দরিদ্র ও বঞ্চিত শ্রেণীর মানুষের চাহিদা পূরণে পরবর্তী প্রজন্মের পরিকাঠামো গড়ে তুলে তাঁদের আশা-আকাঙ্খার বাস্তবায়নে আমরা অঙ্গীকারবদ্ধ
পরিকাঠামোর সঙ্গে যুক্ত যে কোনও অগ্রগতির কাহিনীর মূল কেন্দ্রেই থাকবেন সাধারণ মানুষ; ভারতে আমরা ঠিক এই কাজই করছি
আমরা যদি পরিকাঠামোকে পরিস্থিতি মোকাবিলার উপযুক্ত করে তুলতে পারি, তা হলে কেবল নিজেদের জন্যই নয়, বরং ভবিষ্যৎ প্রজন্মের স্বার্থেও বিপর্যয় প্রতিরোধ করতে পারবো

ভদ্রমহোদয়/মহোদয়াগণ,
 
বিশেষজ্ঞ, শিক্ষাবিদ, ব্যবসায়ী, নীতি-প্রণেতা এবং সারা বিশ্ব থেকে আমার প্রিয় বন্ধুরা,
 
নমস্কার,
 
বিপর্যয় প্রতিরোধী পরিকাঠামো সম্পর্কিত চতুর্থ আন্তর্জাতিক সম্মেলনে যোগ দিতে পেরে আমি অত্যন্ত আনন্দিত। একেবারে শুরুতেই আমি একথা স্মরণ করিয়ে দিতে চাই যে, দীর্ঘমেয়াদী উন্নয়নের লক্ষ্য পূরণে আমরা যেন কোনও দেশকেই পিছনে ফেলে না রাখি। আর এই কারণেই আমরা দরিদ্র ও বঞ্চিত শ্রেণীর মানুষের চাহিদা পূরণে পরবর্তী প্রজন্মের পরিকাঠামো গড়ে তুলে তাঁদের আশা-আকাঙ্খার বাস্তবায়নে অঙ্গীকারবদ্ধ। পরিকাঠামো কেবল মূলধনী সম্পদ সৃষ্টি এবং বিনিয়োগ থেকে দীর্ঘমেয়াদী মুনাফার জন্যই নয়। প্রকৃতপক্ষে পরিকাঠামো হ’ল – সংখ্যামাত্র। এর সঙ্গে কেবল অর্থের সম্পর্কই নেই। আসলে পরিকাঠামোর সঙ্গে মানুষের সম্পর্কও জড়িয়ে রয়েছে। সামঞ্জস্য বজায় রেখে মানুষের জন্য গুণমানবিশিষ্ট, নির্ভরযোগ্য এবং নিরন্তর পরিষেবা দিয়ে যেতে হবে। পরিকাঠামোর সঙ্গে যুক্ত যে কোনও অগ্রগতির কাহিনীর মূল কেন্দ্রেই থাকবেন সাধারণ মানুষ। ভারতে আমরা ঠিক এই কাজই করছি। এমনকি, শিক্ষা থেকে স্বাস্থ্য, পানীয় জল থেকে স্বচ্ছতা, বিদ্যুৎ থেকে পরিবহণ ও অন্যান্য ক্ষেত্রে মৌলিক পরিষেবা পৌঁছে দেওয়ার সুযোগ-সুবিধা যেমন একদিকে বাড়াচ্ছি, অন্যদিকে তেমনই আমরা জলবায়ু পরিবর্তনের সরাসরি মোকাবিলাও করছি। ২০৭০ সালের মধ্যে কার্বন নিঃসরণের পরিমাণ শূন্যতে নামিয়ে আনার লক্ষ্যে কপ-২৬ সম্মেলনে আমরা যে অঙ্গীকার করেছি, তার সঙ্গেই আমাদের উন্নয়নমূলক প্রয়াসও অব্যাহত রয়েছে।
 
