विशाल संख्‍या में पधारे हुए उपस्थित महानुभावों!

मां दन्‍तेश्‍वरी का जहां आर्शीवाद है, जिस क्षेत्र के आदिवासियों ने दुनिया को जीने का रास्‍ता सिखाया है, ऐसी ये बस्‍तर की धरती है। आज मेरा ये सौभाग्‍य है कि आपके बीच आने का मुझे अवसर मिला, आपके दर्शन करने का सौभाग्‍य मिला। आज एक कार्यक्रम रायपुर में भी होने वाला था, लेकिन कल हवा के तूफान ने वहां सब तहस-नहस कर दिया। कई हमारे साथियों को चोट आई। मैं परमात्‍मा से प्रार्थना करता हूं कि ड्यूटी पर तैनात ये सभी बंधु-भगिनी बहुत ही जल्‍द स्‍वस्‍थ हों। डॉ. रमन ने कल ही मुझे फोन करके बताया था.. और उनके स्‍वास्‍थ्‍य की पूरी चिंता राज्‍य सरकार कर रही है और बहुत ही जल्‍द ये सभी स्‍वस्‍थ हो जाएंगे।

आज अनेक विध-कामों के निर्णय हुए हैं। शायद बस्‍तर के इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि एक घंटे के इस समारोह में 24 हजार करोड़ रुपयों के निवेश के साथ विकास की नई ऊंचाईयों को प्राप्‍त करने का निर्णय.. एक राज्‍य, पूरे राज्‍य के लिए भी अगर 5 हजार करोड़ का प्रोजेक्‍ट है, तो राज्‍य के लिए बहुत बड़ी गौरवशाली घटना होती है। जबकि आज एक जिले में 24 हजार करोड़ रुपया..। आने वाले दिनों में इस बस्‍तर की जिंदगी में कैसा बदलाव आएगा इसका मैं भली-भांति अनुमान कर सकता हूं।

आज आप किसी भी आदिवासी को जाकर पूछें, किसी भी गांव के गरीब व्‍यक्ति को जा करके पूछें, आप कोई भी खेत मज़दूर को पूछें, आप किसी भी किसान को पूछें कि आपका क्‍या सुझाव है, कि क्‍या करना चाहिए? आपकी क्‍या अपेक्षा है क्‍या इच्‍छा है? मैं विश्‍वास से कहता हूं, अनुभव से कहता हूं, सब के सब.. किसी भी राज्‍य में क्‍यों न रहते हों, किसी भी भू-भाग पर क्‍यों न रहते हों.. एक ही जवाब निकलता है कि साहब कुछ भी करो, बच्‍चों को रोजगार मिले ऐसा कुछ करो। किसान भी चाहता है कि बच्‍चों को रोजगार मिले क्‍योंकि उसे पता है कि उनको जीवन में आगे बढ़ने के लिए अगर रोजगार मिल जाएगा तो बाकी तो अपना संसार वो खुद मेहनत करके बना लेगा, बच्‍चों को पढ़ाना है तो वो भी कर लेगा, एक बार रोजगार मिल जाए। भारत के लिए सबसे पहली प्राथमिकता है हमारे देश के नौजवान को रोजगार मिले, उसे अवसर मिले, वो देश को आगे बढ़ाने के काम में भागीदार बनना चाहता है। ..और कोई मां-बाप नहीं चाहता है कि बेटा-बेटी रोजगार के लिए सैकड़ों हजार किला मीटर दूर जा करके शहरों की झुग्‍गी-झोपड़ी में जिंदगी बिताए, कोई मां-बाप नहीं चाहता है। हर मां-बाप चाहता है कि बेटा पास रहे और कुछ उसे काम मिल जाए। बेटा भी चाहता है, बेटी भी चाहती है कि बूढ़े-बूढ़े मां-बाप को असहाय छोड़ करके शहर में झुग्‍गी-झोपड़ी की जिंदगी जीने के लिए नहीं जाना है। इसलिए सरकार का यह दायित्‍व बनता है, शासन की जिम्‍मेवारी बनती है कि हम विकास को उस रूप में आगे बढ़ाएं ताकि हिन्‍दुस्‍तान के सभी भू-भाग में विकास पहुंचे, दूर-सुदूर जंगलों में भी विकास पहुंचे और गरीब की झोपड़ी तक विकास के फल पहुंचें। गरीब की झोपड़ी तक विकास का फल पहुंचने का मतलब है कि गरीब से गरीब परिवार की संतान को भी रोजगार का अवसर उपलब्‍ध हो। इसलिए हमने जो विकास का रास्‍ता चुना है उसके केंद्र में हमारा एक ही संकल्‍प है कि देश के नौजवान को अवसर मिले, रोजगार मिले, आगे बढ़ने के लिए उसको मौका मिले।

