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माननीय श्री सुभाष नेंबंग पार्लियमेंट के स्पीकर श्री एवं माननीय सांसदगण और आदरणीय सभागृह ‘मै नेपाल म आउं न पायकोमा अत्यंत ही हर्षित छूं। धैरे-धैरे वर्षगी एक पथिक यातित तीर्थालुको रुकमा मय यहां आएको धीये। यो घनइष्ठ कि एक पतक तपइले नेपाल को भ्रमण करलो भयो भले यो जीवन पर्यंत संबंध मा बदलिन छो। प्रथमतया यश सुंदर देश को स्वाधिको रुकमा मफेरी फरकेल आएको छो। भारत को प्रधानमंत्री को हैसियत मा पुनः आउमो पावदा। वास्तव में मैले भाग्यशाली महसूस करछू। यो यस्तो यात्ताथियो जुनमें प्रधानमंत्री को कार्यालय म प्रवेश घर्लवित्तै की घर्ल चाहन थे, जिनकी हामरो नेपाल संघ को संबंधों मेरो सरकार को उच्चतम प्राथमिकता मदे हो। निमंत्रण अगर नूं भयको म मै सरकार न नेपाल का जनता राई धन्यवाद देना चाहन छो। मै संग मैले 125 करोड़ भारतीय जनता को मया शुभकामना और सदभावना लिए आयो छो।

आप कल्पना कर सकते हैं कि यह पल मेरे लिए कितने गर्व का पल है क्योंकि आपकी संसद में मैं पहला मेहमान हूं जिसको आपने बुलाया है और संबोधन करने का अवसर दिया है। यह सम्मान सिर्फ नरेंद्र मोदी का या भारत के प्रधानमंत्री का नहीं यह सवा सौ करोड़ भारतीयों का सम्मान है। मैं इसके लिए आदरणीय स्पीकर श्री का और आप अभी सभी सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। भारत और नेपाल के संबंध उतने ही पुराने हैं, जितने हिमालय और गंगा पुराने हैं। और इसलिए हमारे संबंध कागज की किश्तियों से आगे नहीं बढ़े हैं हमारे संबंध दिलों की दास्तान कहते हैं। जन-जन के मन के प्रतिकोश के रूप में हम एक ही सांस्कृतिक विरासत के धनी हैं।

मैं मूलतः गुजरात का हूं सोमनाथ की भूमि है और सोमनाथ की भूमि से चलकर के मैंने राष्ट्रीय विश्वनाथ का फलक काशी विश्वनाथ की छत्रछाया से मैंने प्रारंभ किया, काशी से किया। और आज पशुपतिनाथ के चरणों में आकर के खड़ा हुआ हूं। यह वो भूमि है जहां किशोरी जी बचपन में खेला करती थी, और आज भी हम जनक का स्मरण करते हैं। यह भूमि है जिसने विश्व को अचंभित कर देने वाले भगवान बुद्ध को जन्म दिया है। ऐसी एक सांस्कृतिक विरासत की धनी है और इसलिए और जब मैं काशी का प्रतिनिधि बन गया तो मेरा तो नेपाल से नाता और जुड़ गया क्योंकि काशी में एक मंदिर है जहां पुजारी नेपाल का होता है और नेपाल में पशुपतिनाथ है जहां का पुजारी हिन्दुस्तान का होता है।

भारत का हर व्यक्ति 51 शक्तिपीठों के दर्शन की कामना करता है उन 51 शक्तिपीठों में दो पीठ नेपाल में हैं। यदि इतना अटूट नाता है हमारा, इतना ही नहीं, हिन्दुस्तान ने वो कोई लड़ाई जीती नहीं है, जिस जीत के साथ किसी नेपाली का रक्त न बहा हो। किसी नेपाली ने शहादत न दो हो। भारत के स्वाभिमान के लिए, भारत की रक्षा के लिए नेपाल का बहादुर मरने-मिटने के लिए कभी पीछे नहीं रहा। भारत के लिए जीने-मरने वाले उन बहादुर नेपालियों को मैं नमन करना चाहता हूं। भारत की सेना के फील्ड मार्शल एक बहुत बढ़िया बात बताते थे, वो कहते थे कि कोई सेना का जवान यह कहे कि मैं मृत्यु से डरता नहीं हूं तो मान लेना कि या तो वो झूठ बोल रहा है या तो वो गुरखा है। अगर गुरखा कहता है कि मैं मौत से नहीं डरता तो इसमें सच्चाई है। यह बात फील्ड मार्शल मानेक शॉ ने कही थी। ऐसी वीरों की भूमि है, सांस्कृतिक धारा है। और आज मैं कह सकता हूं नेपाल के नागरिकों की नहीं लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले पूरे विश्व का ध्यान नेपाल की तरफ केंद्रित हुआ है। और नेपाल की तरफ केंद्रित हुआ है मतलब इस सभागृह में बैठे आप सब पर केंद्रित हुआ है। लोकतंत्र में विश्वास करने वाला पूरा विश्व आज आपकी तरफ देख रहा है। बड़ी आशा भरी नजरों से देख रहा है। आपको लगता होगा कि आप इस सदन में बैठकर के संविधान के निर्माण की चर्चा कर रहे हैं भिन्न भिन्न धाराओं की चर्चा कर रहे हैं, समाज के भिन्न भिन्न वर्गों के हितों की चर्चा कर रहे हैं, इतना नहीं है। संविधान के निर्माता के रूप में आपको यह सौभाग्य मिलना। उस घटना को मैं अगर और तरीके से देखूं तो जिस परंपरा को हम जीते हैं, कभी कुछ ऋषिमुनियों ने वेद निर्माण किए किसी ने उपनिषद निर्माण किए किसी युग में संहिताओं का निर्माण हुआ और जिसके प्रकाश में हजारों साल से हम अपना जीवन निर्वह और आयोजन करते रहते हैं। उसी कड़ी में आधुनिक जीवन में राष्ट्र का संविधान भी एक नई संहिता के रूप में जन्म लेता है। नए युग को दिशा एवं दशा देने का काम संविधान के माध्यम से होता है, जो किसी जमाने में ऋषियों ने वेद के द्वारा, पुराणों के द्वारा, संहिताओं के द्वारा किया था, एक प्रकार से आप नई संहिता लिख रहे हैं। और इसलिए यह सौभाग्य प्राप्त करने वाले आप सबको मैं हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं, बधाई देना चाहता हूं। लेकिन संविधान निर्माण की एक पूर्व शर्त होती है। संविधान के निर्माण के लिए ऋषिमन होना जरूरी होता है। वो मन जो दूर का देख सकता है। वो मन समस्याओं का अंदाज लगा सकता है वो मन आज भी उन शब्दों में अंकित करेगा जो सौ साल के बाद भी समाज को सुरक्षित रखने की समाज की विकास यात्रा को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा।

कितना पवित्र, कितना उम्दा, कितना व्यापक, कितना विशाल काम आप लोगों के पास है और इसलिए आप बहुत भाग्यशाली हैं, मैं आपको नमन करने आया हूं। मैं आपका अभिनंदन करने आया हूं। संविधान, एक किताब नहीं होती है, संविधान कल आज और कल को जोड़ता है। मैं कभी कभी सोचता हूं भारत का संविधान, वो हिमालय को समंदर के साथ जोड़ता है, भारत का संविधान कच्छ के रेगिस्तान को नागालैंड की हरी भरी पर्वतमालाओं के साथ जोड़ता है।

सवा सौ करोड़ नागरिकों के मन को आशाओं को आकांक्षाओं को पल्लवित करता है। आप जिस संविधान का निर्माण करने जा रहे हैं वह सिर्फ, सिर्फ नेपाल के नागरिकों के लिए नहीं बल्कि दुनिया के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ लिखने जा रहे हो। आपको आश्चर्य होगा कि मोदी जी क्या बता रहे हैं, मैं सच बता रहा हूं। आपका संविधान जो बनेगा वो सिर्फ नेपाल के लिए नहीं विश्व के लिए एक स्वर्णिम पृष्ठ बनेगा क्योंकि इतिहास की धरोहर में देखें तो एक सम्राट अशोक हुआ करते थे, युद्ध के बाद शांति की तलाश में निकले, युद्ध छोड़ बुद्ध की शरण गए और एक नया स्वर्णिम पृष्ठ लिखा गया। मैं उन सबको बधाई देता हूं जिन्होंने बुलेट का रास्ता छोड़कर के बैलेट के रास्ते पर जाने का संकल्प किया नेपाल की धरती पर। मैं उन सबका अभिनंदन करता हूं जो युद्ध से बुद्ध की ओर प्रयाण किया है और इस सदन में आपकी मौजूदगी युद्ध से बुद्ध की तरफ की आपकी यात्रा का अनुमोदन करती है और इसलिए मैं आपको बधाई देने आया हूं।

आप जब संविधान का निर्माण करेंगे वो संविधान, और मुझे विश्वास है कि पीस प्रोसेस धर्म से, एक ऐसा उम्दा संविधान जन्म लेने वाला है जो कोटि-कोटि जनों की आशाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति करेगा। लेकिन इससे भी आगे आज दुनिया के हर भूभाग में छोटे मोटे कई गुट ऐसे पैदा हुए हैं, जिनका हिंसा में ही विश्वास है। शस्त्र के माध्यम से ही सुख प्राप्त करने का उनको मार्ग लगता है।

