समर्पित जीवन

Published By : Admin | May 23, 2014 | 15:09 IST

अधिकांश किशोर 17 वर्ष की आयु में अपने भविष्य के बारे में और बचपन के इस आखिरी पड़ाव का आनंद लेने के बारे में सोचते हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए यह अवस्था पूर्णत: अलग थी। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया, जिसने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने घर छोड़ने और देश भर में भ्रमण करने का निर्णय कर लिया। उनका परिवार नरेन्द्र के इस निर्णय पर चकित था, लेकिन उन्होंने नरेन्द्र के छोटे शहर का सीमित जीवन छोड़ने की इच्छा को अंतत: स्वीकार कर लिया। जब घर त्यागने का वह दिन आ गया, उस दिन उनकी माँ ने उनके लिए विशेष अवसरों पर बनाया जाने वाला मिष्ठान बनाया और उनके मस्तक पर परम्परागत तिलक किया। जिन स्थानों की उन्होंने यात्राएँ की उसमें हिमालय (जहाँ वे गुरूदाचट्टी में ठहरे), पश्चिम बंगाल में रामकृष्ण आश्रम और यहाँ तक कि पूर्वोत्तर भी शामिल है। इन यात्राओं ने इस नौजवान के ऊपर अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने भारत के विशाल भू-भाग में यात्राएँ कीं और देश के विभिन्न भागों की विभिन्न संस्कृतियों को अनुभव किया। यह उनके लिए आध्यात्मिक जागृति का भी एक समय था, जिसने नरेन्द्र मोदी को उस व्यक्ति से अधिक गहराई से जुड़ने का अवसर दिया, जिसके वे सदैव से प्रशंसक रहे हैं – स्वामी विवेकानंद।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

The Activist नरेन्द्र मोदी दो वर्ष के बाद वापस लौट आये लेकिन घर पर केवल दो सप्ताह ही रुके। इस बार उनका लक्ष्य निर्धारित था और उद्देश्य स्पष्ट था – वह अहमदाबाद जा रहे थे। वोराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ कार्य करने का मन बना चुके थे। 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन है, जो भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कार्य करता है। आर.एस.एस. से उनका पहला परिचय आठ वर्ष की बेहद कम आयु में हुआ, जब वह अपनी चाय की दुकान पर दिन भर काम करने के बाद आर.एस.एस. के युवाओं की स्थानीय बैठक में भाग लिया करते थे। इन बैठकों में भाग लेने का प्रयोजन राजनीति से परे था। वे यहाँ अपने जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाले लक्ष्मणराव इनामदार, जिनको ‘वकील साहेब’ के नाम से भी जाना जाता था, से मिले थे।

अहमदाबाद और उसके आगे की राह

अपनी इस पृष्ठभूमि के साथ, लगभग 20 वर्षीय नरेन्द्र गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद पहुँच गए। वह आरएसएस के नियमित सदस्य बन गए और उनके समर्पण और संगठन कौशल ने वकील साहब और अन्य लोगों को प्रभावित किया। 1972 में वह प्रचारक बन गए और पूरा समय आरएसएस को देने लगे। वह अन्य प्रचारकों के साथ अपना आवास साझा करते थे और एक कठोर दैनिक दिनचर्या का पालन करते थे। दिन की शुरुआत प्रातः काल 5 बजे होती थी जो देर रात तक चलती थी। इस तरह के एक व्यस्त दिनचर्या के बीच नरेन्द्र ने राजनीति विज्ञान में अपनी डिग्री पूर्ण की। उन्होंने शिक्षा और अध्ययन को सदैव महत्वपूर्ण माना।

