सिंहस्थ कुंभ सम्मेलन में एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है: प्रधानमंत्री मोदी
हम एक ऐसी परंपरा से जुड़े हैं जहां एक भिक्षुक भी कहता है - सबका भला हो, सबका कल्याण हो: प्रधानमंत्री
हमें कुंभ जैसे विशाल सम्मेलन को आयोजित करने की अपनी क्षमता के बारे में पूरे विश्व को बताना चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी
आईए हम हर वर्ष ‘विचार कुंभ’ आयोजित करें...हमें वृक्ष लगाने, बालिकाओं को शिक्षित करने आदि की जरुरत क्यों है, इस पर चर्चा करें: पीएम मोदी

हम लोगों का एक स्वभाव दोष रहा है, एक समाज के नाते कि हम अपने आपको हमेशा परिस्थितियों के परे समझते हैं। हम उस सिद्धांतों में पले-बढ़े हैं कि जहां शरीर तो आता और जाता है। आत्मा के अमरत्व के साथ जुड़े हुए हम लोग हैं और उसके कारण हमारी आत्मा की सोच न हमें काल से बंधने देती है, न हमें काल का गुलाम बनने देती है लेकिन उसके कारण एक ऐसी स्थिति पैदा हुई कि हमारी इस महान परंपरा, ये हजारों साल पुरानी संस्कृति, इसके कई पहलू, वो परंपराए किस सामाजिक संदर्भ में शुरू हुई, किस काल के गर्भ में पैदा हुई, किस विचार मंथन में से बीजारोपण हुआ, वो करीब-करीब अलब्य है और उसके कारण ये कुंभ मेले की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई होगी उसके विषय में अनेक प्रकार के विभिन्न मत प्रचलित हैं, कालखंड भी बड़ा, बहुत बड़ा अंतराल वाला है।

कोई कहेगा हजार साल पहले, कोई कहेगा 2 हजार साल पहले लेकिन इतना निश्चित है कि ये परंपरा मानव जीवन की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्थाओं में से एक है। मैं अपने तरीक से जब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि कुंभ का मेला, वैसे 12 साल में एक बार होता है और नासिक हो, उज्जैन हो, हरिद्वार हो वहां 3 साल में एक बार होता है प्रयागराज में 12 साल में एक बार होता है। उस कालखंड को हम देखें तो मुझे लगता है कि एक प्रकार से ये विशाल भारत को अपने में समेटने का ये प्रयास ये कुंभ मेले के द्वारा होता था। मैं तर्क से और अनुमान से कह सकता हूं कि समाज वेदता, संत-महंत, ऋषि, मुनि जो हर पल समाज के सुख-दुख की चर्चा और चिंता करते थे। समाज के भाग्य और भविष्य के लिए नई-नई विधाओं का अन्वेषण करते थे, Innovation करते थे। इन्हें वे हमारे ऋषि जहां भी थे वे बाह्य जगत का भी रिसर्च करते थे और अंतर यात्रा को भी खोजने का प्रयास करते थे तो ये प्रक्रिया निरंतर चलती रही, सदियों तक चलती रही, हर पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही लेकिन संस्कार संक्रमण का काम विचारों के संकलन का काम कालानुरूप विचारों को तराजू पर तौलने की परंपरा ये सारी बातें इस युग की परंपरा में समहित थी, समाहित थी।

एक बार प्रयागराज के कुंभ मेले में बैठते थे, एक Final decision लिया जाता था सबके द्वारा मिलकर के कि पिछले 12 साल में समाज यहां-यहां गया, यहां पहुंचा। अब अगले 12 साल के लिए समाज के लिए दिशा क्या होगी, समाज की कार्यशैली क्या होगी किन चीजों की प्राथमिकता होगी और जब कुंभ से जाते थे तो लोग उस एजेंडा को लेकर के अपने-अपने स्थान पर पहुंचते थे और हर तीन साल के बाद जबकि कभी नासिक में, कभी उज्जैन में, कभी हरिद्वार में कुंभ का मेला लगता था तो उसका mid-term appraisal होता था कि भई प्रयागराज में जो निर्णय हम करके गए थे तीन साल में क्या अनुभव आया और हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोग आते थे।

30 दिन तक एक ही स्थान पर रहकर के समाज की गतिविधियों, समाज की आवश्यकताएं, बदलता हुआ युग, उसका चिंतन-मनन करके उसमें फिर एक बार 3 साल का करणीय एजेंडा तय होता था। In the light of main Mahakumbh प्रयागराज में होता था और फिर 3 साल के बाद दूसरा जब कुंभ लगता था तो फिर से Review होता था। एक अद्भुत सामाजिक रचना थी ये लेकिन धीरे-धीरे अनुभव ये आता है कि परंपरा तो रह जाती है, प्राण खो जाता है। हमारे यहां भी अनुभव ये आया कि परंपरा तो रह गई लेकिन समय का अभाव है, 30 दिन कौन रहेगा, 45 दिन कौन रहेगा। आओ भाई 15 मिनट जरा डुबकी लगा दें, पाप धुल जाए, पुण्य कमा ले और चले जाए।

ऐसे जैसे बदलाव आय उसमें से उज्जैन के इस कुंभ में संतों के आशीर्वाद से एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है और ये नया प्रयास एक प्रकार से उस सदियों पुरानी व्यवस्था का ही एक Modern edition है और जिसमें वर्तमान समझ में, वैश्विक संदर्भ में मानव जाति के लिए क्या चुनौतियां हैं, मानव कल्याण के मार्ग क्या हो सकते हैं। बदलते हुए युग में काल बाह्य चीजों को छोड़ने की हिम्मत कैसे आए, पुरानी चीजों को बोझ लेकर के चलकर के आदमी थक जाता है। उन पुरानी काल बाह्य चीजों को छोड़कर के एक नए विश्वास, नई ताजगी के साथ कैसे आगे बढ़ जाए, उसका एक छोटा सा प्रयास इस विचार महाकुंभ के अंदर हुआ है।

जो 51 बिंदु, अमृत बिंदु इसमें से फलित हुए हैं क्योंकि ये एक दिन का समारोह नहीं है। जैसे शिवराज जी ने बताया। देश औऱ दुनिया के इस विषय के जानकार लोगों ने 2 साल मंथन किया है, सालभर विचार-विमर्श किया है और पिछले 3 दिन से इसी पवित्र अवसर पर ऋषियों, मुनियों, संतों की परंपरा को निभाने वाले महान संतों के सानिध्य में इसका चिंतन-मनन हुआ है और उसमें से ये 51 अमृत बिंदु समाज के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। मैं नहीं मानता हूं कि हम राजनेताओं के लिए इस बात को लोगों के गले उतारना हमारे बस की बात है। हम नहीं मानते हैं लेकिन हम इतना जरूर मानते हैं कि समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग चाहे वो गेरुए वस्त्र में हो या न हो लेकिन त्याग और तपस्था के अधिष्ठान पर जीवन जीते हैं। चाहे एक वैज्ञानिक अपनी laboratory में खपा हुआ हो, चाहे एक किसान अपने खेत में खपा हुआ हो, चाहे एक मजदूर अपना पसीना बहा रहा हे, चाहे एक संत समाज का मार्गदर्शन करता हो ये सारी शक्तियां, एक दिशा में चल पड़ सकती हैं तो कितना बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं और उस दिशा में ये 51 अमृत बिंदु जो है आने वाले दिनों में भारत के जनमानस को और वैश्विक जनसमूह को भारत किस प्रकार से सोच सकता है और राजनीतिक मंच पर से किस प्रकार के विचार प्रभाग समयानुकूल हो सकते हैं इसकी चर्चा अगर आने वाले दिनों में चलेगी, तो मैं समझता हूं कि ये प्रयास सार्थक होगा।


