भूपेन दा के संगीत ने भारत को एकजुट किया और पीढ़ियों को प्रेरित कर रहा है: प्रधानमंत्री
भूपेन दा का जीवन 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को प्रतिबिम्बित करता था: प्रधानमंत्री
भूपेन दा ने हमेशा भारत की एकता को स्वर दिया: प्रधानमंत्री
भूपेन दा को भारत रत्न प्रदान करना पूर्वोत्तर के प्रति हमारी सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है: प्रधानमंत्री
सांस्कृतिक संपर्क राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण है: प्रधानमंत्री
नया भारत अपनी सुरक्षा या सम्मान से कभी समझौता नहीं करेगा: प्रधानमंत्री
आइए हम 'वोकल फॉर लोकल' के ब्रांड एंबेसडर बनें, आइए हम अपने स्वदेशी उत्पादों पर गर्व करें: प्रधानमंत्री

मैं कहूंगा भूपेन दा! आप कहिए अमर रहे! अमर रहे! भूपेन दा, अमर रहे! अमर रहे! भूपेन दा, रहे! अमर रहे! भूपेन दा, अमर रहे! अमर रहे! असम के राज्यपाल लक्ष्‍मण प्रसाद आचार्य जी, यहां के लोकप्रिय मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व शर्मा जी, अरुणाचल प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री पेमा खांडू जी, केंद्रीय मंत्रिमंडल में मेरे साथी सर्बानंद सोनोवाल जी, मंच पर उपस्थित भूपेन हजारिका जी के भाई श्री समर हजारिका जी, भूपेन हजारिका जी की बहन श्रीमती कविता बरुआ जी, भूपेन दा के पुत्र श्री तेज हजारिका जी, तेज को मैं कहूंगा, केम छो! उपस्थित अन्य महानुभाव और असम के मेरे भाइयों और बहनों!

आज का दिन अद्भुत है और यह पल अनमोल है। जो दृश्य यहां मैंने देखा, जो उत्साह, जो तालमेल मुझे दिखा, भूपेन संगीत की जो लय दिखी, अगर मैं भूपेन दा के ही शब्दों में कहूं, तो मन में बार-बार आ रहा था, समय ओ धीरे चलो! समय ओ धीरे चलो! मन कर रहा था, भूपेन संगीत की यह लहर ऐसे ही हर तरफ बहती रहे, बहती ही रहे। मैं इस आयोजन में हिस्सा लेने वाले सभी कलाकारों की बहुत-बहुत सराहना करता हूं। असम का मिजाज ही कुछ ऐसा है कि हर ऐसे आयोजन में नया रिकॉर्ड बन जाता है। आज भी आपकी परफॉर्मेंस की जबरदस्त तैयारी दिख रही थी। आप सबका अभिनंदन, आप सबको बधाई।

साथियों,

अभी कुछ दिन पूर्व ही आठ सितंबर को भूपेन हजारिका जी का जन्मदिवस बीता है। उस दिन मैंने भूपेन दा को समर्पित एक लेख में अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं। मेरा सौभाग्य है कि उनके जन्‍म शताब्‍दी वर्ष के इस आयोजन में मुझे हिस्सा लेने का अवसर मिला है। अभी हिमंता कह रहे थे कि मैंने आकर के कुछ कृपा की है, उल्टा है! ऐसे पवित्र अवसर पर आना, यह मेरा सौभाग्य है। भूपेन दा को हम सभी प्यार से शुधा कॉन्ठो कहते थे। यह उन शुधा कॉन्ठो का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष है, जिन्होंने भारत की भावनाओं को आवाज दी, जिन्होंने संगीत को संवेदना से जोड़ा, जिन्होंने संगीत में भारत के सपनों को संजोया और जिन्होंने मां गंगा से मां भारती की करुणा को कह सुनाया। गंगा बहती हो क्यों, गंगा बहती हो क्यों?

साथियों,

भूपेन दा ने ऐसी अमर रचनाएं रची, जो अपने स्‍वरों से भारत को जोड़ती रही, जो भारत की पीढ़ियों को झकझोरती रही।

भाइयों-बहनों!