The Activist एक प्रचारक के तौर पर उन्हें गुजरात भर में घूमना पड़ता था। वर्ष 1972 और 1973 के मध्य वे नादियाड के संतराम मंदिर में रुके, जो कि खेड़ा जिले का भाग है। 1973 में नरेन्द्र मोदी को सिद्धपुर में एक विशाल सम्मलेन आयोजित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया, जहाँ वह संघ के शीर्ष नेताओं से मिले। नरेन्द्र मोदी जब एक कार्यकर्ता के तौर पर अपने आप को स्थापित कर रहे थे उस समय गुजरात सहित देश भर में बेहद अस्थिर माहौल था। जब वह अहमदाबाद पहुंचे, शहर साम्प्रदायिक दंगों की भयानक विभीषिका से जूझ रहा था। देश के अन्य भागों में भी, कांग्रेस पार्टी को 1967 के लोकसभा चुनावों में शिकस्त मिली थी। कांग्रेस पार्टी उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी और अन्य असंतुष्ट गुट में बंट गई थी, इस गुट के नेताओं में गुजरात के मोरारजी देसाई भी थे। ‘गरीबी हटाओ’ के प्रचार की लहर पर सवार श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनावों में लोकसभा की 518 में से 352 सीटें जीतकर बड़ी वापसी की थी।

The Activist गुजरात राज्य के चुनावों में भी श्रीमती इंदिरा गांधी ने केंद्र की सफलता को दोहराया और 50 प्रतिशत से अधिक मतों के साथ 182 में से 140 सीटें प्राप्त कीं। हालाँकि कांग्रेस और श्रीमती गांधी का यह उल्लासोन्माद जिस तेजी के साथ निर्मित हुआ था, उतनी ही तेजी से फीका पड़ा। त्वरित सुधार और प्रगति का सपना गुजरात में कारगर साबित नहीं हुआ और यहाँ के आम आदमी के बीच कांग्रेस से मोहभंग निर्मित होने लगा। इन्दुलाल याज्ञिक, जीवराज मेहता और बलवंत राय मेहता जैसे राजनीतिक दिग्गजों का संघर्ष और बलिदान लालच की राजनीति की भेंट चढ़ गया।

The Activist 1960 की समाप्ति और 1970 के शुरुआत में कांग्रेस सरकारों ने भ्रष्टाचार और कुशासन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। ‘गरीबी हटाओ’ का दिव्य नारा धीरे-धीरे ‘गरीब हटाओ’ में बदल गया। गरीब की हालत बदतर होती चली गई। गंभीर अकाल और भारी कीमत वृद्धि ने गुजरात को दुर्दशा की पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। आवश्यक वस्तुओं के लिए अंतहीन कतारें एक सामान्य सा दृश्य बन गया था। आम आदमी के लिए कोई राहत नहीं थी।

नवनिर्माण आन्दोलन : युवा शक्ति

जनता का असंतोष सार्वजानिक आक्रोश में बदल गया जब दिसम्बर 1973 में मोरबी (गुजरात) इंजीनियरिंग कॉलेज के कुछ छात्रों ने उनके खाने के बिलों में बेतहाशा वृद्धि का विरोध किया। इस तरह का प्रदर्शन गुजरात के अन्य राज्यों में भी हुआ। इन प्रदर्शनों को व्यापक समर्थन मिलने लगा और सरकार के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन खड़ा हुआ, जिसे नवनिर्माण आन्दोलन के नाम से जाना जाता है।

The Activist नरेन्द्र मोदी ने एक व्यापक जन आन्दोलन तैयार किया, जिसे समाज के सभी वर्गों का समर्थन हासिल हुआ। इस आन्दोलन को उस समय और ताकत मिली जब एक सम्मानित सार्वजानिक हस्ती और भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद करने वाले जयप्रकाश नारायण ने इस आन्दोलन को अपना समर्थन दिया। जब जयप्रकाश नारायण अहमदाबाद आये तब नरेन्द्र मोदी को उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अन्य अनुभवी नेताओं द्वारा आयोजित कई वार्ताओं ने नौजवान नरेन्द्र पर एक मजबूत छाप छोड़ी आख़िरकार छात्र शक्ति की जीत हुई और कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। तथापि यह हर्ष अधिक समय तक नहीं रहा। अधिनायकवाद के काले बादलों ने 25 जून 1975 की आधी रात को देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश के ऊपर आपातकाल थोप दिया।