हम वो लोग हैं, जहां हमारी छोटी-छोटी चीज बड़ी समझने जैसी है। हम उस संस्कार सरिता से निकले हुए लोग हैं। जहां एक भिक्षुक भी भिक्षा मांगने के लिए जाता है, तो भी उसके मिहिल मुंह से निकलता है ‘जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला’। ये छोटी बात नहीं है। ये एक वो संस्कार परम्परा का परिणाम है कि एक भिक्षुक मुंह से भी शब्द निकलता है ‘देगा उसका भी भला जो नहीं देगा उसका भी भला’। यानी मूल चिंतन तत्वभाव यह है कि सबका भला हो सबका कल्याण हो। ये हर प्रकार से हमारी रगों में भरा पड़ा है। हमी तो लोग हैं जिनको सिखाया गया है। तेन तत्तेन भूंजीथा। क्या तर के ही भोगेगा ये अप्रतीम आनन्द होता है। ये हमारी रगों में भरा पड़ा है। जो हमारी रगों में है, वो क्या हमारे जीवन आचरण से अछूता तो नहीं हो रहा है। इतनी महान परम्परा को कहीं हम खो तो नहीं दे रहे हैं। लेकिन कभी उसको जगजोड़ा किया जाए कि अनुभव आता है कि नहीं आज भी ये सामर्थ हमारे देश में पड़ा है।

किसी समय इस देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश को आहवान किया था कि सप्ताह में एक दिन शाम का खाना छोड़ दीजिए। देश को अन्न की जरूरत है। और इस देश के कोटी-कोटी लोगों ने तेन त्यक्तेन भुंजीथा इसको अपने जीवन में चरितार्थ करके, करके दिखाया था। और कुछ पीढ़ी तो लोग अभी भी जिन्दा हैं। जो लालबहादुर शास्त्री ने कहा था। सप्ताह में एक दिन खाना नहीं खाते हैं। ऐसे लोग आज भी हैं। तेन त्यक्तेन भुंजीथा का मंत्र हमारी रगों में पला है। पिछले दिनों में ऐसे ही बातों-बातों में मैंने पिछले मार्च महीने में देश के लोगों के सामने एक विषय रखा था। ऐसे ही रखा था। रखते समय मैंने भी नहीं सोचा था कि मेरे देश के जनसामान्य का मन इतनी ऊंचाइयों से भरा पड़ा है। कभी-कभी लगता है कि हम उन ऊंचाईयों को पहुंचने में कम पड़ जाते हैं। मैंने इतना ही कहा था। अगर आप सम्पन्न हैं, आप समर्थ हैं, तो आप रसोई गैस की सब्सिडी क्या जरूरत है छोड़ दीजिये न। हजार-पंद्रह सौ रुपये में क्या रखा है। इतना ही मैंने कहा था। और आज मैं मेरे देश के एक करोड़ से ज्यादा परिवारों के सामने सर झुका कर कहना चाहता हूं और दुनिया के सामने कहना चाहता हूं। एक करोड़ से ज्यादा परिवारों ने अपनी गैस सब्सिडी छोड़ दी। तेन त्यक्तेन भुंजीथा । और उसका परिणाम क्या है। परिणाम शासन व्यवस्था पर भी सीधा होता है। हमारे मन में विचार आया कि एक करोड़ परिवार गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ रहे हैं तो इसका हक़ सरकार की तिजोरी में भरने के लिये नहीं बनता है।

ये फिर से गरीब के घर में जाना चाहिए। जो मां लकड़ी का चूल्हा जला कर के एक दिन में चार सौ सिगरेट जितना धुआं अपने शरीर में ले जाती है। उस मां को लकड़ी के चूल्हे से मुक्त करा के रसोई गैस देना चाहिए और उसी में से संकल्प निकला कि तीन साल में पांच करोड़ परिवारों को गैस सिलेंडर दे कर के उनको इस धुएं वाले चूल्हे से मुक्ति दिला देंगे।

यहाँ एक चर्चा में पर्यावरण का मुद्दा है। मैं समझता हूं पांच करोड़ परिवारों में लकड़ी का चूल्हा न जलना ये जंगलों को भी बचाएगा, ये कार्बन को भी कम करेगा और हमारी माताओं को गरीब माताओं के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन लाएगा। यहां पर नारी की एम्पावरमेंट की बात हुई नारी की dignity की बात हुई है। ये गैस का चूल्हा उसकी dignity को कायम करता है। उसकी स्वास्थ्य की चिंता करता है और इस लिए मैं कहता हूं - तेन त्यक्तेन भुंजीथा । इस मंत्र में अगर हम भरोसा करें। सामान्य मानव को हम इसका विश्वास दिला दें तो हम किस प्रकार का परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं। ये अनुभव कर रहे हैं।

हमारा देश, मैं नहीं मानता हूं हमारे शास्त्रों में ऐसी कोई चीज है, जिसके कारण हम भटक जाएं। ये हमलोग हैं कि हमारी मतलब की चीजें उठाते रहते हैं और पूर्ण रूप से चीजों को देखने का स्वभाव छोड़ दिया है। हमारे यहां कहा गया है – नर करनी करे तो नारायण हो जाए - और ये हमारे ऋषियों ने मुनियों ने कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर भक्ति करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा है। क्या कभी उन्होंने ये कहा है कि नर कथा करे तो नारायण हो जाए। नहीं कहा। संतों ने भी कहा हैः नर करनी करे तो नारायण हो जाए और इसीलिए ये 51 अमृत बिन्दु हमारे सामने है। उसका एक संदेश यही है कि नर करनी करे तो नारायण हो जाए। और इसलिए हम करनी से बाध्य होने चाहिए और तभी तो अर्जुन को भी यही तो कहा था योगः कर्मसु कौशलम्। यही हमारा योग है, जिसमें कर्म की महानता को स्वीकार किया गया है और इसलिए इस पवित्र कार्य के अवसर पर हम उस विचार प्रवाह को फिर से एक बार पुनर्जीवित कर सकते हैं क्या तमसो मा ज्योतिरगमय। ये विचार छोटा नहीं है। और प्रकाश कौनसा वो कौनसी ज्योति ये ज्योति ज्ञान की है, ज्योति प्रकाश की है। और हमी तो लोग हैं जो कहते हैं कि ज्ञान को न पूरब होता है न पश्चिम होता है। ज्ञान को न बीती हुई कल होती है, ज्ञान को न आने वाली कल होती है। ज्ञान अजरा अमर होता है और हर काल में उपकारक होता है। ये हमारी परम्परा रही है और इसलिए विश्व में जो भी श्रेष्ठ है इसको लेना, पाना, पचाना internalize करना ये हमलोगों को सदियों से आदत रही है।

