समर्पित जीवन

Published By : Admin | May 23, 2014 | 15:09 IST

अधिकांश किशोर 17 वर्ष की आयु में अपने भविष्य के बारे में और बचपन के इस आखिरी पड़ाव का आनंद लेने के बारे में सोचते हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए यह अवस्था पूर्णत: अलग थी। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया, जिसने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने घर छोड़ने और देश भर में भ्रमण करने का निर्णय कर लिया। उनका परिवार नरेन्द्र के इस निर्णय पर चकित था, लेकिन उन्होंने नरेन्द्र के छोटे शहर का सीमित जीवन छोड़ने की इच्छा को अंतत: स्वीकार कर लिया। जब घर त्यागने का वह दिन आ गया, उस दिन उनकी माँ ने उनके लिए विशेष अवसरों पर बनाया जाने वाला मिष्ठान बनाया और उनके मस्तक पर परम्परागत तिलक किया। जिन स्थानों की उन्होंने यात्राएँ की उसमें हिमालय (जहाँ वे गुरूदाचट्टी में ठहरे), पश्चिम बंगाल में रामकृष्ण आश्रम और यहाँ तक कि पूर्वोत्तर भी शामिल है। इन यात्राओं ने इस नौजवान के ऊपर अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने भारत के विशाल भू-भाग में यात्राएँ कीं और देश के विभिन्न भागों की विभिन्न संस्कृतियों को अनुभव किया। यह उनके लिए आध्यात्मिक जागृति का भी एक समय था, जिसने नरेन्द्र मोदी को उस व्यक्ति से अधिक गहराई से जुड़ने का अवसर दिया, जिसके वे सदैव से प्रशंसक रहे हैं – स्वामी विवेकानंद।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

The Activist नरेन्द्र मोदी दो वर्ष के बाद वापस लौट आये लेकिन घर पर केवल दो सप्ताह ही रुके। इस बार उनका लक्ष्य निर्धारित था और उद्देश्य स्पष्ट था – वह अहमदाबाद जा रहे थे। वोराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ कार्य करने का मन बना चुके थे। 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन है, जो भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कार्य करता है। आर.एस.एस. से उनका पहला परिचय आठ वर्ष की बेहद कम आयु में हुआ, जब वह अपनी चाय की दुकान पर दिन भर काम करने के बाद आर.एस.एस. के युवाओं की स्थानीय बैठक में भाग लिया करते थे। इन बैठकों में भाग लेने का प्रयोजन राजनीति से परे था। वे यहाँ अपने जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाले लक्ष्मणराव इनामदार, जिनको ‘वकील साहेब’ के नाम से भी जाना जाता था, से मिले थे।

अहमदाबाद और उसके आगे की राह

अपनी इस पृष्ठभूमि के साथ, लगभग 20 वर्षीय नरेन्द्र गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद पहुँच गए। वह आरएसएस के नियमित सदस्य बन गए और उनके समर्पण और संगठन कौशल ने वकील साहब और अन्य लोगों को प्रभावित किया। 1972 में वह प्रचारक बन गए और पूरा समय आरएसएस को देने लगे। वह अन्य प्रचारकों के साथ अपना आवास साझा करते थे और एक कठोर दैनिक दिनचर्या का पालन करते थे। दिन की शुरुआत प्रातः काल 5 बजे होती थी जो देर रात तक चलती थी। इस तरह के एक व्यस्त दिनचर्या के बीच नरेन्द्र ने राजनीति विज्ञान में अपनी डिग्री पूर्ण की। उन्होंने शिक्षा और अध्ययन को सदैव महत्वपूर्ण माना।

