प्रधानमंत्री मोदी ने सोनीपत, हरियाणा में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की परियोजनाओं का शिलान्यास किया
बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर से जीवन की गुणवत्ता भी बढ़ती है: प्रधानमंत्री मोदी
बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर से राष्ट्र का नव-निर्माण किया जा सकता है: प्रधानमंत्री
इन सड़कों पर केवल वाहन नहीं चलेंगे बल्कि ये सड़कें हरियाणा को विकास के मार्ग पर ले जाएंगी: प्रधानमंत्री
कई ज़िले ऐसे हैं जो राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े नहीं हैं। भारत माला परियोजना से ये स्थिति बदलेगी: प्रधानमंत्री
हमने रेल की गति बढ़ाने, विस्तार, और बेहतर स्टेशनों के साथ रेलवे को बदलने का प्रयास किया है। कई और पहल की जा रही है: प्रधानमंत्री
हम उन 18,000 गांवों में 24/7 बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराने के लिए समर्पित हैं जहाँ अभी तक बिजली नहीं पहुंची है: प्रधानमंत्री मोदी

कभी-कभी लोगों के मन में विचार आता है कि पैसे होते हैं तो रास्‍ते बनते हैं लेकिन हकीकत ये है अगर रास्‍ते बनते हैं तो फिर पैसे अपने-आप बनना शुरू हो जाते हैं। आज के युग में विकास की सबसे पहली प्राथमिक आवश्‍यकता होती है Infrastructure चाहे वो बिजली की बात हो, पानी की हो, सड़क की हो, और जहां-जहां Infrastructure पहुंचता है वहां-वहां विकास की रफ्तार तेज होती है। Quality of life में भी बहुत बड़ा बदलाव, जब इस प्रकार की सुविधाएं तैयार होती हैं तब होता है। लेकिन ज्‍यादातर हमारे देश में सरकारें दुविधा में रहती हैं, उनको लगता है कि किसी मतदाता को कोई लाभ मिलेगा तो, तो चुनाव में लाभ मिलेगा लेकिन अगर सड़क बनती है तो लोगों को लगता है उसमें क्‍या है भई ये तो सरकार का काम है, मेरा क्‍या हुआ। और ये दुविधा कई वर्षों से हमारे देश में चल रही है। और शायद ये दुविधा ही हमारे देश में विकास की सबसे बड़ी रुकावट है। जो समाज में दलित है, पीडि़त है, शोषित है, वंचित है, उनकी चिंता करना, विकास के फल उन तक पहुंचें, विकास की यात्रा में उनकी समान भागीदारी हो, ये तो सुनिश्चित करना राज्‍य की प्राथमिकता होती ही है, होनी भी चाहिए। लेकिन साथ-साथ अगर सर्वांगीण विकास करना है, लंबे अर्से तक लोगों को आत्‍मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ना है, ये बहुत आवश्‍यक होता है कि Infrastructure को बल दिया जाए।

हरियाणा छोटा प्रदेश है लेकिन करीब-करीब 32 हजार करोड़ रुपये की योजनाएं सिर्फ roads के लिए आएं, ये छोटी बात नहीं है। ये 32 हजार करोड़ रुपये लगते हैं तो इलाके के नौजवानों को रोजगार भी मिलता है, मजदूरी करने वालों को भी काम मिलता है, लेकिन जब व्‍यवस्‍था खड़ी होती है तो विकास की गति भी बहुत तेज होती है।

आप में से अगर किसी को अध्‍ययन करना है तो कोरिया एक उत्‍तम नमूना है कि कोरिया कहां-से-कहां पहुंचा और वहां की शुरूआत, वहां के शासकों ने इस बात से की कि कोरिया के बीच से गुजरता हुआ एक बहुत बड़ा आधुनिक Highway बनाया जाए। बड़ा विवाद हुआ था उस देश में। विवाद इस बात का हुआ कि देश गरीब है, एक रोड के लिए इतने पैसे लगा रहे हो, स्‍कूल नहीं है, अस्‍पताल नहीं है, गरीबी है, और अब रोड के लिए इतने अरबों-खरबों लगा रहे हो। बड़ा विवाद हुआ था लेकिन उस समय के शासकों ने इन सारे आरोप-प्रत्‍यारोपों के बीच भी पूरे कोरिया के बीच से एक उत्‍तम रास्‍ता बनाने का तय कर लिया और बनाया। और उस एक रास्‍ते ने पूरे कोरिया के जीवन को बदल दिया। आज दुनिया के समृद्ध देशों में कोरिया का नाम आ गया है।

Infrastructure की ये ताकत होती है और इसलिए मार्ग के क्षेत्र में, हमारे नितिन गडकरी जी के नेतृत्‍व में शायद पिछले 60 साल में इतने व्‍यापक रूप से मार्ग निर्माण के काम पर कल्‍पना तक नहीं की गई होगी। एक तरफ भारतमाला योजना है, दूसरी तरफ सेतुभारतम योजना है। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत को उत्‍तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम जोड़ने के लिए एक Golden चतुष्‍क का निर्माण करने का बीड़ा उठाया और उस काम में इतनी तेजी आई कि उनके कार्यकाल में जितना काम पूरा हुआ, उस काम को आज भी हिन्‍दुस्‍तान के विकास में एक अहम भूमिका अदा हो रही है, इस रूप में माना गया से है।

