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माननीय श्री सुभाष नेंबंग पार्लियमेंट के स्पीकर श्री एवं माननीय सांसदगण और आदरणीय सभागृह ‘मै नेपाल म आउं न पायकोमा अत्यंत ही हर्षित छूं। धैरे-धैरे वर्षगी एक पथिक यातित तीर्थालुको रुकमा मय यहां आएको धीये। यो घनइष्ठ कि एक पतक तपइले नेपाल को भ्रमण करलो भयो भले यो जीवन पर्यंत संबंध मा बदलिन छो। प्रथमतया यश सुंदर देश को स्वाधिको रुकमा मफेरी फरकेल आएको छो। भारत को प्रधानमंत्री को हैसियत मा पुनः आउमो पावदा। वास्तव में मैले भाग्यशाली महसूस करछू। यो यस्तो यात्ताथियो जुनमें प्रधानमंत्री को कार्यालय म प्रवेश घर्लवित्तै की घर्ल चाहन थे, जिनकी हामरो नेपाल संघ को संबंधों मेरो सरकार को उच्चतम प्राथमिकता मदे हो। निमंत्रण अगर नूं भयको म मै सरकार न नेपाल का जनता राई धन्यवाद देना चाहन छो। मै संग मैले 125 करोड़ भारतीय जनता को मया शुभकामना और सदभावना लिए आयो छो।

आप कल्पना कर सकते हैं कि यह पल मेरे लिए कितने गर्व का पल है क्योंकि आपकी संसद में मैं पहला मेहमान हूं जिसको आपने बुलाया है और संबोधन करने का अवसर दिया है। यह सम्मान सिर्फ नरेंद्र मोदी का या भारत के प्रधानमंत्री का नहीं यह सवा सौ करोड़ भारतीयों का सम्मान है। मैं इसके लिए आदरणीय स्पीकर श्री का और आप अभी सभी सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। भारत और नेपाल के संबंध उतने ही पुराने हैं, जितने हिमालय और गंगा पुराने हैं। और इसलिए हमारे संबंध कागज की किश्तियों से आगे नहीं बढ़े हैं हमारे संबंध दिलों की दास्तान कहते हैं। जन-जन के मन के प्रतिकोश के रूप में हम एक ही सांस्कृतिक विरासत के धनी हैं।

मैं मूलतः गुजरात का हूं सोमनाथ की भूमि है और सोमनाथ की भूमि से चलकर के मैंने राष्ट्रीय विश्वनाथ का फलक काशी विश्वनाथ की छत्रछाया से मैंने प्रारंभ किया, काशी से किया। और आज पशुपतिनाथ के चरणों में आकर के खड़ा हुआ हूं। यह वो भूमि है जहां किशोरी जी बचपन में खेला करती थी, और आज भी हम जनक का स्मरण करते हैं। यह भूमि है जिसने विश्व को अचंभित कर देने वाले भगवान बुद्ध को जन्म दिया है। ऐसी एक सांस्कृतिक विरासत की धनी है और इसलिए और जब मैं काशी का प्रतिनिधि बन गया तो मेरा तो नेपाल से नाता और जुड़ गया क्योंकि काशी में एक मंदिर है जहां पुजारी नेपाल का होता है और नेपाल में पशुपतिनाथ है जहां का पुजारी हिन्दुस्तान का होता है।

भारत का हर व्यक्ति 51 शक्तिपीठों के दर्शन की कामना करता है उन 51 शक्तिपीठों में दो पीठ नेपाल में हैं। यदि इतना अटूट नाता है हमारा, इतना ही नहीं, हिन्दुस्तान ने वो कोई लड़ाई जीती नहीं है, जिस जीत के साथ किसी नेपाली का रक्त न बहा हो। किसी नेपाली ने शहादत न दो हो। भारत के स्वाभिमान के लिए, भारत की रक्षा के लिए नेपाल का बहादुर मरने-मिटने के लिए कभी पीछे नहीं रहा। भारत के लिए जीने-मरने वाले उन बहादुर नेपालियों को मैं नमन करना चाहता हूं। भारत की सेना के फील्ड मार्शल एक बहुत बढ़िया बात बताते थे, वो कहते थे कि कोई सेना का जवान यह कहे कि मैं मृत्यु से डरता नहीं हूं तो मान लेना कि या तो वो झूठ बोल रहा है या तो वो गुरखा है। अगर गुरखा कहता है कि मैं मौत से नहीं डरता तो इसमें सच्चाई है। यह बात फील्ड मार्शल मानेक शॉ ने कही थी। ऐसी वीरों की भूमि है, सांस्कृतिक धारा है। और आज मैं कह सकता हूं नेपाल के नागरिकों की नहीं लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले पूरे विश्व का ध्यान नेपाल की तरफ केंद्रित हुआ है। और नेपाल की तरफ केंद्रित हुआ है मतलब इस सभागृह में बैठे आप सब पर केंद्रित हुआ है। लोकतंत्र में विश्वास करने वाला पूरा विश्व आज आपकी तरफ देख रहा है। बड़ी आशा भरी नजरों से देख रहा है। आपको लगता होगा कि आप इस सदन में बैठकर के संविधान के निर्माण की चर्चा कर रहे हैं भिन्न भिन्न धाराओं की चर्चा कर रहे हैं, समाज के भिन्न भिन्न वर्गों के हितों की चर्चा कर रहे हैं, इतना नहीं है। संविधान के निर्माता के रूप में आपको यह सौभाग्य मिलना। उस घटना को मैं अगर और तरीके से देखूं तो जिस परंपरा को हम जीते हैं, कभी कुछ ऋषिमुनियों ने वेद निर्माण किए किसी ने उपनिषद निर्माण किए किसी युग में संहिताओं का निर्माण हुआ और जिसके प्रकाश में हजारों साल से हम अपना जीवन निर्वह और आयोजन करते रहते हैं। उसी कड़ी में आधुनिक जीवन में राष्ट्र का संविधान भी एक नई संहिता के रूप में जन्म लेता है। नए युग को दिशा एवं दशा देने का काम संविधान के माध्यम से होता है, जो किसी जमाने में ऋषियों ने वेद के द्वारा, पुराणों के द्वारा, संहिताओं के द्वारा किया था, एक प्रकार से आप नई संहिता लिख रहे हैं। और इसलिए यह सौभाग्य प्राप्त करने वाले आप सबको मैं हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं, बधाई देना चाहता हूं। लेकिन संविधान निर्माण की एक पूर्व शर्त होती है। संविधान के निर्माण के लिए ऋषिमन होना जरूरी होता है। वो मन जो दूर का देख सकता है। वो मन समस्याओं का अंदाज लगा सकता है वो मन आज भी उन शब्दों में अंकित करेगा जो सौ साल के बाद भी समाज को सुरक्षित रखने की समाज की विकास यात्रा को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा।

कितना पवित्र, कितना उम्दा, कितना व्यापक, कितना विशाल काम आप लोगों के पास है और इसलिए आप बहुत भाग्यशाली हैं, मैं आपको नमन करने आया हूं। मैं आपका अभिनंदन करने आया हूं। संविधान, एक किताब नहीं होती है, संविधान कल आज और कल को जोड़ता है। मैं कभी कभी सोचता हूं भारत का संविधान, वो हिमालय को समंदर के साथ जोड़ता है, भारत का संविधान कच्छ के रेगिस्तान को नागालैंड की हरी भरी पर्वतमालाओं के साथ जोड़ता है।

सवा सौ करोड़ नागरिकों के मन को आशाओं को आकांक्षाओं को पल्लवित करता है। आप जिस संविधान का निर्माण करने जा रहे हैं वह सिर्फ, सिर्फ नेपाल के नागरिकों के लिए नहीं बल्कि दुनिया के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ लिखने जा रहे हो। आपको आश्चर्य होगा कि मोदी जी क्या बता रहे हैं, मैं सच बता रहा हूं। आपका संविधान जो बनेगा वो सिर्फ नेपाल के लिए नहीं विश्व के लिए एक स्वर्णिम पृष्ठ बनेगा क्योंकि इतिहास की धरोहर में देखें तो एक सम्राट अशोक हुआ करते थे, युद्ध के बाद शांति की तलाश में निकले, युद्ध छोड़ बुद्ध की शरण गए और एक नया स्वर्णिम पृष्ठ लिखा गया। मैं उन सबको बधाई देता हूं जिन्होंने बुलेट का रास्ता छोड़कर के बैलेट के रास्ते पर जाने का संकल्प किया नेपाल की धरती पर। मैं उन सबका अभिनंदन करता हूं जो युद्ध से बुद्ध की ओर प्रयाण किया है और इस सदन में आपकी मौजूदगी युद्ध से बुद्ध की तरफ की आपकी यात्रा का अनुमोदन करती है और इसलिए मैं आपको बधाई देने आया हूं।

आप जब संविधान का निर्माण करेंगे वो संविधान, और मुझे विश्वास है कि पीस प्रोसेस धर्म से, एक ऐसा उम्दा संविधान जन्म लेने वाला है जो कोटि-कोटि जनों की आशाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति करेगा। लेकिन इससे भी आगे आज दुनिया के हर भूभाग में छोटे मोटे कई गुट ऐसे पैदा हुए हैं, जिनका हिंसा में ही विश्वास है। शस्त्र के माध्यम से ही सुख प्राप्त करने का उनको मार्ग लगता है।