आज बस्‍तर जिले में.. कोयला पहले भी था, iron ore पहले भी था, सरकारें भी पहले थीं, लोग भी पहले थे, बेरोजगारी भी थी लेकिन फिर भी समस्‍या का समाधान खोजने के लिए ऐसी धीमी गति से चला जाता था कि लोग निराशा के गर्त में डूब जाते थे। आज हमारी कोशिश है कि हिन्‍दुस्‍तान के चारों तरफ रेलवे connectivity मिले, दूर-सुदूर इलाकों में भी रेल की पटरी बिछे, लोगों को आने-जाने की सुविधा बने। पटरी जब लग जाती है, ट्रेन आती है तो सिर्फ यात्रा के लिए काम आती है ऐसा नहीं है, वो एक जीवन को भी गति देता है, अर्थ-जीवन को भी गति देता है। जगदलपुर तक रेल की पटरी हिन्‍दुस्तान की मुख्‍यधारा से आपको जोड़ेगी। जब हम प्रधानमंत्री जन-धन योजना लाते हैं तो गरीब से गरीब को आर्थिक मुख्‍यधारा से जोड़ते हैं और बस्‍तर में जगदलपुर तक की ट्रेन की बात करते हैं तो यहां के नागरिक को हिन्‍दुस्‍तान की मुख्‍यधारा के साथ छोड़ने का हमारा प्रयास होता है।

अभी मुख्‍यमंत्री जी विस्‍तार से बता रहे थे कि हम कच्‍चा माल विदेशों में बेच-बेच कर कब तक अपनी रोजी-रोटी कमाएंगे। ..और हम कैसे लोग है कि iron ore तो हम बाहर भेजें और steel बाहर से लाएं! अब वो कारोबार हमें बंद करना है। अगर iron ore हमारा होगा तो steel भी हमारा होगा और दुनिया को चाहिए तो हम steel देगें, हम iron ore में हमारे नौजवान के पसीने को जोड़ेंगे और उसी iron ore में से steel बनाएंगे और उसी iron ore में से steel बनाते समय मेरे नौजवानों की जिंदगी भी बन जाएंगी ताकि वो दुनिया के हर संकटों से टक्‍कर लें। ऐसा जीवन उसका ऊंचा बन जाए, उस दिशा में हम काम कर रहे हैं। हमारी कोशिश है विकास की नई ऊंचाइयों पर देश को ले जाने की।

आज मैं यहां डॉ. रमन सिंह जी के सपने को धरती पर उतरा हुआ देख करके आया। रमन सिंह जी के प्रति मेरे मन में मित्र होने के बावजूद भी हमेशा एक सम्‍मान का भाव रहा है और सबसे ज्‍यादा मुझे आदर तब हुआ, जब यहां के लोग महंगी.. चिरौंजी हो, काजू हो ये बेच करके नमक खरीदते थे, बदले में नमक! और समाज का शोषण करने का भाव रखने वाले लोग उन महंगे उत्‍पादों को ले करके बदले में नमक देते थे और बस्‍तर जिले के नागरिक नमक पाने के लिए पता नहीं क्‍या कुछ देने के लिए तैयार हो जाते थे। रमन सिंह जी ने सरकार बनाते ही प्रारंभ में तय कर लिया कि मैं नमक लोगों को पहुंचाऊंगा। उस दिन से एक मित्र होने के बावजूद भी एक विशेष आदर की मेरे मन में अनुभूति हुई कि मेरा एक साथी है जो हर पल गरीबों के लिए सोचता है, आदिवासियों के लिए सोचता है।

आज जब मैं knowledge(Education) city में जा करके आया, उसमें जो कल्‍पना है.. हिन्‍दुस्‍तान में जो लोग कहते हैं कि हिंसा के रास्‍ते पर गए हुए लोगों को वापस मुख्‍यधारा में लाने का रास्‍ता क्‍या है, मैं समझता हूं कि रमन सिंह जी ने रास्‍ता बना दिया है। कंधे पर हल! वही समस्‍याओं का हल ला सकता है। कंधे पर gun, ये समस्‍याओं का समाधान नहीं है। जिस धरती पर नक्‍सलवाद का जन्‍म हुआ था और जिसके कारण देश में नक्‍सलवाद की चर्चा हुई थी, वहां पर भी जा करके देखिए, अनुभव के बाद वो सीखे.. और उन्‍होंने भी वो रास्‍ता छोड़ दिया। आज वो नक्‍सलबाड़ी, जहां से हिंसा का मार्ग शुरू हुआ था, बम, बंदुक और गोलियां चलती थी, रक्‍त की धारा बहती थी, आज वहां वो बंद हो गया। जिन लोगों को लगता है कि क्‍या.. आए दिन ये मौत का खेल बंद होगा कि नहीं होगा। मैं देशवासियों! आपको विश्‍वास दिलाना चाहता हूं कि निराश होने की जरूरत नहीं है। यह भी बंद होगा। जब पंजाब में खूनी खेल खेला जा रहा था, क्‍या कभी किसी ने सोचा था कि पंजाब में वो खूनी खेल खत्‍म होगा और लोग सुख-चैन की जिंदगी जिएंगे? आज जी रहे हैं। नक्‍सलबाड़ी में सोचा था? आज लोग वहां भी जी रहे हैं। मुझे विश्‍वास है इस भू-भाग में भी, इस गलत रास्‍ते पर चल पड़े लोग भी.. उनके भीतर भी कभी न कभी मानवता जगेगी।