ये जो रास्‍ते बनने वाले हैं, वो रास्‍ते सिर्फ हमारे Vehicles को ले जाने वाले रास्‍ते नहीं हैं। ये मार्ग का निर्माण हरियाणा को गति देने वाला निर्माण है, ये मार्ग का निर्माण हरियाणा को विकास की नई ऊंचाईयों पर तेज गति से पहुंचाने का अभियान है।

सागरमाला योजना के तहत हिन्‍दुस्‍तान के समुद्र तट, उस समुद्र तट के साथ वो Infrastructure जोड़ा जाए ताकि हिन्‍दुस्‍तान का हर कोना सामुद्रिक व्‍यापार के लिए जहां जाना हो, उसको अच्‍छे से अच्‍छा तेज गति से connectivity मिले ताकि देश में व्‍यापार को बढ़ावा मिल सकता है। अगर अच्‍छा Infrastructure है और हिमाचल के apple हैं, उनको समुद्री मार्ग से दुनिया में कहीं पहुंचाना है, तेज गति से अगर पहुंचा दिया तो वो किसान भी सुखी होता है, और जहां पहुंचता है वहां भी अच्‍छा माल पहुंचता है। यानी एक प्रकार से इन सुविधाओं से गांव गरीब किसान भी जो मेहनत करके पैदा करता है, अच्‍छे बाजार में सही समय पर पहुंच करके अपने आर्थिक विकास की यात्रा को गति दे सकते हैं। और इसलिए हमारे बंदरों के साथ, सामुद्रिक बंदरों के साथ, सागरमाला के तहत road connectivity देने का अभियान है।

सेतुभारतम, आपने देखा होगा हमारे देश में दो तरफ सड़क बनी है, बीच में से रेल जा रही है, ऊपर पुलियां नहीं बन रही हैं, रोड खराब हो रहा है। वर्षों तक ये चलता था, कभी रेल permission नहीं दे रही है, कभी रोड वाले काम नहीं करते हैं। नितिन जी ने आ करके बीड़ा उठाया, रेल और रोड के बीच में सामंजस्‍य बन गया, और एक formula बनाएं कि अगर इतने parameter पूरे होते हैं तो permission आपो-आप मिल जाएगी, अब नीचे भले रेल जाती है, ऊपर bridge बनाने का काम चालू करो।

इतनी तेज गति से काम बढ़ रहा है, आपको हैरानी होगी। हमारे देश में कहीं रेल गुजर रही है और गांव विकसित हुआ। गांव को एक छोर इस तरफ है रेलवे के, दूसरा उस तरफ है। पानी की पाईप लाईन डालनी है तो railway department दो-दो, चार-चार साल तक permission नहीं देता। और उसके कारण एक ही गांव, बीच में से रेल जा रही, उधर पानी नहीं पहुंच रहा है। हमने कुछ नियम ऐसे बनाए हैं कि Infrastructure में इस प्रकार की जो कठिनाईयां हैं वो समय-सीमा में निश्चित parameter के तहत तत्‍काल लागू की जाएं और इसके कारण इतने काम जो अटके पड़े थे उनको गति मिली।

मैं इन दिनों हर महीने में एक बार राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ बैठता हूं, video conference करता हूं और जितने project अटके पड़े हें, वो क्यों अटके हैं, किसके कारण अटके हैं, उसकी जरा पूछताछ करता हूं। आपको हैरानी होगी, पिछले 5-6 महीनों से मेरा ये अभियान चल रहा है। अब तक करीब चाल लाख करोड़ रुपए के अटके हुए project काम करना शुरू कर दिए हैं। सेतू भारतम के द्वारा इस देश में करीब पौने 400 ऐसे bridge बनाने की जरूरत है जो विकास के लिए bottle neck बने हुए हैं, रुकावट बने हुए हैं। अगर ये 400 सेतु बन जाते हैं तो पूरे देश में एक गति को नया आयाम मिलेगा।

सेतुभारतम के तहत अरबों-खरबों रुपया लगाकर के, एक focus के रूप में कि bridge बनाने के काम को बल देना है, कभी चौड़ा करना है, कहीं नया Parallel bridge बनाना है, कहीं नए bridge बनाने हैं। एक साथ सर्वे करके उसका काम करने का अभियान उठाया है, एक भारतमाला योजना बनाई है। आपको हैरानी होगी 60 साल के बाद इस देश में 123 district ऐसे हैं, यानी करीब-करीब 20 percent, 20 percent district ऐसे हैं, जो आज भी National Highway के साथ connectivity नहीं है और इसलिए भारतमाला project के तहत एक अभियान उठाया है कि जल्द से जल्द हिन्दुस्तान के 123 district जो National Highway से link नहीं हैं, उनको जोड़ने के लिए भारतमाला project चलाया है और आने वाले वर्षों में focus target योजना के साथ इस काम को करने की दिशा में हम आगे बढ़े जा रहे हैं।

