंगे? और कलाकार जब एक काम करता है तो, बॉक्‍स ऑफिस देखने वाला एक वर्ग होगा, जिसने पैसे डाले हैं, लेकिन बाकी जो creative nature का है वो ज्‍यादा भई जनता के दिलों में इसकी बात क्‍या होगी, उसके दिमाग में तो वही रहता है ना। कितने लोगों ने देखा, क्‍याअनुभव किया क्‍योंकि creative वर्ग जो है उसकी तो, उसको रुपये-पैसे से ज्‍यादा लेना-देना नहीं होता है।

जब ये बात मेरे पास आई तो मैंने जीएसटी काउंसिल से ये बात बताई, उनको कहा कि भई देखिए, ये मेरे पास विषय है। क्‍योंकि हमारे हाथ में नहीं है वो जीएसटी काउंसिल के हाथ में है, लेकिन देश में ऐसा माना जाता है, सब मैं कर रहा हूं। लेकिन मेरी तैयारी है ऐसा कोई तो चाहिए, जिसमें डिब्‍बे में सब डाला जा सके, वरना सफाई कैसे होगी। और मुझे खुशी है कि जीएसटी काउंसिल ने इस चिंता को दूर किया है और 100 रुपये के ऊपर के टिकटों पर लगने वाली जीएसटी को 28 पर्सेंट से घटा करके 18 पर्सेंट कर दिया गया है।

साथियो, एक विषय मेरे सामने आया है और वो है piracy का। मैं समझता हूं कि piracy को ले करके आप सभी की चिंता बहुत स्‍वाभाविक है।piracy आपके श्रम और आपके सामर्थ्‍य का अपमान है और इसे रोकने के लिए सरकार cinematographअधिनियम 1952 में बदलाव करने की दिशा में तेजी से कदम उठा रही है। हम जिस संशोधन की दिशा में जा रहे हैं, उस संशोधन के बाद cam carding को सिर्फ punishable offence ही नहीं बनाया जाएगा, बल्कि इसके लिए कठोर दंड की व्‍यवस्‍था का भी प्रावधान किया जाएगा।

साथियो, बीते साढ़े चार वर्षों में हमारी सरकार ने करीब 1400 से ज्‍यादा पुराने कानूनों को खत्‍म किया है। और आप हैरान होंगे जब मैं 2013-14 में चुनाव प्रचार करता था, जब मेरी पार्टी ने बता दिया था कि मुझे प्रधानमंत्री का उम्‍मीदवार घोषित किया गया था - आमतौर पर सरकारों की पहचान क्‍या होती है, हर सरकार इस बात को ले करके बाजार में जाती है लोगों पास कि हमने ये कानून बनाए, वो कानून बनाए; क्‍या हुआ, वो बाद की बात है। वो आप भी जानते हैं, मैं भी जानता हूं, लेकिन हमने ये बनाया। तब मैंने कहा था कि सरकार बनाने वाली सरकारों को देखा है, मैं एक ऐसी सरकार लेकर आना चाहता हूं जो कानूनों को खत्‍म करे, और मैंने ये कहा था मैं per day एक कानून खत्‍म करूंगा; ऐसा मैंने कहा था। और आपको शायद, आप तक ये बातें पहुंची नहीं होंगी क्‍योंकि ऐसी बहुत अच्‍छी बातें होती हैं जो देश में, उनका महत्‍व नहीं होता है। अब तक 1400 कानून खत्‍म किए हैं जी। चार-साढ़े चार साल के कार्यकाल में 1400 कानून खत्‍म किए हैं ताकि प्रक्रियाएं सरल हों। सरकार के साथ नागरिक को रोजाना जद्दोजहद करनी पड़े, ये समझ में नहीं आ रहा मेरे दिमाग में।

आज जब मैं आपके पास आया हूं तोमें आपसे कुछ मदद चाहता हूं और मुझे विश्‍वास है कि आप में से जो इस पूरे क्षेत्र की चिंता करते हैं- देखिए अब टेक्‍नोलॉजी बदल चुकी है, आज आप मोबाइल फोन पर दुनिया का कोई भी रेडियो सुन सकते हो लेकिन फिर भी सरकार का कानून है कि रेडियो के लिए लाइसेंस लेना पड़ेगा; अब mismatch है।

खैर मैंने निकाल दिया लेकिन मैं कहना ये चाहता हूं कि आज टेक्‍नोलॉजी इतनी बदल चुकी है और कानून हमारे 1952 के हैं। क्‍या फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लोग इस विषय पर गौर से सोचें कि भई ये कौन से कानून हैं जो आज के युग में बिल्‍कुल irrelevant हैं, बेकार हैं, लेकिन वो लटके पड़े हैं जी, कोई उपयोग नहीं है। आप अपने expert से बात करके, एक-एक शब्‍द पढ़ करके अगर कोई detail note बना करके मुझे देते हैं तो मेरी कोशिश है कि मैं और कुछ कानूनों को खत्‍म करूं जो आपके लिए रुकावट बने पड़े हैं और बदले हुए युग के अनुकूल नहीं हैं।

तो मैं चाहूंगा कि आपमें से कोई initiative लें, क्‍योंकि देश के लिए एक प्रकार से और मेरी ये कोशिश है कि आपको सरकार के एक और फैसले के विषय में भी बताना चाहता हूं। Animation, अभी थोड़ा-बहुत हमारे राजवर्धन जी ने उन्‍हें किया था, animation और visual effect में हमारे युवाओं की प्रतिभा का सम्‍मान पूरी दुनिया कर रही है।