आज मैं उस ज्ञान नगरी में जा करके आया। 800 से अधिक उन बच्‍चों को मिला जिनको.. कोई गुनाह नहीं था, मां-बाप से बिछुड़ना पड़ा। हिंसा के रास्‍ते पर पागल बने हुए युवकों ने किसी के बाप को मार दिया, किसी की मां को मार दिया, किसी मां-बाप को वहां से दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया। उन 800 बच्‍चों से मैं मिला जिन्‍होंने अपने परिवार-जनों को खोया है। माओवाद की हिंसा के कारण उनकी जिदगी में मुसीबत आई है। लेकिन आज डॉ. रमन सिंह जी को बधाई देता हूं कि उन्‍होंने.. जिनका सब कुछ खत्‍म करने के लिए माओवादी तुले हुए थे, जो बच्‍चों को तलवार, बम, बंदूक के रास्‍ते पर ले जाना चाहते थे उनको रमन सिंह जी ने हाथ में कलम पकड़ा दी, कम्‍प्‍यूटर पकड़ा दिया है और मैंने उनकी आंखों में जो चेतना देखी.. वो विश्‍वास देखा है, उन 800 बच्‍चों को देख करके मैं कहता हूं हिंसा का कोई भविष्‍य नहीं है। अगर भविष्‍य है तो वो शांतिमय मार्गों का है, वो मैं आज देख करके आया हूं, अनुभव करके आया हूं। मैं हिंसा के रास्‍ते पर चले हुए नौजवानों को कहना चाहता हूं कि कम से कम एक प्रयोग कीजिए, कम से कम दो-पांच दिन के लिए कंधे पर से बंदूक नीचे रख दीजिए। सादे-सीधे आदिवासी पहनते हैं, ऐसे कपड़े पहन लीजिए और आपके कारण जिस परिवार को कोई स्‍वजन खोना पड़ा है, किसी के बाप की मृत्‍यु हुई, है किसी की मां की मृत्‍यु हुई है.. उस घर में बचा हुआ जो बच्‍चा है, पांच दिन सिर्फ उसके साथ ऐसे ही बिता करके आ जाइए, उससे बातें कीजिए और उसको ये मत बताइए कि आप कौन हैं, ऐसे ही बातें कीजिए। मैं विश्‍वास से कहता हूं, वो बालक अपनी बातों से, अपने अनुभव से आपको पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर देगा, आपका हृदय परिवर्तन करके रख देगा। आप भी हिल जाएगे कि हिंसा के नशे में आपने कितना बड़ा पाप कर दिया है। एक बार मानवता को अंगीकार करके, राक्षसी वृत्ति से मुक्ति पा करके.. ज्‍यादा नहीं, कुछ पल इन पीडि़त परिवारों से जरा मिल लीजिए। आपको फिर कभी उस रास्‍ते पर जाने कि नौबत नहीं आएगी। आपको भी लगेगा कि आपने कुछ गलत किया है। कोई सरकार आपको बदले, कोई कानून आपको बदले, कोई लोभ-लालच आपको बदले उससे ज्‍यादा आप ही की गोलियों से पीड़ा पाने वाला एक बालक आपकी जिंदगी बदल सकता है। शर्त यही है कि मानवता का अंगीकार करके कुछ पल उसके साथ बिता करके देख लीजिए। मैंने देखा उन बच्‍चों को आज.. हिंसा से कभी समस्‍याओं का समाधान नहीं हुआ है। मिल-बैठ करके रास्‍ते निकल सकते हैं। छत्‍तीसगढ़ अगर इस संकट से मुक्‍त हो जाए तो मैं विश्‍वास से कहता हूं हिन्‍दुस्‍तान में आर्थिक ऊंचाइयों पर नम्‍बर एक पर छत्‍तीसगढ़ आकर खड़ा हो सकता है। यहां के नौजवानों का भविष्‍य बदल सकता है और छत्‍तीसगढ़ के पास वो ताकत है, वो हिन्‍दुस्‍तान का भविष्‍य भी बदल सकता है। इसलिए मेरे भाईयो-बहनों! विकास एक ही मार्ग है जो हमारी समस्‍याओं का समाधान करेगा।

