उपस्थित सभी देवियों और सज्‍जनों, 

समाज में कैसे-कैसे नर-रत्‍न पैदा हुए हैं, महापुरूष पैदा हुए हैं, जिसके कारण हम सबको उत्‍तम विरासत प्राप्‍त हुई है। अगर आज यह समारोह यहां नहीं हुआ होता तो शायद नार्थ में रहने वाले कई लोग होंगे, जिनको यह पता तक नहीं होता कि अयंकाली जी कौन थे और इस देश का दुर्भाग्‍य रहा है, इसने किसी कारणवश, समाज के लिए जीने-जूझने वाले लोगों को भुला दिया है। शायद हम सबका दायित्‍व बनता है कि हमारे सभी महान पूर्वजों और उनके जीवन से प्रेरणा ले के नई पीढ़ी को संस्‍कारित करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। 

पूरे केरल में ओणम का पर्व मनाया जा रहा है। मैं आज, सभी मेरे केरल के भाइयों-बहनों को ओणम की शुभकामनाएं देता हूं। आज 8 सितंबर है, इसका महात्‍मय मुझे बड़ा महत्‍वपूर्ण लगता है, क्‍योंकि 8 सितंबर को महात्‍मा अयंकाली का जन्‍म हुआ, लेकिन उसी केरल की धरती पर दूसरे महान समाज सुधारक नारायण गुरू जी का भी जन्‍म हुआ। आज केरल के जीवन में दो संगठनों, केपीएमस और एसएनडीपी, उनकी मर्जी के बिना न कोई समाज नीति चल सकती है, न कोई राजनीति चल सकती है। लेकिन, वो उसका एक अलग पहलू है। आज हम जब आज केरल के महान समाज सुधारक, महान संत अयंकाली जी की 152वीं जयंति पर मिले हैं। मेरा यह सौभाग्‍य रहा कि मैं पिछले बार केरल में केपीएमएस के निमंत्रण पर एक कार्यक्रम में गया था और शायद हम जिस विचारधारा में पले हुए लोग हैं, उसमें शायद मैं पहला था, जिसको आपके यहां आने का सौभाग्‍य मिला था। 

उस समय “कायल सभा” की शताब्‍दी का समारोह प्रारंभ हो रहा था। एक प्रकार से अब वो कायल शताब्‍दी की पूर्णाहुति का ही कालखंड है। उसमें भी मुझे आने का सौभाग्‍य मिला है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि स्‍वामी विवेकानंद जी को केरल पर इतना गुस्‍सा क्‍यों आया था। क्‍या वो केरल को प्‍यार नहीं करते थे? क्‍या केरल की भूमि उनको अपनी नहीं लगती थी? लेकिन केरल की जो समाज व्‍यवस्‍था बन गयी थी और जिस प्रकार से वहां दलितों पर जुल्‍म होता था, दलितों के साथ अन्‍याय होता था, इसने स्‍वामी विवेकानंद जी को बेचैन कर दिया था। उन्‍हें लगा, ये क्‍या समाज है, ये क्‍या कर रहे हैं ये लोग। सर्वाधिक गुस्‍से में स्‍वामी विवेकानंद थे और उसी गुस्‍से में से उनके मन से ये उदगार निकले थे। 

हमारे देश का, आजादी का ये आंदोलन देखें तो उस सारे आजादी के आंदोलन में 19वीं शताब्‍दी की घटनाओं का बहुत महत्‍व है। 19वीं शताब्‍दी में हमारे देश में, हिन्‍दुस्‍तान के हर कोने में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुआ। कोई न कोई सांस्‍कृतिक आंदोलन चला। एक प्रकार से 20वीं शताब्‍दी का आजादी के आंदोलन की पीठिका, 19वीं शताब्‍दी के समाज सुधारक आंदलोनों से हुई, सांस्‍कृतिक चेतना से हुई। 1200 साल की गुलामी के अंदर अपना सब कुछ भुला चुके समाज को फिर से एक बार प्राणवान बनाने का प्रयास उस समय महापुरूषों ने किया। 

उसी कालखंड में केरल में अयंकाली जी की समाज सुधार और संघर्ष की गतिविधि नारायण गुरू का शिक्षा आंदोलन और उसी समय डा. पलप्‍पु, मन्‍नायु पद्मनाभन, पंडित करप्‍पन, स्‍वामी वागपट्टानंदन, ऐसे एक से एक दिग्‍गज केरल की धरती पर सामाजिक चेतना को जगाने में लगे थे। 

लेकिन, 1913 में महात्‍मा गांधी हिन्‍दुस्‍तान लौटे, उससे पहले संत अयंकाली जी ने एक कायल सभा के द्वारा एक अद्भुत सत्‍याग्रह किया गया था। हम नार्थ के लोगों को मालूम नहीं है, लेकिन केरल के दलित समाज को जागृ‍त करने के लिए उनके अधिकारों के लिए, उस समय शासकों ने वहां के, अन्‍य लोगों ने, वहां के समाज के अगुवा लोगों ने, ये करने से मना कर दिया। ये कहा कि तुम्‍हें जमीन की इंच की जगह नही मिलेगी, सम्‍मेलन करने के लिए। उस जमाने में एक दलित मां का बेटा, सारा समाज सामने हो तो क्‍या करता, चुप हो जाता, बैठ जाता? 