देखिए दुनिया में Make in India एक महत्‍व है, वैसे ही डिजाइन इन इंडिया, इसका भी एक महत्‍व है। हमारे पास जो creative talent है वो दुनिया को बहुत कुछ दे सकता है। लेकिन उसके लिए, सशक्‍त करने के लिए, एक सरकार ने National Centre for Excellence for Animation,Visual Effects,Gaming and Comics, उसकी भी स्‍थापना करने की दिशा में हम आगे बढ रहे हैं। और वैसे मैं फिर चाहूंगा कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री मिलकर भविष्‍य में और ये विचार में आग्रह से आपके सामने रखना चाहता हूं, क्‍या समय की मांग नहीं है कि दुनिया में हिन्‍दुस्‍तान की फिल्‍म इंडस्‍ट्री जो इतना बड़ा creative world है पूरा, विश्‍व की तुलना में बहुत बड़ी ताकत है हमारी, लेकिन human resource development की दिशा में काम करते-करते सीख जाएं। घर में पहले कोई गाड़ी साफ करने के लिए रखते हैं, बाद में वो ड्राइवर बन जाता है, अब उसमें कितने साल जाते हैं।

आज देश में मुझे लगता है कि आवश्‍यकता है एक communication and entertainment, उसके लिए एक अलग यूनिवर्सिटी हो। अगर फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लोग इस विषय को ले करके आगे आते हैं तो और एक full-fledged university हो इसी काम के लिए, जिसमें टेक्‍नोलॉजी हो, जिसमें creativity का scope हो, जिसमें दुनिया में चलते प्रभाव कि दुनिया में हम कैसे, उसमें फाइनेंस भी विषय हो, अगर उस प्रकार से कोई proposal ले करके, और मैं चाहूंगा कि ये सब सरकार करे तो पता है साहब सरकार क्‍या करेगी। फिर प्रधानमंत्री का मैसेज आएगा कि मेरी फिल्‍म बनाओ, तो मुझे वो नहीं करना है। देश के सामान्‍य मानवी के लिए जो काम आए, ऐसी कुछ व्‍यवस्‍थाएं हम विकसित करें, अगर आप उस प्रकार की बात देंगे, सरकार पूरी तरह से सहयोग करेगी, पूरा सहयोग करेगी।

साथियो, आपसे ऐसी ही एक चर्चा के दौरान एक महत्‍वपूर्ण सुझाव कुछ मित्रों की तरफ से आया था और मुझे वो सुझाव अच्‍छा लगा। और मैं चाहता हूं कि हमने अपने-आपको ये मुम्‍बईया दुनिया से बाहर लाना है जी, ये बहुत जरूरी है। और ये सुझाव मेरे पास ये आया था कि जैसे Davos में world economic summit होती है, क्‍या वैसे ही भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री से जुड़ी एक international summit क्‍या हम देश में हर बार दो साल के बाद कर सकते हैं क्‍या, लगातार। आप लोगों के अभी जो festival होते हैं, उसका मुख्‍य आधार creativity होता है, बिजनेस को मुख्‍य आधार बनाकर, नए मार्केट को मुख्‍य आधार बनाकर, Global film summit हो, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अलग-अलग सेमिनार हों, finance इस दुनिया में किस प्रकार से नए तरीके हो सकते हैं, उसकी चर्चा हो यानी अपने-आप में हमारा सिर्फ कलाकार तक सीमित नहीं, एक पूरी- जिसके अंदर लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है, इसका global एक्‍सपोजर हो, दुनिया को हमारी इंडस्‍ट्री से एक्‍सपोजर मिले।

Davoslike summit, तो मैंने उस समय कहा था कि शुरूआत हम ऐसी करें कि पहले एक-दो साल भारत की ही भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार की जो फिल्‍म व्‍यवस्‍थाएं हैं, अलग-अलग भाषाओं में हैं, उनकी एक summit से शुरू करें और फिर हम उसको globalsummit बनाएं और डावोस से कम जरा भी नहीं। मैं- कुछ लोगों का software होता है ना, वैसे ही मेरा भी software ऐसा है जब से जन्‍मा हूं तब से कि मुझे छोटा दिमाग में बैठता ही नहीं है। और इसलिए एक वैश्विक ताकत के रूप में उभरने का एक तरीका है जी। दुनिया के सामने हमारे लोग आ करके खड़े होंगे, बात करेंगे, चर्चाएं होंगी; विश्‍व को समझना होगा- हां ये जो 50-60-100 साल की यात्रा है, बेकार नहीं गई है जी; बहुत बड़ा काम देश का हो सकता है।