विश्व के सामने नेपाल वो देश बनेगा जब संविधान लेकर आएगा, वो दुनिया को विश्वास दिलाएगा कि शस्त्रों को छोड़कर के शास्त्रों के सहारे भी जीवन को बदला जा सकता है। ये उम्दा काम आप करने वाले हैं। हिंसा में विश्वास करने वाले दुनिया के उन गुटों को यह संदेश जाएगा कि बम, बंदूक और पिस्तौल के माध्यम से भलाई नहीं होती है, संविधान की सीमा में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के द्वारा इच्छित परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। और ऐसा उम्दा काम आपने शुरू किया है और उन लोगों ने इसमें हिस्सेदारी की है, जिन्होंने कभी शस्त्रों में भरोसा किया था। शस्त्रों को छोड़कर के, युद्ध को छोड़कर के बुद्ध के मार्ग पर जाने का रास्ता अपनाया और इसलिए एक ऐसा पवित्र काम आपके माध्यम से हो रहा है इस संविधान सभा के माध्यम से जो इस विश्व के हिंसा में विश्वास करने वाले लोगों को पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगा। और आपका प्रयोग अगर सफल रहा तो विश्व को हिंसा की मुक्ति का एक नया मार्ग बुद्ध की इस भूमि से मिलेगा। यह मुझे आपके संविधान में ताकत नजर आ रही है और इसलिए मैं उस रूप में इस संविधान सभा को देख रहा हूं। उस सामर्थ्य के रूप में देख रहा हूं। संविधान किसके लिए है। भारत प्रारंभ से मानता आया है हमारा काम आपके काम में दखल करने का नहीं है, भारत का काम, आप जो संकल्प करें, आप जो दिशा चुनें, उसमें हम अगर काम आ सकते हैं तो काम आना यही हमारा काम है। आपको दिशा देना यही हमारा काम नहीं है। आपको मंजिल पर ले जाना यह हमारा काम नहीं है।

नेपाल एक सार्वभौम राष्ट्र है। हमारी इच्छा इतनी ही है नेपाल जैसा सार्वभौम राष्ट्र, हिमालय जितनी ऊंचाइयों को प्राप्त करे और पूरा विश्व नेपाल को देखकर के गौरवान्वित हो, ऐसा नेपाल देखने की हमारी इच्छा है। और इसलिए आपके पड़ोस में बैठकर और हमारे लोकतंत्र के अनुभव के आधार पर हमें अच्छा लगता है कि आप इस दिशा में जा रहे हैं आनंद होता है। संविधान वो हो जो सर्वजन समावेशक हो। हर नेपाली नागरिक को गरीब हो, अमीर हो, पढ़ा लिखा हो, अनपढ़ हो, गांव में हो शहर में हो, पहाड़ में हो तराई में, हो कहीं पर भी हो, हर नेपाली को संविधान जब आए तो उसे लगना चाहिए कि यह एक ऐसा गुलदस्ता है जिस गुलदस्ते में मेरे भी पुष्प की महक हैं। और संविधान निर्माता ऐसा गुलदस्ता बनाएंगे कि जिसके कारण हर नेपाली को लगेगा हां ऐसा बढ़िया गुलदस्ता आया है, जिसमें मेरे फूल की महक मुझे महसूस हो रही है वो काम आप कर रहे हैं। संविधान वो हो जो सर्वजन हिताय हो, सर्वजन सुखाय हो। किसी एक का भला करने के लिए नहीं। संविधान जनसामान्य की आशा आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हो। संविधान जोड़ता है, संविधान कभी तोड़ता नहीं है। संविधान विवादों को संवादों की और ले जाने का एक सबल माध्यम होता है और इसलिए चाहे पहाड़ हो तराई हो, संविधान जोड़ने का काम करेगा और अधिक ताकत पैदा करने का काम करेगा। उस दिशा में आप सिद्धि प्राप्त करेंगे ऐसा मेरा पूरा विश्वास है।

संविधान वर्तमान के बोझ से दबा हुआ नहीं होना चाहिए और ऋषि मन का मेरा तात्पर्य यही है, जो वर्तमान से मुक्ति की अनुभूति करता है और जो आने वाले कल को बहुत गहराई से देख सकता है वही ऋषि मन होता है, जो संविधान का निर्माण आने वाली पीढ़ियों के लिए करता है। और यही हमारी सोच होनी चाहिए। संविधान में हजारों चीजें अच्छी होती हैं, लेकिन एक कोमा एक फुलस्टोप कहीं पर भी ऐसा आ गया जो आज तो पता नहीं चले कि कोमा है फुलस्टोप पता नहीं रहे लिख दिया, लेकिन कभी 50 साल के बाद 100 साल के बाद कोमा, फुलस्टोप के तौर पर आया हुआ कोई एक चीज कहीं विष बीच न बन जाए विष बीज को जन्म न दें, जो नेपाल के इन सपनों को रौंद डाले। ऐसी स्थिति कभी आए नहीं, ये बारीकी की चिंता ये संविधान सभा करेगी ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। और मैं मानता हूं कि आपने जो काम शुरू किया है वो अपने आप में गौरव का काम है। शस्त्र को छोड़कर के शास्त्रों को स्वीकार करना यही तो बुद्ध की भूमि से निकलने की आवाज है, संदेश है और उस अर्थ में भारत चाहेगा, और जो आप लोगों ने तय किया जो मैंने सुना है और मैं मानता हूं कि बहुत ही उत्तम काम संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र का है। आज उपलब्ध व्यवस्था में उत्तम रास्ता आप सबने चुना है और भारत हमेशा आपके इस संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की कल्पना का पूरा-पूरा आदर करता है स्वागत करता है। इंतजार यही है कि जितना जल्दी हो। इंतजार इसी बात का है।

नेपाल और भारत के रिश्ते ऐसे हैं कि थोड़ी सी भी हवा इधर उधर हो जाए तो ठंड हमें भी लगती है। अगर सूरज यहां तप जाए तो गर्मी हमें भी लगती है। ऐसा अटूट नाता है। अगर आप चैन से न सोए हों तो हिन्दुस्तान भी चैन से नहीं सो सकता है। नेपाल का कोई मेरा भाई भूखा हो तो भारत कैसे आनंद ले सकता है। कल जब ये कोसी की घटना घटी, समाचार आए। मेरी पूरी सरकार लगी रही। इतना बड़ा हादसा हो गया, क्या हो रहा है इतनी बड़ी चट्टान गिरी है कोसी नदी का पानी रुक नहीं रहा है। पता नहीं क्या हो गया है, कितने लोग खो गए हैं, कितने लोग मारे गए हैं। जितनी चिंता आपको सताती थी, उतनी ही चिंता मुझे भी सताती थी। क्यों, क्योंकि ये कष्ट आपका है तो मेरा भी है। ये आपदा आपकी है तो आपदा मेरी भी है। और हिन्दुस्तान के किसी कौने में जितनी तेजी से मदद पहुंचे, उतनी ही तेजी से मदद पहुंचाने के लिए मैंने दिशा पकड़ी और लोगों को मैंने भेज भी दिया। क्योंकि आप मेरे हैं हमारे हैं। हम और आप अलग हो नहीं सकते। और इसलिए आपके विकास के अंदर भारत आपकी जितनी आशा आकांक्षाएं हैं उसकी पूर्ति के लिए प्रतिबद्ध है।

नेपाल जहां से जन्मे हुए बुद्ध ने मन के अंधेरे को दूर किया था, विचारों का प्रकाश दिया और मानव जाति को एक नई चेतना मिली। यह नेपाल पानी की शक्ति का ऐसा धनी है, जो बिजली के माध्यम से आज भी हिन्दुस्तान का अँधेरा दूर कर सकता है और हम बिजली मुफ्त में नहीं चाहते, हम खरीदना चाहते हैं। हम आपका पानी भी नहीं ले जाना चाहते, आपका पानी और वैसे तो मैं एक बात नहीं जानता कि नेपाल में यह बात किस रूप में देखी जाएगी। पानी और जवानी यह कभी पहाड़ के काम नहीं आते, पानी पहाड़ में रहता नहीं चला जाता है और जवानी भी, पहाड़ में जवानी, थोड़ा सी उम्र बढ़े तो मौका देखते है कि चलो कही चला जाए, बेचारों को वहां रोजी-रोटी नहीं है तो जवानी भी पहाड़ के कम नहीं आती और पानी भी पहाड़ के काम नहीं आता है। लेकिन किसी युग में कहा गया होगा। हमें इस बात को बदलना होगा वो पानी पहाड़ के काम कैसे आये और जवानी पहाड़ को कैसे नई रौनक दे वो नई-नई दिशा में हमको बदलना होगा और इसलिए विकास यही उसके लिए यह मार्ग है।

भारत युवा देश है नेपाल भी युवा देश है। यहां कितने नौजवानों की तादाद है अगर उन नौजवानों के हाथ में अवसर दिया जाए तो नेपाल का कल क्या नेपाल का आज बदलने का सामर्थ्य इन नौजवानों में है वो अवसर कैसे मिलेगा हम प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग करके विकास की एक दिशा तय नहीं करेंगे तो कैसे होगा। भारत इसके लिए आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहता है। निर्णय आप कीजिए आप अपने नेतृत्व का परिचय दीजिए। और अकेले हिन्दुस्तान को बिजली बेचकर भी नेपाल समृद्ध देशों में अपनी जगह बना सकता है। इतनी ताकत आपके पास है। हम इसमें आपके साथ हैं आपकी विकास यात्रा में जुड़ना चाहते हैं। यहां पर ट्रकों के द्वारा ऑयल आता है, युग बदल चुका है, पाइप लाइनों से क्यों न आये हम उस काम को पूरा करेंगे। शिक्षा के क्षेत्र में यहां के नौजवानों भारत आते हैं। भारत सरकार उनकों स्कालरशिप देती है। स्कॉलरशिप पाने वाले नौजवानों की संख्या में मैं बढ़ोत्तरी चाहता हूं । अधिक नौजवानों को अवसर मिले समझ लीजिए कि आज ही घोषणा कर रहा हूं इसका फायदा उठाइए।

जब लक्ष्मण जी मूर्छित हो गये तो हनुमान जी पौधा लेने यहां आये। आज पूरे विश्व में होलिस्टिक हेल्थकेयर की चर्चा चल रही है। हिमालय के गर्भ में जड़ी बूटियां पड़ी हैं। अगर उन जड़ी बूटियों से हम हर्बल मेडिसिन को बढ़ावा दें। क्यों न नेपाल विश्व में सबसे बड़ा हर्बल मेडिसिन का एक्सपोर्टर क्यों ना हो जाए? क्या क्या नहीं है आपके पास। मैं आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के लिए तैयार हूं।

