नमस्ते। मैं तय नहीं कर पा रहा हूं कि किस विषय पर बोलूं और आप क्या सुनना चाहते होंगे. फिजी की यह मेरी पहली मुलाकात है, और भारत की प्रधानमंत्री की 33 साल के बाद मुलाकात है। यहां के जीवन में ऐसे कई मूल्य हैं जो हमें और भारत को जोड़ते हैं और यह भारत का भी दायित्व बनता है और फिजी का भी दायित्व बनता है कि हम उन मूल्यों को जितना अधिक बढ़ावा दें, उन मूल्यों को जितनी अधिक ताकत दें, उतना हमारी विशालता में भी फर्क पड़ेगा और हमारी ताकत में भी बढ़ोतरी होगी।

लोकतंत्र। Democracy. आज दुनिया में उसका जो मूल्य है, उसको जो महत्म्य है, किसी न किसी रूप में दुनिया के सभी देश लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ने के लिए मजबूर हुए हैं। कुछ लोग चाहते हुए करते होंगे, कुछ लोग मजबूरन करते होंगे, लेकिन आज विश्व में एक वातावरण बना है कि अगर वैश्विक प्रवाह में हमें अपनी जगह बनानी है तो लोकतंत्र दुनिया के साथ जुड़ने का एक सबसे सरल रास्ता बन गया है। फिजी ने बहुत उतार-चढ़ाव देखें हैं, लेकिन एक खुशी की बात है कि कुछ महीने पहले लोकतांत्रिक ढंग से आपने अपनी सरकारी चुनी है। फिर एक बार फिजी ने लोकतंत्र में अपनी आस्था प्रकट की है और जब फिजी लोकतंत्र में आस्था प्रकट करता है, तब वो सिर्फ फिजी तक समिति नहीं रहता है। लोकतंत्र एक ऐसी ताकत है जो फिजी को विश्व के लोकतांत्रिक फलक पर उसकी जगह बना देता है, और लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है, जहां हर एक को अपना जीवन, अपना लक्ष्य, अपने इरादे, अपने सपने, उसे साकार करने का रास्ता चुनने का हक रहता है। वो अपनी जिंदगी के फैसले एक राष्ट्र के रूप में भी एक सामूहिक मन के साथ कर सकता है। अगर कोई गलती भी हो जाए तो लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है कि उस में सुधार की पूरी संभावना रहती है।

मैं आशा करूंगा कि फिजी ने जो लोकतंत्र के मार्ग को स्वीकार किया है, वो और फले-फूले-खिले। यहां का मन भी लोकतंत्रिक बने, व्यवस्थाएं भी लोकतांत्रिक बने और न सिर्फ फिजी.. इस भू-भग के और छोटे-छोटे कई टापू है, देश है, उनके जीवन पर भी फिजी की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का प्रभाव पैदा हो और मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में यहां का लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा, और अधिक सामर्थ्यवान होगा।

दुनिया में एक क्षेत्र पर आज सर्वाधिक ध्यान केंद्रित हो रहा है और वो है - ज्ञान, शिक्षा। दुनिया इस बात को मानती है कि 21वीं सदी ज्ञान की सदी है और अगर 21वीं सदी ज्ञान की सदी है, तो 21वीं सदी में जो भी आगे बढ़ना चाहता है, जो भी अपनी जगह बनाना चाहता है, वो गरीब से गरीब देश क्यों न हो, अमीर से अमीर देश क्यों न हो। ताकतवर देश क्यों न हो, लेकिन उसे भी ज्ञान अर्जित करने के मार्ग पर जाना पड़ेगा, ज्ञान के आधार पर आगे बढ़ना पड़ेगा। और ज्ञान के फलक इतने विस्तृत हो रहे हैं। पूरा ब्राह्माण ज्ञान पिपासुओं के लिए एक पूरा खुला मैदान है और पूरे ब्रह्माण की जो स्थिति है उसमें आज मनुष्य जो जानता है वेा शायद एक प्रतिशत भी नहीं जानता होगा। अभी तो और कुछ जानना बाकी है। और उसके लिए ज्ञान हो, रिचर्स हो, प्रयोग हो। इस पर जितना बल मिलता है उतना ही जीवन नई ऊंचाईयों को प्राप्त करता है और हमारी universities, हमारे शिक्षा के दान एक तो उनका रास्ता यह हो सकता है। जो किताबों में है वो परोसते चल जाए। पीढ़ी दर पीढ़ी हम देते चले जाए। हमारे दादा जो कितना पढ़ते थे, हम भी वही पढ़े और हमारे पोते जो पढ़ने वाले हैं हम भी उनके लिए छोड़ कर चले जाए। तो वो जीवन की स्थगितता होती है, एक रूकावट आ जाती है। लेकिन हर पीढ़ी आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ खोज करके जाती है, नये आविष्कार करके जाती है। कुछ नया प्राप्त करके दुनिया को देने का सामर्थ्य रखती है।

तो खोज करने वाली जो पीढ़ी है, वो क्षेत्र के लोग हैं, वो relevant बने रहते हैं, नहीं तो वो भी irrelevant हो जाते हैं। और इसलिए universities का काम रहता है कि मूलभूत तत्वों को तो जरूरत हमें पढ़ाना पड़ेगा, लेकिन मूलभूत तत्वों को पढ़ने-पढ़ाने के बाद उन्हीं मूलभूत तत्वों के आधार पर नये आविष्कार की और कैसे चला जाए? नई खोज के लिए कैसे चला जाए? मानव कल्याण की जो आवश्यकतायें है, वो आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हम क्या कर सकते है?

विश्व ने पिछले 200 साल में जितने अविष्कार किए हैं, उससे ज्यादा गत 30-40 साल में किये है। जगत पूरी तरह बदल चुका है। नये आविष्कारों ने जीवन को समेट लिया है। हम कल्पना कर सकते हैं 20 साल पहले मोबाइल फोन का क्या रोल था और आज क्या रोल है। एक information technology ने जीवन को कैसे बदल दिया। जीवन की तरफ देखने का दृष्टिकोण कैसे बदल गया, जीवन जानने के रास्ते कैसे बदल गए। एक अविष्कार पूरे युग को कैसे बदल देता है, यह हमारे सामने हुई घटना है। क्योंकि हम उस जीवन को भी जानते हैं जबकि मोबाइल फोन या connectivity नहीं थी और हम उस जीवन को भी जानते हैं जो उसके बिना जीने के लिए मुकश्किल कर देता है। उन दोनों चीजों के हम साक्षी है। अब ऐसे अवस्था के लोग हैं जो दोनों के बीच ऐसे खड़े हैं जो कल भी देखा है और आने वाले कल की संभावना भी देख रहे हैं और यही हमें प्रेरणा देती है। और इसलिए universities वो सिर्फ ज्ञान परोसने के केंद्र नहीं होते हैं, universities ज्ञान अर्जित करने के केंद्र बनते हैं, सम्बोधन करने के केंद्र बनते हैं और मुझे विश्वास है भले ही यह university नहीं हो, लेनिक यह नई university भी आने वाले दिनों में एक पूरे region के लिए, यहां की पूरी समस्याओं के लिए, सामान्य मानव के जीवन में बदलाव लाने के लिए वो कौन सा सामर्थ्य पड़ा हुआ है। जिस सामर्थ्य को तब तक हमने छुआ नहीं है, उस सामर्थ्य को कैसे छुआ जाए? और उसमें हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं, इसकी दिशा में अगर प्रयास होता है तो मैं मानता हूं कि university गया, काम सार्थक हो जाता है।

