I would like to begin by acknowledging the traditional owners of this land on which we stand today and pay my respect to their elders in past and present.

यहां उपस्थित, यहां के सामाजिक, राजनीतिक जीवन के सभी महानुभाव और मेरे प्यायरे देशवासियों,

यह स्वागत, यह सम्मान, यह उत्साह, यह उमंग, इसका हकदार मोदी नहीं हैं। सवा सौ करोड़ देशवासी यह उनके हकदार हैं। यह स्वागत, यह सम्मान, यह प्यार भारत माता के उन सवा सौ करोड़ संतानों के चरणों में समर्पित करता हूं। मैं देख रहा हूं कि बहुत लोग अभी बाहर हैं अंदर आ ही नहीं पाए। यह जो, ये जो नजारा सिडनी में दिखाई दे रहा है। यह नजारा पूरे हिंदुस्तान को आंदोलित कर रहा है।

कभी स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों को याद करते हैं, तो हम कल्पना नहीं कर सकते कि हमारे यह महापुरूष कितने दीर्घदृष्टा थे। आजादी के पहले ठीक 50 साल पहले स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि 50 साल के लिए भारत के लोग अपने देवी-देवताओं को भूल जाएं। कोई कल्पना कर सकता है कि एक संन्यासी और जो खुद आध्यात्मिक जीवन को लेकर के चल पड़ा था। जिसने गुरूदेव रामकृष्ण परमहंस को अपना जीवन आहूत कर दिया था, जिसके लिए ईश्वर साक्षात्कार जीवन का मकसद रहा था, वो संन्यासी देश आजादी के 50 साल पहले कह रहा है, 50 साल के लिए आप अपने देवी देवताओं को भूल जाओ और सिर्फ, सिर्फ भारत माता की पूजा करो। दुनिया में फिर एक बार भारत माता की जय करो। उस महापुरूष के शब्दों के ताकत देखिए। ठीक उस 50 साल के बाद भारत आजाद हो गया।

मेरी तरह यहां बहुत लोग ऐसे है जिनका जन्म आजाद हिंदुस्तान में हुआ है और यह मेरा सौभाग्य है कि मैं पहला ऐसा प्रधानमंत्री हूं जो आजाद हिंदुस्तान में पैदा हुआ है और तब जाकर के मुझे ज्यादा ही जिम्मेदारी का एहसास होता है, क्योंकि मेरे जैसे आप में से बहुत लोग हैं जो आजाद हिंदुस्तान में पैदा हुए हैं। हमें देश की आजादी के लिए लड़ने का सौभाग्य नहीं मिला है। हमें भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए फांसी के तख्तं पर चढ़ने का नसीब नहीं हुआ है। हमें भारत के सम्मान और गौरव के लिए जेल की सलाखों के पीछे अपनी जवानी खपाने का सौभाग्य नहीं मिला है और हमारे भीतर एक दर्द होना चाहिए, एक कसक होनी चाहिए कि हम आजादी की जंग में नहीं थे। हम देश के लिए मर तो नहीं सके, लेकिन आजादी के बाद पैदा हुए हैं, तो देश के लिए जी तो सकते हैं। हर किसी के नसीब में देश के लिए मरना नहीं होता है। देश के लिए जीना हर किसी के नसीब में होता है और इसलिए हमारा संकल्प रहना चाहिए। हम जीएंगे तो भी देश के लिए, जूझेंगे, तो भी देश के लिए और यही भाव आज सवा सौ करोड़ देशवासियों के दिल में जगा है।

आजकल तो हिंदुस्तान से रात को निकले सुबह ऑस्ट्रेलिया पहुंच जाते हैं लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को यहां आने में 28 साल लगे हैं। मैं आपको विश्वास दिलाने आया हूं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले मेरे देशवासियों अब आप को कभी 28 साल इंतजार नहीं करना पड़ेगा। जितना हक हिंदुस्तान में रहने वाले हिंदुस्तानियों का है, उतना ही हक यहां पर रहने वाले मेरे देशवासियों का है। सिडनी खूबसूरत शहर है, ऑस्ट्रेलिया एक खूबसूरत देश है और न ऑस्ट्रेलिया और न ही इंडिया क्रिकेट के बिना जी सकते हैं; क्रिकेट ने हमें जोड़ा है। लेकिन इससे पहले हमारी ऐसी सांस्कृतिक विरासत रही है, इतिहास की ऐसी घटनाएं रही है जिसने हमें अटूट रूप से जोड़ा हुआ है और ऑस्ट्रेलिया-भारत common value को share करते हैं। लोकतंत्र हम दोनों देशों की धरोहर है और विश्व लोकतांत्रिक शक्तियों को आज गौरव के भाव से देखता है। भारत के दीर्घदृष्टा महापुरूषों का यह बहुत बड़ा योगदान रहा कि आजाद हिंदुस्तान में लोकतंत्र की मजबूत नींव हमारे पूर्व के सभी महापुरूषों ने डाली और उसी का परिणाम है और लोकतंत्र की ताकत देखिए; अगर लोकतंत्र की ऊंचाई न होती, तो क्या मैं यहां होता। भारत के लोकतंत्र की उस ताकत को हम पहचानें तो जहां सामान्यय से सामान्यर इंसान भी अगर सच्ची निष्ठा और श्रद्धा के साथ देश के लोगों के लिए जीना तय करता है तो देश उसके लिए मरना तय करता है। कभी-कभार हम शास्त्रों में पढ़ते थे कि फलाने भगवान सहस्त्रबाहू थे; एक हजार भुजाएं थी; ऐसा तो नहीं यहां लटकाई होगी। इसका मतलब यह था, उनके पास ऐसे 500 लोग थे जो 1000 भुजाओं के कारण ईश्वर भी अपनी सारी इच्छाओं को पूर्ण कर पाते थे, योजनाओं को पूर्ण कर पाते थे। परमात्मा के पास तो सहस्त्रबाहू थे, लेकिन भारत माता के पास ढ़ाई सौ करोड़ भुजाएं हैं, ढ़ाई सौ करोड़। जिस देवी के पास, जिस भारत माता के पास ढ़ाई सौ करोड़ भुजाएं हो और उसमें भी, दो सौ करोड़ भुजाएं तो 35 साल से कम आयु की है। हिंदुस्तांन नौजवान है। युवा शक्ति से भरा हुआ है। युवा के मन में, आंखों में सपने होते हैं, नेक इरादे होते हैं, मजबूत संकल्प शक्ति होती है और वे पत्थर पर लकीर करने का भी सामर्थ्य रखते हैं। और उसी के भरोसे मैं विश्वास दिलाता हूं जो स्वामी विवेकानंद ने दूसरा सपना देखा था, उस महापुरूष ने कहा था कि मैं मेरे आंखों के सामने देख रहा हूं.... जिस महापुरूष ने जीवन के अंतकाल में 50 साल के बाद जो सपना देखा वो चरितार्थ हुआ। उस महापुरूष ने दूसरा सपना देखा था और स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि मेरे आंख के सामने भारत मां का वो रूप देख हूं, उस जगत जननी का रूप देख रहा हूं, फिर एक बार मेरी भारत माता विश्व गुरू के स्थान पर विराजमान हो, वो विश्व का नेतृत्व करती होगी। वो विश्व की आशाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति का सामर्थ्य रखती होगी। मेरी स्वामी विवेकानंद जी की इस दीर्घदृष्टा पर आपार श्रद्धा है और इसलिए मैं भी विश्वास से कहता हूं कि विवेकानंद जी कभी गलत नहीं हो सकते। ऐसी ऊर्जा से भरा हुआ हमारा देश है और मैं छह महीने के मेरे बहुत अल्पकाल के समय का मेरा अनुभव है। इतने बड़े हिंदुस्तान में छह महीने कुछ नहीं होते हैं। लेकिन छह महीने के अनुभव से मैं कह सकता हूं कि देश के सामान्यन मानव ने जो सपने देखे हैं, उन सपनों को पूरा करने के लिए आशीर्वाद भारत मां दे रही है और वो सपने पूरा होने का सामर्थ्य है। मैं आपसे पूछना चाहता हूं, जो भरोसा मेरा है, आपका है क्या? आपको विश्वास है यह देश फिर से उठ खड़ा होगा? यह देश ताकतवर बनेगा? हम सामर्थ्य के साथ मानवजाति की सेवा कर पाएंगे। विश्व को संकटों से मुक्ति दिलाने का देश में सामर्थ्य होगा। अगर आपकी वाणी में जो ताकत है, वो सामान्य मानव की ताकत, वो वाणी, कभी ईश्वर की वाणी बन जाती है। वो ईश्वर के आर्शीवाद बन जाते हैं। मुझे कोई कारण नहीं लगता भाई और बहनों, कोई कारण मुझे नहीं लगता है कि हमारा देश अब पीछे रह जाए। मुझे कोई कारण नहीं लगता। नियति ने उसका आगे जाना तय कर लिया है। अब हम ढाई सौ करोड़ भुजाओं ने संकल्प करना है। कि हमारी भुजाओं से हर काम वही होगा, जो भारत मां के कल्यापण के लिए होगा। सवा सौ देशवासियों के कल्याण के लिए होगा। विश्व के दुखियारों के लिए होगा। एक बार उन संकल्पों को लेकर चलते हैं, तो उन संकल्पों की पूर्ति भी अपने आप होती है।

