समर्पित जीवन

Published By : Admin | May 23, 2014 | 15:09 IST

अधिकांश किशोर 17 वर्ष की आयु में अपने भविष्य के बारे में और बचपन के इस आखिरी पड़ाव का आनंद लेने के बारे में सोचते हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए यह अवस्था पूर्णत: अलग थी। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया, जिसने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने घर छोड़ने और देश भर में भ्रमण करने का निर्णय कर लिया। उनका परिवार नरेन्द्र के इस निर्णय पर चकित था, लेकिन उन्होंने नरेन्द्र के छोटे शहर का सीमित जीवन छोड़ने की इच्छा को अंतत: स्वीकार कर लिया। जब घर त्यागने का वह दिन आ गया, उस दिन उनकी माँ ने उनके लिए विशेष अवसरों पर बनाया जाने वाला मिष्ठान बनाया और उनके मस्तक पर परम्परागत तिलक किया। जिन स्थानों की उन्होंने यात्राएँ की उसमें हिमालय (जहाँ वे गुरूदाचट्टी में ठहरे), पश्चिम बंगाल में रामकृष्ण आश्रम और यहाँ तक कि पूर्वोत्तर भी शामिल है। इन यात्राओं ने इस नौजवान के ऊपर अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने भारत के विशाल भू-भाग में यात्राएँ कीं और देश के विभिन्न भागों की विभिन्न संस्कृतियों को अनुभव किया। यह उनके लिए आध्यात्मिक जागृति का भी एक समय था, जिसने नरेन्द्र मोदी को उस व्यक्ति से अधिक गहराई से जुड़ने का अवसर दिया, जिसके वे सदैव से प्रशंसक रहे हैं – स्वामी विवेकानंद।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

The Activist नरेन्द्र मोदी दो वर्ष के बाद वापस लौट आये लेकिन घर पर केवल दो सप्ताह ही रुके। इस बार उनका लक्ष्य निर्धारित था और उद्देश्य स्पष्ट था – वह अहमदाबाद जा रहे थे। वोराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ कार्य करने का मन बना चुके थे। 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन है, जो भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कार्य करता है। आर.एस.एस. से उनका पहला परिचय आठ वर्ष की बेहद कम आयु में हुआ, जब वह अपनी चाय की दुकान पर दिन भर काम करने के बाद आर.एस.एस. के युवाओं की स्थानीय बैठक में भाग लिया करते थे। इन बैठकों में भाग लेने का प्रयोजन राजनीति से परे था। वे यहाँ अपने जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाले लक्ष्मणराव इनामदार, जिनको ‘वकील साहेब’ के नाम से भी जाना जाता था, से मिले थे।

अहमदाबाद और उसके आगे की राह

अपनी इस पृष्ठभूमि के साथ, लगभग 20 वर्षीय नरेन्द्र गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद पहुँच गए। वह आरएसएस के नियमित सदस्य बन गए और उनके समर्पण और संगठन कौशल ने वकील साहब और अन्य लोगों को प्रभावित किया। 1972 में वह प्रचारक बन गए और पूरा समय आरएसएस को देने लगे। वह अन्य प्रचारकों के साथ अपना आवास साझा करते थे और एक कठोर दैनिक दिनचर्या का पालन करते थे। दिन की शुरुआत प्रातः काल 5 बजे होती थी जो देर रात तक चलती थी। इस तरह के एक व्यस्त दिनचर्या के बीच नरेन्द्र ने राजनीति विज्ञान में अपनी डिग्री पूर्ण की। उन्होंने शिक्षा और अध्ययन को सदैव महत्वपूर्ण माना।