मुझे आज रमन सिंह जी के livelihood college को भी देखने का अवसर मिला। उन्‍होंने पूरे राज्‍य में उसका जाल बिछाया है। दुनिया के समृद्ध से समृद्ध देश हो तो भी.. एक बात आज उसका प्रमुख काम बन गया है। दुनिया का सुखी देश भी skill development को महत्‍व दे रहे हैं। हुनर सिखाने के लिए दुनिया में, हर देश में priority हो गई है। छत्‍तीसगढ़ के अंदर हुनर से शिखर तक पहुंचने का जो अभियान चलाया गया है, वो काबिले दाद है। मैं देख कर आया हूं। मैंने उन बालक-बालिकाओं को देखा, हाथ में हुनर तो है लेकिन आंख में ओझ है, तेज है और बातों में एक अपरम्‍पार विश्‍वास है। बड़े-बड़े अफसर भी.. सीएम या पीएम से बात करनी है तो कुछ पल तो set होने में time लगता है। मैंने देखा कि बच्‍चे फटाफट बातें करते थे। कोई झिझक नहीं थी, उनकी बातों में कोई झिझक नहीं थी। ये जो confidence level है ये जीवन में आगे बढ़ने के लिए बहुत बड़ी अमानत होता है। वो मैं आज देख कर आया हूं।

Skill Development का मिशन ले करके हम पूरे देश में चल रहे हैं क्‍योंकि हमारे देश के नौजवानों को रोजगार देना है ..और रोजगार देना है तो Skill Development सर्वाधिक सरल मार्ग होता है। जीवन के हर क्षेत्र में, हर नौजवान के हाथ में हुनर हो। जिसके हाथ में हुनर होता है उसको कभी जीवन जीने के लिए हाथ फैलाने की नौबत नहीं आती है, वो अपने बलबूते पर, अपनी शर्तों पर जिंदगी जी सकता है। उसे कभी मजबूर नहीं होना पड़ता है और उस काम को livelihood colleges के माध्‍यम से रमन सिंह जी ने चरितार्थ किया है। देश के अन्‍य राज्‍यों के लिए भी यह अपने आप में एक मिसाल बन सकती है। मैं चाहूंगा, मैं भी प्रयास करूंगा कि देश के और राज्‍य भी आ करके इसको देखें, इस मॉडल को समझें और इसको कैसे लागू किया जा सकता है उस पर चर्चा करें।

भाईयों-बहनों! आपने हमें भारी बहुमत के साथ आपकी सेवा करने का मौका दिया है। छत्‍तीसगढ़ पूरी ताकत के साथ हमारे पीछे खड़ा है और मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं कि जितना आपने दिया है, हम ब्‍याज समेत विकास करके लौटाएंगे।

आज तेंदू पत्‍ता वाले हमारे किसान भाइयों-बहनों को बोनस देने का भी मुझे सौभाग्‍य मिला और उनको भी मैंने पूछा कि क्‍या करोगे, हरेक से मैंने पूछा। हरेक को पता है कि इन पैसों का उपयोग अपने बच्‍चों की जिंदगी संवारने के लिए कैसे करना है, इसका खाका उनके दिमाग में तैयार है। यही तो है हरेक का aspiration । उसको पूर्ण करने का हमारा प्रयास है।

एक समय था.. हिन्‍दुस्‍तान की तरफ दुनिया कैसे दे‍खती थी? ज्‍यादातर तो देखने के लिए तैयार ही नहीं थी और जो देखते थे वो भी बड़े उपेक्षा के भाव से देखते थे या तो हंसी-मजाक के रूप में देखते थे। देखते ही देखते माहौल बदला कि नहीं बदला? दुनिया हिन्‍दुस्‍तान को पूछने लगी कि नहीं लगी? विश्‍व के समृद्ध देशों को भी हिन्‍दुस्‍तान की अहमियत को मानना पड़ा कि नहीं मानना पड़ा। सवा सौ करोड़ का देश! इसको सर झुका करके जीने की जरूरत नहीं है। वो वक्‍त चला गया। सवा सौ करोड़ देशवासियों का संकल्‍प है कि हमारा देश माथा ऊंचा करके आंख से आंख मिला करके, सीना तान करके जीने के लिए पैदा हुआ है, झुकने के लिए पैदा नहीं हुआ है। वो शक्ति हमारे भीतर पड़ी है, सवा सौ करोड़ देशवासियों के भीतर पड़ी है। उस शक्ति को मैं भली-भांति पहचानता हूं। विश्‍व में जब किसी से बात करता हूं तो अकेला मोदी बात नहीं करता है, सवा सौ करोड़ देशवासी एक साथ आंख मिला करके बात करते हैं और विश्‍व आज हिन्‍दुस्‍तान का लोहा मानने लगा है। पूरे विश्‍व मानने लगा है कि आज दुनिया में तेज गति से आर्थिक विकास करने वाला कोई देश अगर है.. सारे संसार में, तो उस देश का नाम है- हिन्‍दुस्‍तान।

