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उपस्थित सभी महानुभाव,

मैं अपने आप में गौरव महसूस कर रहा हूं क्योंकि जब हम छोटे थे, तो ज्ञानपीठ पुरस्कार की खबर आती थी तो बड़े ध्यान से उसको पढ़ते थे कि ये पुरस्कार किसको मिल रहा है, जिसको मिला है उसका Background क्या है। बड़ी उत्सुकता रहती थी और जिसके मन की अवस्था यह रही हो, उसको यहां आ करके बैठने का अवलर मिले, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है।

आज का दिवस मन को विचलित करने वाला दिन है। भयंकर भूकंप ने मानव मन को बड़ा परेशान किया हुआ है और पता नही कि कितना नुकसान हुआ होगा क्योंकि अभी तो जानकारी आ रही हैं। नेपाल की पीड़ा भी हमारी ही पीड़ा है। मैंने नेपाल के प्रधानमंत्री जी से, राष्ट्रपति जी से बात की और विश्वास दिलाया है कि सवा सौ करोड़ देशवासी आपकी इस मुसीबत में आपके साथ हैं। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस भयंकर हादसे को सहने की परमात्मा ताकत दे। जिन परिवारजनों पर आफत आई है, उनको शक्ति दे। भारत में भी कम-अधिक कुछ-न-कुछ प्रभाव हुआ है। उनके प्रति भी मेरी संवेदना है।

ये Golden Jubilee का अवसर है। 50वां समारोह है। समाज जीवन में तकनीकी विकास कितना ही क्यों न हुआ हो, वैज्ञानिक विकास कितना ही क्यों न हुआ हो लेकिन उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का भी अगर विस्तार नहीं होता है, ऊंचाइयों को छूने का प्रयास नहीं होता है, तो पता नहीं मानव जाति का क्या होगा? और इसलिए विज्ञान और Technology के युग में साहित्यिक साधना मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने के लिए, मानवीय संवेदनाओं को संजोने के लिए एक बहुत बड़ी औषधि के रूप में काम करता है और जो साहित्यिक साहित्य रचना करता है। आजकल आप Computer के लिए Software बना दें और Software के अंदर Programming के साथ एक-दो हजार शब्द डाल दें और Computer को कह दें कि भई उसमें से कुछ बनाकर के निकाल दो, तो शायद वो बना देता है। लेकिन वो Production होगा, वो Assemble करेगा, Creation नहीं कर सकता है और ये creativity जो है, वो अनुभूति की अभिव्यक्ति होती है। वह एक दर्शन के रूप में प्रवाहित होती है और तब जाकर के पीढ़ियों तक सामान्य मानव के जीवन को स्पर्श करती रहती है। हमारे यहां परंपरा से निकली हुई कहावतें हैं। सदियों के प्रभाव से, अनुभव से, संजो-संजो करके बनी हुई होती हैं और हमने देखा होगा कि एक कहावत जीवन की कितना दिशा-दर्शक बन जाती है। एक कहावत कितना बड़ी उपदेश दे जाती है। पता तक नहीं है ये कहावत का रचयिता कौन था, नियंता कौन था, किस कालखंड में निर्माण हुआ था, कुछ पता नहीं है। लेकिन आज भी और समाज के अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति से लेकर के वैश्विक ज्ञान संपादन करने का जिसको अवसर मिला है, उनको भी वो एक ही कहावत जोड़ पाती है। यानि हम कल्पना कर सकते हैं कि कितना सामर्थ्य होगा कि जो नीचे से लेकर आसमान तक की अवस्था को स्पष्ट कर सकता है, जोड़ सकता है।