The Activist एक प्रचारक के तौर पर उन्हें गुजरात भर में घूमना पड़ता था। वर्ष 1972 और 1973 के मध्य वे नादियाड के संतराम मंदिर में रुके, जो कि खेड़ा जिले का भाग है। 1973 में नरेन्द्र मोदी को सिद्धपुर में एक विशाल सम्मलेन आयोजित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया, जहाँ वह संघ के शीर्ष नेताओं से मिले। नरेन्द्र मोदी जब एक कार्यकर्ता के तौर पर अपने आप को स्थापित कर रहे थे उस समय गुजरात सहित देश भर में बेहद अस्थिर माहौल था। जब वह अहमदाबाद पहुंचे, शहर साम्प्रदायिक दंगों की भयानक विभीषिका से जूझ रहा था। देश के अन्य भागों में भी, कांग्रेस पार्टी को 1967 के लोकसभा चुनावों में शिकस्त मिली थी। कांग्रेस पार्टी उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी और अन्य असंतुष्ट गुट में बंट गई थी, इस गुट के नेताओं में गुजरात के मोरारजी देसाई भी थे। ‘गरीबी हटाओ’ के प्रचार की लहर पर सवार श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनावों में लोकसभा की 518 में से 352 सीटें जीतकर बड़ी वापसी की थी।

The Activist गुजरात राज्य के चुनावों में भी श्रीमती इंदिरा गांधी ने केंद्र की सफलता को दोहराया और 50 प्रतिशत से अधिक मतों के साथ 182 में से 140 सीटें प्राप्त कीं। हालाँकि कांग्रेस और श्रीमती गांधी का यह उल्लासोन्माद जिस तेजी के साथ निर्मित हुआ था, उतनी ही तेजी से फीका पड़ा। त्वरित सुधार और प्रगति का सपना गुजरात में कारगर साबित नहीं हुआ और यहाँ के आम आदमी के बीच कांग्रेस से मोहभंग निर्मित होने लगा। इन्दुलाल याज्ञिक, जीवराज मेहता और बलवंत राय मेहता जैसे राजनीतिक दिग्गजों का संघर्ष और बलिदान लालच की राजनीति की भेंट चढ़ गया।

The Activist 1960 की समाप्ति और 1970 के शुरुआत में कांग्रेस सरकारों ने भ्रष्टाचार और कुशासन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। ‘गरीबी हटाओ’ का दिव्य नारा धीरे-धीरे ‘गरीब हटाओ’ में बदल गया। गरीब की हालत बदतर होती चली गई। गंभीर अकाल और भारी कीमत वृद्धि ने गुजरात को दुर्दशा की पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। आवश्यक वस्तुओं के लिए अंतहीन कतारें एक सामान्य सा दृश्य बन गया था। आम आदमी के लिए कोई राहत नहीं थी।

नवनिर्माण आन्दोलन : युवा शक्ति

जनता का असंतोष सार्वजानिक आक्रोश में बदल गया जब दिसम्बर 1973 में मोरबी (गुजरात) इंजीनियरिंग कॉलेज के कुछ छात्रों ने उनके खाने के बिलों में बेतहाशा वृद्धि का विरोध किया। इस तरह का प्रदर्शन गुजरात के अन्य राज्यों में भी हुआ। इन प्रदर्शनों को व्यापक समर्थन मिलने लगा और सरकार के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन खड़ा हुआ, जिसे नवनिर्माण आन्दोलन के नाम से जाना जाता है।

The Activist नरेन्द्र मोदी ने एक व्यापक जन आन्दोलन तैयार किया, जिसे समाज के सभी वर्गों का समर्थन हासिल हुआ। इस आन्दोलन को उस समय और ताकत मिली जब एक सम्मानित सार्वजानिक हस्ती और भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद करने वाले जयप्रकाश नारायण ने इस आन्दोलन को अपना समर्थन दिया। जब जयप्रकाश नारायण अहमदाबाद आये तब नरेन्द्र मोदी को उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अन्य अनुभवी नेताओं द्वारा आयोजित कई वार्ताओं ने नौजवान नरेन्द्र पर एक मजबूत छाप छोड़ी आख़िरकार छात्र शक्ति की जीत हुई और कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। तथापि यह हर्ष अधिक समय तक नहीं रहा। अधिनायकवाद के काले बादलों ने 25 जून 1975 की आधी रात को देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश के ऊपर आपातकाल थोप दिया।

आपातकाल के काले दिन

श्रीमती गांधी को भय था कि न्यायालय द्वारा उनके चुनाव को निरस्त करने के बाद उन्हें अपना शीर्ष पद गंवाना पड़ सकता है। उन्हें लगा कि इन हालात में आपातकाल ही श्रेष्ठ विकल्प है। लोकतंत्र सलाखों के पहरे में चला गया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई और विपक्ष के मुखर स्वर श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी, श्री जॉर्ज फर्नांडीज़ से लेकर श्री मोरारजी देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया।