भारत जो मदद हो सके करने के लिए तैयार है क्योंकि आने वाले दिनों में विकास को किस दिशा में ले जाना आप जानते हैं मैं कुछ नया नहीं कह रहा। टूरिज्म की बात करें तो सवा सौ करोड़ देशवासी आपके पड़ोस में ऐसे हैं जो कभी न कभी पशुपतिनाथ आकर अपना सिर झुकाना चाहते हैं। भगवान बुद्ध के पास आकर शान्ति का संदेश देना चाहते हैं। क्यों ना नेपाल का टूरिज्म उस रूप में विकसित हो कि भारत से बहुत बड़ी मात्रा में टूरिस्ट नेपाल पहुंचें। टूरिज्म एक ऐसा क्षेत्र है कम से कम पूंजी में ज्यादा से ज्यादा रोजगार देने वाला कोई अगर क्षेत्र है तो वह टूरिज्म है। टूरिस्ट आता है तो चना बेचने वाला भी कमाता है और मूंगफली बेचने वाला भी कमाता है, ऑटो रिक्शा वाला भी कमाता है, टैक्सी वाला भी कमाता है और चाय बेचने वाला भी कमाता है। और जब चाय बेचने वाले की बात आती है तो मुझे ज्यादा आनंद आता है। कहने का मतलब यह है कि टूरिज्म के विकास में इतनी संभावनाएं भरी पड़ी हैं। एडवेंचर टूरिज्म के लिए, हिमालय से बढ़कर क्या हो सकता है। नेपाल से बढ़कर कौन सी जगह हो सकती है। पूरे विश्व के नौजवानों को पागल कर दे इतनी ताकत आप की धरती के पास पड़ी है। मैं आपसे आह्वान करता हूं , आइए आगे आइये। पूरे विश्व का एडवेंचर यूथ, जिसका एडवेंचर करने का मिज़ाज है, जिसको पहाड़ों पर जाने की इच्छा रखता है, आप पूरे विश्व के युवाओं को ललकार सकते हैं।

आईए, कितना बड़ अवसर है। हमें संविधान भी निर्माण करना है। हमें नेपाल को नई ऊंचाईयों पर भी ले जाना है और इसके लिए एक पड़ोसी का धर्म हम निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मेरे मन में आया कि नेपाल को हिट करें, मैंने सोचा अगर मैं अलग शब्दों का उपयोग करुंगा तो आपको बुरा लग जाएगा ये कौन होता है हिट करने वाला। लेकिन मैं जब हिट करने की बात करता हूं तो मेरे मन में तीन प्रमुख बातें हैं – एचआईटी। एक हाईबेस दूसरा आईबेस और तीसरा ट्रासबेस। नेपाल को भारत जितनी जल्दी ये गिफ्ट दें। आईबेस यानी इनफॉर्मेशन बेस, पूरे विश्व के भीतर नेपाल पीछे नहीं रहना चाहिए। नेपाल भी डिजिटल बनना चाहिए। नेपाल विश्व के साथ जुड्ना चाहिए। आईबेस चाहिए और ट्रांसबेस, ट्रांसमीशन लाईन्स। आज नेपाल को हम जितनी बिजली दे रहे हैं, उसको डबल करने का मेरा इरादा है और इसके लिए जितना जल्दी ट्रांसमीशन लाईन लगाएंगे, अभी हम नेपाल का अंधेरा दूर करेंगे और दशक के बाद, अंधेरा हिन्दुस्तान का नेपाल दूर करेगा, ये हमारा नाता है और इसीलिए मैंने कहा एचआईटी। एच-हाइवेज,आई-इन्फार्मेशन और टी-ट्रासमीशन। ये मैं हिट करना चाहूंगा और आप भी चाहेंगे कि ये हिट जल्दी हो।

मुझे लगता है कि हम जितना जल्दी नेपाल को अपने पास बुला सकें बुला लें पर अभी इसको खिसका कर ले जाने वाला कोई विज्ञान तो अभी आया नहीं है लेकिन अगर महाकाली नदी पर ब्रिज बन जाए तो मेरे और आपके बीच की दूरी बहुत खत्म हो जाएगी। आज एकदम हमारे पास आ जाएंगे। आज हमें घूम घामकर पहुंचना पड़ता है लेकिन महाकाली नदी पर अगर ब्रिज बन गया तो हमारी दूरियां कम हो जाएंगी। हम इस बात पर बल देकर आगे बढ़ना चाहते हैं। उसी प्रकार से सीमा यानी बार्डर जो हैं वो बैरियर नहीं हो सकते, बॉर्डर ब्रिज बनना चाहिए। हम चाहते हैं भारत और नेपाल की सीमाएं इस प्रकार से वाईब्रेंट हो, अच्छेपन की यहां लेनदेन होती रहे ताकि आपका भी विकास हो और भारत के भी आपके साथ जुड़े हुए छोटे-छोटे जो राज्य हैं, उनको भी विकास के अवसर मिलें। एक योजना जिसे मैं प्रधानमंत्री जी को आज बता रहा था। मैंने कहा कि हिमालय पर रिसर्च होना जरूरी है। इतनी बड़ी प्राकृतिक संपदा है। भारत ने उस पर एक काम शुरू किया है, हमने अपने बजट में भी इसकी घोषणा की है। नेपाल भी उसमें आगे बढ़े और हम मिलकर के हिमालय की शक्ति, मानव जाति के कैसे काम आ सकती है, उसके वेज और मीन्स क्या हों, उसके सामर्थ्य को हम पहचाने और मानव जाति के कल्याण की दिशा में हम जरूर काम करें। उसी प्रकार से हम प्रयास करना चाहते हैं।

कभी-कभी मैं हैरान हो जाता हूं कि अमेरिका टेलिफोन करना है तो बड़े सस्ते में हो जाता है लेकिन नेपाल फोन करना है तो बड़ा महंगा पड़ जाता है। हमें समझ नहीं आता कि यह क्या बात है। ऐसा कैसे हो सकता है और नेपाल के लाखों लोग हिन्दुस्तान में रहते हैं अपने परिवार से बात करना चाहते हैं कर नहीं पाते। नमस्ते करके फोन रख देते हैं। मैं यह स्थिति बदलना चाहता हूं। दोनों देशों में ये जो सर्विस प्रोवाइडर हैं उनसे मिलकर के हम भी बात करेंगे आप भी बात कीजिए। यह कनेक्टिविटी ऐसी नहीं होनी चाहिए। बड़े आराम से सहज तरीके से कम खर्चे में बात हो और उसी से तो नाता जुड़ता है। लाइव कम्युनिकेशन जितना बढ़ता है उतना ही नाता बनता है और हम उसको बढ़ावा देना चाहते हैं।

अभी आपने सुना होगा जब मैं, मेरा शपथ समारोह था जब मैं प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाला था तो मैंने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को निमंत्रित किया था और मैं आभारी हूं आदरणीय प्रधानमंत्री जी का कि बहुत ही कम नोटिस में तो आए और मैं मानता हूं कि सार्क देश मिलकर के गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने का एजेंडा लेकर एक साथ आगे क्यों न बढ़ें। गरीबी के खिलाफ लड़ने में हम दोनों हम सब सभी सार्क देश एक-दूसरे की मदद करें। और उसमें एक काम सार्क देशों को और भारत का दायित्व है हम कोई उपकार नहीं करते, हम मानते हैं कि हमारा दायित्व है कि हमारे-अड़ोस-पड़ोस के हमारे जितने भी छोटे भाई हैं हमारे साथी भाई हैं उनकी विकास यात्रा में हम मदद मुख्य रूप से करें।

और इसलिए अभी-अभी मैंने घोषणा की है कि स्पेस टेक्नोलॉजी का लाभ हमारे सार्क देशों को मिलना चाहिए। और इसलिए भारत की तरफ से एक सार्क सैटेलाइट लॉन्च किया जाएगा। इस सार्क सैटेलाइट का लाभ हैल्थ सेक्टर के लिए, एजुकेशन सेक्टर के लिए स्पेस टेक्नोलॉजी का लाभ सार्क देशों को मिले नेपाल को मिले उस दिशा में हमने कदम उठाना तय किया है। और इसलिए इसका आने वाले दिनों में जरूर लाभ मिलेगा।

उसी प्रकार से मैंने पहले ही कहा कि मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट, आपने देखा होगा, हम इतने पास में हैं आपके और हमारे बीच में कोई ज्यादा दूरी नहीं है फिर भी आते-आते 17 साल लग गए। यह अखरता है। मैं आपको वादा करता हूं कि अब ऐसा नहीं होगा। और मैं तो कुछ ही महीनों में वापस आ रहा हूं सार्क समिट के समय। और मैंने उस समय तय किया है कि मैं उस समय जब आउंगा तो राजा जनक को भी नमन करने जाउंगा और भगवान बुद्ध को भी नमन करने जाउंगा। यह खुशी की बात है कि पंचेश्वर प्रोजेक्ट बहुत समय पहले तय हुआ था फिर कितने रूपये की बढ़ गई, लेकिन अब अथॉरिटी का निर्माण दोनों देशों में हुआ है मैं मानता हूं कि एक साल के भीतर-भीतर 5600 मेगावॉट का यह प्रोजेक्ट, काम आरंभ हो जाए तो आप कल्पना कर सकते हैं कि नेपाल की कितनी बड़ी सेवा होगी। आज नेपाल के पास जितनी बिजली है उससे करीब-करीब पाँच गुना बिजली, छोटी बात नहीं है यह। विकास को कितनी नई ऊँचाई मिल सकती है। और उसके लिए भारत बिल्कुल प्रोएक्टिव होकर आपके साथ काम करने के लिए तैयार है। और हम आपको उस दिशा में आगे बढ़ाने के लिए पूरा प्रयास करेंगे।

एक बात मैं और चाहूंगा, जैसा मैंने कहा हर्बल मेडिसिन, एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। वैसे भी ऑर्गेनिक फॉर्मिंग पुरी दुनिया के अंदर एक बहुत बड़ा मार्केट खड़ा हुआ है। जो माल रुपये में बिकता है वो अगर ऑर्गेनिक है तो डॉलरों में बिकने लग जाता है।