ऑस्ट्रे्लिया के जीवन में कोई भी भारतवासी गर्व करता है। यहां दो सौ साल पहले भारत से कुछ परिवार आए थे, दो सौ साल पहले। और भारतीयों का यहां का जीवन हर हिंदुस्तानी को गर्व करा रहा है, गर्व दे रहा है। अब ऑस्ट्रेंलिया को अपना बना लिया है। आपके वाणी से, वर्तनी से, विचार से, व्यवहार से जिन मूल्यों को लेकर के आप जी रहे हैं उसके कारण ऑस्ट्रेलिया का भी हर नागरिक हमसे अपनापन महसूस करता है और मैं मानता हूं एक भारतीय के नाते यही हमारा सबसे बड़ा दायित्व होता है कि जो हमारी कर्मभूमि हो, उस कर्मभूमि के साथ हमारा लगाव भी इतना होना चाहिए, हमारा समर्पण भी इतना होना चाहिए और जो आज हमारे भारतीय भाई-बहन ऑस्ट्रेलिया की धरती पर कर रहे हैं।

मैं यहां आने से पहले कुछ चीजें देख रहा था मुझे देखकर के इतना आनंद हुआ और मैं आज सबका उल्लेच तो नहीं कर पाऊंगा। जिनका उल्लेख रह जाए, वो मुझे क्षमा करें। वो अगर कमी है, तो मेरी कमी है। उनके पराक्रम की कमी नहीं है। आप देखिए 1964 में जो टोक्यो में ओलंपिक गेम हुआ। उसमें मूल भारतीय Bakhtawar Singh Samrai उन्होंने प्रतिनिधित्व किया था ऑस्ट्रेलिया की तरफ से। Bakhtawar ji का यह उस समय ओलंपिक टाइम में ऑस्ट्रेलिया की तरफ से एक भारतीय का प्रतिनिधित्व करना, मैं इसे छोटी बात नहीं मानता हूं। इतना ही नहीं यहां पर बहुत बड़ी तादाद में एंग्लो इंडियन रहते हैं। भारत से आए, यहां पर बसे। Julian Pearce जिनका जन्म जबलपुर में हुआ था और ओलंपिक में हॉकी को represent किया था उन्हों ने, ऑस्ट्रेलिया की तरफ से। Rex Sellers, Stuart Clark, ये दोनों एंग्लो इंडियन थे। भारत से आए थे। लेकिन ऑस्ट्रेलिया को क्रिकेट की दुनिया में उन्हों ने अपनी जगह बना दी थी, यह उनका योगदान था। Lisa Sthalekar पुणे में जन्मी और महिलाओं की क्रिकेट की दुनिया में 2013 तक 1000 रन बनाना और 100 विकेट लेने का उसका रिकॉर्ड है। एक भारतीय मूल की बेटी ऑस्ट्रेलिया की तरफ से खेल रही है। अक्षय वैंकटेश भारतीय मूल के ऑस्ट्रेलियन 12 साल की उम्र में international physics Olympiad and international maths Olympiad, उसमें विश्व में अपना डंका बजा दिया था। ऑस्ट्रेहलिया का नाम रोशन किया। यहीं के हमारे, यह सामर्थ्य वान लोग.. Mathai Varghese भारतीय मूल के थे, via अफ्रीका यहां ऑस्ट्रेलिया पहुंचे। mathematician के नाते उन्होंने अपना नाम बनाया था। Tharini Mudaliar साउथ अफ्रीका में जन्मी मूल भारतीय और actor or singer के रूप में पूरे ऑस्ट्रेलिया में जानी जाने लगी। Indira Naidoo मूल भारतीय की ऑस्ट्रेलियन एक लेखिका के रूप में, एक journalist के रूप में और यूएन में सेवाएं देने के रूप में आज भी हर भारतीय के नामों पर गर्व कर सकता है। इसके सिवा भी बहुत सारे नाम होंगे जो भारतीय मूल के लोग हैं। जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया में अपने आप को खपा दिया, ऐसा समर्पित कर दिया। ऑस्ट्रेलिया के जीवन का भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में ऑस्ट्रेलिया का नाम रोशन हो, उसमें उनका योगदान रहा है और यही हमारी ताकत है। एक भारतीयता के गौरव के लिए भारतीय होने के नाते विश्व में हम जहां हो, वहां के लोगों का हम प्रेम सम्पादन करें। मिलजुल कर अपने जीवन को बनाने में, हम उनका योगदान करें। हमारे पास जो श्रेष्ठ है, वो जगत को काम आए और उसी के लिए माध्यम बने और भूमिका से जो आप भूमिका अदा कर रहे हैं। इसलिए मैं आप सबको हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं आप सबका बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं।

मुझे मालूम है, चुनाव तो हिंदुस्तान में चल रहे थे। आप की उंगली पर तो टीका लगने वाला नहीं था। आपका तो मतदान होना नहीं था। लेकिन मुझे मालूम है वो चुनाव का कोई पल ऐसा नहीं था,जिससे आप जुड़े नहीं थे। कोई परिवार ऐसा नहीं था, जब चुनाव के नतीजे आने वाले थे, उस रात तय करके बैठा था, अब तो सोना नहीं है। यह जो भारत में राजनीतिक परिवर्तन के लिए विश्व भर में फैले हुए भारतीय समुदाय का जो उमंग था। वो उमंग कौन जीते, कौन हारे इसके लिए नहीं था। किसकी सत्ता बने, किसकी न बने, इसके लिए नहीं था। उसके दिल में एक दर्द था, एक आग थी, पीढ़ा थी कि मैं दुनिया में जहां बैठा हूं, मेरा देश कब ऐसा बनेगा। उसके लिए चुनाव उज्जवल भारत के भविष्य के सपनों से जुड़ा हुआ था। उसके लिए चुनाव राजनीतिक उठा-पटक का खेल नहीं था। जय और पराजय का खेल नहीं था। उसके दिल में तो एक ही आवाज थी भारत माता की जय। उसके मन में एक ही भाव था भारत माता की जय और भारत माता की जय का मतलब होता है- भारत के जो कोटि-कोटि लोग जो आज भी गरीबी में जिंदगी गुजार रहे हैं, कितने परिवार है, जिनको आज बिजली तक मुहैया नहीं है। आजादी के इतने सालों के बाद पीने का शुद्ध पानी न मिले, बिजली मुहैया न हो, इतना ही नहीं शौचालय तक नहीं है। कई लोगों के मन में बहुत बड़े-बड़े काम करने के सपने होते हैं। वो सपने उनको मुबारक। मुझे तो छोटे-छोटे काम करने हैं, छोटे-छोटे लोगों के लिए करने है और छोटे लोगों को बड़ा बनाने के लिए करने हैं।

आप कल्पना कर सकते हैं, आज के युग में बैंकिंग सिस्टम से अलग रह करके अर्थ कि, आर्थिक व्य़वस्था की मुख्यधारा के बाहर रहकर के कोई आर्थिक विकास में भागीदार बन सकता है क्या? हर किसी के लिए bank account इतनी सामान्य बात है। हमारे देश में बैंकों राष्ट्रीयकरण हुआ था और यह सपना देखा गया था गरीब से गरीब व्यक्ति बैंक में जा पाएगा। आपने भी किसी गरीब को बैंक में नहीं देखा होगा। जब हिंदुस्तान में थे कभी देखा था।

अब मैंने सपना देखा है कि मैं चाहता हूं, गरीब का बैंक में खाता हो। मैंने प्रधानमंत्री जनधन योजना बनाई, क्योंकि मैं चाहता हूं कि देश भी आर्थिक विकास यात्रा में गरीब से गरीब का हिस्सा जुड़ना चाहिए, वो इस व्यवस्था के साथ परिचित होना चाहिए, उसे कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए। करीब 75 मिलियन लोग जिनका बैंक अकाउंट है उन परिवारों की मैं बात कर रहा हूं। व्यक्ति नहीं परिवार। एक परिवार में पांच लोग गिने तो आप अंदाज कर सकते हैं कि कितनी बड़ी संख्या होगी।