भूपेन दा सशरीर हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके गीत, उनके स्‍वर आज भी भारत की विकास यात्रा के साक्षी बन रहे हैं, उसे ऊर्जा दे रहे हैं। हमारी सरकार बहुत गर्व से भूपेन दा के जन्‍म शताब्‍दी वर्ष को सेलिब्रेट कर रही है। हम भूपेन हजारिका जी के गीतों को, उनके संदेशों को और उनकी जीवन यात्रा को घर-घर ले जा रहे हैं। आज यहां उनकी बायोग्राफी भी रिलीज की गयी है। मैं इस अवसर पर डॉक्टर भूपेन हजारिका जी को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं। मैं असम के भाई-बहनों के साथ ही हर भारतवासी को भूपेन दा के इस जन्‍म शताब्‍दी वर्ष पर बधाई देता हूं।

साथियों,

भूपेन हजारिका जी ने जीवनपर्यंत संगीत की सेवा की। संगीत जब साधना बनता है, तो वो हमारी आत्मा को छूता है और संगीत जब संकल्प बनता है, तो वो समाज को नई दिशा दिखाने का माध्यम बन जाता है। भूपेन दा का संगीत इसलिए ही इतना विशेष था। उन्होंने जिन आदर्शों को जिया, जो अनुभव किया, वही अपने गीतों में भी गाया। हम उनके गीतों में मां भारती के लिए इतना प्रेम इसलिए देखते हैं, क्योंकि वो एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना को जीते थे। आप देखिए, पूर्वोत्तर में उनका जन्म हुआ, ब्रह्मपुत्र की पावन लहरों ने उन्हें संगीत की शिक्षा दी। फिर वो ग्रेजुएशन के लिए काशी गए, ब्रह्मपुत्र की लहरों से शुरू हुई भूपेन दा की संगीत साधना गंगा की कल-कल से सिद्धि में बदल गई। काशी की गतिशीलता ने उनके जीवन को एक अविरल प्रवाह दिया। वो एक यायावर यात्री बन गए, उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया। फिर पीएचडी करने अमेरिका तक गए! लेकिन, जीवन के हर पड़ाव पर वो असम की धरती से एक सच्चे बेटे की तरह जुड़े रहे और इसीलिए, वो फिर वापस भारत लौटे! यहाँ आकर फिल्मों में वो सामान्य मानवी की आवाज़ बने, उनके जीवन की पीड़ा को स्वर दिया। वो आवाज़ आज भी हमें झकझोरती है, उनका गीत मानुहे मानुहोर बाबे, जोदिहे ऑकोनु नाभाबे, ऑकोनि होहानुभूतिरे, भाबिबो कोनेनु कुआ? अर्थात अगर मनुष्य ही मनुष्य के सुख-दुख, दर्द-तकलीफ के बारे में नहीं सोचेगा, तो फिर कौन इस दुनिया में एक दूसरे की चिंता करेगा? सोचिए, यह बात हमें कितनी प्रेरणा देती है। इसी विचार को लेकर आज भारत, गाँव, गरीब, दलित, वंचित, आदिवासी के जीवन को बेहतर बनाने में लगा है।

साथियों,

भूपेन दा, भारत की एकता और अखंडता के महान नायक थे। दशकों पहले, जब नॉर्थ ईस्ट उपेक्षा का शिकार था, नॉर्थ ईस्ट को हिंसा और अलगाववाद की आग में जलने के लिए छोड़ दिया गया था, तब भूपेन दा उस मुश्किल समय में भी भारत की एकता को ही आवाज़ देते रहे। उन्होंने समृद्ध पूर्वोत्तर का सपना देखा था। उन्होंने प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य में बसे पूर्वोत्तर के लिए गीत गाये थे। उन्होंने असम के लिए गीत गाया था- "नाना जाती-उपोजाती, रहोनीया कृष्टि, आकुवाली लोई होइशिल सृष्टि, एई मोर ऑहोम देश’ जब हम ये गीत गुनगुनाते हैं, तो हमें हमारे असम की विविधता पर गर्व होता है। हमें असम की सामर्थ्य और क्षमता पर गर्व होता है।

साथियों,

अरुणाचल से भी उन्हें उतना ही प्रेम था और इसीलिए अरुणाचल के मुख्यमंत्री आज विशेष रूप से आए हैं। भूपेन दा ने लिखा, अरुण किरण शीश भूषण भूमि सुरमयी सुंदरा, अरुणाचल हमारा, अरुणाचल हमारा।

साथियों,

एक सच्चे राष्ट्रभक्त के हृदय से निकली आवाज़ कभी निष्फल नहीं होती। आज नॉर्थ ईस्ट को लेकर उनके सपनों को साकार करने के लिए हम दिन-रात काम कर रहे हैं। हमारी सरकार ने भूपेन दा को भारत रत्न देकर, पूर्वोत्तर के सपनों और स्वाभिमान का सम्मान किया और पूर्वोत्तर को देश की प्राथमिकता भी बनाया। हमने देश के सबसे लंबे ब्रिजेज में से एक, असम और अरुणाचल को जोड़ने वाला ब्रिज बनाया, तो उसका नाम भूपेन हजारिका ब्रिज रखा। आज असम और पूरा पूर्वोत्तर तेज गति से आगे बढ़ रहा है। विकास के हर आयाम में नए रिकॉर्ड बनाए जा रहे हैं। विकास की ये सिद्धियाँ, देश की ओर से भूपेन दा को सच्ची श्रद्धांजलि हैं।