साथियो, अक्‍सर जब फिल्‍म जगत की बात आती है तो उसका एक ही पहलू कुल ध्‍यान में आता है- ग्‍लैमर, चमक-दमक, चकाचौंध- ये ही इसी के आसपास, लेकिन मैं मानता हूं कि फिल्‍म जगत में ग्‍लैमर और चकाचौंध से भी आगे एक बहुत बड़ी दुनिया है, आशा है, अपेक्षा है, दर्द है, पीड़ा है, बहुत कुछ है जी। आज जब मैं म्‍यूजियम देख रहा था, कितनी कठिनाइयों से उस जमाने में फिल्‍म बनी होगी- हमें तो इस विषय का कोई ज्ञान नहीं था, देखने के बाद मुझे पता चला कि भई ऐसे-ऐसे काम होता था, इतनी मेहनत लगती थी, इतने घंटों तक खड़े-खड़ेकाम करना पड़ता था। दुनिया को तो सिर्फ कलाकार दिखता है, बाकी चीजें पता नहीं होती हैं। मैं समझता हूं कि समय की मांग है और मैं मानता हूं कि ये जो हमारे देश में सब कुछ घूम-फिर करके political leader के आसपास आ जाता है ना, उसने देश का बहुत नुकसान किया है जी। आवश्‍यकता से अधिक उनको स्‍पेस मिल गई है, उनको जितनी मिलनी चाहिए, उतनी मिले, इससे मुझे इनकार नहीं है लेकिन रास्‍ता बनेगा तो उनके नाम पर, चौराहा बनेगा तो उनके नाम पर और बिल्डिंग बनेगी तो उनके नाम पर; यही चलता है जी।

मैं मानता हूं आपकी इंडस्‍ट्री में भी ऐसे लोग हैं चाहे टेक्‍नीकल साइड पर हों, क्रिएटिव साइड पर हों, कला के क्षेत्र में हो, perform करने वाले लोग हों; आप स्‍वयं में एक institution हैं और आपने अपने जीवन को इस स्थिति में रखने के लिए- कलाकार होगा, हमें अच्‍छा लगता है जब देखते हैं जितेन्‍द्र जी को कि बहुत body maintain किया है, लेकिनmaintain करने के लिए कितनी मेहनत की होगी, तब किया होगा भाई, लेकिन ये सामान्‍य मानवी को पता नहीं है।

मैं समझता हूं कि क्‍या जो संघर्ष करके अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाया है, आप संकोच मत कीजिए, आप अपने साथियों के साथ इन चीजों को शेयर करते हुए, आज जब सोशल मीडिया इतनी rich है; बताइए, आपकी जिंदगी कैसे शुरू हुई, कितनी कठिनाइयों से हुई, कितना संघर्ष किया आपने, कैसी मुसीबतों से दिन निकाला, कितने घंटे काम करते थे। कभी हिमालय की बर्फीली जगह पर जाना और शूटिंग करना है, शरीर मदद नहीं कर रहा है लेकिन करना पड़ रहा है, हंसना है तो हंसना पड़ता है; ये सारी चीजें।

वरना क्‍या होता है, हमारी नई पीढ़ी गुमराह हो रही है, उसको एक चकाचौंध दिखती है, उसके पीछे जो तपस्‍या है, जो परिश्रम है, त्‍याग है, बलिदान है; वो सब पता नहीं चलता है। मैं चाहूंगा- मैं चाहूंगा कि आप- आप कुछ न कुछ बातें ऐसी, लगातार, अब सोशल मीडिया की rich है जी, पहुंचेंगी। उनको पता चलेगा कि भई एक व्‍यक्ति ने अपने जीवन को ऐसे नहीं पहुंचाया जी और वो- उसको भी जिंदगी में कुछ करने की प्रेरणा बनेगी।

आप अपने-आपको कम मत आंकिए जी। आज एक बहुत बड़ा वर्ग है जो आपसे प्रभावित है लेकिन वो आपसे प्रेरित भी हो सकता है अगर आपके जीवन की सच्‍चाइयों से वो परिचित हो जाएगा। और आप में से कोई ऐसा नहीं होगा जिसको कठिनतम समय से गुजरना न पड़ा हो; और वही है जो दुनिया को ताकत देता है।

और इसलिए मैं आज आपसे ये भी एक चाहता हूं कि आज जब ये हमारे देश की युवा पीढ़ी आपकी तरफ देखती है तो उसे ये भी पता होना चाहिए कि ये सारी चीजें ऐसे ही नहीं आई हैं। जन्‍म से मुझे अच्‍छा चेहरा मिल गया इसलिए मैं यहां नहीं पहुंचा हूं भई, मुझे भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है। ये चीजें नए लोगों के सामने कैसे, और मेरा मानना है कि life building और character building में इस तरह के conversation से युवाओं को बहुत लाभ होगा। मैं आशा करता हूं कि आप इससे जुड़े अपने अनुभवों को युवाओं से अवश्‍य शेयर करेंगे।

इसी तरह मेरा ये भी आग्रह होगा कि जैसे ये म्‍यूजियम बना है, वैसे ही अलग-अलग कालखंडों, टाइम पीरियड में भारतीय सिनेमा की ताकत क्‍या रही है, उस पर भी काम किया जाए, उसे भी संग्रहित किया जाए। जैसे इंडियन फिल्‍म इंडस्‍ट्री के पहले 25 साल कैसे रहे होंगे? तब फिल्‍म बनाने में किस तरह का संघर्ष होता था? अब उसमें क्‍या बदलाव आया है? ये सब लेकर एक विभाग उसका बनाया जा सकता है। तो लोगों को इस प्रकार की हिस्‍ट्री के साथ जीने का अवसर मिल सकता है।