विश्व के सामने नेपाल वो देश बनेगा जब संविधान लेकर आएगा, वो दुनिया को विश्वास दिलाएगा कि शस्त्रों को छोड़कर के शास्त्रों के सहारे भी जीवन को बदला जा सकता है। ये उम्दा काम आप करने वाले हैं। हिंसा में विश्वास करने वाले दुनिया के उन गुटों को यह संदेश जाएगा कि बम, बंदूक और पिस्तौल के माध्यम से भलाई नहीं होती है, संविधान की सीमा में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के द्वारा इच्छित परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। और ऐसा उम्दा काम आपने शुरू किया है और उन लोगों ने इसमें हिस्सेदारी की है, जिन्होंने कभी शस्त्रों में भरोसा किया था। शस्त्रों को छोड़कर के, युद्ध को छोड़कर के बुद्ध के मार्ग पर जाने का रास्ता अपनाया और इसलिए एक ऐसा पवित्र काम आपके माध्यम से हो रहा है इस संविधान सभा के माध्यम से जो इस विश्व के हिंसा में विश्वास करने वाले लोगों को पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगा। और आपका प्रयोग अगर सफल रहा तो विश्व को हिंसा की मुक्ति का एक नया मार्ग बुद्ध की इस भूमि से मिलेगा। यह मुझे आपके संविधान में ताकत नजर आ रही है और इसलिए मैं उस रूप में इस संविधान सभा को देख रहा हूं। उस सामर्थ्य के रूप में देख रहा हूं। संविधान किसके लिए है। भारत प्रारंभ से मानता आया है हमारा काम आपके काम में दखल करने का नहीं है, भारत का काम, आप जो संकल्प करें, आप जो दिशा चुनें, उसमें हम अगर काम आ सकते हैं तो काम आना यही हमारा काम है। आपको दिशा देना यही हमारा काम नहीं है। आपको मंजिल पर ले जाना यह हमारा काम नहीं है।

नेपाल एक सार्वभौम राष्ट्र है। हमारी इच्छा इतनी ही है नेपाल जैसा सार्वभौम राष्ट्र, हिमालय जितनी ऊंचाइयों को प्राप्त करे और पूरा विश्व नेपाल को देखकर के गौरवान्वित हो, ऐसा नेपाल देखने की हमारी इच्छा है। और इसलिए आपके पड़ोस में बैठकर और हमारे लोकतंत्र के अनुभव के आधार पर हमें अच्छा लगता है कि आप इस दिशा में जा रहे हैं आनंद होता है। संविधान वो हो जो सर्वजन समावेशक हो। हर नेपाली नागरिक को गरीब हो, अमीर हो, पढ़ा लिखा हो, अनपढ़ हो, गांव में हो शहर में हो, पहाड़ में हो तराई में, हो कहीं पर भी हो, हर नेपाली को संविधान जब आए तो उसे लगना चाहिए कि यह एक ऐसा गुलदस्ता है जिस गुलदस्ते में मेरे भी पुष्प की महक हैं। और संविधान निर्माता ऐसा गुलदस्ता बनाएंगे कि जिसके कारण हर नेपाली को लगेगा हां ऐसा बढ़िया गुलदस्ता आया है, जिसमें मेरे फूल की महक मुझे महसूस हो रही है वो काम आप कर रहे हैं। संविधान वो हो जो सर्वजन हिताय हो, सर्वजन सुखाय हो। किसी एक का भला करने के लिए नहीं। संविधान जनसामान्य की आशा आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हो। संविधान जोड़ता है, संविधान कभी तोड़ता नहीं है। संविधान विवादों को संवादों की और ले जाने का एक सबल माध्यम होता है और इसलिए चाहे पहाड़ हो तराई हो, संविधान जोड़ने का काम करेगा और अधिक ताकत पैदा करने का काम करेगा। उस दिशा में आप सिद्धि प्राप्त करेंगे ऐसा मेरा पूरा विश्वास है।

संविधान वर्तमान के बोझ से दबा हुआ नहीं होना चाहिए और ऋषि मन का मेरा तात्पर्य यही है, जो वर्तमान से मुक्ति की अनुभूति करता है और जो आने वाले कल को बहुत गहराई से देख सकता है वही ऋषि मन होता है, जो संविधान का निर्माण आने वाली पीढ़ियों के लिए करता है। और यही हमारी सोच होनी चाहिए। संविधान में हजारों चीजें अच्छी होती हैं, लेकिन एक कोमा एक फुलस्टोप कहीं पर भी ऐसा आ गया जो आज तो पता नहीं चले कि कोमा है फुलस्टोप पता नहीं रहे लिख दिया, लेकिन कभी 50 साल के बाद 100 साल के बाद कोमा, फुलस्टोप के तौर पर आया हुआ कोई एक चीज कहीं विष बीच न बन जाए विष बीज को जन्म न दें, जो नेपाल के इन सपनों को रौंद डाले। ऐसी स्थिति कभी आए नहीं, ये बारीकी की चिंता ये संविधान सभा करेगी ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। और मैं मानता हूं कि आपने जो काम शुरू किया है वो अपने आप में गौरव का काम है। शस्त्र को छोड़कर के शास्त्रों को स्वीकार करना यही तो बुद्ध की भूमि से निकलने की आवाज है, संदेश है और उस अर्थ में भारत चाहेगा, और जो आप लोगों ने तय किया जो मैंने सुना है और मैं मानता हूं कि बहुत ही उत्तम काम संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र का है। आज उपलब्ध व्यवस्था में उत्तम रास्ता आप सबने चुना है और भारत हमेशा आपके इस संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की कल्पना का पूरा-पूरा आदर करता है स्वागत करता है। इंतजार यही है कि जितना जल्दी हो। इंतजार इसी बात का है।

नेपाल और भारत के रिश्ते ऐसे हैं कि थोड़ी सी भी हवा इधर उधर हो जाए तो ठंड हमें भी लगती है। अगर सूरज यहां तप जाए तो गर्मी हमें भी लगती है। ऐसा अटूट नाता है। अगर आप चैन से न सोए हों तो हिन्दुस्तान भी चैन से नहीं सो सकता है। नेपाल का कोई मेरा भाई भूखा हो तो भारत कैसे आनंद ले सकता है। कल जब ये कोसी की घटना घटी, समाचार आए। मेरी पूरी सरकार लगी रही। इतना बड़ा हादसा हो गया, क्या हो रहा है इतनी बड़ी चट्टान गिरी है कोसी नदी का पानी रुक नहीं रहा है। पता नहीं क्या हो गया है, कितने लोग खो गए हैं, कितने लोग मारे गए हैं। जितनी चिंता आपको सताती थी, उतनी ही चिंता मुझे भी सताती थी। क्यों, क्योंकि ये कष्ट आपका है तो मेरा भी है। ये आपदा आपकी है तो आपदा मेरी भी है। और हिन्दुस्तान के किसी कौने में जितनी तेजी से मदद पहुंचे, उतनी ही तेजी से मदद पहुंचाने के लिए मैंने दिशा पकड़ी और लोगों को मैंने भेज भी दिया। क्योंकि आप मेरे हैं हमारे हैं। हम और आप अलग हो नहीं सकते। और इसलिए आपके विकास के अंदर भारत आपकी जितनी आशा आकांक्षाएं हैं उसकी पूर्ति के लिए प्रतिबद्ध है।

नेपाल जहां से जन्मे हुए बुद्ध ने मन के अंधेरे को दूर किया था, विचारों का प्रकाश दिया और मानव जाति को एक नई चेतना मिली। यह नेपाल पानी की शक्ति का ऐसा धनी है, जो बिजली के माध्यम से आज भी हिन्दुस्तान का अँधेरा दूर कर सकता है और हम बिजली मुफ्त में नहीं चाहते, हम खरीदना चाहते हैं। हम आपका पानी भी नहीं ले जाना चाहते, आपका पानी और वैसे तो मैं एक बात नहीं जानता कि नेपाल में यह बात किस रूप में देखी जाएगी। पानी और जवानी यह कभी पहाड़ के काम नहीं आते, पानी पहाड़ में रहता नहीं चला जाता है और जवानी भी, पहाड़ में जवानी, थोड़ा सी उम्र बढ़े तो मौका देखते है कि चलो कही चला जाए, बेचारों को वहां रोजी-रोटी नहीं है तो जवानी भी पहाड़ के कम नहीं आती और पानी भी पहाड़ के काम नहीं आता है। लेकिन किसी युग में कहा गया होगा। हमें इस बात को बदलना होगा वो पानी पहाड़ के काम कैसे आये और जवानी पहाड़ को कैसे नई रौनक दे वो नई-नई दिशा में हमको बदलना होगा और इसलिए विकास यही उसके लिए यह मार्ग है।

भारत युवा देश है नेपाल भी युवा देश है। यहां कितने नौजवानों की तादाद है अगर उन नौजवानों के हाथ में अवसर दिया जाए तो नेपाल का कल क्या नेपाल का आज बदलने का सामर्थ्य इन नौजवानों में है वो अवसर कैसे मिलेगा हम प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग करके विकास की एक दिशा तय नहीं करेंगे तो कैसे होगा। भारत इसके लिए आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहता है। निर्णय आप कीजिए आप अपने नेतृत्व का परिचय दीजिए। और अकेले हिन्दुस्तान को बिजली बेचकर भी नेपाल समृद्ध देशों में अपनी जगह बना सकता है। इतनी ताकत आपके पास है। हम इसमें आपके साथ हैं आपकी विकास यात्रा में जुड़ना चाहते हैं। यहां पर ट्रकों के द्वारा ऑयल आता है, युग बदल चुका है, पाइप लाइनों से क्यों न आये हम उस काम को पूरा करेंगे। शिक्षा के क्षेत्र में यहां के नौजवानों भारत आते हैं। भारत सरकार उनकों स्कालरशिप देती है। स्कॉलरशिप पाने वाले नौजवानों की संख्या में मैं बढ़ोत्तरी चाहता हूं । अधिक नौजवानों को अवसर मिले समझ लीजिए कि आज ही घोषणा कर रहा हूं इसका फायदा उठाइए।