বন্ধুগণ,
 
পরিকাঠামো ক্ষেত্রে উন্নয়ন মানব সম্ভাবনার পূর্ণ সদ্ব্যবহার ঘটাতে পারে। কিন্তু, পরিকাঠামোকে আমাদের উপহার হিসাবে গণ্য করা চলবে না। আসলে পরিকাঠামো ব্যবস্থায় অনেক জানা-অজানা চ্যালেঞ্জ রয়েছে। জলবায়ু পরিবর্তনের বিষয়টিও এর সঙ্গে যুক্ত। ২০১৯ – এ আমরা যখন বিপর্যয় প্রতিরোধী পরিকাঠামো জোট (সিডিআরআই) - এর সূচনা করেছিলাম, তখন তা আমাদের অভিজ্ঞতা ও চাহিদার ভিত্তিতে গড়ে তোলা হয়েছিল। বন্যার তোড়ে যখন সেতু নিশ্চিহ্ন হয়ে যায়, ঘূর্ণিঝরের দাপটে যখন বিদ্যুৎ সরবরাহ ব্যবস্থা ভেঙে পড়ে, এমনকি দাবানলের কারণে যখন কম্যুনিকেশন টাওয়ার (মোবাইল টাওয়ার) ক্ষতিগ্রস্ত হয়, তখন তার প্রভাব হাজার হাজার মানুষের জীবন-জীবিকার উপর সরাসরি পড়ে। পরিকাঠামো ক্ষেত্রে এই ক্ষয়ক্ষতিতে  স্বাভাবিকভাবেই লক্ষ লক্ষ মানুষের জীবন প্রভাবিত হয়। তাই, আমাদের সামনে যে চ্যালেঞ্জগুলি রয়ে, তা খুব স্পষ্ট। আমাদের কাছে যে আধুনিক প্রযুক্তি ও জ্ঞান রয়েছে, তার ভিত্তিতে আমরা কি এমন পরিকাঠামো গড়ে তুলতে পারি না, যা দীর্ঘস্থায়ী হবে। এই চ্যালেঞ্জগুলিকে বিবেচনায় রেখেই বিপর্যয় প্রতিরোধী পরিকাঠামো জোট (সিডিআরআই) গড়ে তোলা হয়েছে। এই জোট গড়ে ওঠার পর থেকে তার পরিধি বিস্তার হয়েছে এবং সারা বিশ্বের সমর্থন পেয়েছে। এ থেকেই আমাদের অভিন্ন উদ্বেগের বিষয়গুলি প্রতিফলিত হয়।
 
বন্ধুগণ,
 
আড়াই বছরের অল্প সময়ের মধ্যে এই জোট গুরুত্বপূর্ণ উদ্যোগ গ্রহণ করেছে এবং মূল্যবান অবদান রেখেছে। বিপর্যয়-প্রবণ দ্বীপরাষ্ট্রগুলির জন্য পরিকাঠামো গড়ে তোলার লক্ষ্যে গত বছর কপ-২৬ সম্মেলনে যে উদ্যোগের সূচনা হয়েছে, তা থেকে এটাই স্পষ্ট হয় যে, ছোট দ্বীপরাষ্ট্রগুলির সঙ্গে কাজ করতে আমরা অঙ্গীকারবদ্ধ। ভারতের উপকূলবর্তী এলাকায় বসবাসকারী মানুষের জন্য বিদ্যুৎ সরবরাহ ব্যবস্থাকে বিপর্যয় মোকাবিলার উপযোগী করে তুলতে এই জোট যে কাজ করেছে, তারফলে বহু মানুষ উপকৃত হয়েছেন। এমনকি, ঘূর্ণিঝড়ের সময় বিদ্যুৎ সংযোগ বিচ্ছিন্ন হওয়ার পর, তা পুনরায় চালু করার সময়সীমা কমাতেও এই জোট গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করেছে। শুধু তাই নয়, এই জোটের কর্মকান্ড বৃদ্ধি পাওয়ার সঙ্গে সঙ্গে প্রতি বছর গ্রীষ্মপ্রধান অঞ্চলে ঘূর্ণিঝড়ের দরুণ বিদ্যুৎ সংযোগ ব্যবস্থার উপর যে প্রভাব পড়ে, তা থেকে ১৩০ মিলিয়নেরও বেশি মানুষ উপকৃত হবেন। এই জোট সারা বিশ্ব জুড়ে বিপর্যয়-প্রবণ ১৫০টি বিমানবন্দরকে নিয়ে সমীক্ষার কাজ করছে। বিশ্ব যোগাযোগ ব্যবস্থাকে বিপর্যয় প্রতিরোধী করে তুলতে এই জোটের প্রভূত সম্ভাবনা রয়েছে। সারা বিশ্বে বিপর্যয় প্রতিরোধী পরিকাঠামো ব্যবস্থার মূল্যায়নে সিডিআরআই নেতৃত্ব দিচ্ছে। প্রকৃতপক্ষে, সিডিআরআই – এর এই প্রয়াস এমন এক জ্ঞান ভান্ডার গড়ে তুলতে সাহায্য করবে, যা অত্যন্ত মূল্যবান হয়ে উঠবে। এই জোটভুক্ত রাষ্ট্রগুলির বিশেষজ্ঞরা এমন এক গ্লোবাল নেটওয়ার্ক গড়ে তুলছেন, যা আমাদের পরিকাঠামো ব্যবস্থাকে ভবিষ্যৎ বিপর্যয় মোকাবিলায় সক্ষম করে তুলতে সাহায্য করবে।
 