साथियों,

हमारे असम ने, हमारे पूर्वोत्तर ने भारत की सांस्कृतिक विविधता में हमेशा बड़ा योगदान दिया है। इस धरती का इतिहास, यहाँ के पर्व, यहां के उत्सव, यहाँ की कला, संस्कृति, यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, इसकी दैवीय आभा और इस सबके साथ, भारत माता की आन-बान-शान और रक्षा के लिए यहाँ के लोगों द्वारा दिये गए बलिदान, इसके बिना हम अपने महान भारत की कल्पना नहीं कर सकते। हमारा पूर्वोत्तर तो देश के लिए नए प्रकाश, नई रोशनी की धरती है। देश की पहली सुबह भी यहीं तो होती है। भूपेन दा ने इसी भाव को अपने गीत में स्वर दिया था, ऑहोम आमार रूपोही, गुनोरू नाई हेष, भारोतोरे पूरबो दिखॉर, हूर्जो उठा देश!

इसलिए भाइयों-बहनों,

जब हम असम के इतिहास को सेलिब्रेट करते हैं, तभी भारत का इतिहास पूरा होता है, तभी भारत का उल्लास पूरा होता है और हमें इस पर गर्व करते हुए ही आगे बढ़ते रहना है।

साथियों,

जब हम कनेक्टिविटी की बात करते हैं, तो अक्सर लोगों को रेल-रोड या एयर कनेक्टिविटी की याद आती है। लेकिन देश की एकता के लिए एक और कनेक्टिविटी बहुत जरूरी है और वो है कल्चरल कनेक्टिविटी। बीते 11 वर्षों में देश ने नॉर्थ ईस्ट के विकास के साथ-साथ कल्चरल कनेक्टिविटी को भी बड़ी अहमियत दी है। ये एक अभियान है, जो अनवरत जारी है। आज इस आयोजन में हम इसी अभियान की झलक देख रहे हैं। कुछ ही समय पहले, हमने वीर लसित बोरफुकन की 400वीं जयंती भी राष्ट्रीय स्तर पर मनाई है। आज़ादी की लड़ाई में भी, असम और पूर्वोत्तर के कितने ही सेनानियों ने अभूतपूर्व बलिदान दिए! हमने आज़ादी के अमृत महोत्सव के दौरान, पूर्वोत्तर के सेनानियों को, यहाँ के इतिहास को फिर से जीवंत किया। आज पूरा देश हमारे असम के इतिहास और योगदान से परिचित हो रहा है। कुछ समय पहले हमने दिल्ली में अष्टलक्ष्मी महोत्सव का भी आयोजन किया। इस आयोजन में भी असम का सामर्थ्य दिखा, असम का कौशल दिखा।

साथियों,

परिस्थितियां कोई भी हों, असम ने हमेशा देश के स्वाभिमान को स्वर दिया है। यही स्वर हमें भूपेन दा के गीतों में भी सुनाई देते हैं। जब 1962 का युद्ध हुआ, तो असम उस लड़ाई को प्रत्यक्ष देख रहा था, तब भूपेन दा ने देश की प्रतिज्ञा को बुलंद किया था, उन्होंने उस समय गाया था, प्रोति जोबान रक्तॉरे बिंदु हाहाहॉर अनंत हिंधु, सेइ हाहाहॉर दुर्जेोय लहरे, जाशिले प्रोतिज्ञा जयरे उस प्रतिज्ञा ने देशवासियों में नया जोश भर दिया था।

साथियों,

वो भावना, वो जज्बा देशवासियों के दिलों में आज भी चट्टान की तरह बना हुआ है। ये हमने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी देखा है। पाकिस्तान के आतंकी मंसूबों को देश ने ऐसा जवाब दिया कि भारत की ताकत की गूंज पूरी दुनिया तक गई है। हमने दिखा दिया, भारत का दुश्मन किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं रहेगा। नया भारत, किसी भी कीमत पर अपनी सुरक्षा और स्वाभिमान से समझौता नहीं करेगा।