इतना ही नहीं वो बीते हुए युग को, वर्तमान को और आने वाले युग को जोड़ने का सामर्थ्य रखता है। मैंने कहावत का उल्लेख इसलिए किया कि हम भली-भांति रोजमर्रा की जिंदगी में इसका उपयोग करते हैं। साहित्य की ताकत उससे अनेकों गुना ज्यादा होती है और सर्जक जब करता है, मैं नहीं मानता हूं कि वो वाचक के लिए कुछ लिखता है, मैं नहीं मानता हूं, न ही वो इसलिए लिखता है कि उसे कुछ उपदेश देना है, न ही वो इसलिए लिखता है कि उसको कोई विवाद कर-करके अपना जगह बनानी है। वो इसलिए लिखता है, वो लिखे बिना रह नहीं सकता है। उसके भीतर एक आग होती है, उसके भीतर एक ज्वाला होती है, उसके भीतर एक तड़प होती है और तब जाकर के स्याही के सहारे वो संवेदनाएं शब्द का रूप धारण करके बहने लग जाती हैं, जो पीढ़ियों तक भिझोती रहती हैं, पथ-दर्शक बनकर के रहती हैं और तब जाकर के वो साहित्य समाज की एक शक्ति बन जाता है। कोई कल्पना कर सकता है, वेद किसने बनाएं हैं, कब बनाएं हैं, कहां पता है लेकिन आज भी मानव जाति जिन समस्याओं से उलझ रही है, उसके समाधान उसमें से मिल रहे हैं।

मैं अभी फ्रांस गया था। फ्रांस के राष्ट्रपति जी से मेरी बात हो रही थी क्योंकि COP-21 फ्रांस में होने वाला है और Environment को लेकर के दुनिया बड़ी चिंतित है। मैंने कहा जब प्रकृति पर कोई संकट नहीं था, सारी पृथ्वी लबालब प्रकृति से भरी हुई थी। किसी ने उस प्रकृति का exploitation कभी नहीं किया था उस युग में, उस युग में वेद की रचना करने वालों ने प्रकृति की रचना कैसे करनी चाहिए, क्यों करनी चाहिए, मनुष्य जीवन और प्रकृति का नाता कैसा होना चाहिए इसका इतना विद्वत्तापूर्ण वर्णन किया है। मैंने कहा ये हैं दुनिया को रास्ता दिखा सकते हैं कि हां, global warming से बचना है तो कैसे बचा जा सकता है? Environment protection करना है तो कैसे किया जा सकता है और पूरी तरह वैज्ञानिक कसौटी से कसी हुई चीजें सिर्फ उपदेशात्मक नही हैं, सिर्फ भावात्मक नहीं हैं, सिर्फ संस्कृत के श्लोकों का भंडार नहीं है। इसका मतलब हुआ कि युगों पहले किसी ने कल्पना की होगी कि जमीन के सामने क्या संभव होने वाला है और उसका रास्ता अभी से उन मर्यादाओं का पालन करेंगे तो होगा लेकिन कोई रचना करने वाला उस जमाने का कोई नेमाड़े तो ही होगा। हो सकता है उस समय ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं होगा, कहने का तात्पर्य यह है कि ये युगों तक चलने वाली साधना है।

मैं नेमाड़े जी के जीवन की तरफ जब देखता हूं, मैं comparison नहीं करता हैं, मुझे क्षमा करें, न ही मैं वो नेमाड़े जी की ऊंचाई को पकड़ सकता हूं और जिनका उल्लेख करने जा रहा हूं उनकी भी नहीं पकड़ सकता हूं। लेकिन श्री अरविंद जी के जीवन की तरफ देखें और नेमाड़े जी की बातों को सुनें तो बहुत निकटता महसूस होती है। उनका भी लालन-पालन, पठन सब अंग्रेजियत से रहा लेकिन जिस प्रकार से ये back to basic और जीवन के मूल को पकड़ कर के हिंदुस्तान की आत्मा को उन्होंने झंझोरने का जो प्रयास किया था। ये देश का दुर्भाग्य है कि वो बातें व्यापक रूप से हमारे सामने आई नहीं है, लेकिन जब उस तरफ ध्यान जाएगा, दुनिया का ध्यान जाने वाला है। जैसे नेमाड़े जी कह रहे हैं न कि इस back to basic की क्या ताकत है, कभी न कभी जाने वाला है और तब मानव जाति को संकटों से बचाने के रास्ते क्या हो सकते हैं, मानव को मानव के प्रति देखने का तरीका क्या हो सकता है, वो सीधा-सीधा समझ आता है और तब जाकर के छद्म जीवन की जरूरत नहीं पड़ती है, छद्मता का आश्रय लेने की जरूरत नहीं पड़ती है, भीतर से ही एक ताकत निकलती है, जो जोड़ती है।