अब आज जब 21वीं सदी में फिल्‍में बनाने का तरीका, टेक्‍नोलॉजी, सब कुछ बदल दिया है तो उन पुरानी बातों के बारे में जानकारी को संजोकर रखना भी बहुत आवश्‍यक है। ऐसे ही इस बारे में भी विचार की आवश्‍यकता है कि हम ऐसा क्‍या करें जिससे आने वाली पीढ़ी में विज्ञान, इनोवेशन; इसके प्रति उसका रुझान बढ़े। आपने देखा होगा, दुनिया में साइंस को बेस बना करके फिल्‍मों का एक सिलसिला चला है। भारत में उस पर बहुत कुछ करने की आवश्‍यकता है। हमारी युवा पीढ़ी को, छोटे बच्‍चों को, ये बहुत बड़ी प्रेरणा का कारण बन सकता हैं। Scientific temper बनाने के लिए इन चीजों का बहुत बड़ा रोल होता है। आप लोग biopic तो बनाते ही हैं, अलग-अलग सेक्‍टर में लोगों कोmotivate करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि science, innovation, environment, ये ऐसे विषय हैं जिसमें हम बहुत कुछ कर सकते हैं।

साथियो, आपने देखा होगा कि हमारी सरकार ने एक बदलाव किया है, पद्म पुरस्‍कारों को ले करके। बीते चार वर्षों में हमने खोज-खोजकर देश के ऐसे अनसंग हीरो निकाले हैं जो नि:स्‍वार्थ भाव से बिना किसी पहचान के मानवता की सेवा में लगे थे। उस राज्‍य के भी किसी अखबार ने उनके लिए दो लाइन नहीं लिखी थीं। हमने खोज, पूरे देश में से खोजा और मैं लगातार ये काम करता रहता हूं, और ऐसे लोगों को हमने पद्मश्री दी है; अजूबा है जी। कोई पर्यावरण से जुड़ा हुआ काम कर रहा था तो कोई गरीबों को मुफ्त में इलाज करवा रहा था, कोई स्‍कूल चला रहा था यानी अपनी जिंदगी में जो कुछ भी छोटा सा कमाया है, उसके लिए वो खपा देता था। ऐसे लोग हैं हमारे देश में और मैं ऐसे लोगों को बहुत महान मानता हूं जी। उनको जितना सम्‍मान दें, उतना कम है। लेकिन क्‍या हमारी फिल्‍म इंडस्‍ट्री का ध्‍यान उनकी तरफ ग्‍या है क्‍या? आप देखिए, किसी की जिंदगी में नजर कीजिए, जब आप biopic बना रहे थे, इसमें भी ऐसे case study मिलेंगे जी, आप कल्‍पना नहीं कर सकते हैं, ऐसे-ऐसे लोग हमारे देश में काम कर रहे हैं और ये बहुत बड़ी प्रेरणा बन सकते हैं।

आपकी कहानियों के लिए, आपके सिनेमा के लिए दूर-सुदूर जंगल में पड़ा हुआ एक इंसान भी देश के लिए कारण बन सकता है जी। अगर दशरथ मांझी जैसी कथाएं इतनी ताकत रखती हैं जी, कितनी ताकत रखती हैं।

साथियो, एक बात है जिस पर हमारा ध्‍यान जाना चाहिए, 1857 का स्‍वातंत्रय संग्राम, हम पता नहीं history conscious society के रूप में हम थोड़े पीछे हैं लेकिन 1857 के स्‍वातंत्रय संग्राम की ओर जिसने देखा होगा- हमारे देश के आदिवासियों नेजिस प्रकार से जंग किया था, अंग्रेज सल्‍तनत के खिलाफ 1857 का स्‍वातंत्रय संग्राम का नेतृत्‍व एक प्रकार से इस देशा के आदिवासियों ने किया था और हर आदिवासी इलाके में उसकी कथाएं हैं। एक साथ 100-100, 200-200 लोगों को फांसी के तख्‍त पर चढ़ा दिया गया था और आज भी रिकॉर्ड मौजूद है। लेकिन देश के लिए त्‍याग, बलिदान करने वाले इन महानुभावों की कथाएं, जलियांवाला बाग हमें ध्‍यान है लेकिन हर जगह पर ऐसी कथाएं पड़ी हैं।

एक मिशन से सरकार एक काम कर रही है इन दिनों। मैंने तय किया है कि जिन राज्‍यों में इस प्रकार के आदिवासी समाज की घटनाएं हैं, उनका 1857 के स्‍वातंत्रय संग्राम में उनके योगदान को खोजकरके एक म्‍यूजियम बनाना। अलग-अलग राज्‍यों में इस प्रकार के म्‍यूजियम बनाने के काम चल रहे हैं। उन पुरानी घटनाओं को खोजा जा रहा है। आपके पास creative talent है, क्‍यादेश की इतनी बड़ी त्‍याग, बलिदान, सेवा करने वाले लोग, लड़ाई करने वाले लोग- सरकार जो म्‍यूजियम बना रही है, उसमें आप कुछ contribute कर सकते हैं क्‍या आपके talent का? virtual museum मानो बनाना है, आपके पास मानो महारत है, रिसर्च करने में, बाकी चीजों में सरकार आपकी मदद करेगी। और मुझे लगता है कि हम इसको कर सकते हैं animation film के जरिए या किसी virtual presentation के जरिए। हम हमारी नई पीढ़ी को इसके लिए बहुत कुछ दे सकते हैं। और देश में ये जो नक्‍सल के नाम पर जो दुनिया चलाने वाले लोग हैं, हम अगर उससे बड़ी चीज बताएंगे, देश के लिए आपके पूर्वजों ने ये दिया तो मैं नहीं मानता हूं कि आज हमारे ही देश में स्‍कूल को उड़ा देने के जो पराक्रम करने वाले लोग हैं, वो सही रास्‍ते पर नहीं आएंगे, ऐसा नहीं है- आएंगे। वे भी सही रास्‍ते पर आएंगे।