मैंने रिजर्व बैंक से कहा कि यह काम करना है। कर सकते है क्या? रिजर्व बैंक ने कहा कि मोदी जी हो तो सकता है, लेकिन.... अब प्रधानमंत्री को मना तो कोई करता नहीं। लेकिन उनको तरीके मालूम होते हैं। उन्होंने कहा तीन साल लगेंगे। मैंने कहा भाई तीन साल के बाद क्या सूरज कम उगेगा। मैंने हमारे वित्त मंत्रालय को पूछा, मैंने कहा कि भाई यह काम करना है बताओ क्या करोगे, रिजर्व बैंक तो तीन साल कह रही है। बोले नहीं-नहीं दो साल में कर देंगे। उनको लगा अब मोदी जी खुश हो जाएंगे। वो तीन कह रहे थे तो हमने दो कह दिया तो गाड़ी चल पड़ेगी। मैंने मेरे आफिस के लोगों को बुलाया, पीएमओ को। मैंने कहा भाई यह रिजर्व बैंक कह रही है तीन साल, डिपार्टमेंट कह रहा है दो साल.. आप क्या कह रहे हैं। मैंने कहा बोले एक साल तो लगेगा। अब हमने सबको सुन लिया और हमने कहा, 15 अगस्त को लालकिले पर से बोल दिया, मैंने कहा मुझे यह काम डेढ़ सौ दिन में पूरा करना है।

पिछले 68 years में एक साल में औसत एक करोड़ बैंक अकाउंट खुलते थे, 10 मिलियन। हमने ठान ली कि काम करना है। Last Ten week में Ten week में 71 मिलियन account खुल चुके। सरकार वो ही, मुलाजिम वही, दफ्तर वही, फाइल वही, आदत वही, लोग भी वही। काम हुआ कि नहीं हुआ। हो सकता है कि नहीं हो सकता। इतना ही नहीं देश के गरीब लोगों की ईमानदारी देखिए। देश के गरीबों की ईमानदारी देखिए और मैं आज उनका इस धरती से प्रणाम करता हूं। हमने कहा था मुझे गरीबों का Bank account खोलकर के मुख्य धारा में लाना है। अब उसके पास तो बेचारे को बैंक खाता खोलने के लिए पांच रुपये दस रुपया भी नहीं है। तो हम ने नियम बनाया जीरो balance से Bank account खुलेगा। लेकिन आप सब गर्व कर सकते हो। account खोलना था ऐसे गरीब परिवार के लोगों ने, मन में सोचा- नहीं, नहीं मुफ्त में क्यों कर रहे हैं। बोले मोदी जी ने तो कह दिया, ऐसा नहीं करेंगे। हमारा भी कोई जिम्मा होता है और मेरे दोस्तों आपको जानकर के खुशी होगी कि 70 मिलियन जो Bank Account खुले हैं Ten week में खुले हैं। पांच हजार करोड़ रुपये इन्होंने जमा कराए। five thousand crore rupees... किसी ने सौ रूपया, किसी ने दो सौ रूपया, उसको लगता है कि मैं मुख्य धारा से जुड़ रहा हूं।

मेरा कहने का तात्पर्य यह है दोस्तों कि एक बार.. हम हमारे देश के लोगों की ताकत को कम न आंके, हमारे देश की व्यवस्थाओं की ताकत को कम न आंके, हम व्यवस्थाओं पर भरोसा करें, देशवासियों पर भरोसा करें और उनको सही दिशा में ले जाने के लिए अगर उंगली पकड़कर के चलने की कोशिश करें, वो हमसे भी आगे दौड़ने के लिए तैयार होते हैं। मैंने उनको कहा है 26 जनवरी फाइनल डेट। पूरा करना है काम। लगे है। सारे बैंक employee लगे हुए हैं। काम कर रहे हैं।

02 अक्तूरबर से मैंने काम उठाया है – “स्वच्छ भारत” का। आप मुझे बताइये, दुनिया के किसी भी देश में जाते हैं और वहां की स्वच्छता देखते हैं तो सबसे पहले हमारे देश के गली-मोहल्ले याद आते हैं कि नहीं आते। हम यहां आकर के कभी गंदगी करते हैं क्या? लेकिन भारत में जाते ही.. ये सिर्फ व्यावस्थाओं के कारण ही समस्याएं नहीं हैं। मैं जानता हूं कठिन काम है। महात्मा गांधी भी इस काम के लिए बहुत आग्रह करते थे लेकिन क्या बहुत कठिन काम है? क्या बिल्कुल हाथ ही नहीं लगाना चाहिए? दूर भागना चाहिए क्या? आलोचना सहने की तैयारी चाहिए कि नहीं चाहिए? भाईयों-बहनों मैंने एक बहुत बड़ा संकट मोल लिया है, जानबूझ करके मोल लिया।

जो लोग 1857 के स्व़तंत्रता संग्राम में लड़ पड़े थे, शहीद हो गए थे, उनको अपने देश की आजादी जीते जी देखने को नहीं मिली थी, लेकिन वो अगर यह सोचते कि मेरे जीते जी आजादी मिले तभी तो मैं मरने को तैयार होऊं! तो कभी आजादी नहीं मिल सकती। अगर सवा सौ करोड़ देशवासी तय करें तो दुनिया के सामने हमारी जो यह छवि बिगड़ी हुई है उसको भी बराबर साफ-सुथरा बना सकते हैं और इसलिए मैंने इस काम को उठा लिया। शौचालय बनाने में लगा हूं। बताइये! देश का प्रधानमंत्री यह काम कर रहा है – शौचालय बनाओ ! खास करके हमारी माताओं-बहनों की dignity.. गांव के अंदर आज भी खुले में शौचालय जाना पड़ रहा है, मन में दर्द होता है, शर्मिंदगी महसूस होती है। मैं आपसे भी अनुरोध करता हूं, ईश्वर ने आपको बहुत कुछ दिया होगा। आप पूंजीपति नहीं होंगे, लेकिन दो टाइम अच्छे ढंग से खाना तो जरूर खा सकते होंगे। आप भी अपने गांव में, जहां के आप मूल रहने वाले हैं, इस काम में कुछ योगदान दे सकते हैं तो जरूर दीजिए। मैं आपको निमंत्रण देता हूं। स्वच्छता जो है, वो ऐसा क्षेत्र है..क्योंकि गंदगी है, जो बीमारियों को लाती है और जब बीमारी आती है तो औसत, एवरेज एक गरीब परिवार को करीब-करीब छह से सात हजार रुपये का बोझ आ जाता है, बीमारी के टाइम। अगर हम स्वच्छता अभियान लेते हैं तो गरीबों की इससे बड़ी कोई सेवा नहीं होती है और इसलिए आपके दिल में भारत के लिए सेवा करने का कोई भी भाव आए, उस भाव का प्रकटीकरण इस स्वच्छता अभियान के माध्यम से हो सकता है।

मैं बहुत पहले जब ऑस्ट्रेलिया आया था, तब काफी मेरा मिलना-जुलना हुआ, कई बार आना हुआ है, यहां के लोगों से मिलता था, बात करता था। मुझे कई लोग पूछते थे कि ऑस्ट्रेलिया से आप क्या सीखेंगे? अब क्या कहे कि हमं ऑस्ट्रेलिया से क्या सीखना चाहिए? एक बात मेरे मन को हमेशा छूती थी, और वो थी –dignity of labour; यहां के चरित्र में है, जिस आदर के साथ वो डॉक्टर से बात करता है, उतने ही आदर से वो ड्राइवर के साथ बात करता है। कोई scientist के तौर पर काम करता है तो weekend पर ड्राइविंग करने चला जाता है और टैक्सी चलाता है। यह dignity of labour! यह ऑस्ट्रेलिया से सीखने वाला विषय है। स्वरच्छता के माध्यम से मैं इस बात को गर्व देना चाहता हूं, गौरव देना चाहता हूं, कि सफाई करना, यह कूड़ा-कचरा उठाना, यह below dignity नहीं है, बहुत इज्जत वाला काम है। भारत में हम लोगों का स्वाभाव क्या हो गया है? अगर कोई अपने घर कूड़ा-कचरा उठाने के लिए आ जाए, तो हम क्या कहते हैं, कचरा वाला आया है। हकीकत में वो कचरे वाला नहीं है, वो सफाई वाला है। लेकिन हम.. हमारे सोचने के तरीके में ऐसी गड़बड़ हो गई है, हमारी Terminology इतनी बदल गई है कि जो सचमुच में सफाई का काम करता है, उसको भी हम कचरे वाला कहते हैं। यह स्थिति बदलनी है और इसलिए .. और मैंने देखा है, आज हिंदुस्तान में उद्योग जगत के लोग हों, सिने जगत के लोग हों, शिक्षा जगत के लोग हों, राजनीति जगत के लोग हों, सबने गौरव के साथ इस काम में शरीक होने का बीड़ा उठाया है और मैं सबका अभिनंदन करता हूं। काम कठिन है। दिवाली में भी अगर अपने दो कमरे का घर भी साफ करना है तो हफ्ता निकल जाता है, तो इतना बड़ा हिंदुस्तान साफ करना है तो समय लगता है और इसलिए हमने कहा है 2019.. महात्मा गांधी की 150वीं जयंती आ रही है। महात्मा गांधी ने हमें आजादी दी है, हम गांधी को क्या दें? कम से कम साफ-सुथरा हिंदुस्तान तो उनके चरणों में धरे हम। इतना तो करें। 2019 तक इस बात को मैं आगे बढ़ाना चाहता हूं और यही चीजें हैं!