जब लक्ष्मण जी मूर्छित हो गये तो हनुमान जी पौधा लेने यहां आये। आज पूरे विश्व में होलिस्टिक हेल्थकेयर की चर्चा चल रही है। हिमालय के गर्भ में जड़ी बूटियां पड़ी हैं। अगर उन जड़ी बूटियों से हम हर्बल मेडिसिन को बढ़ावा दें। क्यों न नेपाल विश्व में सबसे बड़ा हर्बल मेडिसिन का एक्सपोर्टर क्यों ना हो जाए? क्या क्या नहीं है आपके पास। मैं आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के लिए तैयार हूं।

भारत जो मदद हो सके करने के लिए तैयार है क्योंकि आने वाले दिनों में विकास को किस दिशा में ले जाना आप जानते हैं मैं कुछ नया नहीं कह रहा। टूरिज्म की बात करें तो सवा सौ करोड़ देशवासी आपके पड़ोस में ऐसे हैं जो कभी न कभी पशुपतिनाथ आकर अपना सिर झुकाना चाहते हैं। भगवान बुद्ध के पास आकर शान्ति का संदेश देना चाहते हैं। क्यों ना नेपाल का टूरिज्म उस रूप में विकसित हो कि भारत से बहुत बड़ी मात्रा में टूरिस्ट नेपाल पहुंचें। टूरिज्म एक ऐसा क्षेत्र है कम से कम पूंजी में ज्यादा से ज्यादा रोजगार देने वाला कोई अगर क्षेत्र है तो वह टूरिज्म है। टूरिस्ट आता है तो चना बेचने वाला भी कमाता है और मूंगफली बेचने वाला भी कमाता है, ऑटो रिक्शा वाला भी कमाता है, टैक्सी वाला भी कमाता है और चाय बेचने वाला भी कमाता है। और जब चाय बेचने वाले की बात आती है तो मुझे ज्यादा आनंद आता है। कहने का मतलब यह है कि टूरिज्म के विकास में इतनी संभावनाएं भरी पड़ी हैं। एडवेंचर टूरिज्म के लिए, हिमालय से बढ़कर क्या हो सकता है। नेपाल से बढ़कर कौन सी जगह हो सकती है। पूरे विश्व के नौजवानों को पागल कर दे इतनी ताकत आप की धरती के पास पड़ी है। मैं आपसे आह्वान करता हूं , आइए आगे आइये। पूरे विश्व का एडवेंचर यूथ, जिसका एडवेंचर करने का मिज़ाज है, जिसको पहाड़ों पर जाने की इच्छा रखता है, आप पूरे विश्व के युवाओं को ललकार सकते हैं।

आईए, कितना बड़ अवसर है। हमें संविधान भी निर्माण करना है। हमें नेपाल को नई ऊंचाईयों पर भी ले जाना है और इसके लिए एक पड़ोसी का धर्म हम निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मेरे मन में आया कि नेपाल को हिट करें, मैंने सोचा अगर मैं अलग शब्दों का उपयोग करुंगा तो आपको बुरा लग जाएगा ये कौन होता है हिट करने वाला। लेकिन मैं जब हिट करने की बात करता हूं तो मेरे मन में तीन प्रमुख बातें हैं – एचआईटी। एक हाईबेस दूसरा आईबेस और तीसरा ट्रासबेस। नेपाल को भारत जितनी जल्दी ये गिफ्ट दें। आईबेस यानी इनफॉर्मेशन बेस, पूरे विश्व के भीतर नेपाल पीछे नहीं रहना चाहिए। नेपाल भी डिजिटल बनना चाहिए। नेपाल विश्व के साथ जुड्ना चाहिए। आईबेस चाहिए और ट्रांसबेस, ट्रांसमीशन लाईन्स। आज नेपाल को हम जितनी बिजली दे रहे हैं, उसको डबल करने का मेरा इरादा है और इसके लिए जितना जल्दी ट्रांसमीशन लाईन लगाएंगे, अभी हम नेपाल का अंधेरा दूर करेंगे और दशक के बाद, अंधेरा हिन्दुस्तान का नेपाल दूर करेगा, ये हमारा नाता है और इसीलिए मैंने कहा एचआईटी। एच-हाइवेज,आई-इन्फार्मेशन और टी-ट्रासमीशन। ये मैं हिट करना चाहूंगा और आप भी चाहेंगे कि ये हिट जल्दी हो।

मुझे लगता है कि हम जितना जल्दी नेपाल को अपने पास बुला सकें बुला लें पर अभी इसको खिसका कर ले जाने वाला कोई विज्ञान तो अभी आया नहीं है लेकिन अगर महाकाली नदी पर ब्रिज बन जाए तो मेरे और आपके बीच की दूरी बहुत खत्म हो जाएगी। आज एकदम हमारे पास आ जाएंगे। आज हमें घूम घामकर पहुंचना पड़ता है लेकिन महाकाली नदी पर अगर ब्रिज बन गया तो हमारी दूरियां कम हो जाएंगी। हम इस बात पर बल देकर आगे बढ़ना चाहते हैं। उसी प्रकार से सीमा यानी बार्डर जो हैं वो बैरियर नहीं हो सकते, बॉर्डर ब्रिज बनना चाहिए। हम चाहते हैं भारत और नेपाल की सीमाएं इस प्रकार से वाईब्रेंट हो, अच्छेपन की यहां लेनदेन होती रहे ताकि आपका भी विकास हो और भारत के भी आपके साथ जुड़े हुए छोटे-छोटे जो राज्य हैं, उनको भी विकास के अवसर मिलें। एक योजना जिसे मैं प्रधानमंत्री जी को आज बता रहा था। मैंने कहा कि हिमालय पर रिसर्च होना जरूरी है। इतनी बड़ी प्राकृतिक संपदा है। भारत ने उस पर एक काम शुरू किया है, हमने अपने बजट में भी इसकी घोषणा की है। नेपाल भी उसमें आगे बढ़े और हम मिलकर के हिमालय की शक्ति, मानव जाति के कैसे काम आ सकती है, उसके वेज और मीन्स क्या हों, उसके सामर्थ्य को हम पहचाने और मानव जाति के कल्याण की दिशा में हम जरूर काम करें। उसी प्रकार से हम प्रयास करना चाहते हैं।

कभी-कभी मैं हैरान हो जाता हूं कि अमेरिका टेलिफोन करना है तो बड़े सस्ते में हो जाता है लेकिन नेपाल फोन करना है तो बड़ा महंगा पड़ जाता है। हमें समझ नहीं आता कि यह क्या बात है। ऐसा कैसे हो सकता है और नेपाल के लाखों लोग हिन्दुस्तान में रहते हैं अपने परिवार से बात करना चाहते हैं कर नहीं पाते। नमस्ते करके फोन रख देते हैं। मैं यह स्थिति बदलना चाहता हूं। दोनों देशों में ये जो सर्विस प्रोवाइडर हैं उनसे मिलकर के हम भी बात करेंगे आप भी बात कीजिए। यह कनेक्टिविटी ऐसी नहीं होनी चाहिए। बड़े आराम से सहज तरीके से कम खर्चे में बात हो और उसी से तो नाता जुड़ता है। लाइव कम्युनिकेशन जितना बढ़ता है उतना ही नाता बनता है और हम उसको बढ़ावा देना चाहते हैं।

अभी आपने सुना होगा जब मैं, मेरा शपथ समारोह था जब मैं प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाला था तो मैंने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को निमंत्रित किया था और मैं आभारी हूं आदरणीय प्रधानमंत्री जी का कि बहुत ही कम नोटिस में तो आए और मैं मानता हूं कि सार्क देश मिलकर के गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने का एजेंडा लेकर एक साथ आगे क्यों न बढ़ें। गरीबी के खिलाफ लड़ने में हम दोनों हम सब सभी सार्क देश एक-दूसरे की मदद करें। और उसमें एक काम सार्क देशों को और भारत का दायित्व है हम कोई उपकार नहीं करते, हम मानते हैं कि हमारा दायित्व है कि हमारे-अड़ोस-पड़ोस के हमारे जितने भी छोटे भाई हैं हमारे साथी भाई हैं उनकी विकास यात्रा में हम मदद मुख्य रूप से करें।

और इसलिए अभी-अभी मैंने घोषणा की है कि स्पेस टेक्नोलॉजी का लाभ हमारे सार्क देशों को मिलना चाहिए। और इसलिए भारत की तरफ से एक सार्क सैटेलाइट लॉन्च किया जाएगा। इस सार्क सैटेलाइट का लाभ हैल्थ सेक्टर के लिए, एजुकेशन सेक्टर के लिए स्पेस टेक्नोलॉजी का लाभ सार्क देशों को मिले नेपाल को मिले उस दिशा में हमने कदम उठाना तय किया है। और इसलिए इसका आने वाले दिनों में जरूर लाभ मिलेगा।

