एक हजार साल बाद भी सोमनाथ मंदिर पर ध्वज लहरा रहा है, जो दुनिया को भारत की ताकत और भावना की याद दिलाता है: प्रधानमंत्री
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व एक हजार सालों की यात्रा का प्रतीक है, जो भारत के अस्तित्व और आत्म-गौरव का उत्सव है: प्रधानमंत्री
सोमनाथ का इतिहास विनाश या हार का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है: प्रधानमंत्री
सोमनाथ को नष्ट करने के इरादे से आए लोग आज इतिहास के चंद पन्नों में सिमट कर रह गए हैं, जबकि सोमनाथ का मंदिर विशाल समुद्र के किनारे शान से खड़ा है और इस पर आस्था का ध्वज शान से लहरा रहा है: प्रधानमंत्री
सोमनाथ यह दर्शाता है कि निर्माण में समय लगता है, लेकिन यह स्वयं ही शाश्वत है: प्रधानमंत्री

जय सोमनाथ।

जय सोमनाथ।

गुजरात के लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई पटेल, ऊर्जावान युवा उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी जी, गुजरात सरकार में मंत्री जीतू भाई वाघाणी, अर्जून भाई मोढवाड़िया, डॉ प्रद्युम्न वाजा, कौशिक भाई वेकरिया, सांसद राजेश भाई, अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों। आज देश के कोने-कोने से लाखों लोग जुड़े हमारे साथ, उनको भी मेरी तरफ से जय सोमनाथ।

साथियों,

ये समय अद्भुत है, ये वातावरण अद्भुत है, ये उत्सव अद्भुत है, एक ओर स्वयं देवाधिदेव महादेव, दूसरी ओर समुद्र की विशाल लहरें, सूर्य की ये किरणें, मंत्रों की ये गूंज, आस्था का ये उफान और इस दिव्य वातावरण में, भगवान सोमनाथ के आप सब भक्तों की उपस्थिति, ये इस अवसर को दिव्य बना रही है, भव्य बना रही है। और मैं इसे अपना बहुत बड़ा सौभाग्य मानता हूं, कि सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में, मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सक्रिय सेवा का अवसर मिला है। ये पीछे से कुछ और आवाज चल रही है भाई, इसे बंद किया जाए। 72 घंटों तक अनवरत ओंकार का नाद, 72 घंटों का अनवरत मंत्रोच्चार, और मैंने देखा कल शाम को एक हजार ड्रोन्स द्वारा वैदिक गुरुकुलों के एक हजार विद्यार्थियों की उपस्थिति, सोमनाथ के एक हजार वर्षों की गाथा का प्रदर्शन, और, आज 108 अश्वों के साथ मंदिर तक शौर्य यात्रा, मंत्रों और भजनों की ये अद्भुत प्रस्तुति सब कुछ मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। इस अनुभूति को शब्द अभिव्यक्त नहीं कर सकते, इसे केवल समय ही संकलित कर सकता है। इस आयोजन में गर्व है, गरिमा है, गौरव है और इसमें गरिमा का ज्ञान भी है। इसमें है वैभव की विरासत है। इसमें है अध्यात्म की अनुभूति। अनुभव है, आनंद है, आत्मीयता है और सबसे बढ़कर देवाधिदेव महादेव का आशीर्वाद है। आईये मेरे साथ बोलिए, नम: पार्वती पतये....हर हर महादेव।