The Activist एक प्रचारक के तौर पर उन्हें गुजरात भर में घूमना पड़ता था। वर्ष 1972 और 1973 के मध्य वे नादियाड के संतराम मंदिर में रुके, जो कि खेड़ा जिले का भाग है। 1973 में नरेन्द्र मोदी को सिद्धपुर में एक विशाल सम्मलेन आयोजित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया, जहाँ वह संघ के शीर्ष नेताओं से मिले। नरेन्द्र मोदी जब एक कार्यकर्ता के तौर पर अपने आप को स्थापित कर रहे थे उस समय गुजरात सहित देश भर में बेहद अस्थिर माहौल था। जब वह अहमदाबाद पहुंचे, शहर साम्प्रदायिक दंगों की भयानक विभीषिका से जूझ रहा था। देश के अन्य भागों में भी, कांग्रेस पार्टी को 1967 के लोकसभा चुनावों में शिकस्त मिली थी। कांग्रेस पार्टी उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी और अन्य असंतुष्ट गुट में बंट गई थी, इस गुट के नेताओं में गुजरात के मोरारजी देसाई भी थे। ‘गरीबी हटाओ’ के प्रचार की लहर पर सवार श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनावों में लोकसभा की 518 में से 352 सीटें जीतकर बड़ी वापसी की थी।

The Activist गुजरात राज्य के चुनावों में भी श्रीमती इंदिरा गांधी ने केंद्र की सफलता को दोहराया और 50 प्रतिशत से अधिक मतों के साथ 182 में से 140 सीटें प्राप्त कीं। हालाँकि कांग्रेस और श्रीमती गांधी का यह उल्लासोन्माद जिस तेजी के साथ निर्मित हुआ था, उतनी ही तेजी से फीका पड़ा। त्वरित सुधार और प्रगति का सपना गुजरात में कारगर साबित नहीं हुआ और यहाँ के आम आदमी के बीच कांग्रेस से मोहभंग निर्मित होने लगा। इन्दुलाल याज्ञिक, जीवराज मेहता और बलवंत राय मेहता जैसे राजनीतिक दिग्गजों का संघर्ष और बलिदान लालच की राजनीति की भेंट चढ़ गया।

The Activist 1960 की समाप्ति और 1970 के शुरुआत में कांग्रेस सरकारों ने भ्रष्टाचार और कुशासन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। ‘गरीबी हटाओ’ का दिव्य नारा धीरे-धीरे ‘गरीब हटाओ’ में बदल गया। गरीब की हालत बदतर होती चली गई। गंभीर अकाल और भारी कीमत वृद्धि ने गुजरात को दुर्दशा की पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। आवश्यक वस्तुओं के लिए अंतहीन कतारें एक सामान्य सा दृश्य बन गया था। आम आदमी के लिए कोई राहत नहीं थी।

नवनिर्माण आन्दोलन : युवा शक्ति

जनता का असंतोष सार्वजानिक आक्रोश में बदल गया जब दिसम्बर 1973 में मोरबी (गुजरात) इंजीनियरिंग कॉलेज के कुछ छात्रों ने उनके खाने के बिलों में बेतहाशा वृद्धि का विरोध किया। इस तरह का प्रदर्शन गुजरात के अन्य राज्यों में भी हुआ। इन प्रदर्शनों को व्यापक समर्थन मिलने लगा और सरकार के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन खड़ा हुआ, जिसे नवनिर्माण आन्दोलन के नाम से जाना जाता है।

The Activist नरेन्द्र मोदी ने एक व्यापक जन आन्दोलन तैयार किया, जिसे समाज के सभी वर्गों का समर्थन हासिल हुआ। इस आन्दोलन को उस समय और ताकत मिली जब एक सम्मानित सार्वजानिक हस्ती और भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद करने वाले जयप्रकाश नारायण ने इस आन्दोलन को अपना समर्थन दिया। जब जयप्रकाश नारायण अहमदाबाद आये तब नरेन्द्र मोदी को उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अन्य अनुभवी नेताओं द्वारा आयोजित कई वार्ताओं ने नौजवान नरेन्द्र पर एक मजबूत छाप छोड़ी आख़िरकार छात्र शक्ति की जीत हुई और कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। तथापि यह हर्ष अधिक समय तक नहीं रहा। अधिनायकवाद के काले बादलों ने 25 जून 1975 की आधी रात को देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश के ऊपर आपातकाल थोप दिया।