अयंकाली जी चुप नहीं हुए। उन्‍होंने ठान ली कि मैं इस जुल्‍म के खिलाफ संघर्ष करूंगा। उन्‍होंने रास्‍ता खोजा। उन्‍होंने सब नावें इकट्ठी की, नौकाएं इकट्ठी की और समुद्र के अंदर एक नौकाओं के द्वारा एक विशाल जगह बना दी और नाव में सभा की उन्‍होंने। वह कायल सभा जो कही जाती है, 1913 के हर प्रतिबंध के बीच, समुंदर के अंदर। जमीन नहीं देते हो तो आप जानें, दुनिया जाने। परमात्‍मा ने मुझे जगह दी है समुन्दर को चीर कर के मैं वहां जायूँगा, लेकिन मैं हक़ों की लड़ाई लडूंगा, ये मिजाज अयंकाली जी ने बताया। समुन्दर में नाव इक्कठी कर कर के, नौकायें इक्कठी करके, वहीं उन्ही नौकायों में मंच बनाया, नाव में ही श्रोता आये और उन्होने सत्याग्रह किया था। 

महात्मा गाँधी 1915 में हिंदुस्तान आये थे और बाद में महात्मा गाँधी ने जब अयंकाली जी की इस शक्ति को देखा तो, महात्मा गाँधी जी ने स्वयं संत अयंकाली जी को मिलने गये थे। लेकिन, हम जब इतिहास के पन्नों को देखतें हैं तो ये चीजें हमे मिलती नहीं। पता नहीं, क्या कारण है? इसे क्यों ओझल कर दिया गया है! समाज सुधार के आंदोलन के रूप में, जो बातें हमने बाबा साहेब आम्बेडकर से सुनी हैं, जो हमे पढ़ने को मिलती है, अयंकाली जी की बातो में वो सारी बाते उस समय मिलती थी, 19वीं शताब्दी में। इतना ही नहीं, आज ह्यूमन राइट्स से सम्बंधित दुनिया में जितने भी डॉक्युमेंट्स हैं, यूएन से लेकर, कहीं पे भी, अगर उन डॉक्युमेंट्स को आप अयंकाली जी ने 19वीं शताबदी में जिन बातों को कहा था, उसको अगर हम जोड़ेंगे, तो बहुत सी बाते वो मिलेंगी, जो 19वीं शताबदी में अयंकाली जी ने कही थी जिन बातों को आज विश्व में ह्यूमन राइट्स की बातों के साथ जोड़ा गया। 

इतना ही नहीं, केरल में तो हम जानते हैं, दक्षिण में तो स्थिति ये थी की अगर किसी दलित को जाना है तो पीछे झाडू लगाना पड़ता था, उसके पद-चिन्ह ना रह पायें, ये पागलपन उस जमाने में था। कोई दलित बैलगाड़ी नहीं रख सकता था। बैलगाड़ी मे बैठ नहीं सकता था, वो दिन थे। तब अयंकाली जी ने सत्याग्रह किया था। उन्होने तय किया, जिस रास्ते पर प्रतिबंध है उस रास्ते पर मैं जाउंगा, बैलगाड़ी ले कर के जाउंगा और अयंकाली जी गये, बहुत बड़ा संघर्ष हुआ, मारपीट हुई, कुछ लोगों को चोटे पहुंची, लेकिन वो झुके नहीं। समाज को जगाने के लिये वो निरंतर प्रयास करते रहे। 

आज जितने भी मजदूर आंदोलन चल रहे हैं, उन सभी मजदूर आंदोलनो को भी अगर कोई सच्चाई सीखनी है तो, अयंकाली जी से सीखने को मिलेगी। 

उन्होंने कृषि मजदूरों को आज़ादी दिलाने का आंदोलन चलाया था। जो कृषि मजदूर थे, उनके लिये काम का समय तय हो, उनके लिये वेतन तय हो, उनके बच्चों को सरकारी स्कूल मे एडमिशन का अधिकार मिले, महिलायों के लिये मजदूरी का प्रकार अलग हो, इन सारे विषयों की लड़ाई लड़ कर के विजय प्राप्त की थी, अयंकाली जी ने। वे एक प्रकार से समाज सुधारक भी थे, लेकिन साथ-साथ समाज के हकों के लिये संघर्ष करना और उन्हें हक दिलाना, ये उस समय अयंकाली जी ने किया था और कृषि जीवन के अंदर अनेक अधिकार पाने में सुविधा मिली थी। आज केरल में जो शिक्षा की जो स्थिति है, अगर इसका गर्व हम करतें हैं, तो हमे इस बात का भी गर्व करना होगा की दो महापुरुष विशेष रूप से, जिन्‍होंने केरल में शिक्षा की जोत जलाई थी, एक संत अयंकाली जी और दूसरे नारायण गुरु जी। उस समय दलित, शोषित, पीड़ित, वंचित, पिछड़े, इनके लिये शिक्षा, ये उनका प्राथमिक विषय रहा था और उसके कारण केरल के समाज जीवन में इतना बड़ा बदलाव आया, इतना परिवर्तन आया। 