भारत में नई सरकार बनी है। अभी तो इस सरकार की उम्र छह महीने है। लेकिन भारत सिर्फ भारत के लिए नहीं जी सकता है। न ही भारत का निर्माण सिर्फ भारत के लिए बना है। हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने, महापुरूषों ने यह हमेशा कहा है कि भारत एक वैश्विक दायित्व को लेकर पैदा हुआ है। उसका जीव मात्र के लिए जगत मात्र के लिए कोई-न-काई दायित्व है। और उस दायित्व को पूरा करने के लिए उस देश को पहले सज्य होना पड़ता है। अपने आप को सामर्थ्यवान बनाना पड़ता है। भारत वो देश नहीं है कि वहां के करोड़ो-करोड़ो नागरिक भरने के लिए देश चलाया जाए। भारत वो देश है जिसने विश्व को कुछ देने की जिम्मेदारी उसके सिर पर है। वो क्या देगा, कब देगा, कैसे देगा, कौन देगा - यह तो समय ही तय करेगा। लेकिन उसका कोई वैश्विक दायित्व है इस बात में किसी को कोई आशंका नहीं है।

दुनिया कहती है कि 21वीं सदी एशिया की सदी है। और कुछ लोग कहते हैं कि एशिया में.. कुछ लोगों को लगता है कि चीन की सदी है। किसी को लगता है कि हिंदुस्तान की सदी है। लेकिन इस बात में किसी को कोई दुविधा नहीं है कि 21वीं सदी एशिया की सदी है। अगर 21वीं सदी ज्ञान की सदी है, और 21वीं सदी एशिया की सदी है तो फिर तो भारत की जिम्मेदारी और बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन क्योंकि जब-जब मानवजात ने ज्ञान युग में प्रवेश किया है तब-तब भारत विश्व गुरु के स्थान पर रहा है। पूरा पाँच हजार साल का इतिहास देखा जाए। सोने की चिडि़या कहलाता था। ज्ञान युग - उसका नेतृत्व हमेशा भारत ने किया है। शायद बाहुबल में वो काम नहीं आया होगा, धनबल में भी काम नहीं आया होगा, लेकिन जब ज्ञान के बल के सामर्थ्य की बात आती है तो भारत हमेशा आगे निकल चुका है। और इसलिए भारत का दायित्व बनता है कि वो ज्ञान के माध्यम से और नई विधाओं का आविष्कार करके दुनिया के सामने अपनी ताकत को दिखाए। और भारत में सामर्थ्य है। तभी भारत ने मंगलयान में सफलता प्राप्त की। कुछ लोगों को लगता होगा कि भई लोग चंद्र पर जा रहे हैं अब मंगल पर गए उसमें क्या है, लेकिन पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुंचने वाले हम अकेले हैं। और आज diesel और petrol के दाम इतने है कि एक किलोमीटर कहीं जाना है तो कम से कम दस रुपये खर्चा होता है। हमें मंगलयान पहुंचने में एक किलोमीटर का सिर्फ सात रुपया खर्चा हुआ है।

यह संभव इसलिए होता है कि युवा शक्ति में सामर्थ्य है और भारत ने इसे एक सौभाग्य भी माना है, एक जिम्मेवारी भी मानी है और एक अवसर भी माना है। सौभाग्य यह है कि हम उस युग के अंदर है, जबकि दुनिया में हिंदुस्तान सबसे जवान है। 65% जनसंख्या हिंदुस्तान की 35 साल से कम उम्र की है। जिस देश में 800 मिलियन लोग जो 35 साल से कम उम्र के हैं, जबकि सारी दुनिया में सबसे ताकतवर देश भी बूढ़े होते चले जा रहे हैं, तो यह एक अवसर है, पूरे मानव जात की सेवा करने के लिए हिन्दुस्तान के नौजवान के पास अवसर है। उसे अपने आप को सज्य करना होगा। और हमारी सरकार का प्रयास यह है कि हमारी युवा शक्ति को अवसर दें। और इसमें बहुत बड़ा अभियान चलाया है - Skill India. दुनिया को जो work force की जरूरत है उस प्रकार का Human Resource Development कैसे हो, Skill Development कैसे हो? हर भुजा में हुनर कैसे हो? ताकि वो दुनिया को कुछ-न-कुछ दे सके। और ये हुनर ही तो है जिसके कारण सदियों पहले भारतीय दुनिया के कोने-कोने में पहुंचे थे - आपके पूर्वज Fiji भी तो आए थे।

वो हुनर, वो सामर्थ्य, विश्व के आवश्यकताओं के अनुसार हो हुनर। विश्व पर बोझ बनने के लिए नहीं। विश्व के भले-भलाई के लिए इस युवा शक्ति को Skill Development के माध्यम से सजय करना, जोड़ना, उसका एक Global Exposure बने। उसका सोचने का दायर Global बने। वे वैश्विक परिवेश में सोचने लगे। वे वैश्विक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने आप को सज्य करने के लिए आतुर हो। ऐसी एक व्यवस्था को बनाने का प्रयास हमने प्रारंभ किया है, और मुझे पूरा भरोसा है कि ये जिम्मेदारी हिन्दुस्तान निभाएगा। दुनिया की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत इस काम को कर पाएगा।