उसी प्रकार से मैंने पहले ही कहा कि मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट, आपने देखा होगा, हम इतने पास में हैं आपके और हमारे बीच में कोई ज्यादा दूरी नहीं है फिर भी आते-आते 17 साल लग गए। यह अखरता है। मैं आपको वादा करता हूं कि अब ऐसा नहीं होगा। और मैं तो कुछ ही महीनों में वापस आ रहा हूं सार्क समिट के समय। और मैंने उस समय तय किया है कि मैं उस समय जब आउंगा तो राजा जनक को भी नमन करने जाउंगा और भगवान बुद्ध को भी नमन करने जाउंगा। यह खुशी की बात है कि पंचेश्वर प्रोजेक्ट बहुत समय पहले तय हुआ था फिर कितने रूपये की बढ़ गई, लेकिन अब अथॉरिटी का निर्माण दोनों देशों में हुआ है मैं मानता हूं कि एक साल के भीतर-भीतर 5600 मेगावॉट का यह प्रोजेक्ट, काम आरंभ हो जाए तो आप कल्पना कर सकते हैं कि नेपाल की कितनी बड़ी सेवा होगी। आज नेपाल के पास जितनी बिजली है उससे करीब-करीब पाँच गुना बिजली, छोटी बात नहीं है यह। विकास को कितनी नई ऊँचाई मिल सकती है। और उसके लिए भारत बिल्कुल प्रोएक्टिव होकर आपके साथ काम करने के लिए तैयार है। और हम आपको उस दिशा में आगे बढ़ाने के लिए पूरा प्रयास करेंगे।

एक बात मैं और चाहूंगा, जैसा मैंने कहा हर्बल मेडिसिन, एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। वैसे भी ऑर्गेनिक फॉर्मिंग पुरी दुनिया के अंदर एक बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हुआ है। जो माल रुपये में बिकता है वो अगर ऑर्गेनिक है तो डॉलरों में बिकने लग जाता है।

नेपाल एक ऐसी भूमि है जहां यह संभव है। भारत में सिक्किम एक राज्य, आपके पड़ोस में ही माना जाएगा। सिक्किम ने पूरा ऑर्गेनिक स्टेट बना दिया अपने आपको। और उसके कारण पूरे विश्व में उसका एक नया मार्केट खड़ा हुआ है। अगर नेपाल उस दिशा में जाना चाहता है तो मुझे खुशी होगी आपको मदद करने की, आपके साथ काम करने की। उसी प्रकार से हमने एक प्रयोग शुरू किया है हिन्दुस्तान में सोइल (मृदा) हैल्थ कार्ड का। हम जानते हैं कि भारत और नेपाल में हम नागरिकों के पास भी सोइल हैल्थ कार्ड नहीं है। लेकिन हम स्वाइल हैल्थ कार्ड किसानों को उसकी जमीन की तबीयत कैसी है, कोई बीमारी तो नहीं है, विशेषताएं क्या हैं किस प्रकार के फसल के लिए उपयोगी है। कौन सी दवाइंया वहां डालनी चाहिएं कौन सी दवाएं नहीं डालनी चाहिएं। कितना फर्टिलाइजर लिया जा सकता है ये सारी वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है। अगर नेपाल की रुचि होगी तो हम जो सोइल हैल्थ कार्ड के इस काम को जो हिन्दुस्तान में आगे बढ़ा रहे हैं यहां के किसानों को भी अगर उसका लाभ मिलेगा तो कृषि आधुनिक हो, कृषि वैज्ञानिक हो उसमें हम बहुत बड़ी मात्रा में उपयोगी हो सकते हैं। और मैं चाहता हूं कि आने वाले दिनों में आप इसके लिए जरूर ही कुछ न कुछ सोचेंगे।

और मैं मानता हूं। उसी प्रकार से आज जब मैं आपके बीच आया हूं तो मैं आज यह भी आपको घोषणा करके जाना चाहता हूं कि भारत नेपाल को 10,000 करोड़ नेपाली रुपये कंसेसनल लाइन ऑफ क्रेडिट की सहायता देने का हमने निर्णय किया है। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इस क्रेडिट का उपयोग नेपाल की प्राथमिकता पर होगा। आप इसे हाइड्रो पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर इन सारे क्षेत्रों में लगाएं तो यह करीब एक बिलियन डॉलर जैसी अमाउंट मैं आज और पहले इसका जो दिया हुआ है यह इससे अलग है उसको इससे मत जोड़ना वो अलग है, जो दे दिया। यह नया है।

फिर एक बार मैं, आपने मेरा स्वागत किया सम्मान किया इसलिए मैं आपका आभारी हूं। लेकिन मैं फिर से एक बार विश्वास दिलाता हूं कि दुनिया कि नजरें आपकी तरफ हैं। विश्व बड़ी आशा भरी नजरों से आपकी तरफ देख रहा है क्योंकि शस्त्र से मुक्ति का मार्ग, संविधान के माध्यम से आज शस्त्र के रास्ते पर चल पड़े लोगों को वापस लाने का काम आज नेपाल की सफलता से जुड़ा हुआ है। आप सफल हुए तो दुनिया को वापस लौटने का अवसर मिलेगा। शस्त्र छोड़ने की प्रेरणा मिलेगी।

लोकतांत्रिक व्यवस्था से भी जन-मन की आशाओं आकांक्षाओं की पूर्ति का रास्ता खुलेगा, नया विश्वास पैदा होगा। आप संविधान के इस काम को उस रूप में देखें। इसलिए मैं दोबारा इस बात का उल्लेख कर रहा हूं। आपका ऋषि मन 100 साल के बाद नेपाल कैसा होगा, नेपाल के लोग कैसे हों, नेपाल के लोगों को क्या मिले इसका निर्णय आप कर रहे हैं और उस निर्णय में आप सफल होंगे। भगवान बुद्ध की इस भूमि में विचारों की कोई कमी हो नहीं सकती। इरादों की कमी हो नहीं सकती। संकल्पशक्ति की कमी कभी नहीं हो सकती, और इसलिए एक नया इतिहास यहां से रचने जा रहा है। इसको इतना बड़ा लाभ मिलने वाला है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम सबको, मैं यही कहूंगा कि हमारे जो संबंध हैं भारत-नेपाल मैत्री यह अमर रहें। भारत-नेपाल मैत्री युग-युग जीवे और यह सार्वभौम राष्ट्र नेपाल हिमालय से भी नई ऊंचाइयों पर ऊपर उठे। इसी शुभकामनाओं के साथ फिर एक बार आपके बीच आने का अवसर मिला बहुत बहुत धन्यवाद।

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Saving every drop of water, preventing any kind of wastage of water should become an integral part of our lives: PM Modi

माझ्या प्रिय देशबांधवानो, नमस्कार !

 

दोन दिवसांपूर्वीची काही अद्भुत छायाचित्रे, काही अविस्मरणीय क्षणांच्या ताज्या आठवणी आताही माझ्या डोळ्यांसमोर आहेत. त्यामुळे, यावेळच्या ‘मन की बात’ ची सुरुवात याच क्षणांनी करुया. टोक्यो ऑलिंपिक मध्ये भारतीय खेळाडूंना तिरंगा घेऊन चालतांना बघून केवळ मीच नाही, तर संपूर्ण देश रोमांचित झाला होता. त्याक्षणी, संपूर्ण देशाने जणू एकत्र येत, आपल्या या योद्ध्यांना म्हटले -

विजयी भव ! विजयी भव !

जेव्हा हे खेळाडू भारतातून गेले, त्याआधी मला त्यांच्याशी बोलण्याची, त्यांचे आयुष्य जाणून घेण्याची आणि देशालाही ते सांगण्याची संधी मिळाली होती. हे खेळाडू, आयुष्यातील अनेक आव्हानांवर मात करत, इथे पोहोचले आहेत.

आज त्यांच्याजवळ आपले प्रेम आणि सर्वांच्या पाठिंब्याची ताकद आहे- त्यामुळे चला, आपण सगळे मिळून आपल्या या सर्व खेळाडूंना शुभेच्छा देऊया, त्यांचा उत्साह वाढवूया. सोशल मीडियावर देखील ऑलिंपिक खेळाडूंना पाठिंबा देण्यासाठी आता व्हिक्टरी पंच कॅम्पेन म्हणजेच विजयी ठोसा अभियान सुरु झाले आहे. आपणही आपल्या चमू सोबत आपला व्हिक्टरी पंच शेयर करा, भारतासाठी चीयर करा !

 मित्रांनो, जो देशासाठी तिरंगा हातात घेतो, त्याच्या सन्मानार्थ आपल्या भावना अभिमानाने उचंबळून येणं स्वाभाविक आहे. देशभक्तीची हीच भावना आपल्या सर्वांना एकमेकांशी बांधून ठेवते. उद्या, म्हणजेच 26 जुलै रोजी, ‘कारगिल विजय दिवस’ही आहे. कारगिलचे युद्ध भारतीय सैन्याच्या शौर्य आणि संयमाचे असे प्रतीक आहे, जे संपूर्ण जगाने पहिले आहे. यावर्षी हा गौरवास्पद दिवस देखील अमृत महोत्सवाच्या दरम्यान साजरा केला जाणार आहे, त्यामुळे तो आणखीनच विशेष आहे. माझी अशी विनंती आहे की तुम्ही सर्वांनी कारगिल युद्धाची रोमांचकारी कथा नक्की वाचा. कारगिलच्या योद्ध्यांना आपण सर्व आधी वंदन करूया.

मित्रांनो

यावर्षी, 15 ऑगस्ट रोजी देश आपल्या स्वातंत्र्याच्या 75 व्या वर्षात प्रवेश करत आहे. आपले हे खूप मोठे भाग्य आहे की जे स्वातंत्र्य मिळवण्यासाठी , देशाने कित्येक शतके वाट पहिली, त्या देशाच्या स्वातंत्र्याला 75 वर्षे पूर्ण होत असतांनाच्या क्षणांचे आपण साक्षीदार बनणार आहोत.