कितनी तेजी से परिवर्तन आ रहा है, लेकिन कुछ लोग होते हैं, जिनको जीवनभर लोगों को गरीब रखने में ही आनंद आया, दु:खी रखने में ही आनंद आया। अगर उसमें कुछ बदलाव आता है, तो वो अब दु:खी हो रहे हैं। उनकी परेशानी मैं समझ सकता हूं। जो लोग विजय पचा नहीं पाए 60 साल तक, वो पराजय भी नहीं पचा पा रहे हैं। भाईयों-बहनों, जिनको जनता ने नकार दिया है, उनके पास झूठ फैलाने के सिवाए, जनता को भ्रमित करने के सिवाए, जनता को गुमराह करने के सिवाए कोई रास्‍ता नहीं बचा है।

मैं देशवासियों को विश्‍वास दिलाता हूं, इन्‍हीं दिनों को याद कर लीजिए, इसी कालखंड में मैं छत्‍तीसगढ़ भी आया था, पिछले साल। अखबारों में क्‍या आता था? टीवी में क्‍या समाचार आते थे एक साल पहले? .. आज इतने का भ्रष्‍टाचार हुआ, आज ये घोटाला हुआ, वो घोटाला हुआ, इसने इतना मार लिया, उसने उतना लूट लिया, यही खबरें आती थीं कि नहीं आती थीं। कोयले की चोरी की चर्चा होती थी कि नहीं होती थी? एक साल हुआ है मेरे भाईयों-बहनों! एक भी खबर आई है क्‍या? क्‍या ईमानदारी से देश नहीं चलाया जा सकता क्‍या? चलाया जा सकता है। एक साल के अनुभव से मैं कह सकता हूं कि ये देश ईमानदारी से चलाया जा सकता है।

चिठ्ठी–पर्ची से कोयले की खदानें दे दी थीं। आज हमने सार्वजनिक रूप से auction किया और वो खज़ाना राज्‍य की तिजोरी में दे दिया। कोयले के auction का पैसा राज्‍य के खज़ाने में आ गया। इतना ही नहीं, जहां पर खनिज़ निकलता है, उस इलाके के जो जिले हैं.. और ज्‍यादातर पूरे देश में आदिवासी क्षेत्र है जहां पर खनिज़ सम्‍पदा है। वहां हमने special संगठन की रचना की है। वहां से कुछ हिस्‍सा लोगों के कल्‍याण के लिए खर्च कर दिया जाएगा। पहली बार गरीबों के लिए रुपए तिजोरी से निकालने का काम हो रहा है।

मुझे विश्‍वास है कि जिस विकास के रास्‍ते पर हम चल पड़े हैं, उस रास्‍ते से देश की समस्‍याओं का समाधान भी करेंगे, आपकी आशाओ-आकांक्षाओं को परिपूर्ण भी करेंगे और आपके साथ कंधे से कंधा मिला करके देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में हम सफल होंगे।

इसी एक विश्‍वास के साथ मैं फिर एक बस्‍तर को, छत्‍तीसगढ़ को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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हमारी सरकार भारत में 21वीं सदी का आधुनिक स्पोर्ट्स इकोसिस्टम बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध: पीएम मोदी
August 27, 2026
खेलो इंडिया देशभर में खेल प्रतिभाओं को निखारने का एक शानदार मंच बन गया है; यह युवा खिलाड़ियों को अपने सपनों को साकार करने के अवसर और समर्थन प्रदान कर रहा है: प्रधानमंत्री
जब मैं खेलों की बात करता हूं, तो यह सिर्फ पदक जीतने तक सीमित नहीं है; यह विकसित भारत के निर्माण में, भारत की खेलशक्ति और युवाशक्ति को एक साथ जोड़ने का अभियान है: प्रधानमंत्री
अन्य देश उन खेलों में पदक जीत रहे हैं जिनमें भारत भाग भी नहीं लेता; हमें इन खेलों में भी महारत हासिल करनी होगी: प्रधानमंत्री
खेल हमें केवल चैंपियन बनना ही नहीं सिखाता, बल्कि खेल हमें एक बेहतर प्रतिस्पर्धी बनना भी सिखाता है; उठना, गिरना और गिरकर फिर से उठने जज्बा हमारे भीतर लाता हैः प्रधानमंत्री
स्क्रीन से ज्यादा खेल केंद्रों की अहमियत है, प्लेस्टेशन से ज्यादा खेल के मैदानों की अहमियत है: प्रधानमंत्री

नमस्कार।

आप सभी ने इतने शानदार तरीके से खेलो इंडिया संवाद का ये कार्यक्रम आयोजित किया है। मैं आप सभी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं टेक्नोलॉजी के माध्यम से इस कार्यक्रम से जुड़े केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी, सभी मुख्यमंत्री, राज्य सरकार के अनेक मंत्री, संसद में मेरे सहयोगी, My Bharat के लाखों-लाख वॉलिंटियर्स का भी बहुत हृदय से अभिनंदन करता हूं। आज इस कार्यक्रम में देशभर के एथलीट्स और स्पोर्ट्स जगत के महानुभाव भी हम सबके साथ शामिल हुए हैं।