हम एक ऐसे समाज के लोग हैं। जहां विविधताएं भी हैं और कभी-कभी बाहर वाले व्यक्ति को conflict भी नजर आता है। लेकिन दुनिया जो conflict management को लेकर के इतनी सैमिनार कर रही है, लेकिन रास्ते नहीं मिल रहे। हमलोग हैं inherent conflict management का हमें सिखाया गया है। वरना दो extreme हम कभी भी नहीं सोच सकते थे। हम भगवान राम की पूजा करते हैं, जिन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया था। और हम वो लोग हैं, जो प्रहलाद की भी पूजा करते हैं, जिसने पिता की आज्ञा की अवमानना की थी। इतना बड़ा conflict, एक वो महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा को माना वो भी हमारे पूजनीय और एक दूसरा महापुरुष जिसने पिता की आज्ञा क का अनादर किया वो भी हमारा महापुरुष।

हम वो लोग हैं जिन्होंने माता सीता को प्रणाम करते हैं। जिसने पति और ससुर के इच्छा के अनुसार अपना जीवन दे दिया। और उसी प्रकार से हम उस मीरा की भी भक्ति करते हैं जिसने पति की आज्ञा की अवज्ञा कर दी थी। यानी हम किस प्रकार के conflict management को जानने वाले लोग हैं। ये हमारी स्थिति का कारण क्या है और कारण ये है कि हम हठबाधिता से बंधे हुए लोग नहीं हैं। हम दर्शन के जुड़े हुए लोग हैं। और दर्शन, दर्शन तपी तपाई विचारों की प्रक्रिया और जीवन शैली में से निचोड़ के रूप में निकलता रहता है। जो समयानुकूल उसका विस्तार होता जाता है। उसका एक व्यापक रूप समय में आता है। और इसलिए हम उस दर्शन की परम्पराओं से निकले हुए लोग हैं जो दर्शन आज भी हमें इस जीवन को जीने के लिए प्रेरणा देता है।

यहां पर विचार मंथन में एक विषय यह भी रहा – Values, Values कैसे बदलते हैं। आज दुनिया में अगर आप में से किसी को अध्ययन करने का स्वभाव हो तो अध्ययन करके देखिये। दुनिया के समृद्ध-समृद्ध देश जब वो चुनाव के मैदान में जाते हैं, तो वहां के राजनीतिक दल, वहां के राजनेता उनके चुनाव में एक बात बार-बार उल्लेख करते हैं। और वो कहते हैं – हम हमारे देश में families values को पुनःप्रस्थापित करेंगे। पूरा विश्व, परिवार संस्था, पारिवारिक जीवन के मूल्य उसका महत्व बहुत अच्छी तरह समझने लगा है। हम उसमें पले बड़े हैं। इसलिये कभी उसमें छोटी सी भी इधर-उधर हो जाता है तो पता नहीं चलता है कि कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। लेकिन हमारे सामने चुनौती है कि values और values यानी वो विषय नहीं है कि आपकी मान्यता और मेरी मान्यता। जो समय की कसौटी पर कस कर के खरे उतरे हैं, वही तो वैल्यूज़ होते हैं। और इसलिए हर समाज के अपने वैल्यूज़ होते हैं। उन values के प्रति हम जागरूक कैसे हों। इन दिनों मैं देखता हूं। अज्ञान के कारण कहो, या तो inferiority complex के कारण कहो, जब कोई बड़ा संकट आ जाता है, बड़ा विवाद आ जाता है तो हम ज्यादा से ज्यादा ये कह कर भाग जाते हैं कि ये तो हमारी परम्परा है। आज दुनिया इस प्रकार की बातों को मानने के लिए नहीं है।

हमने वैज्ञानिक आधार पर अपनी बातों को दुनिया के सामने रखना पड़ेगा। और इसलिये यही तो कुम्भ के काल में ये विचार-विमर्श आवश्यकता है, जो हमारे मूल्यों की, हमारे विचारों की धार निकाल सके।

हम जानते हैं कभी-कभी जिनके मुंह से परम्परा की बात सुनते हैं। यही देश ये मान्यता से ग्रस्त था कि हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने संतों ने समुद्र पार नहीं करना चाहिए। विदेश नहीं जाना चाहिए। ये हमलोग मानते थे। और एक समय था, जब समुद्र पार करना बुरा माना जाता था। वो भी एक परम्परा थी लेकिन काल बदल गया। वही संत अगर आज विश्व भ्रमण करते हैं, सातों समुद्र पार करके जाते हैं। परम्पराएं उनके लिए कोई रुकावट नहीं बनती हैं, तो और चीजों में परम्पराएं क्यों रुकावट बननी चाहिए। ये पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और इसलिए परम्पराओं के नाम पर अवैज्ञानिक तरीके से बदले हुए युग को, बदले हुए समाज को मूल्य के स्थान पर जीवित रखते हुए उसको मोड़ना, बदलना दिशा देना ये हम सबका कर्तव्य बनता है, हम सबका दायित्व बनता है। और उस दायित्व को अगर हम निभाते हैं तो मुझे विश्वास है कि हम समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं।

आज विश्व दो संकटों से गुजर रहा है। एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग दूसरी तरफ आतंकवाद। क्या उपाय है इसका। आखिर इसके मूल पर कौन सी चीजें पड़ी हैं। holier than thou तेरे रास्ते से मेरा रास्ता ज्यादा सही है। यही तो भाव है जो conflict की ओर हमें घसीटता ले चला जा रहा है। विस्तारवाद यही तो है जो हमें conflict की ओर ले जा रहा है। युग बदल चुका है। विस्तारवाद समस्याओं का समाधान नहीं है। हम हॉरीजॉन्टल की तरह ही जाएं समस्याओं का समाधान नहीं है। हमें वर्टिकल जाने की आवश्यकता है अपने भीतर को ऊपर उठाने की आवश्यकता है, व्यवस्थाओं को आधुनिक करने की आवश्यकता है। नई ऊंचाइयों को पार करने के लिए उन मूल्यों को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है और इसलिये समय रहते हुए मूलभूत चिंतन के प्रकाश में, समय के संदर्भ में आवश्यकताओं की उपज के रूप में नई विधाओं को जन्म देना होगा। वेद सब कुछ है लेकिन उसके बाद भी हमी लोग हैं जिन्होंने वेद के प्रकाश में उपनिषदों का निर्माण किया। उपनिषद में बहुत कुछ है। लेकिन समय रहते हमने भी वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में समृति और स्रुति को जन्म दिया और समृति और स्रुतियां, जो उस कालखंड को दिशा देती है, उसके आधार पर हम चलें। आज हम में किसी को वेद के नाम भी मालूम नहीं होंगे। लेकिन वेद के प्रकाश में उपनिषद, उपनिषद के प्रकाश में श्रुति और समृति वो आज भी हमें दिशा देती हैं। समय की मांग है कि अगर 21वीं सदी में मानव जाति का कल्याण करना है तो चाहे वेद के प्रकाश में उपनिषद रही हो, उपनिषद के प्रकाश में समृति और श्रुति रही हो, तो समृति और श्रुति के प्रकाश में 21वीं सदी के मानव के कल्याण के लिए किन चीजों की जरूरत है ये 51 अमृत बिन्दु शायद पूर्णतयः न हो कुछ कमियां उसमें भी हो सकती हैं। क्या हम कुम्भ के मेले में ऐसे अमृत बिन्दु निकाल कर के आ सकते हैं।

