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भारत और जापान के बीच जो गहरे संबंध हैं, उन संबंधों का यश सिर्फ दो देशों की सरकारों को नहीं जाता है। उन संबंधों का यश आप जैसे सामाजिक जीवन के सभी वरिष्‍ठ लोगों ने जिस भावना के साथ एक छोटे से पौधे को अपनी बुद्धिमता-क्षमता के अनुसार एक विशाल वटवृक्ष बनाया है, इसके लिए आपको और आपके पूर्व के पीढि़यों को इसका यश जाता है। उनका हक बनता है और मैं इसलिए अब तक जिन-जिन लोगों ने भारत और जापान के संबंधों को सुदृढ़ किया है, उन सबका मैं हृदय से आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

मुझे बताया गया है कि भारत-जापान एसोसिएशन को 110 साल हो गए हैं। मैं सोच रहा था कि आज के युग में एक फैमिली भी 100 साल तक इकट्ठे नहीं रहती है। अगर एक परिवार 100 साल तक इकट्ठा नहीं रह सकता है तो ये लीडरशिप की कितनी मैच्‍योरिटी होगी, दोनों देशों के नीति निर्धारकों की कितनी मैच्‍योरिटी होगी, जिसके कारण 110 साल तक ये संबंध और गहरा होता गया। ये अपने आप में, एक बहुत बड़ी प्रेरणा दायक घटना है।

मुझे यह भी बताया गया कि जापान की किसी भी देश के साथ इतनी पुरानी एक भी एसोसिएशन नहीं है, जितनी कि जापान और भारत की है। हमारे पूर्वजों ने ये जो महान नींव रखी है, मैं नहीं मानता हूं कि ये महान काम किसी तत्‍कालीन लाभ के लिए किया गया है। ये नींव पूरे मानव जाति के कल्‍याण को ध्‍यान में रखते हुए ये नींव रखी गई है जिसे दोनों देशों के महानुभावों ने और ताकतवर बनाया है।

अब हम इस पीढ़ी की और आने वाले पीढि़यों की जिम्‍मेदारी है, कि जो 110 साल की ये यात्रा है, एक तपस्‍या है, उसको हम अधिक प्राणवान कैसे बनायें, अधिक जीवंत कैसे बनायें और आने वाली पीढि़यों तक उसके संस्‍कार संक्रमण के लिए हम मिलकर के क्‍या कर सकते हैं, ये हम सबका दायित्‍व है।

कल जैसे प्रधानमंत्री आबे और मेरे बीच जो वार्ता हुई, हमारा एक जो तोक्यो डिक्‍लरेशन था, उसमें एक महत्‍वपूर्ण निर्णय हुआ है कि अब तक हम ‘स्‍ट्रे‍टेजिक ग्‍लोबल पार्टनर्स’ के रूप में काम करते थे, अब हमारा उसका स्‍टेटस ऊपर करके ‘स्‍पेशल स्‍ट्रेटेजिक ग्‍लोबल पार्टनर्स’ के रूप में आगे बढ़े हैं। ये हो सका है, इसके दो कारण हैं। एक, ये 110 साल पुरानी निरंतर हमारी ये एसोसिएशन, ये निरंतर संपर्क की व्‍यवस्‍था, इंडियन और जापानीज पार्लियामेंट्री एसोसिएशन की सक्रियता और दूसरा जो सबसे बड़ा कारण है, वह आज भले हम स्‍पेशल स्‍ट्रेटेजिक ग्‍लोबल पार्टनर्स के रूप में कागज पर हमने शायद लिखा हो, लेकिन जो चीज हमने कागज पे नहीं, हमारे दिलों में लिखी गई है, वह है जापान भारत की ‘स्पिरिचुअल पार्टनरशिप’।

मैं देख रहा हूं कि जापान में धीरे-धीरे हिंदी भाषा सीखने का जो उत्‍साह है, उमंग है, वह बढ़ता ही चला जा रहा है। उसी प्रकार से योग के संबंध में मैं देख रहा हूं कि जापान की रूचि और बढ़ रही है। यानी एक-एक बारीक चीज का संबंध हमारा जुड़ रहा है।