आप सबको पता है साथियों,

दो दिन बाद, 29 अगस्त को नेशनल स्पोर्ट्स डे भी है। मैं आप सभी को, देशभर के युवाओं को और खेल जगत से जुड़े सभी साथियों को खेल दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं देता हूं। ये दिन माँ भारती की एक महान संतान, मेजर ध्यानचंद जी को, उनको याद करने का भी अवसर होता है। 100 वर्ष पहले भारतीय सेना की हॉकी टीम न्यूजीलैंड के दौरे पर टूर पर गई थी और उस टीम में ध्यानचंद जी भी थे। वो टूर भारत और न्यूजीलैंड के, स्पोर्ट्स रिलेशंस के 100 वर्ष पूरे होने का आधार है। कुछ दिन पहले मैं न्यूजीलैंड की यात्रा पर गया था। तब भी मैंने न्यूजीलैंड में उन्हें याद किया था। मेजर ध्यानचंद जी ने जिन रिश्तों की नींव रखी थी, आज भारत उन रिश्तों की समृद्धि के लिए निरंतर काम कर रहा है।

साथियों,

मैंने इस 15 अगस्त को लाल किले से भारत का स्पोर्ट्स विजन देश के सामने रखा है। जब मैं स्पोर्ट्स की बात करता हूं, तो ये केवल मेडल जीतने तक सीमित नहीं है, ये विकसित भारत के निर्माण में भारत की खेलशक्ति और भारत की युवाशक्ति को एक साथ जोड़ने का अभियान है। मैं हमेशा कहता आया हूं - जो खेले, वो खिले। और खेल में खिलना सिर्फ मैदान पर जीतना नहीं है, खेल में खिलना मतलब व्यक्तित्व का खिलना, परिवार का खिलना और देश का गौरव बढ़ाना।

साथियों,

जब कोई खिलाड़ी सफल होता है, तो वो सफलता केवल उसकी नहीं होती, उसकी सफलता से उसके परिवार की पहचान बनती है, प्रतिष्ठा बढ़ती है। जिस स्कूल और कॉलेज में वो पढ़ा, उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है। उसके जिले और राज्य की पहचान और मजबूत होती है। यानि दुनिया उस खिलाड़ी के नाम से उस शहर या राज्य को पहचानने लगती है। और जब ऐसी अनेक सफलताओं को लेकर कोई क्षेत्र Global Sports Map पर चमकता है, तो दुनिया का उस शहर को देखने का नजरिया भी बदल जाता है। आज के इस कार्यक्रम में देश के जिन सैकड़ों जिलों के खिलाड़ी जुड़े हुए हैं, हर जिले में दुनिया के Sports Map पर चमकने की ताकत है। इस ताकत को समझते हुए ही हमें इस संवाद कार्यक्रम को आगे बढ़ाना है।

साथियों,

इस बार लाल किले से मैंने खेलों से जुड़ी एक बहुत बड़ी चुनौती की तरफ भी देश का ध्यान दिलाया है। ये चुनौती ओलंपिक्स से जुड़ी है। एक कड़वी सच्चाई ये है कि ओलंपिक्स में जितने अलग-अलग स्पोर्ट्स होते हैं, भारत की टीमें उसमें से आधे स्पोर्ट्स में हिस्सा ही नहीं लेती हैं। यानि मेडल टैली के एक बहुत बड़े हिस्से के लिए तो हम कंपीट ही नहीं करते और दशकों से ऐसा ही चला आ रहा है। 2012 के ओलंपिक्स में, उस समय भारत ने सिर्फ, 2012 में सिर्फ 13 खेलों में हिस्सा लिया था। 20 से ज्यादा खेलों में तो भारत की भागीदारी ही नहीं थी। और इन 20 से ज्यादा खेलों में कई सारे खेल ऐसे हैं, जिनका नाम तक देश में लोगों ने शायद ही सुना हो। दुनिया के दूसरे देश उन खेलों में मेडल जीतते हैं और हम उनमें हिस्सा ही नहीं लेते। हमें मेडल टैली बढ़ाने के लिए इन खेलों में भी महारथ हासिल करनी ही होगी। अब जैसे, सर्फिंग और स्पोर्ट्स क्लाइंबिंग, हमारे पास इतनी बड़ी कोस्टलाइन है, इतना बड़ा पहाड़ी क्षेत्र है, जहां इस प्रकार के स्पोर्ट्स के लिए एक स्वाभाविक रूचि हो सकती है। हमारे पास वॉटर स्पोर्ट्स से लेकर विंटर स्पोर्ट्स तक के लिए डेमोग्राफी भी है और जियोग्राफी भी है। लेकिन फिर भी हम ऐसे खेलों में दुनिया में कहीं दिखते ही नहीं हैं। इसलिए, हमें अलग-अलग जिलों में ऐसी संभावनाओं को तलाशना होगा जहां किसी एक खास स्पोर्ट्स का इकोसिस्टम विकसित हो सके, और इसमें आज के इस कार्यक्रम की बहुत बड़ी भूमिका है।