मुझे विश्वास है कि हमारा इतना बड़ा समागम। कभी – कभी मुझे लगता है, दुनिया हमे कहती है कि हम बहुत ही unorganised लोग हैं। बड़े ही विचित्र प्रकार का जीवन जीने वाले बाहर वालों के नजर में हमें देखते हैं। लेकिन हमें अपनी बात दुनिया के सामने सही तरीके से रखनी आती नहीं है। और जिनको रखने की जिम्मेवारी है और जिन्होंने इस प्रकार के काम को अपना प्रोफेशन स्वीकार किया है। वे भी समाज का जैसा स्वभाव बना है शॉर्टकट पर चले जाते हैं। हमने देखा है कुम्भ मेला यानी एक ही पहचान बना दी गई है नागा साधु। उनकी फोटो निकालना, उनका प्रचार करना, उनका प्रदर्शन के लिए जाना इसीके आसपास उसको सीमित कर दिया गया है। क्या दुनिया को हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारे देश के लोगों की कितनी बड़ी organizing capacity है। क्या ये कुम्भ मेले का कोई सर्कुलर निकला था क्या। निमंत्रण कार्ड गया था क्या।

हिन्दुस्तान के हर कोने में दुनिया में रहते हुए भारतीय मूल के लोगों को कोई इनविटेशन कार्ड गया था क्या। कोई फाइवस्टार होटलों का बुकिंग था क्या। एक सिपरा मां नदी के किनारे पर उसकी गोद में हर दिन यूरोप के किसी छोटे देश की जनसंख्या जितने लोग आते हों, 30 दिन तक आते हों। जब प्रयागराज में कुंभ का मेला हो तब गंगा मैया के किनारे पर यूरोप का एकाध देश daily इकट्ठा होता हो, रोज नए लोग आते हों और कोई भी संकट न आता हो, ये management की दुनिया की सबसे बड़ी घटना है लेकिन हम भारत का branding करने के लिए इस ताकत का परिचय नहीं करवा रहे हैं।

मैं कभी-कभी कहता हूं हमारे हिंदुस्तान का चुनाव दुनिया के लिए अजूबा है कि इतना बड़ा देश दुनिया के कई देशों से ज्यादा वोटर और हमारा Election Commission आधुनिक Technology का उपयोग करते हुए सुचारु रूप से पूरा चुनाव प्रबंधन करता है। विश्व के लिए, प्रबंधन के लिए ये सबसे बड़ा case study है, सबसे बड़ा case study है। मैं तो दुनिया की बड़ी-बड़ी Universities को कहता हूं कि हमारे इस कुंभ मेले की management को भी एक case study के रूप में दुनिया की Universities को study करना चाहिए।

हमने अपने वैश्विक रूप में अपने आप को प्रस्तुत करने के लिए दुनिया को जो भाषा समझती है, उस भाषा में रखने की आदत भी समय की मांग है, हम अपनी ही बात को अपने ही तरीके से कहते रहेंगे तो दुनिया के गले नहीं उतरेगी। विश्व जिस बात को जिस भाषा में समझता है, जिस तर्क से समझता है, जिस आधारों के आधार पर समझ पाता है, वो समझाने का प्रयास इस चिंतन-मनन के द्वारा तय करना पड़ेगा। ये जब हम करते हैं तो मुझे विश्वास है, इस महान देश की ये सदियों पुरानी विरासत वो सामाजिक चेतना का कारण बन सकती है, युवा पीढ़ी के आकर्षण का कारण बन सकती है और मैं जो 51 बिंदु हैं उसके बाहर एक बात मैं सभी अखाड़े के अधिष्ठाओं को, सभी परंपराओं से संत-महात्माओं को मैं आज एक निवेदन करना चाहता हूं, प्रार्थना करना चाहता हूं। क्या यहां से जाने के बाद हम सभी अपनी परंपराओं के अंदर एक सप्ताह का विचार कुंभ हर वर्ष अपने भक्तों के बीच कर सकते हैं क्या।

मोक्ष की बातें करें, जरूर करें लेकिन एक सप्ताह ऐसा हो कि जहां धरती की सच्चाइयों के साथ पेड़ क्यों उगाना चाहिए, नदी को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए, बेटी को क्यों पढ़ाना चाहिए, नारी का गौरव क्यों करना चाहिए वैज्ञानिक तरीके से और देश भर के विधिवत जनों बुलाकर के, जिनकी धर्म में आस्था न हो, जो परमात्मा में विश्वास न करता हो, उसको भी बुलाकर के जरा बताओ तो भाई और हमारा जो भक्त समुदाय है। उनके सामने विचार-विमर्श हर परंपरा में साल में एक बार 7 दिन अपने-अपने तरीके से अपने-अपने स्थान पर ज्ञानी-विज्ञानी को बुलाकर के विचार-विमर्श हो तो आप देखिए 3 साल के बाद अगला जब हमारा कुंभ का अवसर आएगा और 12 साल के बाद जो महाकुंभ आता है वो जब आएगा आप देखिए ये हमारी विचार-मंथन की प्रक्रिया इतनी sharpen हुई होगी, दुनिया हमारे विचारों को उठाने के लिए तैयार होगी।

जब अभी पेरिस में पुरा विश्व climate को लेकर के चिंतित था, भारत ने एक अहम भूमिका निभाई और भारत ने उन मूल्यों को प्रस्तावित करने का प्रयास किया। एक पुस्तक भी प्रसिद्ध हुई कि प्रकृति के प्रति प्रेम का धार्मिक जीवन में क्या-क्या महत्व रहा है और पेरिस के, दुनिया के सामने life style को बदलने पर बल दिया, ये पहली बार हुआ है।

हम वो लोग हैं जो पौधे में भी परमात्मा देखते हैं, हम वो लोग हैं जो जल में भी जीवन देखते हैं, हम वो लोग हैं जो चांद और सूरज में भी अपने परिवार का भाव देखते हैं, हम वो लोग हैं जिनको... आज शायद अंतरराष्ट्रीय Earth दिवस मनाया जाता होगा, पृथ्वी दिवास मनाया जाता होगा लेकिन देखिए हम तो वो लोग हैं जहां बालक सुबह उठकर के जमीन पर पैर रखता था तो मां कहती थी कि बेटा बिस्तर पर से जमीन पर जब पैर रखते हो तो पहले ये धरती मां को प्रणाम करो, माफी मांगों, कहीं तेरे से इस धरती मां को पीढ़ा न हो हो जाए। आज हम धरती दिवस मनाते हैं, हम तो सदियों से इस परंपरा को निभाते आए हैं।

हम ही तो लोग हैं जहां मां, बालक को बचपन में कहती है कि देखो ये पूरा ब्रहमांड तुम्हारा परिवार है, ये चाँद जो है न ये चाँद तेरा मामा है। ये सूरज तेरा दादा है। ये प्रकृति को अपना बनाना, ये हमारी विशेषता रही है।