आपल्याला आठवत असेल, स्वातंत्र्याचा हा अमृत महोत्सव आपण 12 मार्चपासून महात्मा गांधींच्या साबरमती आश्रमातून केली होती. याच दिवशी, बापूंच्या दांडी यात्रेचे पुनरुज्जीवन करण्यात आले होते. तेव्हापासून, जम्मू-काश्मीर पासून ते पुडदूचेरीपर्यंत, गुजरातपासून ते ईशान्येकडील राज्यांपर्यंत अमृत महोत्सवासही संबंधित कार्यक्रम होत आहेत. अशा अनेक घटना, ज्यांचे योगदान तर खूप आहेच, मात्र त्यांची म्हणावी तेवढी चर्चा झाली नाही,- आज लोक त्यांच्याविषयीही जाणून घेत आहेत. आता जसे की मोईरांग डे चेच बघा ना! माणिपूरची छोटीशी वस्ती मोईरांग, कधीकाळी नेताजी सुभाषचंद्र बोस यांच्या भारतीय राष्ट्रीय लष्कर म्हणजे आयएनएचे प्रमुख केंद्र होते. इथे स्वातंत्र्याच्या पहिल्याच लढाईआधी, आयएनएच्या शौकत मलिक जी यांनी भारताचा झेंडा फडकवला होता. या अमृत महोत्सवादरम्यान, 14 एप्रिल रोजी याच मोईरांग मध्ये पुन्हा एकदा तिरंगा फडकवण्यात आला. असे कितीतरी स्वातंत्र्य संग्राम सैनिक आणि महापुरुष आहेत ,ज्यांचे आपण यानिमित्ताने स्मरण करत आहोत. सरकार आणि सामाजिक संस्थांकडूनही सातत्याने याच्याशी संबंधित कार्यक्रम आयोजित केले जात आहेत. यंदाच्या 15 ऑगस्टलाही असेच एक आयोजन होणार आहे. हा एक प्रयत्न आहे- राष्ट्रगीताशी संबंधित.  सांस्कृतिक मंत्रालयाचा प्रयत्न आहे की त्या दिवशी, जास्तीत जास्त भारतीयांनी एकाच वेळी राष्ट्रगीत गायचे. यासाठी एक संकेतस्थळ देखील तयार करण्यात आले आहे- Rashtragaan.in

 

या संकेतस्थळाच्या मदतीने आपण राष्ट्रगीत गाऊन ते ध्वनिमुद्रित करु शकाल आणि या अभियानात सहभागी होऊ शकाल. मला आशा आहे, आपण या विशेष उपक्रमात नक्की सहभागी व्हाल. अशाच प्रकारचे अनेक अभियान, अनेक उपक्रम आपल्याला येत्या  काळात बघायला मिळणार आहेत. “अमृत महोत्सव’ हा कुठल्या सरकारचा कार्यक्रम नाही, तर हा कोट्यवधी भारतवासियांचा कार्यक्रम आहे. प्रत्येक स्वतंत्र आणि कृतज्ञ भारतीयाने आपल्या स्वातंत्र्यसैनिकांना केलेले हे वंदन आहे. या महोत्सवाच्या मूळ भावनेचा विस्तार तर बराच मोठा आहे. –ही भावना आहे, आपल्या स्वातंत्र्यसैनिकांच्या मार्गावरुन चालणे, त्यांच्या स्वप्नातल्या देशाची उभारणी करणे. जशाप्रकारे, देशाला स्वातंत्र्य मिळवून देण्यासाठी ते सगळे झपाटलेले लोक एकत्र होऊन लढले होते, तसेच आपल्याला देशाच्या विकासासाठी एकत्र यायचे आहे. आपल्याला देशासाठी जगायचे आहे, देशासाठी काम करायचे आहे. आणि या प्रवासात अगदी छोटी छोटी कामेदेखील मोठा प्रभाव पाडू शकतात. आपली दैनंदिन कामे करतांनाही आपण राष्ट्र निर्मितीचे काम करु शकतो. जसे की ‘व्होकल फॉर लोकल’. आपल्या देशातील स्थानिक उद्योजक, कलाकार, शिल्पकार, विणकर यांना आधार देणे, हे आपल्या रोजच्या सवयीचा भाग बनले पाहिजे. सात ऑगस्ट रोजी येणारा ‘राष्ट्रीय हातमाग दिवस’ आपल्यासाठी अशी एक संधी आहे ज्यावेळी आपण प्रयत्नपूर्वक हे काम करु शकतो. राष्ट्रीय हातमाग दिनामागेही खूप मोठी ऐतिहासिक पार्श्वभूमी आहे.याच दिवशी, 1905 साली स्वदेशी आंदोलनाची सुरुवात झाली होती.  

मित्रांनो,

आपल्या देशातील ग्रामीण आणि आदिवासी भागात, हातमाग, उत्पन्नाचे एक महत्त्वाचे साधन आहे. हे एक असे क्षेत्र आहे, ज्याच्याशी, लाखों महिला, लाखो विणकर, लाखो शिल्पकार जोडलेले आहेत. आपले छोटे छोटे प्रयत्न, वीणकरांमध्ये एक नवी उमेद जागवू शकतात. आपण स्वतः काही ना काही तरी खरेदी करा, आणि आपले अनुभव इतरांनाही सांगा. जेव्हा आपण स्वातंत्र्याचा अमृत महोत्सव साजरा करत आहोत, अशावेळी एवढे काम करणे आपली निश्चितच जबाबदारी आहे, मित्रांनो !

आपण पहिले असेल 2014 पासूनच आपल्या ‘मन की बात’ मध्ये आपण नेहमीच खादीवर चर्चा करतो. आपल्याच प्रयत्नांमुळे आज देशात खादीची विक्री कित्येक पटीने वाढली आहे. कोणी कधी विचार केला असेल का, की खादीच्या कुठल्या दुकानात एकाच दिवशी, एक कोटींपेक्षा अधिक विक्री होऊ शकते ! मात्र, आपण हे देखील करुन दाखवले आहे. आपण जेव्हाही कधी खादीचे कोणतेही उत्पादन खरेदी करता, तेव्हा त्याचा लाभ, आपल्या गरीब  वीणकर बंधू-भगिनींना होतो.

यामुळेच, खादीची खरेदी करणे एकप्रकारे लोकसेवाही आहे आणि देशसेवाही आहे. माझी आपल्याला आग्रही विनंती आहे, की आपण सर्व, माझे प्रिय बंधू-भगिनी, ग्रामीण भागात तयार होणाऱ्या हातमागाच्या वस्तू जरूर खरेदी करा. आणि त्या वस्तू #MyHandloomMyPride वर शेयर करा.  

मित्रांनो, जेव्हा आपण स्वातंत्र्य आंदोलन आणि खादीविषयी बोलतो आहोत, त्यावेळी बापूंचे स्मरण होणे स्वाभाविक आहे. जसे बापूंच्या नेतृत्वाखाली ‘भारत छोडो आंदोलन’ झाले होते, तसेच आज प्रत्येक भारतीयाला ‘भारत जोडो’ आंदोलनाचे नेतृत्व करायचे आहे. हे आपले कर्तव्य आहे, की आपण आपले काम अशाप्रकारे करावे, जे विविधतांनी भरलेल्या आपल्या भारताला एकत्र आणण्यासाठी उपयुक्त ठरेल. चल तर मग, आपण अमृत महोत्सवानिमित्त हा अमृत संकल्प  घेऊया, की देशच कायम आपली सर्वात मोठी ‘आस्था’ आणि सर्वात मोठी प्राथमिकता असेल. “Nation First, Always First”, हा मंत्र घेऊनच आपल्याला पुढे वाटचाल करायची आहे.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो, आज मी ‘मन की बात’ ऐकणाऱ्या माझ्या युवा मित्रांचे विशेष आभार मानू इच्छितो. अगदी काही दिवसांपूर्वी, माय गव्ह च्या वतीने ‘मन की बात’ च्या श्रोत्यांविषयी एक अध्ययन करण्यात आले होते. या अध्ययनात असे आढळले की ‘मन की बात’ साठी संदेश आणि सूचना पाठवणाऱ्या लोकांमध्ये प्रामुख्याने कोणते लोक आहेत?

 तर अध्ययनातून ही माहिती पुढे आली की, मला संदेश आणि सूचना पाठवणाऱ्या लोकांमध्ये सुमारे 75 टक्के लोक 35 वर्षांपेक्षा कमी वयाचे आहेत. म्हणजेच, भारताच्या युवा शक्तिच्या सूचना ‘मन की बात’ ला दिशा देत आहेत. मी हा खूप चांगला संकेत आहे, असे मानतो. ‘मन की बात’ हे एक असे माध्यम आहे, जिथे सकारात्मकता आहे, संवेदनशीलता आहे. ‘मन की बात’ मध्ये आपण अनेक सकारात्मक गोष्टी करतो. या कार्यक्रमांचे स्वरूप एकोप्याचे आहे. सकारात्मक विचार आणि सूचनांसाठी, भारताच्या युवकांची सक्रियता मला आनंदीत करते आहे. मला याचाही आनंद आहे, की मन की बात च्या माध्यमातून मला युवकांचे मन जाणण्याची देखील संधी मिळते आहे.