साथियों,

आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं, तो मन में बार-बार ये प्रश्न आ रहा है कि, ठीक एक हजार साल पहले, ठीक इसी जगह पर जहां आप बैठे हैं, क्या माहौल रहा होगा, आप जो यहां उपस्थित हैं, उनके पुरखों ने, आपके पुरखों ने, हमारे पुरखों ने, जान की बाजी लगा दी थी। अपनी आस्था के लिए, अपने विश्वास के लिए, अपने महादेव के लिए, उन्होंने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। हजार साल पहले तब वो आततायी सोच रहे थे कि हमें जीत लिया। लेकिन आज एक हजार साल बाद भी, सोमनाथ महादेव के मंदिर पर फहरा रही ध्वजा, पूरी सृष्टि का आह्वान कर रही है कि हिंदुस्तान की शक्ति क्या है, उसका सामर्थ्य क्या है। प्रभास पाटन तीर्थ की इस मिट्टी का कण-कण, शौर्य, पराक्रम और वीरता का साक्षी है। सोमनाथ के इस स्वरूप के लिए, कितने ही शिवभक्तों ने, संस्कृति के उपासको ने, संस्कृति के घ्वजधारकों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। आज सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर, सबसे पहले मैं हर उस वीर-वीरांगना को नमन करता हूं, जिसने सोमनाथ की रक्षा को, मंदिर के पुनर्निमाण को अपना जीवन ध्येय बनाया, अपना सब कुछ देवाधिदेव महादेव को अर्पण कर दिया।

भाइयों बहनों,

प्रभास पाटन का ये क्षेत्र भगवान शिव का अपना क्षेत्र तो है, इसकी पवित्रता भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है। महाभारत काल में पांडवों ने भी इस तीर्थ में तपस्या की थी। इसलिए, ये अवसर भारत के अनगिनत आयामों को नमन करने का भी अवसर है। ये भी एक सुखद संयोग है कि, आज जब सोमनाथ मंदिर की स्वाभिमान यात्रा के एक हजार साल पूरे हो रहे हैं, तो साथ ही, 1951 में हुए इसके पुनर्निमाण के 75 साल भी पूरे हो रहे हैं। मैं दुनियाभर के करोड़ों श्रद्धालुओं को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की शुभकामनाएं देता हूं।

साथियों,

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, 1000 साल पहले हुए विध्वंस के स्मरण के लिए ही नहीं, ये पर्व हजार साल की यात्रा का पर्व है। साथ ही, ये हमारे भारत के अस्तित्व और अभिमान का पर्व है। क्योंकि, हमें हर कदम पर, हर मुकाम पर सोमनाथ और भारत में अनोखी समानताएं दिखती हैं। जैसे सोमनाथ को नष्ट करने के एक नहीं, अनेकों प्रयास हुए, दुष्प्रयास हुए, उसी तरह, विदेशी आक्रांताओं द्वारा कई सदियों तक भारत को खत्म करने की लगातार कोशिशें होती रहीं। लेकिन न सोमनाथ नष्ट हुआ, और न ही भारत नष्ट हुआ! क्योंकि, भारत और भारत की आस्था के केंद्र, एक दूसरे में समाये हुए हैं।

साथियों,

आप उस इतिहास के बारे में कल्पना करिए, आज से हजार साल पहले सन 1026 में सबसे पहले गजनी ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ा, उसे लगा उसने सोमनाथ का वजूद मिटा दिया। लेकिन, कुछ वर्षों के भीतर-भीतर सोमनाथ का पुनर्निमाण हो चुका था। बारहवीं शताब्दी में राजा कुमारपाल ने मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करा दिया था। लेकिन तेरहवीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी ने सोमनाथ पर फिर आक्रमण का दुस्साहस कर दिया। कहते हैं, जालौर के रावल ने खिलजी सेनाओं से जमकर लोहा लिया, इसके बाद चौदहवीं शताब्दी की शुरुआत में जूनागढ़ के राजा द्वारा फिर से सोमनाथ की प्रतिष्ठा संपन्न कर दी गई। चौदहवीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में मुज़फ़्फ़र ख़ान ने सोमनाथ पर फिर हमला किया, वो हमला भी नाकाम रहा। पंद्रहवीं शताब्दी में सुल्तान अहमद शाह ने सोमनाथ मंदिर को दूषित करने की कोशिश की, और इसी शताब्दी में उसके पोते सुल्तान महमूद बेगड़ा ने सोमनाथ पर आक्रमण कर मंदिर को मस्जिद बनाने की कोशिश की, लेकिन, महादेव के भक्तों के प्रयासों से मंदिर पुनः जीवंत हो उठा। सत्रहवीं-अठारवीं शताब्दी में औरंगजेब का दौर आया। उसने सोमनाथ मंदिर को अपवित्र किया, सोमनाथ को फिर मस्जिद बनाने की कोशिश की। उसके बाद भी, अहिल्याबाई होल्कर ने नए मंदिर की स्थापना कर सोमनाथ को एक बार फिर साकार कर दिया। यानी, सोमनाथ का इतिहास विनाश और पराजय का इतिहास नहीं है। ये इतिहास विजय और पुनर्निर्माण का है। हमारे पूर्वजों के पराक्रम का है, हमारे पूर्वजों के त्याग और बलिदानका है। आततायी आते रहे, मजहबी आतंक के नए-नए आक्रमण होते रहे, लेकिन, हर युग में सोमनाथ पुनः-पुनः स्थापित होता रहा। इतनी सदियों तक का ये संघर्ष, इतना लंबा प्रतिकार, इतना महान धैर्य, सृजन और पुनर्निर्माण का ऐसा जीवट, ये सामर्थ्य, अपनी संस्कृति में ऐसा विश्वास और ऐसी आस्था, दुनिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। जरा मुझे जवाब देना भाई, हमें अपने पूर्वजों के पराक्रम का पुनः स्मरण करना चाहिए की नहीं ? अपने पूर्वजों द्वारा किए हुए पराक्रमो में से प्रेरणा लेनी चाहिए या नहीं लेनी चाहिए? ऐसा कोई पुत्र होता है, ऐसी कोई संतान होती है जो अपने पूर्वजो के पराक्रमो को भूलने का नाटक करें।

