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विशाल संख्‍या में पधारे हुए उपस्थित महानुभावों!

मां दन्‍तेश्‍वरी का जहां आर्शीवाद है, जिस क्षेत्र के आदिवासियों ने दुनिया को जीने का रास्‍ता सिखाया है, ऐसी ये बस्‍तर की धरती है। आज मेरा ये सौभाग्‍य है कि आपके बीच आने का मुझे अवसर मिला, आपके दर्शन करने का सौभाग्‍य मिला। आज एक कार्यक्रम रायपुर में भी होने वाला था, लेकिन कल हवा के तूफान ने वहां सब तहस-नहस कर दिया। कई हमारे साथियों को चोट आई। मैं परमात्‍मा से प्रार्थना करता हूं कि ड्यूटी पर तैनात ये सभी बंधु-भगिनी बहुत ही जल्‍द स्‍वस्‍थ हों। डॉ. रमन ने कल ही मुझे फोन करके बताया था.. और उनके स्‍वास्‍थ्‍य की पूरी चिंता राज्‍य सरकार कर रही है और बहुत ही जल्‍द ये सभी स्‍वस्‍थ हो जाएंगे।

आज अनेक विध-कामों के निर्णय हुए हैं। शायद बस्‍तर के इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि एक घंटे के इस समारोह में 24 हजार करोड़ रुपयों के निवेश के साथ विकास की नई ऊंचाईयों को प्राप्‍त करने का निर्णय.. एक राज्‍य, पूरे राज्‍य के लिए भी अगर 5 हजार करोड़ का प्रोजेक्‍ट है, तो राज्‍य के लिए बहुत बड़ी गौरवशाली घटना होती है। जबकि आज एक जिले में 24 हजार करोड़ रुपया..। आने वाले दिनों में इस बस्‍तर की जिंदगी में कैसा बदलाव आएगा इसका मैं भली-भांति अनुमान कर सकता हूं।

आज आप किसी भी आदिवासी को जाकर पूछें, किसी भी गांव के गरीब व्‍यक्ति को जा करके पूछें, आप कोई भी खेत मज़दूर को पूछें, आप किसी भी किसान को पूछें कि आपका क्‍या सुझाव है, कि क्‍या करना चाहिए? आपकी क्‍या अपेक्षा है क्‍या इच्‍छा है? मैं विश्‍वास से कहता हूं, अनुभव से कहता हूं, सब के सब.. किसी भी राज्‍य में क्‍यों न रहते हों, किसी भी भू-भाग पर क्‍यों न रहते हों.. एक ही जवाब निकलता है कि साहब कुछ भी करो, बच्‍चों को रोजगार मिले ऐसा कुछ करो। किसान भी चाहता है कि बच्‍चों को रोजगार मिले क्‍योंकि उसे पता है कि उनको जीवन में आगे बढ़ने के लिए अगर रोजगार मिल जाएगा तो बाकी तो अपना संसार वो खुद मेहनत करके बना लेगा, बच्‍चों को पढ़ाना है तो वो भी कर लेगा, एक बार रोजगार मिल जाए। भारत के लिए सबसे पहली प्राथमिकता है हमारे देश के नौजवान को रोजगार मिले, उसे अवसर मिले, वो देश को आगे बढ़ाने के काम में भागीदार बनना चाहता है। ..और कोई मां-बाप नहीं चाहता है कि बेटा-बेटी रोजगार के लिए सैकड़ों हजार किला मीटर दूर जा करके शहरों की झुग्‍गी-झोपड़ी में जिंदगी बिताए, कोई मां-बाप नहीं चाहता है। हर मां-बाप चाहता है कि बेटा पास रहे और कुछ उसे काम मिल जाए। बेटा भी चाहता है, बेटी भी चाहती है कि बूढ़े-बूढ़े मां-बाप को असहाय छोड़ करके शहर में झुग्‍गी-झोपड़ी की जिंदगी जीने के लिए नहीं जाना है। इसलिए सरकार का यह दायित्‍व बनता है, शासन की जिम्‍मेवारी बनती है कि हम विकास को उस रूप में आगे बढ़ाएं ताकि हिन्‍दुस्‍तान के सभी भू-भाग में विकास पहुंचे, दूर-सुदूर जंगलों में भी विकास पहुंचे और गरीब की झोपड़ी तक विकास के फल पहुंचें। गरीब की झोपड़ी तक विकास का फल पहुंचने का मतलब है कि गरीब से गरीब परिवार की संतान को भी रोजगार का अवसर उपलब्‍ध हो। इसलिए हमने जो विकास का रास्‍ता चुना है उसके केंद्र में हमारा एक ही संकल्‍प है कि देश के नौजवान को अवसर मिले, रोजगार मिले, आगे बढ़ने के लिए उसको मौका मिले।