और इसी तरह एक और बात है मैं चाहूंगा कि जो थिएटर की दुनिया है, आप में से बहुत लोग हैं जिनकी जिंदगी का पूर्वाश्रम कहीं न कहीं थिएटर रहा है। देखिए, थिएटर भारत की सशक्‍त परम्‍परा रही है।शकुंतला से ले करके आज तक हमारे यहां शास्‍त्रों में उसका बहुत बड़ा स्‍थान रहा है। अब दुनिया को बताने के लिए बहुत कुछ हमारे पास है। और मैं नहीं मानता हूं हमें थिएटर और फिल्‍म को अलग करना चाहिए, उसको integrate करके उसकी हिस्‍ट्री भी, उन बातों को भी देश और दुनिया में लाने का हम काम कर सकते हैं, तो इस कला जगत की बहुत बड़ी सेवा होगी, आने वाली पीढ़ी को भी लाभ मिलेगा। और हमारे देश में अलग-अलग स्‍वरूप में, अलग-अलग भाषाओं में इसके अनेक स्‍वरूप देखने को मिलते हैं। और मैं समझता हूं कि थिएटर और फिल्‍मों को बहुत अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।

नई टेक्‍नोलॉजी के माध्‍यम से अगर इस दिशा में आप कुछ कर सकें तो थिएटर को भी एक नई ताकत मिलेगी और नए talent के लिए नया अवसर मिलेगा।

साथियो, लोकतंत्र में कोई भी सरकार अगर ये सोचे कि सारे काम वही अकेले कर सकती है तो मैं समझता हूं वो सरकार आपको भी मूर्ख बना रही है और वो भी गलत कर रही है। सरकार को सबके विकास के लिए सबका साथ भी चाहिए।

जन-भागीदारी बढ़ाने में, देश के प्रति अपने कर्तव्‍यों की याद दिलाने में, देश को जागरूक करने में भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री के योगदान की सराहना मैं करता हूं, मैं इस योगदान को नमन करता हूं और जो देश की बहुत बड़ी सेवा की है उसका आज आपके बीच आकर गौरवगान करना मेरे लिए भी एक धन्‍य पल है। इस कार्य के लिए मुझे आने का अवसर मिला, आप सबसे मिलने का अवसर मिला।

आप वो लोग हैं जिनको सलाह देने का किसी को हक नहीं है क्‍योंकि सलाह भी तो freedom के खिलाफ है, ऐसा माना जाता है। लेकिन फिर भी मैंने शायद कुछ अधिक आपसे कह दिया हो तो क्षमा कीजिएगा। लेकिन आइए, हम सब मिल करके देश के लिए और इस देश को दुनिया के लिए कुछ करने के लिए तैयार करें, ताकत के साथ आगे बढ़ें। ये क्षेत्र, मैं सामान्‍य नहीं मानता हूं, भारत की ये असामान्‍य पूंजी है, 100 साल की आपकी तपस्‍या का परिणाम है। दुनिया को भी आप पर हक है, हमारा भी जिम्‍मा है कि दुनिया को इससे परिचित कराएं, दुनिया को प्रभावित करें और दुनिया को प्रेरित करके हम भारत का झंडा गाड़ने में आगे आएं।

इसी एक अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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March 23, 2026
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From the Gulf to the Global West and from the Global South to neighbouring countries, India is a trusted partner for all: PM
What gets measured gets improved and ultimately gets transformed: PM
This is the new India, It is leaving no stone unturned for development: PM

नमस्कार!

पिछले कुछ समय में मुझे एक-दो बार टीवी9 भारतवर्ष देखने का मौका मिला है। नॉर्मली भी युद्धों और मिसाइलों पर आपका बहुत फोकस होता है और आजकल तो आपको कंटेंट की ओवरफीडिंग हो रही है। बड़े-बड़े देश टीवी9 को इतना सारा कंटेंट देने पर तुले हुए हैं, लेकिन On a Serious Note, आज विश्व जिन गंभीर परिस्थितियों से गुजर रहा है, वो अभूतपूर्व है और बेहद गंभीर है। और इन स्थितियों के बीच, आज टीवी-9 नेटवर्क ने विचारों का एक बेहद महत्वपूर्ण मंच बनाया है। आज इस समिट में आप सभी India and the world, इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं। मैं आप सबको बधाई देता हूं। इस समिट के लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूं। सभी अतिथियों का अभिनंदन करता हूं।