বন্ধুগণ,
 
আমাদের ভবিষ্যতকে বিপর্যয় প্রতিরোধী করে তুলতে আমাদের একযোগে বিপর্যয় প্রতিরোধী পরিকাঠামো ক্ষেত্রে রূপান্তরের লক্ষ্যে কাজ করতে হবে। তাই, আমরা যদি পরিকাঠামোকে পরিস্থিতি মোকাবিলার উপযুক্ত করে তুলতে পারি, তা হলে কেবল নিজেদের জন্যই নয়, বরং ভবিষ্যৎ প্রজন্মের স্বার্থেও বিপর্যয় প্রতিরোধ করতে পারবো। আর এগুলিই আমাদের অভিন্ন স্বপ্ন, অভিন্ন দৃষ্টিভঙ্গী, যা আমাদের অবশ্যই বাস্তবায়িত করতে হবে। ভাষণ শেষ করার আগে আমি এই সম্মেলন যৌথভাবে আয়োজন করার জন্য সিডিআরআই এবং মার্কিন যুক্তরাষ্ট্র সরকারকে অভিনন্দন জানাই।
 
যৌথভাবে এই সম্মেলন আয়োজনের জন্য আমি সমস্ত অংশীদারদের শুভেচ্ছা জানাই। এক ফলপ্রসূ ও গঠনমূলক আলাপ-আলোচনার জন্য আপনাদের সকলকে আমার শুভেচ্ছা।
 
ধন্যবাদ।
 
অনেক অনেক ধন্যবাদ।
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August 01, 2026

एल्लरिगू नन्ना नमस्कारगलु।

रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशनबेलूर मठ के अध्यक्ष परम पूज्य स्वामी गौतमानंद जी महाराज, श्री रामकृष्ण आश्रम, मैसुरू के अध्यक्ष पूज्य स्वामी मुक्तिदानंद जी, रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के ट्रस्टी पूज्य स्वामी यादवेंद्रानंद जी, राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत जी, मुख्यमंत्री श्री डी.के. शिवकुमार जी, सांसद यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वाडियार जी, विधायक विजयेंद्र येदियुरप्पा जी, के. हरीश गौड़ा जी, अन्य महानुभाव, पूज्य संतगण और भाईयों और बहनों।

सर्वप्रथम मैं मैसूरू की अधिष्ठात्री देवी मां चामुंडेश्वरी को प्रणाम करता हूं। अभी दो दिन पहले ही हम सभी ने गुरू पूर्णिमा भी मनाई है। आप सब जानते हैं, मेरी यात्रा जहां से शुरू हुई और आज मैं जहां हूं, इसमें राम कृष्ण मिशन का बहुत अहम योगदान है। मैं तीन महीने पहले हावड़ा में बेलूर मठ गया था। सभी पूज्य संतों से सतसंग करने का अवसर मिला था। मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे फिर मैसूरू में श्री रामकृष्ण आश्रम से जुड़े संतों से, मेरे गुरू बंधुओं से मिलने का, उनसे आशीर्वाद लेने का अवसर मिला है। आप सभी की उपस्थिति की वजह से, आज मैसूरू की इस पवित्र भूमि पर मुझे एक अलग ही ऊर्जा अनुभव हो रही है। मैं आप सभी संतों के चरणों में सादर प्रणाम करता हूं।