The Activist नरेन्द्र मोदी आपातकाल विरोधी आंदोलन के मूल में थे। वे उस तानाशाह अत्याचार का विरोध करने के लिए गठित की गई गुजरात लोक संघर्ष समिति (जीएलएसएस)के एक सदस्य थे। कालांतर में वे इस समिति के महासचिव बन गए, जिसके तौर पर उनकी प्राथमिक भूमिका राज्य भर में कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की थी। कांग्रेस विरोधी नेताओं और कार्यकर्ताओं के ऊपर की जा रही सख्त निगरानी के चलते यह बेहद मुश्किल काम था। आपातकाल के दौरान नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए काम के बारे में कई कहानियाँ हैं। उनमें से एक यह है कि वह एक स्कूटर पर सवार होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को एक सुरक्षित घर में ले गए थे। इसी प्रकार, एक बार यह बात सामने आई कि गिरफ्तार किए गए नेताओं में से एक गिरफ्तारी के समय अपने साथ कई महत्वपूर्ण कागजात ले जा रहे थे। वे कागजात किसी भी कीमत पर पुनः प्राप्त किए जाने थे। यह ज़िम्मेदारी नरेन्द्र मोदी को सौंपी गई कि वे किसी भी तरह उन कागजात को पुलिस थाने में पुलिस की हिरासत में बैठे उस नेता से लेकर आएं और वह भी पुलिस बल के सामने। जब नानाजी देशमुख को गिरफ्तार कर लिया गया था, तब उनके पास एक पु‍स्तक थी जिसमें उनसे सहानुभूति रखने वालों के पते लिखे हुए थे।नरेन्द्र मोदी ने उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का प्रबंध कर दिया कि उनमें से किसी को भी आततायी सरकार के पुलिस बल गिरफ्तार नहीं कर पाए।

नरेन्द्र मोदी की अन्य जिम्मेदारियों में से एक गुजरात में आने व वहां से जाने वाले आपातकाल विरोधी कार्यकर्ताओं के लिए यात्रा की व्यवस्था बनाना भी था। कभी-कभी अपने काम के चलते उन्हें कई तरह के भेष बदल कर जाना होता था ताकि वे पहचाने न जाएं – एक दिन वे एक सिख सज्जन के रूप में होते थे, तो अगले दिन एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग आदमी के रूप में।

The Activist आपातकाल के दिनों में नरेन्द्र मोदी के सबसे मूल्यवान अनुभवों में से एक यह था कि उस दौरान उन्हें विभिन्न दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ काम करने का अवसर मिला। नरेन्द्र मोदी ने जून 2013 को अपने ब्लॉग पर लिखा है:

मुझ जैसे युवाओं को आपातकाल ने एक ही लक्ष्य के लिए लड़ रहे अनेक नेताओं और संगठनों के एक व्यापक एवं आश्चर्यजनक समूह के साथ काम करने का एक अदभुत अवसर दिया। इसने हमें उन संस्थाओं से परे काम करने में सक्षम बनाया, जिनसे हम प्रारंभ से जुड़े थे। हमारे परिवार के दिग्गजों जैसे अटल जी, आडवाणी जी, स्वर्गीय श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी, स्वर्गीय श्री नानाजी देशमुख से लेकर श्री जॉर्ज फर्नांडीस जैसे समाजवादियों तथा श्री रवीन्द्र वर्मा जैसे कांग्रेसियों तक जो मोरारजी भाई देसाई के साथ मिलकर काम कर रहे थे व आपात स्थिति से दुखी थे, विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े नेताओं ने हमें प्रेरित किया। मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने गुजरात विद्यापीठ के पूर्व उपकुलपति श्री धीरूभाई देसाई,मानवतावादी श्री सी टी दारू व गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्रियों श्री बाबूभाई जशभाई पटेल और श्री चिमनभाई पटेल तथा प्रमुख मुस्लिम नेता स्वर्गीय श्री हबीब उर रहमान जैसे लोगों से बहुत कुछ सीखा है। इस बारे में कांग्रेस की निरंकुशता का विरोध करने वाले और यहां तक कि पार्टी छोड़ने वाले स्वर्गीय श्री मोरारजी भाई देसाई का संघर्ष और दृढ़ संकल्प मन में आता है।