साथियों,

आज जब दुनिया, conflicts के कारण उलझी हुई है, जब इन conflicts के दुष्प्रभाव पूरी दुनिया पर दिख रहे हैं, तब India and the world की बात करना बहुत ही प्रासंगिक है। भारत आज वो देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। 2014 के पहले की स्थितियों को पीछे छोड़कर के आज भारत एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। अब भारत चुनौतियों को टालता नहीं है बल्कि चुनौतियों से टकराता है। आप बीते 5-6 साल में देखिए, कोरोना की महामारी के बाद चुनौतियां एक के बाद एक बढ़ती ही गई हैं। ऐसा कोई साल नहीं है, जिसने भारत की, भारतीयों की परीक्षा न ली हो। लेकिन 140 करोड़ देशवासियों के एकजुट प्रयास से भारत हर आपदा का सामना करते हुए आगे बढ़ रहा है। इस समय युद्ध की परिस्थितियों में भी भारत की नीति और रणनीति देखकर, भारत का सामर्थ्य देखकर दुनिया के अनेकों देश हैरान हैं। हमारे यहां कहावत है, सांच को आंच नहीं। 28 फरवरी से दुनिया में जो उथल-पुथल मची है, इन कठोर विपरीत परिस्थितियों में भी भारत प्रगति के, विकास के, विश्वास के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इन 23 दिनों में भारत ने अपनी Relationship Building Capacity दिखाई है, Decision Making Capacity दिखाई है और Crisis Management Capacity दिखाई है।

साथियों,

आज जब दुनिया इतने सारे खेमों में बंटी हुई है, भारत ने अभूतपूर्व और अकल्पनीय bridges बनाए हैं। Gulf से लेकर Global West तक, Global South से लेकर पड़ोसी देशों तक भारत सभी का trusted partner है। कुछ लोग पूछते हैं, हम किसके साथ हैं? तो उनको मेरा जवाब यही है कि हम भारत के साथ हैं, हम भारत के हितों के साथ हैं, शांति के साथ हैं, संवाद के साथ हैं।

साथियों,

संकट के इसी समय में जब global supply chains डगमगा रही हैं, भारत ने diversification और resilience का मॉडल पेश किया है। Energy हो, fertilizers हों या essential goods अपने नागरिकों को कम से कम परेशानी हो, इसके लिए भारत ने निरंतर प्रयास किया है और आज भी कर रहे है।

साथियों,

जब राष्ट्रनीति ही राजनीति का मुख्य आधार हो, तब देश का भविष्य सर्वोपरि होता है। लेकिन जब राजनीति में व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हो जाता है, तब लोग देश के फ्यूचर के बजाय अपने फ्यूचर के बारे में सोचते हैं। आप ज़रा याद कीजिए 2004 से 2010 के बीच क्या हुआ था? तब कांग्रेस सरकार के समय पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतों का संकट आया था और तब कांग्रेस ने देश की नहीं बल्कि अपनी सत्ता की चिंता की। उस वक्त कांग्रेस ने एक लाख अड़तालीस हज़ार करोड़ रुपए के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने खुद कहा था कि वो आने वाली पीढ़ी पर कर्ज का बोझ डाल रहे हैं। यह जानते हुए भी कि ऑयल बॉन्ड का फैसला गलत है, जो रिमोट कंट्रोल से सरकार चला रहे थे, उन लोगों ने अपनी सत्ता बचाने के लिए यह गलत निर्णय किया क्योंकि जवाबदेही उस समय नहीं होनी थी, उस बॉन्ड पर री-पेमेंट 2020 के बाद होनी थी।

साथियों,

बीते 5-6 वर्षों में हमारी सरकार ने कांग्रेस सरकार के उस पाप को धोने का काम किया है, और इस धुलाई का खर्चा कम नहीं आया है, ऐसी लाँड्री आपने देखी नहीं होगी। 1 लाख 48 हज़ार करोड़ रुपए की जगह, देश को 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक की पेमेंट करनी पड़ी क्योंकि इसमें ब्याज भी जुड़ गया था। यानी हमने करीब-करीब दोगुनी राशि चुकाने के लिए मजबूर हुए। आजकल कांग्रेस के जो नेता बयानों की मिसाइलें दाग रहे हैं, मिसाइल आई तो टीवी9 को मजा आएगा, उनकी इस विषय का जिक्र आते ही बोलती बंद हो जाती है।

साथियों,

पश्चिम एशिया में बनी परिस्थितियों पर मैंने आज लोकसभा में अपना वक्तव्य दिया है। दुनिया में जहां भी युद्ध हो रहे हैं, वो भारत की सीमा से दूर हैं। लेकिन आज की व्यवस्थाओं में कोई भी देश युद्धों से दुष्प्रभाव से दूर रहे, ऐसा संभव नहीं होता। अनेक देशों में तो स्थिति बहुत गंभीर हो चुकी है। और इन हालातों में हम देख रहे हैं कि राजनीतिक स्वार्थ से भरे कुछ लोग, कुछ दल, संकट के इस समय में भी अपने लिए राजनीतिक अवसर खोज रहे हैं। इसलिए मैं टीवी9 के मंच से फिर कहूंगा, यह समय संयम का है, संवेदनशीलता का है। हमने कोरोना महासंकट के दौरान भी देखा है, जब देशवासी एकजुट होकर संकट का सामना करते हैं, तो कितने सार्थक परिणाम आते हैं। इसी भाव के साथ हमें इस युद्ध से बनी परिस्थितियों का सामना करना है।