अगर बीमारी जाती है तो गरीब को फायदा होता है लेकिन स्वच्छता आती है तो Tourism इतनी तेजी से बढ़ेगा, जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। हिंदुस्तान के पास क्या नहीं है, दुनिया को देने के लिए, दिखाने के लिए। पूरे विश्व के पास जितना है, उतना अकेले एक हिंदुस्तान के पास है। हिम्मत के साथ अगर हम जुट जाएं तो लोग आ जाएंगे, लेकिन वो मिजाज भी तो चाहिए, वो दम भी तो चाहिए। अपने आप पर भरोसा भी तो होना चाहिए। इतनी पुरातन चीजें हमारे पास हैं, विश्व को हम आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन शुरूआत ही ऐसी होती है – यार! पता नहीं! .. और बात वहीं अटक जाती हैं।

दुनिया से हम इंवेस्टमेंट चाहते हैं। मेक इंडिया का अभियान लेकर के बैठे हैं। मैं चाहता हूं, विश्व भारत की धरती पर आए, मैन्यूफैक्चैरिंग सेक्टर में आए, क्योंकि हमारा मकसद एक है – हमारे देश के नौजवान को रोजगार मिले। हमारी सारी नीतियों के केंद्र बिंदु में नौजवानों के लिए रोजगार है। job creation कैसे हो? और इसके लिए हम दुनिया को कह रहे हैं – आइये, भारत में पूंजी लगाइये। जिस देश के पास इतने नौजवान हो, वो देश के नौजवान अपने कौशल के द्वारा, अपने सामर्थ्य के द्वारा दुनिया को क्या कुछ नहीं दे सकते हैं। इसलिए मेक इन इंडिया अभियान हमने चलाया है और उसके लिए नियमों में, कानूनों में, व्यवस्थाओं में बदलाव ला रहे हैं। Good Governance सबसे बड़ी आवश्यकता है, लेकिन पूंजी निवेश के लिए भी कोई आएगा तो सबसे पहले उसके साथ जो लोग आते हैं, CEO आएगा, Top Managers लाएगा और Managerial skills वाले पूछते हैं quality of life का क्या है।

मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था, तो हम चाहते थे कि जापान हम से जुड़े, जापान के लोग हमारे यहां आएं। हमारे ध्यान में आया कि बाकी सब होगा, लेकिन golf नहीं होगा तो जापान नहीं आएगा। अब गुजरात वालों को गिल्ली-डंडा मालूम है, golf मालूम नहीं। आखिरकार हमने प्राइवेट पार्टी को कहा कि भई golf के लिए कोई व्यवस्था करो अब, मुझे investment चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी पूंजी निवेश के लिए आता है, तो वो उसके अपने लोगों के लिए, managerial लोगों के लिए quality of life चाहता है। यह भारत की जिम्मेदारी बनती है कि वो उस quality of life के लिए लोगों को ऑफर करे, ताकि पूंजी निवेश के साथ उसके जो लोग आएं, उनके जीवन को भी एक स्तर से रहने का अवसर मिले, अच्छी शिक्षा मिले, अच्छी Health care मिले, अच्छा जीवन जीने का अवसर मिले, यह सारी चीजें जुड़ी हुई है। हम सिर्फ सरकार की नीतियां बनाए और लोगों को कहें कि यह टैक्स, फ्री करेंगे, वो फ्री करेंगे, यह मुफ्त में देंगे, आप आ जाइये, दुनिया आती नहीं है, उसके लिए व्यवस्थाएं विकसित करनी पड़ती है, environment बनाना होता है। मेक इन इंडिया हमने उस दिशा में प्रयास शुरू किया है।

भारत की रेल पर हम सब गर्व कर सकते हैं। लेकिन वहीं अटकी पड़ी है। न नया एक किलोमीटर रेल की पटरी डाली जाती है, न उसकी स्पीड बढ़ती है, न पैसेंजरों के लिए जगह बढ़ती है। पैसेंजर बढ़ रहे हैं, तो अंदर नहीं, तो ऊपर बैठते हैं। क्या इन स्थितियों के उपाय नहीं है क्या? उपाय हैं। बड़ी हिम्मत के साथ हमने निर्णय किया है, रेलवे में 100% Foreign Direct Dnvestment लाएंगे। दुनिया में जो लोग इसके जानकार हैं, मैं निमंत्रित करता हूँ; आएंगे। भारत में रेलवे के विस्तार के लिए इतनी संभावना है, रेलवे के विकास के लिए इतनी संभावना है, रेलवे में Technology upgradation की इतनी संभावना है और सवा सौ करोड़ देशवासियों का मार्केट! छोटी बात नहीं है। दुनिया में कई देश ऐसे हैं, जहां रेलवे होगी, passenger नहीं मिलते होंगे जी।

मेरा कहने का तात्पर्य यह है मित्रों कि हम नीतिगत बदलाव ला रहे हैं, जिन बदलावों के कारण भारत के सामान्य मानव, के जीवन में बदलाव के लिए, विकास की नई ऊंचाईयों को पार करने के लिए हम आगे बढ़ेंगे। अब इतना बड़ा रेलवे का नेटवर्क है, लेकिन रेलवे में आज तक क्या होता था? जिसको भी नौकरी चाहिए, अखबार में advertisement आता है, वह apply करता था। apply करने के बाद रेलवे वाले उसको छह महीना, एक साल ट्रेनिंग देते थे। आप जानते हैं कि सरकारी स्तर पर training होती है तो फिर क्या। होता है, फिर वो रेलवे में नौकरी पर लग जाता था तो फिर वो रेलवे का क्या हाल होता होगा। हमने कहा कि रेलवे अपनी खुद चार युनिवर्सिटी बनाए, जिसको रेलवे में नौकरी करनी है वो युनिवर्सिटी में पढ़ाई करे और पढ़ाई के दरम्यान ही उसके अंदर वो ताकत आ जाए कि वो उत्तंम से उत्तम रेलवे की सेवा करे, Technology up gradation हो, रेलवे का expansion हो ।

At the same time, Human Resource Development भी होना चाहिए। इस के लिए जो एक और काम हमने उठाया है। दुनिया को बहुत बड़े work force की जरूरत होने वाली है। आज जो दुनिया तेज गति से दौड़ रही है ना, वो बुढ़ापे में आ गई है। आज दुनिया के कई देश है, जिसके पास आर्थिक सामर्थ्य है लेकिन work force नहीं हैं और सिर्फ Technology के माध्यम से जीवन संभव नहीं है। कितनी ही Technology लाएं लेकिन proper work force की जरूरत हरेक को रहने वाली है और हम भाग्यवान हैं। सारी दुनिया को जितनी work force की जरूरत है वो पहुंचाने के लिए हमारे लोगों ने भरपूर काम किया है। लेकिन वो अधूरा है। skill development आवश्यक है, skill development नहीं होगा.. विश्व को जिस प्रकार के work force की जरूरत है उस work force के लिए हम अभी से plan नहीं करते। हम दुनिया का मैपिंग करना चाहते हैं कि 2020 में किस देश में किस प्रकार के लोगों की जरूरत पड़ेगी। नर्सिंग, आज भी दुनिया को जरूरत है, maths and science के Teacher, आज भी दुनिया को जरूरत है। क्या भारत वहां से डायमंड भी export करें क्या? James and jewelry भी export करें क्या? आलू टमाटर भी export करें क्या? अगर हम दुनिया में best quality के टीचर export करते हैं, पूरी दुनिया को हम अपनी बना सकते हैं। सारे विश्व को इसकी जरूरत है। सारे विश्व को best quality teachers की जरूरत है, लेकिन उसके लिए Human Resource Development पर ध्यान भारत में देना पड़ता है। पांच साल लगें, दस साल लगें, 15 साल लगें लेकिन ऐसी मानव ताकत को तैयार करें जो विश्व की जरूरतों की पूर्ति के लिए हो। हमारे नौजवान को रोजगार मिलेगा। विश्वर का कल्याण होगा और भारत की जय-जयकार होगी।

विकास की नई ऊंचाईयों को अगर पार करना है, मेरे नौजवान साथियों भारत में अपना पूरा ध्यान भारत की युवा शक्ति पर केंद्रित करने की जरूरत है। युवा शक्ति के भरोसे, उनके सामर्थ्य के भरोसे, उनके talent के भरोसे दुनिया के अंदर भारत का लोहा मनवाने के लिए सामर्थ्यवान बन सकते हैं।