आज बस्‍तर जिले में.. कोयला पहले भी था, iron ore पहले भी था, सरकारें भी पहले थीं, लोग भी पहले थे, बेरोजगारी भी थी लेकिन फिर भी समस्‍या का समाधान खोजने के लिए ऐसी धीमी गति से चला जाता था कि लोग निराशा के गर्त में डूब जाते थे। आज हमारी कोशिश है कि हिन्‍दुस्‍तान के चारों तरफ रेलवे connectivity मिले, दूर-सुदूर इलाकों में भी रेल की पटरी बिछे, लोगों को आने-जाने की सुविधा बने। पटरी जब लग जाती है, ट्रेन आती है तो सिर्फ यात्रा के लिए काम आती है ऐसा नहीं है, वो एक जीवन को भी गति देता है, अर्थ-जीवन को भी गति देता है। जगदलपुर तक रेल की पटरी हिन्‍दुस्तान की मुख्‍यधारा से आपको जोड़ेगी। जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना लाते हैं तो गरीब से गरीब को आर्थिक मुख्‍यधारा से जोड़ते हैं और बस्‍तर में जगदलपुर तक की ट्रेन की बात करते हैं तो यहां के नागरिक को हिन्‍दुस्‍तान की मुख्‍यधारा के साथ छोड़ने का हमारा प्रयास होता है।

अभी मुख्‍यमंत्री जी विस्‍तार से बता रहे थे कि हम कच्‍चा माल विदेशों में बेच-बेच कर कब तक अपनी रोजी-रोटी कमाएंगे। ..और हम कैसे लोग है कि iron ore तो हम बाहर भेजें और steel बाहर से लाएं! अब वो कारोबार हमें बंद करना है। अगर iron ore हमारा होगा तो steel भी हमारा होगा और दुनिया को चाहिए तो हम steel देगें, हम iron ore में हमारे नौजवान के पसीने को जोड़ेंगे और उसी iron ore में से steel बनाएंगे और उसी iron ore में से steel बनाते समय मेरे नौजवानों की जिंदगी भी बन जाएंगी ताकि वो दुनिया के हर संकटों से टक्‍कर लें। ऐसा जीवन उसका ऊंचा बन जाए, उस दिशा में हम काम कर रहे हैं। हमारी कोशिश है विकास की नई ऊंचाइयों पर देश को ले जाने की।

आज मैं यहां डॉ. रमन सिंह जी के सपने को धरती पर उतरा हुआ देख करके आया। रमन सिंह जी के प्रति मेरे मन में मित्र होने के बावजूद भी हमेशा एक सम्‍मान का भाव रहा है और सबसे ज्‍यादा मुझे आदर तब हुआ, जब यहां के लोग महंगी.. चिरौंजी हो, काजू हो ये बेच करके नमक खरीदते थे, बदले में नमक! और समाज का शोषण करने का भाव रखने वाले लोग उन महंगे उत्‍पादों को ले करके बदले में नमक देते थे और बस्‍तर जिले के नागरिक नमक पाने के लिए पता नहीं क्‍या कुछ देने के लिए तैयार हो जाते थे। रमन सिंह जी ने सरकार बनाते ही प्रारंभ में तय कर लिया कि मैं नमक लोगों को पहुंचाऊंगा। उस दिन से एक मित्र होने के बावजूद भी एक विशेष आदर की मेरे मन में अनुभूति हुई कि मेरा एक साथी है जो हर पल गरीबों के लिए सोचता है, आदिवासियों के लिए सोचता है।