हम हिन्दुस्तान की आज़ादी के आंदोलन की जब चर्चा करतें हैं, तो 1930 की दांडी यात्रा को एक टर्निंग प्‍वाइंट के रूप में देखते हैं। मैं समझाता हूं, आज़ादी के आंदोलन में 1930 की दांडी यात्रा एक महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट है, तो दलित उद्धार के आंदोलन में 1913 का कायल सम्‍मेलन, ये टर्निंग प्‍वाइंट है। बाबा साहब कहते थे- संगठित बनो, संघर्ष करो, शिक्षित बनो। संत अयंकाली जी ने भी इन्‍हीं तीन मंत्रों को ले कर के समाज को सशक्‍त बनाने का काम किया था। उस अर्थ में ऐसे महापुरूष, जिन्‍होंने समाज के हकों के लिए लड़ाई लड़ी, समाज के अंदर चेतना जगाई, लेकिन कभी समग्रतया समाज जीवन में दरार पैदा होने का प्रयास होने नहीं दिया। सामाजिक एकता को कभी आंच न आए, इसके लिए वह प्रयारत रहे। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। बाबा साहब अंबेदकर का जीवन देखिए, दलित उद्धार के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन दलितों के अंदर नफरत की आग जलाने का प्रयास कभी बाबा साहब अंबेदकर ने नहीं किया। यही तो दिव्‍य दृष्टि होती है और वही अयंकाली जी का था कि उन्‍होंने अन्‍याय के खिलाफ लड़ना तय माना लेकिन, समाज के प्रति प्रेम, उसमें कभी कटुता को जन्‍म न आए, इसके लिए एक जागरूक प्रयास किया और उसका परिणाम है कि समाज के ताने-बाने बचे रहते हैं। 

समाज जीवन में, यह विविधताओं भरा देश है। विविधता में एकता, यह हमारे भारत की विशेषता है। ये भारत के सौंदर्य को बढ़ाने वाले, हमारी विरासत हैं। उन विविधता में एकता को बनाये रखते हुए, सामाजिक एकता के मूल मंत्र को कोई आंच न आए। लेकिन उसके साथ कोई वंचित न रह जाए। किसी से अन्‍याय न हो, ये व्‍यवस्‍थाओं के ऊपर बल देना, यह हर समय की मांग होती है। 

कभी-कभी मुझे लगता है, लोग चर्चा करते हैं, ये 5000 साल हो गए, इस संस्‍कृति को, परंपरा को। ये कैसे इतना चल रहा है। दुनिया में कई संस्‍कृतियां नष्‍ट हो गईं, क्‍या कारण है? अगर हम देखें तो इस समाज की एक विशेषता है। हर युग में हमारे देश में कोई न कोई समाज सुधारक पैदा हुए हैं। उन समाज सुधारकों ने अपने ही समाज की बुराइयों या कमियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। 

महात्‍मा गांधी ने आजादी का आंदोलन लड़ा, लेकिन साथ-साथ ही हिंदू समाज में जो अस्‍पृष्‍यता थी, उसके खिलाफ भी उन्‍होंने जंग छेड़ा, लड़ाई लड़ी। राजाराम मोहन राय समाज जीवन के लिए अनेक काम किए, लेकिन समाज में महिलाओं के खिलाफ जो अन्‍याय हो रहा था, उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी। हम भाग्‍यशाली हैं एक प्रकार से, सदियों से हम देखें, कोई युग ऐसा नहीं गया है, कि हमारे भीतर कोई बुराइयां आई है तो हमारे भीतर ही कोई महापुरूष पैदा हुआ है। उसने हमें उन बुराइयों से मुक्ति के लिए कभी डांटा है तो कभी झकझोरा है, कभी शिक्षित किया है और हमें सुधार करने के लिए रास्‍ता दिखाया है और हम टिके हैं, उसका कारण यह है कि हमारे यहां एक ऑटो पायलट व्‍यवस्‍था है। हमारे भीतर से ही ऐसे महापुरूष पैदा होते हैं, जो हमारी कमियों को दूर करके, हमें सशक्‍त करने का निरंतर प्रयास करते हैं। हम इसलिए भाग्‍यवान हैं, कि जो काल बाह्य चीजें हैं, जो किसी समय उपयोगी रही होगी लेकिन, समय रहते निकम्‍मी रह गई होगी। अगर हमें ऐसे संत नहीं मिले होते, ऐसे समाज सुधारक नहीं मिले होते, तो वहीं चीजें हमारे लिए बोझ बन जाती। हमारे यहां ऐसे महापुरूष पैदा हुए, जिन्‍होंने हमें उस काल बाह्य चीजों से मुक्ति दिलाई। आधुनिक बनने की दिशा दी। नवचेतना जगाने का प्रयास किया। 

एक समाज के रूप में हम स्‍थगितता को लेकर हम जीने वाले, पनपे हुए लोग नहीं हैं। हम नित्‍य नूतन प्रयास करने वाले लोग हैं और हर सदी में हुआ है। उस प्रयास करने वाले महापुरूषों में अनेक महापुरूषों का जैसे स्‍मरण होता है, संत अयंकाली जी का भी होता है। आजादी के आंदोलन में सारे हिन्‍दुस्‍तान की तरफ नजर करना, समाज सुधारक, भक्ति आंदोलन चेतना आंदोलन, हर कोने में महापुरूषों की भरमार थी। आजादी के लिए पहले समाज को साशक्‍त करने के लिए उन्‍होंने मेहनत की थी। उसी पीठिका का परिणाम था कि 20वीं शताब्‍दी में हम पूरी ताकत के साथ आजादी के लिए सफलता की ओर आगे बढे और उसकी पीठिका तैयार करने में अयंकाली जैसे अनेक महापुरूषों ने, नारायण गुरू स्‍वामी जैसे अनेक महापुरूषों ने प्रयास किया था जिस पर परिणाम लाभदायक रहा। 