दिल्ली के चारों तरफ पूरब और पश्चिम नई सड़क, दिल्ली को तो अनेक समस्याओं से तो मुक्त करेंगे ही करेंगे लेकिन इसके बाद हरियाणा के व्यक्ति को अगर राजस्थान जाना, या हरियाणा के व्यक्ति को उत्तर प्रदेश के किसी छोर पर जाना है, उसकी सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा, तेज गति से वो बाहर से बाहर अपना आगे बढ़ जाएगा और ये road की रचना ऐसी है कि भविष्य में वहां पर urban development तो होना ही होना है। जब road आता है तो विकास अपने आप होता ही होता है, कई कालोनियां बनना शुरू हो जाती है लेकिन ये road की रचना ऐसी है कि साथ में अगर नए शहर विकसित भी हो जाएंगे, नई locality विकसित भी हो जाएगी तो भी दोनों के बीच में कोई contradiction नहीं होगा, तकलीफ नहीं होगी। ऐसा सुरक्षित मार्ग बनाने के पीछे ये इतने अरबों-खरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

मैं हरियाणा सरकार को, श्रीमान नितिन जी को और उनके department की पूरी team को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं कि इस काम को वो बहुत तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं और भारत को गति देने में एक बहुत बड़ी अहम भूमिका, railway हमने railway में आमूल-चूल परिवर्तन करने कि दिशा में प्रयास शुरू किया है, railway स्टेशनों में बदलाव लाने का प्रयास शुरू किया है, रेल की गति बढ़े, रेल expansion हो, रेल के नए area extension हो, रेल में जहां diesel से चल रहा है, वहां electricity कैसे आए, एक साथ अनेकों प्रकार के initiative लेकर के, भारत के रेल युग को एक आधुनिक रेल युग में परिवर्तन करने का प्रयास बहुत तेज गति से हमने उठाया है। बिजली, 2022 जब भारत आजादी के 75 साल मनाएं, हमारा सपना है कि तब हिंदुस्तान के हर गांव में सातों दिन, 24 घंटे, पूरे सालभर बिजली मिलनी चाहिए। ये काम सरल नहीं है, मैं जानता हूं, बिजली के उत्पादन में कितनी ताकत लगेगी, मैं जानता हूं, बिजली पहुंचाने में कितनी ताकत लेगगी, मैं जानता हूं लेकिन किसी ने तो कठिन काम भी हाथ में लेने पड़ते हैं और हमने बीड़ा उठाया है कि 2022 जब भारत आजादी के 75 साल मनाता होगा, हिंदुस्तान के अंदर जहां-जहां बिजली पहुंचानी होगी, वहां पहुंचेगी और 24 घंटे बिजली उपलब्ध होगी, इस दिशा में हम काम रहे हैं।

युग बदला है, बदले हुए युग में अब highway से ही काम सिर्फ नहीं है। Highways भी चाहिए, information wave भी चाहिए, Digital India का जो हमारा सपना है, उस Digital India के सपने का पूरा करने के लिए 21वीं सदी का जो महत्वपूर्ण Infrastructure है, वो है Highways के साथ-साथ eye ways आज सारी दुनिया आपके mobile phone में है और इसलिए उसके infrastructure को भी बल देना पड़ेगा। आधुनिक भारत की पहली शर्त बन गया है, eye ways होना और इसलिए Digital India के माध्यम से Optical Fiber Network का काम पूरा हिंदुस्तान में तेज गति से चल रहा है। मैं जब इन चीजों का review करता हूं तो मेरे ध्यान में आया, लाखों गांव ऐसे हैं कि जहां पर आज के युग में Digital connectivity नहीं है, वो भी एक कठिन काम है, हमने उसका बीड़ा उठाया है, काम तेजी से चल रहा है। जब मैं बिजली के लिए पूछ रहा था, मैं हैरान था 21वीं सदी के 15 साल बीत चुके हैं, आजादी के 70 साल होने जा रहे हैं लेकिन इस देश में 18 हजार गांव ऐसे हैं, जहां बिजली का खंभा तक नहीं लगा है, एक तार भी नहीं पहुंचा है। हमने बीड़ा उठाया है, मैंने लाल किले से इसकी घोषणा की थी कि एक हजार दिन में 18 हजार गांव जहां बिजली पहुंची नहीं है, वो दुर्गम से दुर्गम इलाके होंगे, पहाड़ की चोटी पर हो या रेगिस्तान में हो, हम वहां पर बिजली पहुंचाएंगे, इसका एक अभियान चलाया है।

भाइयों-बहनों आधुनिक भारत को बनाने के लिए Infrastructure की जितनी आवश्यकता है, उस पर हम तेज गति से काम पर लगे हैं, हरिय़ाणा उसमें बहुत प्रगति कर सकता है, सबसे ज्यादा फायदा हरियाणा ले सकता है और मनोहर जी इस बात को बल देकर के आगे बढ़ा रहे हैं। मैं फिर एक बार हरियाणा को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं, आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं। मेरे साथ बोलिए भारत माता की, भारत माता की।