आपातकाल के काले दिन

श्रीमती गांधी को भय था कि न्यायालय द्वारा उनके चुनाव को निरस्त करने के बाद उन्हें अपना शीर्ष पद गंवाना पड़ सकता है। उन्हें लगा कि इन हालात में आपातकाल ही श्रेष्ठ विकल्प है। लोकतंत्र सलाखों के पहरे में चला गया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई और विपक्ष के मुखर स्वर श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी, श्री जॉर्ज फर्नांडीज़ से लेकर श्री मोरारजी देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया।

The Activist नरेन्द्र मोदी आपातकाल विरोधी आंदोलन के मूल में थे। वे उस तानाशाह अत्याचार का विरोध करने के लिए गठित की गई गुजरात लोक संघर्ष समिति (जीएलएसएस)के एक सदस्य थे। कालांतर में वे इस समिति के महासचिव बन गए, जिसके तौर पर उनकी प्राथमिक भूमिका राज्य भर में कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की थी। कांग्रेस विरोधी नेताओं और कार्यकर्ताओं के ऊपर की जा रही सख्त निगरानी के चलते यह बेहद मुश्किल काम था। आपातकाल के दौरान नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए काम के बारे में कई कहानियाँ हैं। उनमें से एक यह है कि वह एक स्कूटर पर सवार होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को एक सुरक्षित घर में ले गए थे। इसी प्रकार, एक बार यह बात सामने आई कि गिरफ्तार किए गए नेताओं में से एक गिरफ्तारी के समय अपने साथ कई महत्वपूर्ण कागजात ले जा रहे थे। वे कागजात किसी भी कीमत पर पुनः प्राप्त किए जाने थे। यह ज़िम्मेदारी नरेन्द्र मोदी को सौंपी गई कि वे किसी भी तरह उन कागजात को पुलिस थाने में पुलिस की हिरासत में बैठे उस नेता से लेकर आएं और वह भी पुलिस बल के सामने। जब नानाजी देशमुख को गिरफ्तार कर लिया गया था, तब उनके पास एक पु‍स्तक थी जिसमें उनसे सहानुभूति रखने वालों के पते लिखे हुए थे।नरेन्द्र मोदी ने उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का प्रबंध कर दिया कि उनमें से किसी को भी आततायी सरकार के पुलिस बल गिरफ्तार नहीं कर पाए।

नरेन्द्र मोदी की अन्य जिम्मेदारियों में से एक गुजरात में आने व वहां से जाने वाले आपातकाल विरोधी कार्यकर्ताओं के लिए यात्रा की व्यवस्था बनाना भी था। कभी-कभी अपने काम के चलते उन्हें कई तरह के भेष बदल कर जाना होता था ताकि वे पहचाने न जाएं – एक दिन वे एक सिख सज्जन के रूप में होते थे, तो अगले दिन एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग आदमी के रूप में।

The Activist आपातकाल के दिनों में नरेन्द्र मोदी के सबसे मूल्यवान अनुभवों में से एक यह था कि उस दौरान उन्हें विभिन्न दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ काम करने का अवसर मिला। नरेन्द्र मोदी ने जून 2013 को अपने ब्लॉग पर लिखा है:

मुझ जैसे युवाओं को आपातकाल ने एक ही लक्ष्य के लिए लड़ रहे अनेक नेताओं और संगठनों के एक व्यापक एवं आश्चर्यजनक समूह के साथ काम करने का एक अदभुत अवसर दिया। इसने हमें उन संस्थाओं से परे काम करने में सक्षम बनाया, जिनसे हम प्रारंभ से जुड़े थे। हमारे परिवार के दिग्गजों जैसे अटल जी, आडवाणी जी, स्वर्गीय श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी, स्वर्गीय श्री नानाजी देशमुख से लेकर श्री जॉर्ज फर्नांडीस जैसे समाजवादियों तथा श्री रवीन्द्र वर्मा जैसे कांग्रेसियों तक जो मोरारजी भाई देसाई के साथ मिलकर काम कर रहे थे व आपात स्थिति से दुखी थे, विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े नेताओं ने हमें प्रेरित किया। मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने गुजरात विद्यापीठ के पूर्व उपकुलपति श्री धीरूभाई देसाई,मानवतावादी श्री सी टी दारू व गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्रियों श्री बाबूभाई जशभाई पटेल और श्री चिमनभाई पटेल तथा प्रमुख मुस्लिम नेता स्वर्गीय श्री हबीब उर रहमान जैसे लोगों से बहुत कुछ सीखा है। इस बारे में कांग्रेस की निरंकुशता का विरोध करने वाले और यहां तक कि पार्टी छोड़ने वाले स्वर्गीय श्री मोरारजी भाई देसाई का संघर्ष और दृढ़ संकल्प मन में आता है।