एक जमाना था शिक्षा का महत्व था। अक्षर ज्ञान का महत्व था। पढ़ने-पढ़ाने का महत्व था। लेकिन वो युग बहुत पीछे रह गया है। आज कितने ही पढ़े-लिखे क्यों न हों, लेकिन अगर आप Information Technology और Computer से अनभिज्ञ हैं, अगर आपको अज्ञान है, तो कोई आपकों शिक्षित मानने को तैयार नहीं है। परिभाषा बदल गई है। और ये नई Technology की गति इतनी तेज है कि अगर आप Computer पर काम कर रहे हैं और अगर आपकी माता जी देखें, या दादी मां देखे, तो गर्व करें, कि “वाह बेटा तूझे इतना कुछ सारा आता है! कैसे करते हो?” लेकिन अगर आपका दस साल का पोता देख ले तो कहता है “क्या दादा! आपको कुछ नहीं आता है!” ये इतना अंतर है दो पीढ़ी में कि जिस काम के लिए आपकी दादी मां गर्व करती है कि मेरा पोता बहुत अच्छा जानता है, उसी व्यक्ति को उसी काम करता हुआ देख करके पोता कहता है कि “दादा तुम्हें कुछ नहीं आता है। आप अनपढ़ हो।“

आप कल्पना कर सकते हैं तीन पीढ़ी मौजूद हों तब कितने दायरे में ज्ञान विज्ञान और technology ने कितना बड़ा दायरा बदल दिया है। और तब जा करके, हम उससे अछूते नहीं रह सकते हैं। एक समय था गरीब और अमीर के बीच की खाई की चर्चा हुआ करती थी। Haves and have-nots की चर्चा हुआ करती दुनिया के अंदर। आने वाले उन दिनों में चर्चा होने वाली है Digital Divide की। और पूरा विश्व अगर Digital Divide का शिकार बन गया, तो जो पीछे रह गया है उसको आगे जाने में दम उखड़ जाएगा। और इसलिए कैसे भी करके दुनिया को इस Digital Divide के संकट से बचाना पड़ेगा। भारत ने कोशिश की है - Digital India का सपना देखा है। जैसे एक सपना देखा Skill India, दूसरा सपना देखा है Digital India. आधुनिक से आधुनिक विज्ञान, आधुनिक से आधुनिक टेक्नोलॉजी उसकी वहां अंगुलियां पर होनी चाहिए। वो सामर्थ्य में से होना चाहिए।

और भारतवासियों के संबंध में लोगों का देखने का दृष्टिकोण बहुत अलग है। मुझे एक घटना बराबर स्मरण आती है। मैं एक बार Taiwan गया था। Taiwan में जो उनका interpreter था, वो Computer Engineer था। और मेरी कोई वहां 7-8 दिन की वहां tour थी, तो मेरे साथ रहता था। वो Taiwanese Chinese language जो लोग उपयोग करते है, वह बोलता है तो मुझे वह interpret करता था, वही काम करता था। 24 घंटों मेरे साथ रहता था, तो धीरे-धीरे दोस्ती हो गई। दोस्ती हो गई तो एक दिन फिर हिम्मत करके उसने मुझसे पूछा, आखिर दिनों में, कि “मैं आपके एक बात पूंछू? आपको बुरा नहीं लगेगा न?”

मैंने कहा, “नहीं नहीं आप पूछिए।“

“नहीं-नहीं, आपको बुरा लग जाएगा।“

बेचारा संकोच कर रहा था पूछ नहीं रहा था। मैंने कहा “बताइए न क्या पूछना है?”

उसने कहा कि “हमने सुना है, पढ़ा है, कि हिन्दुस्तान तो जादू टोना करने वालों लोगों का देश है। Black Magic वालों का देश है। सांप-सपेरों का देश है।“

बोला “सचमुच में ऐसा देश है?”

मैंने कहा “मुझे देखकर क्या लगता है? मैं तो कोई जादू-वादू तो करता नहीं हूं।“

उसने कहा “नहीं, आपको देखने के बाद ही मन करता है कि पूंछू कि क्या है”

मैंने कहा “तुम्हारा सवाल सही है। एक ज़माना था, हमारे पूर्वज सांप-सपेरे की दुनिया में जीते थे। लेकिन अब हमारा बड़ा devaluation हो गया है। अब हमारे में वो सांप वाली ताकत रही नहीं। और इसलिए हम अब mouse से खेलते हैं।“

और हिन्दुस्तान का नवजान mouse पर उंगली दबार कर दुनिया को हिलाने की ताकत रखता है आज – ये सामर्थ्य हमने पैदा किया है। ये नया Digital World है। उसमें भारत के नवजानों ने अपना कमाल दिखाई है। लेकिन इतने से ही सीना तानकर रहने से काम नहीं चलने वाला है। हमने आने वाली शताब्दी के अनुसार को सज्य करना होगा, और वो हम अगर कर पाते हैं तो और नई ऊंचाईयों को पार करना होगा। और वो हम अगर कर पाते हैं तो हम विश्व को बहुत कुछ दे सकते हैं। हमारा प्रयास उस दिशा में है। हमने एक ऐसा अभियान चलाया है जो यहां हिन्दुस्तान के लोग रहते हैं उनकों जरूर मन को पसंद आया होगा। और वो है स्वच्छता का अभियान. Cleanliness. आपके बच्चें हिन्दुस्तान आने की बात होती होगी तो कहते होंगे "नहीं!" उनका नाक सिकुड जाता होगा। हम ऐसा देश बनाएंगे, आपके बच्चों को वहां आने का मन कर जाए। उसको नाक सिकुड़ने की इच्छा नहीं होगी। उसको आने का मन कर जाएगा ऐसा देश बनाना है। और उस दिशा में प्रयास कर रहे हैं।

आज सुबह में आया, यहां के सरकार ने बहुत ही स्वागत किया सम्मान किया। हमने कुछ घोषणाएं की हैं, कुछ निर्णय किए हैं। एक तो भारत की तरफ दुनिया का बहुत ध्यान है सारी दुनिया भारत की तरफ देख रही है - जाना चाहती हैं आना चाहती हैं। लेकिन आपको कभी-कभी लगता होगा कि अस्पताल जाना अच्छा है, embassy जाना बुरा है। मैं भले ही Fiji में पहली बार आया हूं, लेकिन आपकी पीड़ा का मुझे पता रहता है। लेकिन आप सज्जन लोग हैं इसलिए शिकायत करते नहीं हैं।

हमने निर्णय किया है, कि अब फिजी से और यह Pacific महासागर के टापूओं से आने वाले लोगों के लिए Visa-On-Arrival. बाते छोटी-छोटी होती है, लेकिन वो ही बदलाव लाती है। और उस दिशा में हम काम कर रहे हैं।

आज भारत ने यह भी कहा है कि फिजी मैं Small or Medium Level की जो industries हैं, उनको upgrade करने के लिए Five Million American Dollar फिजी को हम देंगे। फिजी के नागरिकों को भारत scholarships देती है, यहां के students को, यहां के Trainees को - हमने निर्णय किया है कि वो संख्या अब double कर दी जाएगी।