Neil Armstrong चंद्रमा पर गए थे, वैज्ञानिक थे, technology, space science ये ही जीवन का एक प्रकार से जब जवानी के दिन शुरू हुए, वो space में खो गए, अपने-आप को उसमें समर्पित कर दिया और जब वो वापिस आते थे तो उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है, मैं समझता हूं कि वो अपने-आप में एक बहुत बड़ा संदेश है। उन्होंने लिखा, मैं गया जब तब मैं astronaut था लेकिन जब मैं आया तो मैं इंसान बन गया। देखिए जीवन में कहां से, कौन-सी चीज निकलती है और यही तो सामर्थ्य होता है। नेमाड़े जी ने अपने कलम के माध्यम से, अपने भाव जगत को आने वाली पीढ़ियों के लिए अक्षर-देह दिया हुआ है। ये अक्षर-देह आने वाली पीढ़ियों में उपकारक होगा, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है लेकिन एक चिंता भी सता रही है।

हमारे यहां किताबें छपती हैं, बहुत कम बिकती हैं मैं जब, मराठी साहित्य का क्या हाल है, मुझे पूरी जानकारी नहीं है लेकिन गुजराती में तो ज्यादातर 1250 किताबें छपती हैं, 2250 तो मैं कभी पूछता था कि 2250 क्यों छाप रहे हो, तो बोले paper जो कभी cutting होता है, तो फिर wastage नहीं जाता है, इतने में से ही निकल जाती है। Publisher के दिमाग में paper रहता है, लेखक के दिमाग में युग रहता है, इतना अंतर है और वो भी बिकते-बिकते दस, बारह, पंद्रह साल बीत जाते हैं, उसमें भी आधी तो शायद library में जाती होगी तब जाकर के मेल बैठ जाता है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि हम बढ़िया सा मकान जब बनाते हैं, कभी किसी architecture से बात हुआ क्या? उनको ये तो कहा होगा कि bathroom कैसा हो? उसे ये भी कहा होगा कि drawing room कैसा हो? लेकिन कितने लोग होंगे जिन्होंने करोड़ो- अरबों रुपए खर्च करके बंगला बनाते होंगे और ये भी कहा होगा कि एक कमरा, अच्छी library भी हो और कितने architecture होंगे, जिन्होंने ये कहा होगा कि भले ही कम जगह हो लेकिन एक कोना तो किताब रखने के लिए रखिए। हम आदत क्यों न डालें, हम आदत क्यों न डालें? घर में पूजा अगर होगी, जूते रखने के लिए अलग जगह होगी, सब होगा लेकिन किताब के लिए अलग जगह नहीं होगी। मैं lawyers की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि उनको तो उसी का सहारा है। लेकिन सामान्य रूप से, दूसरा एक जमाने में student को भी guide मिल जाती थी, तो text book क्यों पढ़े ? Guide से चल जाती थी गाड़ी, अब तो वो भी चिंता का विषय नहीं है, पूरी पीढ़ी Google गुरू की शिष्य है। एक शब्द डाल दिया Google गुरू को पूछ लिया, गुरूजी ढूंढकर के ले आते हैं, सारा ब्राहमांड खोज मारते हैं और इसके कारण अध्य्यन ये सिर्फ प्रवृति नहीं अध्य्यन ये वृत्ति बनना चाहिए। जब तक वो हमारा DNA नहीं बनता तब तक हम नएपन से जुड़ ही नहीं सकते, व्यापकता से जुड़ नहीं सकते, हम आने वाले कल को पहचान नहीं सकते हैं।