ऐसा लग रहा था जैसे विभिन्न विचारों और विचारधाराओं का एक जीवंत संगम एक बड़े और नेक उद्देश्य के लिए आकार ले चुका था। हम सब अपने सांझा उद्देश्य यानि देश के लोकतांत्रिक लोकाचार को बनाए रखने के लिए जाति, धर्म, समुदाय या धर्म के मतभेदों से ऊपर उठ कर एक साथ काम कर रहे थे। हमने दिसंबर 1975 मेंगांधीनगर में सभी विपक्षी सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक के लिए तैयारी की। इस बैठक में स्वर्गीय श्री पुरुषोत्तम मावलंकर, श्री उमाशंकर जोशी और श्री कृष्णकांत जैसे निर्दलीय सांसदों ने भी भाग लिया। राजनीति के दायरे के बाहर नरेन्द्र मोदी को सामाजिक संगठनों और कई गांधीवादियों के साथ काम करने का अवसर मिला है। वे जार्ज फर्नांडीस (जिन्हें वह ‘जॉर्ज साहब’ के नाम से पुकारते हैं) और नानाजी देशमुख दोनों के साथ हुई बैठक को अक्‍सर याद करते हैं। उन स्याह दिनों के दौरान वह अपने अनुभवों के बारे में लिखते रहते थे, जिसे बाद में ‘आपातकाल में गुजरात’ नाम की एक पुस्तक के रूप में छापा भी गया।

आपातकाल से परे नवनिर्माण आंदोलन की ही तरह, आपातकाल की समाप्ति लोगों की जीत के रूप में हुई। 1977 के संसदीय चुनावों में श्रीमती इंदिरा गांधी बुरी तरह पराजित हुईं। जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया और नई जनता पार्टी की सरकार में अटल जी और आडवाणी जी जैसे जनसंघ नेताओं को महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री बनाया गया। लगभग उसी समय, नरेन्द्र मोदी को पूर्ववर्ती वर्षों के दौरान उनकी सक्रियता और अच्छे संगठनात्मक काम की सराहना के तौर पर ‘संभाग प्रचारक’ (एक क्षेत्रीय आयोजक के बराबर का पद) बनाया गया था। उन्हें दक्षिण और मध्य गुजरात का प्रभार दिया गया था। उसी समय उन्हें दिल्ली बुलाया गया था और आपातकालीन अवधि के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुभवों को आधिकारिक तौर पर प्रस्तुत करने का दायित्व दिया गया। इस जिम्मेदारी का अर्थ काम का अधिक बोझ तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दोनों कर्तव्यों के मध्य संतुलन स्थापित करना था, जिसे नरेन्द्र मोदी ने आसानी और दक्षता के साथ निभाया।

The Activist

गुजरात में उनकी यात्राएं जारी रहीं तथा 1980 के दशक के प्रारंभ में काफी बढ़ गईं। इस दौरान उन्हें राज्य के हर तालुके तथा लगभग हर गांव का दौरा करने का अवसर मिला। यह अनुभव एक आयोजक तथा एक मुख्यमंत्री, दोनों के रूप में उनके लिए बहुत काम आया। इस दौरान वे लोगों की समस्याओं से सीधे रूबरू हुए तथा उन्हें हल करने के लिए कठिन काम करने के उनके संकल्प में वृद्धि हुई। सूखा, बाढ़ या दंगों के दौरान वे अनेक बार राहत कार्यों का नेतृत्व भी करते थे।

