सम्राट सम्प्रति संग्रहालय जैन संस्कृति की गहराई से समाहित परंपराओं तथा मानवता के लिए उसके शाश्वत मूल्यों को प्रदर्शित करता है: प्रधानमंत्री
मैं भगवान महावीर के चरणों में नमन करता हूँ, कोबा तीर्थ से मैं समस्त देशवासियों को भगवान महावीर जयंती की शुभकामनाएँ देता हूँ: प्रधानमंत्री
सम्राट सम्प्रति संग्रहालय भारत के करोड़ों लोगों की धरोहर है, भारत के गौरवशाली अतीत की धरोहर है: प्रधानमंत्री
सम्राट सम्प्रति ने सिंहासन पर आरूढ़ होने के बाद अहिंसा का प्रसार किया। उन्होंने सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का प्रचार-प्रसार किया: प्रधानमंत्री
भारत में ज्ञान सदैव एक अविरल प्रवाहित होती धारा रहा है: प्रधानमंत्री
प्रत्येक युग में तीर्थंकर, ऋषि एवं विचारक अवतरित होते रहे, ज्ञान का संकलन निरंतर बढ़ता रहा और समय के साथ उसमें बहुत-सी नई सामग्री का समावेश होता गया: प्रधानमंत्री

जय जिनेन्द्र !

जय जिनेन्द्र !

आचार्य भगवंतश्री पद्मसागर सुरीश्वर जी महाराज साहेब, गुजरात के गवर्नर आचार्य देवव्रत जी, मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई, राज्य के उप-मुख्यमंत्री भाई हर्ष संघवी जी, परम पूज्य आचार्य भगवंत, पूज्य साधुभगवंत, साध्वीजी भगवंत, इस पवित्र सभा में उपस्थित समस्त आचार्यगण और मुनिभगवंत, माननीय दानवीर, विद्वतजन, देवियों और सज्जनों !

आज भगवान महावीर जयंती के पावन पर्व पर मुझे इस पवित्र जैन तीर्थ आने का सौभाग्य मिला है। सर्वप्रथम, मैं भगवान महावीर के चरणों में प्रणाम करता हूँ। मैं कोबातीर्थ से सभी देशवासियों को भगवान महावीर जयंती की शुभकामनाएँ देता हूँ।

साथियों,

मैं आज परम पूज्य आचार्य श्री कैलास सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब की स्मृति को भी वन्दन करता हूँ। उनके स्वप्न ने कोबा की इस धरती पर ज्ञान और श्रद्धा का यह महान केन्द्र स्थापित किया है। कोबातीर्थ की ये स्थली आध्यात्मिक शांति से ओतप्रोत है। जिस स्थान की ऊर्जा ऐसी अलौकिक हो, जिसमें इतने जैन मुनियों की, संतों की तपस्या जुड़ी हो, वहाँ सृजन और सेवा, ये अपने आप प्रस्फुटित और संचालित होते हैं। मैं तो बरसों से देखता आया हूं कि कोबातीर्थ में कैसे अध्ययन, साधना, और संयम की सतत परंपरा चली आ रही है। यहाँ मूल्यों का संरक्षण होता है, संस्कारों को संबल मिलता है और ज्ञान का पोषण होता है। यह त्रिवेणी भारतीय सभ्यता का आधार है। इस त्रिवेणी को अविरल बनाए रखना, ये हम सबका दायित्व है।

साथियों,

मुझे खुशी है कि हजारों वर्षों की भारतीय विरासत, जैन धर्म का समयातीत ज्ञान, हमारी धरोहरें और उनसे मिलने वाली प्रेरणाएँ, उन्हें आने वाली सदियों तक अमर बनाने के लिए, उन्हें नए और आधुनिक रूप में अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए हमारे संतों ने इस जैन हेरिटेज म्यूज़ियम की संकल्पना की। आज वो संकल्पना एक भव्य रूप में साकार हो रही है। ये सम्राट संप्रति संग्रहालय, जैन दर्शन, भारतीय संस्कृति और हमारी प्राचीन धरोहर का एक पवित्र केंद्र बना है। मैं इस अद्वितीय प्रयास के लिए हमारे सभी जैन मुनियों का, संतों का अभिनंदन करता हूँ। मैं उनके चरणों में प्रणाम करता हूँ। ऐसे हजारों निष्ठावान लोग, जिन्होंने इस कार्य में असीम योगदान दिया, मैं उन सभी की भी सराहना करता हूँ।