भाइयों बहनों,

जब गजनी से लेकर औरंगजेब तक, तमाम आक्रांता सोमनाथ पर हमला कर रहे थे, तो उन्हें लग रहा था कि उनकी तलवार सनातन सोमनाथ को जीत रही है। वो मजहबी कट्टरपंथी ये नहीं समझ पाये कि जिस सोमनाथ को वो नष्ट करना चाहते हैं, उनके नाम में ही सोम अर्थात् अमृत जुड़ा हुआ है। उसमें हलाहल को पीकर भी अमर रहने का विचार जुड़ा है। उसके भीतर सदाशिव महादेव के रूप में वो चैतन्य शक्ति प्रतिष्ठित है, जो कल्याणकारक भी हैं, और “प्रचण्ड ताण्डवः शिवः” ये शक्ति का स्रोत भी है।

भाइयों बहनों,

सोमनाथ में विराजमान महादेव, उनका एक नाम मृत्युंजय भी है। मृत्युंजय, जिसने मृत्यु को जीत लिया हो! जो स्वयं काल-स्वरूप है।यतो जायते पाल्यते येन विश्वं, तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम! अर्थात्, ये सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न होती है, उन्हीं में लय हो जाती है। हम मानते हैं- त्वमेको जगत् व्यापको विश्व रूप! यानी, शिव पूरे जगत में व्याप्त हैं। इसीलिए, हम कण-कण, कंकड़-कंकड़ में भी उस शंकर को देखते हैं। फिर, कोई उन शंकर के कितने स्वरूपों को नष्ट कर सकता था? हम तो वो लोग हैं जो जीव में भी शिव को देखते हैं! उनसे हमारी आस्था को कोई कैसे डिगा सकता था?

और साथियों,

ये समय चक्र है, कि सोमनाथ को ध्वस्त करने की मंशा लेकर आए मजहबी आततायी, आज इतिहास के कुछ पन्नों में सिमटकर रह गए हैं। और, सोमनाथ मंदिर उसी विशाल समंदर के किनारे गगनचुंबी धर्म-ध्वजा को थामे खड़ा है। सोमनाथ का ये शिखर मानो उद्घोष कर रहा है- चन्द्रशेखरम् आश्रये मम किं करिष्यति वै यमः! अर्थात्, मैं चंद्रशेखर शिव पर आश्रित हूँ, काल भी मेरा क्या कर लेगा?

