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उपस्थित सभी महानुभाव,

मैं अपने आप में गौरव महसूस कर रहा हूं क्योंकि जब हम छोटे थे, तो ज्ञानपीठ पुरस्कार की खबर आती थी तो बड़े ध्यान से उसको पढ़ते थे कि ये पुरस्कार किसको मिल रहा है, जिसको मिला है उसका Background क्या है। बड़ी उत्सुकता रहती थी और जिसके मन की अवस्था यह रही हो, उसको यहां आ करके बैठने का अवलर मिले, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है।

आज का दिवस मन को विचलित करने वाला दिन है। भयंकर भूकंप ने मानव मन को बड़ा परेशान किया हुआ है और पता नही कि कितना नुकसान हुआ होगा क्योंकि अभी तो जानकारी आ रही हैं। नेपाल की पीड़ा भी हमारी ही पीड़ा है। मैंने नेपाल के प्रधानमंत्री जी से, राष्ट्रपति जी से बात की और विश्वास दिलाया है कि सवा सौ करोड़ देशवासी आपकी इस मुसीबत में आपके साथ हैं। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस भयंकर हादसे को सहने की परमात्मा ताकत दे। जिन परिवारजनों पर आफत आई है, उनको शक्ति दे। भारत में भी कम-अधिक कुछ-न-कुछ प्रभाव हुआ है। उनके प्रति भी मेरी संवेदना है।

ये Golden Jubilee का अवसर है। 50वां समारोह है। समाज जीवन में तकनीकी विकास कितना ही क्यों न हुआ हो, वैज्ञानिक विकास कितना ही क्यों न हुआ हो लेकिन उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का भी अगर विस्तार नहीं होता है, ऊंचाइयों को छूने का प्रयास नहीं होता है, तो पता नहीं मानव जाति का क्या होगा? और इसलिए विज्ञान और Technology के युग में साहित्यिक साधना मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने के लिए, मानवीय संवेदनाओं को संजोने के लिए एक बहुत बड़ी औषधि के रूप में काम करता है और जो साहित्यिक साहित्य रचना करता है। आजकल आप Computer के लिए Software बना दें और Software के अंदर Programming के साथ एक-दो हजार शब्द डाल दें और Computer को कह दें कि भई उसमें से कुछ बनाकर के निकाल दो, तो शायद वो बना देता है। लेकिन वो Production होगा, वो Assemble करेगा, Creation नहीं कर सकता है और ये creativity जो है, वो अनुभूति की अभिव्यक्ति होती है। वह एक दर्शन के रूप में प्रवाहित होती है और तब जाकर के पीढ़ियों तक सामान्य मानव के जीवन को स्पर्श करती रहती है। हमारे यहां परंपरा से निकली हुई कहावतें हैं। सदियों के प्रभाव से, अनुभव से, संजो-संजो करके बनी हुई होती हैं और हमने देखा होगा कि एक कहावत जीवन की कितना दिशा-दर्शक बन जाती है। एक कहावत कितना बड़ी उपदेश दे जाती है। पता तक नहीं है ये कहावत का रचयिता कौन था, नियंता कौन था, किस कालखंड में निर्माण हुआ था, कुछ पता नहीं है। लेकिन आज भी और समाज के अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति से लेकर के वैश्विक ज्ञान संपादन करने का जिसको अवसर मिला है, उनको भी वो एक ही कहावत जोड़ पाती है। यानि हम कल्पना कर सकते हैं कि कितना सामर्थ्य होगा कि जो नीचे से लेकर आसमान तक की अवस्था को स्पष्ट कर सकता है, जोड़ सकता है।

इतना ही नहीं वो बीते हुए युग को, वर्तमान को और आने वाले युग को जोड़ने का सामर्थ्य रखता है। मैंने कहावत का उल्लेख इसलिए किया कि हम भली-भांति रोजमर्रा की जिंदगी में इसका उपयोग करते हैं। साहित्य की ताकत उससे अनेकों गुना ज्यादा होती है और सर्जक जब करता है, मैं नहीं मानता हूं कि वो वाचक के लिए कुछ लिखता है, मैं नहीं मानता हूं, न ही वो इसलिए लिखता है कि उसे कुछ उपदेश देना है, न ही वो इसलिए लिखता है कि उसको कोई विवाद कर-करके अपना जगह बनानी है। वो इसलिए लिखता है, वो लिखे बिना रह नहीं सकता है। उसके भीतर एक आग होती है, उसके भीतर एक ज्वाला होती है, उसके भीतर एक तड़प होती है और तब जाकर के स्याही के सहारे वो संवेदनाएं शब्द का रूप धारण करके बहने लग जाती हैं, जो पीढ़ियों तक भिझोती रहती हैं, पथ-दर्शक बनकर के रहती हैं और तब जाकर के वो साहित्य समाज की एक शक्ति बन जाता है। कोई कल्पना कर सकता है, वेद किसने बनाएं हैं, कब बनाएं हैं, कहां पता है लेकिन आज भी मानव जाति जिन समस्याओं से उलझ रही है, उसके समाधान उसमें से मिल रहे हैं।