आपातकाल के काले दिन

श्रीमती गांधी को भय था कि न्यायालय द्वारा उनके चुनाव को निरस्त करने के बाद उन्हें अपना शीर्ष पद गंवाना पड़ सकता है। उन्हें लगा कि इन हालात में आपातकाल ही श्रेष्ठ विकल्प है। लोकतंत्र सलाखों के पहरे में चला गया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई और विपक्ष के मुखर स्वर श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी, श्री जॉर्ज फर्नांडीज़ से लेकर श्री मोरारजी देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया।

The Activist नरेन्द्र मोदी आपातकाल विरोधी आंदोलन के मूल में थे। वे उस तानाशाह अत्याचार का विरोध करने के लिए गठित की गई गुजरात लोक संघर्ष समिति (जीएलएसएस)के एक सदस्य थे। कालांतर में वे इस समिति के महासचिव बन गए, जिसके तौर पर उनकी प्राथमिक भूमिका राज्य भर में कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की थी। कांग्रेस विरोधी नेताओं और कार्यकर्ताओं के ऊपर की जा रही सख्त निगरानी के चलते यह बेहद मुश्किल काम था। आपातकाल के दौरान नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए काम के बारे में कई कहानियाँ हैं। उनमें से एक यह है कि वह एक स्कूटर पर सवार होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को एक सुरक्षित घर में ले गए थे। इसी प्रकार, एक बार यह बात सामने आई कि गिरफ्तार किए गए नेताओं में से एक गिरफ्तारी के समय अपने साथ कई महत्वपूर्ण कागजात ले जा रहे थे। वे कागजात किसी भी कीमत पर पुनः प्राप्त किए जाने थे। यह ज़िम्मेदारी नरेन्द्र मोदी को सौंपी गई कि वे किसी भी तरह उन कागजात को पुलिस थाने में पुलिस की हिरासत में बैठे उस नेता से लेकर आएं और वह भी पुलिस बल के सामने। जब नानाजी देशमुख को गिरफ्तार कर लिया गया था, तब उनके पास एक पु‍स्तक थी जिसमें उनसे सहानुभूति रखने वालों के पते लिखे हुए थे।नरेन्द्र मोदी ने उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का प्रबंध कर दिया कि उनमें से किसी को भी आततायी सरकार के पुलिस बल गिरफ्तार नहीं कर पाए।

नरेन्द्र मोदी की अन्य जिम्मेदारियों में से एक गुजरात में आने व वहां से जाने वाले आपातकाल विरोधी कार्यकर्ताओं के लिए यात्रा की व्यवस्था बनाना भी था। कभी-कभी अपने काम के चलते उन्हें कई तरह के भेष बदल कर जाना होता था ताकि वे पहचाने न जाएं – एक दिन वे एक सिख सज्जन के रूप में होते थे, तो अगले दिन एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग आदमी के रूप में।

The Activist आपातकाल के दिनों में नरेन्द्र मोदी के सबसे मूल्यवान अनुभवों में से एक यह था कि उस दौरान उन्हें विभिन्न दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ काम करने का अवसर मिला। नरेन्द्र मोदी ने जून 2013 को अपने ब्लॉग पर लिखा है:

मुझ जैसे युवाओं को आपातकाल ने एक ही लक्ष्य के लिए लड़ रहे अनेक नेताओं और संगठनों के एक व्यापक एवं आश्चर्यजनक समूह के साथ काम करने का एक अदभुत अवसर दिया। इसने हमें उन संस्थाओं से परे काम करने में सक्षम बनाया, जिनसे हम प्रारंभ से जुड़े थे। हमारे परिवार के दिग्गजों जैसे अटल जी, आडवाणी जी, स्वर्गीय श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी, स्वर्गीय श्री नानाजी देशमुख से लेकर श्री जॉर्ज फर्नांडीस जैसे समाजवादियों तथा श्री रवीन्द्र वर्मा जैसे कांग्रेसियों तक जो मोरारजी भाई देसाई के साथ मिलकर काम कर रहे थे व आपात स्थिति से दुखी थे, विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े नेताओं ने हमें प्रेरित किया। मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने गुजरात विद्यापीठ के पूर्व उपकुलपति श्री धीरूभाई देसाई,मानवतावादी श्री सी टी दारू व गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्रियों श्री बाबूभाई जशभाई पटेल और श्री चिमनभाई पटेल तथा प्रमुख मुस्लिम नेता स्वर्गीय श्री हबीब उर रहमान जैसे लोगों से बहुत कुछ सीखा है। इस बारे में कांग्रेस की निरंकुशता का विरोध करने वाले और यहां तक कि पार्टी छोड़ने वाले स्वर्गीय श्री मोरारजी भाई देसाई का संघर्ष और दृढ़ संकल्प मन में आता है।