साथियों,

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व इतिहास के गौरव का पर्व तो है ही, ये एक कालातीत यात्रा को भविष्य के लिए जीवंत बनाने का माध्यम भी है। हमें इस अवसर को अपने अस्तित्व और पहचान को सशक्त करने के लिए उपयोग करना है। आप भी देखते हैं, अगर कहीं किसी देश के पास कुछ सौ साल पुरानी विरासत होती है, वो देश उसे अपनी पहचान बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है। वहीं भारत के पास सोमनाथ जैसे हजारों साल पुराने पुण्य स्थान हैं। ये स्थान हमारी सामर्थ्य, प्रतिरोध और परंपरा के पर्याय रहे हैं। लेकिन, दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद गुलामी की मानसिकता वाले लोगों ने उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश की! उस इतिहास को भुलाने के कुत्सित प्रयास हुये! हम जानते हैं, सोमनाथ की रक्षा के लिए देश ने कैसे-कैसे बलिदान दिये थे। रावल कान्हड़देव जैसे शासकों के प्रयास, वीर हमीरजी गोहिल का पराक्रम, वेगड़ा भील का शौर्य, ऐसे कितने ही नायकों का इतिहास सोमनाथ मंदिर से जुड़ा है। लेकिन, दुर्भाग्य से इन्हें कभी उतना महत्व नहीं दिया गया। बल्कि, आक्रमण के इतिहास को भी कुछ इतिहासकारों और राजनेताओं द्वारा ‘व्हाइट वॉश’ करने की कोशिश की गई! मजहबी उन्माद की मानसिकता को केवल साधारण लूट बताकर ढंकने के लिए किताबें लिखी गईं। सोमनाथ मंदिर एक बार नहीं, बार-बार तोड़ा गया। अगर सोमनाथ पर आक्रमण केवल आर्थिक लूट के लिए हुए होते, तो हजार साल पूर्व, पहली बड़ी लूट के बाद रुक गए होते! लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। सोमनाथ के पवित्र विग्रह को तोड़ा गया। बार-बार मंदिर का स्वरूप बदलने की कोशिशें हुईं। और हमें पढ़ाया गया कि सोमनाथ को लूट के लिए तोड़ा गया था। नफरत, अत्याचार और आतंक का असली क्रूर इतिहास, हमसे छिपाया गया।

साथियों,

अपने धर्म के प्रति ईमानदार कोई भी व्यक्ति ऐसी कट्टरपंथी सोच का समर्थन नहीं करेगा। लेकिन, तुष्टीकरण के ठेकेदारों ने हमेशा इस कट्टरपंथी सोच के आगे घुटने टेके। जब भारत गुलामी की बेड़ियों से मुक्त हुआ, जब सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की शपथ ली, तो उन्हें भी रोकने की कोशिश की गई। 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के यहां आने पर भी आपत्ति जताई गई। उस समय सौराष्ट्र के सर्वाधिक मसहूर हमारे जाम साहब महाराजा दिग्विजय सिंह जी आगे आए थे। भूमि अधिग्रहण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक, उन्होंने राष्ट्रीय गौरव को सबसे ऊपर रखा था। उस दौर में सोमनाथ मंदिर के लिए जाम साहब ने 1 लाख रुपए का दान दिया। और उन्होंने ट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष के रूप में बड़ी ज़िम्मेदारी निभाई।

भाइयों बहनों,

दुर्भाग्य से, आज भी हमारे देश में वो ताकते मौजूद हैं, पूरी तरह सक्रिय हैं, जिन्होंने सोमनाथ पुनर्निर्माण का विरोध किया। आज तलवारों की जगह दूसरे कुत्सित तरीकों से भारत के खिलाफ षड्यंत्र हो रहे हैं। और इसलिए हमें ज्यादा सावधान रहना है, हमें खुद को शक्तिशाली बनाना है। हमें एक रहना है, एकजुट रहना है, ऐसी हर ताकत को हराना है जो हमें बांटने की साजिशें रच रही हैं।

साथियों,

जब हम अपनी आस्था से जुड़े रहते हैं, अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, पूरे स्वाभिमान के साथ अपनी विरासत का संरक्षण करते हैं, अपनी विरासत के प्रति सजग रहते हैं, तो हमारी सभ्यता की जड़ें भी मजबूत होती हैं। और इसीलिए, पिछले एक हजार वर्षों की यात्रा, हमें अगले एक हजार वर्षों के लिए तैयार रहने की प्रेरणा देती है।