मैं अभी फ्रांस गया था। फ्रांस के राष्ट्रपति जी से मेरी बात हो रही थी क्योंकि COP-21 फ्रांस में होने वाला है और Environment को लेकर के दुनिया बड़ी चिंतित है। मैंने कहा जब प्रकृति पर कोई संकट नहीं था, सारी पृथ्वी लबालब प्रकृति से भरी हुई थी। किसी ने उस प्रकृति का exploitation कभी नहीं किया था उस युग में, उस युग में वेद की रचना करने वालों ने प्रकृति की रचना कैसे करनी चाहिए, क्यों करनी चाहिए, मनुष्य जीवन और प्रकृति का नाता कैसा होना चाहिए इसका इतना विद्वत्तापूर्ण वर्णन किया है। मैंने कहा ये हैं दुनिया को रास्ता दिखा सकते हैं कि हां, global warming से बचना है तो कैसे बचा जा सकता है? Environment protection करना है तो कैसे किया जा सकता है और पूरी तरह वैज्ञानिक कसौटी से कसी हुई चीजें सिर्फ उपदेशात्मक नही हैं, सिर्फ भावात्मक नहीं हैं, सिर्फ संस्कृत के श्लोकों का भंडार नहीं है। इसका मतलब हुआ कि युगों पहले किसी ने कल्पना की होगी कि जमीन के सामने क्या संभव होने वाला है और उसका रास्ता अभी से उन मर्यादाओं का पालन करेंगे तो होगा लेकिन कोई रचना करने वाला उस जमाने का कोई नेमाड़े तो ही होगा। हो सकता है उस समय ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं होगा, कहने का तात्पर्य यह है कि ये युगों तक चलने वाली साधना है।

मैं नेमाड़े जी के जीवन की तरफ जब देखता हूं, मैं comparison नहीं करता हैं, मुझे क्षमा करें, न ही मैं वो नेमाड़े जी की ऊंचाई को पकड़ सकता हूं और जिनका उल्लेख करने जा रहा हूं उनकी भी नहीं पकड़ सकता हूं। लेकिन श्री अरविंद जी के जीवन की तरफ देखें और नेमाड़े जी की बातों को सुनें तो बहुत निकटता महसूस होती है। उनका भी लालन-पालन, पठन सब अंग्रेजियत से रहा लेकिन जिस प्रकार से ये back to basic और जीवन के मूल को पकड़ कर के हिंदुस्तान की आत्मा को उन्होंने झंझोरने का जो प्रयास किया था। ये देश का दुर्भाग्य है कि वो बातें व्यापक रूप से हमारे सामने आई नहीं है, लेकिन जब उस तरफ ध्यान जाएगा, दुनिया का ध्यान जाने वाला है। जैसे नेमाड़े जी कह रहे हैं न कि इस back to basic की क्या ताकत है, कभी न कभी जाने वाला है और तब मानव जाति को संकटों से बचाने के रास्ते क्या हो सकते हैं, मानव को मानव के प्रति देखने का तरीका क्या हो सकता है, वो सीधा-सीधा समझ आता है और तब जाकर के छद्म जीवन की जरूरत नहीं पड़ती है, छद्मता का आश्रय लेने की जरूरत नहीं पड़ती है, भीतर से ही एक ताकत निकलती है, जो जोड़ती है।

Neil Armstrong चंद्रमा पर गए थे, वैज्ञानिक थे, technology, space science ये ही जीवन का एक प्रकार से जब जवानी के दिन शुरू हुए, वो space में खो गए, अपने-आप को उसमें समर्पित कर दिया और जब वो वापिस आते थे तो उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है, मैं समझता हूं कि वो अपने-आप में एक बहुत बड़ा संदेश है। उन्होंने लिखा, मैं गया जब तब मैं astronaut था लेकिन जब मैं आया तो मैं इंसान बन गया। देखिए जीवन में कहां से, कौन-सी चीज निकलती है और यही तो सामर्थ्य होता है। नेमाड़े जी ने अपने कलम के माध्यम से, अपने भाव जगत को आने वाली पीढ़ियों के लिए अक्षर-देह दिया हुआ है। ये अक्षर-देह आने वाली पीढ़ियों में उपकारक होगा, ऐसा मुझे पूरा विश्वास है लेकिन एक चिंता भी सता रही है।