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मेरे प्यारे देशवासियो,

नमस्कार | ‘मन की बात’ में एक बार फिर आप सबसे जुड़कर मुझे अत्यंत आनंद हो रहा है | 2026 का आधा साल बीतने को है | इन 6 महीनों में हमने ‘मन की बात’ में देशवासियों की अनेक उपलब्धियों पर चर्चा की है | जून में भी, देश ने कुछ ऐसी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जो हर देशवासी को गर्व से भर देती हैं | ये सफलताएँ देश की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जुड़ी हैं | हाल ही में मुझे कोलकाता में नौ-सेना से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला | वहाँ INS दूनागिरी, INS संशोधक और INS अग्रय को भारतीय नौ-सेना के बेड़े में शामिल किया गया | इन ships की design और manufacturing तक, सब कुछ स्वदेशी है |

साथियो,

जून के महीने में ही aviation sector में भी देश ने एक बड़ी सफलता पाई | C-295, ये विमान ‘Made In India’ है और C-295 विमान ने अपनी पहली उड़ान पूरी की है, और ऐसे 40 विमान, भारत में ही बनाए जा रहे हैं | इससे MSME और Aerospace sector को नई शक्ति मिल रही है | रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं | और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प भी मजबूत हो रहा है | इसी महीने DRDO ने स्वदेशी ‘Long Range Land Attack Cruise Missile’ का भी सफल परीक्षण किया है | इसको DRDO की Laboratories और Indian Industries Partners ने मिलकर बनाया है, यानि, आज समुद्र से लेकर आकाश तक हमारा भारत अधिक सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन रहा है |

साथियो,

जून में एक और आयोजन हुआ जिसमें पूरी दुनिया भारत के प्रयासों से जुड़ी, और ये कार्यक्रम था ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ | इस बार दुनिया के 2500 से अधिक स्थानों पर योग के अनेक विविध कार्यक्रम हुए | हमारे देश में करोड़ों लोगों ने स्थान-स्थान पर योग कार्यक्रमों में हिस्सा लिया | इस महीने, अहमदाबाद में आयोजित ‘विश्व योगासन चैम्पियनशिप’ की भी बड़ी चर्चा हुई | इसमें भारत ने कुल 114 पदक जीते हैं, इनमें 102 गोल्ड मेडल भी शामिल हैं | भारत इस चैम्पियनशिप की पदक तालिका में पहले स्थान पर रहा | मैं सभी विजेता खिलाड़ियों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ |

साथियो,

किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसके लोग होते हैं | और जब उस देश के लोग कोई संकल्प लेते हैं तो कोई भी शक्ति उन्हें अपने लक्ष्य से डिगा नहीं पाती | राष्ट्र निर्माण में जन-भागीदारी की ये ताकत भारत की बहुत बड़ी पूंजी है और इस जन-भागीदारी का हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं |

साथियो,

पश्चिम एशिया में बनी युद्ध की स्थितियों को देखते हुए, मैंने देशवासियों से कुछ आग्रह किए थे | मैंने कहा था कि जहाँ तक संभव हो, कुछ समय के लिए गोल्ड, सोना खरीदने से बचें | लोगों से कहा था कि विदेश में छुट्टियाँ मनाने से बचें, मैंने लोगों से car pooling को भी बढ़ावा देने की अपील की थी, मैंने किसानों से chemical मुक्त खेती के लिए, खेत बचाने के लिए और प्राकृतिक खाद का ज्यादा- से-ज्यादा इस्तेमाल का आग्रह किया था | साथियो, मैं देश के हर नागरिक का आभारी हूँ कि मेरी अपील का उन्होंने ना सिर्फ समर्थन किया बल्कि हर तरफ से उसमें अपना सहयोग कर रहे हैं | मुझे कई परिवारों ने संदेश भेजकर अपने अनुभव साझा किए हैं | कितने ही परिवारों ने तय किया है कि घर के विवाह में इस बार सोना नहीं खरीदेंगे | जरूरत पड़ी तो पुराने सोने को recycle करके नए गहने बना लेंगे | कितने ही लोगों ने social media पर ये भी लिखा है कि कैसे उन्होंने इस बार विदेश यात्रा को टाल दिया है |

साथियो,

car pooling को लेकर भी लोगों ने अनेक अनुभव साझा किए हैं | जो लोग हर दिन एक ही दिशा में अपने-अपने वाहनों से जाते थे, वे अब साथ जाने लगे हैं | लोग हर संभव बस और मेट्रो का उपयोग कर रहे हैं | इससे पेट्रोल और डीजल की बचत हो रही है | इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृतिक खाद की खपत बढ़ने की भी खबरें आ रही हैं | साथियो, मुझे इस बात की खुशी है, इस global crisis का हम भारतीय मिलकर मुकाबला कर रहे हैं | मुझे विश्वास है जनभागीदारी की यही शक्ति हमें मजबूती देगी, हमें सफल बनाएगी |