आज जब मैं knowledge(Education) city में जा करके आया, उसमें जो कल्‍पना है.. हिन्‍दुस्‍तान में जो लोग कहते हैं कि हिंसा के रास्‍ते पर गए हुए लोगों को वापस मुख्‍यधारा में लाने का रास्‍ता क्‍या है, मैं समझता हूं कि रमन सिंह जी ने रास्‍ता बना दिया है। कंधे पर हल! वही समस्‍याओं का हल ला सकता है। कंधे पर gun, ये समस्‍याओं का समाधान नहीं है। जिस धरती पर नक्‍सलवाद का जन्‍म हुआ था और जिसके कारण देश में नक्‍सलवाद की चर्चा हुई थी, वहां पर भी जा करके देखिए, अनुभव के बाद वो सीखे.. और उन्‍होंने भी वो रास्‍ता छोड़ दिया। आज वो नक्‍सलबाड़ी, जहां से हिंसा का मार्ग शुरू हुआ था, बम, बंदुक और गोलियां चलती थी, रक्‍त की धारा बहती थी, आज वहां वो बंद हो गया। जिन लोगों को लगता है कि क्‍या.. आए दिन ये मौत का खेल बंद होगा कि नहीं होगा। मैं देशवासियों! आपको विश्‍वास दिलाना चाहता हूं कि निराश होने की जरूरत नहीं है। यह भी बंद होगा। जब पंजाब में खूनी खेल खेला जा रहा था, क्‍या कभी किसी ने सोचा था कि पंजाब में वो खूनी खेल खत्‍म होगा और लोग सुख-चैन की जिंदगी जिएंगे? आज जी रहे हैं। नक्‍सलबाड़ी में सोचा था? आज लोग वहां भी जी रहे हैं। मुझे विश्‍वास है इस भू-भाग में भी, इस गलत रास्‍ते पर चल पड़े लोग भी.. उनके भीतर भी कभी न कभी मानवता जगेगी।

आज मैं उस ज्ञान नगरी में जा करके आया। 800 से अधिक उन बच्‍चों को मिला जिनको.. कोई गुनाह नहीं था, मां-बाप से बिछुड़ना पड़ा। हिंसा के रास्‍ते पर पागल बने हुए युवकों ने किसी के बाप को मार दिया, किसी की मां को मार दिया, किसी मां-बाप को वहां से दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया। उन 800 बच्‍चों से मैं मिला जिन्‍होंने अपने परिवार-जनों को खोया है। माओवाद की हिंसा के कारण उनकी जिदगी में मुसीबत आई है। लेकिन आज डॉ. रमन सिंह जी को बधाई देता हूं कि उन्‍होंने.. जिनका सब कुछ खत्‍म करने के लिए माओवादी तुले हुए थे, जो बच्‍चों को तलवार, बम, बंदूक के रास्‍ते पर ले जाना चाहते थे उनको रमन सिंह जी ने हाथ में कलम पकड़ा दी, कम्‍प्‍यूटर पकड़ा दिया है और मैंने उनकी आंखों में जो चेतना देखी.. वो विश्‍वास देखा है, उन 800 बच्‍चों को देख करके मैं कहता हूं हिंसा का कोई भविष्‍य नहीं है। अगर भविष्‍य है तो वो शांतिमय मार्गों का है, वो मैं आज देख करके आया हूं, अनुभव करके आया हूं। मैं हिंसा के रास्‍ते पर चले हुए नौजवानों को कहना चाहता हूं कि कम से कम एक प्रयोग कीजिए, कम से कम दो-पांच दिन के लिए कंधे पर से बंदूक नीचे रख दीजिए। सादे-सीधे आदिवासी पहनते हैं, ऐसे कपड़े पहन लीजिए और आपके कारण जिस परिवार को कोई स्‍वजन खोना पड़ा है, किसी के बाप की मृत्‍यु हुई, है किसी की मां की मृत्‍यु हुई है.. उस घर में बचा हुआ जो बच्‍चा है, पांच दिन सिर्फ उसके साथ ऐसे ही बिता करके आ जाइए, उससे बातें कीजिए और उसको ये मत बताइए कि आप कौन हैं, ऐसे ही बातें कीजिए। मैं विश्‍वास से कहता हूं, वो बालक अपनी बातों से, अपने अनुभव से आपको पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर देगा, आपका हृदय परिवर्तन करके रख देगा। आप भी हिल जाएगे कि हिंसा के नशे में आपने कितना बड़ा पाप कर दिया है। एक बार मानवता को अंगीकार करके, राक्षसी वृत्ति से मुक्ति पा करके.. ज्‍यादा नहीं, कुछ पल इन पीडि़त परिवारों से जरा मिल लीजिए। आपको फिर कभी उस रास्‍ते पर जाने कि नौबत नहीं आएगी। आपको भी लगेगा कि आपने कुछ गलत किया है। कोई सरकार आपको बदले, कोई कानून आपको बदले, कोई लोभ-लालच आपको बदले उससे ज्‍यादा आप ही की गोलियों से पीड़ा पाने वाला एक बालक आपकी जिंदगी बदल सकता है। शर्त यही है कि मानवता का अंगीकार करके कुछ पल उसके साथ बिता करके देख लीजिए। मैंने देखा उन बच्‍चों को आज.. हिंसा से कभी समस्‍याओं का समाधान नहीं हुआ है। मिल-बैठ करके रास्‍ते निकल सकते हैं। छत्‍तीसगढ़ अगर इस संकट से मुक्‍त हो जाए तो मैं विश्‍वास से कहता हूं हिन्‍दुस्‍तान में आर्थिक ऊंचाइयों पर नम्‍बर एक पर छत्‍तीसगढ़ आकर खड़ा हो सकता है। यहां के नौजवानों का भविष्‍य बदल सकता है और छत्‍तीसगढ़ के पास वो ताकत है, वो हिन्‍दुस्‍तान का भविष्‍य भी बदल सकता है। इसलिए मेरे भाईयो-बहनों! विकास एक ही मार्ग है जो हमारी समस्‍याओं का समाधान करेगा।