हमारे यहां किताबें छपती हैं, बहुत कम बिकती हैं मैं जब, मराठी साहित्य का क्या हाल है, मुझे पूरी जानकारी नहीं है लेकिन गुजराती में तो ज्यादातर 1250 किताबें छपती हैं, 2250 तो मैं कभी पूछता था कि 2250 क्यों छाप रहे हो, तो बोले paper जो कभी cutting होता है, तो फिर wastage नहीं जाता है, इतने में से ही निकल जाती है। Publisher के दिमाग में paper रहता है, लेखक के दिमाग में युग रहता है, इतना अंतर है और वो भी बिकते-बिकते दस, बारह, पंद्रह साल बीत जाते हैं, उसमें भी आधी तो शायद library में जाती होगी तब जाकर के मेल बैठ जाता है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि हम बढ़िया सा मकान जब बनाते हैं, कभी किसी architecture से बात हुआ क्या? उनको ये तो कहा होगा कि bathroom कैसा हो? उसे ये भी कहा होगा कि drawing room कैसा हो? लेकिन कितने लोग होंगे जिन्होंने करोड़ो- अरबों रुपए खर्च करके बंगला बनाते होंगे और ये भी कहा होगा कि एक कमरा, अच्छी library भी हो और कितने architecture होंगे, जिन्होंने ये कहा होगा कि भले ही कम जगह हो लेकिन एक कोना तो किताब रखने के लिए रखिए। हम आदत क्यों न डालें, हम आदत क्यों न डालें? घर में पूजा अगर होगी, जूते रखने के लिए अलग जगह होगी, सब होगा लेकिन किताब के लिए अलग जगह नहीं होगी। मैं lawyers की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि उनको तो उसी का सहारा है। लेकिन सामान्य रूप से, दूसरा एक जमाने में student को भी guide मिल जाती थी, तो text book क्यों पढ़े ? Guide से चल जाती थी गाड़ी, अब तो वो भी चिंता का विषय नहीं है, पूरी पीढ़ी Google गुरू की शिष्य है। एक शब्द डाल दिया Google गुरू को पूछ लिया, गुरूजी ढूंढकर के ले आते हैं, सारा ब्राहमांड खोज मारते हैं और इसके कारण अध्य्यन ये सिर्फ प्रवृति नहीं अध्य्यन ये वृत्ति बनना चाहिए। जब तक वो हमारा DNA नहीं बनता तब तक हम नएपन से जुड़ ही नहीं सकते, व्यापकता से जुड़ नहीं सकते, हम आने वाले कल को पहचान नहीं सकते हैं।

मैं गुजरात में जब मुख्यमंत्री था, तो मैंने गुजरात का जब Golden jubilee मनाया तो Golden jubilee year में मैंने एक कार्यक्रम दिया था, गुजराती में उसे कहते हैं “वांचे गुजरात” यानी गुजरात पढ़े और बड़ा अभियान चलाया, मैं खुद library में जाकर के पढ़ता था ताकि लोग देखें कि किताब पढ़नी चाहिए और माहौल ऐसा बना कि library की library खाली होने लगी। पहली बार library खाली हुई होगी? वो सौभाग्य कहां है जी? Library में कई पुस्तक ऐसी होंगी, जिसकी 20-20 साल तक किसी ने हाथ तक नहीं लगाया होगा? ये स्थिति भी बदलनी चाहिए। बालक मन को अगर घर में आदत डालें क्योंकि ये एक ज्ञान का भंडार भी तो जीवन जीने के लिए बहुत बड़ी ताकत होती है और इसलिए हम लोगों का प्रयास रहना चाहिए समाज-जीवन में एक आदत बननी चाहिए।

भले हम technology से जुड़ें, Google गुरू के सहारे गुजारा कर लें, फिर भी मूलतः चीजों को और एक बार पढ़ने की आदत शुरू करेंगे न तो फिर मन लगता है। अगला पढ़ा, इसको पढ़ें, उसको पढ़ें, मन लगता है और लेखक बनने के लिए पढ़ने की जरूरत नहीं होती है, कभी-कभी अपने-आप के लिए भी दर्पण की जरूरत होती है और जिस दर्पण में चेहरा दिखता है। अगर किताब वाली दर्पण को देखें तो भीतर का इंसान नजर आता है और उस रूप में किताब वाली दर्पण और मैं मानता हूं नेमाड़े जी, उस दर्पण का काम करना है कि जो हमारे मूल जगत से हटने का क्या परिणाम होते हैं और हम विश्व के साथ जो सोच रहे हैं, हम कहां खड़े हैं? अपने आप को ठीक पाते हैं कि नहीं पाते? उसका दर्शन करा देते हैं और इसलिए मैं आज ज्ञानपीठ पुरस्कार, वैसे मैंने देखा जब नेमाड़े जी को सरस्वती देवी जी की मूर्ति मिली तो प्रसन्न दिखते थे, शॉल मिली प्रसन्न दिखते थे, नारियल मिला प्रसन्न दिखते थे, लेकिन 11 लाख का चैक आया तो वो uncomfortable थे क्यों? क्योंकि हमारे देश में सरस्वती और लक्ष्मी के मिलन की कल्पना ही नहीं है। देश को आगे बढ़ना है तो सरस्वती और लक्ष्मी का भी मिलन आवश्यक है। ईश्वर नेमाड़ें जी को बुहत शक्ति दे। अपार संपदा अभी भी बहुत भीतर पड़ी होगी। अभी तो बहुत कम निकला होगा, इतना विपुल मात्रा में है, हमें परोसते रहें, परोसते रहें ताकि आने वाली पीढ़ियां भी पुलकित हो जाएं।