नेपाल एक ऐसी भूमि है जहां यह संभव है। भारत में सिक्किम एक राज्य, आपके पड़ोस में ही माना जाएगा। सिक्किम ने पूरा ऑर्गेनिक स्टेट बना दिया अपने आपको। और उसके कारण पूरे विश्व में उसका एक नया मार्केट खड़ा हुआ है। अगर नेपाल उस दिशा में जाना चाहता है तो मुझे खुशी होगी आपको मदद करने की, आपके साथ काम करने की। उसी प्रकार से हमने एक प्रयोग शुरू किया है हिन्दुस्तान में सोइल (मृदा) हैल्थ कार्ड का। हम जानते हैं कि भारत और नेपाल में हम नागरिकों के पास भी सोइल हैल्थ कार्ड नहीं है। लेकिन हम स्वाइल हैल्थ कार्ड किसानों को उसकी जमीन की तबीयत कैसी है, कोई बीमारी तो नहीं है, विशेषताएं क्या हैं किस प्रकार के फसल के लिए उपयोगी है। कौन सी दवाइंया वहां डालनी चाहिएं कौन सी दवाएं नहीं डालनी चाहिएं। कितना फर्टिलाइजर लिया जा सकता है ये सारी वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है। अगर नेपाल की रुचि होगी तो हम जो सोइल हैल्थ कार्ड के इस काम को जो हिन्दुस्तान में आगे बढ़ा रहे हैं यहां के किसानों को भी अगर उसका लाभ मिलेगा तो कृषि आधुनिक हो, कृषि वैज्ञानिक हो उसमें हम बहुत बड़ी मात्रा में उपयोगी हो सकते हैं। और मैं चाहता हूं कि आने वाले दिनों में आप इसके लिए जरूर ही कुछ न कुछ सोचेंगे।

और मैं मानता हूं। उसी प्रकार से आज जब मैं आपके बीच आया हूं तो मैं आज यह भी आपको घोषणा करके जाना चाहता हूं कि भारत नेपाल को 10,000 करोड़ नेपाली रुपये कंसेसनल लाइन ऑफ क्रेडिट की सहायता देने का हमने निर्णय किया है। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इस क्रेडिट का उपयोग नेपाल की प्राथमिकता पर होगा। आप इसे हाइड्रो पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर इन सारे क्षेत्रों में लगाएं तो यह करीब एक बिलियन डॉलर जैसी अमाउंट मैं आज और पहले इसका जो दिया हुआ है यह इससे अलग है उसको इससे मत जोड़ना वो अलग है, जो दे दिया। यह नया है।

फिर एक बार मैं, आपने मेरा स्वागत किया सम्मान किया इसलिए मैं आपका आभारी हूं। लेकिन मैं फिर से एक बार विश्वास दिलाता हूं कि दुनिया कि नजरें आपकी तरफ हैं। विश्व बड़ी आशा भरी नजरों से आपकी तरफ देख रहा है क्योंकि शस्त्र से मुक्ति का मार्ग, संविधान के माध्यम से आज शस्त्र के रास्ते पर चल पड़े लोगों को वापस लाने का काम आज नेपाल की सफलता से जुड़ा हुआ है। आप सफल हुए तो दुनिया को वापस लौटने का अवसर मिलेगा। शस्त्र छोड़ने की प्रेरणा मिलेगी।

लोकतांत्रिक व्यवस्था से भी जन-मन की आशाओं आकांक्षाओं की पूर्ति का रास्ता खुलेगा, नया विश्वास पैदा होगा। आप संविधान के इस काम को उस रूप में देखें। इसलिए मैं दोबारा इस बात का उल्लेख कर रहा हूं। आपका ऋषि मन 100 साल के बाद नेपाल कैसा होगा, नेपाल के लोग कैसे हों, नेपाल के लोगों को क्या मिले इसका निर्णय आप कर रहे हैं और उस निर्णय में आप सफल होंगे। भगवान बुद्ध की इस भूमि में विचारों की कोई कमी हो नहीं सकती। इरादों की कमी हो नहीं सकती। संकल्पशक्ति की कमी कभी नहीं हो सकती, और इसलिए एक नया इतिहास यहां से रचने जा रहा है। इसको इतना बड़ा लाभ मिलने वाला है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम सबको, मैं यही कहूंगा कि हमारे जो संबंध हैं भारत-नेपाल मैत्री यह अमर रहें। भारत-नेपाल मैत्री युग-युग जीवे और यह सार्वभौम राष्ट्र नेपाल हिमालय से भी नई ऊंचाइयों पर ऊपर उठे। इसी शुभकामनाओं के साथ फिर एक बार आपके बीच आने का अवसर मिला बहुत बहुत धन्यवाद।

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কারগিলের যুদ্ধ, ভারতের সৈনিকদের শৌর্য আর সংযমের এমন প্রতীক যা সারা বিশ্ব দেখেছে: প্রধানমন্ত্রী মোদী
‘অমৃত মহোৎসব’ কোনও সরকারের কর্মসূচী নয়, কোনও রাজনৈতিক দলের কর্মসূচী নয়, এটা কোটি-কোটি ভারতবাসীর কর্মসূচী: প্রধানমন্ত্রী মোদী
#MyHandloomMyPride: প্রধানমন্ত্রী মোদী মানুষকে খাদি ও তাঁত পণ্য কিনতে অনুরোধ করেছেন
মন কি বাত' এমন একটি মাধ্যম যেখানে ইতিবাচক দিক রয়েছে ও সংবেদনশীলতা রয়েছে: প্রধানমন্ত্রী মোদী
সমীক্ষার পরে জানা গিয়েছে যে বার্তা এবং পরামর্শ প্রেরকদের প্রায় ৭৫ শতাংশ মানুষ, ৩৫ বছর বা তারো কম বয়সী: প্রধানমন্ত্রী মোদী
জলের এক এক ফোঁটা বাঁচানো, জলের যে কোনো রকমের অপচয়কে বন্ধ করা আমাদের জীবন শৈলীর এক অন্যতম অংশ হওয়া দরকার: প্রধানমন্ত্রী মোদী

আমার প্রিয় দেশবাসী,  নমস্কার।

দু' দিন আগের কিছু অদ্ভূত ছবি, কিছু স্মরণীয় মুহূর্ত এখনও ভাসছে আমার চোখের সামনে। তাই এবারের 'মন কি বাত' সেইসব মুহূর্ত দিয়েই শুরু করব। টোকিও অলিম্পিক্সে ভারতের খেলোয়াড়দের ত্রিবর্ণ রঞ্জিত পতাকা নিয়ে চলতে দেখে শুধু  আমিই নয়, গোটা দেশ রোমাঞ্চিত হয়ে উঠেছে। পুরো দেশ যেন এক হয়ে নিজেদের এই যোদ্ধাদের বলছে,

বিজয়ী ভব, বিজয়ী ভব!

যখন এই সব খেলোয়াড়রা ভারত থেকে রওনা হয়েছিলেন, তাঁদের সঙ্গে গল্প করার, তাঁদের সম্পর্কে জানার আর দেশকে জানানোর সুযোগ পেয়েছিলাম আমি। এই সব খেলোয়াড়রা জীবনের অনেক চ্যালেঞ্জের মোকাবিলা করে এখানে পৌঁছেছেন। আজ তাঁদের সঙ্গে রয়েছে আপনাদের সমর্থন ও ভালোবাসার শক্তি। এই জন্য, আসুন সবাই একসঙ্গে মিলে আমাদের সব খেলোয়াড়দের শুভেচ্ছা জানাই, তাঁদের মনোবল বাড়াই। সোশ্যাল মিডিয়াতে অলিম্পিক্সের খেলোয়াড়দের সমর্থনের জন্য  আমাদের ভিক্টরি পাঞ্চ ক্যাম্পেন এখন শুরু হয়ে গিয়েছে। আপনিও নিজের টিমের সঙ্গে নিজের ভিক্টরি পাঞ্চ শেয়ার করুন, ইণ্ডিয়ার জন্য চীয়ার করুন।

বন্ধুরা, যিনি দেশের ত্রিবর্ণ রঞ্জিত পতাকা উত্তোলন করেন, সেই পতাকার সম্মানে, আবেগে পূর্ণ হওয়া তাঁর পক্ষে স্বাভাবিক। দেশপ্রেমের এই আবেগ আমাদের একত্রিত করে রাখে। আগামীকাল অর্থাৎ ২৬শে জুলাই 'কারগিল বিজয় দিবস'ও বটে। কারগিলের যুদ্ধ, ভারতের সৈনিকদের শৌর্য আর সংযমের এমন প্রতীক যা সারা বিশ্ব দেখেছে। এই বার এই গৌরবশালী দিবসও 'অমৃত মহোৎসবের' মধ্যে পালিত হবে। এই জন্য এটা আরও বিশিষ্ট হয়ে উঠছে। আমি চাইব যে আপনারা কারগিলের রোমাঞ্চকর কাহিনী অবশ্যই পড়ুন, কারগিলের বীরদের আমরা সবাই প্রণাম জানাই।