ऐसा लग रहा था जैसे विभिन्न विचारों और विचारधाराओं का एक जीवंत संगम एक बड़े और नेक उद्देश्य के लिए आकार ले चुका था। हम सब अपने सांझा उद्देश्य यानि देश के लोकतांत्रिक लोकाचार को बनाए रखने के लिए जाति, धर्म, समुदाय या धर्म के मतभेदों से ऊपर उठ कर एक साथ काम कर रहे थे। हमने दिसंबर 1975 मेंगांधीनगर में सभी विपक्षी सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक के लिए तैयारी की। इस बैठक में स्वर्गीय श्री पुरुषोत्तम मावलंकर, श्री उमाशंकर जोशी और श्री कृष्णकांत जैसे निर्दलीय सांसदों ने भी भाग लिया। राजनीति के दायरे के बाहर नरेन्द्र मोदी को सामाजिक संगठनों और कई गांधीवादियों के साथ काम करने का अवसर मिला है। वे जार्ज फर्नांडीस (जिन्हें वह ‘जॉर्ज साहब’ के नाम से पुकारते हैं) और नानाजी देशमुख दोनों के साथ हुई बैठक को अक्‍सर याद करते हैं। उन स्याह दिनों के दौरान वह अपने अनुभवों के बारे में लिखते रहते थे, जिसे बाद में ‘आपातकाल में गुजरात’ नाम की एक पुस्तक के रूप में छापा भी गया।

आपातकाल से परे नवनिर्माण आंदोलन की ही तरह, आपातकाल की समाप्ति लोगों की जीत के रूप में हुई। 1977 के संसदीय चुनावों में श्रीमती इंदिरा गांधी बुरी तरह पराजित हुईं। जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया और नई जनता पार्टी की सरकार में अटल जी और आडवाणी जी जैसे जनसंघ नेताओं को महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री बनाया गया। लगभग उसी समय, नरेन्द्र मोदी को पूर्ववर्ती वर्षों के दौरान उनकी सक्रियता और अच्छे संगठनात्मक काम की सराहना के तौर पर ‘संभाग प्रचारक’ (एक क्षेत्रीय आयोजक के बराबर का पद) बनाया गया था। उन्हें दक्षिण और मध्य गुजरात का प्रभार दिया गया था। उसी समय उन्हें दिल्ली बुलाया गया था और आपातकालीन अवधि के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुभवों को आधिकारिक तौर पर प्रस्तुत करने का दायित्व दिया गया। इस जिम्मेदारी का अर्थ काम का अधिक बोझ तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दोनों कर्तव्यों के मध्य संतुलन स्थापित करना था, जिसे नरेन्द्र मोदी ने आसानी और दक्षता के साथ निभाया।

The Activist

गुजरात में उनकी यात्राएं जारी रहीं तथा 1980 के दशक के प्रारंभ में काफी बढ़ गईं। इस दौरान उन्हें राज्य के हर तालुके तथा लगभग हर गांव का दौरा करने का अवसर मिला। यह अनुभव एक आयोजक तथा एक मुख्यमंत्री, दोनों के रूप में उनके लिए बहुत काम आया। इस दौरान वे लोगों की समस्याओं से सीधे रूबरू हुए तथा उन्हें हल करने के लिए कठिन काम करने के उनके संकल्प में वृद्धि हुई। सूखा, बाढ़ या दंगों के दौरान वे अनेक बार राहत कार्यों का नेतृत्व भी करते थे।