मैं उनका बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं, हृदय से आदर करता हूं और ये जिम्मेवारी बहुत बड़ी होती है, जिस काम को नामवर सिंह जी ने निभाया है। मैं उनका भी अभिनंदन करता हूं और जैन परिवार ने 50 साल तक लगातार इस परंपरा को उत्तम तरीके से निभाया है, पुरस्कृत किया है, प्रोत्साहित किया है, उस परिवार को भी बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

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राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरण 2020 च्या पहिल्या वर्धापन दिनानिमित्त पंतप्रधानांनी केलेले मार्गदर्शन
July 29, 2021
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या प्रसंगानिमित विविध प्रमुख उपक्रमांचा शुभारंभ
राष्ट्रीय विकासाच्या ‘महायज्ञात’ राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरण महत्वाचा घटक : पंतप्रधान
देश संपूर्णत: तुमच्या आणि तुमच्या आकांक्षासोबत आहे, याची ग्वाही युवकांना या राष्ट्रीय शिक्षण धोरणातून मिळते: पंतप्रधान
मुक्त आणि तणावरहित शिक्षण, हे नव्या शैक्षणिक धोरणाचे महत्वाचे वैशिष्ट्य : पंतप्रधान
देशातील 8 राज्यांमधल्या 14 अभियांत्रिकी महाविद्यालयात पाच भाषांमधून शिक्षण मिळण्याची सुविधा सुरु होणार : पंतप्रधान
मातृभाषेतून मिळालेले शिक्षण गरीब, ग्रामीण आणि आदिवासी पार्श्वभूमी असलेल्या विद्यार्थ्यांचा आत्मविश्वास वाढवणारे ठरेल

नमस्कार! माझ्यासोबत कार्यक्रमात सहभागी झालेले माझे सगळे सहकारी, राज्यांचे माननीय राज्यपाल, सर्व सन्माननीय मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, राज्य सरकारांचे मंत्री, उपस्थित शिक्षण तज्ञ, शिक्षक, सर्व पालक आणि माझ्या प्रिय तरुण मित्रांनो!

नवीन राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणाला एक वर्ष पूर्ण झाल्याबद्दल सर्व देशबांधवांना आणि विशेषतः सर्व विद्यार्थ्यांना अनेक अनेक शुभेच्छा. गेल्या एक वर्षात देशातील तुम्ही  सर्व मान्यवर, शिक्षक, मुख्याध्यापक, धोरणकर्त्यांनी  नव्या  राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणाच्या अंमलबजावणीसाठी अपार कष्ट घेतले आहेत. या कोरोना काळात देखील लाखो नागरिक, शिक्षक, राज्य सरकारे, स्वायत्त संस्था यांच्याकडून सूचना मागवून कृती दल बनवून टप्प्या टप्प्याने नवीन शैक्षणिक धोरण राबले जात आहे. गेल्या एक वर्षात राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणावर  आधारित अनेक मोठे  निर्णय घेतले गेले आहेत. आज याच शृंखलेत अनेक नव्या योजना, नवे उपक्रम सुरु करण्याचे सौभाग्य मला मिळाले आहे.