भाइयों-बहनों,

जब हम अनादि ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए इनोवेशन करते हैं, नयापन लाते हैं, तो इससे हमारी विरासत भी समृद्ध होती है और आने वाले कल को भी प्रेरणा मिलती है। सम्राट संप्रति संग्रहालय, ये भारत के कोटि-कोटि लोगों की धरोहर है, ये भारत के गौरवशाली अतीत की धरोहर है। मैं इसके लिए सभी देशवासियों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

साथियों,

सम्राट संप्रति, ये केवल एक ऐतिहासिक राजा का नाम नहीं है। सम्राट संप्रति एक ऐसे सेतु हैं, जो भारत के दर्शन और व्यवहार को जोड़ते हैं। क्योंकि, जब हम इतिहास में झाँकते हैं, तो हम देखते हैं कि दुनिया की कई सभ्यताओं में महान विचारकों और दार्शनिकों ने जन्म लिया। मानवता के आदर्श भी अलग-अलग परिभाषाओं में गढ़े गए। लेकिन, जब सवाल सत्ता और शक्ति का आया, कई शासकों ने आदर्शों और मूल्यों को किनारे कर दिया। इससे विचार और व्यवहार में, विचार और व्यवस्था में, एक खाई पैदा होती चली गई। लेकिन, भारत में सम्राट संप्रति जैसे शासक हुए, जिन्होंने सत्ता को सेवा और साधना मानकर काम किया। जहां एक ओर कुछ शासकों ने हिंसा को हथियार बनाकर शासन किया, वहीं सम्राट संप्रति ने सिंहासन पर बैठकर अहिंसा का विस्तार किया। उन्होंने सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का प्रचार-प्रसार किया। इतनी निःस्पृहता से, इतने निःस्वार्थ भाव से, शासन को सेवा का माध्यम मानकर जीवन जीना, ये सीख हमें भारत के अतीत से ही मिलती है। इसी अतीत को हम इस म्यूज़ियम में सहेज रहे हैं।

साथियों,

मैं ये देख रहा था, इस म्यूज़ियम को डिज़ाइन भी ऐसे किया गया है, इसमें हर कदम पर भव्य भारत की पहचान के दर्शन होते हैं। इसकी सात दीर्घाएँ, हर दीर्घा भारत की विविधता और सांस्कृतिक संपन्नता का उद्घोष करती है। प्रथम दीर्घा में हमें नवपद के दर्शन होते हैं। नवपद यानी- अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, और साधू। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और सम्यक तप, अर्थात्, हम उनसे सीखें, जिन्होंने स्वयं तप करके जीवन को जाना है, और जो ज्ञान हम प्राप्त करें, वो सम्यक हो! हमारा चरित्र सम्यक हो! क्योंकि ज्ञान जब सम्यक होता है, तो वो समता और सेवा का आधार बनता है।

साथियों,

तीसरी दीर्घा में हमारे तीर्थंकरों के जीवन को, उनके उपदेशों और प्रसंगों को कलात्मक तरीकों से भी जीवंत किया गया है।

भाइयों-बहनों,

इस म्यूज़ियम में भारत की सबसे बड़ी विशिष्टता के, सबसे बड़ी ताकत के दर्शन होते हैं। जैसा कि मैंने पहले भी ज़िक्र किया, हमारी ये ताकत है- भारत की विविधता और विविधता में एकता। दुनिया ने हमेशा मत, मजहब और आस्था के नाम पर टकराव देखा है, लेकिन, इस म्यूज़ियम में भारत के दूसरे सभी धर्मों के भी गौरवशाली दर्शन होते हैं। वैदिक और बौद्ध परंपरा, वेद, पुराण, आयुर्वेद, योग, दर्शन, विभिन्न परंपराओं के सभी रंग एक साथ इंद्रधनुष की तरह उपस्थित हों, ये भारत में ही हो सकता है।

साथियों,

आज दुनिया में जिस तरह के हालात हैं, जिस तरह विश्व अस्थिरता और अशांति की आग में झुलस रहा है, इस म्यूज़ियम की विरासत, इसका संदेश, केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए बहुत अहम है। हमारा प्रयास होना चाहिए, दुनिया के देशों से यहाँ आने वाले जिज्ञासु, स्टूडेंट्स और रिसर्चर्स की संख्या और बढ़े। जो लोग यहाँ आयें, वो भारत की, जैनधर्म की शिक्षाओं को विश्व के कोने-कोने में पहुंचाएं।