मित्रांनो, आपल्याकडून मिळालेल्या सूचना, हीच ‘मन की बात’ ची खरी ताकद आहे. आपल्या सूचनाच, ‘मन की बात’ च्या माध्यमातून भारताची विविधता प्रकट करत असतात. भारतवासियांच्या सेवा आणि त्यागाचा सुगंध, चारी दिशांना पसरवत असतात. आपल्या परिश्रमी युवकांची संशोधने सर्वाना प्रेरित करत असतात. ‘मन की बात’ मध्ये आपण कितीतरी प्रकारच्या कल्पना पाठवत असता.आपण सर्वांवर तर चर्चा करु शकत नाही, मात्र त्यातील बहुतांश कल्पना मी संबंधित विभागांना नक्कीच पाठवत असतो. जेणेकरुन, त्या कल्पना प्रत्यक्षात अमलात आणल्या जाव्यात.

मित्रांनो, मी आज आपल्याला साई-प्रनीथ यांच्या प्रयत्नाविषयी सांगणार आहे. साई-प्रनीथ जी, एक सॉफ्टवेअर इंजिनियर आहेत, आंध्रप्रदेशचे रहिवासी आहेत. गेल्या वर्षी त्यांनी पहिले की त्यांच्या भागात खराब हवामानामुळे अनेक शेतकऱ्यांचे खूप नुकसान झाले. हवामान शास्त्र विषयात त्यांना पूर्वीपासूनच रस होता, आणि म्हणूनच, त्यांनी आपल्या या रुचिचा आणि कौशल्याचा वापर शेतकऱ्यांच्या कल्याणासाठी घेण्याचा निर्णय घेतला. ते आता वेगवेगळ्या डेटा स्त्रोतांकडून हवामानाचा डेटा विकत घेतात, त्याचे विश्लेषण करतात आणि स्थानिक भाषेत, वेगवेगळ्या माध्यमांच्या मदतीने शेतकऱ्यांपर्यंत आवश्यक ती माहिती पोचवतात. हवामानाच्या माहितीशिवाय, प्रणीथजी वेगवेगळ्या हवामानात लोकांनी काय करायला हवे, याचेही मार्गदर्शन करतात. विशेषतः पूरापासून संरक्षण करण्यासाठी किंवा वादळ  आणि वीज पडल्यावर, त्यापासून कसे संरक्षण करायचे, याची माहितीही ते लोकांना देतात.

मित्रांनो,

एकीकडे, या तरुण सॉफ्टवेअर अभियंत्याचा हा प्रयत्न मनाला स्पर्शून जाणारा आहे. तर दुसरीकडे आमच्या एका मित्राकडून होणारा तंत्रज्ञानाचा वापरही, आपल्याला थक्क करुन सोडेल.

 हे मित्र आहेत, ओडिशाच्या संबलपूर जिल्ह्यात एका गावात राहणारे श्री इसाक मुंडा जी. ईसाक जी एकेकाळी रोजंदारी स्वरुपात काम करत होते, मात्र आता ते इंटरनेटवर गाजत आहेत. त्यांच्या यू ट्यूब चॅनेल मधून ते उत्तम पैसे कमावत आहेत. ते आपल्या व्हिडिओ मधून स्थानिक पदार्थ, पारंपरिक स्वयंपाक बनवण्याच्या पद्धती, आपले गाव, आपली जीवनशैली, कुटुंब आणि आहारविहाराच्या सवयी, अशा गोष्टी दाखवत असतात. एक YouTuber म्हणून त्यांनी आपला प्रवास, मार्च 2020 पासून सुरु केला होता. त्यावेळी, त्यांनी ओडिशातीळ सुप्रसिद्ध स्थानिक पदार्थ, ‘पखाल’ शी संबंधित, एक व्हिडिओ पोस्ट केला होता. तेव्हापासून त्यांनी शेकडो व्हिडिओ पोस्ट केले आहेत. त्यांचा हा प्रयत्न अनेक कारणांनी सर्वात वेगळा आहे. विशेषतः यासाठी की या उपक्रमामुळे शहरात राहणाऱ्या लोकांना ती जीवनशैली बघण्याची संधी मिळते, ज्याविषयी त्यांना विशेष काही माहिती नसते. ईसाक मुंडा जी संस्कृती आणि पदार्थ या दोघांना एकत्रित घेऊन, त्याचा उत्सव साजरा करतात आणि त्यातून आपल्या सर्वांना प्रेरणाही देतात.

मित्रांनो, आता आपण जेव्हा तंत्रज्ञानाविषयी बोलतो आहोत, तेव्हा मी आणखी एका रोचक विषयावर चर्चा करु इच्छितो.

आपण अलीकडेच वाचले असेल, पहिले असेल की आयआयटी मद्रास च्या माजी विद्यार्थ्यानी स्थापन केलेल्या एक स्टार्ट-अप ने एक थ्री-डी प्रिंटेड हाऊस तयार केले आहे. या थ्री-डी प्रिंटिंग ने घराची निर्मिती कशी शक्य झाली? तर, या स्टार्ट अप ने सर्वात आधी, थ्री-डी प्रिंटर मध्ये एक त्रिमीतीय चित्र भरले आणि एका विशिष्ट प्रकारच्या काँक्रीटच्या माध्यमातून, थरावर थर चढवत, एक  थ्री-डी संरचना तयार केली. आपल्याला हे जाणून अत्यंत आनंद होईल, की देशात अशाप्रकारचे अनेक प्रयोग सुरु आहेत. एक काळ असा होता, जेव्हा छोट्या छोट्या बांधकामालाही कित्येक वर्षे लागत असत. मात्र, आता तंत्रज्ञानामुळे भारतातील परिस्थिति बदलली आहे. काही काळापूर्वी, आपण जगभरातील अशा नवोन्मेषी कंपन्यांना आमंत्रित करण्यासाठी एक जागतिक गृहनिर्माण तंत्रज्ञान आव्हान स्पर्धा आयोजित केली होती. हा देशातील अशा वेगळ्या प्रकारचा पहिलाच प्रयोग होता, ज्याला आम्ही लाईट हाऊस प्रयोग असे नाव दिले होते. सध्या देशात सहा विविध ठिकाणी, लाईट हाऊस प्रकल्पांवर अत्यंत वेगाने काम सुरु आहे. या लाईट हाऊस प्रकल्पांमध्ये अत्याधुनिक तंत्रज्ञान आणि अभिनव कार्यपद्धतींचा वापर केला जातो. यामुळे बांधकामाचा कालावधी कमी होतो. त्यासोबतच, जी घरे तयार होतात, ती अधिक टिकावू, किफायतशीर आणि आरामदायी असतात. मी अलिकडेच, ड्रोन च्या माध्यमातून या प्रकल्पांचा आढावा घेतला आणि त्यांच्या कामाची प्रगती देखील प्रत्यक्ष पाहिली.

इंदौरच्या प्रकल्पात विटा आणि सीमेंट काँक्रीटच्या भिंतीच्या ऐवजी प्री- फॅब्रिकेटेड सँडविच पॅनल सिस्टिमचा वापर केला जात आहे. राजकोट इथे, लाईट हाऊस फ्रेंच तंत्रज्ञानाच्या मदतीने तयार केले जात आहेत. ज्यात, बोगद्याच्या माध्यमातून, मोनोलिथिक काँक्रीट बांधकाम तंत्रज्ञानाचा वापर केला जात आहे. या तंत्रज्ञानाने तयार झालेली घरे, संकटांचा सामना करण्यासाठी अधिक सक्षम असतील. चेन्नईत, अमेरिका आणि फिनलंडचे तंत्रज्ञान, प्री-कास्ट काँक्रीट सिस्टिमचा  वापर होत आहे. त्यामुळे घरे लवकर बनतील आणि त्यासाठी खर्च देखील कमी येईल. रांची इथे जर्मनीच्या थ्री-डी बांधकाम तंत्रज्ञानाचा वापर करुन घरे बांधली जाणार आहेत. यात प्रत्येक खोली वेगवगेळया जागी बनवली जाईल.  आणि त्यानंतर हे पूर्ण बांधकाम एकमेकांशी जोडले जाईल. अगरतला इथे न्यूझीलैंड च्या तंत्रज्ञानाचा वापर करत पोलादी चौकटी वापरुन घरे बनवली जात आहेत, ही घरे मोठ्या भूकंपाचाही सामना करु शकतील. तसेच, लखनौ इथे, कॅनडाच्या तंत्रज्ञानाचा वापर केला जात आहेत, यात प्लास्टर आणि पेंटची गरज पडत नाही. आणि जलद गतीने घरे तयार करण्यासाठी आधीपासूनच तयार असलेल्या भिंतींचा वापर केला जात आहे.

मित्रांनो, आज देशात हे सगळे जे प्रयोग होत आहेत, ते प्रकल्प मूळ, इनक्युबेशन केंद्र म्हणून कामी येतील. यामुळे आमचे गृहनिर्माण नियोजनकर्ते, स्थापत्यतज्ञ, अभियंते आणि विद्यार्थी नवे तंत्रज्ञान समजू  शकतील आणि त्याचे प्रत्यक्ष प्रयोगही करु शकतील. मी मुद्दामच या सगळ्या गोष्टी, युवकांना सांगतो आहे, जेणेकरुन आमचे युवक, राष्ट्रहितासाठी तंत्रज्ञानाच्या नवनवीन क्षेत्रांना प्रोत्साहन देऊ शकतील.