मैं गुजरात में जब मुख्यमंत्री था, तो मैंने गुजरात का जब Golden jubilee मनाया तो Golden jubilee year में मैंने एक कार्यक्रम दिया था, गुजराती में उसे कहते हैं “वांचे गुजरात” यानी गुजरात पढ़े और बड़ा अभियान चलाया, मैं खुद library में जाकर के पढ़ता था ताकि लोग देखें कि किताब पढ़नी चाहिए और माहौल ऐसा बना कि library की library खाली होने लगी। पहली बार library खाली हुई होगी? वो सौभाग्य कहां है जी? Library में कई पुस्तक ऐसी होंगी, जिसकी 20-20 साल तक किसी ने हाथ तक नहीं लगाया होगा? ये स्थिति भी बदलनी चाहिए। बालक मन को अगर घर में आदत डालें क्योंकि ये एक ज्ञान का भंडार भी तो जीवन जीने के लिए बहुत बड़ी ताकत होती है और इसलिए हम लोगों का प्रयास रहना चाहिए समाज-जीवन में एक आदत बननी चाहिए।

भले हम technology से जुड़ें, Google गुरू के सहारे गुजारा कर लें, फिर भी मूलतः चीजों को और एक बार पढ़ने की आदत शुरू करेंगे न तो फिर मन लगता है। अगला पढ़ा, इसको पढ़ें, उसको पढ़ें, मन लगता है और लेखक बनने के लिए पढ़ने की जरूरत नहीं होती है, कभी-कभी अपने-आप के लिए भी दर्पण की जरूरत होती है और जिस दर्पण में चेहरा दिखता है। अगर किताब वाली दर्पण को देखें तो भीतर का इंसान नजर आता है और उस रूप में किताब वाली दर्पण और मैं मानता हूं नेमाड़े जी, उस दर्पण का काम करना है कि जो हमारे मूल जगत से हटने का क्या परिणाम होते हैं और हम विश्व के साथ जो सोच रहे हैं, हम कहां खड़े हैं? अपने आप को ठीक पाते हैं कि नहीं पाते? उसका दर्शन करा देते हैं और इसलिए मैं आज ज्ञानपीठ पुरस्कार, वैसे मैंने देखा जब नेमाड़े जी को सरस्वती देवी जी की मूर्ति मिली तो प्रसन्न दिखते थे, शॉल मिली प्रसन्न दिखते थे, नारियल मिला प्रसन्न दिखते थे, लेकिन 11 लाख का चैक आया तो वो uncomfortable थे क्यों? क्योंकि हमारे देश में सरस्वती और लक्ष्मी के मिलन की कल्पना ही नहीं है। देश को आगे बढ़ना है तो सरस्वती और लक्ष्मी का भी मिलन आवश्यक है। ईश्वर नेमाड़ें जी को बुहत शक्ति दे। अपार संपदा अभी भी बहुत भीतर पड़ी होगी। अभी तो बहुत कम निकला होगा, इतना विपुल मात्रा में है, हमें परोसते रहें, परोसते रहें ताकि आने वाली पीढ़ियां भी पुलकित हो जाएं।

मैं उनका बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं, हृदय से आदर करता हूं और ये जिम्मेवारी बहुत बड़ी होती है, जिस काम को नामवर सिंह जी ने निभाया है। मैं उनका भी अभिनंदन करता हूं और जैन परिवार ने 50 साल तक लगातार इस परंपरा को उत्तम तरीके से निभाया है, पुरस्कृत किया है, प्रोत्साहित किया है, उस परिवार को भी बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

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Text to PM’s interaction with beneficiaries of Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana in Gujarat
August 03, 2021
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Earlier, the scope and budget of cheap ration schemes kept on increasing but starvation and malnutrition did not decrease in that proportion: PM
Beneficiaries are getting almost double the earlier amount of ration after Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana started: PM
More than 80 crore people people are getting free ration during the pandemic with an expenditure of more than 2 lakh crore rupees: PM
No citizen went hungry despite the biggest calamity of the century: PM
Empowerment of the poor is being given top priority today: PM
New confidence of our players is becoming the hallmark of New India: PM
Country is moving rapidly towards the vaccination milestone of 50 crore: PM
Let's take holy pledge to awaken new inspiration for nation building on Azadi ka Amrit Mahotsav: PM

नमस्‍कार! गुजरात के मुख्यमंत्री श्री विजय रुपाणी जी, उप-मुख्यमंत्री श्री नितिन भाई पटेल जी, संसद में मेरे साथी और गुजरात भाजपा के अध्यक्ष श्रीमान सी. आर. पाटिल जी, पी एम गरीब कल्याण अन्न योजना के सभी लाभार्थी, भाइयों और बहनों!