नरेन्द्र मोदी खुशी से अपने काम में डूबे थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नवगठित भाजपा में उनके वरिष्ठ उन्हें और अधिक ज़िम्मेदारी सौंपना चाहते थे, और इस प्रकार 1987 में एक और अध्याय नरेन्द्र मोदी के जीवन में शुरू हुआ। उसके बाद से वे जितना समय सड़कों पर काम करते थे उतना ही समय वे पार्टी की रणनीतियां तैयार करने में व्यतीत करते थे। उन्हें पार्टी के नेताओं के साथ काम करना होता था व कार्यकर्ताओं के साथ बैठना होता था। राष्ट्र की सेवा के लिए अपना घर छोड़ देने वाला वह वड़नगर का बालक एक और लंबी छलांग लगाने ही वाला था, हालांकि उसके अपने लिए यह अपने देशवासियों और महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए चल रही अपनी यात्रा की निरंतरता में महज एक छोटा सा मोड़ था। कैलाश मानसरोवर की एक यात्रा के बाद नरेन्द्र मोदी ने गुजरात भाजपा में महासचिव के रूप में काम करना प्रारंभ कर दिया।

 

डिस्कलेमर :

यह उन कहानियों या खबरों को इकट्ठा करने के प्रयास का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव पर उपाख्यान / राय / विश्लेषण का वर्णन करती हैं।

Explore More
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी
Indian youth are at the forefront of tech-led growth, innovation: PM Modi

Media Coverage

Indian youth are at the forefront of tech-led growth, innovation: PM Modi
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
भारत में नई चेतना का संचार करने वाले नेता: नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
June 14, 2026

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का साधारण पृष्ठभूमि से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेतृत्व तक का सफर, अंततः उस व्यक्ति की कहानी है जिसने भारत का खुद पर, अपनी क्षमताओं पर और अपने भविष्य पर विश्वास फिर से जगाया।

किसी राष्ट्र की नियति उसके नेताओं की नियति से गहराई से जुड़ी होती है। मजबूत और निर्णायक नेतृत्व में राष्ट्र आगे बढ़ते हैं और समृद्ध होते हैं, जबकि कमजोर, अनिर्णायक और भ्रष्ट नेतृत्व के दौर में उनका क्षरण होने लगता है। जनता किसी राष्ट्र की जीवन-ऊर्जा होती है, लेकिन नेता वही होते हैं जो इस सामूहिक ऊर्जा को सही और उत्पादक दिशा देते हैं। अपने संस्थापकों और नेताओं के बिना किसी राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। जब हम संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में सोचते हैं, तो थॉमस जेफरसन, जॉर्ज वॉशिंगटन, अब्राहम लिंकन, जॉन एफ. केनेडी और एफ.डी. रूजवेल्ट जैसे प्रमुख नेताओं के नाम हमारे मन में आते हैं। इसी तरह, भारतीय राष्ट्र का निर्माण भी महात्मा गांधी, बी.आर. आंबेडकर और वीर सावरकर जैसे महान संस्थापक पुरोधाओं के विजन पर हुआ है।

मजबूत नेतृत्व जनता के मनोबल को ऊंचा उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जबकि दूरदर्शी नेता राष्ट्र को समृद्धि और गौरव के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। नेतृत्व का महत्व किसी राष्ट्रीय संकट के समय सबसे अधिक होता है, ठीक वैसे ही जैसे भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार ने प्रलय के दौरान मनु महाराज के विशाल जहाज का मार्गदर्शन कर उसे सुरक्षित बचाया था। संकट की घड़ी में नेता ही राष्ट्र का मार्गदर्शन करते हैं और उसे कठिनाइयों से बाहर निकालते हैं। श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भी भारतीय राजनीति में ऐसे ही एक संकटपूर्ण दौर के दौरान केंद्र में अपनी प्रमुख भूमिका स्थापित की।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऐसे समय राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे, जब भारतीय राजनीति गहरे संकट के दौर से गुजर रही थी और देश पर एक नाममात्र के प्रधानमंत्री को थोपे जाने की स्थिति बन गई थी। सरकार पॉलिसी पैरालिसिस से जूझ रही थी। भ्रष्टाचार राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में गहराई तक जड़ें जमा चुका था और कोलगेट, 2जी स्पेक्ट्रम तथा कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे घोटाले बार-बार सामने आने वाली घटनाएं बन गए थे। मीडिया, कारोबारी जगत और राजनेताओं के बीच एक अपवित्र गठजोड़ बन गया था, जो बिना किसी भय के सार्वजनिक धन की लूट में लगा हुआ था। उद्यमी, उद्योग जगत और अकादमिक क्षेत्र निराशा के माहौल में डूब चुके थे तथा भारतीय राज्य व्यवस्था पर उनका भरोसा कमजोर पड़ने लगा था। आम लोगों के मन में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर गर्व की भावना क्षीण होती जा रही थी।