जो समुद्री तट पर रहने वाले देश हैं। भारत के पास भी बहुत बड़ा समुद्री तट है और जब Global Warming की चर्चा होती है तो समुद्री तट पर रहने वाले सबसे ज्यादा चिंतित होते हैं और कभी पढ़ ले Nostradamus की आघाई तो उनको तो कल ही दिखता है, कल ही डूबने वाला है। और कभी अख़बार में आ जाता है कि दो मीटर समुद्र चढ़ जाने वाला है और कभी तीन मीटर, तो वो सोचता है कि मेरा घर तो दूर ले जाओ भाई। एक बहुत बड़ा तनाव रहता है। और उसमें भी एक बार ज्यादा ही waves में उछाल आया तो यार लगता है कि अब तो आया, मौत सामने दिखती है। Global Warming की चिंता है। दुनिया को चिंता है। और ऐसी जगह पर रहने वालों को ज्यादा चिंता है। भारत भी उसमें से एक है। इसकी समस्या का समाधान खोजना पड़ेगा। हमारी जीवनशैली को बदलना पड़ेगा। Exploitation of the nature - यह crime है यह हमें स्वीकार करना पड़ेगा। Milking of nature - इतना ही मनुष्य को अधिकार है। Exploitation of the nature - मनुष्य को अधिकार नहीं है। तो जो बिगड़ा सो बिगड़ा, लेकिन आगे न बिगाड़े - यह जिम्मेवारी हमने निभानी होगी। पूरे विश्व को निभानी होगी। लेकिन जो बिगड़ा है उसको भी बनाने की कोशिश करनी होगी। और इसलिए इस बार हमने तय किया है - One million American dollar से एक Adaption Fund के रूप में एक fund बनाया जाएगा, ताकि इस भू-भाग में Technologically upgradation करके इस Global Warming के दु:भाव से कैसे बचा जा सके, यहाँ के जीवन को कैसे रक्षा मिले, उस दिशा में काम करने का हमने निर्णय किया है।

Global Warming की चर्चा करता हैं तो energy एक ऐसा क्षेत्र है, जहां सबसे ज्यादा चिंता का विषय रहता है। और उसके लिए हमने तय किया है कि renewal energy हो, solar energy हो, wind energy हो, इसकी generation के लिए, इस प्रोजेक्ट को करने के लिए 70 Million American dollar का line of credit देने का।

फिजी की Parliament की Library आधुनिक बने, E-Library बने, उसकी जिम्मेवारी भी भारत लेगा ताकि, हां, उस Library का उपयोग हर कोई कर सके।

यहां राजदूत भवन बनाने का सोचा है। आप लोग मिलकर देखिए, बनाइये, हम लोग आपके साथ रहेंगे।

तो कई ऐसी बाते हैं जिसको ले करके हम देश को नई ऊंचाईयों पर ले जाने का प्रयास... और वो मोदी नहीं कर रहा है, यह सवा सौ करोड़ देशवासी कर रहे हैं। हर हिंदुस्तानी के मन में जज्बा पैदा हुआ है - उसको लगता है “नहीं, मेरा देश ऐसा नहीं रहना चाहिए” । और कभी कभी तो लगता है कि लोग बहुत आगे है, सरकार बहुत पीछे है। लेकिन जिस तेज गति से आज देश चल पड़ा है। वो चलता रहेगा और भारत लोकतांत्रिक मूल्य के कारण, वसुधैव कुटुंभकम की भावना के कारण “सर्वे भवंतु सुखीना, सर्वे संतु निरमाहया” यह भाव के कारण, जिसकी सोच, जिसके विचार-आचार में यह चिंतन पडा है, वो अगर ताकतवर होता है, तो फिजी का भी भला होता है, इस उपखंड का भी भला होता है, मानवजाति का भी भला होता है। हरेक की भलाई में काम आने वाला देश बन सकता है। तो मैंने प्रारंभ में कहा था – वैश्विक दायित्व को निभाने के लिए राष्ट्र को तैयार होना चाहिए। और जिस दिशा में दुनिया जा रहा रही है, उसमें लगता है कि भारत मूलभूत चिंतन के द्वारा विश्व की बहुत बड़ी सेवा कर सकता है। और उस दिशा में काम करने का प्रयास चल रहा है।

मुझे आप सब के बीच आने का अवसर मिला। मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं। university को मैं मेरी शुभकामनाएं देता हूं। मैं चाहूंगा कि यहां से भी ऐसे रत्न पैदा हो, जो पूरी मानवजात की सेवा करने का सामर्थ्य रखते हो - ऐसी यहां की शिक्षा- दीक्षा बने।

बहुत-बहुत शुभकमानाएं।

धन्यवाद।

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മുൻ രാഷ്ട്രപതി ശ്രീ രാംനാഥ് കോവിന്ദിന്റെ ആത്മകഥയുടെ പ്രകാശന ചടങ്ങിൽ പ്രധാനമന്ത്രി നടത്തിയ അഭിസംബോധനയുടെ മലയാളം പരിഭാഷ
August 12, 2026
ഇന്ന് ശ്രീ രാം നാഥ് കോവിന്ദ് ജിയുടെ ആത്മകഥ പ്രകാശനം ചെയ്യാൻ നമുക്ക് അവസരം ലഭിച്ചു; ഈ പരിപാടിയുടെ ഭാഗമാകാൻ കഴിഞ്ഞതിൽ എനിക്ക് സന്തോഷമുണ്ട്: പ്രധാനമന്ത്രി
പൊതുസേവനത്തിനും നമ്മുടെ രാജ്യത്തിന്റെ പുരോഗതിക്കുമായി അർപ്പിച്ച ഒരു ജീവിതത്തെ അദ്ദേഹത്തിൻ്റെ യാത്ര പ്രതിഫലിപ്പിക്കുന്നു: പ്രധാനമന്ത്രി
കോവിന്ദ് ജിയുമായുള്ള എന്റെ ദീർഘകാല ബന്ധവും എന്നോടുള്ള അദ്ദേഹത്തിന്റെ പ്രത്യേക സ്നേഹവാത്സല്യവും ഊഷ്മളതയും എന്റെ ഏറ്റവും വലിയ സമ്പത്താണ്: പ്രധാനമന്ത്രി
ഏറ്റവും പാവപ്പെട്ടവർക്കും പാർശ്വവൽക്കരിക്കപ്പെട്ടവർക്കും ഏറ്റവും ഉയർന്ന നിലയിലെത്താൻ അവസരം ലഭിക്കുന്ന ഒരു പുതിയ ഇന്ത്യ കെട്ടിപ്പടുക്കാനാണ് മഹാത്മാഗാന്ധി, ബാബാസാഹേബ് അംബേദ്കർ, ജ്യോതിബ ഫൂലെ, സാവിത്രിബായ് ഫൂലെ എന്നിവർ സ്വപ്നം കണ്ടത്: പ്രധാനമന്ത്രി
കോവിന്ദ് ജിയെപ്പോലുള്ള വ്യക്തികൾ തങ്ങളുടെ കഠിനാധ്വാനത്തിലൂടെയും പ്രാപ്തിയിലൂടെയും സ്വന്തം ജീവിതം മാറ്റിയെഴുതുക മാത്രമല്ല ചെയ്തത്, നൂറ്റാണ്ടുകൾ പഴക്കമുള്ള ആ സ്വപ്നവും ദർശനവും സാക്ഷാത്കരിക്കുന്നതിൽ പ്രധാന പങ്ക് വഹിക്കുകയും ചെയ്തിട്ടുണ്ട്: പ്രധാനമന്ത്രി
രാഷ്ട്രപതി സ്ഥാനത്തുനിന്ന് വിരമിച്ച ശേഷവും അദ്ദേഹം 'ഒരു രാജ്യം, ഒരു തിരഞ്ഞെടുപ്പ്' എന്ന വിഷയത്തിൽ പ്രവർത്തിക്കുകയാണ്; ഇതിന്റെ പ്രമേയത്തിന് ജനാധിപത്യത്തിൽ ഒരു പുതിയ അധ്യായം കുറിക്കാൻ കഴിയും: പ്രധാനമന്ത്രി