बीते वर्षों में गुजरात ने विकास और विश्वास का जो अनवरत सिलसिला शुरु किया, वो राज्य को नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। गुजरात सरकार ने हमारी बहनों, हमारे किसानों, हमारे गरीब परिवारों के हित में हर योजना को सेवाभाव के साथ ज़मीन पर उतारा है। आज गुजरात के लाखों परिवारों को पी एम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत एक साथ मुफ्त राशन वितरित किया जा रहा है। ये मुफ्त राशन वैश्विक महामारी के इस समय में गरीब की चिंता कम करता है, उनका विश्वास बढ़ाता है। ये योजना आज से प्रारंभ नहीं हो रही है, योजना तो पिछले एक साल से करीब-करीब चल रही है ताकि इस देश का कोई गरीब भूखा ना सो जाए।

मेरे प्‍यारे भाईयों और बहनों,

गरीब के मन में भी इसके कारण विश्‍वास पैदा हुआ है। ये विश्वास, इसलिए आया है क्योंकि उनको लगता है कि चुनौती चाहे कितनी भी बड़ी हो, देश उनके साथ है। थोड़ी देर पहले मुझे कुछ लाभार्थियों के साथ बातचीत करने का अवसर मिला, उस चर्चा में मैंने अनुभव भी किया कि एक नया आत्‍मविश्‍वास उनके अन्‍दर भरा हुआ है।

साथियों,

आज़ादी के बाद से ही करीब-करीब हर सरकार ने गरीबों को सस्ता भोजन देने की बात कही थी। सस्ते राशन की योजनाओं का दायरा और बजट साल दर साल बढ़ता गया, लेकिन उसका जो प्रभाव होना चाहिए था, वो सीमित ही रहा। देश के खाद्य भंडार बढ़ते गए, लेकिन भुखमरी और कुपोषण में उस अनुपात में कमी नहीं आ पाई। इसका एक बड़ा कारण था कि प्रभावी डिलिवरी सिस्टम का ना होना और कुछ बिमारियाँ भी आ गईं व्‍यवस्‍थाओं में, कुछ cut की कंपनियाँ भी आ गईं, स्‍वार्थी तत्‍व भी घुस गये। इस स्थिति को बदलने के लिए साल 2014 के बाद नए सिरे से काम शुरु किया गया। नई technology को इस परिवर्तन का माध्यम बनाया गया। करोड़ों फर्ज़ी लाभार्थियों को सिस्टम से हटाया। राशन कार्ड को आधार से लिंक किया और सरकारी राशन की दुकानों में digital technology को प्रोत्साहित किया गया। आज परिणाम हमारे सामने है।

भाइयों और बहनों,

सौ साल की सबसे बड़ी विपत्ति सिर्फ भारत पर नहीं, पूरी दुनिया पर आई है, पूरी मानव जाति पर आई है। आजीविका पर संकट आया, कोरोना लॉकडाउन के कारण काम-धंधे बंद करने पड़े। लेकिन देश ने अपने नागरिकों को भूखा नहीं सोने दिया। दुर्भाग्य से दुनिया के कई देशों के लोगों पर आज संक्रमण के साथ-साथ भुखमरी का भी भीषण संकट आ गया है। लेकिन भारत ने संक्रमण की आहट के पहले दिन से ही, इस संकट को पहचाना और इस पर काम किया। इसलिए, आज दुनियाभर में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की प्रशंसा हो रही है। बड़े-बड़े expert इस बात की तारीफ कर रहे हैं कि भारत अपने 80 करोड़ से अधिक लोगों को इस महामारी के दौरान मुफ्त अनाज उपलब्ध करा रहा है। इस पर 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक ये देश खर्च कर रहा है। मकसद एक ही है- कोई भारत का मेरा भाई-बहन, मेरा कोई भारतवासी भूखा ना रहे। आज 2 रुपए किलो गेहूं, 3 रुपए किलो चावल के कोटे के अतिरिक्त हर लाभार्थी को 5 किलो गेहूं और चावल मुफ्त दिया जा रहा है। यानि इस योजना से पहले की तुलना में राशन कार्ड धारकों को लगभग डबल मात्रा में राशन उपलब्ध कराया जा रहा है। ये योजना दीवाली तक चलने वाली है, दिवाली तक किसी गरीब को पेट भरने के लिये अपनी जेब से पैसा नहीं निकालना पड़ेगा। गुजरात में भी लगभग साढ़े 3 करोड़ लाभार्थियों को मुफ्त राशन का लाभ आज मिल रहा है। मैं गुजरात सरकार की इस बात के लिए भी प्रशंसा करूंगा कि उसने देश के दूसरे हिस्सों से अपने यहां काम करने आए श्रमिकों को भी प्राथमिकता दी। कोरोना लॉकडाउन के कारण प्रभावित हुए लाखों श्रमिकों को इस योजना का लाभ मिला है। इसमें बहुत सारे ऐसे साथी थे, जिनके पास या तो राशन कार्ड था ही नहीं, या फिर उनका राशन कार्ड दूसरे राज्यों का था। गुजरात उन राज्यों में है जिसने सबसे पहले वन नेशन, वन राशन कार्ड की योजना को लागू किया। वन नेशन, वन राशन कार्ड का लाभ गुजरात के लाखों श्रमिक साथियों को हो रहा है।