उस निर्णायक मोड़ पर श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी एक स्पष्ट, सशक्त और दूरदर्शी विजन के साथ राष्ट्रीय मंच पर उभरे। उन्होंने युवाओं, महिलाओं और अनुभवी पीढ़ी सहित समाज के विभिन्न वर्गों को नई प्रेरणा दी। पीएम नरेन्द्र मोदी ने नेतृत्व और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में आशा, विश्वास और भरोसे को फिर से स्थापित किया। उन्होंने अर्थव्यवस्था की रफ्तार को नई ऊर्जा दी, उद्यमिता और उद्योग जगत को प्रोत्साहित किया तथा नौकरशाही में भी नई कार्यसंस्कृति और उत्साह का संचार किया। स्वयं साधारण पृष्ठभूमि से आने के कारण पीएम मोदी को भारतीय समाज की गहरी समझ थी और आरएसएस प्रचारक के रूप में उन्होंने भारतीय संस्कृति तथा उसकी मूल चेतना को भी निकटता से समझा था।

भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल, उनका प्रशासनिक और चुनावी रिकॉर्ड बेदाग रहा। पीएम मोदी अपने साथ "मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस" का मंत्र लेकर आए।

पीएम मोदी ने सरकारी सेवाओं के तेज डिजिटलीकरण के माध्यम से फाइनेंस में मौजूद जड़ता को कम किया और सरकार को आम नागरिकों की उंगलियों तक पहुंचा दिया। अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही उन्होंने गजेटेड अधिकारियों से दस्तावेजों के सत्यापन की अनिवार्यता को समाप्त कर आम नागरिकों के लिए सेल्फ-अटेस्टेशन की व्यवस्था लागू की। यह आम नागरिकों की प्रगति में बाधा बनने वाली नौकरशाही अड़चनों के प्रति उनकी सूक्ष्म समझ को दर्शाता है। उनके द्वारा शुरू किए गए सुधारात्मक उपायों के कारण अंतरराष्ट्रीय बिजनेस इंडिकेटर्स में भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ। पीएम मोदी ने एक दक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह सरकार के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता दिखाई है। अब नियम और नीतियां बंद एसी कमरों में नहीं, बल्कि लोगों के बीच बनती हैं।

पीएम मोदी ने सत्ता संभालने के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मैन्युफैक्चरिंग हब में बदलने और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए लगातार कार्य किया है। पीएम मोदी ने स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव्स (PLI) जैसी पहलों की शुरुआत की। सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए पीएम मोदी ने ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और शिपिंग पोर्ट्स को मंजूरी दी, साथ ही ब्राउनफील्ड एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और स्टेशनों के निर्माण को भी गति दी। पीएम मोदी ने नए IIT और IIM स्थापित कर भारत के हायर एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया। पीएम मोदी ने "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास" के मंत्र के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों का भारतीय सरकार के प्रति विश्वास फिर से मजबूत किया। उनकी संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पारंपरिक चूल्हों के धुएं से माताओं और बहनों को होने वाली परेशानी को समझते हुए उन्होंने पीएम उज्ज्वला योजना की शुरुआत की।

पीएम मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से स्वच्छता और सैनिटेशन को जनचर्चा का हिस्सा बनाया। इस योजना के तहत बनाए गए शौचालयों के जरिए पीएम मोदी ने हमारी माताओं और बहनों को गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराने का प्रयास किया। पीएम नरेन्द्र मोदी के भागीरथ प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत की महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए नारीशक्ति वंदन अधिनियम पारित किया गया।