मुझे आज रमन सिंह जी के livelihood college को भी देखने का अवसर मिला। उन्‍होंने पूरे राज्‍य में उसका जाल बिछाया है। दुनिया के समृद्ध से समृद्ध देश हो तो भी.. एक बात आज उसका प्रमुख काम बन गया है। दुनिया का सुखी देश भी skill development को महत्‍व दे रहे हैं। हुनर सिखाने के लिए दुनिया में, हर देश में priority हो गई है। छत्‍तीसगढ़ के अंदर हुनर से शिखर तक पहुंचने का जो अभियान चलाया गया है, वो काबिले दाद है। मैं देख कर आया हूं। मैंने उन बालक-बालिकाओं को देखा, हाथ में हुनर तो है लेकिन आंख में ओझ है, तेज है और बातों में एक अपरम्‍पार विश्‍वास है। बड़े-बड़े अफसर भी.. सीएम या पीएम से बात करनी है तो कुछ पल तो set होने में time लगता है। मैंने देखा कि बच्‍चे फटाफट बातें करते थे। कोई झिझक नहीं थी, उनकी बातों में कोई झिझक नहीं थी। ये जो confidence level है ये जीवन में आगे बढ़ने के लिए बहुत बड़ी अमानत होता है। वो मैं आज देख कर आया हूं।

Skill Development का मिशन ले करके हम पूरे देश में चल रहे हैं क्‍योंकि हमारे देश के नौजवानों को रोजगार देना है ..और रोजगार देना है तो Skill Development सर्वाधिक सरल मार्ग होता है। जीवन के हर क्षेत्र में, हर नौजवान के हाथ में हुनर हो। जिसके हाथ में हुनर होता है उसको कभी जीवन जीने के लिए हाथ फैलाने की नौबत नहीं आती है, वो अपने बलबूते पर, अपनी शर्तों पर जिंदगी जी सकता है। उसे कभी मजबूर नहीं होना पड़ता है और उस काम को livelihood colleges के माध्‍यम से रमन सिंह जी ने चरितार्थ किया है। देश के अन्‍य राज्‍यों के लिए भी यह अपने आप में एक मिसाल बन सकती है। मैं चाहूंगा, मैं भी प्रयास करूंगा कि देश के और राज्‍य भी आ करके इसको देखें, इस मॉडल को समझें और इसको कैसे लागू किया जा सकता है उस पर चर्चा करें।

भाईयों-बहनों! आपने हमें भारी बहुमत के साथ आपकी सेवा करने का मौका दिया है। छत्‍तीसगढ़ पूरी ताकत के साथ हमारे पीछे खड़ा है और मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं कि जितना आपने दिया है, हम ब्‍याज समेत विकास करके लौटाएंगे।

आज तेंदू पत्‍ता वाले हमारे किसान भाइयों-बहनों को बोनस देने का भी मुझे सौभाग्‍य मिला और उनको भी मैंने पूछा कि क्‍या करोगे, हरेक से मैंने पूछा। हरेक को पता है कि इन पैसों का उपयोग अपने बच्‍चों की जिंदगी संवारने के लिए कैसे करना है, इसका खाका उनके दिमाग में तैयार है। यही तो है हरेक का aspiration । उसको पूर्ण करने का हमारा प्रयास है।