अब दुनिया जमीनी लड़ाई से चलने वाली नहीं है। हार जीत जमीनी लड़ाईयों से नहीं होने वाली। वो समय बीत चुका है। अब बाहुबल से नहीं, दुनिया बुद्धिबल से चलने वाली है। धनबल से भी ज्याहदा बुद्धिबल काम करने वाला है और उसके लिए सामर्थ्यवान नागरिकों को तैयार करना, सामर्थ्यवान नागरिकों के भरोसे विश्व की आवश्यकताओं को ध्याक में रखते हुए, भारत को अपने आप को सजग करना होगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं मेरे भाइयों-बहनों मैं जानता हूं, यह प्यार, यह आशीर्वाद, यह जय जयकार, इसके भीतर अपेक्षाएं पड़ी हैं, आकांक्षाएं पड़ी हैं लेकिन आपका सपना मेरा सपना है। आपकी इच्छाएं-आकांक्षाएं मेरी इच्छाएं-आकांक्षाएं हैं। आप जिस रूप में भारत को देखना चाहते हैं, मैं भी उसी रूप में भारत को बनाना चाहता हूं। फर्क इतना है कि पहले लगता था कि सरकारें देश बनाएंगी, मैं मानता हूं कि सरकारें देश नहीं बना सकती और नहीं बनाना चाहिए। देश बनता है देशवासियों के कारण, देश बनता है देशवासियों की शक्ति के कारण और अगर हम देशवासियों को अपनी शक्ति का भरपूर उपयोग करने का मौका दें, रूकावटें न डाले, सरकार इतना ही करें न.. हट जाए। आपको हैरानी होगी, पहले की सरकारें इस बात का गर्व करती थीं कि हमने यह कानून बनाया, हमने ढिकना कानून बनाया, हमने फलाना कानून बनाया, आपने सुना होगा सब चुनावों में। मेरी गाड़ी उलटी है। उनको कानून बनाने में मजा आता था, मुझे कानून खत्म करने में आनंद आता है। ऐसा बोझ बना दिया, ऐसा बोझ बना दिया है.. अरे जरा खिड़की खोलो भाई! लोगों को जीने दो! खुली हवा मिलने दो, खिलने लगेगा देश। इसलिए मैं कहता हूं कि देश के नागरिकों पर मुझे भरोसा है, नागरिकों के सामर्थ्य पर भरोसा है और उन्हीं के भरोसे देश आगे बढ़ने वाला है, सरकारों के भरोसे देश नहीं चल सकता है और न चलना चाहिए, इस विचार का, मैं इंसान हूं।

आप लोग जब यहां आएं होंगे, आप जब पढ़ते होंगे तो आपको अपनी Mark- sheet को certify कराने के लिए किसी politician के पास मोहर लगवाने जाना पड़ा होगा, किसी गजेटेड ऑफिसर के यहां जाना पड़ा होगा। सुबह कतार लगी होगी उसके घर के सामने और कोई पहचान के बिना काम होता नहीं है। यह सब आपने अनुभव किया होगा। मेरी समझ में नहीं आता है कि जीरोक्स। का जमाना है, क्या वो गजेटेड ऑफिसर या वो कॉरपोरेटर या वो MLA.. क्या वो certify करे तभी हम सच्चे हैं? लेकिन अंग्रेजों के जमाने से यह चल रहा था, मैंने आ करके निकाल दिया। मैंने कहा भई, तुम खुद ही लिख दो कि यह मेरा है, मैं मान लूंगा। अरे! सवा सौ करोड़ देशवासियों पर भरोसा तो करो, भई! अपनों पर हम भरोसा नहीं करेंगे, तो अपने हम पर भरोसा क्यों करेंगे। मैंने उन सारे नियमों को निकाल दिया। हां! जब नौकरी लगेगी तो तुम original certificate ला करके दिखा देना, बात पूरी हो गई।

कहने का तात्पर्य यह है कि हम हमारे देशवासियों पर विश्वास करें। आशंकाएं न करें। अपने आप ही माहौल बदलना शुरू हो जाता है। अगर मैंने गरीबों पर भरोसा न किया होता, तो मेरे गरीब हिंदुस्तान के बैंकों में पांच हजार करोड़ रुपया नहीं लगाते दोस्तो!

इसलिए हम भरोसा कर करके, समाज की शक्ति को जोड़ करके, देशवासियों की ताकत को जोड़ करके, हम देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हमारा किसान सुखी हो, हमारी माताओं-बहनों को सम्मान मिले, गौरव से जीएं, हर क्षेत्र में dignity.. अभी मैंने एक प्रोग्राम लॉन्च किया है – श्रमेव जयते! हम सत्यमेव जयते से तो परिचित थे, मैंने कहा – श्रमेव जयते... dignity of labour , इसको बहुत आगे बढ़ा रहा हूं।

लेकिन मुझे विश्वास है भाइयों कि आपने जो मुझे प्यार दिया है उस प्यार के माध्यम से कुछ जानकारी आपको दे दूं, ताकि.. कुछ बात, आपके लिए भी बात होनी चाहिए न। आपकी भी शिकायत होगी साहब, embassy में कोई पूछता नहीं है, कोई फोन नहीं उठाता, ईमेल करते हैं तो कोई जवाब नहीं देता हैं और फिर.. छोड़ो यार! मोदी जी आए, लेकिन कुछ हुआ नहीं। यही होता है न। निराशा इतनी है, इतने बुरे दिन देखे हैं कि मन में यह होता है कि यार.. लेकिन व्यवस्थाएं बदली जा सकती है। एक निर्णय - मैं जब अमेरिका गया था, तो मैंने कुछ बातें कही थीं, लेकिन उस समय Medison Square में जो बातें कही थीं, वहां जो लोग इक्ट्ठे हुए थे, उनको भरोसा नहीं था, क्यों कि मेरे पहले भी बहुत लोग बोल करके गए होंगे। दूध का जला छांछ फूंक कर पीता है लेकिन भाइयों बहनों मैंने अमेरिका में जो कहा था, मैंने आ करके उसको एक के बाद एक लागू करना शुरू कर दिया। जिनके पास पीआईओ कार्ड है, उन सबको आजीवन वीजा मिल जाएगा। अब, embassy वाले ने फोन उठाया, नहीं उठाया, ईमेल का जवाब दिया, नहीं दिया, हम गए तब मिला, नहीं मिला- सब दूर। एक और काम है, क्योंकि यह झगड़ा चल रहा है कि पीआईओ को वो ले करके चले या ओसीआई उसको ले करके चले.. तो ओसीआई वाला और पीआईओ वाला, दोनों के यहां अलग-अलग treatment होती है। मैंने वहां घोषणा की थी कि हम दोनों को एक कर देंगे।

इस बार प्रवासी भारतीय दिवस अहमदाबाद में होने वाला है। इस बार के प्रवासी भारतीय दिवस का विशेष महत्व होने वाला है। 1915, जनवरी महीने में महात्मा गांधी साउथ अफ्रीका से भारत वापस आए थे। एक प्रवासी भारतीय के रूप में साउथ अफ्रीका से 1915, जनवरी में महात्मा गांधी वापस आए थे। महात्मा गांधी का हिंदुस्तान वापस आने को 2015, जनवरी में 100 साल पूरे हो रहे है। इसलिए प्रवासी भारतीय दिवस में महात्मा गांधी की शताब्दी मनाए जाने का अवसर है और विश्व में रहने वाले हर भारतीय को.. जैसे महात्मा गांधी के दिल में देश के लिए कुछ करने की ललक थी, यह ललक हर हिंदुस्तानी के दिल में, वो दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो, वो जलती रहे, जगती रहे। इस तरह इस योजना को आगे बढ़ाते हुए.. इसलिए यह पीआईओ और ओसीआई को एक करने का तय किया है कि 8-9 जनवरी, 2015 जब प्रवासी भारतीय दिवस होगा, उसके पहले मेरी सरकार इस काम को पूरा कर देगी। तारीख के साथ बता रहा हूं मैं।

पहले हमारे यहां से जो लोग आते थे, आप लोगों को पता होगा, पुलिस थाने जाना पड़ता था कि मैं ‘वही’ हूं और यह पुलिस वाला तय करता था कि अच्छा़, अच्छा ‘वही’ हैं आप। क्या‘–क्या.. मैं हैरान हूं जी! हमने तय कर दिया है किसी को जाना नहीं पड़ेगा। छुट्टी! और इसको लागू कर दिया है। कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसी चीजें बना करके रखी है.. और इस तरह से मैंने मुक्ति का अभियान चलाया है भाईयों। सिडनी में, हमारी embassy का एक हिस्सा यहां भी है, वहां का cultural center, आज ही मैंने सूचना दी है, फरवरी तक मैं उसको functional करना चाहता हूं और यह होगा!