राष्ट्रवाद की भावना से ओत-प्रोत पीएम मोदी ने देश में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का नेतृत्व किया। औपनिवेशिक विरासत के अवशेष रहे इंडियन पीनल कोड (IPC) और सीआरपीसी (Code of Criminal Procedure) को समाप्त कर भारतीय न्याय संहिता का मार्ग प्रशस्त किया गया। पीएम मोदी निरंतर हमारे पवित्र तीर्थस्थलों के पुनर्निर्माण और विकास में जुटे हुए हैं। उनके प्रयासों से अयोध्या और काशी जैसे हमारे सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक केंद्रों को नई पहचान और भव्य स्वरूप मिला। पीएम मोदी ने ब्रांड एंबेसडर की तरह आयुर्वेद के स्वदेशी ज्ञान को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दिया और आयुर्वेद को प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित करने के लिए नीतियां तैयार कीं।

पीएम मोदी अपने उल्लेखनीय कार्यों, अटूट समर्पण और विकसित भारत के प्रति प्रतिबद्धता के माध्यम से हर भारतीय को 2047 तक विकसित भारत के अपने विजन में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

फिर भी, किसी नेता की वास्तविक पहचान केवल उसकी बनाई गई नीतियों या स्थापित संस्थाओं से नहीं होती, बल्कि उससे होती है कि वह अपने लोगों में कितना आत्मविश्वास पैदा करता है। पिछले 12 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया है—शासन-व्यवस्था में विश्वास, भारत की सभ्यतागत विरासत में विश्वास, सामान्य नागरिकों की क्षमताओं में विश्वास और राष्ट्र के भविष्य में विश्वास।

अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देने और गरीबों के सशक्तिकरण से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करने और वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई देने तक, पीएम मोदी के नेतृत्व ने समकालीन भारत पर एक अमिट छाप छोड़ी है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने गवर्नेंस को एक राष्ट्रीय जनआंदोलन का स्वरूप दिया है, जिससे लाखों लोग देश की विकास यात्रा में सक्रिय भागीदार बनने के लिए प्रेरित हुए हैं।

जैसे-जैसे भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है, विकसित भारत का विजन अब कोई दूर का सपना नहीं रह गया है; यह एक सामूहिक राष्ट्रीय मिशन बन चुका है। इतिहास उन नेताओं को याद रखता है जो तब आगे आते हैं जब उनके राष्ट्र को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है, ऐसे नेता जो केवल अपने समय का नेतृत्व ही नहीं करते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की नियति को भी आकार देते हैं।

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का साधारण पृष्ठभूमि से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेतृत्व तक का सफर, अंततः उस व्यक्ति की कहानी है जिसने भारत का खुद पर, अपनी क्षमताओं पर और अपने भविष्य पर विश्वास फिर से जगाया। एक अधिक सशक्त, आत्मविश्वासी और आकांक्षी भारत की नींव रखी जा चुकी है। अब राष्ट्र के सामने इस गति को आगे बढ़ाने और विकसित भारत के सपने को साकार करने का दायित्व है।

जब भारत और भी बड़ी संभावनाओं की दहलीज पर खड़ा है, तब रॉबर्ट फ्रॉस्ट के शब्द नए अर्थों और नई प्रासंगिकता के साथ गूंजते हैं,

"ये वन मनोहर हैं, गहरे हैं और रहस्यमय भी,

लेकिन मुझे अपने वादे निभाने हैं,

और विश्राम से पहले मुझे अभी मीलों चलना है,

और विश्राम से पहले मुझे अभी मीलों चलना है।"

भारत के लिए ये वादे उसके लोगों, उसकी सभ्यता और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हैं। पिछले बारह वर्षों की उपलब्धियां उस यात्रा की मजबूत नींव हैं। यह यात्रा अभी जारी है और आगे का मार्ग अनिश्चितताओं से नहीं, बल्कि अवसरों, उद्देश्य और विकसित भारत के संकल्प से परिपूर्ण है।

(रेखा गुप्ता दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं।)