नरेन्द्र मोदी खुशी से अपने काम में डूबे थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नवगठित भाजपा में उनके वरिष्ठ उन्हें और अधिक ज़िम्मेदारी सौंपना चाहते थे, और इस प्रकार 1987 में एक और अध्याय नरेन्द्र मोदी के जीवन में शुरू हुआ। उसके बाद से वे जितना समय सड़कों पर काम करते थे उतना ही समय वे पार्टी की रणनीतियां तैयार करने में व्यतीत करते थे। उन्हें पार्टी के नेताओं के साथ काम करना होता था व कार्यकर्ताओं के साथ बैठना होता था। राष्ट्र की सेवा के लिए अपना घर छोड़ देने वाला वह वड़नगर का बालक एक और लंबी छलांग लगाने ही वाला था, हालांकि उसके अपने लिए यह अपने देशवासियों और महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए चल रही अपनी यात्रा की निरंतरता में महज एक छोटा सा मोड़ था। कैलाश मानसरोवर की एक यात्रा के बाद नरेन्द्र मोदी ने गुजरात भाजपा में महासचिव के रूप में काम करना प्रारंभ कर दिया।

 

डिस्कलेमर :

यह उन कहानियों या खबरों को इकट्ठा करने के प्रयास का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव पर उपाख्यान / राय / विश्लेषण का वर्णन करती हैं।

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परंपरागत ढर्रे से आगे बढ़कर काम करने वाले नेता हैं नरेन्द्र मोदी
February 28, 2026

शायद यह आदत थी, या फिर वह हल्की सी घबराहट जो 140 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री को कुछ देते समय होती है और मन में यही उम्मीद रहती है कि सब ठीक चले। मैंने अपने नोटपैड के कोने पर जल्दी से एक लाइन लिखी, यह देख लिया कि पेन ठीक चल रहा है, और फिर उसे उन्हें दे दिया।

उन्होंने पेन की ओर देखे बिना उसे ले लिया। वह मेरी तरफ देख रहे थे।

नरेन्द्र मोदी को करीब से देखकर मैंने सबसे पहले यही बात नोट की। उनकी आंखों का संपर्क। स्थिर, बिना जल्दबाजी का, ऐसा कि लगे यह मुलाकात तय समय की औपचारिकता नहीं है। उन्होंने खड़े होकर मेरा स्वागत किया, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी, और जब उन्होंने हाथ मिलाया तो पकड़ मजबूत थी और आम तौर पर जितनी देर होती है उससे एक पल ज्यादा रही। सब कुछ सुनियोजित सा लगा, जैसे वह चाहते हों कि आपको महसूस हो कि वह सच में गंभीर हैं।

उन्होंने इंतजार के लिए माफी मांगी। किंग डेविड होटल के उनके सुइट के बाहर इजरायली सुरक्षा टीम ने मेरी जितनी जांच की, उसका ब्योरा देना भी मुश्किल है। एक वक्त तो मुझे सच में लगा कि खुद उनका निजी निमंत्रण होने के बावजूद मुझे अंदर जाने से रोक दिया जाएगा, जो एक दिलचस्प कॉलम तो बनाता, लेकिन दोपहर को काफी निराशाजनक बना देता।

मोदी को देरी की जानकारी मिल चुकी थी और उन्होंने सबसे पहले माफी मांगी। मैंने उनसे कहा कि दिक्कत उनकी टीम की नहीं, इजरायली पक्ष की वजह से हुई थी। वह मुस्कुराए और कमरे का माहौल थोड़ा हल्का हो गया।

इसके बाद उन्होंने हमारे द्वारा उनके दौरे के लिए प्रकाशित विशेष फ्रंट पेज उठाया, उसे कुछ पल देखा और खड़े खड़े, बिना बैठे और बिना किसी औपचारिकता के, हिंदी में दो लाइनें लिखीं: “मानवता सर्वोपरि रहेगी। लोकतंत्र अमर रहेगा।”

उन्होंने अपने नाम से साइन किया और 26 फरवरी, 2026 की तारीख लिखी। इस पूरे काम में शायद 45 सेकंड लगे। उन्होंने दोनों हाथों से पेज वापस कर दिया।