समाज में आजादी के बाद दलित, पीडि़त, शोषितों से मु‍क्ति के लिए हम बाबा साहब अंबेडकर के जितने आभारी हों, उतने कम हैं। भारत के संविधान में एक ऐसी व्‍यवस्‍था दी है, जिसके कारण हमें अपना हक पाने का अवसर मिला है। ये भारत के संविधान निर्माता सब मिल कर के दलितों का, पीडि़तों का, शोषितों का कल्‍याण हो, उसकी चिंता की है। लेकिन हमें कभी एक समाज के नाते, इतने में ही संतुष्‍ट हो कर के चलेगा क्‍या? एक समाज के अग्र वर्ग का बेटा, उसको बैंक में नौकरी मिल जाए, एक दलित मां का बेटा, उसको नौकरी मिल जाए। दोनों को समानता मिलेगी। लेकिन इससे समाज की एकता हो जाती है क्‍या। नहीं होती है। इसलिए सिर्फ समानता के स्‍टेशन पर हमारी गाड़ी अटक गई तो हमें जहां जाना है, वहां हम कभी पहुंच नहीं पाएंगे। इसलिए सिर्फ समता से काम नहीं चलता है।सब समाजों के लिये समता हो, इन से काम नहीं चलता है, समता के आगे भी एक यात्रा है, और उस यात्रा के अंतिम मंजिल है समरसता। 

समता पर सब कुछ बन गए, दलित का बेटा भी डॉक्टर बन गया, ब्राह्मण का भी बेटा भी डॉक्टर बन गया, दोनों डॉक्टरी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी अगर समरसता नहीं है तो कुछ न कुछ कमी महसूस होती है । ये समरसता कब आती है, संविधान की व्यवस्था से, कानून की व्यवस्था से, हकों की लड़ाई लड़ते-लड़ते समता तो मिल सकती, लेकिन समरसता पाने के लिये समाज मे एक सतत निरन्तर, जागरूक समाज का प्रयासकरना पड़ता है । और इसलिये दो मूल बातों को ले करके चलना पड़ता है, सम-भाव+मम-भाव=समरसता। समता प्‍लस ममता इज इक्‍वल टू समरसता। समता है, लेकिन अगर ममता नहीं है तो समाज एक रस नहीं बन सकता। सम-भाव है, लेकिन मम-भाव नहीं है, ये भी मेरा है, मेरा ही भाई है, उसकी और मेरी रगों में एक ही खून है, ये भाव जब तक पैदा नहीं होता, तब तक समरसता नहीं आती है । 

इसलिये, हमे सम-भाव की यात्रा को मम-भाव से जोडना है, हमें समता की यात्रा को ममता की यात्रा के साथ जोड़ना है। समता और ममता के भाव को जोड़ कर के ही हम समरसता की यात्रा को आगे बड़ा सकते हैं । तभी जा करके समाज में किसी के प्रति कटुता पैदा नहीं होगी, किसी के साथ अन्याय नहीं होगा, किसी को अपने हकों के लिये लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी, सहज रूप से उसे प्राप्त होगा । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आने वाला युग समरसता की यात्रा का युग है । 

इसे परिपूर्ण करना, समाज का शासकों का, सुधारकों का, शिक्षकों का, संस्कृतिक नेतृत्‍व करने वालों का, सबका सामूहिक दायित्व है । 

भारत "बहुरत्न वसुंधरा" है । हर युग में ऐसे लोग मिले हैं जिन्होने साहित्यों को पैदा किया है, इन साहित्यों का लाभ हमें अवश्‍य मिलेगा। 

मैं फिर एक बार परम पूज्‍य अयंकाली जी, उनके उन महान कामों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता हूँ, उनके चरणों में नमन करता हूँ, और केपीएमएस के द्वारा ये जो निरन्तर प्रयास चले हैं, मैं उन सब को बहुत हृदय से अभिनन्दन देता हूँ । राजनीतिक दृष्टि से कभी हमारा और उनका मेल नहीं रहा, लेकिन जो प्यार् मुझे केपीएमएस से मिला है, हमेशा मिला है और बाबू तो हमारे लिये, मैंने देखा है, हमेशा, प्यार लिये रहते हैं। ये प्‍यार बना रहेगा। 

मुझे आज आप के बीच आने का अवसर मिला, दिल्ली के इस महत्‍वपूर्ण ओडिटोरियम में , कभी किसी ने सोचा होगा, 152 साल पहले पैदा हुये एक संत को, इस महत्‍वपूर्ण भवन में हम लोगों को श्रद्धांजलि देने का सौभाग्‍य प्राप्त होगा। यही तो बताता है कि ये समरसता की यात्रा का युग है, और इस समरसता की यात्रा को हम सब मिल कर आगे बढायेंगे। 

फिर एक बार आप सब को मेरी शुभकामनाएं। फिर एक बार ओणम की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, धन्यवाद । 

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ಸಂಸತ್ತಿನ 2026ರ ಮುಂಗಾರು ಅಧಿವೇಶನದ ಆರಂಭದಲ್ಲಿ ಪ್ರಧಾನಮಂತ್ರಿ ಅವರ ಭಾಷಣದ ಕನ್ನಡ ಅನುವಾದ
July 20, 2026
May this session witness productive discussions that strengthen India's development journey: PM
We pray that the monsoon remains proactive and the Monsoon Session remains productive, contributing to the welfare of the nation: PM
Over the past month, the country has achieved several milestones at the national, international and space levels that have filled every Indian with pride: PM
Despite the challenges in West Asia, India continued to grow as the fastest-growing major economy in the world, reflecting its strength and determination: PM
Smooth functioning of Parliament, meaningful discussions and a collective resolve to take the country forward are the need of the hour: PM

ನಿಮ್ಮೆಲ್ಲರಿಗೂ  ಹಾರ್ಧಿಕ ಸುಸ್ವಾಗತ.