जापान का भारत पर कितना बड़ा हक है, मैं एक उदाहरण बताना चाहता हूं। अभी कुछ दिन पहले मुझे आपकी एक चिट्ठी मिली थी और चिट्ठी में आपने मुझे लिखा था कि मोदी जी आप आएंगे तो हिंदी में बोलिये। आप ही ने लिखी थी ना। जरा सा हमारे भारत के लोगों को आपका चेहरा बताइए। और इतनी बढि़या हिंदी में चिट्ठी लिखी है। प्‍लीज, ये हमारे लोग देखना चाहेंगे, आपको। इतनी, इतनी बढि़या हिंदी में चिट्ठी लिखी है उन्‍होंने मुझे और उन्‍होंने मुझे आग्रह किया है कि मोदी जी, मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आप जापान के किसी भी कार्यक्रम में जाएं, कृपा करके हिंदी में बोलिये।

देखिए, एक-एक सामान्‍य व्‍यक्ति का ये जो लगाव है, ये जो अपनापन है, ये अपने आप में हैरान करने वाला हे। जब मैं यहां सुभाष चंद्र बोस की बात करूं तो मुझे यहां इतने लोग मिलेंगे, बड़े गौरव के साथ उन स्‍मृतियों को बताएंगे। मुझे ये भी बताया गया है कि आपके इन सदस्‍यों में एक सबसे वयोवृद्ध हैं। शायद उनकी उमर 95 इयर है। वे आज भी सुभाष बाबू की सारी घटनाओं का इतना वर्णन करते हैं, इतनी डिटेल बताते हैं। सुभाष बाबू उनसे शेक हैंड नहीं करते थे, गले लगते थे। वे सारी बातों को बताते हैं। वो यहां बैठे हैं खास इस काम के लिए आए हैं। खड़े हो पाएंगे, मैं उनको प्रणाम करता हूं। वो सुभाष बाबू के एक बहुत बड़े निकट के साथी रहे हैं।मैं उनको प्रणाम करता हूं।

आपको सुभाष बाबू की कौन सी साल, कौन सी डेट, सारी घटनाएं अभी भी याद हैं। मैंने हमारे एम्‍बेसेडर को कहा है कि हाइली प्रोफेशनल वीडियो टीम उनके साथ एक महीने के लिए लगा दिया जाए और उसका वीडियो रिकॉर्डिंग होना चाहिए। महीने भर कोई उसके साथ रहें, उनका इंटरव्‍यू लेते रहे और हर पुरानी बातों को रिकार्ड करे। क्‍योंकि यह एक जीते-जागते इतिहास की हमारे पास तवारीख हैं। तो ऐसी बहुत सी चीजें हमारे साथ जुड़ी हुई हैं।

मैं जब पहली बार जापान आया था तो मैं मोरी जी के घर गया था। बड़े प्‍यार से उन्‍होंने मुझे अपने घर पर बुलाया था, तो कड़ी की बात निकली। जापान में कड़ी बहुत फेमस है। तो मुझे बताया गया, बंगाल से जो परिवार आए थे, उन्‍होंने सबसे पहले कड़ी की शुरूआत की थी। वो आज एक प्रकार से जापान की फेवरेट डिश बन गई है। यानी कितनी निकटता कितनी बारीकी है। और मैं मानता हूं कि इसको हमें और महात्‍म्‍य देना चाहिए। और आगे बढ़ना चाहिए।

पार्लियामेंट्री ऐसोसिएशन का भी बहुत बड़ा योगदान है। इन संबंधों के कारण दोनों देशों की नीतियों में हमेशा उस बात पर ध्‍यान रखा गया है कि हमारे संबंधों को कोई खरोंच न आ जाए। कोई भी उस पर नुकसान न हो जाए।

पार्लियामेंट्री एसोसिएशन के लिए मेरे मन में कुछ विचार आए हैं। मैं चाहूंगा कि इसको आगे चलकर के हम इसको कुछ एक्‍सपैंड कर सकते हैं क्‍या ? एक तो मैं भारत के लिए इस पार्लियामेंट्री एसोसिएशन के लिए निमन्‍त्रण देता हूं। आप आइए और दिल्‍ली के सिवाए भी मैं चाहूंगा कि कुछ और लोकेशन पर भी जाइए और भारत को खुशी होगी, आप सबकी मेहमान नवाजी करने की। दो-तीन और चीजें अगर हम कर सकते हैं तो सोचें। एक पार्लियामेंट्री एसोसिएशन बहुत अच्‍छा चल रहा है। भारत से भी लोग यहीं आते हैं। यहां के भी पार्लियामेंट मेम्‍बर्स आते हैं और एक अंडरस्‍टेंडिंग ईच अदर, ये अपने आप में बहुत अच्‍छी प्रोग्रेस हो रही है। लेकिन समय रहते उसमें मुझे थोड़े बदलाव की मुझे जरूरत लगती है।

इसी पार्लियामेंटरी एसोसिएशन के साथ एक छोटा सा यंग पार्लियामेंटरी ऐसोसिएशन बना सकते हैं क्‍या ? जो दोनों देशों के यंगेस्‍ट पार्लियामेंटेरियंस हैं, उनका जरा मिलना-जुलना हो, वो अपनी नई पीढ़ी की सोच की चर्चा करें। उस दिशा में कुछ कर सकते हैं क्‍या ?