इस जॉब में रहते हुए मैंने बहुत से लोगों का इंटरव्यू लिया है। पॉलिटिशियन, प्रेसिडेंट, धार्मिक नेता, सेलिब्रिटी। एक तरह के पब्लिक फ़िगर होते हैं जिन्हें इतने सालों तक देखा गया है कि वे जो कुछ भी करते हैं वह एक तरह का परफ़ॉर्मेंस बन जाता है। हाथ मिलाना, रुकना, प्रैक्टिस की हुई ईमानदारी। मोदी वैसे नहीं थे। वह उस सुइट में जो कुछ भी कर रहे थे, वह बस वहीं थे, पूरी तरह से, एक ऐसे तरीके से जो सुनने में जितना मुश्किल लगता है, उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है।

दुभाषिए के जरिए भी उनकी सोच की लय साफ सुनाई देती थी। पूरे और स्पष्ट विचार। ऐसे ठहराव जो समय निकालने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए हों क्योंकि वह सच में आपकी बात पर विचार कर रहे हों।हैं।
एक बार, मैंने उनसे कहा कि उनका क्नेसेट भाषण, जो एक दिन पहले दिया गया था, इज़राइल की पार्लियामेंट में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला भाषण ऐतिहासिक लगा। उन्होंने इसे बिना किसी घुमाव या बढ़ा-चढ़ाकर बताए, आसानी से लिया, और फिर कुछ ऐसा कहा जो मेरे दिमाग में रह गया: “हमारे देश और धर्म लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा मिलते-जुलते हैं।”

उन्होंने पिछला दिन ठीक यही बात कही थी। डिप्लोमैटिक शिष्टाचार के तौर पर नहीं। एक फिलॉसॉफिकल तर्क के तौर पर।

ज्यादातर नेता जब यरूशलम आते हैं तो सुरक्षा, व्यापार और तकनीक की बात करते हैं। मोदी ने भी यह सब कहा, लेकिन इसके बाद वह बिल्कुल अलग दिशा में चले गए। उन्होंने ऐसा भाषण दिया जिसे मैं सभ्यताओं से जुड़ा भाषण कहूंगा, जिसमें उन्होंने एक सच में दिलचस्प सवाल उठाया: जब दुनिया की दो सबसे प्राचीन जीवित संस्कृतियां एक दूसरे को ध्यान से देखती हैं और कुछ अपना सा पहचानती हैं, तो क्या होता है?

‘टिक्कुन ओलाम’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’

उनका जवाब एक ऐसी तुलना पर आधारित था जो सुनने में सरल लगती है, लेकिन गहराई से सोचें तो काफी अर्थ रखती है। उन्होंने टिक्कुन ओलाम, यानी दुनिया को सुधारने और बेहतर बनाने की यहूदी अवधारणा, को वसुधैव कुटुंबकम के साथ रखा, जो प्राचीन संस्कृत का यह संदेश है कि पूरा विश्व एक परिवार है। उन्होंने हलाखा, यानी यहूदी कानून जो रोजमर्रा के नैतिक आचरण का जीवंत ढांचा है, की तुलना धर्म से की, जो हिंदू परंपरा में नैतिक व्यवस्था और व्यक्तिगत कर्तव्य का सिद्धांत है।

वह जिस बात की ओर इशारा कर रहे थे, वह यह थी कि दोनों सभ्यताओं ने एक ही समस्या का समाधान हैरान करने वाली समानता के साथ किया। सवाल यह है कि ऐसा समाज कैसे बनाया जाए जहां नैतिकता सिर्फ किसी पवित्र दिन दिया जाने वाला उपदेश न हो, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के ताने बाने में शामिल एक व्यवहार हो? यहूदी और हिंदू दोनों परंपराओं ने इसका जवाब दिया: कानून के जरिए, कर्तव्य के जरिए और दिन भर में लिए जाने वाले हजारों छोटे छोटे फैसलों के जरिए।

यह कोई ऐसा संयोग नहीं है जो कूटनीतिक शिखर बैठकों में अचानक सामने आ जाए। यह सदियों पुरानी एक गहरी संरचनात्मक समानता है।