साथियों,

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर, मैंने भारत के लिए हजार साल का विराट स्वप्न सामने रखा था। मैंने ‘देव से देश’ के विजन के साथ आगे बढ़ने की बात कही थी। आज देश का सांस्कृतिक पुनर्जागरण करोड़ों देशवासियों में नया विश्वास भर रहा है। आज हर देशवासी के मन में विकसित भारत को लेकर एक भरोसा है। आज 140 करोड़ भारतीय भविष्य के लक्ष्यों को लेकर संकल्पित हैं। भारत अपने गौरव को नई बुलंदी देगा, हम गरीबी के खिलाफ अपनी लड़ाई में जीतेंगे, हम विकास की नई ऊंचाइयों को छुएंगे! पहले दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य, फिर उसके आगे का सफर, देश अब इसके लिए तैयार हो चुका है। और सोमनाथ मंदिर की ये ऊर्जा, हमारे इन संकल्पों को आशीर्वाद दे रही है।

साथियों,

आज का भारत विरासत से विकास की प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रहा है। सोमनाथ में विकास भी विरासत भी ये भावना निरंतर साकार हो रही है। आज एक ओर, सोमनाथ मंदिर का सांस्कृतिक विस्तार, सोमनाथ संस्कृत यूनिवर्सिटी की स्थापना, माधवपुर मेले की लोकप्रियता और उसके रंग, इनसे हमारी विरासत मजबूत हो रही है, गिर लायन के संरक्षण से इस क्षेत्र का प्राकृतिक आकर्षण बढ़ रहा है, तो वहीं, प्रभास पाटन क्षेत्र विकास के नए आयाम भी गढ़े जा रहे हैं। केशोद एयरपोर्ट का विस्तार किया जा रहा है। इससे देश-विदेश से श्रद्धालु सीधे सोमनाथ तक पहुंच सकेंगे। अहमदाबाद से वेरावल वंदे भारत ट्रेन की शुरुआत से तीर्थयात्रियों और पर्यटकों का समय कम हुआ है। इस क्षेत्र में यात्राधाम सर्किट का विकास भी किया जा रहा है। यानी, आज का भारत आस्था को स्मरण करने के साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और टेक्नॉलॉजी के जरिए उसे भविष्य के लिए सशक्त भी कर रहा है।

 

साथियों,

हमारी सभ्यता का संदेश कभी किसी को पराजित करने का नहीं रहा, बल्कि जीवन को संतुलन में रखने का रहा है। हमारे यहां आस्था की राह हमें घृणा की तरफ नहीं ले जाती। हमारे यहाँ शक्ति हमें विनाश करने का अहंकार नहीं देती। सोमनाथ जैसे तीर्थ ने हमें सिखाया है कि, सृजन का मार्ग लंबा होता है, लेकिन वही स्थायी होता है, चिरंजीव होता है। तलवार की नोक पर कभी दिलों को नहीं जीता जा सकता, जो सभ्यताएं दूसरों को मिटाकर आगे बढ़ना चाहती हैं, वे स्वयं समय में खो जाती हैं। इसीलिए, भारत ने दुनिया को ये नहीं सिखाया कि दूसरे को हराकर कैसे जीता जाए, बल्कि ये सिखाया कि कैसे दिलों को जीतकर जिया जाए। ये विचार आज दुनिया की जरूरत हैं। सोमनाथ की हजार वर्षों की गाथा पूरी मानवता को ये सीख दे रही है। इसलिए आइए, हम संकल्प करें, हम विकास की ओर आगे बढ़ें, कदम से कदम मिलाकर चलें, कंधे से कंधा मिलाकर चलें, मन से मन को जोड़कर चलें, लक्ष्य को ओझल दिए हुए बिना हम चलते चलें, और साथ ही अपने अतीत और अपनी विरासत से भी जुड़े रहें। हम आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी चेतना को संभाले रखें। आइए, सोमनाथ स्वाभिमान पर्व जैसे आयोजनों से प्रेरणा लेते हुए, विकसित होने के मार्ग पर तेजी से चलें। हर चुनौती को पार करते हुए, हम अपने लक्ष्य तक पहुंचें और ये कार्यक्रम आज तो शुरू हो रहा है, हमें हजार साल का स्मरण देश के कोन-कोने में करना है, दुनिया को हमारी विरासत का परिचय करवाना है, हमें 75 साल का ये नया पर्व भी मनाना है, और हम 2027 मई तक इसको मनाते रहें, जन-जन को जगाते रहें , जगा हुआ देश सपनों को साकार करने के लिए चलता रहे, इसी कामना के साथ, एक बार फिर समस्त देशवासियों को मैं बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