നമ്മുടെ മുൻ രാഷ്ട്രപതി ശ്രീ രാംനാഥ് കോവിന്ദ് ജി, ലോക്‌സഭാ സ്പീക്കർ ശ്രീ ഓം ബിർള ജി, ശ്രീമതി സവിതാ കോവിന്ദ് ജി, സദസ്സിലിരിക്കുന്ന എല്ലാ മുതിർന്ന വ്യക്തിത്വങ്ങളേ - എല്ലാവരുടെയും പേരുകൾ എടുത്തുപറയാൻ കഴിഞ്ഞെന്നു വരില്ല, എങ്കിലും ഇതൊരു കുടുംബ സംഗമം പോലെ തോന്നുന്നതിൽ എനിക്ക് വലിയ സന്തോഷമുണ്ട്.

സഹോദരീസഹോദരന്മാരേ,

ഇന്ന് ശ്രീ രാംനാഥ് കോവിന്ദ് ജിയുടെ ആത്മകഥ പ്രകാശനം ചെയ്യുന്നതിനായി നാം ഒത്തുചേർന്ന സന്ദർഭമാണ്. ഈ ചടങ്ങിൽ പങ്കാളിയാകാനുള്ള ഭാഗ്യം എനിക്കും ലഭിച്ചതിൽ സന്തോഷമുണ്ട്. കോവിന്ദ് ജിയുമായി എനിക്ക് ദീർഘകാലത്തെ ബന്ധമുണ്ട്; അദ്ദേഹത്തെ അടുത്തറിയാനും രാഷ്ട്രപതി എന്ന നിലയിൽ അദ്ദേഹത്തിന്റെ മാർഗ്ഗനിർദ്ദേശം സ്വീകരിക്കാനും ഇതോടൊപ്പം അദ്ദേഹത്തിന്റെ പ്രത്യേക സ്നേഹത്തിനും വാത്സല്യത്തിനും പാത്രമാകാനും എനിക്ക് അവസരം ലഭിച്ചു - ഇത് എൻ്റെ ജീവിതത്തിലെ വലിയൊരു നിധിയാണ്. അദ്ദേഹത്തിന്റെ ജീവിതത്തെക്കുറിച്ച് ഞാൻ മനസ്സിലാക്കിയതിൽ നിന്നും അദ്ദേഹത്തിന്റെ കഴിവുകളെക്കുറിച്ച് ഞാൻ കണ്ടതിൽ നിന്നും ശ്രീ രാംനാഥ് കോവിന്ദ് ജിയുടെ ആത്മകഥ ഇന്ത്യൻ ജനാധിപത്യത്തിനും ഇന്ത്യൻ സമൂഹത്തിനും ഒരു പൈതൃകമായി മാറുമെന്ന് എനിക്ക് പൂർണ്ണ ആത്മവിശ്വാസത്തോടെ പറയാൻ കഴിയും. അദ്ദേഹത്തിന്റെ ജീവിതയാത്ര, സമൂഹത്തിനും രാജ്യത്തിനും നൽകിയ സംഭാവനകൾ - ഇതേക്കുറിച്ച് സംസാരിക്കാൻ ഒരുപാട് കാര്യങ്ങളുണ്ട്, എന്നാൽ ഒരു പുസ്തക പ്രകാശന ചടങ്ങിൽ ഒരു "കർട്ടൻ റൈസർ" മാത്രമേ നൽകാവൂ. പുസ്തകത്തിന്റെ പൂർണ്ണമായ പ്രയോജനം ലഭിക്കുന്നതിന് നിങ്ങൾ അത് മുഴുവനായും വായിക്കണം.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

കോവിന്ദ് ജിയുടെ ജീവിതയാത്ര അദ്ദേഹത്തിന്റെ തന്നെ വാക്കുകളിൽ അറിയാനും അദ്ദേഹത്തിന്റെ എഴുത്തുകളും അനുഭവങ്ങളും വായിക്കാനും സാധിക്കുന്നത് പുതിയ തലമുറയ്ക്ക് ഒരുപാട് കാര്യങ്ങൾ പഠിക്കാൻ അവസരമൊരുക്കും. ഈ ആത്മകഥയുടെ പേരിൽ ശ്രീ രാംനാഥ് കോവിന്ദ് ജിയെ ഞാൻ ഹൃദയപൂർവ്വം അഭിനന്ദിക്കുന്നു.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