साथियों,

भारत में ज्ञान हमेशा से एक मुक्त प्रवाह रहा है। हर युग में तीर्थंकरों और ऋषियों-मनीषियों का अवतार हुआ। ज्ञान का संकलन बढ़ता चला गया, समय के साथ बहुत कुछ नया जुड़ता गया। आप कल्पना करिए, एक समय हमारे तक्षशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय लाखों ग्रन्थों और पाण्डुलिपियों से भरे होते थे। लेकिन, विदेशी आक्रमणकारियों ने मजहबी संकीर्णता में ज्ञान को भी अपना दुश्मन मानकर उन्हें जला दिया, मानवता की कितनी बड़ी धरोहरें नष्ट हो गई। उस मुश्किल दौर में, लोगों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी बची हुई पाण्डुलिपियों को सहेजा, उनकी सुरक्षा की।आज़ादी के बाद, उन्हें खोजना, उन्हें सहेजना, ये देश की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए थी, लेकिन दुर्भाग्य से गुलामी की मानसिकता के कारण इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। आचार्य भगवंत श्री पद्मसागर सूरीश्वर जी महाराज साहेब जैसे महान व्यक्तित्वों और संतों ने इसका महत्व समझा, उन्होंने अपना पूरा जीवन इसके लिए समर्पित किया। जीवन के 60 साल, गाँव-गाँव, शहर-शहर, देश के कोने-कोने से उन्होंने manuscripts को खोजा। ऐसी तीन लाख से अधिक पांडुलिपियाँ, ताड़पत्र, भोजपत्र पर अंकित सैकड़ों साल पुराना वो ज्ञान, आज कोबा में सुरक्षित और संकलित हुआ है। ये भारत के अतीत की, भारत के वर्तमान की और हमारे भविष्य की बहुत बड़ी सेवा है।

साथियों,

पुरानी सरकारों ने पाण्डुलिपियों की उपेक्षा करके जो गलती की थी, आज हम उसका सुधार कर रहे हैं। हमने इसके लिए ‘ज्ञान भारतम मिशन’ शुरू किया है। इस काम में हम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस मिशन के तहत, प्राचीन पाण्डुलिपियों का डिजिटाइजेशन किया जा रहा है, उनका वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण हो रहा है। स्कैनिंग, केमिकल ट्रीटमेंट और डिजिटल संग्रह जैसे सभी प्रयास इस दिशा में हो रहे हैं। इसी रविवार को ‘मन की बात’ में मैंने विस्तार से जिक्र किया है कि कैसे इस दिशा में एक सर्वे भी शुरू किया गया है। इसमें देशभर से लोग अपने पास संरक्षित पाण्डुलिपियों को अपलोड कर रहे हैं। ये अभियान देश के कोने-कोने में बिखरी पाण्डुलिपियों को एकत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

 

साथियों,

सरकार के स्तर पर ‘ज्ञान भारतम मिशन’ और कोबातीर्थ का असाधारण योगदान, समाज और सरकार के ये साझा प्रयास भारत के नए सांस्कृतिक अभ्युदय का प्रतीक भी हैं।

साथियों,

आज देश के कल्चरल हेरिटेज को सहेजने, विश्व के सामने लाने के प्रयास हर स्तर पर हो रहे हैं। पाण्डुलिपियों और ज्ञान धरोहर के संरक्षण का कार्य तो हो ही रहा है। इसके साथ-साथ प्राचीन मंदिरों का पुनरुद्धार, तीर्थक्षेत्रों का विकास, ऐतिहासिक स्थलों का विकास, आयुर्वेद और योग का प्रचार-प्रसार, हर स्तर पर इस दिशा में काम हो रहा है। यहां गुजरात में ही लोथल में विशाल मेरीटाइम म्यूजियम बन रहा है, और ये दुनिया का सबसे बड़ा मेरीटाइम म्यूजियम बनने जा रहा है, यहां से 70-80 किलोमीटर दूरी पर है। उधर वडनगर में एक बहुत बड़ा म्यूजियम बना है, वो दुनिया के अच्छे म्यूजियमों में, उसकी जगह बन चुकी है। दिल्ली में ‘युगे युगीन भारत’ म्यूजियम बनाने की भी तैयारी है। आज पहली बार, आज़ादी की लड़ाई के इतिहास को भी समग्र रूप में सामने लाने के लिए सार्थक कार्य हुये हैं। आपको याद होगा, पहले ये काम राजनैतिक चश्मे से होते थे, एक राजनैतिक परिवार का नैरेटिव कैसे सेट हो, वोटबैंक के हिसाब से बातें कैसे बोली जाएँ, सबकुछ इसी के इर्द-गिर्द घूमता था। हमने इस मानसिकता को समाप्त किया है। हम ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र के साथ चल रहे हैं। यही मंत्र विकसित भारत के विज़न की आत्मा है।