साथियों,

दुनिया की हर उथल-पुथल के बीच, भारत ने अपनी प्रगति की गति को भी बनाए रखा है। अगर मैं 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद, बीते 23 दिनों का ही ब्यौरा दूं, तो पूरब से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक देश में हजारों करोड़ के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स का काम हुआ है। दिल्ली मेट्रो रेल के महत्वपूर्ण कॉरिडोर्स का लोकार्पण, सिलचर का हाई स्पीड कॉरिडोर का शिलान्यास, कोटा में नए एयरपोर्ट का शिलान्यास, मदुरै एयरपोर्ट को इंटरनेशनल एयरपोर्ट का दर्जा देना, ऐसे अनेक काम बीते 23 दिनों में ही हुए हैं। बीते एक महीने के दौरान ही औद्योगिक विकास को गति देने के लिए भव्य स्कीम को मंजूरी दी गई है। इसके तहत देशभर में 100 plug-and-play industrial parks विकसित किए जाएंगे। देश में Small Hydro Power Development Scheme को भी हरी झंडी दी गई है। इससे आने वाले वर्षों में 1,500 मेगावाट नई hydro power capacity जोड़ी जाएगी। इसी दौरान जल जीवन मिशन को साल 2028 तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। किसानों के हित में भी अनेक बड़े निर्णय लिए गए हैं। बीते एक महीने में ही पीएम किसान सम्मान निधि के तहत 18 हजार करोड़ रुपए से अधिक सीधे किसानों के खातों में ट्रांसफर किए गए हैं। और जो हमारे MSMEs हैं, जो हमारे निर्यातक हैं, उनके लिए भी करीब 500 करोड़ रुपए के राहत पैकेज की भी घोषणा की गई है। यह सारे कदम इस बात का प्रमाण हैं कि विकसित भारत बनाने के लिए देश कितनी तेज गति से काम कर रहा है।

साथियों,

Management की दुनिया में एक सिद्धांत कहा जाता है - What gets measured, gets managed. लेकिन मैं इसमें एक बात और जोड़ना चाहता हूं, What gets measured, gets improved और ultimately, gets transformed. क्योंकि आकलन जागरूकता पैदा करता है। आकलन जवाबदेही तय करता है और सबसे महत्वपूर्ण आकलन संभावनाओं को जन्म देता है।

साथियों,

अगर आप 2014 से पहले के 10-11 साल और 2014 के बाद के 10-11 साल का आप आकलन करेंगे, तो यही पाएंगे कि कैसे इसी सिद्धांत पर चलते हुए, भारत ने हर सेक्टर को Transform किया है। जैसे पहले हाईवे बनते थे, करीब 11-12 किलोमीटर प्रति दिन की रफ्तार से, आज भारत करीब 30 किलोमीटर प्रतिदिन की स्पीड से हाईवे बना रहा है। पहले पोर्ट्स पर शिप का Turnaround Time, 5-6 दिन का होता था। आज वही काम, करीब-करीब 2 दिन से भी कम समय में पूरा हो रहा है। पहले Startup Culture के बारे में चर्चा ही नहीं होती थी। 2014 से पहले, हमारे देश में 400-500 स्टार्ट अप्स ही थे। आज भारत में 2 लाख से ज्यादा रजिस्ट्रर्ड स्टार्ट अप्स हैं। पहले मेडिकल education में सीटें भी सीमित थीं, करीब 50-55 हजार MBBS seats थीं, आज यह बढ़कर सवा लाख से ज्यादा हो चुकी हैं। पहले देश के Banking system से भी करोड़ों लोग बाहर थे। देश में सिर्फ 25 करोड़ के आसपास ही बैंक account थे। वहीं जनधन योजना के माध्यम से 55 करोड़ से ज्यादा बैंक अकाउंट खुले हैं। पहले हमारे देश में airports की संख्या भी 70 से कम थी। आज एयरपोर्ट्स की संख्या भी बढ़कर 160 से ज्यादा हो चुकी है।

साथियों,

पहले भी योजनाएं तो बनती थीं, लेकिन आज फर्क है, आज परिणाम दिखते हैं। पहले गति धीमी थी, आज भारत fastrack पर है। पहले संभावनाएं भी अंधकार में थीं, आज संकल्प सिद्धियों में बदल रहे हैं। इसलिए दुनिया को भी यह संदेश मिल रहा है कि यह नया भारत है। यह अपने विकास के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है।

साथियों,

आज हमारा प्रयास है कि अतीत में विकास का जो असंतुलन पैदा हो गया था, उसको अवसरों में बदला जाए। अब जैसे हमारा पूर्वी भारत है। हमारा पूर्वी भारत संसाधनों से समृद्ध है, दशकों तक वहां जिन्होंने सरकारें चलाई हैं, उनकी उपेक्षा ने पूर्वी भारत के विकास पर ब्रेक लगा दी थी। अब हालात बदल रहे हैं। जिस असम में कभी गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, आज वहां सेमीकंडक्टर यूनिट बन रही है। ओडिशा में सेमीकंडक्टर से लेकर पेट्रोकेमिकल्स तक अनेक नए-नए सेक्टर का विकास हो रहा है। जिस बिहार में 6-7 दशक में गंगा जी पर एक बड़ा पुल बन पाया था एक, उस बिहार में पिछले एक दशक में 5 से ज्यादा नए पुल बनाए गए हैं। यूपी में कभी कट्टा मैन्युफैक्चरिंग की कहानियां कही जाती थीं, आज यूपी, मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग में दुनिया में अपनी पहचान बना रहा है।