साथियों,

मैसूरू भारत की अनादि सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है। यहां के मंदिर, यहां की परंपराएं और उत्सव, मैसूरू का दशहरा, यहां के भव्य महल, इसका संगीत और साहित्य, भारत की विरासत इस शहर के कण-कण में रची बसी है। और यह देखकर बहुत संतोष मिलता है। इस शहर ने इस विरासत को उसी कुशलता से सहेजा भी है, संवारा भी है। श्री रामकृष्ण आश्रम और स्वामी विवेकानंद जी की स्मृतियां भी मैसुरू की विरासत का ही एक समृद्ध हिस्सा हैं। कुछ देर पहले मैं उस ऐतिहासिक भवन में भी गया था, जहां स्वामी विवेकानंद जी ने अपने प्रवास के दौरान कुछ समय बिताया था। कर्नाटका के कितने ही विद्वान और मनीषी इस स्थान से जुड़े रहे हैं। राष्ट्रकवि कुवेम्पु जैसे महापुरुष जब मैसुरू में थे, उनका भी श्रीरामकृष्ण आश्रम से गहरा जुड़ाव था। आज स्वामी विवेकानंद कल्चरल यूथ सेंटर, यानी विवेका स्मारका के उद्घाटन के जरिए, हम इस मिशन को नया विस्तार दे रहे हैं। इसके लिए मैं श्रीरामकृष्ण आश्रम और इससे जुड़े सभी विद्वानों को हार्दिक बधाई देता हूं।

साथियों,

व्यक्ति से विभूति का निर्माण एकाएक नहीं होता। इसके लिए हमें जीवन की अनगिनत परीक्षाएँ देनी होती हैं। साधना करनी होती है, तप करना होता है, खुद को तपाना पड़ता है, खपाना पड़ता है। ख्याति के बाद तो संसार पीछे खड़ा होता है। लेकिन, तप के समय महान विभूतियों को पहचानना आसान नहीं होता। जो साधक को तपस्या में पहचानता है, वो उसकी सिद्धि का सहभागी भी होता है।

इसलिए भाइयों बहनों,

स्वामी विवेकानंद के जीवन में मैसुरू का इतना अहम योगदान था। करीब 130 वर्ष पहले, स्वामी जी, एक युवा संन्यासी के रूप में भ्रमण करते हुए मैसुरू आए थे। तब उनकी प्रसिद्धि वैसी नहीं थी। लेकिन, विचार उतने ही ऊंचे थे। उस समय उन्हें जिन लोगों ने पहचाना, जो उनके साथ जुड़े, उनमें से एक प्रमुख नाम मैसुरू के तत्कालीन महाराजा का भी था। जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में थे, तो उन्होंने वहाँ से मैसुरू के तत्कालीन महाराजा को एक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने स्वयं महाराजा के सहयोग का उल्लेख किया था।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय चेतना को आत्मसात किया था। उन्होंने शास्त्रों को आत्मसात किया था जो कहते हैं- “परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति”। अर्थात्, वास्तव में वही जीता है जो दूसरों के लिए जीता है। इसी मंत्र पर चलते हुए, मैसुरू के इस श्री रामकृष्ण आश्रम ने पिछले वर्ष अपने सौ साल पूरे किए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएँ हों, या प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य, श्री रामकृष्ण आश्रम ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत को जीवंत रखा है। मुझे विश्वास है विवेका स्मारका साधकों और श्रद्धालुओं के लिए आत्मिक उत्थान का तीर्थ बनेगा। स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरणा थी- ‘शिव ज्ञाने जीव सेवा’। यानी जीव की सेवा ही शिव की सेवा है। हमें इस विवेका स्मारक में इसलिए, ऐसे युवाओं को गढ़ना है, जिनके लिए समाज और राष्ट्र के हित, गरीब-वंचित के दुःख, अपने सुख-दुःख से ऊपर हों। जिन युवाओं के लिए राष्ट्र प्रथम ही सर्वोपरि मंत्र हो, मां भारती की सेवा ही जिनका जीवन लक्ष्य हो।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी युवाओँ की शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार मानते थे। उन्होंने स्वयं ये देखा था कि कैसे दुनिया के देश अपने युवाओं को शिक्षित बना रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से तब भारत गुलाम था। भारत के युवा भी गुलामी की जंजीरों में जक़ड़े हुए थे। उस दौर से लेकर अब तक, भारत के युवा ने एक लंबी यात्रा तय की है। भारत का जो युवा कभी जंजीरों में था, आज वो युवा दुनिया के विकास को गति दे रहा है।