साथियों,

जब हम 2036 ओलंपिक्स की तैयारी की बात करते हैं, तो हमारा फोकस ये होना चाहिए कि हमें आज से ही वो खिलाड़ी तैयार करने हैं जो 2036 में अलग-अलग स्पोर्ट्स के लिए क्वालीफाई और कंपीट करेंगे। और इसलिए, लाल किले से मैंने 5 साल की उम्र से 15 साल की उम्र के खिलाड़ियों की पहचान करने के लिए एक बड़े टैलेंट हंट अभियान का ऐलान किया है। और इसमें भी हमें केवल ये नहीं देखना है कि किस बच्चे की किस खेल में रुचि है, बल्कि ये भी देखना है कि कौन सा बच्चा किस खेल के लिए फिट है। हमें उस हिसाब से ही उस बच्चे को ट्रेनिंग देनी होगी। और मैं आप सभी को भरोसा देता हूं, इसके लिए सरकार की तरफ से जो भी सपोर्ट चाहिए, सरकार उसमें आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेगी।

साथियों,

हमारी सरकार भारत में 21वीं सदी का आधुनिक स्पोर्ट्स इकोसिस्टम बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। आज स्पोर्ट्स और स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटीज से लेकर आधुनिक ट्रेनिंग सेंटर्स तक देश में एक ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है, जिसमें प्रतिभा को पहचानने से लेकर उसे दुनिया के मंच तक पहुंचाने तक हर स्तर पर सहयोग मिले। हम दुनिया के दूसरे देशों के साथ भी Sports Science, Training, Coaching और अनुभव साझा करने के लिए सहयोग बढ़ा रहे हैं।

साथियों,

Sports को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, ये आयोजन भी इसका उदाहरण है। खेलो इंडिया संवाद सिर्फ खेल की बात करने का कार्यक्रम नहीं है। ये एक ऐसे संवाद का मंच है जिसका एक-एक विचार देश के स्पोर्ट्स विजन को एक नई दिशा दे सकता है। और इसके साथ जो युवा संवाद हो रहा है, वो कार्यक्रम आपके Ideas और Aspirations को देश के सपनों से जोड़ने का बहुत बड़ा माध्यम है। इस कार्यक्रम में स्पोर्ट्स इकोसिस्टम, टैलेंट डेवलपमेंट, गवर्नेंस और विकसित भारत को लेकर युवा क्या सोचते हैं, उनके सुझाव क्या हैं, इन बातों को सुना जाएगा और policy process में शामिल किया जाएगा। इसलिए, आप सबसे कहूंगा कि जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके, इस मंच का सार्थक उपयोग कीजिए, नए Ideas आने दीजिए, युवा शक्ति के ये नए Ideas ही विकसित भारत की सिद्धि की ताकत बनेंगे।

साथियों,

हम अक्सर सुनते हैं, एक स्वस्थ समाज के लिए, एक अच्छी पारिवारिक व्यवस्था के लिए, एक बेहतर कार्यसंस्कृति के लिए स्पोर्ट्स-पर्सन स्पिरिट बहुत जरूरी होती है और ये स्पोर्ट्स-पर्सन स्पिरिट खेल के मैदान में गए बिना सीखनी बहुत मुश्किल होती है। खेल हमें केवल चैंपियन बनना ही नहीं सिखाता, बल्कि खेल हमें एक बेहतर कंपीटिटर बनना भी सिखाता है। उठना, गिरना, गिरकर फिर से उठना, स्पोर्ट्स ये ज़ज्बा हमारे भीतर लाता है।

साथियों,

खेलों से जीवन कैसे बदलता है, इसका एक बड़ा उदाहरण हमारे पैरा एथलीट्स हैं। पैरा एथलीट्स को जब कोई मैदान में देखता है, तो जीवन के बारे में सोचने का नज़रिया बदल ही जाता है। और जब वो कुछ अचीव करता है, तो उस एथलीट के साथ ही उसके पूरे परिवार को नई ज़िंदगी मिल जाती है। वो मां-बाप, भाई-बहन, जो अपने उस बच्चे को शुरुआती दिनों में संघर्ष करते देखते हैं, उनके लिए उस दिव्यांग खिलाड़ी की सफलता, उनके सपनों को, उनके हौसलों को भी एक नई ऊंचाई दे देती है।

साथियों,

मैं खुद ऐसे प्लेयर्स से हमेशा इंस्पायर होता रहा हूं, अब जैसे आपने सबने नाम जो सुने हैं, आर्चरी में हमारी एक बेटी, एक कमाल की खिलाड़ी हैं, नाम जानते हो आप?, शीतल। जब पैरालंपिक में उन्होंने मेडल जीता, तो पूरा जम्मू-कश्मीर, पूरा हिन्दुस्तान गर्व से भर उठा। ऐसे ही हमारी एक और बेटी अवनि लेखरा हैं, जिन्होंने दो-दो बार पैरालंपिक के मेडल जीते। मैं जब भी बेटी अवनि से मिलता हूं, बहुत गर्व महसूस करता हूं। सुमित अंतिल हो, नितेश कुमार हो और अभी-अभी तो आपने नाम सुना होगा, हमारे झंडू कुमार। ऐसे हमारे पैरा-एथलीट्स हैं, ऐसे हर साथी, हमें भी प्रेरित करते हैं।