भाइयों और बहनों,

एक दौर था जब देश में विकास की बात केवल बड़े शहरों तक ही सीमित होती थी। वहाँ भी, विकास का मतलब बस इतना ही होता था कि ख़ास-ख़ास इलाकों में बड़े बड़े flyovers बन जाएं, सड़कें बन जाएं, मेट्रो बन जाएं! यानी, गाँवों-कस्बों से दूर, और हमारे घर के बाहर जो काम होता था, जिसका सामान्‍य मानवी से लेना-देना नहीं था उसे विकास माना गया। बीते वर्षों में देश ने इस सोच को बदला है। आज देश दोनों दिशाओं में काम करना चाहता है, दो पटरी पर चलना चाहता है। देश को नए infrastructure की भी जरूरत है। Infrastructure पर भी लाखों-करोड़ों खर्च हो रहा है, उससे लोगों को रोजगार भी मिल रहा है, लेकिन साथ ही, सामान्य मानवी के जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए, Ease of Living के लिए नए मानदंड भी स्थापित कर रहे हैं। गरीब के सशक्तिकरण, को आज सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। जब 2 करोड़ गरीब परिवारों को घर दिये जाते हैं तो इसका मतलब होता है कि वो अब सर्दी, गर्मी, बारिश के डर से मुक्त होकर जी पायेगा, इतना ही नहीं, जब खुद का घर होता है ना तो आत्‍मसम्‍मान से उसका जीवन भर जाता है। नए संकल्‍पों से जुड़ जाता है और उन संकल्‍पों को साकार करने के लिये गरीब परिवार समेत जी जान से जुट जाता है, दिन रात मेहनत करता है। जब 10 करोड़ परिवारों को शौच के लिए घर से बाहर जाने की मजबूरी से मुक्ति मिलती है तो इसका मतलब होता है कि उसका जीवन स्तर बेहतर हुआ है। वो पहले सोचता था कि सुखी परिवारों के घर में ही toilet होता है, शौचालय उन्‍हीं के घर में होता है। गरीब को तो बेचारे को अंधेरे का इंतजार करना पड़ता है, खुले में जाना पड़ता है। लेकिन जब गरीब को शौचालय मिलता है तो वो अमीर की बराबरी में अपने आप को देखता है, एक नया विश्‍वास पैदा होता है। इसी तरह, जब देश का गरीब जन-धन खातों के जरिए बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ता है, मोबाइल बैंकिंग गरीब के भी हाथ में होती है तो उसे ताकत मिलती है, उसे नए अवसर मिलते हैं। हमारे यहाँ कहा जाता है-

सामर्थ्य मूलम्
सुखमेव लोके!