 

मित्रांनो,

ही महत्वाची संधी अशा वेळी आली आहे, जेंव्हा देश स्वातंत्र्याचा अमृत महोत्सव साजरा करतो आहे. थोड्याच दिवसांनी 15 ऑगस्टला आपण स्वातंत्र्याच्या 75व्या वर्षात पदार्पण करणार आहोत. एकप्रकारे, नव्या शैक्षणिक धोरणाची अंमलबजावणी स्वातंत्र्याच्या अमृतमहोत्सव समारंभाचा महत्वाचा भाग बनली आहे. इतक्या मोठ्या उत्सवादरम्यान ‘राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणा’ अंतर्गत सुरु झालेल्या योजना ‘नव्या भारताच्या निर्मितीत’ मोठं योगदान देणार आहेत. स्वातंत्र्याचे अमृत महोत्सवी वर्ष आपण जे संकल्प सोडून साजरे करत आहोत, त्या दिशेने आपल्याला आजची नवी पिढीच घेऊन जाणार आहे. आज आपण युवकांना कसे शिक्षण देत आहोत, कुठली दिशा दाखवत आहोत, यावर भविष्यातली आपली प्रगती कशी असेल, आपण कुठली शिखरे सर करू शकु, हे अवलंबून आहे. म्हणूनच, भारताचे नवे ‘राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरण’ राष्ट्र निर्माणाच्या महायज्ञात महत्वाची भूमिका बजावणार आहे, असे मी मानतो. म्हणूनच देशाने शैक्षणिक धोरण इतके आधुनिक, भविष्यासाठी तयार असलेले बनवले आहे. आज या कार्यक्रमात सहभागी झालेले बहुतांश मान्यवरांना, नव्या राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणाचे बारकावे माहित आहेत, मात्र हे किती मोठे अभियान आहे, याची जाणीव सतत करत राहायचीच आहे.

 

 

मित्रांनो,

देशभरातील आमचे अनेक युवा विद्यार्थी आज या कार्यक्रमात आपल्यासोबत आहेत. जर या विद्यार्थ्यांना, आपल्या मित्रांना आपण त्यांची स्वप्ने, त्यांच्या आकांक्षाविषयी विचारले तर आपल्याला जाणवेल की प्रत्येक युवकाच्या मनात एक नावीन्य आहे, एक नवी ऊर्जा आहे. आमचा युवक परिवर्तनासाठी पूर्णपणे सज्ज आहे. त्याला आता अधिक प्रतीक्षा करायची नाही. आपण सर्वांनी बघितले आहे, कोरोनाकाळात कशी आमच्या शिक्षणव्यवस्थेसमोर मोठमोठी आव्हाने होती. विद्यार्थ्यांच्या जीवन जगण्याची, शिक्षणाची तऱ्हाच बदलली. पद्धती बदलल्या. मात्र, देशातल्या विद्यार्थ्यांनी अत्यंत वेगाने या बदलाला स्वीकारले, अंगीकारले. ऑनलाईन शिक्षण आता मुलांच्या अंगवळणी पडले आहे. शिक्षण मंत्रालयाने देखील त्यासाठी अनेक प्रयत्न केले आहेत. मंत्रालयाने दीक्षा प्लॅटफॉर्म सुरु केला, स्वयं पोर्टलवर अभ्यासक्रम सुरु केला आणि आपले विद्यार्थी देखील पूर्ण जोशात, या बदलात सहभागी झाले आहेत. मला असे सांगण्यात आले आहे की, गेल्या एका वर्षात या पोर्टलला 2300 कोटींपेक्षा जास्त हिट्स मिळाले आहेत. यातूनच हे पोर्टल किती उपयुक्त ठरले आहे, हे सिद्ध होते. आज देखील दररोज सुमारे पांच कोटी हिट्स यावर येत आहेत.

 मित्रांनो,

21 व्या शतकातील हा तरुण आज आपल्या व्यवस्था, आपले जग स्वतःच्या मर्जीवर आणि समर्थ्यावर बनवू इच्छितो आहे. म्हणूनच त्याला संधी  हवी आहे, स्वातंत्र्य हवे आहे. जुन्या बंधनांपासून मुक्तता हवी आहे. आपण बघा, आज छोट्या छोट्या गावांमध्ये, वस्त्यांमधून येणारे युवक काय काय विलक्षण कामे करत आहेत. याच दुरवरच्या प्रदेशातून आणि अत्यंत सामान्य कुटुंबातून आलेले हे तरुण टोक्यो ऑलिंपिक मध्ये देशाचा ध्वज दिमाखात उंच करत आहेत. भारताला नवी ओळख देत आहेत. असेच कोट्यवधी युवक आज वेगवेगळ्या क्षेत्रात असामान्य कार्य करत आहेत. असाधारण उद्दिष्टाचा पाया रचत आहेत. कोणी कला आणि संस्कृतीच्या क्षेत्रात, प्राचीन आणि आधुनिकतेचा संगम घडवत नव्या कलाप्रकारांना जन्म देत आहेत. कोणी रोबोटिक्स क्षेत्रात कधी केवळ विज्ञानाच्या दंतकथा समजल्या जाणाऱ्या कल्पना प्रत्यक्षात उतरवत आहेत.