കോവിന്ദ് ജി തന്റെ പുസ്തകത്തിന് വളരെ അനുയോജ്യമായ ഒരു തലക്കെട്ടാണ് നൽകിയിരിക്കുന്നത് - "ട്രയംഫ് ഓഫ് ദി ഇന്ത്യൻ റിപ്പബ്ലിക്: മൈ ലൈഫ്, മൈ സ്ട്രഗിൾസ്" (ഇന്ത്യൻ റിപ്പബ്ലിക്കിന്റെ വിജയം: എന്റെ ജീവിതം, എന്റെ പോരാട്ടങ്ങൾ). ജീവിതവും അതിലെ പോരാട്ടങ്ങളും വ്യക്തിപരമാണ്, എന്നാൽ ആ പോരാട്ടങ്ങളിൽ നിന്നുണ്ടായ വിജയങ്ങൾ ഇന്ത്യൻ റിപ്പബ്ലിക്കിനും ഇന്ത്യൻ ജനാധിപത്യത്തിനും അവകാശപ്പെട്ടതാണ് എന്നതാണ് ഇതിന്റെ അർത്ഥം.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

മനുഷ്യസഹജമായ ഒരു രീതി നമ്മൾ പലപ്പോഴും കാണാറുണ്ട്; വിജയങ്ങളുടെ ക്രെഡിറ്റ് ആളുകൾ സ്വന്തമായി എടുക്കുകയും ബുദ്ധിമുട്ടുകൾക്ക് സമൂഹത്തെ കുറ്റപ്പെടുത്തുകയും ചെയ്യും. എന്നാൽ ഹൃദയം ഉദാരമായിരിക്കുമ്പോൾ ഭാരതീയ മൂല്യങ്ങൾ ഉള്ളിലുണ്ടാകുമ്പോൾ ഒരാൾ സമൂഹത്തിൽ കുറ്റങ്ങൾ കണ്ടെത്തുന്നതിനായി സമയം കളയില്ല. അവൻ നല്ല വശങ്ങളിൽ ശ്രദ്ധ കേന്ദ്രീകരിക്കുകയും തന്റെ വിജയത്തിൽ സമൂഹത്തെയും തുല്യ പങ്കാളിയാക്കുകയും ചെയ്യുന്നു. കോവിന്ദ് ജിയുടെ ആത്മകഥയും അതിന്റെ തലക്കെട്ടും ഇതിന് ഉദാഹരണങ്ങളാണ്. അദ്ദേഹത്തിന്റെ ജീവിതം നോക്കൂ - കാൺപൂർ ദെഹാതിലെ വളരെ സാധാരണമായ ഒരു കുടുംബത്തിൽ ജനിച്ചു. ഒരു വേനൽക്കാലത്ത് തന്റെ വീട്ടിൽ തീപിടുത്തമുണ്ടായതിനെക്കുറിച്ച് അദ്ദേഹം പുസ്തകത്തിൽ വിവരിക്കുകയും എഴുതുകയും ചെയ്തിട്ടുണ്ട്. അദ്ദേഹത്തിന്റെ അമ്മ, സ്വന്തം സുരക്ഷ പോലും മറന്ന്, വീട്ടുസാധനങ്ങൾ സംരക്ഷിക്കാൻ ശ്രമിച്ചു. ഒരു സാധാരണ കുടുംബത്തിലെ അമ്മയെ സംബന്ധിച്ചിടത്തോളം ഓരോ സാധനങ്ങളും തന്റെ മക്കളെ വളർത്താനുള്ള മാർഗ്ഗമാണ്. ആ ശ്രമത്തിനിടയിൽ, അവർ തീയിൽ പെട്ടുപോകുകയും മരണപ്പെടുകയും ചെയ്തു. സങ്കൽപ്പിച്ചു നോക്കൂ - അത്രയും ചെറുപ്പത്തിൽ തന്നെ അമ്മയെ ഈ രീതിയിൽ നഷ്ടപ്പെടുന്നത് എത്രത്തോളം വേദനാജനകമായിരുന്നിരിക്കും. എൻ്റെ അമ്മയ്ക്ക് 100 വയസ്സിലധികം ജീവിക്കാനും എന്നെ അനുഗ്രഹിക്കാനും കഴിഞ്ഞത് എൻ്റെ ഭാഗ്യമാണ്. എങ്കിൽപ്പോലും അവരുടെ അസാന്നിധ്യം എനിക്ക് ഇപ്പോഴും അനുഭവപ്പെടുന്നുണ്ട്.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

വേദനാജനകമായ ഈ സംഭവം ആരെയും തളർത്തിക്കളയുമായിരുന്നു, എന്നാൽ ഇത് കോവിന്ദ് ജിയെ കൂടുതൽ ശക്തനാക്കുകയാണ് ചെയ്തത്. അയൽപക്കത്തെ ഒരു അമ്മയാണ് അദ്ദേഹത്തെ വളർത്താൻ സഹായിച്ചത്. ഇതിൽ നിന്ന് സാമൂഹിക ഐക്യത്തിന്റെയും സൗഹാർദ്ദത്തിന്റെയും ശക്തി അദ്ദേഹം മനസ്സിലാക്കി. ഈ സംഭവത്തിനു ശേഷം, അദ്ദേഹത്തിന്റെ പിതാവിന്റെ പങ്ക് കൂടുതൽ വലുതായി. പിതാവ് കുടുംബത്തെ നയിച്ച രീതി, മക്കൾക്ക് നൽകിയ മൂല്യങ്ങൾ - അതുകൊണ്ടാണ് കോവിന്ദ് ജി തന്റെ പിതാവിനെ സ്വന്തം നായകനായി കാണുന്നത്.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

കുട്ടിക്കാലത്തെ ഈ പോരാട്ടങ്ങൾക്കിടയിലും കോവിന്ദ് ജി വിദ്യാഭാസത്തെ തന്നെത്തന്നെ ശക്തനാക്കാനുള്ള വഴിയാക്കി മാറ്റി. അദ്ദേഹം കഠിനാധ്വാനം ചെയ്തു, വിഭവങ്ങളുടെ ലഭ്യതക്കുറവിനെ ഒരു ബലഹീനതയാകാൻ അനുവദിച്ചില്ല. അങ്ങനെ അന്ന് ആളുകൾക്ക് സങ്കൽപ്പിക്കാൻ പോലും കഴിയാതിരുന്ന ഒരു ഉയരത്തിലേക്ക് അദ്ദേഹം എത്തിച്ചേർന്നു - ഇന്ത്യയെപ്പോലുള്ള ഒരു വലിയ രാജ്യത്തിന്റെ രാഷ്ട്രപതിയായി അദ്ദേഹം മാറി.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