हर हर महादेव।

जय सोमनाथ।

जय सोमनाथ।

जय सोमनाथ।

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भारत-न्यूजीलैंड की मित्रता को नयी गति और नयी दिशा मिली: गाला लंच में पीएम मोदी
July 11, 2026

Your Excellency, Prime Minister क्रिस्टोफर लक्सन,

दोनों देशों के delegates,

नमस्कार!

किया ओरा!

मेरे और मेरे delegation के ऊष्मा भरे स्वागत और आतिथ्य के लिए मैं मेरे मित्र प्रधानमंत्री लक्सन का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। उन्होंने स्वागत में इतनी गर्मजोशी दिखाई है, कि ऑकलैंड की सर्दी भी आज कुछ कम लग रही है। इस यात्रा के दौरान न्यूजीलैंड के लोगों से जो स्नेह और अपनापन मिला है, वह हमारे हृदय में हमेशा रहेगा।

पिछले वर्ष प्रधानमंत्री लक्सन की भारत यात्रा से हमारे संबंधों के हर क्षेत्र में नई ऊर्जा आई है। उनके नेतृत्व, स्पष्ट विजन, और मजबूत प्रतिबद्धता से, भारत और New Zealand की मित्रता को नयी गति और नयी दिशा मिली है। आज चालीस वर्षों के बाद भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा हो रही है। और मैं हमेशा कहता हूँ, कि बहुत सारे अच्छे काम है, जो मेरे पहले वाले लोग मेरे लिए छोड़ के गए हैं, जो मैं पूरा कर रहा हूँ। साथियों, यह हमारे संबंधों के एक नए अध्याय का शुभारंभ है।

Friends,

भारत और न्यूजीलैंड का लोकतान्त्रिक मूल्यों में दृढ़ विश्वास हमें मिलकर आगे बढ़ने के लिए natural comfort प्रदान करता है। पिछले कुछ वर्षों में हमने हमारे सबंधों को अभूतपूर्व गति प्रदान की है।

आज आज की बैठक में हमने हमारे सहयोग को नई गहराई और व्यापकता देने पर विस्तार से चर्चा की। हमने भारत-न्यूजीलैंड संबंधों को Strategic Partnership के स्तर पर ले जाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत हम हर क्षेत्र में स्पष्ट लक्ष्यों और ठोस परिणामों के साथ आगे बढ़ेंगे।

इस वर्ष हमने रिकॉर्ड समय में Free Trade Agreement किया। इस उपलब्धि से दोनों देशों के उद्योगों, किसानों और युवाओं के लिए नए द्वार खुलेंगे। हम trade के साथ साथ trust, technology और talent का blue print तैयार कर रहे हैं।

पिछले तीन वर्षों में हमारे व्यापार में 50 पर्सेन्ट से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। हमें विश्वास है कि FTA अगले पाँच वर्षों में हमारे व्यापार को दोगुना करने का मजबूत आधार बनेगा।

न्यूजीलैंड द्वारा भारत में बीस बिलियन डॉलर के investment commitment का भी हम विशेष स्वागत करते हैं। यह न्यूज़ीलैंड की companies को भारत की growth story में long-term partner बनने का अवसर देगा।

Friends,

हमारी Strategic Partnership को सार्थक बनाने के लिए हम दोनों देशों की strengths को practical cooperation में बदल रहे हैं। Fin Tech के क्षेत्र में हम भारत के UPI और न्यूजीलैंड के payment systems को जोड़ने पर आगे बढ़ रहे हैं।