सहज रूप से हमारे जीवन में प्रकृति का प्रेम, प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन के संस्कार हमें मिले हैं और इसलिए जिन बिंदुओं को लेकर के आज हम चलना चाहते हैं। उन बिंदुओं पर विश्वास रखते हुए और जो काल बाह्य है उसको छोड़ना पड़ेगा। हम काल बाह्य चीजों के बोझ के बीच जी नहीं सकते हैं और बदलाव कोई बड़ा संकट है, ये डर भी मैं नहीं मानता हूं कि हमारी ताकत का परिचय देता है। अरे बदलाव आने दो, बदलाव ही तो जीवन होता है। मरी पड़ी जिंदगी में बदलाव नहीं होता है, जिंदा दिल जीवन में ही तो बदलाव होता है, बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। हम सर्वसमावेशक लोग हैं, हम सबको जोड़ने वाले लोग हैं। ये सबको जोड़ने का हमारा सामर्थ्य है, ये कहीं कमजोर तो नहीं हो रहा अगर हम कमजोर हो गए तो हम जोड़ने का दायित्व नहीं निभा पाएंगे और शायद हमारे सिवा कोई जोड़ पाएगा कि नहीं पाएगा ये कहना कठिन है इसलिए हमारा वैश्विक दायित्व बनता है कि जोड़ने के लिए भी हमारे भीतर जो विशिष्ट गुणों की आवश्यकता है उन गुणों को हमें विकसित करना होगा क्योंकि संकट से भरे जन-जीवन को सुलभ बनाना हम लोगों ने दायित्व लिया हुआ है और हमारी इस ऋषियों-मुनियों की परंपरा ज्ञान के भंडार हैं, अनुभव की एक महान परंपरा रही है, उसके आधार पर हम इसको लेकर के चलेंगे तो मुझे पूरा विश्वास है कि जो अपेक्षाएं हैं, वो पूरी होंगी। आज ये समारोह संपन्न हो रहा है।

मैं शिवराज जी को और उनकी पूरी टीम को हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं इतने उत्तम योजना के लिए, बीच में प्रकृति ने कसौटी कर दी। अचानक आंधी आई, तूफान सा बारिश आई, कई भक्त जनों को जीवन अपना खोना पड़ा लेकिन कुछ ही घंटों में व्यवस्थाओं को फिर से ठीक कर दी। मैं उन सभी 40 हजार के करीब मध्य प्रदेश सरकार के छोटे-मोटे साथी सेवारत हैं, मैं विशेष रूप से उनको बधाई देना चाहता हूं कि आपके इस प्रयासों के कारण सिर्फ मेला संपन्न हुआ है, ऐसा नहीं है। आपके इन उत्तम प्रयासों के कारण विश्व में भारत की एक छवि भी बनी है। भारत के सामान्य मानव के मन में हमारा अपने ऊपर एक विश्वास बढ़ता है इस प्रकार के चीजों से और इसलिए जिन 40 हजार के करीब लोगों ने 30 दिन, दिन-रात मेहनत की है उनको भी मैं बधाई देना चाहता हूं, मैं उज्जैनवासियों का भी हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं, उन्होंने पूरे विश्व का यहां स्वागत किया, सम्मान किया, अपने मेहमान की तरह सम्मान किया और इसलिए उज्जैन के मध्य प्रदेश के नागरिक बंधु भी अभिनंदन के बहुत-बहुत अधिकारी हैं, उनको भी हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और अगले कुंभ के मेले तक हम फिर एक बार अपनी विचार यात्रा को आगे बढ़ाएं इसी शुभकामनाओं के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, फिर एक बार सभी संतों को प्रणाम और उनका आशीर्वाद, उनका सामर्थ्य, उनकी व्यवस्थाएं इस चीज को आगे चलाएगी, इसी अपेक्षा के साथ सबको प्रणाम।

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भारत माता की जय

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मैं मेरा भाषण शुरू करूं, उसके पहले मैं एक प्रार्थना करना चाहता हूं। करूं प्रार्थना आप लोगों को। प्रार्थना करूं। मैं देख रहा हूं बंगाल की धरती तो कला की धरती है। इतने सारे कलाकार दोस्त बढ़िया-बढ़िया चित्र बनाकर ले आए हैं। किसी ने मोदी को नेपाली बना दिया है। जो लोग कुछ पेंटिंग वगैरा बनाकर लाए हैं, उनसे मैं प्रार्थना करता हूं अगर पीछे आपका एड्रेस लिखा होगा, तो मैं आपको धन्यवाद पत्र भेजूंगा। आपको चिट्ठी लिखूंगा। मैं मेरे एसपीजी के साथियों से कहता हूं कि ऐसे जो भी कलाकार मित्र कोई छोटे--मोटे चित्र बनाकर के ले आए हैं। उसको कलेक्ट कर लीजिए और मैं आपको वादा करता हूं अगर आपका एड्रेस होगा तो मेरी चिट्ठी आएगी। बोलिए... भारत माता की जय

भारत माता की जय

भारत माता की जय

अब दूसरा काम इस चुनाव में जो हमारे कैंडिडेट्स हैं, उन सभी कैंडिडेट से मेरा आग्रह है, जो उम्मीदवार हैं वह जरा आगे आ जाए। जो इस चुनाव में उम्मीदवार हैं, वही कतार बना दीजिए अपना, वही कतार बना दीजिए। मैं यह मेरे सभी उम्मीदवार साथियों को मिलकर के आपके पास आता हूं। आप सब लगातार भारत माता की जय बोलिए और इनका आशीर्वाद देते रहिए।

जॉय मां काली… //

जॉय मोहाकाल… //

जॉय मोहाकाल… //

जॉय जॉलपेश बाबा… //

जॉय सिन्चेल देबी…

आमार प्रियो मां-बाबारा... //

आपना देर शोबाइके // नमोश्कार कोर्लाम

आशा कोरी//आपनारा भालो आछेन

मेरा प्यारा //अनि आदोरणीय //

गोर्खा आमा-बाबा, // रा सबैमा //

मेरो नमोस्ते !

साथियों,

दार्जलिंग हो, सिलीगुड़ी हो, मैं पहले भी कई बार आपके दर्शन करने के लिए आया हूं। और जब भी यहां आता हूं, आपका भरपूर प्यार, भरपूर आशीर्वाद हमेशा मुझे मिलता है। जरा सिक्योरिटी वाले बाबू थोड़ा हट जाइए, बिना कारण वहां क्यों परेशानी कर रहे हो। अगर आप लोग वहां ठीक से बैठ गए. तो फिर मैं अपनी बात शुरू करूं। मैं अपनी बात शुरू करूं। ऐसा है देखिए, आप लोग तो यहां बैठे हैं, वहां दूर-दूर जो खड़े हैं वह तो मुझे देख भी नहीं पा रहे हैं। फिर भी देखिए, कितने प्यार से खड़े हैं। दोस्तों, यह जरा सिक्योरिटी वाले सज्जन कैमरा के नीचे आ जाओ। इधर आओ इधर आओ. ठीक है भाई आप इनको इतना परेशान मत करो उनकी ड्यूटी है। आप अगर नहीं दिखता है, तो मंच पर आ जाइए और क्या करूं मैं आपको, आप किसी को खड़े नहीं रहने देंगे, ऐसे कैसे लोग हैं भाई, आप इतना प्यार करते हैं और परेशान भी करते हैं।