एक मेरी वेबसाइट है, आप में से किसी को interest हो तो mygov.in अगर शिकायत हो तो लिखिए उस पर। सुझाव है तो भी लिखिए और आप देश के लिए कुछ करना चाहते हैं तो भी लिखिए। फरवरी में यह cultural center शुरू हो जाए, इसके लिए मैं आगे बढ़ने वाला हूं।

एक और महत्वपूर्ण निर्णय करना है, जो शायद आपको.. भारत में जो Tourism बढ़ाने के लिए हम चाहते हैं, हम भी ऑस्ट्रेलिया के नागरिकों को कह सकते हैं –Visa on Arrival. यह सुविधा बहुत जल्द आपको प्राप्त हो जाए, उस दिशा में हम काम कर रहे हैं।

मैंने काफी समय ले लिया, मैं समझता हूं। आप लोग special train ले करके आए हैं। कोई कल्पना कर सकता है! आज working day! और यह जमावड़ा! ऊपर तो मेरी नजर भी नहीं पहुंच पा रही है। मैं आपके प्यार के लिए बहुत-बहुत आभारी हूं और यह आशीर्वाद बने रहें, प्यार बना रहे।

मैं आपको विश्वास दिलाता हूं, मैं परिश्रम करने में कोई कमी नहीं रखूंगा। ईश्वर ने जितनी बुद्धि, समय, शक्ति दी है वो आपको समर्पित है, देशवासियों को समर्पित है। लेकिन यह निश्चित है कि हम सबको मिलकर देश को बनाना है। देश ने हमें बहुत कुछ दिया है। हमें भी देश को कुछ देना है। आज हम जो कुछ भी है, किसी न किसी गरीब की कृपा है, तब हम यहां है, हमने उसे लौटाना है। ईश्वर भी प्रसन्न होता है, जब हम किसी के काम आते हैं।

मैं फिर एक बार, इतनी बड़ी संख्या में आप आए, सम्मान दिया, प्यार दिया, मैं आपका बहुत बहुत आभारी हूं। मेरे साथ आज पूरी ताकत से बोलिए और मेरा भी मन करता है कि बोल लूं– भारत माता की जय! भारत माता की जय!

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July 09, 2026

I would like to begin by acknowledging the traditional owners of the land on which we meet and I pay my respects to their elders past, present and emerging.

वणक्कम मेलबन
नमस्कार माइट्स !
कैसे हैं आप?
केम छो?

ये शो हाउसफुल है, ब्लॉक-बस्टर है।

मैं अपना भाषण शुरू करूँ इससे पहले विक्टोरिया के प्रीमियर और मेरे मित्र प्रधानमंत्रीजी के सम्मान में आप सब अपने मोबाइल फ़ोन का फ्लैशलाइट जलाके इनको सम्मानित कीजिये।

साथियों,

इससे पहले मैं दो बार सिडनी में आपसे मिला था, मेलबन वालों से मिलने का मुझे भी इंतजार था, इसलिए सोचा इस बार मेलबन वालों के साथ फ्लैट व्हाइट कॉफी पीता हूं।

साथियों,

जिस एनर्जी से आप सभी ने हमारे ऑसी फ्रेंड्स ने हम सभी को वेलकम किया है वो और भी Amazing है। मेलबन ने एक तरह से मैदान मार लिया है।

साथियों,

मैं, मेरे मित्र, भारत के मित्र, प्राइम मिनिस्टर एंथनी अल्बनीसी का भी आभारी हूं। आप सिडनी में भी साथ थे, और आज यहां मेलबन में भी, भारतीय कम्यूनिटी के बीच आए हैं। और ये एक प्रकार से फुल सर्कल हो गया है।

अमदाबाद जहां दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट ग्राउंड है, और मेलबन, जहां iconic स्टेडियम है हम दोनों साथ रहे हैं। और साथियों हम सभी ने देखा है प्राइम मिनिस्टर अल्बनीसी जब बोलते हैं तो भारतीयों के दिल और दिमाग में छा जाते हैं। सिडनी में भी आपने धूम मचाई थी और यहां भी आप छा गए।

मैं विक्टोरिया के प्रीमियर का भी उनके ऊर्जा भरे शब्दों केलिए, भारत के प्रति इतने स्नेह से उन्होंने जो कहा उसके लिये उनका भी आभार व्यक्त करता हूँ।

साथियों,

मैं जब साल 2014 में ऑस्ट्रेलिया आया था तो 28 साल के बाद, भारत का कोई पीएम यहां पहुंचा था। और आप याद कीजिए तब मैंने कहा था कि अब आपको 28 साल इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

पिछले 12 वर्षों में मैं तीसरी बार यहां आया हूं यानि इस बार हैट्रिक लगी है। ये दिखाता है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते किस उंचाईं पर हैं। और जानते हैं इसमें सबसे बड़ी भूमिका किसकी है? मोदी की नहीं, इसमें आप सभी साथियों की भूमिका है, इंडियन डायस्पोरा की भूमिका है।

साथियों,

कहते हैं कि मेलबन शहर एक दिन में ही चार सीज़न के दर्शन करा देता है। लेकिन भारतीय समुदाय ने अपने कल्चरल कलर्स से इसको और वाइब्रेंट बना दिया है।

यहां मेलबन में और आसपास काफी ऐसे स्थान हैं, ऐसे मार्केट्स हैं, जो भारतीयता के रंगों से भरे हैं। कोई उन्हें लिटिल इंडिया कहता है, कोई मिनी इंडिया कहता है, नाम जो भी हों, लेकिन रंग भारतीयता से भरे हैं।

ऐसे ही एक मार्केट का वीडियो किसी ने मुझे दिखाया। वीडियो में बता रहे थे, कि वहां खूब सेल चलती रहती है। इस सेल के चक्कर में, लोग घनचक्कर बन जाते हैं। शॉपिंग का मूड न भी हो, तो भी खरीदारी करनी ही पड़ती है। मैं सही कह रहा हूं?

साथियों,

आप में से कई साथी, फर्स्ट टाइम ऑस्ट्रेलिया आए, और कइयों का जन्म भी यहीं हुआ, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन भीतर की भारतीयता हमेशा ज़िंदा रहती है। यहां कई सारे साथी ऐसे होंगे जिनके घर में कम से कम दो Time Zone चलते हैं? यहाँ बच्चे स्कूल से घर, ऑस्ट्रेलियन टाइम के हिसाब से आते हैं, लेकिन भारत में दादा-दादी, नाना-नानी, Video Call पर इंतज़ार कर रहे होते हैं। यहाँ Weekend होता है, तो भारत में किसी शादी की Live Streaming चल रही होती है। यानी, दूरी हज़ारों किलोमीटर की है, लेकिन Daily Routine, आज भी भारत से जुड़ा हुआ है। और इस रुटीन के साथ आप सभी ऑस्ट्रेलिया के विकास में पूरी शक्ति से जुटे हुए हैं। मुझे आप सब पर गर्व है।

साथियों,

हम भारतीय ऐसे ही हैं, जैसे दूध में चीनी मिल जाती है, उसे और मीठा कर देती है, वैसे ही हम भारतीय दुनिया में अपने प्रेम का रंग घोलते रहते हैं।

घर में दूध, ऑस्ट्रेलिया वाला आता है, लेकिन चाय भारत वाली बनती है। दाल-सब्ज़ियाँ ऑस्ट्रेलिया की हैं लेकिन उनमें तड़का देसी मसालों का लगता है।

साथियों,

आपने सुना होगा भारत में आजकल भजन क्लबिंग का नया ट्रेंड चल रहा है। इसको हमारी gen-ज़ी ड्राइव कर रही है। और यहां ऑस्ट्रेलिया में भी मैंने सुना है कि आपका वीकेंड आस्था, और आध्यात्म से भरा रहता है।

कहीं किसी के घर भगवान सत्यनारायण की कथा, कहीं गुरुद्वारे में अरदास, कहीं बच्चों द्वारा भांगड़ा या भरतनाट्यम की प्रस्तुति, कहीं कोई क्रिकेट टूर्नामेंट चल रहा होता है।

और अब तो, Indian Film Festival भी यहां आ गया है। कुछ दिन बाद ही मेलबन में इंडियन फिल्म फेस्टिवल शुरु होने वाला है। मैं इसके सफल आयोजन की आपको अभी से शुभकामनाएं देता हूं।

साथियों,

आप सभी, ऑस्ट्रेलिया की ग्रोथ को अपने परिश्रम से सींच रहे हैं। लेकिन मैं जानता हूं कि आपकी एक नज़र भारत पर लगातार रहती है। भारत क्या कर रहा है, भारत की प्रगति, भारत की गति, इसकी खोज खबर आप लेते रहते हैं।

साथियों,

21वीं सदी का भारत आज विकसित होने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। एक सपना पूरा होता है, तो नया सपना जन्म ले लेता है।

पहले कहते थे, एक दीप से जले दूसरा, जलते दीप हज़ार। आज में कहता हूँ, एक सपने से जन्मे दूसरा, सपने जन्मे हज़ार। एक लक्ष्य पूरा होता है तो उससे भी बड़ा संकल्प सामने आता है।

ये वो भारत है, जो कहता है- Grow More Achieve More.