Agriculture, dairy और food processing में हमने सहयोग का एक मजबूत खाका बनाया है। इसका लाभ हमारे किसानों और पशु-पालकों को मिलेगा।

Traditional medicine में न्यूज़ीलैंड और भारत दोनों की समृद्ध और जीवंत परंपराएं हैं। आज हमने हमारे स्वास्थ्य सहयोग में traditional medicines की भूमिका बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की।

रक्षा और सुरक्षा में हमारा बढ़ता सहयोग हमारे गहरे strategic trust का प्रतीक है। पिछले वर्ष किए गए Defence Cooperation Agreement से हमारे सहयोग का मजबूत ढांचा तैयार हुआ है। आज हमने इंडो-पैसिफिक में maritime cooperation के लिए एक फ्रैम्वर्क पर सहमति बनाई है। Bilateral naval exercises, Logistics support और hydrography में सहयोग से हमारा आपसी तालमेल बढ़ेगा।

Friends,

हमारे संबंधों की सबसे मजबूत ताकत हमारे people-to-people ties हैं। भारतीय समुदाय के लोगों ने अपने परिश्रम और talent से न्यूजीलैंड में विशेष स्थान बनाया है। उनकी देखरेख के लिए मैं प्रधानमंत्री लक्सन और न्यूजीलैंड सरकार और न्यूजीलैंड के लोगों का आभार व्यक्त करता हूँ।

आज हुआ Cultural Cooperation MOU दोनों देशों के art, culture, heritage तथा creative industries में exchanges को गति देगा। न्यूजीलैंड भारतीय students के लिए एक महत्वपूर्ण destination रहा है। हम न्यूजीलैंड की universities को भारत में campus खोलने के लिए आमंत्रित करते हैं।

इस वर्ष हम दोनों देशों के बीच खेल संबंधों की सौवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। सौ साल पहले मेजर ध्यानचंद के नेतृत्व में हॉकी टीम ने यहाँ आकर जो इतिहास रचा था, वह हमारी खेल साझेदारी को आज भी प्रेरित कर रहा है। इस उपलक्ष्य पर हम दोनों देशों में कई स्पोर्ट्स इवेंट्स आयोजित कर रहे हैं। क्रिकेट के साथ-साथ अन्य खेलों में भी सहयोग बढ़ाने के लिए हम Sports Joint Action Plan बनाया है। हाल ही में भुवनेश्वर में न्यूजीलैंड रग्बी और रग्बी इंडिया के कोचिंग प्रोग्राम से अच्छी शुरुवात हुवी है।

Friends,

वैश्विक मंच पर भी भारत और न्यूज़ीलैंड भरोसेमंद साझेदार और करीबी मित्र हैं। हमारा मानना है कि वर्तमान समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए UN सहित अन्य वैश्विक संस्थानों में reform आवश्यक है।

आतंकवाद के विषय पर कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ाने के लिए आज हमने Joint Working Group का गठन किया है। भारत और न्यूजीलैंड के बीच सहयोग इंडो-पेसिफिक में शांति, स्थिरता और सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Friends, मैं आप सभी को माओरी नव वर्ष “मातरिकी” की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। जिस तारा-समूह को यहाँ “मातरिकी” नाम दिया गया है, जैसे आपने भी बताया, उसे भारत में प्राचीन काल से “कृत्तिका नक्षत्र” के रूप में जाना जाता है। मुझे विश्वास है कि “मातरिकी” का यह पर्व, हमारे संबंधों को इन्हीं सितारों की तरह जगमगाने की प्रेरणा देगा।

Prime Minister लक्सन,

आपकी मित्रता, आपकी प्रतिबद्धता और मेरी न्यूज़ीलैंड यात्रा को यादगार बनाने के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ। जैसे रग्बी में टीमवर्क और भरोसा ज़रूरी होता है, वैसे ही हम भी आपसी विश्वास के साथ आगे बढ़ेंगे। हम एक ही टीम में है, इसलिए टैकल केवल चुनौतियों को करेंगे।

बहुत-बहुत धन्यवाद।