അത്രയും ഉയർന്ന പദവിയിൽ എത്തിച്ചേർന്നിട്ടും, കോവിന്ദ് ജിയുടെ വിനയം നിറഞ്ഞ വ്യക്തിത്വത്തിനും ലാളിത്യത്തിനും ഒരു മാറ്റവും വന്നില്ല. ഞാൻ ഓർക്കുന്നു, പ്രധാനമന്ത്രി എന്ന നിലയിൽ ഞാൻ രാഷ്ട്രപതി ഭവനിൽ അദ്ദേഹത്തെ കാണാൻ പോകുമ്പോൾ, അദ്ദേഹം പ്രോട്ടോക്കോളിനും അപ്പുറത്തുള്ള കാര്യങ്ങൾ ചെയ്യുമായിരുന്നു. പ്രധാനമന്ത്രിയെ യാത്രയാക്കാൻ അദ്ദേഹം കാറിന്റെ വാതിൽക്കൽ വരെ എത്തുമായിരുന്നു. അങ്ങനെ ചെയ്യരുതെന്ന് ഞാൻ അദ്ദേഹത്തോട് അപേക്ഷിക്കാറുണ്ടായിരുന്നു, എങ്കിലും അവസാനം വരെ അദ്ദേഹം തന്റെ എളിമ ഉപേക്ഷിച്ചില്ല. രാഷ്ട്രപതിയായ ശേഷം, തന്റെ ഗ്രാമമായ പരൗൻഖിൽ പോയപ്പോൾ അദ്ദേഹം തന്റെ അധ്യാപകരുടെ പാദങ്ങളിൽ തൊട്ട് വന്ദിക്കുകയും ആദരവ് പ്രകടിപ്പിക്കുകയും ചെയ്തു. അദ്ദേഹം ഗ്രാമത്തിലെ മണ്ണിൽ തൊട്ടു വന്ദിക്കുകയും അവിടുത്തെ സാധാരണക്കാരോട് നന്ദി പറയുകയും ചെയ്തു. ആ വൈകാരിക രംഗം രാജ്യമാകെ കണ്ടതാണ്. അദ്ദേഹത്തിന്റെ പെരുമാറ്റം ഓരോ ഇന്ത്യക്കാരനും അഭിമാനം തോന്നുന്ന ഭാരതീയ മൂല്യങ്ങളുടെ ചിത്രമാണ് ലോകത്തിനു മുന്നിൽ അവതരിപ്പിച്ചത്.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

നൂറ്റാണ്ടുകൾ നീണ്ട അടിമത്തത്തിൽ, നമ്മുടെ രാജ്യത്തിന് സാമ്പത്തികമായും സാമൂഹികമായും ഒരുപാട് കാര്യങ്ങൾ നഷ്ടപ്പെട്ടു. നമ്മുടെ പൂർവ്വികർ നൂറ്റാണ്ടുകളോളം പോരാടി. മഹാത്മാഗാന്ധി, ബാബാസാഹെബ് അംബേദ്കർ, ജ്യോതിബ ഫൂലെ, സാവിത്രിബായി ഫൂലെ - തുടങ്ങി അനേകം മഹദ്‌വ്യക്തികൾ ഏറ്റവും നിർധനരായവർക്കും പാർശ്വവൽക്കരിക്കപ്പെട്ടവർക്കും പോലും പരമോന്നത പദവിയിൽ എത്താൻ കഴിയുന്ന ഒരു പുതിയ ഇന്ത്യയെക്കുറിച്ച് സ്വപ്നം കണ്ടു. കോവിന്ദ് ജിയെപ്പോലുള്ള വ്യക്തിത്വങ്ങൾ, തങ്ങളുടെ അധ്വാനത്തിലൂടെയും കഴിവിലൂടെയും സ്വന്തം ജീവിതം മാറ്റുക മാത്രമല്ല ചെയ്തത്, നൂറ്റാണ്ടുകൾ പഴക്കമുള്ള ആ സ്വപ്നവും ദർശനവും സാക്ഷാത്കരിക്കുന്നതിൽ പ്രധാന പങ്കുവഹിക്കുകയും ചെയ്തു. ഈ ദിശയിലുള്ള നമ്മുടെ ശ്രമങ്ങൾ തുടരുകയാണ്. ഭാവിയിൽ പ്രതിസന്ധികളിൽ തളരാത്ത, ബുദ്ധിമുട്ടുകൾക്ക് മുന്നിൽ നിരാശരാകാത്ത, മറിച്ച് കഠിനാധ്വാനത്തിലൂടെ ഏതൊരു ലക്ഷ്യവും എളുപ്പമാക്കാനുള്ള ധൈര്യമുള്ള കോവിന്ദ് ജിയെപ്പോലുള്ള നിരവധി യുവാക്കളെ നമുക്ക് ആവശ്യമുണ്ട്. ഈ മാറ്റം ശക്തമായ ഒരു ഇന്ത്യ കെട്ടിപ്പടുക്കുക എന്ന സങ്കല്പത്തെ പൂർത്തീകരിക്കും. ഇവിടെ നിന്നായിരിക്കും സ്വാശ്രയവും വികസിതവുമായ ഭാരതത്തിലേക്കുള്ള പാത ഉയർന്നുവരുന്നത്.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

ഇത്തരമൊരു യുവശക്തിയെ കെട്ടിപ്പടുക്കുന്നതിന് കോവിന്ദ് ജിയുടെ ആത്മകഥ വലിയൊരു പ്രചോദന സ്രോതസ്സായി മാറും.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

തന്റെ ആത്മകഥയിൽ, മൊറാർജി ദേശായിയുമായുള്ള തന്റെ അനുഭവങ്ങളെക്കുറിച്ചും കോവിന്ദ് ജി വിശദമായി വിവരിച്ചിട്ടുണ്ട്. അദ്ദേഹത്തിനുള്ളിലുണ്ടായിരുന്ന രാജ്യസേവന മനോഭാവവും മൊറാർജി ഭായിക്കൊപ്പം പ്രവർത്തിച്ചതിലൂടെ അദ്ദേഹത്തിന് ലഭിച്ച പാഠങ്ങളും പാതയും - കോവിന്ദ് ജി രാഷ്ട്രീയത്തെയും സാമൂഹിക സേവനത്തെയും തന്റെ മാർ​ഗമാക്കി മാറ്റി. അദ്ദേഹം തന്റെ കർത്തവ്യങ്ങളിൽ പ്രതിജ്ഞാബദ്ധനായി നിലകൊണ്ടു. സേവനത്തെ അദ്ദേഹം തന്റെ ലക്ഷ്യമാക്കി. പാർലമെന്റിലെ അദ്ദേഹത്തിന്റെ കാലാവധി ഇതിന് തെളിവാണ്. ഗവർണർ എന്ന നിലയിലും അദ്ദേഹം മാതൃക കാട്ടി. രാഷ്ട്രപതി എന്ന നിലയിലും ഇതേ സമർപ്പണബോധം നമ്മൾ കണ്ടതാണ്. രാഷ്ട്രപതി എന്ന പരമോന്നത പദവിയിൽ നിന്ന് വിരമിച്ച ശേഷവും അദ്ദേഹം വിശ്രമിച്ചിട്ടില്ല. 'ഒരു രാജ്യം, ഒരു തിരഞ്ഞെടുപ്പ്' എന്ന പ്രധാന വിഷയത്തിൽ അദ്ദേഹം ഇപ്പോഴും പ്രവർത്തിച്ചുവരികയാണ്. അദ്ദേഹം രാജ്യത്തെ ഉണർത്തുകയാണ്. ഇതിനൊരു പരിഹാരമുണ്ടാകുന്നത് ഇന്ത്യൻ ജനാധിപത്യത്തിൽ പുതിയൊരു അധ്യായത്തിന് തുടക്കം കുറിക്കാൻ കഴിയുന്ന ഒരു വിഷയമാണിത്. കോവിന്ദ് ജിയുടെ സമർപ്പണബോധത്തിൽ നിന്നും സേവനമനോഭാവത്തിൽ നിന്നും രാജ്യത്തെ ജനങ്ങൾക്ക് ഒരുപാട് കാര്യങ്ങൾ പഠിക്കാനുണ്ടെന്ന് ഞാൻ വിശ്വസിക്കുന്നു.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