भारत माता की जय

भारत माता की जय

भारत माता की जय

साथियो,

यह आपका प्यार. आपका उत्साह मेरे सिर आंखों पर है। आपने मेरा दिल जीत लिया है,अब आपको बंगाल के हर एक व्यक्ति का दिल जीतना है। जीतोगे, हर बंगाली का दिल जीतोगे. बंगाल को प्यार करने वाले हर किसी का दिल जीतोगे। फिर तो आप चुनाव जीतने वाले पक्का हो।

साथियो,

कल मैं बंगाल के अलग-अलग क्षेत्रों में गया था। वहां जो मैंने दृश्य देखा, जो उत्साह देखा, जो उमंग जो जोश नौजवान, माताएं, बहनें, बुजुर्ग, गांव के लोग इतना कष्ट उठाकर आए थे। मीलों तक पैदल चलकर आ रहे थे। बंगाल इस प्रकार से परिवर्तन की ठान के बैठा है। इस बार बंगाल में टीएमसी का जाना तय है। कल शाम यहां सिलीगुड़ी में मैं जब बागडोगरा से निकला, तो मुझे कुछ साथियों ने कहा था कि साहब एक 500-700 मीटर एक रोड शो हम छोटा सा करना चाहते हैं। मैंने कहा भाई आज रोड शो करोगे, कल जनसभा करोगे लोग कहां से आएंगे। लेकिन 500 -700 मीटर नहीं, 15 किलोमीटर लंबा रोड शो चला क्या कमाल कर दिया आप लोगों ने। और मैं तो देख रहा था छोटे-छोटे बालक, ऐसा प्यार मैं कभी भी देशवासियों के इस प्यार को भूल नहीं सकता हूं। आपके प्यार को भूल नहीं सकता हूं। एक अद्भुत दृश्य था, बहुत बड़ी संख्या में बुजुर्ग दादा-दादी की उम्र के लोग आशीर्वाद दे रहे थे। ऐसा सौभाग्य शायद ही किसी को मिलता हो। मैं इसके लिए सिर झुका करके इस क्षेत्र के सभी नागरिकों को प्रणाम करता हूं, उनका धन्यवाद करता हूं। अभी भी कुछ दोस्त वहां चित्र बनाकर लाए हैं खड़े हैं, वह निराश हो जाएंगे वह चित्र उनसे लेकर के यहां पहुंचा दीजिए। देखिए दूर-दूर जो लोग खड़े हैं वह चित्र यहां पहुंचा दें। यह छोटे-छोटे बच्चे निराश ना हो जाए भाई। उनका भी मेरे ऊपर अधिकार है, पूरा अधिकार है इन बच्चों का। एक गदाधारी व्यक्ति नीचे बैठ जाइए आप, एक गदाधारी बैठ जाइए आप।

साथियो,

आपका स्नेह और आशीर्वाद यही मेरी सबसे बड़ी ऊर्जा है। यही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा है। जब 140 करोड़ देशवासी जब बंगाल का हर एक नागरिक मुझे इतना प्यार दे रहा है, इतना आशीर्वाद दे रहा है तो मैं भी आपको वादा करता हूं, मैं आपके लिए अपने आप को हर पल खापा दूंगा, जीऊंगा तो आपके लिए जीऊंगा, जूझता रहूंगा तो आपके लिए जूझता रहूंगा

साथियो.

और आज का यह दृश्य भी मुझे पक्का विश्वास है, टीएमसी की नींद उड़ाने वाला है। सिलीगुड़ी की ये रैली, TMC के महा-जंगलराज की विदाई ये आपने तय कर लिया है। पूरे बंगाल में एक ही उद्घोष गूंज रहा है... एक ही नारा गूंज रहा है
पाल्टानो दोरकार…

चाइ बीजेपी शोरकार!

पाल्टानो दोरकार…

चाइ बीजेपी शोरकार!

पाल्टानो दोरकार…

चाइ बीजेपी शोरकार!

साथियों,

TMC की निर्मम सरकार वो अपने 15 साल पूरा कर चुकी है, 15 साल में बर्बादी, आपने देखी है। और यहां काफी नौजवानों को मैं देख रहा हूं। मेरे नौजवान साथी 15 साल पहले, आप शायद पहली कक्षा में पढ़ते होगे। और इस चुनाव में आप बंगाल का भविष्य तय करने जा रहे हैं। आप वोट करने जा रहे हैं। ये किसी के काम और करतूतों के मूल्यांकन का बहुत बड़ा समय होता है। लेकिन TMC ने काम नहीं किया, सिर्फ और सिर्फ काले कारनामे ही किए हैं।

साथियो,

आज मैं एक-एक करके, TMC के हर पाप का, TMC के हर काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा आपके सामने रखूंगा। हमारा ये सिलीगुड़ी नॉर्थ बंगाल का गेटवे है। लेकिन TMC ने नॉर्थ बंगाल के इंफ्रास्ट्रक्चर को जानबूझकर पीछे रखा। आपको कनेक्टिविटी हो, इंडस्ट्री हो, टूरिज्म हो, हर सेक्टर में उपेक्षा ही मिली है। केंद्र सरकार ने जो पैसा भेजा, वो भी सिंडिकेट वाले हड़प कर गए।

साथियो,

उत्तर बंगाल से भेदभाव का उदाहरण TMC की निर्मम सरकार का बजट भी है। निर्मम सरकार ने, मदरसों के लिए करीब छह हजार करोड़ रुपए का बजट दिया गया है। आपको याद रहेगा आंकड़ा, मैं आपको पूछूं, आप बोलेंगे। मदरसों के लिए टीएमसी ने 6 हजार करोड़ दिया। कितना..कितना बजट दिया. किसको दिया, किसको दिया, कितना दिया, मदरसों के लिए 6 हजार करोड़ का बजट और इतने बड़े नॉर्थ बंगाल के लिए बंगाल सरकार पर्याप्त बजट नहीं देती। TMC सिर्फ अपने खास वोटबैंक के तुष्टिकरण में ही दिन-रात लगी हुई है।

साथियो,

जब नॉर्थ बंगाल के अनेक जिलों में भारी बारिश से तबाही फैली, हर तरफ हाहाकार था, तब TMC की निर्मम सरकार, कोलकाता में जश्न मना रही थी। TMC- एंटी नॉर्थ बंगाल पार्टी है। TMC – एंटी ट्राइबल पार्टी है। TMC- एंटी चाय-बागान पार्टी है। TMC- महिला और युवा विरोधी पार्टी है। इसलिए बंगाल में इस बार हर तरफ गूंज रहा है-आत्मविश्वास के साथ गूंज रहा है, हर कोई कह रहा है। ऐई बार बदल होबे। ऐई बार….ऐई बार।

साथियो,

TMC तो अपने 15 साल का अपने काम का हिसाब नहीं दे रही है। क्योंकि काम नहीं काले कारनामे किए हैं, तो किस मुंह से वो आपको काम का हिसाब देगी। लेकिन मैं देख रहा हूं, बंगाल की जनता टीएमसी सरकार से पल-पल का हिसाब मांग रही है। पाई-पाई का हिसाब मांग रही है। और टीएमसी वाले सुन लो, कान खोलकर सुन लो, 4 मई के बाद बीजेपी सरकार बनेगी, और टीएमसी वालों को 15 साल का पल-पल का हिसाब देना पड़ेगा। पाई-पाई का हिसाब देना पड़ेगा। नॉर्थ बंगाल के लिए TMC की दुर्नीति, हमेशा डराना, भय पैदा करना, लोगों को भयभीत रखना और लोगों की उपेक्षा करना। यहां जो TMC के खिलाफ, उनके खिलाफ राजनीतिक हिंसा होती है। उनको डराया धमकाया जाता है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या कराई जाती है। लेकिन साथियों.बहुत हो चुका अब बंगाल सहन नहीं करेगा अब और नहीं। अब और नहीं...