मेरे प्यारे देशवासियो,

हमारे देश में जन्मदिन, शादी-ब्याह पारिवारिक कार्यक्रम होने के ही साथ ही पूरे समाज का भी उत्सव होता है | हर परिवार चाहता है कि उसकी खुशियाँ दूसरों के साथ भी साझा हों | लोग मेहमानों को उपहार भी देते हैं | साथियो, महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक परिवार ने अपनी खुशियाँ बाँटने के लिए ऐसा काम किया है जो चर्चा का विषय बन गया है | यहाँ नांदेड़ के बहादुरपुरा गाँव में पेठकर परिवार रहता है | इस परिवार ने सोचा कि अगर खुशी बाँटनी ही है, तो ऐसी चीज दी जाए, जो मुश्किल समय में किसी परिवार का सहारा बने | अपने घर में विवाह के अवसर पर इस परिवार ने गाँव के लगभग साढ़े तीन हजार लोगों के लिए दुर्घटना बीमा की व्यवस्था की | हर व्यक्ति को एक लाख रुपए का बीमा कवर दिया गया | इस पहल के पीछे की भावना बहुत स्पर्श करने वाली है | परिवार ने देखा था कि दुर्घटना के बाद परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | ऐसे समय में एक छोटी-सी सहायता भी बहुत बड़ा संबल बन जाती है |

साथियो,

सरकार देश के करोड़ों परिवारों तक सुरक्षा का कवच पहुंचा रही है | ‘प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना’ के तहत केवल 20 रुपये के सालाना premium यानि केवल एक साल के 20 रुपये का premium, उस पर दो लाख रुपये तक का ‘दुर्घटना बीमा’ मिलता है | अब तक इस योजना से 58 करोड़ से अधिक लोग जुड़ चुके हैं | इनमें करीब 28 करोड़ हमारी माताएं, बहनें, बेटियाँ हैं, महिलाएं हैं | इस योजना से पीड़ित परिवारों को अब तक जो हिसाब मिला है 3,700 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता मिल चुकी है|

साथियो

उसी प्रकार से ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ भी उतनी ही अहम है | ये योजना व्यक्ति की दुखद मृत्यु होने पर उसके परिवार को दो लाख रुपये का बीमा कवर देती है | इसका वार्षिक premium सिर्फ 436 रुपये है | मतलब एक दिन का मुश्किल से डेढ़ रुपया | इस योजना से अब तक 27 करोड़ से अधिक लोग जुड़े हैं | इसके तहत देश के करीब 11 लाख परिवारों को करीब 22 हजार करोड़ रुपये की सहायता मिल चुकी है | ये आकड़ें बहुत बड़े हैं | इन आकड़ों के पीछे लाखों परिवारों की अपनी-अपनी कहानी है | कहीं किसी माँ को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में सहायता मिल गई, कहीं किसी पत्नी को घर की जिम्मेदारियाँ संभालने का सहारा मिल गया | साथियो, कई बार बहुत बड़ी सुरक्षा की शुरुआत बहुत छोटी राशि और एक छोटे-से कदम से हो सकती है, छोटा-सा भी निर्णय बहुत बड़ा बदलाव करता है | मेरा आप सभी से आग्रह है कि अपने परिवार में इन योजनाओं की जानकारी जरूर साझा करें |

मेरे प्यारे देशवासियो

‘मन की बात’ में अब बात एक ऐसे विषय की जो हजारों साल पुराना है, हजारों साल से मानव समाज में घर कर करके बैठ गया है | ये विषय है – अंधविश्वास का | अंधविश्वास कई बार केवल एक गलत धारणा नहीं होता | वो डर पैदा करता है और जब डर मन पर हावी हो जाता है, तो इंसान सच को देखना ही बंद कर देता है | अंधविश्वास में डूबे लोग, फिर बिना तर्क के, बिना सत्य जाने, ऐसे फैसले लेने लगते हैं, जिनका बड़ा नुकसान होता है | वहीं समाज में ऐसे लोग भी होते हैं, जो विज्ञान, अनुभव और तर्क के आधार पर उन धारणाओं को चुनौती देते हैं | अंधविश्वास से विश्वास तक की ये यात्रा आसान नहीं होती और आज मैं ऐसी ही एक सफल यात्रा के बारे में आपको जरूर बताना चाहता हूँ |

साथियो,

असम में एक पक्षी पाया जाता है | उस पक्षी का नाम है ‘हरगिला’ | ‘हरगिला’ एक दुर्लभ पक्षी है | ये प्रकृति को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाता है | लेकिन असम के कुछ इलाकों में लंबे समय तक इसे अशुभ माना जाता था | लोग इसे अपने आसपास देखना पसंद नहीं करते थे | कई बार उन पेड़ों को भी काट दिया जाता था जिन पर हरगिला के घोसलें बने होते थे | सोचिए, एक ऐसा पक्षी जो पर्यावरण की सफाई में मदद करता है, वही ‘हरगिला’ लोगों के डर का शिकार बन गया था | इसी दौरान जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन ने ये सब देखा | उन्होंने लोगों के मन में बैठी गलत धारणा को बदलने का संकल्प लिया | उन्होंने महिलाओं से बात की, उन्होंने लोगों को विज्ञान के आधार पर समझाया, धीरे-धीरे महिलाएं इस अभियान से जुडने लगीं | फिर एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ | जिस पक्षी को कभी अशुभ मानकर भगाया जाता था, वही गांवों की पहचान बनने लगा | हजारों ग्रामीण महिलाएं ‘हरगिला’ को बचाने के लिए आगे आईं - आज उन्हें ‘हरगिला आर्मी’ के नाम से जाना जाता है |