സാമൂഹിക ജീവിതത്തിൽ സജീവമായിരിക്കുമ്പോൾ തന്നെ ഒരു ആത്മകഥയ്ക്കായി സമയം കണ്ടെത്തുക എന്നത് വളരെ ബുദ്ധിമുട്ടുള്ള കാര്യമാണ്. കോവിന്ദ് ജി നമുക്കെല്ലാവർക്കും വേണ്ടി ഈ പ്രവൃത്തി ചെയ്തിരിക്കുകയാണ്; കാരണം, പാവപ്പെട്ടവരും പാർശ്വവൽക്കരിക്കപ്പെട്ടവരുമായ ആളുകൾക്ക് സ്വന്തം ജീവിതത്തിന്റെ പ്രതിഫലനങ്ങൾ കാണാൻ കഴിയുന്ന ഒരുപാട് കാര്യങ്ങൾ അദ്ദേഹത്തിന്റെ ജീവിതത്തിലുണ്ട്. പ്രയാസകരമായ സാഹചര്യങ്ങളിൽ പോലും ഒരു സാധാരണ കുടുംബം ജീവിതത്തിന്റെ വിശുദ്ധിയോടും സത്യസന്ധതയോടും എങ്ങനെ ഒത്തുതീർപ്പുണ്ടാക്കുന്നില്ല എന്നത്; ആ ആദർശങ്ങൾ എങ്ങനെ പിന്നീട് നമ്മുടെ ജീവിതത്തിന്റെ അടിത്തറയായി മാറുന്നു എന്നത്; കഷ്ടപ്പാടുകളുടെ കാലത്തെ മൂല്യങ്ങൾ ജീവിതത്തിലുടനീളം നമുക്ക് എങ്ങനെ വെളിച്ചം തരുന്നു എന്നത്; ഈ വിശുദ്ധി ദേശസേവനത്തിന് നമുക്ക് എങ്ങനെ കരുത്ത് നൽകുന്നു എന്നത് - വ്യത്യസ്ത പദവികളിൽ ഉത്തരവാദിത്തങ്ങൾ നിർവ്വഹിക്കുമ്പോഴും, കോവിന്ദ് ജി തുടർച്ചയായി ഈ പ്രചോദനമാണ് സമൂഹത്തിന് നൽകിയിട്ടുള്ളത്.

സുഹൃത്തുക്കളേ,

കോവിന്ദ് ജിയുടെ ആത്മകഥ അദ്ദേഹത്തിന്റെ ജീവിതത്തിലെ ഓർമ്മകൾ മാത്രമല്ല, നമ്മുടെ ജനാധിപത്യത്തിന്റെ സുപ്രധാനമായ ഓർമ്മകളെക്കൂടി കാത്തുസൂക്ഷിക്കുമെന്ന് എനിക്ക് ഉറപ്പുണ്ട്. ഒരിക്കൽക്കൂടി, അദ്ദേഹത്തിന്റെ ആത്മകഥയ്ക്ക് ഞാൻ എൻ്റെ എല്ലാവിധ ആശംസകളും നേരുന്നു. കൂടാതെ പ്രധാനമായും പുതിയ തലമുറയോട് എനിക്ക് പറയാനുള്ളത് - ഇത് റീലുകളുടെ കാലമാണ്, സമൂഹമാധ്യമ ഇൻഫ്ലുവൻസർമാർ നിങ്ങളെ പല വഴികളിലേക്ക് വലിച്ചിഴയ്ക്കുന്നു. കുറുക്കുവഴികളുടെ ഈ യുഗത്തിൽ ഒരു കാര്യം ഓർക്കുക. റെയിൽവേ സ്റ്റേഷനുകളിൽ എഴുതിവെച്ചിരിക്കുന്നത് കാണാം - ചില ആളുകൾ മേൽപ്പാലം ഉപയോഗിക്കുന്നതിന് പകരം റെയിൽവേ ട്രാക്കുകളിലൂടെ ചാടിക്കടക്കാറുണ്ട്. അവിടെ ഇങ്ങനെ എഴുതിവെച്ചിട്ടുണ്ട്: "കുറുക്കുവഴി നിങ്ങളുടെ ജീവിതത്തെത്തന്നെ ചെറുതാക്കിക്കളയും". നിങ്ങൾ കുറുക്കുവഴികളിലൂടെ പോകാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നവരാണെങ്കിൽപ്പോലും, യുവാക്കളോട് എനിക്ക് അഭ്യർത്ഥിക്കാനുള്ളത് - നിങ്ങൾ ആരാധിക്കുന്ന വ്യക്തികളുടെ ആത്മകഥകൾ വായിക്കുക. ചരിത്ര സംഭവങ്ങളെ വേറൊരു രീതിയിൽ മനസ്സിലാക്കാനുള്ള അവസരം ആത്മകഥകൾ നൽകുന്നു. അവ ചരിത്രത്തോട് ചേർന്നുനിൽക്കുന്നവയാണ്. അതുകൊണ്ടാണ് കോവിന്ദ് ജിയുടെ ഈ ശ്രമം ഭാവി തലമുറയ്ക്ക്, പ്രത്യേകിച്ച് യുവാക്കൾക്ക്, പ്രയോജനപ്പെടണമെന്ന് ഞാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നത്. ഏവർക്കും എൻ്റെ അഭിനന്ദനങ്ങൾ. വളരെ നന്ദി.