 

कोणी कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षेत्रात मानवी क्षमताना नव्या उंचीवर पोहोचवत आहे, तर कोणी मशीन लर्निंग क्षेत्रात नवे मैलांचे दगड गाठण्याची तयारी करत आहे, म्हणजेच, प्रत्येक क्षेत्रात, भारताचे युवक आपले झेंडे गाडत पुढे वाटचाल करत आहेत. हेच युवा, भारतातील स्टार्ट अप व्यवस्थेत क्रांतिकरक परिवर्तन करत आहेत. चौथ्या औद्योगिक क्रांतीत भारताचे नेतृत्व करण्यासाठी हे युवा सज्ज आहेत, आणि डिजिटल इंडियाला नवी गती देत आहेत.

आपण कल्पना करा, या युवा पिढीला जेव्हा त्यांच्या स्वप्नांच्या अनुरुप वातावरण मिळेल, त्यावेळी त्यांची शक्ति किती वाढू शकेल? आणि म्हणूनच, नवे ‘राष्ट्रीय शिक्षण धोरण’  युवकांना ही ग्वाही देते की संपूर्ण देश त्यांच्यासोबत आहे, त्यांच्या उमेद-आकांक्षासोबत आहे, ज्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपक्रमाचा आज शुभारंभ झाला आहे, तो देखील आपल्याला  भविष्योन्मुख बनवेल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणीत अर्थव्यवस्थेचे नवे मार्ग खुले करेल. शिक्षणात ही डिजिटल क्रांती, संपूर्ण देशाला एकत्र आणेल. गांवे-शहर सर्व समानतेने डिजिटल शिक्षणाशी जोडले जावे, त्याचीही काळजी घेण्यात आली आहे . राष्ट्रीय डिजिटल शिक्षण संरचना  म्हणजेच NDEAR, आणि राष्ट्रीय शिक्षण तंत्रज्ञान मंच- NETF या दिशेने संपूर्ण देशासाठी डिजिटल आणि तंत्रज्ञानाचा आराखडा उपलब्ध करुन देण्यात महत्वाची भूमिका बजावणार आहेत. तरुण मन ज्या दिशेने विचार करेल, ज्या मोकळ्या आकाशात भराऱ्या घेऊ पाहील, ते करण्याची संधी त्याला या नव्या शैक्षणिक धोरणामुळे मिळेल.

 

मित्रांनो, 

गेल्या एका वर्षात आपण हे ही अनुभवले असले की राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणाला कोणत्याही प्रकारच्या दबावापासून मुक्त ठेवण्यात आले आहे. जो विमुक्तपणा, धोरणात्मक पातळीवर आहे, तोच विद्यार्थ्याना 

 

मिळणाऱ्या पर्यायातही आहे. आता विद्यार्थ्यानी किती काळ अभ्यास करावा, किती अभ्यास करावा, हे केवळ शिक्षणमंडळे किंवा विद्यापीठे ठरवणार नाहीत. या निर्णयात विद्यार्थ्यांचाही सहभाग असेल. विविध ठिकाणी प्रवेश घेण्याची किंवा एखादा अभ्यासक्रम सोडण्याची जी व्यवस्था आता सुरु झाली आहे, त्यामुळे विद्यार्थ्याना एकाच वर्गात आणि एकाच अभ्यासक्रमात अडकून राहण्याच्या बंधनातून मुक्त करण्यात आले आहे.  

आधुनिक तंत्रज्ञानावर  आधारित 'अकॅडमिक बँक  ऑफ क्रेडिट'  या प्रणालीमुळे या दिशेने विद्यार्थ्यांसाठी क्रांतिकारी बदल घडणार आहे. आता प्रत्येक युवक आपल्या आवडीनुसार, आपल्या सोयीनुसार कधीही एक शाखा निवडू शकेल , सोडू शकेल. आता कोणताही अभ्यासक्रम निवडताना ही भीती असणार नाही की जर जर आपला निर्णय चुकला तर काय होईल?  त्याचप्रमाणे , '‘अध्ययनाच्या पातळीचे विश्लेषण करण्यासाठी संरचनात्मक मूल्यमापन’ ' अर्थात 'सफल' च्या माध्यमातून विद्यार्थ्यांच्या आकलनाची देखील वैज्ञानिक व्यवस्था सुरु झाली आहे. ही व्यवस्था येणाऱ्या काळात विद्यार्थ्यांना परीक्षांच्या भीतीपासून मुक्ती देईल. जेव्हा ही भीती युवा मनातून निघून जाईल तेव्हा नवनवीन कौशल्ये शिकण्याचे साहस आणि नवनवीन नावीन्यपूर्ण संशोधनाचे नवे पर्व सुरु होईल, अमाप संधी निर्माण होतील. म्हणूनच मी पुन्हा सांगेन की आज नव्या  राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणांतर्गत हे जे नवीन कार्यक्रम सुरु करण्यात आले आहेत त्यांच्यात भारताचे  भाग्य पालटण्याचे सामर्थ्य आहे. 