आर नोय !//

भॉय नॉय, //भरोशा चाई /

बीजेपी का मंत्र है...

सबका साथ, सबका विकास !

लेकिन बंगाल में बीजेपी का फॉर्मूला होगा, सबका साथ, सबका विकास और TMC के लुटेरों का का पूरा-पूरा हिसाब!

साथियो,

हमारा ये सिलीगुड़ी, भारत की सुरक्षा का भी प्रमुख द्वार है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर सिर्फ शब्द नहीं है, मां भारती की भुजा है। लेकिन आप याद रखना साथियों, TMC, ने तुष्टिकरण के लिए, वोटबैंक को खुश करने के लिए क्या किया था? साथियों, नॉर्थ बंगाल को लेकर, देश की सुरक्षा को लेकर TMC की दुर्नीति का एक और सबूत मैं यहां देना चाहता हूं। देश में एक टुकड़े-टुकड़े गैंग है। इस गैंग ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर को काटने की धमकी दी थी। नॉर्थ ईस्ट को देश से अलग करने की बात कही थी। तुष्टिकरण से भरी ये TMC ऐसे लोगों को सड़क से लेकर संसद तक समर्थन देती है। ये है TMC का असली चेहरा है।

साथियो,

बीजेपी के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर, देश सुरक्षा और समृद्धि का कॉरिडोर है और हम इसको निरंतर, लगातार सशक्त करने में पूरी ताकत लगा रहे हैं। सेवक–रंगपो रेल परियोजना इसका उत्तम उदाहरण है। इससे हमारा सिक्किम सिलीगुड़ी से और देश के रेल नेटवर्क से सीधे जुड़ने जा रहा है।

इस काम पर तेज गति से काम चल रहा है। यह प्रोजेक्ट बंगाल और सिक्किम की कनेक्टिविटी, यहां ट्रेड और टूरिज्म को बहुत बल देगा। और इसका सबसे अधिक फायदा दार्जिलिंग के, नॉर्थ बंगाल के नौजवानों को होगा।

साथियो,

बीजेपी की केंद्र सरकार ने नॉर्थ बंगाल को तीन आधुनिक वंदे भारत और नौ अमृत भारत ट्रेनें दी हैं। यहां का रेलवे स्टेशन आधुनिक हो रहा है, नॉर्थ बंगाल को साउथ बंगाल से जोड़ने के लिए शानदार एक्सप्रेसवे पर काम चल रहा है।

साथियो,

आपका ये प्रधान-सेवक, बंगाल के उन्नोयन के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। लेकिन ये TMC, केंद्र सरकार की हर योजना में रोड़े अटकाती है।

इसका एक उदाहरण पोरबंदर से सिल्चर तक बन रहा, East–West Corridor भी है। इस कॉरिडोर में, घोषपुकुर–सलसलाबाड़ी खंड का काम ही ऐसा है, जो अबतक पूरा नहीं हो पाया है।

साथियो,

बीजेपी की डबल इंजन सरकार में बंगाल का डबल तेजी से विकास होगा।

बंगाल बीजेपी ने नॉर्थ बंगाल के लिए बहुत ही शानदार घोषणाएं की हैं। यहां के युवाओं को हजारों रुपए की मदद तो मिलेगी ही, साथ ही, आधुनिक इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, कैंसर अस्पताल, फैशन डिजायनिंग इंस्टीट्यूट, ऐसे संस्थान उत्तर बंगाल में बनें, ये बंगाल बीजेपी का संकल्प है। और ये मोदी की गारंटी है।

साथियो,

दार्जिलिंग सहित नॉर्थ बंगाल का एक बड़ा हिस्सा, ये पूरा इलाका, चाय की पैदावार का क्षेत्र है। मैं आपकी चाय का स्वाद, मुझसे बेहतर भला कौन जान सकता है। लेकिन आप देख रहे हैं कि TMC की निर्मम सरकार, चाय बगानों को भी बर्बाद कर रही है।

साथियो,

आपके पड़ोस में असम है। वहां भी बीजेपी सरकार ने चाय बगानों में अनेक सुविधाएं विकसित की हैं। टी-गार्डन के बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर वहां बहुत काम हुआ है। वहां चाय बागान के श्रमिकों को भूमि के पट्टे दिए जा रहे हैं। बंगाल बीजेपी ने यहां भी टी-गार्डन के परिवारों के लिए अनेक संकल्प लिए हैं। श्रमिक परिवारों को भूमि के पट्टे देने हों, पक्के घर, नल से जल, बिजली, पानी और रोजगार की सुविधाएं देनी हों यानि श्रमिकों की कमाई, पढ़ाई, दवाई और हर चीज पर यहां बनने वाली बीजेपी सरकार काम करेगी।

साथियो,

मैं जानता हूं...यहां की बेटियां बहुत ही टैलेंटेड हैं। मंटु घोष के टैलेंट का देश को बहुत फायदा मिला है और आजकल तो बेटी रिचा घोष की बहुत चर्चा होती है। इतने लंबे-लंबे सिक्सर बेटी रिचा लगाती हैं, वो गजब है। और जब मुझे बेटी रिचा से मिलने का मौका मिला। और मैं उनके हौसले से, उनके आत्मविश्वास से बहुत प्रभावित हुआ हूं।

साथियो,

बीजेपी, बंगाल की हर बेटी में ऐसा ही आत्मविश्वास देखना चाहती है। इसलिए बीजेपी सरकार, खेलो इंडिया स्कीम चला रही है। ओलंपिक पोडियम स्कीम चला रही है। ताकि, घर और गांव के पास ही अच्छा स्टेडियम हो, अच्छी ट्रेनिंग सुविधा हो। हम चाहते हैं कि बंगाल के बेटे-बेटियां भी खूब खेलें, खूब खिले। इसलिए बंगाल बीजेपी ने भी, नॉर्थ बंगाल में आपके लिए स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने की घोषणा की है। लेकिन साथियों,TMC की निर्मम सरकार यहां बेटियों को बेड़ियों में बांध रही है। TMC ने यहां बेटियों में मां-बाप में भय पैदा कर दिया है। फांसीदेवा में जो कुछ हुआ, TMC से जुड़े लोगों ने एक गर्भवती महिला के साथ जो कुछ किया,.उसने इंसानियत को ही शर्मसार कर दिया है। यही तो टीएमसी की निर्ममता है। इसी निर्ममता से बंगाल की बेटियों को बचाना है।

साथियो,

मोदी ने बंगाल की हर बहन-बेटी को एक गारंटी दी है। रेप केस हों, अन्य अत्याचार हों। बीजेपी सरकार, हर केस में न्याय दिलाकर रहेगी। हमारी बहनों-बेटियों को पूरी सुरक्षा मिले, इसके लिए हर ब्लॉक में महिला थाने, महिला सहायता डेस्क बनाने की योजना है। बंगाल पुलिस में बेटियों की अधिक से अधिक भर्ती हो, ये काम भी बीजेपी ही करेगी।