इन महिलाओं ने समाज के साथ संघर्ष भी किया | समाज को समझाने के लिए दिन-रात काम किया और अंधविश्वास को पीछे छोड़ करके रहे | उन्होंने दिखाया है जब सही जानकारी पहुंचाई जाती है, तो वर्षों पुरानी सोच भी बदल सकती है |

साथियो,

मैं अक्सर कहता हूँ, जो खेलता है, वो खिलता है | आज देश में ऐसे युवाओं की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, जो खेल भी रहे हैं और खिल भी रहे हैं | पहले की तुलना में अब कहीं अधिक युवा खेलों को career के रूप में अपना रहे हैं | मुझे नागालैंड के दो ऐसे प्रयासों के बारे में जानकारी मिली है, जो बहुत दिलचस्प हैं | पहला प्रयास है ‘Nagaland Baby League’. नाम सुनकर आपको जरूर लगता होगा ये बहुत छोटे बच्चों की कोई साधारण लीग होगी, लेकिन ऐसा नहीं है | ये 5 से 10-12 साल की आयु के छोटे-छोटे बच्चे, फूल जैसे बच्चों की एक असाधारण league है और इन बच्चों के football खिलाड़ियों की एक ऐसी league है, जो उनकी रफ्तार को और प्रतिभा के लिए उनको प्रेरित भी करती है और उनकी पहचान भी बनाती है | इसकी शुरुआत नागालैंड के अधिक-से-अधिक बच्चों को football से जोड़ने के लिए हुई थी | पांच से बारह वर्ष तक के लड़के और लड़कियां इसमें हिस्सा ले सकते हैं | ये league अब अपने तीन वर्ष पूरे कर चुकी है | इस लीग का बच्चों के मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा है |

साथियो,

नागालैंड में एक और अच्छा प्रयास हो रहा है | इसका नाम है, ‘Nagaland Women Futsal League’, हो सकता है आपके लिए ये ‘futsal’ एक नया नाम होगा, मैं आपको बताता हूँ Futsal को indoor football भी कहा जाता है | इसमें एक टीम में केवल पांच खिलाड़ी होते हैं | खेल का मैदान भी football के मैदान से बहुत छोटा होता है | इस कारण खिलाड़ियों को तेज फैसले लेने होते हैं | उन्हें अपनी technique और skill का बेहतर इस्तेमाल करना पड़ता है | नागालैंड की Women Futsal League हमारी बेटियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा अवसर दे रही है | मैं ऐसी पहलों के लिए नागालैंड के लोगों की सराहना करता हूं | ऐसे प्रयास देश के दूसरे हिस्सों को भी प्रेरणा देते हैं |

साथियो,

ये technology का युग है । हर दिन नई research हो रही है । नए-नए AI innovations सामने आ रहे हैं । इस दौर में एक सवाल बहुत महत्वपूर्ण है - लोगों की creativity को कैसे बचाए रखा जाए? नई technology के साथ आगे बढ़ते हुए हम अपनी जड़ों से कैसे जुड़े रहें? इन सवालों का समाधान खोजा है ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ ने । हजारों साल पुरानी हमारी नालंदा विश्वविद्यालय अब नए अवतार के रूप में भारत का भाग्य गढ़ रही है | दो साल पहले मुझे नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर के लोकार्पण का अवसर मिला था । नालंदा विश्वविद्यालय ने शास्त्रार्थ की हमारी प्राचीन परंपरा को फिर से जीवंत किया है । शास्त्रार्थ केवल अपनी बात रखने का माध्यम नहीं है । ये वाद–संवाद और मंथन की एक अनुशासित प्रक्रिया है । इसमें तर्क के साथ, तथ्य के साथ, अपनी बात कहना बहुत जरूरी होता है, और उसमें आपकी महारत होनी चाहिए | दूसरों के विचारों को धैर्य से सुनने और समझने की सीख भी इस शास्त्रार्थ की प्रक्रिया से मिलती है । मुझे खुशी है कि नालंदा विश्वविद्यालय ने इसे अपने दीक्षांत समारोह का हिस्सा बनाया । इसमें भाग लेने वाले करीब आधे students अन्य देशों से आए थे । एक प्राचीन परंपरा को आज के समय से जोड़ने का ये प्रयास बहुत सराहनीय है । मैं इसके लिए नालंदा विश्वविद्यालय को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ । मैं देश के दूसरे विश्वविद्यालयों से भी आग्रह करूंगा कि वे ऐसी पहल पर विचार करें ।