ಮುಂಗಾರಿನ ಪ್ರಯೋಜನಗಳು ಗೋಚರಿಸುತ್ತಿವೆ ಮತ್ತು ಮಳೆಗಾಲದ ಅಧಿವೇಶನವೂ ಪ್ರಾರಂಭವಾಗುತ್ತಿದೆ. ಅದು ಮುಂಗಾರು ಮಳೆಯಾಗಿರಲಿ ಅಥವಾ ಮುಂಗಾರು ಅಧಿವೇಶನವಾಗಲಿ - ಎರಡೂ ಸಕ್ರಿಯವಾಗಿದ್ದಾಗ, ಅವು ಹೆಚ್ಚು ಉತ್ಪಾದಕವಾಗುತ್ತವೆ; ಮತ್ತು ಎರಡೂ ಉತ್ಪಾದಕವಾಗಿದ್ದರೆ, ಅದು ರಾಷ್ಟ್ರದ ಕಲ್ಯಾಣ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಯೋಗಕ್ಷೇಮಕ್ಕೆ ಕಾರಣವಾಗುತ್ತದೆ. ಆದ್ದರಿಂದ, ಮುಂಗಾರು ಸಕ್ರಿಯವಾಗಿ  ಇರಲಿ ಮತ್ತು ಮುಂಗಾರಿನ ಅಧಿವೇಶನವು ಉತ್ಪಾದಕವಾಗಿರಲಿ ಎಂದು ನಾನು ಪ್ರಾರ್ಥಿಸುತ್ತೇನೆ.

 

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಕಳೆದ ಒಂದು ತಿಂಗಳಿನಿಂದ, ದೇಶವು ಹಲವಾರು ಮೈಲಿಗಲ್ಲುಗಳನ್ನು ಸಾಧಿಸಿದೆ - ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬ ನಾಗರಿಕನನ್ನೂ ಹೆಮ್ಮೆಯಿಂದ ತುಂಬುವ ಸಾಧನೆಗಳ ಸರಣಿ. ಇವು ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಮತ್ತು ಅಂತರರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ರಂಗಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ಈಗ, ಬಾಹ್ಯಾಕಾಶವನ್ನು ಸಹ ವ್ಯಾಪಿಸಿವೆ. ಒಂದು ರೀತಿಯಲ್ಲಿ, ಇವು ಭಾರತಕ್ಕೆ ಹೆಮ್ಮೆಯ ಕ್ಷಣಗಳಾಗಿವೆ. ಕಳೆದ ವರ್ಷದ ಮುಂಗಾರು ಅಧಿವೇಶನಕ್ಕೆ ಸ್ವಲ್ಪ ಮೊದಲು, ಭಾರತೀಯ ನಾಗರಿಕರೊಬ್ಬರು ಅಂತರರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಬಾಹ್ಯಾಕಾಶ ನಿಲ್ದಾಣವನ್ನು ತಲುಪಿದರು, ಮತ್ತು ನಿನ್ನೆ ಹಿಂದಿನ ದಿನವಷ್ಟೇ, ಭಾರತದ ಯುವ ನವೋದ್ಯಮವೊಂದು ಅಭೂತಪೂರ್ವ ಸಾಧನೆ ಮಾಡಿತು. ಖಾಸಗಿ ಉದ್ಯಮಗಳು ಇಂತಹ ಸಾಮರ್ಥ್ಯವನ್ನು ಪ್ರದರ್ಶಿಸಿದ ದೇಶಗಳು ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಬಹಳ ಕಡಿಮೆ ಇವೆ; ಭಾರತದ ಯುವಕರು ಬಾಹ್ಯಾಕಾಶಕ್ಕೆ ಹೊಸ ಹಾರಾಟ ನಡೆಸಿದ್ದಾರೆ - ಇದು ಒಂದು ಅದ್ಭುತ ಯಶಸ್ಸು. ಈ ನವೋದ್ಯಮ 'ಸ್ಕೈರೂಟ್' ಬಗ್ಗೆ - ಅಲ್ಲಿ ಕೆಲಸ ಮಾಡುವ ಇಡೀ ತಂಡದ ಸರಾಸರಿ ವಯಸ್ಸು ಕೇವಲ 28 ವರ್ಷಗಳು ಎಂದು ನನಗೆ ಹೇಳಲಾಯಿತು. ಈ ರೀತಿಯ ಯುವಕರು ಈ ಸಾಧನೆಯನ್ನು ಸಾಧಿಸಿದ್ದಾರೆ. ನಾನು '56 ವರ್ಷ ವಯಸ್ಸಿನ ಯುವಕ'ರ ಬಗ್ಗೆ ಮಾತನಾಡುತ್ತಿಲ್ಲ; ನಾನು ದೇಶದ ನವೋದ್ಯಮಗಳ ಬಗ್ಗೆ  ಉಲ್ಲೇಖಿಸುತ್ತಿದ್ದೇನೆ - ಸರಾಸರಿ 28 ವರ್ಷ ವಯಸ್ಸಿನ ಯುವಕರು - ಅವರು ಬಾಹ್ಯಾಕಾಶದಲ್ಲಿ ಭಾರತದ ಧ್ವಜವನ್ನು ನೆಟ್ಟಿದ್ದಾರೆ. ಅವರು ಖಂಡಿತವಾಗಿಯೂ ಅಭಿನಂದನೆಗಳಿಗೆ ಅರ್ಹರು, ಅಂತಹ ಸಾಧನೆಗಳು ಭಾರತವನ್ನು ಆತ್ಮವಿಶ್ವಾಸದಿಂದ ತುಂಬುತ್ತವೆ. ಜಾಗತಿಕ ವೇದಿಕೆಯಲ್ಲಿ ಭಾರತದ ಪ್ರತಿಷ್ಠೆ ಸಾರ್ವತ್ರಿಕವಾಗಿ ಗುರುತಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ ಮತ್ತು ಸ್ವೀಕಾರಾರ್ಹವಾಗಿಸಿದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಇದು ಕಾಕತಾಳೀಯವಲ್ಲ; ಇದು ಒಂದು ಸಂದೇಶ - ಬಹಳ ಬಲವಾದ ಸಂದೇಶ - ನಮ್ಮ ದೇಶದ ಯುವಕರ ಸಾಮರ್ಥ್ಯ ಮತ್ತು ಆಕಾಂಕ್ಷೆಗಳು ಬಾಹ್ಯಾಕಾಶದಷ್ಟೇ ಅಪರಿಮಿತವಾಗಿವೆ. ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ಇದಕ್ಕಿಂತ ದೊಡ್ಡ ಸಂದೇಶ ಅಥವಾ ಸ್ಫೂರ್ತಿಯ ಮೂಲ ಬೇರೊಂದು ಇರಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ. 