 मी या गोष्टी विशेषत आपल्या युवकांसाठी सांगत आहे , जेणेकरून आपले  युवक राष्ट्रहितासाठी  तंत्रज्ञानाच्या नवनवीन क्षेत्रांकडे प्रोत्साहित होऊ शकतील .  माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

 तुम्ही इंग्रजीत एक म्हण ऐकली असेल – “To Learn is to Grow” अर्थात  शिकणं म्हणजेच  पुढे जाणे आहे.  जेव्हा आपण काही नवीन शिकतो , तेव्हा आपल्यासाठी प्रगतीचे नवनवीन मार्ग आपोआप खुले होतात.  जेव्हा कधी  काहीतरी वेगळं नवीन करण्याचा प्रयत्न झाला आहे,  मानवतेसाठी नवीन कवाडे खुली झाली आहेत,  एका नवीन युगाचा प्रारंभ झाला आहे . आणि तुम्ही पाहिलं असेल,  जेव्हा काही नवीन घडते,  तेव्हा त्याचा परिणाम प्रत्येकालाच आश्चर्यचकित करतो. आता जसे की मी  तुम्हाला विचारलं की असं कोणते  राज्य आहे , ज्याचा संबंध तुम्ही सफरचंदाशी जोडाल?  सर्वांनाच माहित आहे , तुमच्या मनात सर्वप्रथम हिमाचल प्रदेश , जम्मू-काश्मीर , उत्तराखंडचे नाव येईल. मात्र  जेव्हा मी म्हणेन की या यादीत तुम्ही मणिपूरला देखील जोडा तेव्हा कदाचित तुम्हाला आश्चर्य वाटेल . काही तरी नवीन करण्याची उर्मी घेऊन युवकांनी मणिपूरमध्ये ही कामगिरी करून दाखवली आहे.  सध्या मणिपूरच्या उखरुल जिल्ह्यात सफरचंदाची शेती मोठ्या प्रमाणात सुरू आहे. इथले शेतकरी आपल्या बागांमध्ये सफरचंद पिकवत  आहेत. सफरचंद पिकवण्यासाठी इथल्या  लोकांनी खास हिमाचल प्रदेशात जाऊन प्रशिक्षण देखील घेतले आहे. यापैकीच एक आहेत  टी एस रिंगफामी योंग . योंग हे व्यवसायाने एरोनॉटिकल इंजिनीअर आहेत . त्यांनी पत्नी टी.एस. एंजेल यांच्या मदतीने सफरचंदाची शेती केली आहे . त्याचप्रमाणे अवुन्गशी शिमरे ऑगस्टीना  यांनी देखील आपल्या बागांमध्ये सफरचंदाचे  उत्पादन घेतले आहे . अवुन्गशी दिल्लीमध्ये नोकरी करत होत्या . ही नोकरी सोडून त्या आपल्या गावात परत गेल्या आणि सफरचंदाची शेती सुरू केली. मणिपूरमध्ये आज असे अनेक सफरचंद उत्पादक आहेत, ज्यांनी काही वेगळे आणि नवीन करून दाखवले आहे.

 मित्रांनो आपल्या आदिवासी समुदायात बोरे  खूप लोकप्रिय आहेत.  आदिवासी समुदायाचे लोक नेहमीच बोरांची  शेती करतात . मात्र कोविड -19 महामारी नंतर याची शेती विशेष  वाढली आहे. त्रिपुराच्या उनाकोटी येथील असेच 32 वर्षांचे युवक मित्र आहेत विक्रमजीत चकमा. त्यांनी बोरांची लागवड  करून खूप नफा कमावला आणि आता ते लोकांना बोरांचे पीक घेण्यासाठी  देखील प्रेरित करत आहेत.  राज्य सरकार देखील अशा लोकांच्या मदतीसाठी पुढे आले आहे सरकारकडून यासाठी अनेक विशेष बागा तयार केल्या जात आहेत, जेणेकरून बोरांच्या लागवडी संबंधित लोकांची मागणी पूर्ण करता येईल. शेती मध्ये संशोधन होत आहे,  तर शेतीच्या इतर दुय्यम उत्पादनांमध्ये देखील सर्जनशीलता पाहायला मिळत आहे.

मित्रांनो मला उत्तर प्रदेशच्या लखीमपुर-खीरी मध्ये करण्यात आलेल्या एका प्रयत्नाबद्दल माहिती समजली आहे . कोविडच्या काळात लखीमपुर-खिरी  मध्ये एक अनोखा उपक्रम हाती घेण्यात आला. तिथल्या महिलांना केळ्याच्या तणांपासून फायबर बनवण्याचे प्रशिक्षण देण्याचं काम सुरू करण्यात आले आहे . कचऱ्यापासून टिकाऊ सर्वोत्तम वस्तू  बनवण्याचा मार्ग. केळ्यांचे तण कापून मशीनच्या मदतीने हे फायबर तयार केलं जातं , जे ज्यूट  प्रमाणे असतं .  या फायबरपासून  हॅन्ड बॅग,  सतरंजी असे कितीतरी वस्तू बनवल्या जातात .

 यामुळे एक तर पिकांचा कचर्‍याचा वापर सुरू झाला आहे आणि दुसरीकडे गावात राहणाऱ्या आपल्या भगिनी आणि मुलींना उत्पन्नाचे एक साधन देखील मिळाले आहे . बनाना फायबरच्या या कामात एका स्थानिक महिलेची  रोजची 400 ते 600 रुपये कमाई होते.  लखीमपुर-खीरी मध्ये शेकडो एकर जमिनीवर केळ्याची शेती होते . केळ्यांचे पीक घेतल्यानंतर  साधारणपणे शेतकऱ्यांना तण फेकण्यासाठी वेगळा खर्च करावा लागत होता . आता त्यांचे पैसे देखील वाचतात.  म्हणजेच आम के आम , गुठलियो  के दाम ही म्हण इथे अगदी चपखल बसते.

 मित्रांनो एकीकडे बनाना फायबर पासून वस्तू  बनवल्या जात आहेत  तर दुसरीकडे केळ्याच्या पिठापासून डोसे आणि गुलाबजाम सारखे स्वादिष्ट पदार्थ देखील तयार होत आहेत.  कर्नाटकच्या उत्तर कन्नड आणि दक्षिण कन्नड जिल्ह्यांमध्ये महिला हे वैशिष्ट्यपूर्ण कार्य करत आहेत.

त्याची सुरुवात देखील कोरोना काळातच  झाली . या महिलांनी  केळ्याचा पिठापासून केवळ डोसा ,  गुलाबजाम सारखे पदार्थ नुसते बनवले नाहीत तर त्याची  छायाचित्रे देखील सोशल मीडियावर शेअर केली आहेत . जेव्हा जास्तीत जास्त लोकांना या पीठाबाबत समजले  तेव्हा  त्यांची मागणी आणखी वाढली आणि  या महिलांचे उत्पन्न देखील. लखीमपुर-खीरी प्रमाणेच इथेही ही नावीन्यपूर्ण कल्पना महिलाच राबवत आहेत.

मित्रांनो अशी  उदाहरणे  आयुष्यात काही तरी नवीन करण्याची प्रेरणा देतात . तुमच्या आसपास देखील असे अनेक लोक असतील.  जेव्हा तुमचं कुटुंब मनातल्या गुजगोष्टी सांगत असेल तेव्हा तुम्ही या गोष्टीदेखील तुमच्या गप्पांमध्ये समाविष्ट करा.

कधीतरी वेळ काढून मुलांबरोबर असे उपक्रम पहायला जा आणि  संधी मिळाली तर स्वतःदेखील असं काहीतरी करून दाखवा. आणि हो आणि हे सगळं तुम्ही माझ्याबरोबर NamoApp किंवा  MyGov वर  शेअर केलं तर मला खूप छान वाटेल.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,  आपल्या संस्कृत ग्रंथांमध्ये एक श्लोक आहे-

आत्मार्थम् जीव लोके अस्मिन्, को न जीवति मानवः |

        परम् परोपकारार्थम्, यो जीवति स जीवति ||

अर्थात स्वतःसाठी या जगात प्रत्येक जण जगत असतो मात्र वास्तवात खरेतर ती व्यक्ती जगत असते जी परोपकारासाठी जगते.  भारत मातेच्या सुपुत्रांच्या परोपकारी प्रयत्नांच्या गोष्टी हीच तर आहे मन की बात. आज देखील अशाच काही अन्य मित्रांबाबत आपण बोलणार आहोत . एक मित्र चंदीगड शहरातलेआहेत.  चंदीगड मध्ये मी देखील काही वर्ष राहिलो आहे . खूपच आनंदी आणि सुंदर शहर आहे.  तिथे राहणारे लोक देखील दिलदार आहेत . आणि हो, तुम्ही जर खाण्याचे शौकीन असाल तर इथे तुम्हाला आणखी मजा येईल. या चंदिगडमधील सेक्टर 29 मध्ये संजय राणा फुड स्टॉल चालवतात.

आणि सायकलवर  छोले भटूरे विकतात.  एक दिवस त्यांची मुलगी रिद्धिमा आणि भाची रिया एक कल्पना घेऊन त्यांच्याकडे आल्या.  दोघींनीही त्यांना कोविड लस  घेणाऱ्यांना मोफत छोले-भटूरे खायला द्यायला  सांगितलं. ते  आनंदाने तयार झाले आणि त्यांनी लगेच हे उत्तम आणि नेक कार्य सुरु केले. संजय राणा यांचे छोले-भटूरे मोफत खाण्यासाठी तुम्हाला दाखवावे लागेल कि तुम्ही त्यादिवशी लस घेतलेली आहे.  लसीकरणाचा संदेश दाखवला की लगेचच  ते तुम्हाला स्वादिष्ट छोले-भटूरे देतील. असे म्हणतात समाजाच्या कल्याणासाठी काम करण्यासाठी पैशांपेक्षा जास्त सेवाभाव, कर्तव्य भावनेची अधिक गरज असते . आपले संजय भाऊ हेच सिद्ध करत आहे.