अर्थात्, हमारे सामर्थ्य का आधार हमारे जीवन का सुख ही होता है। जैसे हम सुख के पीछे भागकर सुख हासिल नहीं कर सकते बल्कि उसके लिए हमें निर्धारित काम करने होते हैं, कुछ हासिल करना होता है। वैसे ही सशक्तिकरण भी स्वास्थ्य, शिक्षा, सुविधा और गरिमा बढ़ने से होता है। जब करोड़ों गरीबों को आयुष्मान योजना से मुफ्त इलाज मिलता है, तो स्वास्थ्य से उनका सशक्तिकरण होता है। जब कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की सुविधा सुनिश्चित की जाती है तो इन वर्गों का शिक्षा से सशक्तिकरण होता है। जब सड़कें शहरों से गाँवों को भी जोड़ती हैं, जब गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन, मुफ्त बिजली कनेक्शन मिलता है तो ये सुविधाएं उनका सशक्तिकरण करती हैं। जब एक व्यक्ति को स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सुविधाएं मिलती हैं तो वो अपनी उन्नति के बारे में, देश की प्रगति में सोचता है। इन सपनों को पूरा करने के लिए आज देश में मुद्रा योजना है, स्वनिधि योजना है। भारत में ऐसी अनेकों योजनाएं गरीब को सम्मानपूर्ण जीवन का मार्ग दे रही हैं, सम्मान से सशक्तिकरण का माध्यम बन रही हैं।

भाइयों और बहनों,

जब सामान्य मानवी के सपनों को अवसर मिलते हैं, व्यवस्थाएं जब घर तक खुद पहुँचने लगती हैं तो जीवन कैसे बदलता है, ये गुजरात बखूबी समझता है। कभी गुजरात के एक बड़े हिस्से में लोगों को, माताओं-बहनों को पानी जैसी जरूरत के लिए कई-कई किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। हमारी सभी माताएं-बहनें साक्षी हैं। ये राजकोट में तो पानी के लिये ट्रेन भेजनी पड़ती थी। राजकोट में तो पानी लेना है तो घर के बाहर गड्ढा खोदकर के नीचे पाइप में से पानी एक-एक कटोरी लेकर के बाल्‍टी भरनी पड़ती थी। लेकिन आज, सरदार सरोवर बांध से, साउनी योजना से, नहरों के नेटवर्क से उस कच्छ में भी मां नर्मदा का पानी पहुंच रहा है, जहां कोई सोचता भी नहीं था और हमारे यहां तो कहा जाता था कि मां नर्मदा के स्‍मरण मात्र से पूण्‍य मिलता है, आज तो स्‍वयं मां नर्मदा गुजरात के गांव-गांव जाती है, स्‍वयं मां नर्मदा घर-घर जाती है, स्‍वयं मां नर्मदा आपके द्वार आकर के आपको आशीर्वाद देती है। इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज गुजरात शत-प्रतिशत नल से जल उपलब्ध कराने के लक्ष्य से अब ज्यादा दूर नहीं है। यही गति, आम जन के जीवन में यही बदलाव, अब धीरे धीरे पूरा देश महसूस कर रहा है। आज़ादी के दशकों बाद भी देश में सिर्फ 3 करोड़ ग्रामीण परिवार पानी के नल की सुविधा से जुड़े हुए थे, जिनको नल से जल मिलता था। लेकिन आज जल जीवन अभियान के तहत देशभर में सिर्फ दो साल में, दो साल के भीतर साढ़े 4 करोड़ से अधिक परिवारों को पाइप के पानी से जोड़ा जा चुका है और इसलिये मेरी माताएं-बहनें मुझे भरपूर आशीर्वाद देती रहती हैं।

भाइयों और बहनों,

डबल इंजन की सरकार के लाभ भी गुजरात लगातार देख रहा है। आज सरदार सरोवर बांध से विकास की नई धारा ही नहीं बह रही, बल्कि Statue of Unity के रूप में विश्व के सबसे बड़े आकर्षण में से एक आज गुजरात में है। कच्छ में स्थापित हो रहा Renewable Energy Park, गुजरात को पूरे विश्व के Renewable Energy Map में स्थापित करने वाला है। गुजरात में रेल और हवाई कनेक्टिविटी के आधुनिक और भव्य Infrastructure Project बन रहे हैं। गुजरात के अहमदाबाद और सूरत जैसे शहरों में मेट्रो कनेक्टिविटी का विस्तार तेज़ी से हो रहा है। Healthcare और Medical Education में भी गुजरात में प्रशंसनीय काम हो रहा है। गुजरात में तैयार हुए बेहतर Medical Infrastructure ने 100 साल की सबसे बड़ी Medical Emergency को हैंडल करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