हम 140 करोड़ Aspirations से भरे राष्ट्र हैं, हम अधीर हैं, बेसब्र हैं, हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती इकॉनॉमी हैं, लेकिन हम जल्द से जल्द दुनिया की टॉप थ्री इकॉनॉमी बनना चाहते हैं। क्योंकि हमारी प्रेरणा है- Grow More Achieve More.

साथियों,

आपने भी देखा है, भारत ने मून के साउथ पोल पर चंद्रयान लैंड कराया। दुनिया में कोई और देश ऐसा नहीं कर सका। लेकिन भारत इतने भर से संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि भारत कहता है Grow More Achieve More.

इसलिए साथियों, भारत अब स्पेस में अपना गगनयान भेजने की तैयारी कर रहा है, भारत अब अपना स्पेस स्टेशन बनाने के लक्ष्य पर चल रहा है।

साथियों,

कुछ साल पहले तक, 5G टेक्नॉलॉजी को लेकर बड़े सवाल देश के सामने थे? कब लॉन्च होगी, कैसे रोलआउट होगी, कितना समय लग जाएगा? हमने 2022 के अंत में 5G रोलआउट करना शुरु किया, और आज भारत के Ninety nine percent district इससे कवर्ड हो चुके हैं। और आपको खुशी होगी दोस्तों, भारत 5G का Fastest rollout करने वाले देशों में से एक है।

आज भारत, दुनिया का दूसरा बड़ा 5G मार्केट बन चुका है। औऱ इतना ही नहीं, भारत आज मेड इन इंडिया 6G टेक्नॉलॉजी पर भी तेज़ी से काम कर रहा है। वो इसलिए, क्योंकि भारतीय कहते हैं, Grow More Achieve More.

साथियों,

पिछले 12 वर्षों में, भारत के दो दर्जन से अधिक शहरों में मेट्रो नेटवर्क पहुंच चुका है। आज भारत में हर दिन सवा करोड़ से अधिक लोग मेट्रो में सफर करते हैं। भारत, दुनिया का तीसरा बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश है। लेकिन हम भारतीय इससे भी संतुष्ट नहीं है, हम कहते हैं- Grow More Achieve More.

इसलिए हम भारत में नमो भारत रैपिड रेल, और वंदे भारत जैसे सेमी हाईस्पीड नेटवर्क को तेज़ी से बढ़ा रहे हैं।

एक और उदाहरण मेक इन इंडिया का है। बीते 12 वर्ष में, मेक इन इंडिया ग्लोबल ब्रांड बना। हमारे मोबाइल फोन, हमारे इलेक्ट्रॉनिक्स, दुनियाभर में पहुंचे। हमारे ऑटोमोबील, हमारे फार्मा प्रोडक्ट्स का ग्लोबली और विस्तार हुआ। भारत के डिफेंस प्लेटफॉर्म की कैपेबिलिटी और क्रेडबिलिटी, दुनिया देख रही है।

आपने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, डेमो तो देख ही लिया होगा। धमाके, आतंकियों के अड्डों पर हो रहे थे, और गूंज, पूरी दुनिया में सुनाई दे रही थी। टैरर कैंप्स पर इस करारे प्रहार से आपको गर्व हुआ या नहीं?

साथियों,

भारत इतने पर ही रुकना नहीं चाहता, भारत कह रहा है Grow More Achieve More. इसलिए, आज चिप से लेकर शिप तक, मैन्युफेक्चरिंग का भारत में एक नया इकोसिस्टम डवलप किया जा रहा है।

साथियों,

भारत के बड़े सपनों, बड़ी एस्पिरेशन्स की नींव है। भारत का नागरिक, We the people और इन सपनों को एनर्जी दे रहा है। People first, यानि नागरिक देवो भव का मंत्र। ये आज के भारत की गवर्नेंस का मूल मंत्र बन गया है।

मैं आपको अटेस्टेशन का उदाहरण देता हूं। अटेस्टेशन की मजबूरी, कुछ साल पहले तक बहुत कॉमन हुआ करती था। यानि कुछ भी करना हो, कहीं भी अप्लाई करना हो, अपने डॉक्यूमेंट किसी अधिकारी से अटेस्ट कराने पड़ते थे।

कतार में खड़ा रहना पड़ता था सुबह सुबह। ये बताने के लिए कि, हां तुम वही हो। हमारे लिए तो नागरिक देवो भव। अब ये स्थिति नहीं है। अब ज्यादातर काम सेल्फ अटेस्टेशन से ही चल जाता है।

वहां से जो यात्रा शुरू हुई, वो भारत में डिजी-लॉकर तक पहुंच गई है। एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था, जिसमें भारतीय, अपने डॉक्यूमेंट्स Digi फॉर्मेट में रख सकते हैं। इसमें एक क्लिक में डॉक्यूमेंट Share होता है। Verify होता है। Accept होता है।

साथियों,

व्यवस्था बनाना एक चीज है, उसे स्केल और सिक्योर फीचर के साथ बनाना, बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। आप जानते हैं कि आज भारत में डिजीलॉकर के कितने यूज़र हैं? मैं जानता हूँ, यह आंकड़ा याद रखना थोड़ा कठिन है।

इस वक्त तक, 70 करोड़ यानि 700 मिलियन से ज्यादा डिजिलॉकर यूज़र हैं। और इनमें, 850 करोड़ से अधिक डॉक्युमेंट्स स्टोर हैं। 850 करोड़ से अधिक।

साथियों,

नागरिक देवो भव का एक उदाहरण, हमारा हेल्थकेयर सिस्टम है। आज करोड़ों भारतीयों के पास, एक सिक्योर डिजिटल हेल्थ आईडी है। इसमें हेल्थ रिकॉर्ड्स की पूरी हिस्ट्री डिजिटली स्टोर होती है। इससे भारत में, डाइअग्नोसिस और बेहतर हो रहा है। और इससे इलाज की व्यवस्था और सुधर रही है।

यही नहीं टेलिकंसल्टेशन का चलन भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। सरकार का एक ई-संजीवनी प्लेटफॉर्म है, इससे अभी तक 48 करोड़ यानि 480 मिलियन टेली-कंसलटेशन्स हो चुकी हैं। इस प्लेटफॉर्म से सवा दो लाख से अधिक हेल्थकेयर प्रोवाइडर जुड़े हैं।

साथियों,

एक जमाने में आप सभी ने पासपोर्ट से जुड़ी परेशानियां भी सही होंगी। आप याद कीजिए, कितने हफ्ते लगते थे पासपोर्ट बनने में? लेकिन आज पासपोर्ट औसतन कुछ ही दिनों में मिल जाता है। यही सिटिजन फर्स्ट गवर्नेंस है। यही नागरिक देवो भव के मंत्र की सफलता है।

साथियों,

मैं अक्सर एक बात कहता हूं, भारत का सामर्थ्य जितना बढ़ता है, उसका फायदा, पूरी मानवता को होता है। हमारे संस्कार हैं- सर्वे भवन्तु सुखिन: यानि सब सुखी रहें। यही शाश्वत संस्कार आज भी भारत की पॉलिसीज़ और एक्शन्स को प्रेरित करते हैं।

साथियों,

अभी पिछले महीने ही वेनज़ुएला में भूकंप की इतनी बड़ी त्रासदी आई। कितना बड़ा विनाश हुआ। सैकड़ों लोगों की जान गई। हमने दूरी कितनी है देखा नहीं। हमने वेनज़ुएला की उस पीड़ा को अपनी पीड़ा समझा। भारत ने रिलीफ़ और rescue के लिए ऑपरेशन चलाया।

हमने जितनी तेज़ी से संभव हो सकता था, मदद भेजी, अपने एक्सपर्ट्स भेजे, हमारी मेडिकल टीम्स ने तेज़ी से काम शुरु किया। मुझे बहुत संतोष है, कि इससे अनेक ज़िंदगियां बच पाईं।

साथियों,

ऐसे ही तुर्किए और सीरिया में जब भूकंप आया, तब भी भारत ने बहुत तेज़ी से राहत और बचाव के लिए मदद भेजी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, पिछले साल हमने म्यांमार में ऑपरेशन ब्रह्मा चलाया। श्रीलंका में साइक्लोन की तबाही हुई, तो वहां ऑपरेशन सागर बंधु चलाया।