साथियों,

आप सभी संतगण भारत की विरासत को संजोने का इतना महान प्रयास कर रहे हैं। हम व्यक्तिगत आकांक्षा से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लक्ष्यों के लिए काम करते हैं, तो देश के विकास को गति और मिल जाती है। इसी भावना के साथ मैं नवकार महामंत्र दिवस पर दिल्ली में हुए कार्यक्रम में भी शामिल हुआ था। इस आयोजन में चारों फिरके एक साथ जुटे थे। उस ऐतिहासिक अवसर पर मैंने नौ आग्रह किए थे, नौ संकल्पों की बात की थी, और जिसका उल्लेख अभी-अभी हमारे मुख्यमंत्री भूपेंद्र भाई ने भी किया। मैं हर बार आपके सामने वो नौ संकल्प जरूर दोहराता हूं। आज का ये अवसर उन्हें फिर से दोहराने का भी है। पहला संकल्प- पानी बचाने का संकल्प। दूसरा संकल्प- एक पेड़ माँ के नाम। तीसरा संकल्प- स्वच्छता का मिशन। चौथा संकल्प- वोकल फॉर लोकल। पांचवा संकल्प- देश दर्शन। छठा संकल्प- नैचुरल फार्मिंग को अपनाना। सातवां संकल्प- हेल्दी लाइफस्टाइल को अपनाना। आठवां संकल्प है- योग और खेल को जीवन में लाना। नवां संकल्प है- गरीबों की सहायता का संकल्प, और दसवां संकल्प आप सभी ने स्वयं से जोड़ लिया है, और वो है- भारत की विरासत का संरक्षण। आज का ये कार्यक्रम इसी का प्रतिबिंब है।

साथियों,

आने वाले समय में हमारे सामने बड़े लक्ष्य हैं, हमें बड़े संकल्पों को पूरा करना है। हमारी एकता, हमारे ये सांस्कृतिक संबल ही, इसमें हमारी ताकत बनेगा। मुझे विश्वास है कि सम्राट संप्रति म्यूजियम आने वाले समय में इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह ज्ञान, साधना और संस्कृति का एक ऐसा केंद्र बनेगा, जहां से नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी और समाज को एक नई ऊर्जा मिलेगी। इसी विश्वास के साथ, मैं आप सभी को इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए एक बार फिर से बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

और साथ ही साथ सभी को आग्रह भी करता हूं कि महाराज साहेब ने तो यह सब किया है, लेकिन हम इसको देखने के लिए भी समय नहीं देंगे, तो कैसे चलेगा? ज्यादा से ज्यादा लोग यहाँ आएं और देख के चले जाए, ऐसा नहीं, जानने का प्रयत्न करें, समझने का प्रयत्न करें, ये एक अमूल्य खजाना है। और मैं चाहता हूं कि गुजरात में सभी पीढ़ी के लोग परिवार के साथ यहाँ आएं, इसे मन भरके देखें, ज्ञान और महान विरासत का गौरव करें। और मेरे लिए आज ये महावीर जयंती, कई तरीकों से शुभ है, क्योंकि यहाँ गांधीनगर में आते ही, गुजरात की धरती पर पैर रखते ही पहला कार्यक्रम जड़ों से जुड़ना है, और यहाँ से अभी साणंद जाऊंगा, वहाँ दूसरा कार्यक्रम है, जगत से जुड़ना। यहाँ महान सांस्कृतिक परंपराएं, भव्य भूतकाल, उसके साथ आचमन लिया, और साणंद में जाकर, विश्व की अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी चिप्स के निर्माण का उद्घाटन हो रहा है, सेमीकंडक्टर का उद्घाटन हो रहा है । यहाँ जड़ों से जुड़ना है और वहाँ से जग को जोड़ना है, और यह सब गुजरात की धरती पर हो रहा है, भारत की धरती पर हो रहा है । आप सभी को बहुत-बहुत शुभकानाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

जय जिनेन्द्र !

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Prime Minister attends the Defence Investiture Ceremony 2026 (Phase-1)
June 08, 2026

Prime Minister Shri Narendra Modi today attended the Defence Investiture Ceremony 2026 (Phase-1) where Gallantry Awards were conferred upon our brave personnel.

The Prime Minister expressed pride in their extraordinary courage, commitment and selfless service to the nation.

The Prime Minister posted on X:

"Attended the Defence Investiture Ceremony 2026 (Phase-1) where Gallantry Awards were conferred upon our brave personnel. We are proud of their extraordinary courage, commitment and selfless service to the nation."