दूसरा, एक मेरे मन में विचार आता है, क्‍या दोनों देशों की वीमेन पार्लियामेंट मेम्‍बर्स का एसोसिएशन बन सकता है क्‍या। जिसमें महिला पार्लियामेंट मेम्‍बर्स के बारी-बारी से मिलने की संभावना बन सकती है क्‍या ?सभी महिलाओं ने सबसे पहले तालियां बजाई हैं।

तीसरा एक जो मुझे लगता है कि भारत इतना विशाल देश है। इतने राज्‍य हैं, हर राज्‍य की अपनी असेम्‍बली है, और असेम्‍बली के भी मेम्‍बर्स है। क्‍या कभी न कभी हम उन राज्‍यों से और एक ही राज्‍य से सभी एमएलए नहीं, लेकिन 5-6 राज्‍यों के दो-दो करके एमएलए यहां आए और यहां से भी उसी प्रकार से लोकल बॉडीज के लोग आयें । ये अगर हमारा बनता है तो इतना बड़ा विशाल देश है, भिन्‍न–भिन्‍न कोने में जाने का हो जाए। और हम यह तय कर सकते हैं कि जापान का कोई न कोई डेलीगेशन, हिंदुस्‍तान में 25 से भी ज्‍यादा राज्‍य हैं, हर महीने अगर दो डेलीगेशन आते हैं, और एक राज्‍य में एक डेलीगेशन जाता है और लोग आते चलें – आते चलें। अब देखिए, देखते ही देखते जापान में हिंदुस्‍तान की एक्‍सपर्टाइज वाले 1000 लोग तैयार हो जाएंगे।

आपने मुझे यहां बुलाया, मेरा सम्‍मान किया। मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं। लेकिन मैं अनुभव करता हूं, मैं कारण नहीं जानता हूं। लेकिन, मैं जब भी जापान आया हूं और जब भी जापान के लोगों से मिलता हूं मुझे एक अलग सा अपनापन महसूस होता है। वो ये अपनापन क्‍या है, मैं नहीं जानता, शास्‍त्र कौन से होंगे। देखिए मुझे बहुत अपनापन लगता है और मुझे इतना प्‍यार मिलता है जापान से।

आपके एम्‍बेसडर मेरे यहां थे, वो मेरे यहां 3 साल रहे और मैंने देखा कि हम इतने मित्र की तरह साथ काम करते थे, इतनी हमारी दोस्‍ती बन गई थी। और इतने कामों को हम बढ़ा रहे थे और इसलिए मैं मानता हूं कि आपने जो अपनापन मुझे दिया है, वो प्रधानमंत्री पद से भी बहुत बड़ी चीज है। बहुत बड़ी चीज है, जो आपने मुझे दिया है। मैं इसको कभी भूल नहीं सकता हूं।

मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं, और मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्‍यवाद।

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Venkaiah ji’s quality of always staying active will keep him connected to public life for a long time to come: PM
August 08, 2022
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“Venkaiah ji’s quality of always staying active and engaged will keep him connected to public life for a long time to come”
“We should always try to fulfil the expectations that he has from all the Parliamentarians”
​​​​​​​“Initiatives like ‘Bhashini’ and annual compendium of new words emerging from Parliamentary debates will carry forward Venkaiah ji’s legacy of love for the mother tongue”

आदरणीय उपराष्‍ट्रपति जी, मंचस्‍थ सभी वरिष्‍ठ महानुभाव, उपस्थित सभी गणमान्‍य सांसदगण, अन्‍य सभी महानुभाव।