हस्सिदिक विचारधारा के पाठक के लिए यह बात खास असर डालती है। हस्सिदिज्म, जिसे हस्सिदुत यानी हस्सिदिक शिक्षाएं और दर्शन भी कहा जाता है, इसे अवोदाह कहता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है काम, यानी भीतर की आध्यात्मिक भावना जो व्यवहारिक कर्मों के जरिए व्यक्त होती है।

18वीं सदी में हस्सिदुत के संस्थापक बाल शेम टोव ने सिखाया कि ईश्वरीय तत्व दुनिया से दूर हटने में नहीं, बल्कि उसके साथ पूरी तरह जुड़ने में मिलता है, बाजार में, भोजन की मेज पर और आपके सामने खड़े व्यक्ति के साथ आपके व्यवहार में। मोदी ने वही शब्द नहीं इस्तेमाल किए, लेकिन वह उसी परंपरा का सम्मान कर रहे थे और यह बता रहे थे कि भारत ने भी अपनी सभ्यता की नींव इसी आधार पर रखी।
उन्होंने हनुक्का और दिवाली को जोड़ा, जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का हिंदू पर्व है, और यह तुलना सिर्फ काव्यात्मक नहीं है।

दोनों पर्व अंधेरे के सामने निष्क्रिय रहने की सोच को ठुकराते हैं। हनुक्का की कथा में रब्बियों ने एक खास फैसला लिया: धार्मिक आदेश यह नहीं है कि एक बड़ा अलाव जलाया जाए, बल्कि हर रात एक छोटी मोमबत्ती जोड़ी जाए, धीरे धीरे, खुले तौर पर और लगातार। यह इतिहास में सक्रिय भूमिका निभाने की एक सोच है। अंधेरा एक ही बार में खत्म नहीं होता, उसे रोशनी के छोटे छोटे और लगातार किए गए प्रयासों से पीछे धकेला जाता है।

दिवाली भी यही संदेश देती है, करोड़ों घरों में जलते दीयों की कतारें, जहां हर छोटा सा दीपक एक अलग प्रयास है जो मिलकर बड़ी रोशनी बनाता है।

उन्होंने पुरीम की तुलना होली से की, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का हिंदू वसंत पर्व है, और यहां भी यह बौद्धिक जुड़ाव और गहरा है। दोनों त्योहार उस अनुभव पर आधारित हैं जब छिपी हुई सच्चाई अचानक सामने आ जाती है।

पुरीम की कहानी में एस्तेर की पुस्तक में ईश्वर का नाम कहीं नहीं आता। चमत्कार सामान्य महल की राजनीति और इंसानी फैसलों के भीतर छिपा रहता है। हस्सिदिक विचारधारा इसे सबसे गहरी सच्चाई के रूप में देखती है कि ईश्वरीय मार्गदर्शन, यानी हशगाचा प्रतित, जो व्यक्ति के जीवन की बारीकियों में काम करता है, बाहर से अक्सर संयोग या इतिहास जैसा दिखता है। पैटर्न तभी दिखता है जब आप उसे देखने के लिए तैयार हों।

मोदी ने भारत और इजराइल के बीच प्राचीन संबंधों पर जोर दिया। उन्होंने पुराने व्यापार मार्गों, साझा धार्मिक ग्रंथों और फारसी रानी एस्तेर का जिक्र किया, जिनके हिब्रू नाम का मतलब “छिपा हुआ” से जुड़ता है। उनका कहना था कि कुछ रिश्ते इतिहास में बहुत पहले से लिखे होते हैं, कूटनीतिक समझौते तो बाद में होते हैं।

उन्होंने आतंकवाद पर बिना लाग-लपेट के साफ बात की। उन्होंने 7 अक्टूबर के नरसंहार को मुंबई हमलों से जोड़ा, जो भारत का अपना घाव है और आज भी महसूस होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी कारण से निर्दोष लोगों की हत्या सही नहीं ठहराई जा सकती। उन्होंने कहा कि कहीं भी आतंकवाद होगा तो वह हर जगह शांति के लिए खतरा है। उन्होंने यह बात ऐसे कही जैसे कोई लंबे समय से जिस सच को मानता आया हो, उसे दोहराने की जरूरत ही न हो।