 

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ದೇಶವು 'ಸುಧಾರಣಾ ಎಕ್ಸ್ ಪ್ರೆಸ್' ಹತ್ತಿದ್ದರಿಂದ ಭಾರತದ ಯುವಕರು ಅಂತಹ ಮಹಾನ್ ಧೈರ್ಯವನ್ನು ತೋರಿಸಲು ಮತ್ತು ಯಶಸ್ಸನ್ನು ಸಾಧಿಸುತ್ತಿರುವುದು ಸಾಧ್ಯವಾಗಿದೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಇತ್ತೀಚೆಗೆ, ರಾಜಸ್ಥಾನದಲ್ಲಿ ಬೃಹತ್ ತೈಲ ಸಂಸ್ಕರಣಾಗಾರವನ್ನು ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ಸಮರ್ಪಿಸಲಾಯಿತು. ಕೆಲವೇ ವಾರಗಳ ಹಿಂದೆ, ದೇಶದ ಮೂರನೇ ಸೆಮಿಕಂಡಕ್ಟರ್ (ಅರೆವಾಹಕ) ಸ್ಥಾವರವನ್ನು ಸಮರ್ಪಿಸಲಾಯಿತು. ಇತ್ತೀಚೆಗೆ, ಹಸಿರು ಜಲಜನಕ ಚಾಲಿತ ರೈಲಿಗೆ ಚಾಲನೆ ನೀಡಲಾಯಿತು; ವಿಶ್ವದ ಕೆಲವೇ ದೇಶಗಳು ಈ ಸೌಲಭ್ಯವನ್ನು ಹೊಂದಿವೆ. ಆದಾಗ್ಯೂ, ಭಾರತವು ತನ್ನ ನಾಗರಿಕರಿಗೆ ಅರ್ಪಿಸಿರುವ ಜಲಜನಕ (ಹೈಡ್ರೋಜನ್) ರೈಲು ಅತ್ಯಂತ ಶಕ್ತಿಶಾಲಿ ಎಂಜಿನ್ ಅನ್ನು ಹೊಂದಿದೆ ಮತ್ತು ಅದು ಈ ಶ್ರೇಣಿಯಲ್ಲಿ ಅತ್ಯಂತ ಉದ್ದವಾದ ರೈಲಾಗಿದೆ. ಈ ಸಾಧನೆಯು ಭಾರತದ ವಿಜ್ಞಾನಿಗಳು, ಎಂಜಿನಿಯರ್ ಗಳು, ನಾವೀನ್ಯಕಾರರು, ಉದ್ಯಮಿಗಳು ಮತ್ತು ಕಾರ್ಮಿಕರ ಸಮರ್ಪಣೆಗೆ ಸಾಕ್ಷಿಯಾಗಿದೆ - ಅವರೆಲ್ಲರೂ ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕಾಗಿ ಒಂದೇ ಗುರಿಯೊಂದಿಗೆ ಬದುಕುತ್ತಿದ್ದಾರೆ ಮತ್ತು ಕೆಲಸ ಮಾಡುತ್ತಿದ್ದಾರೆ.