साथियों,

गुजरात सहित पूरे देश में ऐसे अनेक काम हैं, जिनके कारण आज हर देशवासी का, हर क्षेत्र का आत्मविश्वास बढ़ रहा है। और ये आत्मविश्वास ही है जो हर चुनौती से पार पाने का, हर सपने को पाने का एक बहुत बड़ा सूत्र है। अभी ताज़ा उदाहरण है ओलंपिक्स में हमारे खिलाड़ियों का प्रदर्शन। इस बार ओलंपिक्स में भारत के अब तक के सबसे अधिक खिलाड़ियों ने क्वालीफाई किया है। याद रहे ये 100 साल की सबसे बड़ी आपदा से जूझते हुए हमने किया है। कई तो ऐसे खेल हैं जिनमें हमने पहली बार qualify किया है। सिर्फ qualify ही नहीं किया बल्कि कड़ी टक्कर भी दे रहे हैं। हमारे खिलाड़ी हर खेल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। इस ओलिंपिक में नए भारत का बुलंद आत्मविश्वास हर game में दिख रहा है। ओलंपिक्स में उतरे हमारे खिलाड़ी, अपने से बेहतर रैंकिंग के खिलाड़ियों को, उनकी टीमों को चुनौती दे रहे हैं। भारतीय खिलाड़ियों का जोश, जुनून और जज़्बा आज सर्वोच्च स्तर पर है। ये आत्मविश्वास तब आता है जब सही टैलेंट की पहचान होती है, उसको प्रोत्साहन मिलता है। ये आत्मविश्वास तब आता है जब व्यवस्थाएं बदलती हैं, transparent होती हैं। ये नया आत्मविश्वास न्यू इंडिया की पहचान बन रहा है। ये आत्मविश्वास आज देश के कोने-कोने में, हर छोटे-छोटे बड़े गांव-कस्बे, गरीब, मध्यम वर्ग के युवा भारत के हर कोने में ये विश्‍वास में आ रहा है।

साथियों,

इसी आत्मविश्वास को हमें कोरोना से लड़ाई में और अपने टीकाकरण अभियान में भी जारी रखना है। वैश्विक महामारी के इस माहौल में हमें अपनी सतर्कता लगातार बनाए रखनी है। देश आज 50 करोड़ टीकाकरण की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा है तो, गुजरात भी साढ़े 3 करोड़ वैक्सीन डोसेज के पड़ाव के पास पहुंच रहा है। हमें टीका भी लगाना है, मास्क भी पहनना है और जितना संभव हो उतना भीड़ का हिस्सा बनने से बचना है। हम दुनिया में देख रहे हैं। जहां मास्क हटाए भी गए थे, वहां फिर से मास्क लगाने का आग्रह किया जाने लगा है। सावधानी और सुरक्षा के साथ हमें आगे बढ़ना है।

साथियों,

आज जब हम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्नयोजना पर इतना बड़ा कार्यक्रम कर रहे हैं तो मैं एक और संकल्प देशवासियों को दिलाना चाहता हूँ। ये संकल्प है राष्ट्र निर्माण की नई प्रेरणा जगाने का। आज़ादी के 75 वर्ष पर, आजादी के अमृत महोत्सव में, हमें ये पवित्र संकल्प लेना है। इन संकल्पों में, इस अभियान में गरीब-अमीर, महिला-पुरुष, दलित-वंचित सब बराबरी के हिस्सेदार हैं। गुजरात आने वाले वर्षों में अपने सभी संकल्प सिद्ध करे, विश्व में अपनी गौरवमयी पहचान को और मजबूत करे, इसी कामना के साथ मैं आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। एक बार फिर अन्न योजना के सभी लाभार्थियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं !!! आप सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद !!!