फिर उन्होंने ऐसा काम किया जिसने औपचारिक घोषणाओं से ज्यादा लोगों को भावुक कर दिया। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल में मौजूद भारतीय कामगारों और देखभाल करने वालों का खास जिक्र किया। वे लोग जो डटे रहे। जिन्होंने मदद की। जो भागे नहीं। उन्होंने तलमूद की यह बात दोहराई: जो एक जान बचाता है, वह पूरी दुनिया बचाता है।

हसीदुत की नजर से देखें तो यह भाषण का सबसे अहम पल था। इस परंपरा में उस छोटे से दिखने वाले काम को बहुत महत्व दिया जाता है, जिसका असर बहुत बड़ा होता है। सामान्य से काम में छिपी पवित्र चिंगारी, जिसे सही इरादे से किया गया कर्म ऊंचा उठा देता है।

उन्होंने युद्ध क्षेत्र में काम कर रहे विदेशी कामगारों को दो देशों के रिश्ते का नैतिक केंद्र बना दिया। यह सिर्फ भाषण नहीं था। यह सोच का वह तरीका था, जो जानता है कि असली मायने कहां तलाशने हैं।

उन्होंने एक और बात कही, जिसे इजराइल के दोस्त हमेशा खुलकर नहीं कहते। उन्होंने क्नेसेट से कहा कि यहूदी समुदाय सदियों तक भारत में बिना उत्पीड़न, बिना डर और अपनी उजागर पहचान के साथ रहे। उन्होंने अपना धर्म भी बचाए रखा और समाज में पूरी तरह भागीदारी भी की। उन्होंने इसे भारत के लिए गर्व की बात बताया।

उन्होंने इसे गर्व कहकर सही कहा। और 2026 में यरूशलम में यह बात कहना भी सही था, जब दुनिया में यह सवाल पहले से ज्यादा गंभीर हो गया है कि यहूदी जीवन आखिर कहां खुले तौर पर और सुरक्षित तरीके से जिया जा सकता है।

सुइट में लौटने पर बातचीत गर्मजोशी भरी रही। उनमें यह खासियत है कि औपचारिक मुलाकात भी असली बातचीत जैसी लगने लगती है। जब मैंने उनसे कहा कि क्नेसेट में दिया गया भाषण ऐतिहासिक लगा, तो उन्होंने वही बात दोहराई जिससे शुरुआत की थी कि दोनों सभ्यताएं जितनी लोग समझते हैं, उससे कहीं ज्यादा एक जैसी हैं। उन्होंने यह ऐसे कहा जैसे यह निष्कर्ष वे बहुत पहले निकाल चुके थे और अब उन्हें इसे कहने के लिए सही जगह मिल गई हो।

हमारा बुधवार का कवर मेरे उस सुइट में पहुंचने से पहले ही सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा था। मोदी ने इसे एक्स या ट्विटर पर अपने बड़े फॉलोअर समूह के साथ साझा किया। भारतीय मीडिया ने भी इसे उठाया। आजकल पहला पन्ना इस तरह खुद ही दूर तक पहुंच जाता है, कई बार उसके नीचे लिखी बातों से भी तेज।

वे दो हाथ से लिखी पंक्तियां कुछ अलग ही हैं। वे कागज पर दर्ज हैं, यरूशलम के एक होटल के कमरे में, खड़े होकर लिखी गईं, एक ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे कुछ लिखने की जरूरत नहीं थी, फिर भी उसने वही लिखना चुना। मानवता पहले। लोकतंत्र स्थायी है। हनुक्का की एक मोमबत्ती और एक दीया; रात का वही अंधेरा है और उसमें एक-एक कर सावधानी से रोशनी जोड़ते जाने का वही जज़्बा भी एक जैसा ही है

मैंने उन्हें पेन देने से पहले खुद जांच लिया था कि वह ठीक से चल रहा है।

लेकिन बाद में समझ आया, उन्हें मेरी मदद की कोई जरूरत नहीं थी।

(श्री ज्विका क्लेन, यरूशलम पोस्ट के एडिटर-इन-चीफ हैं। यहां व्यक्त किये गए विचार उनके निजी हैं।)

स्रोत: द यरूशलम पोस्ट