 

ಇತ್ತೀಚೆಗೆ, ರಾಜಸ್ಥಾನದಲ್ಲಿ ಬೃಹತ್ ತೈಲ ಸಂಸ್ಕರಣಾಗಾರವನ್ನು ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ಸಮರ್ಪಿಸಲಾಯಿತು. ಕೆಲವೇ ವಾರಗಳ ಹಿಂದೆ, ದೇಶದ ಮೂರನೇ ಸೆಮಿಕಂಡಕ್ಟರ್ (ಅರೆವಾಹಕ) ಸ್ಥಾವರವನ್ನು ಸಮರ್ಪಿಸಲಾಯಿತು. ಇತ್ತೀಚೆಗೆ, ಹಸಿರು ಜಲಜನಕ ಚಾಲಿತ ರೈಲಿಗೆ ಚಾಲನೆ ನೀಡಲಾಯಿತು; ವಿಶ್ವದ ಕೆಲವೇ ದೇಶಗಳು ಈ ಸೌಲಭ್ಯವನ್ನು ಹೊಂದಿವೆ. ಆದಾಗ್ಯೂ, ಭಾರತವು ತನ್ನ ನಾಗರಿಕರಿಗೆ ಅರ್ಪಿಸಿರುವ ಜಲಜನಕ (ಹೈಡ್ರೋಜನ್) ರೈಲು ಅತ್ಯಂತ ಶಕ್ತಿಶಾಲಿ ಎಂಜಿನ್ ಅನ್ನು ಹೊಂದಿದೆ ಮತ್ತು ಅದು ಈ ಶ್ರೇಣಿಯಲ್ಲಿ ಅತ್ಯಂತ ಉದ್ದವಾದ ರೈಲಾಗಿದೆ. ಈ ಸಾಧನೆಯು ಭಾರತದ ವಿಜ್ಞಾನಿಗಳು, ಎಂಜಿನಿಯರ್ ಗಳು, ನಾವೀನ್ಯಕಾರರು, ಉದ್ಯಮಿಗಳು ಮತ್ತು ಕಾರ್ಮಿಕರ ಸಮರ್ಪಣೆಗೆ ಸಾಕ್ಷಿಯಾಗಿದೆ - ಅವರೆಲ್ಲರೂ ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕಾಗಿ ಒಂದೇ ಗುರಿಯೊಂದಿಗೆ ಬದುಕುತ್ತಿದ್ದಾರೆ ಮತ್ತು ಕೆಲಸ ಮಾಡುತ್ತಿದ್ದಾರೆ.