मित्रांनो ,

तुम्ही-आम्ही गेल्या अनेक दशकांपासून अशी परिस्थिती पाहिली आहे जेव्हा असे समजले जायचे की उत्तम शिक्षणासाठी परदेशातच जावे लागेल. मात्र उत्तम शिक्षणासाठी परदेशातून विद्यार्थी भारतात येतील, सर्वोत्तम संस्था भारताकडे आकर्षित होतील याकडे आता आम्ही लक्ष देत आहोत. देशातील दीडशेहून अधिक विद्यापीठांमध्ये परराष्ट्र व्यवहार कार्यालय स्थापन करण्यात आली आहेत ही माहिती उत्साह वाढवणारी आहे. भारताच्या उच्च शिक्षण संस्थानी  आंतरराष्ट्रीय स्तरावर संशोधन आणि शिक्षणात आणखी  प्रगती करावी यासाठी  आज नवीन मार्गदर्शक तत्वे देखील जारी करण्यात आली आहेत.

मित्रांनो ,

आज निर्माण होत असलेल्या संधी साकार करण्यासाठी आपल्या युवकांना यापुढे जगाच्या एक पाऊल पुढे रहावे लागेल,  पुढचा विचार करावा लागेल. आरोग्य असेल, संरक्षण असेल, पायाभूत विकास असेल, तंत्रज्ञान असेल, देशाला प्रत्येक बाबतीत सक्षम आणि आत्मनिर्भर व्हावेच लागेल.  'आत्मनिर्भर भारत' चा हा मार्ग कौशल्य विकास आणि तंत्रज्ञानाच्या मार्गाने जातो, ज्याकडे राष्ट्रीय शैक्षणिक धोरणात विशेष लक्ष देण्यात आले आहे. मला आनंद आहे की एका वर्षात  1200 हून अधिक उच्च शिक्षण संस्थांमध्ये कौशल्य विकासाशी संबंधित शेकडो नव्या अभ्यासक्रमांना मंजुरी देण्यात आली आहे.

 

मित्रांनो ,

 शिक्षणाबाबत पूज्य बापू महात्मा गांधी म्हणायचे - "राष्ट्रीय शिक्षण खऱ्या अर्थाने  राष्ट्रीय होण्यासाठी राष्ट्रीय परिस्थिती प्रतिबिंबित करायला हवी. "

बापूंचा हा  दूरदर्शी विचार साकारण्यासाठी स्थानिक भाषांमध्ये, मातृभाषांमध्ये शिक्षण देण्याचा विचार एनईपीमध्ये मांडण्यात आला आहे. आता उच्च शिक्षणात  'शिक्षणासाठी' स्थानिक भाषा हा देखील एक पर्याय असेल. मला आनंद आहे की 8 राज्यांतील 14 अभियांत्रिकी महाविद्यालये, 5 भारतीय भाषा- हिंदी, तामिळ,तेलुगु, मराठी  बंगाली या 5 भारतीय भाषांमधून अभियांत्रिकी शिक्षण सुरु  करणार आहेत.  अभियांत्रिकी शिक्षणातील अभ्यासक्रम 11 विविध भारतीय भाषांमध्ये भाषांतरित करणारे एक साधन देखील विकसित करण्यात आले आहे. प्रादेशिक भाषांमध्ये आपले शिक्षण सुरु करणाऱ्या विद्यार्थी-विद्यार्थिनींचे मला   विशेष अभिनंदन करायचे आहे. याचा सर्वात जास्त लाभ देशातल्या  गरीब , गावे -खेड्यांमध्ये राहणाऱ्या मध्यम वर्गातील विद्यार्थ्यांना, दलित-मागास आणि  आदिवासी बंधू भगिनींना होईल. या कुटुंबातून आलेल्या मुलांना सर्वात जास्त भाषेच्या अडचणीचा सामना करावा लागत होता, सर्वात जास्त नुकसान याच कुटुंबांमधील हुशार मुलांना सोसावे लागत होते. मातृभाषेत शिक्षणामुळे गरीब मुलांचा आत्मविश्वास वाढेल, त्यांचे  सामर्थ्य आणि  प्रतिभेला न्याय मिळेल.