বন্ধুরা, এই বার ১৫ই আগস্ট দেশ তার স্বাধীনতার পঁচাত্তরতম বর্ষে প্রবেশ করছে। এটা আমাদের পরম সৌভাগ্য, যে স্বাধীনতার জন্য যুগ-যুগ ধরে দেশ অপেক্ষা করেছে তার পঁচাত্তর বর্ষের  সাক্ষী হচ্ছি আমরা। আপনাদের মনে থাকবে, স্বাধীনতার পঁচাত্তরতম বর্ষ উদযাপনের জন্য, ১২ই মার্চ বাপুর সবরমতী আশ্রম থেকে ‘অমৃত মহোৎসবের’ সূচনা হয়েছিল। এই দিনেই বাপুর ডাণ্ডি যাত্রাকেও পুনরুর্জীবিত করা হয়েছিল। সেই সময় জম্মু-কাশ্মীর থেকে পুদুচ্চেরি অবধি, গুজরাত থেকে  উত্তর - পূর্বাঞ্চল অবধি, দেশ জুড়ে অমৃত মহোৎসবের সঙ্গে যুক্ত কর্মসূচী পালিত হচ্ছে। অনেক এমন ঘটনা, এমন স্বাধীনতা সেনানী, যাঁদের অবদান তো বিরাট কিন্তু সেসবের চর্চা করা যায় নি – আজ মানুষ তাঁদের ব্যাপারেও জানতে পারছে।  যেমন, মোইরাং ডে-র কথাই ধরুন। মণিপুরের ছোট একটা গ্রাম মোইরাং, কোনও এক সময় নেতাজি সুভাষচন্দ্র বসুর আজাদ হিন্দ বাহিনী অর্থাৎ আই-এন-এর এক  অন্যতম প্রধান ঠিকানা ছিল। এখানে, স্বাধীনতা লাভের আগেই, আইএনএর কর্নেল শৌকত মালিকজী পতাকা উত্তোলন করেন। অমৃত মহোৎসব চলাকালীন সেই মোইরাং-এ গত ১৪ই এপ্রিল আরেকবার ত্রিবর্ণ রঞ্জিত পতাকা উত্তোলন করা হয়। এমন কত স্বাধীনতা সেনানী আর মহাপুরুষ আছেন, অমৃত মহোৎসবে দেশ যাঁদের স্মরণ করছে। সরকার আর সামাজিক নানা সংগঠনের  তরফেও  এর সঙ্গে যুক্ত নানাধরণের কর্মসূচী আয়োজিত হচ্ছে। এমনই এক আয়োজন এবার ১৫ই আগস্টে হতে চলেছে, এটা জাতীয় সঙ্গীতের সঙ্গে যুক্ত একটা প্রয়াস। সংস্কৃতি মন্ত্রণালয় উদ্যোগ  নিয়েছে সেদিন যাতে প্রচুর সংখ্যক ভারতবাসী  এক হয়ে জাতীয় সঙ্গীত গান। এর জন্য একটা ওয়েবসাইটও বানানো হয়েছে – রাষ্ট্রগান-ডট-ইন। এই ওয়েবসাইটের সাহায্যে আপনি জাতীয় সঙ্গীত গেয়ে সেটা রেকর্ড করতে পারবেন, এই অভিযানের সঙ্গে যুক্ত হতে পারবেন। আমি আশা করি, আপনারা এই অভিনব উদ্যোগের সঙ্গে যুক্ত হবেন। এইভাবে অনেক অভিযান, অনেক প্রয়াস, আপনারা আগামী দিনে দেখতে পাবেন। ‘অমৃত মহোৎসব’ কোনও সরকারের কর্মসূচী নয়, কোনও রাজনৈতিক দলের কর্মসূচী নয়, এটা কোটি-কোটি ভারতবাসীর কর্মসূচী। প্রত্যেক স্বাধীন আর কৃতজ্ঞ ভারতীয়র নিজেদের স্বাধীনতা সংগ্রামীদের প্রতি প্রণাম নিবেদনে আর এই মহোৎসবের মূল ভাবনার  বিস্তার তো বিশাল – এই ভাবনা হল, নিজেদের স্বাধীনতা সংগ্রামীদের পথে চলার, তাঁদের স্বপ্নের দেশ নির্মাণের। যেমনভাবে দেশের স্বাধীনতার জন্য উদ্বেলিত সকলে স্বাধীনতার লক্ষ্যে একজোট  হয়েছিলেন তেমনভাবেই আমাদেরও দেশের বিকাশের লক্ষ্যে একজোট হতে হবে। আমাদের দেশের জন্য বাঁচতে হবে, দেশের জন্য কাজ করতে হবে, আর এতে ছোট-ছোট উদ্যোগও বড় ফলাফল এনে দেয়। দৈনন্দিন কাজ করার মধ্যেও আমরা রাষ্ট্র নির্মাণ করতে পারি, যেমন ভোকাল ফর লোকাল। আমাদের দেশের স্থানীয় উদ্যোগপতি, সব ধরণের শিল্পী, তন্তুবায়দের সমর্থন করা আমাদের সহজাত  প্রবৃত্তি  হওয়া উচিত। আগামী ৭ই আগস্ট ‘ন্যাশনাল হ্যাণ্ডলুম ডে’ এমন এক সুযোগ যখন আমরা সম্মিলিত প্রচেষ্টার মাধ্যমে এই কাজ করতে পারি। ‘ন্যাশনাল হ্যাণ্ডলুম ডে’-র সঙ্গে অনেক ঐতিহাসিক প্রেক্ষাপট যুক্ত হয়ে আছে। ১৯০৫ সালের এই দিনে স্বদেশী আন্দোলন শুরু হয়েছিল।

বন্ধুরা, আমাদের দেশের গ্রামীণ আর আদিবাসী এলাকায় তাঁতশিল্প রোজগারের একটা বড় পথ। এটা এমন ক্ষেত্র যার সঙ্গে লক্ষ-লক্ষ মহিলা, লক্ষ-লক্ষ বুননশিল্পী, লক্ষ-লক্ষ শিল্পী যুক্ত আছেন। আপনাদের ছোট-ছোট প্রয়াস তাঁতশিল্পীদের মধ্যে এক নতুন উৎসাহের সঞ্চার করবে। আপনারা নিজেরা কিছু-না-কিছু কিনুন, আর নিজেদের কেনার ব্যাপারে অন্যদেরও জানান, আর যখন আমরা স্বাধীনতার পঁচাত্তরতম বর্ষ পালন করছি, তখন তো এইটুকু করা আমাদের দায়িত্ব ভাই! আপনারা লক্ষ্য করেছেন যে ২০১৪ সালের পরেই ‘মন কি বাতে’ আমরা প্রায়ই খাদি নিয়ে কথা বলি। এটা আপনাদের প্রচেষ্টারই ফল যে আজ দেশে খাদির বিক্রি কয়েক গুণ বেড়ে গিয়েছে। কেউ কি ভাবতে পারতেন যে খাদির কোনও দোকান থেকে এক দিনে এক কোটি টাকারও বেশি বিক্রি হবে! কিন্তু আপনারা এটাও করে দেখিয়েছেন। আপনারা যখনই কোথাও খাদির তৈরি কিছু কেনেন তখন এর লাভ আমাদের গরীব তন্তুবায় ভাইবোনেদেরই হয়। এইজন্য, খাদি কেনা এক দিক থেকে জনসেবা এবং দেশসেবাও বটে। আমার আপনাদের কাছে অনুরোধ যে আমার প্রিয় ভাইবোন, আপনারা, গ্রামীণ এলাকায় তৈরি হওয়া তাঁত শিল্পের সামগ্রী অবশ্যই কিনুন এবং হ্যাশট্যাগ মাই-হ্যাণ্ডলুম-মাই-প্রাইডের সঙ্গে শেয়ার করুন।

বন্ধুরা, কথা যখন স্বাধীনতা আন্দোলন আর খাদি নিয়ে হচ্ছে তখন পূজনীয় বাপুকে স্মরণ করা স্বাভাবিক – যেমন বাপুর নেতৃত্বে ‘ভারত ছাড়ো আন্দোলন’ চলেছিল তেমনই আজ প্রত্যেক ভারতবাসীকে ‘ভারত জোড়ো আন্দোলনের’ নেতৃত্ব দিতে হবে। এটা আমাদের কর্তব্য যে আমরা নিজেদের কাজ এমনভাবে করি যে তা বিবিধতার মাঝে আমাদের ভারতকে জোড়ার কাজে সহায়ক হয়। তাহলে আসুন, আমরা এই ‘অমৃত মহোৎসবে’, এই অমৃত সঙ্কল্প নিই, যে দেশই আমাদের সবথেকে বড় আস্থা, সবথেকে প্রধান অগ্রাধিকার হয়ে থাকবে। ‘নেশন ফার্স্ট, অলওয়েজ ফার্স্ট’ -এর মন্ত্র নিয়েই আমাদের এগিয়ে চলতে হবে।

আমার প্রিয় দেশবাসী, আজ আমি 'মন কি বাত' শুনছে, এ ধরণের যুব বন্ধুদের বিশেষভাবে ধন্যবাদ জানাতে চাই। এই কিছুদিন আগেই, মাই-গভের তরফ থেকে 'মন কি বাত' এর শ্রোতাদের নিয়ে একটা সমীক্ষা করা হয়েছিল। এই সমীক্ষাতে দেখা গিয়েছে যে 'মন কি বাত' এর জন্য বার্তা এবং পরামর্শ কারা প্রধানত পাঠাচ্ছে। সমীক্ষার পরে জানা গিয়েছে যে বার্তা এবং পরামর্শ প্রেরকদের প্রায় ৭৫% মানুষ, ৩৫ বছর বা তারো কম বয়সী, অর্থাৎ ভারতের যুবশক্তির পরামর্শ 'মন কি বাত' কে দিশা দেখাচ্ছে। আমি মনে করি এ খুবই ভালো লক্ষণ। 'মন কি বাত' এমন একটি মাধ্যম যেখানে ইতিবাচক দিক রয়েছে - সংবেদনশীলতা রয়েছে। 'মন কি বাত' এ আমরা  ইতিবাচক কথা বলি, এর বৈশিষ্টটা সঙ্ঘবদ্ধ। ইতিবাচক চিন্তা এবং পরামর্শের জন্য ভারতের যুবদের এই সক্রিয়তা আমায় আনন্দিত করেছে। আমি এই জন্য খুশি যে 'মন কি বাত' এর  মাধ্যমে আমি যুবদের মন কে জানবার সুযোগ পেয়েছি।

বন্ধুরা, আপনাদের থেকে পাওয়া পরামর্শ 'মন কি বাত' এর আসল শক্তি। আপনাদের পরামর্শই 'মন কি বাত' এর মাধ্যমে ভারতের বৈচিত্র প্রকাশ করে, ভারতবাসীদের সেবা আর ত্যাগের সুগন্ধ চতুর্দিকে ছড়িয়ে দেয়, আমাদের পরিশ্রমী তরুণদের উদ্ভাবন সবার মনে প্রেরণা যোগায়। 'মন কি বাত' এ আপনারা নানান ভাবনা পাঠান। আমি সব বিষয়ে আলোচনা করে উঠতে পারি না, তবে তারমধ্যে বহু ভাবনাকে নির্দিষ্ট বিভাগে অবশ্যই পাঠিয়ে দি যাতে তার ওপর আরও কাজ করা যায়। 