साथियों,

स्पोर्ट्स, एक बेहतर जीवन की गारंटी है। स्पोर्ट्स हमें बेहतर जीवन जीने के लिए फिट बनाता है, हमारी क्वालिटी ऑफ लाइफ को बेहतर करता है। हम सभी फौजा सिंह जी के बारे में जानते हैं। पिछले वर्ष 100 वर्ष से ज्यादा की आयु में फौजा सिंह जी का निधन हुआ है। खेल के प्रति प्यार हो, फिटनेस हो, ये कैसे जीवन पर्यंत चलता है, फौजा सिंह जी इसकी मिसाल थे। उनका जीवन इस बात की बहुत बड़ी प्रेरणा है कि कैसे स्पोर्ट्स और क्वालिटी ऑफ लाइफ आपस में जुड़े हुए हैं।

साथियों,

स्पोर्ट्स का एक और बहुत बड़ा फायदा होता है, जो असली खिलाड़ी होते हैं, उनमें ड्रग्स, नशे से दूर रहने की इच्छाशक्ति भी पैदा हो जाती है। आज जब नशे की इतनी बड़ी चुनौती युवाओं के सामने है, तो स्पोर्ट्स इसमें भी बहुत सार्थक भूमिका निभाता है।

साथियों,

मुझे खुशी है कि आज भारत में स्पोर्ट्स एक बेहतरीन प्रोफेशन के तौर पर उभरा है। समाज में Sports को लेकर नज़रिया बदला है। आज आप देखिए, हमारे देश में लोग ट्रायाथलोन में हिस्सा ले रहे हैं, 5K और 10K Races दौड़ रहे हैं। यार-दोस्त मिलकर हाय-रॉक्स जैसे चैलेंजेस को पूरा कर रहे हैं। कोई पहली बार शीर्षासन करने की खुशी मना रहा है, तो कोई दोस्तों और फैमिली के साथ मिलकर पिकलबॉल और बैडमिंटन खेल रहा है। ये छोटी-छोटी चीजें हैं, लेकिन अगर इसको एक बड़े नजरिए से देखें, तो इसमें बहुत बड़ा चेंज नज़र आएगा। चेंज ये कि स्पोर्ट्स अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन रहा है। अगर पढ़ाई और करियर का टाइमटेबल बन रहा है, तो दिन भर के रूटीन में स्पोर्ट्स को भी जगह मिल रही है। और यही चेंज है, यही परिवर्तन है, जिसके कारण भारत के स्पोर्ट्स फ्यूचर पर भरोसा भी बढ़ रहा है।

साथियों,

देश में स्पोर्ट्स कल्चर तभी बनता है, जब सामान्य मानवी इससे जुड़े। जब स्कूल्स, स्पोर्ट्स के पीरियड को, को-करिकुलर नहीं, जीवन का हिस्सा मानें। जब ऐसा होता है, तो इससे टैलेंट पूल भी बढ़ता है और स्पोर्ट्स को करियर मानने वाले बच्चों को, उनकी फैमिली का सपोर्ट भी मिलता है। और इसलिए ही मैं कहता हूं, स्क्रीन से ज्यादा, स्पोर्ट्स सेंटर्स की अहमियत है। प्ले-स्टेशन से ज्यादा, प्लेग्राउंड की अहमियत है। और ये तभी होगा, जब आप सब युवा साथी इस अप्रोच को आगे बढ़ाएंगे।

साथियों,

मुझे भारत की युवाशक्ति के सामर्थ्य औऱ उसकी सफलता पर बहुत भरोसा है। मैं देश के हर युवा से कहना चाहता हूं, खेल के मैदान में हो या समाज के बीच, आपकी भागीदारी ही भारत की शक्ति है। आपको खेल से प्यार है, तो इससे जुड़ने के अनेक माध्यम बन रहे हैं। अब नए- नए स्पोर्ट्स इक्विपमेंट्स आ गए हैं, नई टेक्नोलॉजी आ गई है। ट्रेनिंग और कोचिंग के तरीके बदल गए हैं। खेलों के आयोजन की, उसकी प्रतिस्पर्धा की, उसकी विधाओं की जरूरतें बदल गई हैं। इक्विपमेंट डिजाइन है, स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी है, Sports Medicine है, Nutrition है, Psychology, Analytics, ऐसे अनेक क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर बन रहे हैं। आपको ये अवसर छोड़ना नहीं है। इसलिए, इस संवाद में खुलकर अपने ideas सामने रखिए। युवा शक्ति की ये भागीदारी विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत है। एक बार फिर आप सभी युवा साथियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद।

वंदे मातरम्।