साथियो,

जड़ों से जुड़े रहकर युवाओं को नई technology के लिए तैयार करने का एक और अच्छा प्रयास हो रहा है । दिल्ली में स्थित Central Sanskrit University, Artificial Intelligence और Data Science में B.tech Programme शुरू करने जा रही है । ये आधुनिक technology को भारत के पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । इससे भारतीय भाषाओं के लिए नए AI tools तैयार करने में मदद मिलेगी । हमारे प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों को digital रूप में संरक्षित करने के काम को भी नई गति मिलेगी । मैं Central Sanskrit University को इस प्रयास के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूँ ।

साथियो,

आज भारतीय संस्कृति दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँच रही है । हमारे गीत, संगीत और आध्यात्म को दुनिया-भर के लोग जान रहे हैं और अपना रहे हैं । भारत से हजारों kilometre दूर Caribbean सागर में Dominican Republic नाम का एक देश है । वहाँ भारतीयों की संख्या करीब 100 है शायद इससे भी कम होगी । इसके बावजूद भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से जुड़ा एक बहुत अच्छा प्रयास वहाँ हो रहा है । वहाँ Spanish बोलने वाले कुछ लोगों ने एक team बनाई है । इस team का नाम है, ‘ब्रहमकमल डोमिनिकाना’ । team के सदस्य मिलकर वैदिक साहित्य का अध्ययन करते हैं । वे वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी सीख रहे हैं । उन्हें इसकी कोई formal training नहीं मिली है । लेकिन उन्होंने audio recordings सुनकर वैदिक मंत्रों का सही उच्चारण सीखा है । आज वे कई मंत्रों का बहुत अच्छे से जाप कर लेते हैं । इनमें पुरुष सूक्तम, श्री सूक्तम, श्री रुद्रम, दुर्गा सूक्तम और देवी महात्मयम शामिल हैं । भारत से इतनी दूर रहकर हमारी परंपराओं को सीखने का उनका यह प्रयास बहुत प्रेरक है । मैं ‘ब्रहमकमल डोमिनिकाना’ वहाँ के सभी सदस्यों को उनके प्रयासों के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ । मैं ऐसे सभी लोगों की हृदय से सराहना करता हूँ जो भारतीय संस्कृति को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं ।

मेरे प्यारे देशवासियो,

मेघालय की पहचान बादलों से है, खूबसूरत नजारों से है | जो मेघालय जाता है, उसे वहां के लोगों का अपनापन भी लंबे समय तक याद रहता है | लेकिन, मेघालय की एक और विशेषता है, जिसकी मैं आज, ‘मन की बात’ में, आपसे चर्चा करना चाहता हूं | ये है - मेघालय के रूट ब्रिज | रास्ता वाला route नहीं, जड़ों वाला root | इन रूट ब्रिजों की कहानी बहुत रोचक है | ये ब्रिज कुछ दिनों या कुछ वर्षों में नहीं बनते | इन्हें तैयार होने में कई दशक लगते हैं | रबर के पेड़ों की जड़ों को धीरे-धीरे दिशा दी जाती है | इन जड़ों को जल-धाराओं के पार ले जाया जाता है | समय के साथ वही जड़ें एक मजबूत ब्रिज का रूप ले लेती हैं | इन ब्रिजों की एक और विशेषता है | ये जीवित ब्रिज हैं | समय बीतने के साथ ये और मजबूत हो जाते हैं | इनमें मेघालय के लोगों की सृजनशीलता दिखाई देती है | इनके पीछे वर्षों का धैर्य और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान है | ये ब्रिज बताते हैं कि मनुष्य प्रकृति के साथ मिलकर कितनी अद्भुत चीजें बना सकता है | ये हमारे देश की, इस धरती की, धरोहर है | अब भारत ने मेघालय के रूट ब्रिजों को UNESCO World Heritage Site Network में शामिल कराने के लिए आवेदन किया है |

साथियो,

climate change के कारण इन रूट ब्रिजों के सामने कई चुनौतियां भी आती हैं | ऐसे समय में मेघालय के लोगों ने इस प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई है | पहले ये पता लगाना भी आसान नहीं था कि ऐसे ब्रिजों की संख्या कितनी है? स्थानीय लोगों ने खुद इनकी गिनती शुरू की | इसके बाद समुदायों ने इन ब्रिजों की देख-भाल की जिम्मेदारी भी संभाली | आज स्थानीय लोग 120 से अधिक रूट ब्रिजों की देख-रेख कर रहे हैं | कुछ टीमें हर साल इन पुलों की स्थिति की जांच करती हैं | कुछ लोगों ने आस-पास के क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए नर्सरी भी तैयार की है | इस तरह के इनके संरक्षण के लिए एक पूरा ecosystem तैयार हो गया है | आपने देखा होगा, इस वर्ष हैली वार जी को Padma Award से सम्मानित किया गया है | उन्होंने अपने जीवन के 50 से अधिक वर्ष इन रूट ब्रिजों की देखभाल में लगाए हैं | उनका समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणादायक है| साथियो, आपने कभी इन रूट ब्रिजों की यात्रा की हो, तो उनकी तस्वीरें social media पर जरूर साझा कीजिए | आपकी तस्वीरें दूसरे लोगों को भी मेघालय की इस अनोखी धरोहर के बारे में जानने के लिए प्रेरित करेगी |