বন্ধুরা, আমি আপনাদের সাই প্রনীথজীর প্রচেষ্টা সম্পর্কে জানাতে চাই। সাই প্রনীথজী একজন অন্ধ্রপ্রদেশের সফটওয়্যার ইঞ্জিনিয়ার । গতবছর তিনি লক্ষ্য করেন আবহাওয়ার খামখেয়ালীপনার জন্য  ওখানকার কৃষকরা খুব ক্ষতিগ্রস্থ হয়েছেন। বহু বছর ধরে আবহবিদ্যা সম্পর্কে ওনার আগ্রহ ছিল। তাই তিনি তাঁর আগ্রহ আর নিজের মেধাকে কৃষকদের উন্নতির জন্য ব্যবহার করার সিদ্ধান্ত নিলেন। এখন তিনি বিভিন্ন তথ্য সুত্র থেকে আবহাওয়ার তথ্য কেনেন, তার বিশ্লেষণ করেন আর স্থানীয় ভাষায় বিভিন্ন মাধ্যমের সাহায্যে কৃষকদের কাছে জরুরী তথ্য পৌঁছে দেন। আবহাওয়ার সর্বশেষ তথ্য ছাড়াও, প্রনীথজী ভিন্ন ভিন্ন জলবায়ুর পরিস্থিতিতে মানুষের কি করনীয় সেই পরামর্শও দেন। বিশেষত, বন্যা থেকে রক্ষা পাওয়া কিংবা ঝড় বা বজ্রপাতের সময় কিভাবে সুরক্ষিত থাকা যায় সেই বিষয়েও সবাইকে জানান।       

বন্ধুরা, একদিকে এই তরুণ সফটওয়্যার ইঞ্জিনিয়ার এর প্রচেষ্টা মন ছুঁয়ে যায়, অন্যদিকে আমাদের এক বন্ধুর প্রযুক্তির ব্যবহার আপনাকে অবাক করে দেবে। এই বন্ধু উড়িষ্যার সম্বলপুর জেলার এক গ্রামের বাসিন্দা শ্রীমান ইসাক মুন্ডাজি। ইসাকজি একসময় দিনমজুর হিসেবে কাজ করতেন কিন্তু এখন তিনি একজন ইন্টারনেট সেন্সেশন হয়ে গিয়েছেন। নিজের ইউ টিউব চ্যানেল  থেকে তিনি অনেক টাকা রোজগার করছেন। তিনি নিজের ভিডিওতে স্থানীয় রান্নার পদ, প্রচলিত রন্ধন পদ্ধতি, নিজের গ্রাম, নিজেদের জীবনশৈলী, পরিবার ও খাদ্যাভ্যাসকেই প্রধানত দেখান। একজন ইউ টিউবার হিসেবে তার যাত্রা শুরু হয়েছিল ২০২০ সালের মার্চ মাসে যখন তিনি উড়িষ্যার বিখ্যাত স্থানীয় পদ পখাল সম্পর্কিত একটা ভিডিও পোস্ট করেছিলেন। সেই থেকে তিনি কয়েকশো ভিডিও পোস্ট করেছেন। তাঁর এই প্রচেষ্টা বহু কারণে অন্যদের থেকে ভিন্ন। বিশেষত তিনি শহুরে নাগরিকদের সেই জীবনযাত্রা দর্শনের সুযোগ করে দিয়েছেন যে সম্পর্কে তাদের খুব বেশি জানা ছিল না। ইসাক মুন্ডাজি সংস্কৃতি ও রান্নাবান্না দুটিকে সমানভাবে মিলিয়ে দিয়ে তা উদযাপন করছেন ও আমাদের সকলকে অনুপ্রাণিতও করছেন।   

বন্ধুরা, যেহেতু আমরা প্রযুক্তি নিয়ে আলোচনা করছি, তাই আমি একটা আকর্ষণীয় বিষয় নিয়ে আলোচনা করতে চাই। আপনারা হয়তো সম্প্রতি পড়েছেন, দেখেছেন আইআইটি ম্যাড্রাসের এক প্রাক্তনীর নতুন উদ্যোগ সংস্থা একটি  ত্রিমাত্রিক মুদ্রণে বাড়ি তৈরি করেছে। ত্রিমাত্রিক মুদ্রণের  সাহায্যে বাড়ির নির্মাণ কিভাবে সম্ভব হলো? আসলে এই নতুন উদ্যোগ বা স্টার্ট আপে সবার প্রথমে ত্রিমাত্রিক মুদ্রণযন্ত্রে একটি  থ্রি ডায়মেশনাল নকশা ঢোকান হয় এবং এক বিশেষ ধরনের কংক্রিটের সাহায্যে একটির উপর একটি স্তরে একটা ত্রিমাত্রিক কাঠামো তৈরি হয়ে যায়। আপনারা জেনে খুশি হবেন যে, দেশে এরকম অনেক পরীক্ষা-নিরীক্ষা চলছে। একটা সময় ছিল যখন ছোট ছোট নির্মাণের কাজে বহু বছর লেগে যেত। কিন্তু আজ প্রযুক্তির দরুন ভারতে পরিস্থিতি  বদলাচ্ছে। কিছুকাল আগে আমরা বিশ্বের এইরকম উদ্ভাবন সংস্থাদের আমন্ত্রণ জানানোর জন্য  গ্লোবাল হাউজিং টেকনোলজি চ্যালেঞ্জ শুরু  করেছিলাম। এটি দেশের মধ্যে একটি অনন্য প্রচেষ্টা,  তাই আমরা এটিকে লাইট হাউস প্রোজেক্ট নাম দিয়েছি। বর্তমানে দেশের ছয়টি ভিন্ন জায়গায় লাইট হাউস প্রোজেক্টএর উপর দ্রুত গতিতে কাজ চলছে। এই  লাইট হাউস প্রোজেক্ট এর মধ্যে আধুনিক প্রযুক্তি ও উদ্ভাবন পদ্ধতি ব্যবহার করা হয়। এতে নির্মাণ কাজে সময় কম লাগে। সেইসঙ্গে যে বাড়িগুলি তৈরি হয় তা অনেক বেশি মজবুত, সাশ্রয়কর ও আরামদায়ক। আমি সম্প্রতি ড্রোনের  মাধ্যমে এই প্রকল্পগুলির বিশ্লেষণ করলাম এবং কাজের অগ্রগতিও সরাসরি দেখলাম। 

ইন্দোরের প্রকল্পে এ ইট ও চুন বালির দেওয়ালের পরিবর্তে প্রি-ফেব্রিকেটেড স্যান্ডউইচ প্যানেল সিস্টেমের ব্যবহার করা হচ্ছে। রাজকোটে লাইট হাইস ফরাসি প্রযুক্তির সাহায্যে তৈরি করা হচ্ছে, যার মধ্যে সুড়ঙ্গের সাহায্যে মোনোলিথিক কংক্রিট নির্মাণ প্রযুক্তি ব্যবহৃত হচ্ছে। এই প্রযুক্তি দিয়ে তৈরি বাড়ি বিপর্যয় মোকাবিলা করতে অনেক বেশি সক্ষম হবে। চেন্নাইতে, মার্কিন যুক্তরাষ্ট্র ও ফিনল্যান্ডের প্রযুক্তি , প্রিকাস্ট কংক্রিট সিস্টেমের  ব্যবহার করা হচ্ছে। এতে বাড়ি দ্রুত তৈরি হবে, আর খরচাও কম হবে। রাঁচিতে তে জার্মানির ত্রিমাত্রিক নির্মাণ পদ্ধতিতে বাড়ি নির্মাণ করা হবে।  এতে প্রতিটি ঘর আলাদা ভাবে তৈরি হবে, এরপর পুরো কাঠামোকে এমন ভাবে জোড়া লাগানো হবে যেমনভাবে ব্লক টয়কে জোড়া যায়। আগরতলায় নিউজিল্যান্ডের এর প্রযুক্তি ব্যবহার করে স্টিলের কাঠামোর  সঙ্গে বাড়ি তৈরি করা হচ্ছে, যা বড় ভূমিকম্প সহ্য করতে পারবে। আবার লখনৌতে কানাডার প্রযুক্তি ব্যবহার করা হচ্ছে। এতে প্লাস্টার ও রঙের প্রয়োজন পড়বে না এবং দ্রুত বাড়ি নির্মাণ করার জন্য আগের থেকে তৈরি দেওয়াল ব্যবহার করা হবে।
বন্ধুরা, দেশে এখন এই চেষ্টা করা হচ্ছে যে এটা প্রজেক্ট ইনকিউবেশন সেন্টার-এর মত কাজ করবে। এতে আমাদের প্ল্যানার্স, আর্কিটেক্টস,  ইঞ্জিনিয়ার এবং ছাত্রছাত্রীরা নতুন প্রযুক্তি সম্বন্ধে জানতে পারবে এবং তার পরীক্ষানিরীক্ষাও করতে পারবে। আমি এই কথাগুলো বিশেষ করে আমাদের যুবক যুবতী বন্ধুদের উদ্দেশে বলছি যাতে আমাদের যুবক যুবতী বন্ধুরা রাষ্ট্রের কল্যাণ  সাধনের জন্য প্রযুক্তির নতুন নতুন ক্ষেত্রে আরও উৎসাহ অনুভব করে। 