· आज भारत की अर्थव्यवस्था, सबसे तेजी से आगे बढ़ रही है।

· किसकी वजह से? भारत के युवाओँके सामर्थ्य से।

· आज भारत में दुनिया की तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम है।

· किसकी वजह से? भारत के युवाओँ के सामर्थ्य से।

· आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत से बने Digital Solutions, दुनिया के अनेक देशों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की नई यात्रा पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत AI, Deep Tech, Space Technology और Innovation के नए अध्याय लिख रहा है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

अभी कुछ दिन पहले ही हमने देखा है, भारत के युवाओं ने अंतरिक्ष में कमाल कर दिया है। पहली बार युवाओं का बनाया हुआ एक प्राइवेट कंपनी का रॉकेट, अंतरिक्ष तक पहुंचा है। आज कोई भी सेक्टर हो, भारत युवा अपना दम-खम दिखा रहा है। हम सभी अपने आसपास देख रहे हैं, आज छोटे से छोटे व्यवसाय में लगा युवा, भारत की डिजिटल इकॉनमी को आगे बढ़ा रहा है। वो मुद्रा लोन के जरिए नई शुरुआत कर रहा है। वो देश की स्टार्टअप revolutionको लीड कर रहा है। आत्मनिर्भर भारत का अभियान हो, मेक इन इंडिया का अभियान हो, इसकी सफलता के पीछे भारत के युवाओं की ही ताकत है।

साथियों,

किसी भी देश में, युवाओं का सामर्थ्य तभी उस राष्ट्र की शक्ति बनता है, जब उसे सही अवसर मिले, जब उसे सही दिशा मिले, और जब उसे अपनी ही धरती पर बड़े सपने देखने, उन्हें पूरा करने का भरोसा मिले। और इसमें बहुत बड़ी भूमिका हमारे शिक्षा संस्थानों की होती है। मुझे खुशी है कि आज भारत में शिक्षण संस्थाओँ की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले 12 वर्षों में, 650 से ज्यादा नई यूनिवर्सिटीज बनी हैं। पिछले 12 वर्षों में करीब 14 हजार नए कॉलेज बने हैं। 4 हजार से ज्यादा नई ITI बनाई गई हैं। 9 नए आई.आई.एम, 7 नई आई.आई.टी, और13 नए एम्स भी स्थापित किए गए हैं। आज देश में MBBS की सीटें करीब 1 लाख 40 हजार हो चुकी हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 823 हो गई है।

साथियों,

एक ओर हम एजुकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर को modernize कर रहे हैं। साथ ही, शिक्षा व्यवस्था को भी आधुनिक जरूरतों के हिसाब से ढाला जा रहा है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी, भारत के युवाओँ को 21वीं सदी के अनुरूप तैयार करने का माध्यम बन रही है।