मित्रांनो अशाच आणखी एका कामाची चर्चा मला करायची आहे. हे काम  तामिळनाडूच्या निलगिरी मध्ये होत आहे. तिथे राधिका शास्त्री यांनी एम्बुरेक्स प्रकल्पाची सुरुवात केली आहे.  डोंगराळ भागातल्या रुग्णांना उपचारासाठी सहजपणे वाहतुकीचे  साधन उपलब्ध करून देणे हा या प्रकल्पाचा  उद्देश आहे. राधिका कून्नूरमध्ये एक कॅफे चालवतात . त्यांनी आपल्या कॅफेच्या सहकाऱ्यांच्या मदतीने एम्बुरेक्स साठी निधी जमा केला. निलगिरी डोंगरावर आज सहा एम्बुरेक्स कार्यरत आहे आणि दुर्गम भागातल्या आपत्कालीन स्थितीत रुग्णांसाठी उपयुक्त ठरत आहेत. एम्बुरेक्समध्ये स्ट्रेचर,  ऑक्सीजन सिलेंडर , फर्स्ट एड बॉक्स यासारख्या अनेक गोष्टींची व्यवस्था केली आहे.

मित्रांनो संजय असोत किंवा राधिका , त्यांच्या उदाहरणातून असं दिसून येतं की आपण आपलं कार्य आपला व्यवसाय , नोकरी करता करता सेवाकार्य  देखील करू शकतो.

 मित्रांनो काही दिवसांपूर्वी एक खूपच रोचक आणि खूपच भावनिक घटना घडली, ज्यामुळे  भारत जॉर्जिया मैत्रीला बळकटी मिळाली.  या कार्यक्रमात भारताने सेंट क्वीन केटेवानच्या  होली रेलिक म्हणजेच त्यांचे पवित्र स्मृतिचिन्ह जॉर्जियाचे  सरकार आणि तिथल्या जनतेकडे सुपूर्द केले. यासाठी आपले परराष्ट्रमंत्री स्वतः तिथे गेले होते . अतिशय भावनिक वातावरणात झालेल्या कार्यक्रमात जॉर्जियाचे राष्ट्रपती,  पंतप्रधान अनेक धर्मगुरू आणि मोठ्या संख्येने जॉर्जियाची जनता उपस्थित होती. या कार्यक्रमात भारताची प्रशंसा करताना जे गौरवोद्गार काढण्यात आले ते कायम स्मरणात  राहतील . या एका कार्यक्रमाने दोन्ही देशांबरोबरच गोवा आणि जॉर्जिया  दरम्यान संबंध देखील अधिक दृढ केले आहेत. असं यासाठी कारण सेंट क्वीन केटेवान यांचे हे अवशेष  २००५ मध्ये गोव्याच्या सेंट ऑगस्टीन चर्च येथे सापडले होते .

मित्रानो, तुमच्या मनात प्रश्न निर्माण झाला असेल हे सगळं काय  आहे आणि हे सगळं केव्हा झाले?  खरं तर ही चारशे पाचशे  वर्षांपूर्वीची गोष्ट आहे .क्वीन केटेवान जॉर्जियाच्या राज परिवारातील मुलगी होती . दहा वर्षांच्या तुरुंगवासानंतर  १६२४ मध्ये ती शहीद झाली होती . एका प्राचीन पोर्तुगाल दस्तावेनुसार सेंट  क्वीन केटेवानच्या  अस्थी जुन्या गोव्याच्या सेंट ऑगस्टीन कॉन्व्हेंट मध्ये ठेवण्यात आल्या होत्या. मात्र  दीर्घकाळ असे मानले जात होते की गोव्यामध्ये दफन करण्यात आलेले तिचे अवशेष 1930 च्या भूकंपात गायब झाले होते .

भारत सरकार आणि जॉर्जियाचे इतिहासकार,  संशोधक पुरातत्व शास्त्रज्ञ  आणि जॉर्जियन चर्चच्या अनेक दशकांच्या अथक प्रयत्नानंतर 2005 मध्ये ते पवित्र अवशेष शोधण्यात यश मिळाले होते. हा विषय जॉर्जियाच्या लोकांसाठी खूपच भावनात्मक आहे . म्हणून  त्यांचं ऐतिहासिक धार्मिक आणि अध्यात्मिक भावना लक्षात घेऊन भारत सरकारने या  अवशेषांचा एक भाग जॉर्जियाच्या जनतेला  भेट देण्याचा निर्णय घेतला. भारत आणि जॉर्जियाचा सामायिक इतिहासातील  या बाबी जपून ठेवल्याबद्दल मी आज गोव्याच्या जनतेचे मनः पूर्वक आभार मानतो . गोवा अनेक महान आध्यात्मिक वारसांची भूमी आहे.  सेंट ऑगस्टीन चर्च युनेस्कोच्या जागतिक वारसा स्थळ (गोव्याचे चर्चेस आणि कॉन्व्हेंट) चा  एक भाग आहे .

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,  जॉर्जिया मधून आता मी तुम्हाला थेट सिंगापूरला घेऊन जातो , जिथे या महिन्याच्या सुरुवातीला आणखी एक गौरवशाली संधी समोर आली. पंतप्रधान आणि माझे मित्र ली सेन लुंग यांनी अलीकडेच नूतनीकरण केलेल्या सिलाट रोड गुरुद्वाराचे  उद्घाटन केलं. त्यांनी पारंपारिक पगडी देखील घातली होती . हा गुरूद्वारा  सुमारे शंभर वर्षांपूर्वी बांधण्यात आला होता. आणि तिथे  भाई महाराज यांना समर्पित स्मारक देखील आहे. भाई महाराजजी  भारताच्या स्वातंत्र्याच्या लढ्यात सहभागी झाले होते. आणि हा क्षण स्वातंत्र्याची 75 वर्ष साजरी करताना अधिक प्रेरक ठरतो. दोन्ही देशांदरम्यान लोकांमधील संबंध अशाच प्रयत्नांतून अधिक बळकट होतात. यातून हे देखील समजतं की सौहार्दपूर्ण  वातावरणात राहणे आणि एक दुसऱ्याची संस्कृती समजून घेणे  किती महत्त्वाचे आहे .

माझ्या देशबांधवांनो,  आज मन की बात मध्ये आपण अनेक विषयांवर चर्चा केली. आणखी एक विषय आहे जो माझ्या मनाच्या अत्यंत जिव्हाळ्याचा विषय आहे .

हा विषय आहे जलसंरक्षणाचा . माझं बालपण जिथे गेलं तिथे पाण्याची नेहमी टंचाई असायची. आम्ही पावसासाठी आसुसलेले असायचो आणि म्हणूनच पाण्याचा एक एक थेंब वाचवणे  आमच्या संस्कारांचा एक भाग बनला आहे . आता 'जन  भागीदारीतून जल  संरक्षण ' या मंत्राने तिथले चित्र पालटून टाकले आहे. पाण्याचा प्रत्येक  थेंब वाचवणे आणि पाणी कुठल्याही प्रकारे वाया जाणार नाही याची काळजी घेणे  हा आपल्या जीवनशैलीचा एक सहज भाग असायला हवा. आपल्या कुटुंबाची परंपरा बनायला  हवी ज्याचा  प्रत्येक सदस्यांना अभिमान वाटेल .

मित्रानो, निसर्ग आणि पर्यावरण संरक्षण भारताच्या सांस्कृतिक जीवनात  आपल्या दैनंदिन जीवनात वसलेले आहे. पाऊस हा  नेहमीच आपले विचार, आपलं  तत्वज्ञान आणि आपल्या संस्कृतीला आकार देत आला आहे. ऋतुसंहार आणि मेघदूत मध्ये महाकवी कालिदास यांनी पावसाचे खूप सुंदर वर्णन केलं आहे . साहित्यप्रेमीमध्ये या कविता आजही खूप लोकप्रिय आहेत. ऋग्वेदातील पर्जन्यसूक्त मध्ये देखील पावसाच्या सौंदर्याचे खूप सुंदर वर्णन केलं आहे. त्याचप्रमाणे श्रीमद्भागवत मध्ये देखील काव्यात्मक स्वरूपात पृथ्वी, सूर्य आणि पाऊस यामधील संबंध विस्ताराने सांगितला आहे

अष्टौ मासान् निपीतं यद्, भूम्याः च, ओद-मयम् वसु |

        स्वगोभिः मोक्तुम् आरेभे, पर्जन्यः काल आगते ||

अर्थात सूर्याने 8 महीने पाण्याच्या रूपात पृथ्वीच्या संपत्तीचा वापर केला  होता. आता पावसाळ्याच्या ऋतूत सूर्य संचित संपत्ती पृथ्वीला परत करत आहे . खरंच  पावसाचा ऋतू केवळ सुंदर आणि आनंददायी नाही तर  पोषण देणारा,  जीवन देणारा देखील असतो. पावसाचे पाणी जे आपल्याला मिळत आहे ते आपल्या भावी पिढ्यांसाठी आहे हे आपण कधीही विसरू नये .

आज माझ्या मनात हा विचार आला कि रोचक संदर्भानेच  मी आज आपली आजची मन कि बात  समाप्त करावी. तुम्हा सर्वांना आगामी सण -उत्सवांच्या खूप खूप  शुभेच्छा . सण उत्सवांच्या काळात हे जरूर लक्षात ठेवा की कोरोना  अजूनही आपल्यातून गेलेला नाही. कोरोनाशी  संबंधित नियम विसरायचे नाहीत. तुम्ही सगळे निरोगी आणि प्रसन्न रहा .  खूप खूप धन्यवाद!