আমার প্রিয় দেশবাসী, আপনারা ইংরেজিতে একটা কথা শুনেছেন 'টু লার্ন ইজ টু গ্রো' অর্থাৎ শেখার মাধ্যমে এগিয়ে চলা। যখন আমরা নতুন কিছু শিখি, তখন উন্নতির নতুন নতুন পথ নিজে থেকেই আমাদের জন্য উন্মুক্ত হয়। যখন কোথাও প্রথাগত থেকে আলাদা নতুন কিছু করার চেষ্টা হয়েছে মানবতার জন্য নতুন দরজা খুলে গেছে, এক নতুন যুগের সূচনা হয়েছে। আর আপনারা দেখেছেন যখনই কোথাও নতুন কিছু  হয়েছে তার ফলাফল প্রত্যেককে অভিভূত করে দিয়েছে। এখন যেমন, যদি আমি আপনাদের জিজ্ঞেস করি যে, এমন কোন রাজ্য আছে যা আপেলের সঙ্গে সম্পর্কযুক্ত?  নিশ্চিতভাবেই আপনাদের মনে সর্বপ্রথম হিমাচল প্রদেশ জম্মু-কাশ্মীর এবং উত্তরাখণ্ডের নাম আসবে। কিন্তু আমি যদি বলি এই লিস্টে আপনি মনিপুরকেও যোগ করুন, তাহলে আপনি নিশ্চয়ই অবাক হবেন। কিছু নতুন করার উদ্যমে উদ্বুদ্ধ যুবকবন্ধুরা মণিপুরে এই কাজটি করে  দেখিয়েছেন। আজকাল মনিপুরের উখরুল জেলায় আপেলের চাষ জোর কদমে শুরু হয়েছে। এখানকার কৃষকরা নিজেদের বাগানে আপেল উৎপাদন করছেন। আপেল উৎপাদন করার জন্য এঁরা রীতিমতো হিমাচলে গিয়ে ট্রেনিংও নিয়েছেন। এঁদের মধ্যেই একজন টি.এস. রিংফামি ইয়োং। তিনি পেশায় একজন এরোনোটিক্যাল ইঞ্জিনিয়ার। তিনি তাঁর স্ত্রী শ্রীমতি টি এস এঞ্জেল-এর সঙ্গে মিলে আপেলের উৎপাদন করেছেন। এভাবেই আভুংশী সিমরে অগাস্টিনাও নিজের বাগানে আপেলের চাষ করেছেন। আভুংশী দিল্লিতে চাকরি করতেন। চাকরি ছেড়ে নিজের গ্রামে ফিরে আপেলের চাষ শুরু করেছেন। মণিপুরে আজ এমন অনেক আপেল উৎপাদক আছেন যাঁরা আলাদা এবং নতুন কিছু করে দেখিয়েছেন।

বন্ধুরা, আমাদের আদিবাসী সম্প্রদায়ের মধ্যে কুল খুবই জনপ্রিয়। আদিবাসী সম্প্রদায়ের মানুষ সবসময়ই কুলের চাষ করে এসেছেন। কিন্তু কোভিড নাইনটিন মহামারীর পরে এর চাষ বিশেষভাবে বেড়ে যাচ্ছে। ত্রিপুরার ঊনকোটির ৩২ বছর বয়সী আমার এমনই এক যুবকবন্ধু বিক্রমজিত চাকমা। তিনি কুলের চাষ করে অনেক মুনাফা অর্জন করেছেন এবং এখন তিনি  লোকজনকে কুলের চাষ করার জন্য অনুপ্রেরণাও দিচ্ছেন। রাজ্য সরকারও এমন লোকের সাহায্যের জন্য এগিয়ে এসেছে। সরকারী উদ্যোগে এর জন্য অনেক বিশেষ নার্সারি তৈরি করা হয়েছে যাতে কুলের চাষের সঙ্গে যুক্ত লোকের দাবি পূরণ করা যেতে পারে। চাষে উদ্ভাবন হচ্ছে, তাই চাষের ফলে উৎপন্ন বাইপ্রডাক্টস এর মধ্যেও সৃজনশীলতাও দেখতে পাওয়া যাচ্ছে।   

বন্ধুরা,  আমি উত্তরপ্রদেশের লখিমপুর খেরিতে হওয়া একটি প্রচেষ্টার ব্যাপারে জানতে পেরেছি। কোভিডের সময়ে লখিমপুর খেরিতে এক অভিনব উদ্যোগ নেওয়া হয়েছে। এখানে মহিলাদের, কলার পরিত্যক্ত কান্ড থেকে  ফাইবার তৈরীর ট্রেনিং দেওয়ার কাজ শুরু হয়েছে। বর্জ্য থেকে ভালো কিছু  করার পথ। কলার কান্ড কেটে মেশিনের সাহায্যে ব্যানানা ফাইবার তৈরি করা হয় যা পাটের তন্তুর মত। এই ফাইবার থেকে হ্যান্ডব্যাগ, মাদুর, কার্পেটের মতো কতই না জিনিস তৈরি করা হচ্ছে। এতে প্রথমত ফসলের আবর্জনার ব্যবহার শুরু হয়েছে, দ্বিতীয়তঃ গ্রামে বাস করা আমাদের বোন-মেয়েদের আয়ের এক সুযোগ তৈরি হয়েছে। কলা তন্তুর এই কাজের মাধ্যমে একজন স্থানীয় মহিলার প্রতিদিন প্রায় ৪০০ থেকে ৬০০ টাকা মত রোজগার হয়। লখিমপুর খেরিতে কয়েকশো একর জমিতে কলার চাষ হয়। কলার ফসল উৎপাদনের পরে সাধারণত কৃষকদের এর কান্ডকে ফেলার জন্য আলাদা করে খরচ করতে হতো। এখন ওদের এই পয়সাও বেঁচে যায়, মানে আমের আম খাওয়াও হলো আবার আঁটিরও দাম পাওয়া গেল, এই প্রবাদ এখানে একেবারে সঠিক ভাবে প্রযোজ্য।

বন্ধুরা, একদিকে ব্যানানা ফাইবার থেকে বিভিন্ন সামগ্রী তৈরি করা হচ্ছে। ‌ অপরদিকে কলার আটা থেকে ধোসা এবং গোলাপজাম এর মত সুস্বাদু খাবার তৈরি হচ্ছে। কর্নাটকের উত্তর কন্নড় এবং দক্ষিণ কন্নড় জেলায় মহিলারা এই অবিনব কাজ করছেন। এর শুরুও এই করোনাকালেই হয়েছে। এই মহিলারা তো শুধু কলার আটা থেকে ধোসা, গোলাপজাম-এর মত জিনিস তৈরি করেছেন তা নয়,  এইসব জিনিসের ছবিও সোশ্যাল মিডিয়াতে শেয়ার করেছেন। অনেক লোক যখন কলার আটার কথা জানতে পেরেছেন, এর চাহিদা বেড়েছে, আর এই মহিলাদের আমদানিও বেড়েছে। লখিমপুর খেরির মত এখানেও এই উদ্ভাবনমূলক উদ্যোগে মহিলারাই নেতৃত্ব দিয়েছেন।

বন্ধুরা, এমন উদাহরণই জীবনে নতুন কিছু  করার অনুপ্রেরণা। আপনাদের আশেপাশে এমন অনেক মানুষ আছেন। যখন আপনার পরিবার তাদের মনের কথা বলেন তখন আপনি এঁদেরও সঙ্গে আড্ডায় যোগ করুন। কখনো সময় বের করে বাচ্চাদের সঙ্গে এমন প্রচেষ্টা দেখতেও যান এবং অবসর পেলে নিজেও এমন কিছু করে দেখান। আর হ্যাঁ এই সব আপনারা আমার সঙ্গে নামোঅ্যাপ অথবা মাই গভ-এ ভাগ করে নিন , তাহলে আমার আরো ভালো লাগবে।

আমার প্রিয় দেশবাসী,  আমাদের সংস্কৃত গ্রন্থে একটি শ্লোক আছে
"আত্মার্থম, জীব লোকে অস্মিন, কো ন জীবতি মানবঃ
পরম পরোপকার্থম, য়ো জীবতি স জীবতি"

অর্থাৎ এই পৃথিবীতে নিজের জন্য তো সকলেই বাঁচে। কিন্তু সেই ব্যক্তিই প্রকৃতভাবে বাঁচে, যে পরোপকারের জন্য বাঁচে। ভারত মাতার ছেলেমেয়েদের পরোপকারের প্রচেষ্টার কথা- এটাই তো 'মন কি বাত।' আজও আরো এমন কিছু বন্ধুদের ব্যাপারে আমরা কথা বলি‌। চন্ডিগড় শহরের এক বন্ধু। চন্ডীগড়ে আমিও কয়েক বছর থেকে এসেছি। এটি খুব সুন্দর এবং আনন্দময় শহর। এখানে বাস করা মানুষেরা উদার মনের এবং হ্যাঁ, যদি আপনি খাওয়ার ব্যাপারে শৌখিন হন তাহলে এখানে আপনার আরো ভালো লাগবে। 

এই চণ্ডীগড়ের সেক্টর -২৯ এ সঞ্জয় রাণাজি একটি ফুড স্টল চালান, এবং সাইকেলে করে ছোলা বাটোরা বিক্রি করেন।  তার মেয়ে ঋদ্ধিমা ও ভাইঝি রিয়া একদিন তাকে  একটি আইডিয়া দেয়। তারা দুজনে ওঁকে বলেন,  যারা কোভিড টিকা  নিয়েছে তাদের বিনামূল্যে ছোলা বাটোরা খাওয়াতে। তিনিও সে কথায় খুশি মনে রাজি হয়ে যান, এবং শীঘ্রই তিনি সেই ভালো কাজ করা শুরুও করেন। সঞ্জয় রাণাজির সেই ছোলা বাটোরা বিনা পয়সায় খাওয়ার জন্য আপনাকে দেখাতে হবে  যে সেই দিনই আপনি টিকা নিয়েছেন। টিকা নেওয়ার মেসেজ দেখানো মাত্রই তিনি আপনাকে সুস্বাদু ছোলা বাটোরা দিয়ে দেবেন। বলা হয় সমাজের মঙ্গলের জন্য টাকা-পয়সার থেকেও বেশি প্রয়োজন সেবার মানসিকতা ও কর্তব্যবোধ। সেই কথাটাকেই আমাদের সঞ্জয় ভাই সত্য প্রমাণ করে চলেছেন। 