साथियों,

असम की संस्कृति का हर आयाम अद्भुत है, असाधारण है और इसलिए मैं कई बार कहता था कि वो दिन दूर नहीं कि जब देश के बच्चे पढ़ेंगे A for Assam. यहाँ की संस्कृति, सम्मान और स्वाभिमान के साथ-साथ असीम संभावनाओं की स्रोत भी है। असम के परिधान, यहाँ का खान-पान, असम का पर्यटन, यहाँ के प्रॉडक्ट्स, हमें इसे देश ही नहीं, पूरी दुनिया में पहचान दिलानी है। आप सब जानते हैं, असम के गमोशा की ब्रांडिंग तो मैं खुद ही बहुत गर्व से करता रहता हूं, ऐसे ही हमें असम के हर उत्पाद को दुनिया के कोने-कोने में ले जाना है।

साथियों,

भूपेन दा का पूरा जीवन, देश के लक्ष्यों के प्रति समर्पित रहा। आज भूपेन दा के जन्म शताब्दी वर्ष के इस अवसर पर हमें देश के लिए आत्मनिर्भरता का संकल्प लेना है। मैं असम के मेरे भाई-बहनों से अपील करूंगा, हमें वोकल फॉर लोकल का ब्रैंड एंबेसडर बनना है। हमें स्वदेशी चीजों पर गर्व करना है। हम स्वदेशी ही खरीदें और स्वदेशी ही बेचें। हम इन अभियानों को जितनी गति देंगे, विकसित भारत का सपना उतनी ही तेज गति से पूरा होगा।

साथियों,

भूपेन दा ने 13 साल की उम्र में गीत लिखा था, अग्निजुगोर फिरिंगोति मोय, नोतुन भारत गॉढ़िम्, हर्बोहारार हर्बोश्वो पुनॉर फिराय आनिम, नोतुन भारत गॉढ़िम्।

साथियों,

इस गीत में उन्होंने खुद को अग्नि की चिंगारी मानकर ये संकल्प लिया था कि नया भारत बनाएंगे। एक ऐसा नया भारत, जहां हर पीड़ित और वंचित को उनका अधिकार वापस मिले।

मेरे भाइयों और बहनों,

नूतन भारत का जो सपना भूपेन दा ने तब देखा था, आज वो देश का संकल्प बन चुका है। हमें इस संकल्प से खुद को जोड़ना है। आज समय है, हम अपने हर प्रयास हर संकल्प के केंद्र में 2047 के विकसित भारत को रखें। इसकी प्रेरणा हमें भूपेन दा के गीतों से मिलेगी, उनके जीवन से मिलेगी। हमारे ये संकल्प ही भूपेन हजारिका जी के सपनों को साकार करेंगे। इसी भाव के साथ, मैं एक बार फिर सभी देशवासियों को भूपेन दा के जन्म शताब्दी वर्ष की बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मेरी आप सबसे प्रार्थना है, अपना मोबाइल फोन निकालिए और मोबाइल फोन की फ्लैश लाइट चालू करके भूपेन दा को श्रद्धांजलि दीजिए। हजारों-हजारों ये द्वीप भूपेन दा की अमर आत्मा को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। उनके स्वर को आज की पीढ़ी रोशनी से सजा रही है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

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Prime Minister marks opening of Shri Kedarnath Dham and commencement of Chardham Yatra
April 22, 2026
Prime Minister conveys his sentiments through a letter addressed to all devotees

The Prime Minister today expressed deep reverence on the sacred occasion of the opening of the doors of Shri Kedarnath Dham in Devbhoomi Uttarakhand, marking the commencement of this year’s Chardham Yatra. On the occasion, the Prime Minister shared his heartfelt sentiments through a letter addressed to all devotees visiting Uttarakhand for the Yatra, and extend his best wishes and prayers for their well-being.

Highlighting the spiritual significance of the occasion, Shri Modi noted that the journey to Kedarnath Dham and the Chardham is a divine celebration of India’s enduring faith, unity, and rich cultural traditions. He emphasized that such pilgrimages offer a glimpse into the country’s eternal heritage and spiritual consciousness.

The Prime Minister posted on X:

"देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र धरती पर आज श्री केदारनाथ धाम के कपाट पूरे विधि-विधान के साथ हम सभी श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं।

केदारनाथ धाम और चारधाम की यह यात्रा हमारी आस्था, एकता और समृद्ध परंपराओं का दिव्य उत्सव है। इन यात्राओं से हमें भारत की सनातन संस्कृति के दर्शन भी होते हैं।

इस वर्ष चारधाम यात्रा के आरंभ उत्सव पर, उत्तराखंड आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए मैंने एक पत्र के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं।

मेरी कामना है कि बाबा केदार सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें और आपकी यात्राओं को शुभ करें।

हर-हर महादेव!"