साथियों,

स्कूली शिक्षा में भी बड़े स्तर पर काम हुआ है। देशभर में 14 हजार से ज्यादा पीएम श्री स्कूल विकसित किए गए हैं। शिक्षा केवल किताबी न रहे, बच्चों में इनोवेशन और साइंटिफिक टेंपरामेंट विकसित हो, इसके लिए,10 हजार से ज्यादा अटल टिंकरिंग लैब्स स्थापित हुई हैं।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी, राष्ट्र उत्थान के लिए शिक्षा के साथ-साथ समानता को भी उतना ही अहम मानते थे। शिक्षा में भेदभाव न हो, अवसरों में भेदभाव न हो, आज ये देश का विज़न बन गया है। आज बेटियाँ भी सैनिक स्कूलों में एड्मिशन ले रहीं हैं। एनडीए में बेटियां राष्ट्र के लिए योगदान दे रही हैं। आज मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई मातृभाषा में करने की सुविधा हो गई है। इससे, भाषा के आधार पर अवसरों में होने वाले भेदभाव पर लगाम लग रही है।

साथियों,

युवा शक्ति का स्वस्थ, अनुशासित और आत्मविश्वास से भरे रहना उतना ही जरूरी है। जो देश खेलों को महत्व देते हैं, वहां के युवाओं में इन तीनों गुणों का तेजी से विकास होता है। इसलिए आज खेलों को राष्ट्र निर्माण की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जा रहा है। खेलो इंडिया यूथ गेम्स, यूनिवर्सिटी गेम्स, पैरा गेम्स और विंटर गेम्स जैसे आयोजनों ने देशभर के युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दिया है। आज देशभर में आधुनिक स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है, खेलो इंडिया सेंटर के माध्यम से सुविधाएं बढ़ रही हैं, गांवों से लेकर छोटे शहरों तक नई प्रतिभाओं की पहचान की जा रही है।

और साथियों,

आज इस अभियान के परिणाम भी साफ - साफ दिखाई दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का प्रदर्शन बेहतर होता जा रहा है। हमारे खिलाड़ी नए-नए कीर्तिमान बना रहे हैं, हमारी बेटियां देश का गौरव बढ़ा रही हैं।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी की तरह, हमें विवेका स्मारका, बड़े उद्देश्य के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है। ऐसे स्थान पर मैं हमारे युवाओं से कुछ आग्रह करना चाहता हूं।

साथियों,

मैसुरू को अक्सर भारत के सबसे स्वच्छ शहरों में स्थान मिला है। मैं इसके लिए यहां के लोगों को हृदय से बधाई देता हूं। क्या इस अवसर पर हम ये संकल्प ले सकते हैं, कि भविष्य में स्वच्छता के संकल्प को निरंतर मजबूत करते रहेंगे। हमें यहाँ की प्राकृतिक संपदाओं को संरक्षित करना चाहिए। हमें पर्यावरण से जुड़े संकल्प लेने चाहिए। हमें पानी की हर बूंद बचाने के लिए मिशन मोड में काम करना होगा।

साथियों,

आज ही यहां ‘वाल्मीकि रामायण’ के कन्नड़ा अनुवाद का विमोचन भी हुआ है। मैं कन्नड़ा भाषा से जुड़ी एक अपील भी करना चाहता हूं। कर्नाटका महान लेखकों और कवियों की धरती है। कन्नड़ा भाषी लोग हमेशा से पढ़ने की संस्कृति के लिए जाने जाते हैं। स्मार्टफोन के इस युग में इस स्वभाव को और बढ़ावा मिलना चाहिए। क्या हम युवा पीढ़ी को कन्नड़ा साहित्य से गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

साथियों,

मैसुरू अपने सिल्क, चंदन और हस्तशिल्प के लिए प्रसिद्ध है। जब भी हम किसी को उपहार दें, तो क्या हम ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि वो किसी भारतीय के हाथों और पसीने से बनी चीज हो? इससे हमारी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही, एक और परिवार को आर्थिक सहायता भी मिलेगी।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी ने जिस तरह के भारत का सपना देखा था, उसे पूरा करने का दायित्व आज की पीढ़ी पर है। मुझे विश्वास है, विवेका स्मारका इसके लिए एक ऊर्जा स्रोत का काम करेगा। मैं एक बार फिर, यहां एकत्र पूज्य संतजनों गुरू बंधुओं और मैसुरू के लोगों को नमन करते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं। आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।