বন্ধুরা, আজ ঠিক এমনই আরেকটা কাজের বিষয়ে আপনাদের সঙ্গে আমি আলোচনা করতে চাই। এই ঘটনাটা হচ্ছে তামিলনাড়ুর নীলগিরির। সেখানে রাধিকা শাস্ত্রী জি এম্বুরেক্স প্রকল্প শুরু করেছেন। এই প্রকল্পর উদ্দেশ্য পাহাড়ি এলাকায় অসুস্থদের চিকিৎসার জন্য সহজে পরিবহনের  ব্যবস্থা করা। রাধিকা কুন্নুরে একটি ক্যাফে চালান। তিনি তার কাফের সঙ্গী সাথীদের কাছ থেকে  এম্বুরেক্সর জন্য তহবিল সংগ্রহ করেন। নীলগিরি পাহাড়ে বর্তমানে ছটি এম্বুরেক্স পরিষেবা চালু রয়েছে, এবং যে কোন জরুরী পরিস্থিতিতে দূরদূরান্তের অঞ্চলেও তা অসুস্থদের কাজে আসছে। এম্বুরেক্স এ স্ট্রেচার, অক্সিজেন সিলিন্ডার, ফাস্ট এইড বক্সের এর মত অনেক কিছুরই সুবিধা রয়েছে।  বন্ধুরা, আমরা নিজের কাজ, ব্যবসা বা চাকরি করেও যে মানুষের সেবা করতে পারি সঞ্জয়জি বা রাধিকাজি তারই উদাহরণ। 
বন্ধুরা কিছুদিন আগে ভীষণ আকর্ষণীয় এবং খুবই আবেগময় একটা ঘটনা ঘটেছে যার ফলে ভারত এবং জর্জিয়ার  সম্পর্ক  নতুন করে আরো মজবুত হয়েছে।  এই অনুষ্ঠানে, ভারত‌ সেন্ট কুইন কেটেভানের  পবিত্র স্মৃতিচিহ্ন জর্জিয়ার সরকার ও তাদের জনতার হাতে তুলে দিয়েছে, সে জন্য আমাদের বিদেশমন্ত্রী স্বয়ং সেখানে গিয়েছিলেন।  খুবই আবেগঘন  অনুষ্ঠানে জর্জিয়ার রাষ্ট্রপতি, প্রধানমন্ত্রী, তাঁদের ধর্ম গুরু এবং বহু সংখ্যক জর্জিয়ার মানুষ উপস্থিত ছিলেন।এই অনুষ্ঠানে ভারতের প্রশংসায় যা কিছু বলা হয়েছে তা স্মরণ করে রাখার মত। এই অনুষ্ঠানটি দুটি দেশের পাশাপাশি, গোয়া এবং জর্জিয়ার মধ্যে যে সম্পর্ক তাকেও আরো প্রগাঢ় করেছে। তার কারণ ২০০৫ সালে সেন্ট কুইন কাটেভানের পবিত্র অবশেষ গোয়ার সেন্ট অগাস্টিন চার্চেই পাওয়া গিয়েছিল। 

বন্ধুরা, আপনাদের মনে প্রশ্ন জাগতেই পারে যে এ সমস্ত কি ?এগুলো কবে আর কীভাবেই বা হলো? প্রকৃতপক্ষে এটি আজ থেকে চার-পাঁচশ বছর আগের ঘটনা। কুইন কেটেভান ছিলেন জর্জিয়ার রাজপরিবারের কন্যা। ১০ বছর কারাবাসের পর ১৬২৪ সালে তিনি শহীদ হয়েছিলেন। এক প্রাচীন পর্তুগিজ দলিল অনুযায়ী জানা যায় সেন্ট কুইন কেটেভান এর অস্থি ওল্ড গোয়ার সেন্ট অগাস্টিন কনভেন্ট রাখা হয়েছিল। কিন্তু দীর্ঘ সময় ধরে মনে করা হতো যে গোয়ায় সমাহিত তার দেহাবশেষ ১৯৩০ সালের ভূমিকম্পে নষ্ট হয়ে গিয়েছিল। 

ভারত সরকার ও জর্জিয়ার ঐতিহাসিক, গবেষক, পূরাতত্ত্ববিদ এবং জর্জিয়ার চার্চের কয়েক দশকের নিরলস প্রচেষ্টার পর ২০০৫ সালে সেই পবিত্র অবশেষগুলির অনুসন্ধানে সাফল্য মেলে। এটি জর্জিয়াবাসীর জন্য অত্যন্ত আবেগপ্রবণ একটি বিষয়। সেজন্য তাদের ঐতিহাসিক, ধর্মীয় এবং আধ্যাত্বিক অনুভূতির কথা মাথায় রেখে ভারত সরকার এই অবশেষের একটা অংশ জর্জিয়ার মানুষকে উপহার দেওয়ার সিদ্ধান্ত নিয়েছিল। ভারত ও জর্জিয়ার সম্মিলিত ইতিহাসের এই অনন্য নির্দশনকে সংরক্ষণের জন্য আমি গোয়ার জনগণকে আন্তরিকভাবে ধন্যবাদ জানাতে চাই। গোয়া  মহান আধ্যাত্বিক ঐতিহ্যবাহী একটি স্থান। সেন্ট অগাস্টিন গির্জা, ইউনেস্কো'র‌  ওয়ার্ল্ড হেরিটেজ সাইট চার্চেস অ্যান্ড কনভেন্ট অফ গোয়ার একটি অংশ।

আমার প্রিয় দেশবাসী, জর্জিয়া থেকে এবার আমি আপনাদের সরাসরি সিঙ্গাপুরে নিয়ে যাচ্ছি, যেখানে এ মাসের শুরুতে আরো একটি গৌরবময় ঘটনা ঘটেছে। সিঙ্গাপুরের প্রধানমন্ত্রী, আমার বন্ধু লি সেন লুঙ সম্প্রতি পুনর্নির্মিত সিলাট রোড গুরুদুয়ারার  উদ্বোধন করেন। তিনি পরম্পরাগত শিখ পাগড়িও পড়ে ছিলেন। এই গুরুদুয়ারাটি প্রায় ১০০ বছর আগে তৈরি হয়েছিল এবং এটি ভাই মহারাজ সিংহর উদ্দেশ্যে নিবেদিত একটি স্মারক। ভাই মহারাজ সিংহ ভারতের স্বাধীনতার জন্য সংগ্রাম করেছিলেন।  ঠিক এই মুহূর্তে যখন আমরা স্বাধীনতার ৭৫ বছর উদযাপন করতে চলেছি তখন এটি অনেক বেশি অনুপ্রেরণার বিষয় হয়ে ওঠে। এরকমই কিছু ঘটনা এবং প্রচেষ্টা দুটি দেশের মধ্যে জনসাধারণের মধ্যে যোগাযোগের মত বিষয়কে আরো সুদৃঢ় করে। সৌহার্দ্যপূর্ণ পরিবেশে থাকার এবং পরস্পরের সংস্কৃতিকে জানার এবং বোঝার গুরুত্ব কতটাতা এখান থেকেই স্পষ্ট হয়।

আমার প্রিয় দেশবাসী, আজ ‘মন কি বাত’ অনুষ্ঠানে আমরা অনেক বিষয় নিয়ে আলোচনা করলাম। আরেকটি বিষয় যেটা আমার হৃদয়গ্রাহী। সেটা হলো জল সংরক্ষণ। আমার শৈশব যেখানে কেটেছে, সেখানে জলের অভাব সবসময় থাকতো। আমরা বৃষ্টির জন্য তাকিয়ে থাকতাম, তাই জলের প্রত্যেক ফোঁটা বাঁচানো আমাদের সংস্কারের অংশ ছিল।  বর্তমানের ‘সাধারণের সহযোগিতায় জল সংরক্ষণ’ এই মন্ত্র ওখানের চালচিত্র বদলে দিয়েছে। জলের এক এক ফোঁটা বাঁচানো, জলের যে কোনো রকমের অপচয়কে বন্ধ করা আমাদের জীবন শৈলীর এক অন্যতম অংশ হওয়া দরকার। আমাদের পরিবারের মধ্যেও এই রকম পরম্পরা শুরু হওয়া দরকার, যা নিয়ে  পরিবারের প্রত্যেক সদস্য গর্ব অনুভব করবে। 

বন্ধুরা, প্রকৃতি ও পরিবেশের রক্ষা ভারতের সাংস্কৃতিক জীবনে, আমাদের দৈনন্দিন জীবনের অবিচ্ছেদ্য অংশ। সেইসঙ্গে বৃষ্টি-বাদল আমাদের বিচার, আমাদের দর্শন আর আমাদের সভ্যতাকে আকার দিয়ে আসছে। ‘ঋতুসংহার’ এবং ‘মেঘদূতে’ মহাকবি কালিদাস বর্ষা নিয়ে খুব সুন্দর বর্ণনা দিয়েছেন।সাহিত্যপ্রেমীদের মধ্যে এইসব কবিতা আজও খুব জনপ্রিয়। ঋকবেদের ‘পর্জন্য সুক্তম’ -এও বর্ষাকালের সৌন্দর্য খুব সুন্দর করে বর্ণিত আছে। একি ভাবে, শ্রীমৎ ভাগবতেও কাব্যের মাধ্যমে পৃথিবী, সূর্য এবং বর্ষার মধ্যে সম্পর্ককে বিস্তারিত ভাবে বর্ণনা আছে। 

অষ্টৌ মাসান নিপীতং যদ, ভুম্যাঃ চ, ঔদ-ময়ম বসু ।
স্বগোভিঃ মোক্তুম আরেভে, পর্জন্যঃ কাল আগতে।। 

অর্থাৎ, সূর্য আট মাস পর্যন্ত জলের রূপে পৃথিবীর সম্পদকে শুষে নিচ্ছিল, এখন বর্ষাকালে সূর্য এই সঞ্চিত সম্পদকে পৃথিবীকে ফিরিয়ে দেয়। ঠিকই, বর্ষাকাল শুধু খুব সুন্দর আর মনোরম হয় না, এই ঋতু পুষ্টি দেয়, প্রাণ সঞ্চারও করে। বর্ষার যে জল আমরা পাচ্ছি সেটা আমাদের ভবিষ্যত প্রজন্মের জন্য, এটা আমাদের কখনো ভুললে চলবে না। 
আজ আমার মনে হল যে এই মজার দৃষ্টান্তের মাধ্যমে আজকের পর্ব শেষ করি। আপনাদের সবাইকে আসন্ন উৎসবের অনেক অনেক শুভকামনা। পার্বণ-উৎসবের সময় এটা ঠিক মনে রাখবেন যে করোনা এখনো আমাদের মধ্য থেকে বিদায় নেয় নি। করোনা বিধি আপনাদের ভুললে চলবেন না। আপনি সুস্থ ও আনন্দে থাকুন । অনেক অনেক ধন্যবাদ।