जितना मैं वैंकेया जी को जानता हूं, मुझे नहीं लगता है कि विदाई संभव है। 11 तारीख के बाद आप जरूर अनुभव करेंगे कि किसी न किसी काम से आप के पास फोन आएगा, आपके विषय में कोई जानकारी लेनी होगी, सुख-दुख की बात होगी तो तुरंत पूछेंगे। यानी एक प्रकार से वो हल पल सक्रिय रहते हैं, हर पल हर किसी के बीच होते हैं और ये उनकी बड़ी विशेषता रही है। उनके जीवन की भी क्षमता को अगर हम देखें, मैं जब पार्टी संगठन का काम करता था और उस समय अटलजी की सरकार बनी। मंत्रीपरिषद की रचना हो रही थी, मैं संगठन का काम करता था तो मेरा और वैंकेया जी के बीच संवाद जरा अधिक रहता था। उन्‍होंने मुझे कहा कि वैसे तो ये प्रधानमंत्री का ही अंतिम निर्णय होता है कि कौन मंत्री बनेगा, किस मंत्री को क्‍या काम मिलेगा, कौन सा डिपार्टमेंट रहेगा और ये भी तय था कि साउथ में से वैंकेया जी जैसे वरिष्‍ठ नेता का मंत्री होना तय था। लेकिन वो चाहते थे कि बहुत बड़ा तामझाम वाला जरा ग्लैमरस, ऐसा कोई डिपार्टमेंट से मुझे बचाइए और बोले अगर प्रधानमंत्री जी को बुरा न लगे तो मेरी इच्‍छा है कि मेरे मन का काम अगर है वो ग्रामीण विकास है, अगर ग्रामीण विकास का काम मुझे मिले तो मैं करना चाहता हूं। यानी ये passion, ये अपने-आप में बहुत बड़ी बात है।

अटलजी को वैंकेया जी की और भी जरूरतें थीं, लेकिन चूंकि उनका मन ये था तो अटलजी ने उस प्रकार से निर्णय भी किया और उस काम को बखूबी वैंकेया जी ने निभाया। अब और एक विशेषता देखिए, वैंकेया जी शायद एक ऐसे व्‍यक्ति हैं कि जिन्‍होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय तो देखा ही देखा, शहरी विकास भी देखा। यानी एक प्रकार से विकास के जो दोनों प्रमुख पहलु कहें, उसमें उन्‍होंने अपनी महारत दिखाई।

वे पहले ऐसे उपराष्‍ट्रपति थे, राज्‍यसभा के पहले सभापति थे, जो राज्‍यसभा के मेंबर रहे। बाकी ये सौभाग्‍य बहुत कम लोगों को मिला, शायद अकेले वैंकेया जी को मिला। अब जो स्‍वयं लंबे समय तक राज्‍यसभा में रहे हों, जो पार्लियामेंटरी अफेयर्स के रूप में कार्यभार देख चुके हों, इसका मतलब है कि उनको सदन में क्‍या-क्‍या चलता है, परदे के पीछे क्‍या-क्‍या चलता है, कौन सा दल क्‍या करेगा, ट्रेजरी बेंच की तरफ से क्‍या होगा, सामने से क्‍या होगा, वो उठकर उसके पास गया मतलब ये खुराफत कुछ चल रही है, इन सारी बातों का उनको भलीभांति अंदाज था और इसलिए सभापति के रूप में दोनों तरफ उनको पता रहता था आज ये करेंगे। और ये उनका जो अनुभव था वो ट्रेजरी बेंच के लिए उपयोगी होता था तो विपक्ष के मित्रों के लिए परेशानी का भी कारण बनता था कि पता चल जाता था। लेकिन उन्‍होंने सदन को और अधिक सक्षम बनाना, सांसद का बेस्‍ट देश को कैसे मिले, ये उसकी चिंता है। पार्लियामेंटरी कमिटीज अधिक productive हो, आउटकम ओरिएंटेड हो और वैल्‍यू एडीशन करने वाली हो। शायद वैंकेया जी पहले ऐसे सभापति रहे होंगे जिन्‍होंने पार्लियामेंटरी कमीटीज के फंक्‍शन के संबंध में भी इतनी चिंता की होगी और राजी-नाराज़गी व्‍यक्‍त करते हुए उसमें सुधार लाने का एक निरंतर प्रयास किया।

मैं आशा करता हूं कि आज जब हम वैंकेया जी के कार्यों की सराहना करते हैं तो साथ-साथ हम संकल्‍प भी करें कि सभापति के रूप में एक सांसद के नाते हम लोगों से उनकी जो अपेक्षाएं रही हैं उन अपेक्षाओं को परिपूर्ण करके सच्‍चे अर्थ में उनकी सलाह को हम जीवन में यादगार बनाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत बड़ी सेवा होगी।