ऐसा लग रहा था जैसे विभिन्न विचारों और विचारधाराओं का एक जीवंत संगम एक बड़े और नेक उद्देश्य के लिए आकार ले चुका था। हम सब अपने सांझा उद्देश्य यानि देश के लोकतांत्रिक लोकाचार को बनाए रखने के लिए जाति, धर्म, समुदाय या धर्म के मतभेदों से ऊपर उठ कर एक साथ काम कर रहे थे। हमने दिसंबर 1975 मेंगांधीनगर में सभी विपक्षी सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक के लिए तैयारी की। इस बैठक में स्वर्गीय श्री पुरुषोत्तम मावलंकर, श्री उमाशंकर जोशी और श्री कृष्णकांत जैसे निर्दलीय सांसदों ने भी भाग लिया। राजनीति के दायरे के बाहर नरेन्द्र मोदी को सामाजिक संगठनों और कई गांधीवादियों के साथ काम करने का अवसर मिला है। वे जार्ज फर्नांडीस (जिन्हें वह ‘जॉर्ज साहब’ के नाम से पुकारते हैं) और नानाजी देशमुख दोनों के साथ हुई बैठक को अक्‍सर याद करते हैं। उन स्याह दिनों के दौरान वह अपने अनुभवों के बारे में लिखते रहते थे, जिसे बाद में ‘आपातकाल में गुजरात’ नाम की एक पुस्तक के रूप में छापा भी गया।

आपातकाल से परे नवनिर्माण आंदोलन की ही तरह, आपातकाल की समाप्ति लोगों की जीत के रूप में हुई। 1977 के संसदीय चुनावों में श्रीमती इंदिरा गांधी बुरी तरह पराजित हुईं। जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया और नई जनता पार्टी की सरकार में अटल जी और आडवाणी जी जैसे जनसंघ नेताओं को महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री बनाया गया। लगभग उसी समय, नरेन्द्र मोदी को पूर्ववर्ती वर्षों के दौरान उनकी सक्रियता और अच्छे संगठनात्मक काम की सराहना के तौर पर ‘संभाग प्रचारक’ (एक क्षेत्रीय आयोजक के बराबर का पद) बनाया गया था। उन्हें दक्षिण और मध्य गुजरात का प्रभार दिया गया था। उसी समय उन्हें दिल्ली बुलाया गया था और आपातकालीन अवधि के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुभवों को आधिकारिक तौर पर प्रस्तुत करने का दायित्व दिया गया। इस जिम्मेदारी का अर्थ काम का अधिक बोझ तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दोनों कर्तव्यों के मध्य संतुलन स्थापित करना था, जिसे नरेन्द्र मोदी ने आसानी और दक्षता के साथ निभाया।

The Activist

गुजरात में उनकी यात्राएं जारी रहीं तथा 1980 के दशक के प्रारंभ में काफी बढ़ गईं। इस दौरान उन्हें राज्य के हर तालुके तथा लगभग हर गांव का दौरा करने का अवसर मिला। यह अनुभव एक आयोजक तथा एक मुख्यमंत्री, दोनों के रूप में उनके लिए बहुत काम आया। इस दौरान वे लोगों की समस्याओं से सीधे रूबरू हुए तथा उन्हें हल करने के लिए कठिन काम करने के उनके संकल्प में वृद्धि हुई। सूखा, बाढ़ या दंगों के दौरान वे अनेक बार राहत कार्यों का नेतृत्व भी करते थे।

नरेन्द्र मोदी खुशी से अपने काम में डूबे थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नवगठित भाजपा में उनके वरिष्ठ उन्हें और अधिक ज़िम्मेदारी सौंपना चाहते थे, और इस प्रकार 1987 में एक और अध्याय नरेन्द्र मोदी के जीवन में शुरू हुआ। उसके बाद से वे जितना समय सड़कों पर काम करते थे उतना ही समय वे पार्टी की रणनीतियां तैयार करने में व्यतीत करते थे। उन्हें पार्टी के नेताओं के साथ काम करना होता था व कार्यकर्ताओं के साथ बैठना होता था। राष्ट्र की सेवा के लिए अपना घर छोड़ देने वाला वह वड़नगर का बालक एक और लंबी छलांग लगाने ही वाला था, हालांकि उसके अपने लिए यह अपने देशवासियों और महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए चल रही अपनी यात्रा की निरंतरता में महज एक छोटा सा मोड़ था। कैलाश मानसरोवर की एक यात्रा के बाद नरेन्द्र मोदी ने गुजरात भाजपा में महासचिव के रूप में काम करना प्रारंभ कर दिया।