मित्रांनो ,

प्रारंभिक शिक्षणात देखील मातृभाषेला प्रोत्साहित करण्याचे काम सुरु झाले आहे. आज जो  'विद्या प्रवेश' कार्यक्रम सुरु करण्यात आला आहे, त्याचीही यात खूप मोठी भूमिका आहे.  प्ले स्कूलची जी संकल्पना आतापर्यंत केवळ मोठया शहरांपुरती मर्यादित आहे,   'विद्या प्रवेश' च्या माध्यमातून ती आता दुर्गम भागातील शाळांपर्यंत पोहचेल, गावागावांमध्ये जाईल. हा कार्यक्रम आगामी काळात सार्वत्रिक कार्यक्रम म्हणून लागू होईल आणि राज्ये देखील आपापल्या गरजांनुसार त्याची अंमलबजावणी करतील. म्हणजेच देशातील कुठल्याही भागात मुले श्रीमंत असो व गरीब , त्यांचे शिक्षण हसतखेळत होईल, सहज होईल या दिशेने हा प्रयत्न आहे. आणि सुरुवात हसतखेळत झाली की पुढे यशाचा मार्ग देखील सहज साध्य होईल.

मित्रांनो ,

आज आणखी एक  काम झाले आहे जे माझ्या जिव्हाळ्याचे आहे, खूप संवेदनशील आहे. आज देशात  3 लाखांपेक्षा अधिक मुले अशी आहेत ज्यांना शिक्षणासाठी सांकेतिक भाषेची गरज भासते. हे लक्षात घेऊन भारतीय सांकेतिक भाषेला देखील प्रथमच भाषा विषयाचा दर्जा देण्यात आला आहे. आता विद्यार्थी एक भाषा म्हणून ती शिकू शकतील.  या निर्णयामुळे भारतीय सांकेतिक भाषेला चालना मिळेल आणि आपल्या दिव्यांग मित्रांना खूप मदत  होईल. 

मित्रांनो ,

तुम्हाला माहितच आहे की कोणत्याही विद्यार्थ्याच्या संपूर्ण शिक्षणात , त्याच्या आयुष्यात त्याचे शिक्षक हे खूप मोठी प्रेरणा असतात. आपल्याकडे तर म्हटलेच आहे -

 

गुरौ न प्राप्यते यत् तत्,

न अन्य अत्रापि लभ्यते।

अर्थात, जे गुरूकडून  प्राप्त होऊ शकत नाही ते कुठेच प्राप्त होऊ शकत नाही. म्हणजेच असे काही नाही जे एक उत्तम गुरु, उत्तम शिक्षक मिळाल्यानंतर  दुर्लभ असेल. म्हणूनच  राष्ट्रीय शिक्षण धोरणाच्या आखणीपासून अंमलबजावणी पर्यंत प्रत्येक टप्प्यात आपले शिक्षक सक्रियपणे या अभियानाचा भाग आहेत. आज सुरु करण्यात आलेला  ‘निष्ठा' 2.0 हा कार्यक्रम देखील याच दिशेने  एक महत्वपूर्ण  भूमिका पार पाडेल. या कार्यक्रमाच्या माध्यमातून देशातील शिक्षकांना आधुनिक गरजांनुसार प्रशिक्षण देखील मिळेल आणि ते विभागाकडे आपल्या सूचना देखील पाठवू शकतील. माझी तुम्हा सर्व शिक्षकांना, शिक्षण 

 

तज्ञांना विनंती आहे की या प्रयत्नांमध्ये सक्रिय भाग घ्या, जास्तीत जास्त योगदान द्या. तुम्हा सर्वांना शिक्षण क्षेत्रातला एवढा अनुभव आहे, गाढा अनुभव आहे, म्हणूनच जेव्हा तुम्ही प्रयत्न कराल तेव्हा तुमचे प्रयत्न राष्ट्राला खूप पुढे घेऊन जातील.  मला वाटते की सध्याच्या काळात आपण ज्या भूमिकेत आहोत , आपण भाग्यवान आहोत कारण एवढ्या मोठ्या बदलांचे आपण साक्षीदार बनत आहोत , या बदलांमध्ये सक्रिय भूमिका पार पाडत आहोत. देशाचे भविष्य घडवण्याची, भविष्याची रूपरेषा आपल्या हाताने आखायची ही सोनेरी संधी  तुमच्या आयुष्यात आली आहे. मला विश्वास आहे की यापुढील काळात जसजशी राष्ट्रीय शिक्षण धोरणाची वैशिष्ट्ये प्रत्यक्षात साकारतील , आपल्या देशाला एका नव्या युगाचा साक्षात्कार होईल. जसजसे आपण आपल्या युवा पिढीला एका आधुनिक आणि राष्ट्रीय शिक्षण व्यवस्थेशी जोडत जाऊ , देश स्वातंत्र्याचे अमृत संकल्प सिद्धीस नेत जाईल. याच शुभेच्छांसह मी माझे भाषण थांबवतो. तुम्ही सगळे तंदुरुस्त रहा, आणि नव्या ऊर्जेने पुढे जात रहा. खूप खूप  धन्यवाद।