साथियों,

कोरोनाकाल की यादें भी आज तक हमारे मन में ताजा हैं। हमने दुनियाभर से भारत के ही नहीं, अन्य देशों के नागरिकों को भी अपने-अपने घर पहुंचाया। रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। ज़रूरतमंदों तक दवाएं पहुंचाईं, 100 से अधिक देशों को वैक्सीन्स भेजीं। युद्धक्षेत्रों में भी भारत ने, संकट में फंसे व्यक्तों को बाहर निकालने का प्रयास किया।

साथियों,

भारत जब मदद करता है, तो पासपोर्ट नहीं देखता, भारत जब मदद भेजता है, पासपोर्ट का रंग नहीं देखता। इसलिए, दुनिया भी भारत पर इतना विश्वास करती है।

साथियों,

मैं जानता हूं कि मानवता के हित में काम करने में ऑस्ट्रेलिया की भी बहुत बड़ी भूमिका है। ये हम दोनों देशों की पार्टनरशिप का एक अहम पिलर है।

और हम दोनों देशों की साझेदारी को, एक और सेक्टर मजबूती देता है। ये सेक्टर है—स्पोर्ट्स। स्पोर्ट्स की दुनिया में, ऑस्ट्रेलिया अपने आप में एक ब्रैंड है। लेकिन भारत में भी स्पोर्ट्स इकोसिस्टम ट्रांसफॉर्म हो रहा है।

साथियों,

आपने खेलो इंडिया मिशन का नाम सुना होगा। ये सिर्फ एक स्पोर्ट्स पॉलिसी नहीं है, ये अभियान स्कूल लेवल से ही हज़ारों खिलाड़ियों का एक पूल तैयार कर रहा है। भारत में स्कूल, यूनिवर्सिटी और नेशनल लेवल पर खेलो इंडिया गेम्स होते हैं, इनमें लाखों एथलीट्स पार्टिसिपेट करते हैं।

इस मिशन के तहत, भारत के रिमोट एरियाज़ में भी स्पोर्ट्स इंफ्रा तैयार किया जा रहा है। इससे ज्यादा से ज्यादा एथलीट्स को खासतौर पर हमारी बेटियों को ज्यादा अवसर मिल रहे हैं। और ये सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है सांसद खेल महाकुंभ जैसे आयोजनों से गांव-गांव में स्पोर्ट्स को, फिटनेस से जोड़ा जा रहा है, करियर ऑपॉर्चुनिटीज़ से कनेक्ट किया जा रहा है।

और ये जो कुछ भी हो रहा है, इसका इंपैक्ट फील्ड में दिख रहा है। भारत के एथलीट्स, भारत की टीम्स, Better से बेस्ट होती जा रही हैं।

साथियों,

यही कॉन्फिडेंस, भारत को स्पोर्टिंग लीग के नेक्स्ट लेवल पर ले जा रहा है। 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स, भारत होस्ट कर रहा है। भारत 2036 ओलंपिक्स को होस्ट करने का भी दावेदार है। मुझे पूरा विश्वास है, स्पोर्ट्स के क्षेत्र में भी ऑस्ट्रेलिया और भारत की पार्टनरर्शिप का और विस्तार होगा।

साथियों,

भारत और ऑस्ट्रेलिया, जो कुछ भी करते हैं, वो हम दोनों देशों के लिए भी शुभ होता है। इसका एक बड़ा उदाहरण, भारत-ऑस्ट्रेलिया ट्रेड एग्रीमेंट है। आपने वो शेर सुना होगा, आपको याद होगा:

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

ऐसे ही, भारत और ऑस्ट्रेलिया का एग्रीमेंट एक शुरुआत थी, और आज ये कारवां दुनिया के लगभग 40 देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट्स तक पहुंच चुका है।

साथियों,

हम केवल, ट्रेडिंग नेशन नहीं हैं, हम इनोवेशन को, साइंस एंड टेक्नॉलॉजी को महत्व देते हैं। ऑस्ट्रेलिया की अनेक उपलब्धियां हैं, Hearing implant, Wi-Fi, Cervical cancer vaccine, Flight Black Box, Secret Ballot Voting, ऐसे कितने ही innovations हैं जिनमें ऑस्ट्रेलिया का एक बड़ा रोल रहा है, और आज ये पूरी दुनिया को बेहतर बनाने के काम आ रहे हैं।

साथियों,

ऐसे ही भारत भी, अपने साइंस, टेक और इनोवेशन इकोसिस्टम को ट्रांसफॉर्म कर रहा है। आपको ये जानकर खुशी होगी, आज भारत के 10 हज़ार स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब्स चल रही हैं। ये स्कूल लेवल पर ही, इनोवेशन का माइंटसेट तैयार कर रही हैं।

बीते 12 वर्षों में भारत दुनिया का तीसरा बड़ा स्टार्ट अप इकोसिस्टम बन गया है। लेकिन मैं नंबर बताउंगा, तो आप भी हैरान रह जाएंगे। आप डेटा सुनना चाहेंगे, तो मैं बताऊं ?

आज भारत में 2 लाख से अधिक रजिस्टर्ड स्टार्ट अप्स हैं। भारत में हर महीने 4 हज़ार से ज्यादा नए स्टार्ट अप रजिस्टर हो रहे हैं। और डिफेंस और स्पेस जैसे सेक्टर्स में भी सैकड़ों स्टार्ट अप्स काम कर रहे हैं। इनके उदाहरण मैं इसलिए दे रहा हूं, क्योंकि ये सारे सेक्टर पहले भारत में बंद थे। कुछ साल पहले ही इनको प्राइवेट आंत्रप्रन्योरशिप के लिए खोला गया है। और आप देखिए भारत का एक स्पेस स्टार्ट-अप बहुत जल्द, अपने रॉकेट में, पहली बार सैटेलाइट्स लॉन्च करने जा रहा है।

साथियों,

मुझे खुशी है कि एजुकेशन, स्किल, इनोवेशन में भारत और ऑस्ट्रेलिया का रिश्ता और गहरा हो रहा है, और मजबूत हो रहा है। आज ऑस्ट्रेलिया में हज़ारों भारतीय स्टूडेंट्स पढ़ रहे हैं। और अब ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सिटीज़, भारत में भी अपने कैंपस खोल रही हैं।

डीकिन और वुलोन्गोंग University के कैंपस शुरु हो चुके हैं। और भी ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सिटीज इस तरफ आगे बढ़ रही हैं। और ये केवल नए कैंपस खोलने तक की बात नहीं है, ये दुनिया को स्किल्ड, इनोवेटिव टैलेंट देने का ग्लोबल लीडरशिप तैयार करने का भी अभियान है।

साथियों,

भारत की इतनी सारी बातें मैंने आपके बीच की हैं। अब मैं आपसे एक आग्रह भी करूंगा। कुछ समय पहले हमने हमारी प्रवासी कम्युनिटी के बच्चों के लिए, भारत को जानो क्विज की शुरुआत की है। ये क्विज दुनिया को भारत की डायवर्सिटी से परिचित कराती है, और साथ ही, भारतीय कम्यूनिटी के परिवारों को अपनी विरासत से जोड़ती है। मुझे ये जानकर अच्छा लगा, कि इस साल ऑस्ट्रेलिया में बहुत सारे युवा साथियों ने इस कार्यक्रम के कर्टेन रेजर में पार्टिसिपेट किया है। अब इस कंप्टीशन के सिक्स्थ एडिशन की शुरुआत होने जा रही है। इस बार गेमीफ़ाइड मोड में बहुत से कंप्टीशन होने जा रहे हैं, मैं ऑस्ट्रेलिया में भारतीय कम्यूनिटी के सभी परिवारों से आग्रह करूंगा, कि इसमें जरूर हिस्सा लें। लेकिन साथ साथ आप ऑस्ट्रेलिया के दोस्तों को भी, आपके स्कूल में पढ़ने वाले साथियों को, कॉलेज में पढ़ने वाले साथियों को इस कंपटीशन में जरुर जोड़ें।

साथियों,

आप सभी ने भारत-ऑस्ट्रेलिया के रिश्तों को मजबूत बनाने में बहुत मेहनत की है, बहुत योगदान दिया है। लेकिन आपका काम यहां खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यहां से आपकी ज़िम्मेदारियां और बढ़ गई हैं। अब भारत और ऑस्ट्रेलिया की पार्टनरशिप का एक अलग ही फेज़ शुरु हो रहा है।

इसलिए आप, ऐसे ही भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को जोश से भरते रहिए, चौके-छक्के मारते रहिए, आपकी सफलता में ही, भारत और ऑस्ट्रेलिया की सफलता है।

साथियों,

आज के इस कार्यक्रम के लिए प्राइम मिनिस्टर अल्बनीसी और आप सभी साथियों को मेरा एक बार फिर बहुत बहुत धन्यवाद।

भारत माता की जय!

वंदे मातरम!