एक समय था.. हिन्‍दुस्‍तान की तरफ दुनिया कैसे दे‍खती थी? ज्‍यादातर तो देखने के लिए तैयार ही नहीं थी और जो देखते थे वो भी बड़े उपेक्षा के भाव से देखते थे या तो हंसी-मजाक के रूप में देखते थे। देखते ही देखते माहौल बदला कि नहीं बदला? दुनिया हिन्‍दुस्‍तान को पूछने लगी कि नहीं लगी? विश्‍व के समृद्ध देशों को भी हिन्‍दुस्‍तान की अहमियत को मानना पड़ा कि नहीं मानना पड़ा। सवा सौ करोड़ का देश! इसको सर झुका करके जीने की जरूरत नहीं है। वो वक्‍त चला गया। सवा सौ करोड़ देशवासियों का संकल्‍प है कि हमारा देश माथा ऊंचा करके आंख से आंख मिला करके, सीना तान करके जीने के लिए पैदा हुआ है, झुकने के लिए पैदा नहीं हुआ है। वो शक्ति हमारे भीतर पड़ी है, सवा सौ करोड़ देशवासियों के भीतर पड़ी है। उस शक्ति को मैं भली-भांति पहचानता हूं। विश्‍व में जब किसी से बात करता हूं तो अकेला मोदी बात नहीं करता है, सवा सौ करोड़ देशवासी एक साथ आंख मिला करके बात करते हैं और विश्‍व आज हिन्‍दुस्‍तान का लोहा मानने लगा है। पूरे विश्‍व मानने लगा है कि आज दुनिया में तेज गति से आर्थिक विकास करने वाला कोई देश अगर है.. सारे संसार में, तो उस देश का नाम है- हिन्‍दुस्‍तान।

कितनी तेजी से परिवर्तन आ रहा है, लेकिन कुछ लोग होते हैं, जिनको जीवनभर लोगों को गरीब रखने में ही आनंद आया, दु:खी रखने में ही आनंद आया। अगर उसमें कुछ बदलाव आता है, तो वो अब दु:खी हो रहे हैं। उनकी परेशानी मैं समझ सकता हूं। जो लोग विजय पचा नहीं पाए 60 साल तक, वो पराजय भी नहीं पचा पा रहे हैं। भाईयों-बहनों, जिनको जनता ने नकार दिया है, उनके पास झूठ फैलाने के सिवाए, जनता को भ्रमित करने के सिवाए, जनता को गुमराह करने के सिवाए कोई रास्‍ता नहीं बचा है।

मैं देशवासियों को विश्‍वास दिलाता हूं, इन्‍हीं दिनों को याद कर लीजिए, इसी कालखंड में मैं छत्‍तीसगढ़ भी आया था, पिछले साल। अखबारों में क्‍या आता था? टीवी में क्‍या समाचार आते थे एक साल पहले? .. आज इतने का भ्रष्‍टाचार हुआ, आज ये घोटाला हुआ, वो घोटाला हुआ, इसने इतना मार लिया, उसने उतना लूट लिया, यही खबरें आती थीं कि नहीं आती थीं। कोयले की चोरी की चर्चा होती थी कि नहीं होती थी? एक साल हुआ है मेरे भाईयों-बहनों! एक भी खबर आई है क्‍या? क्‍या ईमानदारी से देश नहीं चलाया जा सकता क्‍या? चलाया जा सकता है। एक साल के अनुभव से मैं कह सकता हूं कि ये देश ईमानदारी से चलाया जा सकता है।

चिठ्ठी–पर्ची से कोयले की खदानें दे दी थीं। आज हमने सार्वजनिक रूप से auction किया और वो खज़ाना राज्‍य की तिजोरी में दे दिया। कोयले के auction का पैसा राज्‍य के खज़ाने में आ गया। इतना ही नहीं, जहां पर खनिज़ निकलता है, उस इलाके के जो जिले हैं.. और ज्‍यादातर पूरे देश में आदिवासी क्षेत्र है जहां पर खनिज़ सम्‍पदा है। वहां हमने special संगठन की रचना की है। वहां से कुछ हिस्‍सा लोगों के कल्‍याण के लिए खर्च कर दिया जाएगा। पहली बार गरीबों के लिए रुपए तिजोरी से निकालने का काम हो रहा है।