साथियों,

पूर्वी भारत का एक और बड़ा राज्य पश्चिम बंगाल है। पश्चिम बंगाल, एक समय में भारत के कल्चर, एजुकेशन, इंडस्ट्री और ट्रेड का हब होता था। बीते 11 वर्षों में केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल के विकास के लिए बड़ी मात्रा में निवेश किया है। लेकिन दुर्भाग्य से, आज वहां एक ऐसी निर्मम सरकार है, जो विकास पर ब्रेक लगाकर बैठी है। TV9 बांग्ला के जो दर्शक हैं, वो जानते हैं कि बंगाल में आयुष्मान योजना पर निर्मम सरकार ने ब्रेक लगाया हुआ है। पीएम सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना पर ब्रेक लगाया हुआ है। पीएम आवास योजना पर ब्रेक लगाया हुआ है। चाय बागान श्रमिकों के लिए शुरू हुई योजना के लिए ब्रेक लगाया हुआ है। यानी विकास और जनकल्याण से ज्यादा प्राथमिकता निर्मम सरकार अपने राजनीतिक स्वार्थ को दे रही है।

साथियों,

देश में इस तरह की राजनीति की शुरुआत जिस दल ने की है, वो अपने गुनाहों से बच नहीं सकती और वो पार्टी है - कांग्रेस। कांग्रेस पार्टी की राजनीति का एक ही लक्ष्य रहा है, किसी भी तरह विकास का विरोध और कांग्रेस यह तब से कर रही है, जब मैं गुजरात में था। गुजरात में वर्षों तक जनता ने हमें आशीर्वाद दिया, तो कांग्रेस ने उस जनादेश को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने गुजरात की छवि पर सवाल उठाए, उसकी प्रगति को कटघरे में खड़ा किया और जब यही विश्वास पूरे देश में दिखाई दिया, तो कांग्रेस का विरोध भी रीजनल से नेशनल हो गया।

साथियों,

जब राजनीति में विरोध, विकास के विरोध में बदल जाए, जब आलोचना देश की उपलब्धियों पर सवाल उठाने लगे, तब यह सिर्फ सरकार का विरोध नहीं रह जाता, यह देश की प्रगति से असहज होने की मानसिकता बन जाती है। आज कांग्रेस इसी मानसिकता की गुलाम बन चुकी है। आज स्थिति यह है कि देश की हर सफलता पर प्रश्न उठाया जाता है, हर उपलब्धि में कमी खोजी जाती है और हर प्रयास के असफल होने की कामना की जाती है। कोविड के समय, देश ने अपनी वैक्सीन बनाई, तो कांग्रेस ने उस पर भी संदेह जताया। Make in India की बात हुई, तो कहा गया कि यह सफल नहीं होगा, बब्बर शेर कहकर इसका मजाक उड़ाया गया। जब देश में डिजिटल इंडिया अभियान शुरू हुआ, तो उसका मजाक उड़ाया गया। लेकिन हर बार यह कांग्रेस का दुर्भाग्य और देश का सौभाग्य रहा कि भारत ने हर चुनौती को सफलता में बदला। आज भारत दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीनेशन ड्राइव का उदाहरण है। भारत डिजिटल पेमेंट्स में दुनिया का अग्रणी देश है। भारत मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप्स में नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

साथियों,

लोकतंत्र में विरोध जरूरी होता है। लेकिन विरोध और विद्वेष के बीच एक रेखा होती है। सरकार का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन देश को बदनाम करना, यह कांग्रेस की नीयत पर सवाल खड़ा करता है। जब विरोध इस स्तर तक पहुंच जाए कि देश की उपलब्धियां भी असहज करने लगें, तो यह राजनीति नहीं, यह दृष्टिकोण की समस्या है। अभी हमने ग्लोबल AI समिट में भी देखा है। जब पूरी दुनिया भारत में जुटी हुई थी, तो कांग्रेस के लोग कपड़े फाड़ने वहां पहुंच गए थे। इन लोगों को देश की इज्जत की कितनी परवाह है, यह इसी से पता चलता है। इसलिए आज आवश्यकता है कि देशहित को, दलहित से ऊपर रखा जाए क्योंकि अंत में राजनीति से ऊपर, राष्ट्र होता है, राष्ट्र का विकास होता है।

साथियों,

आज का यह दिन भी हमें यही प्रेरणा देता है। आज के ही दिन शहीद भगत सिंह, शहीद राजगुरु और शहीद सुखदेव ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। आज ही, समाजवादी आंदोलन के प्रखर आदर्श डॉ. राम मनोहर लोहिया जी की जयंती भी है। यह वो प्रेरणाएं हैं, जिन्होंने देश को हमेशा स्व से ऊपर रखा है। देशहित को सबसे ऊपर रखने की यही प्रेरणा, भारत को विकसित भारत बनाएगी। यही प्रेरणा भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी। मुझे पूरा विश्वास है कि टीवी9 की यह समिट भी भारत के आत्मविश्वास और दुनिया के भरोसे पर, भारतीयों पर जो भरोसा है, उस भरोसे को और सशक्त करेगी। आप सभी को मेरी तरफ से बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं और आपके बीच आने का अवसर दिया, आप सबसे मिलने का मौका लिया, इसलिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

नमस्‍कार!