ಸ್ನೇಹಿತರೇ,

ಜಗತ್ತಿನ ವಿವಿಧ ಭಾಗಗಳಲ್ಲಿ ಯುದ್ಧದ ಸನ್ನಿವೇಶಗಳು ಸಂದರ್ಭಗಳು ನಿರಂತರವಾಗಿ ಉದ್ಭವಿಸುತ್ತಿವೆ ಎಂದು ನಮಗೆ ಚೆನ್ನಾಗಿ ತಿಳಿದಿದೆ - ಮತ್ತು ಇಡೀ ಜಗತ್ತು ಕಳವಳ ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸಿದೆ. ಪಶ್ಚಿಮ ಏಷ್ಯಾದಲ್ಲಿನ ಸಂಘರ್ಷವು ಇಂಧನಕ್ಕಾಗಿ ಇತರರನ್ನು ಅವಲಂಬಿಸಿರುವ ಭಾರತದಂತಹ ದೇಶಗಳಿಗೆ ದೊಡ್ಡ ಬಿಕ್ಕಟ್ಟನ್ನುಂಟುಮಾಡಿದೆ. ಪೆಟ್ರೋಲ್, ಡೀಸೆಲ್, ಎಲ್ ಪಿ ಜಿ, ರಸಗೊಬ್ಬರಗಳು ಮತ್ತು ರಾಸಾಯನಿಕಗಳಿಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದಂತೆ ಹಲವಾರು ಅಡೆತಡೆಗಳು ಮತ್ತು ಬಿಕ್ಕಟ್ಟುಗಳು ಹುಟ್ಟಿಕೊಂಡವು. ಇದರ ಹೊರತಾಗಿಯೂ, ಭಾರತವು ಶೇಕಡಾ 7.7 ರಷ್ಟು ಬೆಳವಣಿಗೆಯ ದರವನ್ನು ಕಾಯ್ದುಕೊಂಡು, ವಿಶ್ವದಲ್ಲೇ ವೇಗವಾಗಿ ಬೆಳೆಯುತ್ತಿರುವ ಪ್ರಮುಖ ಆರ್ಥಿಕತೆಯಾಗಿ ಹೊರಹೊಮ್ಮುತ್ತಿದೆ. ಇದು ಭಾರತದ ಸಾಮರ್ಥ್ಯವನ್ನು ಪ್ರದರ್ಶಿಸುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ರಾಷ್ಟ್ರವು ಹೊಸ ಎತ್ತರವನ್ನು ತಲುಪಲು ಬಯಸುವ ಚೈತನ್ಯ ಮತ್ತು ಉತ್ಸಾಹವನ್ನು ಪ್ರತಿಬಿಂಬಿಸುತ್ತದೆ. ಈ ಮುಂಗಾರು ಅಧಿವೇಶನ ಪ್ರಾರಂಭವಾಗುತ್ತಿದ್ದಂತೆ, ದೇಶವು ವೇಗವನ್ನು ಪಡೆದುಕೊಂಡಿದೆ ಮತ್ತು ಸಂಸತ್ತಿನ ಚೈತನ್ಯವು ಆ ವೇಗಕ್ಕೆ ಹೊಸ ಶಕ್ತಿಯನ್ನು ತುಂಬಬಹುದು. ದೇಶದ ಗುರಿಗಳನ್ನು ಸಾಧಿಸಲು ಸಕಾರಾತ್ಮಕ ಮನೋಭಾವ ಅತ್ಯಗತ್ಯ. ನಮ್ಮ ಸದನವು ಹೆಚ್ಚು ಅನುಭವಿ ಸಂಸತ್ ಸದಸ್ಯರನ್ನು ಒಳಗೊಂಡಿದೆ; ಅವರ ಪಕ್ಷಭೇದವಿಲ್ಲದೆ, ಅವರು ಅನುಭವದ ಸಂಪತ್ತನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ. ಈ ಸಮಯದಲ್ಲಿ, ಸಂಸತ್ತು ಮತ್ತು ರಾಷ್ಟ್ರ ಎರಡಕ್ಕೂ ಅವರ ಅನುಭವ ಮತ್ತು ಜ್ಞಾನದ  ಅಗತ್ಯವಿದೆ. ಇದಕ್ಕಾಗಿ, ಸಂಸತ್ತಿನ ಕಾರ್ಯನಿರ್ವಹಣೆ, ಅರ್ಥಪೂರ್ಣ ಚರ್ಚೆಗಳು ಮತ್ತು ರಾಷ್ಟ್ರವನ್ನು ಮುಂದಕ್ಕೆ ಕೊಂಡೊಯ್ಯುವ ಸಾಮೂಹಿಕ ಸಂಕಲ್ಪ - ನನ್ನ ಅಭಿಪ್ರಾಯದಲ್ಲಿ - ಈ ಸಮಯದ ಅಗತ್ಯವಾಗಿದೆ. ಈ ದೇಶದ ಯುವಕರು, ಮಹತ್ವಾಕಾಂಕ್ಷೆಗಳಿಂದ ತುಂಬಿದ್ದಾರೆ, ನಾವು ಮುಂದುವರಿಯಬೇಕೆಂದು ಬಯಸುತ್ತಾರೆ.  ಇಂದು, ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ಸಮರ್ಪಿತ  ಮತ್ತು ರಾಷ್ಟ್ರಭಕ್ತಿಯಿಂದ ತುಂಬಿದ ಧ್ವನಿಗಳು ಸಂಸತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಸರಿಯಾದ ವೇದಿಕೆಯನ್ನು ಕಂಡುಕೊಳ್ಳಬೇಕು, ತಮ್ಮ ಧ್ವನಿಯನ್ನು ಎತ್ತಿ ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ಮಾರ್ಗದರ್ಶನ ನೀಡಬೇಕು ಎಂಬುದು ಇಂದಿನ ಬೇಡಿಕೆಯಾಗಿದೆ. ಸತ್ಯಗಳು ಮತ್ತು ತರ್ಕಗಳು ಮೇಲುಗೈ ಸಾಧಿಸುವಲ್ಲಿ ಅಡೆತಡೆಗಳಿಗೆ ಜಾಗವಿಲ್ಲ ಎಂದು ನಾನು ಬಲವಾಗಿ ನಂಬುತ್ತೇನೆ. ಬಲವಾದ ವಾದಗಳು ಮತ್ತು ಬಲವಾದ ಸತ್ಯಗಳು ಪ್ರಶಾಂತವಾಗಿಯೂ ಆದರೆ ಪ್ರಬಲವಾಗಿಯೂ ಧ್ವನಿ ಎತ್ತಲು ಅವಕಾಶ ನೀಡುತ್ತವೆ. ಸಂಸತ್ತಿನ ಚರ್ಚೆಗಳು ಸತ್ಯಗಳು ಮತ್ತು ತರ್ಕಗಳಿಂದ ಸಮೃದ್ಧವಾಗಿರುತ್ತವೆ, ಪ್ರತಿಯೊಂದು ಧ್ವನಿಗೆ ಅವಕಾಶ ಸಿಗುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ಪ್ರತಿಯೊಂದು ಆಲೋಚನೆಗೆ ಗೌರವ ಸಿಗುತ್ತದೆ ಎಂದು ನಾನು ಭಾವಿಸುತ್ತೇನೆ. ಸಂಸತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಇದು ನಮ್ಮ ಪಾತ್ರ. ಈ ಅಧಿವೇಶನದಲ್ಲಿ ಸಕ್ರಿಯವಾಗಿ ಪಾಲ್ಗೊಳ್ಳುವಂತೆ ನಾನು ಎಲ್ಲಾ ಸಂಸದರನ್ನು ಆಹ್ವಾನಿಸುತ್ತೇನೆ. ಇಂದು ಬೆಳಿಗ್ಗೆ, ಸಭಾಪತಿಯವರು ಕೂಡ ಸಾಮಾಜಿಕ ಮಾಧ್ಯಮಗಳ ಮೂಲಕ ಸಂಸದರನ್ನು ಸ್ವಾಗತಿಸಿದ್ದಾರೆ. ನಾನು ಅವರ ಧ್ವನಿಯೊಂದಿಗೆ ನನ್ನ ಧ್ವನಿಯನ್ನು ಸೇರಿಸುತ್ತೇನೆ.

ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಬಹಳ ಧನ್ಯವಾದಗಳು.

ನಮಸ್ಕಾರ.