साथियो,

TMC ने मां-माटी-मानुष तीनों से विश्वासघात किया है। TMC ने अलग-अलग घोटालों में बंगाल की महिलाओं का ही पैसा लूटा है। आप यहां बंगाल में बीजेपी सरकार बनाइए। TMC के हर घोटालेबाज का हिसाब होगा। हमारी सरकार में महिलाओं के बैंक खातों में योजनाओं का पूरा पैसा आएगा, बिना कट-कमीशन के आएगा, सीधा उनके खाते में आएगा। बंगाल बीजेपी ने तो महिलाओं को तीन हजार रुपए देने वाली योजना का ऐलान किया है। ये पैसा कोई हमारी बहनों-बेटियों से छीन नहीं पाएगा- ये मोदी की गारंटी है।

साथियो,

उत्तर बंगाल, अद्भुत प्रतिभा से भरी धरती है। हमारे नागेंद्र नाथ रॉय जी... उन्होंने रामायण का राजबंशी भाषा में अनुवाद किया। ये बहुत बड़ी बात है।

उनको पद्म सम्मान देने का सौभाग्य, बीजेपी सरकार को मिला है। राजबंशी समाज का...आदिवासी समाज का...भारत की प्रगति और संस्कृति में भारत की समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान है। बीजेपी की केंद्र सरकार आदिवासी भाषा, परंपरा, संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर काम कर रही है। माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी ने संथाली भाषा में भी संविधान का आधिकारिक संस्करण जारी किया है। केंद्र सरकार, पूरे देश में आदिवासी महापुरुषों के म्यूजियम बना रही है। बंगाल बीजेपी कुड़माली और राजवंशी भाषा को और प्रोत्साहित करने का भी संकल्प लिया है।

साथियो,

केंद्र सरकार, आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए, करीब एक लाख करोड़ रुपए की दो बड़ी योजनाएं चला रही है। इससे आदिवासी बस्तियों में सड़कें बन रही हैं। पानी आ रहा है, स्कूल-अस्पताल बन रहे हैं। रोजगार के काम हो रहे हैं। लेकिन साथियों, TMC की निर्मम सरकार आदिवासी गांवों के विकास को भी रोक रही है। जैसे पीएम जनमन योजना है। इसके तहत छोटे-छोटे आदिवासी गांव में पाइप से पानी पहुंचाया जा रहा है। इसके तहत बिहार के अनेकों ट्राइबल गांवों में जनमन योजना के काम स्वीकृत हुए थे। वहां बीजेपी-एनडीए सरकार है इसलिए हर गांव में सौ प्रतिशत काम पूरा हो गया।

साथियो,

अब बंगाल की भी पीड़ा सुनिए। बंगाल के करीब सवा चार सौ आदिवासी गांवों में भी जनमन योजना के तहत पाइप से पानी का काम स्वीकृत हुआ था।

लेकिन यहां 25 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हो पाया है। गरीब और आदिवासी परिवारों के साथ ऐसा बर्ताव यहां किया जा रहा है।

साथियो,

TMC यहां 15 साल से इसलिए है, क्योंकि उसने भय का सम्राज्य बनाया है।

अब इस भय को हटाना है और बंगाल में भरोसा लाना है। ये काम बीजेपी ही कर सकती है। मोदी ने बंगाल को घुसपैठ, भ्रष्टाचार से मुक्त करने और सिस्टम पर, कानून पर भरोसा लौटाने की गारंटी दी है। बंगाल बीजेपी ने ऐलान किया है...TMC के गुंडों ने जो राजनीतिक हिंसा की है...उसकी जांच के लिए विशेष कमीशन बनाया जाएगा। मुझे सिलीगुड़ी के, नॉर्थ बंगाल के लोग बताते हैं कि यहां लैंड-माफिया ने, गुंडों ने जीना मुहाल कर रखा है। बीजेपी सरकार में ऐसे हर माफिया, हर गुंडे की जगह परमानेंट जेल में होगी।

साथियो,

टीएमसी अपने महाजंगलराज को बचाने के लिए झूठ की भी फैक्ट्री चला रही है। विशेष रूप से, हमारे मतुआ और नामशूद्र परिवारों को TMC के झूठ से बहुत सतर्क रहना होगा। मोदी आपके साथ है। देश का संविधान आपके साथ है। आपको मोदी ने CAA के तहत संविधान की गारंटी दी है। संविधान, देश के नागरिक को जो भी गारंटी देता है, वही गारंटी आपके पास भी है।

TMC की निर्मम सरकार आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इसलिए, आपको भयभीत होने की कोई ज़रूरत नहीं है।

साथियो,

हम ये भी देख रहे हैं कि उत्तर-बंगाल के जिलों में घुसपैठ से कितना बदलाव आ रहा है। सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा है, भाषा-बोली में, संस्कार-संस्कृति में अंतर आ रहा है। मेहनत-मजदूरी के काम में घुसपैठियों का कब्जा हो रहा है, इसको अभी नहीं रोका गया तो बहुत देर हो जाएगी। इसलिए, मेरा मंत्र याद रखिए...

कमल खिलाओ...

घुसपैठिया भगाओ !

कमल खिलाओ...

कमल खिलाओ...

पोद्मो फुटाओ… //

अबोइधो //

ओनु-प्रोबेश-कारीदेर ताड़ाओ

साथियो,

बंगाल के चुनाव नतीजे, बंगाल का भविष्य तय करेंगे। आप सब मेरे लिए मोदी हैं। ये सभी उम्मीदवार ये भी मोदी ही हैं। 70 साल में आपने लेफ्ट को मौका दिया, कांग्रेस को मौका दिया, टीएमसी को मौका दिया। अब एक मौका मोदी को दीजिए। एक मौका मोदी को...बंगाल की बेटियों की सुरक्षा के लिए। एक मौका मोदी को…घुसपैठ से बंगाल को बचाने के लिए। एक मौका मोदी को…बंगाल के युवाओं को बंगाल में ही नौकरी दिलाने के लिए। एक मौका मोदी को…उद्योग वापस लाने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए। एक मौका मोदी को…कानून का राज स्थापित करने के लिए।

एक मौका मोदी को…गरीब को मुफ्त इलाज और पक्का घर देने के लिए।

एक मौका मोदी को…भय का शासन हटाकर भरोसे का माहौल बनाने के लिए। एक मौका मोदी को…बंगाल की संस्कृति को तुष्टिकरण से बचाने के लिए।

साथियो,

इसलिए एक काम आप को और करना है...मेरा एक काम करेंगे, सब हाथ ऊपर करके बताइए मेरा काम करेंगे, मेरा एक काम करेंगे, पोलिंग बूथ में जाएंगे, घर-घर जाएंगे, आप जहां भी जाएं लोगों से मिलें, उनको कहना मोदी जी आए थे और मोदी जी ने परिवार को सबको पोइला बोइशाख की शुभकामनाएं भेजी हैं। मेरे साथ बोलिए भारत माता की जय..

भारत माता की जय...

वंदे वंदे वंदे वंदे वंदे वंदे।