वैंकेया जी समय का सर्वाधिक उपयोग कैसे हो उनके व्‍यक्तिगत जीवन में बहुत यात्रा करना, स्‍थान-स्‍थान पर खुद जाना तो उनके पिछले पांच दशक की जिंदगी रही। लेकिन जब कोरोनाकाल आया, हम लोग मजाक में एक बार बैठे थे तो बातें चल रही थीं। मैंने कहा इस कोरोना के कारण और इस लॉकडाउन के कारण सबसे ज्‍यादा मुसीबत किसको आएगी, मैंने अपने साथियों को पूछा था। सब लोगों को लगा‍ कि मोदीजी ये क्‍या पूछ रहे हैं। मैंने कहा कल्‍पना कीजिए, सबसे ज्‍यादा तकलीफ किसको आएगी, तो कोई जवाब मिला नहीं। मैंने कहा कि इस परिस्थिति की सबसे ज्‍यादा मुसीबत अगर किसी को आएगी तो वैंकेया नायडू को आएगी। क्‍योंकि वो इतनी दौड़धूप करने वाले व्‍यक्ति, उनके लिए एक जगह पर बैठना, ये बहुत बड़ा punishment का कालखंड था उनके लिए। लेकिन वे innovative भी हैं और उसके कारण उन्होंने इस कोरोना कालखंड का एक बड़ा रचनात्‍मक उपयोग किया। उन्‍होंने, मैं एक शब्‍द प्रयोग करना चाहूंगा, बहुत से वो विद्वान लोगों की नजर में ठीक‍ होगा‍ कि नहीं, मैं नहीं जानता हूं, लेकिन वो टेली यात्रा करते थे। वो टेली यात्रा, उन्‍होंने क्‍या किया, सुबह टेलीफोन डायरी लेकर बैठते थे और पिछले 50 साल में देश में भ्रमण करते-करते सार्वजनिक जीवन में, राजनीतिक जीवन में जिन-जिन लोगों से उनका संबंध आया, उसमें जो वरिष्‍ठ लोग थे, daily 30, 40, 50 लोगों को फोन करना, उनके हाल पूछना, कोरोना के कारण कोई तकलीफ तो नहीं है इसकी जानकारी प्राप्‍त करना और हो सके तो मदद करना।

उन्‍होंने समय का इतना सदुपयोग किया था लेकिन उन दूर-सुदूर इलाकों में छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं को जब उनका टेलीफोन आता था तो वो तो ऊर्जा से भर जाता था। इतना ही नहीं, शायद ही कोई एमपी ऐसा होगा कि जिन्‍होंने कोराना काल में वैंकेया जी की तरफ से फोन उनको न आया हो, उनकी खबर न पूछी हो, वैक्‍सीनेशन की चिंता न की हो। यानी एक प्रकार से परिवार के मुखिया की तरह उन्‍होंने सबको संभालना, सबकी चिंता करने का भी उनका प्रयास रहा।

वैंकेया जी की एक विशेषता है, मैं जो कहता हूं ना कि वो कभी हमसे अलग हो ही नहीं सकते और उसका मैं उदाहरण बता रहा हूं। एक बार इलेक्‍शन कैंपेन के लिए वो बिहार गए हुए थे। अचानक उनके हेलीकॉप्‍टर को लैंडिंग करना पड़ा, खेत में उतरना पड़ा। अब वो इलाका भी थोड़ा चिंताजनक था, थोड़े सिक्‍योरिटी के भी इशू खड़े हो जाएं इस प्रकार का था। लेकिन नजदीक के एक किसान ने आ करके उनकी मदद की, मोटरसाइकिल पर उनको नजदीक के पुलिस थाने तक ले गया।

अब भारत के सार्वजनिक जीवन के हिसाब से देखें तो वैंकेया जी बहुत बड़े व्‍यक्ति हैं लेकिन आज भी उस किसान परिवार से उनका जीवंत नाता है। यानी बिहार के दूर-सूदूर ग्रामीण जीवन में एक घटना के समय किसी की मदद मिली। वो मोटरसाइकिल वाला किसान आज भी वैंकेया जी के साथ मेरी बात होती है, लगातार होती है, इस प्रकार का गर्व से बात करे, ये वैंकेया जी की विशेषता है।