 

डिस्कलेमर :

यह उन कहानियों या खबरों को इकट्ठा करने के प्रयास का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव पर उपाख्यान / राय / विश्लेषण का वर्णन करती हैं।

Explore More
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

Media Coverage

"AI Summit Turning Point For How World Will Use AI": PM Modi In Mann Ki Baat
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
उस चहलकदमी में दिखा कार्यकर्ताओं के प्रति पीएम मोदी का गहरा सम्मान: नितिन नबीन जी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
January 21, 2026

पटना में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान हुई एक ऐसी घटना ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितिन नबीन जी पर गहरी छाप छोड़ी और नेतृत्व का एक शांत लेकिन बेहद प्रभावशाली सबक दिया।

देशभर से वरिष्ठ नेता एक बड़े कार्यक्रम के लिए पटना पहुँच रहे थे। नितिन नबीन जी उस टीम में शामिल थे, जिसकी जिम्मेदारी एयरपोर्ट पर नेताओं का स्वागत करने और तय प्रोटोकॉल के अनुसार उन्हें उनके वाहनों तक पहुँचाने की थी। जैसे-जैसे नेता आते गए, वे सामान्य प्रक्रिया के तहत सीधे अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ते गए।

जब प्रधानमंत्री मोदी जी पहुँचे, तो उनका स्वागत किया गया और उनसे गाड़ी की ओर चलने का अनुरोध किया गया। लेकिन आगे बढ़ने से पहले वे रुक गए और पूछा कि क्या बाहर कार्यकर्ता खड़े हैं। जब उन्हें बताया गया कि वहाँ कई कार्यकर्ता इंतजार कर रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत कहा कि वे पहले उनसे मिलना चाहेंगे।

प्रधानमंत्री जी ने गाड़ी में बैठने के बजाय पैदल चलना चुना। उनकी गाड़ी पीछे-पीछे चलती रही थी, वे स्वयं हर कार्यकर्ता से मिले, अपने हाथों से माला स्वीकार की, सम्मान में हाथ जोड़कर अभिवादन किया और वहाँ मौजूद प्रत्येक कार्यकर्ता का अभिवादन स्वीकार किया। सभी से मिलने के बाद ही वे अपनी गाड़ी में बैठे और वहाँ से रवाना हुए।

हालाँकि ये बहुत छोटा स्मरण है, लेकिन यह व्यवहार सभी के मन पर गहरी और स्थायी छाप छोड़ गया। प्रधानमंत्री जी आसानी से कार में बैठकर हाथ हिला सकते थे, लेकिन उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ चलना और व्यक्तिगत रूप से उनका सम्मान करना चुना। यह क्षण उनकी संवेदनशीलता और इस विश्वास को दर्शाता है कि प्रत्येक कार्यकर्ता, चाहे उसका पद कुछ भी हो, सम्मान का पात्र है।

नितिन नबीन जी बताते हैं कि इस घटना ने उन्हें नेतृत्व का सही अर्थ सिखाया। नरेन्द्र मोदी जी के लिए नेतृत्व की नींव विनम्रता, भावनात्मक जुड़ाव और जमीनी स्तर से लगातार संपर्क में निहित है। कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मान और खुला संवाद केवल दिखावे के लिए नहीं हैं, बल्कि सभी कार्यकर्ताओं, नेताओं और पूरे संगठन के मूल मूल्य हैं।

यह सोच, जहाँ कार्यकर्ताओं के साथ सम्मान और अपनापन रखा जाता है, भाजपा की संगठनात्मक संस्कृति की पहचान है। यही परंपरा पार्टी की जड़ों को मजबूत करती है और आम लोगों को राष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ को निभाने के लिए तैयार करती है।