मेरे प्यारे देशवासियो,

हम सभी चाहते हैं कि हमारा गांव साफ-सुथरा हो, हमारा शहर सुंदर दिखे | लेकिन शायद ही कभी रुककर ये सोचा जाता है कि हमारे आस-पास जो कचरा जमा होता है, कौन उसे साफ करता है? ज्यादातर लोग तो यही मानकर चलते हैं कि ये किसी और की जिम्मेदारी है, और, वो ही सफाई करेगा | लेकिन हमारे बीच कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो अपनी सोच से हमें बहुत प्रेरित करते हैं | मुझे मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा की कुछ बहनों के बारे में जानने का अवसर मिला | उन्होंने अपने आस-पास फैले plastic कचरे को हटाने का संकल्प लिया | ये नहीं सोचा कि कोई आकर बदलाव लाएगा | उन्होंने खुद शहर-भर से plastic कचरा और खाली बोतलें इकट्ठा करना शुरू किया | धीरे-धीरे ये प्रयास आगे बढ़ता गया और फिर उस plastic को eco-bricks में बदला जाने लगा | आज इन्हीं eco-bricks का उपयोग सार्वजनिक स्थानों को सुंदर बनाने में किया जा रहा है | राजगढ़ में पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों किलो plastic को recycle करके उनका बेहतर उपयोग किया गया है | यानी, जो plastic पहले शहर में प्रदूषण फैलाता था, आज वही इन बहनों के प्रयास से शहर की सुंदरता बढ़ाने में योगदान दे रहा है | मैं ब्यावरा की सभी बहनों और इस अभियान से जुड़े साथियो को बधाई देता हूं |

मेरे प्यारे देशवासियो,

मुझे कई लोगों ने पत्र लिखकर एक खास विषय पर बात करने का सुझाव भेजा है | ये विषय ‘गणेश उत्सव’ से जुड़ा है | वैसे तो ‘गणेश उत्सव’ में अभी काफी समय बाकी है, लेकिन लोगों ने ये आग्रह किया है कि इस विषय पर अभी ही बात होनी चाहिए | दरअसल, गणेश जी की मूर्तियां बनाने का काम बहुत पहले शुरू हो जाता है | मूर्ति बनाने वाले, मूर्तियों के व्यापार से जुड़े लोग अभी से सक्रिय हो जाते हैं | इसलिए मेरा आप सभी से एक आग्रह है | आप प्रयास करें कि आपके घर, सोसायटी या आसपास की जगहों पर गणपति बप्पा की जो मूर्ति स्थापित हो, वो हमारे देश की मिट्टी से बनी हो, वो हमारे अपने कुम्हारों और स्थानीय कलाकारों के हाथों तैयार हुई हो | जो लोग गणेश जी की मूर्तियां बनाते हैं, उनसे भी मेरा आग्रह है कि वे मिट्टी की मूर्तियों को प्राथमिकता दें, और जो लोग मूर्तियां खरीदते हैं, वे भी यह जरूर देखें, कि, गणपति बप्पा की मूर्ति किससे बनी है और किस देश में तैयार हुई है | Plaster of Paris से बनी मूर्तियां बिल्कुल ना खरीदें | साथियो, मिट्टी की मूर्तियां पूजा के बाद सहज रूप से पानी में विलीन हो जाती हैं | इससे हमारी नदियां, तालाबों और पर्यावरण की रक्षा होती है | हमारी आस्था भी बनी रहती है और प्रकृति के प्रति हमारा दायित्व भी पूरा होता है | जब हम स्थानीय कारीगरों से मूर्ति खरीदते हैं, हम ‘Vocal for Local’ के संकल्प को मजबूत करते हैं | मुझे विश्वास है कि इस बार ‘गणेश उत्सव’ में और ऐसे हर उत्सव में हम ऐसी सारी बातों पर जरूर गंभीरता से सोचेंगे और देश-हित में कदम भी उठाएंगें |

साथियो,

हमारे देश की सबसे बड़ी शक्ति, हमारे देश के लोग हैं | देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे छोटे-बड़े प्रयास हमें बहुत कुछ सिखाते हैं | ये प्रयास बताते हैं कि जब मन में संकल्प हो और समाज का साथ मिले, तो कोई भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है | आप अपने आस-पास हो रहे ऐसे प्रयासों के बारे में मुझे जरूर लिखते रहिए | अपने विचार और अपने सुझाव भेजते रहिए, हो सकता है आपके आस-पास की कोई छोटी-सी पहल, पूरे देश के लिए प्रेरणा बन जाए | अगले महीने हम फिर मिलेंगे | देशवासियों के कुछ नए प्रयासों की चर्चा करेंगे | तब तक आप अपना और अपने परिवार का ध्यान रखिए, और हाँ! जलसंचय तो करना-ही-करना है | बारिश के पानी की एक-एक बूँद को हमें बचाना है | ‘Catch the Rain’ ये अभियान जरा भी ढ़ीला नहीं होने देना है | तो मेरा खास आग्रह है, वर्षा का बूँद-बूँद पानी, हम मिल करके बचायें | बहुत-बहुत धन्यवाद | नमस्कार |