मुझे विश्‍वास है कि जिस विकास के रास्‍ते पर हम चल पड़े हैं, उस रास्‍ते से देश की समस्‍याओं का समाधान भी करेंगे, आपकी आशाओ-आकांक्षाओं को परिपूर्ण भी करेंगे और आपके साथ कंधे से कंधा मिला करके देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में हम सफल होंगे।

इसी एक विश्‍वास के साथ मैं फिर एक बस्‍तर को, छत्‍तीसगढ़ को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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Baba Saheb Ambedkar was a person with universal vision: PM Modi
April 14, 2021
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Baba Saheb Ambedkar had a universal vision: PM Modi
Baba Saheb Ambedkar gave a strong foundation to independent India so the nation could move forward while strengthening its democratic heritage: PM
We have to give opportunities to the youth according to their potential. Our efforts towards this is the only tribute to Baba Saheb Ambedkar: PM

Namaskar!

Present with me in this programme, Gujarat Governor Acharya Shri Dev Vrat ji, the country’s Education Minister Shri Ramesh Pokhriyal Nishank ji, Chief Minister of Gujarat Shri Vijay Rupani ji, Education Minister of Gujarat Shri Bhupendra Singh ji, Chairman of UGC Prof. D.P.Singh ji, Babasaheb Ambedkar Open University Vice-Chancellor Prof. Ami Upadhyay ji, Association of Indian Universities President Prof. Taj Pratap ji, all dignitaries and friends.

Today when the country is celebrating the Amrit Mahotsav of Independence, the occasion of Babasaheb Ambedkar ji's birth anniversary also connects us with that great yagna and also with the inspiration of the future. On behalf of the grateful nation and all the countrymen, I pay my respectful homage to Babasaheb.

Friends,

During the freedom struggle, millions and millions of our freedom fighters dreamt of a harmonious and inclusive India. Babasaheb made the beginning in realizing those dreams in the form of the Constitution to the country. Today India is creating a new future and achieving new dimensions of success by following the same Constitution.

Friends,

Today, the 95th meeting of the Vice Chancellors of Association of Indian Universities is taking place on this auspicious day. Babasaheb Ambedkar Open University has announced the establishment of 'Babasaheb Samarasta Chair'. The four books written by Shri Kishore Makwana ji have also been released on Babasaheb's life, his thoughts and ideals. I congratulate all the dignitaries involved in these efforts.

Friends,

India has been the mother of democracy in the world. Democracy has been an integral part of our civilization and our way of life. Babasaheb laid a strong foundation to independent India so the nation could move forward while strengthening its democratic heritage. When we read and understand Babasaheb, we realize that he was a person of universal vision.

There is a clear vision of Babasaheb's philosophy in Shri Kishore Makwana ji's books. While one of his books introduces Babasaheb’s “Jeevan Darshan” (philosophy of life), the other focuses on “Vyakti Darshan” (individual philosophy). Similarly, the third book highlights Babasaheb's “Rashtra Darshan” (national philosophy), whereas the fourth book “Aayam Darshan” will introduce his philosophy of dimension to the countrymen.  These four philosophies are no less than modern scriptures in themselves.

I would like our new generation in colleges and universities to read more and more of such books. All these dimensions, whether it is the inclusive society, the concern for the rights of the Dalit-deprived society, the question of upliftment and contribution of women, or Babasaheb's vision on education and especially on higher education, will offer an opportunity to the youth of the country to understand Babasaheb.

Friends,

Doctor Ambedkar would say:

"My three revered deities are -- Knowledge, self-respect and politeness.” Self-respect comes with knowledge and makes a person aware of his or her rights. Through equal rights, social harmony emerges and the country progresses.

We are all familiar with Babasaheb's struggles of life. The position that Babasaheb reached after so many struggles is a great inspiration for all of us. Our education system and universities have this responsibility to carry the country forward on the path shown by Babasaheb Ambedkar. And when it is the issue of common goals and shared efforts as a nation, collective efforts become the means of accomplishment.

Therefore, I think the role of Association of Indian Universities becomes very important. AIU also has the legacy of scholars like Dr. Sarvepalli Radhakrishnan ji, Dr. Shyama Prasad Mukherjee, Smt. Hansa Mehta and Dr. Zakir Hussain.

Dr. Radhakrishnan ji would say: “The end-product of education should be a free creative man, who can battle against historical circumstances and adversities of nature”.