और इसलिए मैं कहता हूं क्‍योंकि हमेशा हमारे बीच एक सक्रिय साथी के रूप में रहेंगे, मार्गदर्शक के रूप में रहेंगे, उनका अनुभव हमारे लिए काम आता रहेगा। आने वाला उनका कार्यकाल अधिक अनुभव के साथ अब वैंकेया जी समाज की एक नई जिम्‍मेदारी की तरफ आगे बढ़ रहे हैं तब। ये बात सही है, आज सुबह जब वो कह रहे थे तो उनका उन्‍होंने भई मुझे जब ये दायित्‍व आया तो मेरा एक पीड़ा का कारण ये था कि मुझे मेरी पार्टी से इस्‍तीफा देना पड़ेगा। जिस पार्टी के लिए मैंने जीवन खपा दिया, इससे मुझे इस्‍तीफा देना पड़ेगा। उसका मुझे कोई वो संवैधानिक आवश्‍यकता थी तो। लेकिन मुझे लगता है कि वो पांच साल की जो कमी है वैंकेया जी जरूर भरपाई कर देंगे, जरूर उन पुराने सारे साथियों को प्रेरित करना, प्रोत्‍साहित करना, पृस्कृत करने का उनका काम निरंतर जारी रहेगा। मेरी तरफ से, आप सबकी तरफ से वैंकेया जी का जीवन हम लोगों के लिए बहुत बड़ी अमानत है, बहुत बड़ी विरासत है। उनके साथ जो कुछ भी हमने सीखा है उसको हम आगे बढ़ाएं।

भाषा के प्रति उनका जो लगाव है और उनहोंने मातृभाषा को जिस प्रकार से प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है उसको आगे बढ़ाने के और भी प्रयास होंगे।

मैं आप में से शायद लोगों को अगर रूचि हो तो मैं आग्रह करूंगा कि ''भाषिणी'' एक वेबसाइट भारत सरकार ने लॉन्‍च की हुई है, इस ''भाषिणी'' में हम भारतीय भाषाओं को, उसकी समृद्धि को और हमारी अपनी ही भाषाओं को एक भाषा में से दूसरी भाषा में अगर interpretation करना है, ट्रांसलेशन करना है, उसमें सारी व्‍यवस्‍था है। एक बहुत ही अच्‍छा टूल बना हुआ है जो हम लोगों को काफी काम आ सकता है। लेकिन उसमें से मुझे एक और विचार आया है, मैं चाहूंगा कि स्‍पीकर महोदय भी और हरिवंश जी भी, हरिवंश जी तो उसी दुनिया के व्‍यक्ति हैं, जरूर इस दिशा में काम हो सकता है। दुनिया में डिक्‍शनरी में नए शब्‍द जोड़ने की परंपरा रही है। और officially announce भी होता है, एक बड़ा इसका महात्‍मय होता है जब फलाने देश की फलानी भाषा का फलाना वर्ड अब अंग्रेजी की उस डिक्‍शनरी में स्‍थान प्राप्‍त कर रहा है, उसका गौरव भी होता है। जैसे हमारा गुरू शब्‍द वहां की अंग्रेजी डिक्‍शनरी में उसका हिस्‍सा बन चुका है, ऐसे कई शब्‍द होते हैं।

हमारे यहां जो मातृभाषा में भाषण हो दोनो सदनों में उसमें कई लोगों के पास से बहुत बढ़िया शब्‍द निकले, निकलते हैं। और और भाषा के लोगों के लिए वो शब्‍द बड़ा सार्थक भी लगता है और बड़ा interesting लगता है। क्‍या हमारे दोनों सदन हर साल इस प्रकार के नए शब्‍द कौन से आ रहे हैं, जो सचमुच में हमारी भाषा वैविध्‍य को ले करके आते हैं, नए तरीके से आते हैं, उसका संग्रह करके चलें, और हर वर्ष एक बार अच्‍छे शब्‍दों का संग्रह की परंपरा खड़ी करें ताकि हमारी मातृभाषा से जो वैंकेया जी का लगाव रहा है, उनकी इस legacy को हम आगे बढ़ाएं। और जब भी हम इस काम को करेंगे, हमें हमेशा वैंकेया जी की बातें याद आएंगी और एक जीवंत काम हम खड़ा कर देंगे।

मैं फिर एक बार आप सबको बहुत शुभकामनाएं देता हूं। वैंकेया जी को, उनके पूरे परिवार को अनेक-अनेक शुभकामनाओं के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।