It implies that education should be such which should liberate the person, so that he can think openly, and make something new with a new thinking. He believed that we should develop our education management as a unit of the entire world. But at the same time, he emphasized the Indian character of education. This becomes even more important in the global scenario today.

Here special issues were released on the new 'National Education Policy' and plan for its implementation. These issues are detailed documents how National Education Policy is a futuristic policy, a policy of global parameters. You all scholars are familiar with the nuances of the National Education Policy. The purpose of education that Dr. Radhakrishnan ji spoke about is reflected in the core of this policy.

I am told that this time the theme of the seminar is - 'Implementing National Educational Policy-2020 to Transforming Higher Education in India'. All of you deserve congratulations for this.

I have been constantly discussing NEP with experts. National Education Policy is as practical as its implementation.

Friends,

You have dedicated your entire life to education. You all know very well that every student has his own capability and capacity. Based on these capabilities, students and teachers also have three questions.

First: What can they do?

Second: What is their potential if they are properly taught?

And, third, what they want to do?

What a student can do is his inner strength. But if we add institutional strength to his inner strength, his development becomes expansive. With this combination, our youth can do what they want to do. Therefore, the country’s special emphasis is on skill development. As the country is moving ahead with the mission of the AatmaNirbhar Bharat, the role and demand of skilled youths is also increasing.

Friends,

In view of the strength of skills, Dr. Shyama Prasad Mukherjee had placed greater emphasis on the collaboration of educational institutions and industries decades ago. Today, the country has immense opportunities, and there are new industries of modern times. India is being looked upon as a future centre of Artificial Intelligence, Internet of Things, Big Data, 3D printing, Virtual Reality, Robotics, mobile technology, geo-informatics, smart healthcare and defence sector. The country is taking huge steps to meet these requirements.

Indian Institutes of Skills are being set up in three big metropolitans of the country. The first batch of the Indian Institute of Skills has already started in Mumbai a few months ago in December. The Future Skills Initiative was launched with NASSCOM in 2018. This initiative offers training in more than 150 skill sets in 10 emerging technologies.

Friends,

The new National Policy on Education also provides for NETF which emphasizes the maximum use of technology in education. We want all universities to be multi-disciplinary. We want to give flexibility to students so that they can complete courses anywhere easily through the easy entry-exit and Academic Bank of Credit. Every university in the country will have to work together to achieve all these goals. All the Vice Chancellors have to pay special attention to this.

A huge skill pool will be created in our universities for the new possibilities that we can create in the country. All of you are requested to work in this direction more expeditiously and the work should be completed within a stipulated time.

Friends,

The country is rapidly transforming the lives of the poor, Dalits, the victims, the exploited and the deprived following the footsteps of Babasaheb Ambedkar. Babasaheb talked about equal opportunities and equal rights. Today, schemes like Jan Dhan accounts are leading to financial inclusion of every person and through DBT money is reaching directly to their accounts.  The BHIM UPI that was launched for the digital economy has become a great strength for the poor today. Today, every poor person is getting a house and free electricity connection. Similarly, work is in the progress to provide clean water to villages under the Jal Jeevan Mission.

When there was a corona crisis, the country stood up for the poor and the labourers. There is no discrimination among the poor and the rich in the world's largest vaccination program. This is the path shown by Babasaheb and these are his ideals.

Friends,

Babasaheb always emphasized on women empowerment and made many efforts in this direction. It is with this vision that the country is giving new opportunities to its daughters today. From toilets at home and schools to combat roles in the army, women are at the centre of every policy of the country today.

Similarly, the country is working to spread Babasaheb's message to the people. The places associated with Babasaheb are being developed as Panch Teerth.

A few years ago, I had the opportunity to dedicate the Dr. Ambedkar International Centre. Today, this Centre is emerging as a centre of research on social and economic issues and on Babasaheb's life.

Friends,

Today, we are close to 75 years of independence, and we have goals for the next 25 years. The country’s future, the future goals and successes of the country are linked to our youth. It is our youth who will fulfill these resolutions. We have to give opportunities to the youth of the country to the best of their ability.

I am confident that our collective resolve and conscious efforts of the education world will realise this dream of a New India.

Our efforts and the hard work will be our tribute to Babasaheb.

With these good wishes, I once again thank you all very much. I wish you all the very best on Navratri. I also extend my special greetings on the birth anniversary of Babasaheb Ambedkar.

Many thanks.