अंतरराष्ट्रीय सिंधी सम्मेलन

Published By : Admin | December 16, 2011 | 15:29 IST

सिंधु भवन, अहमदाबाद

१६ दिसंबर, २०११

 

मुझे अच्छा लगा कि आप सब के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। मित्रों, मैं मन से आप लोगों का बहुत आदर करता हूँ, आप लोगों का बहुत सम्मान करता हूँ और मनोमन मेरे मन में, मेरे दिल में, एक पूज्य भाव आप लोगों के लिये है। और वह इसलिए नहीं है कि मैं मुख्यमंत्री हूँ इसलिए ऐसा कहना पड़ता है, ऐसा नहीं है। इसके पीछे एक तर्क है, एक हकीकत है। पूरी मानवजात की सांस्कृतिक विकास यात्रा की ओर जब नजर करते हैं और इसके मूल की तरफ़ जब जाते हैं तो एक जगह पर आ करके रूकते हैं, जहाँ से मानव संस्कृति की विकास की यात्रा का आरम्भ हुआ था। वो जगह वो है जहाँ आपके पूर्वजों ने पराक्रम किया था। आप उस महान विरासत के अंश हैं। आपके पूर्वजों ने वे महान काम किये हैं और इसके कारण मेरे दिल में उस परंपरा के प्रति पूज्य भाव है और आप उसके प्रतिनिधि हैं तो सहज रूप से उसका प्रकटीकरण आपकी ओर होता है।

सिंधु ओर सरस्वती के किनारे पर पूरे मानवजात के कल्याण के लिये हमेशा हमेशा सोचा गया। मैं जब विद्यार्थी काल में धोलावीरा देखने गया था। हड़प्पन संस्कृति, मोहें-जो-दरो... और वहाँ की बारीकीयों को वहाँ के लोग मुझे समझा रहे थे, तो मन में इतना बड़ा गर्व होता था कि हमारे पूर्वज कितना लंबा सोचते थे। वहाँ की एक एक ईंट, एक एक पथ्थर इन सिंधु संस्कृति की परंपरा के उन महान सपूतों के पराक्रम की गाथा कहता है। आज दुनिया में ओलिंपिक गेम्स की चर्चा होती है और बड़े बड़े खेल के मैदान, बड़े बड़े स्टेडियम की चर्चा होती है। आप में से यहाँ बैठे हुए कई लोग होंगे जिनको आप ही के पूर्वजों के उस पराक्रम की ओर देखने का शायद सौभाग्य नहीं मिला होगा। अगर आप धोलावीरा जायेंगे तो वहाँ पायेंगे कि वहाँ ५००० साल पहले कितना बड़ा स्टेडियम था और खेलकूद के कितने बड़े समारोह होते थे, उसके सारे चिह्न आज भी वहाँ मौजूद हैं। यानि इन्हें क्या विशालता से देखते होंगे..! आज पूरी दुनिया मे साइनेज की कल्पना है भाई, गली इस तरफ जाती है तो वहाँ लिखा होता है गली का नाम, एरो करके लिखा होता है, साइनेजीस होते है। और साइनेजीस की किसके लिये जरूरत होती है? आप किसी छोटे गाँव में जाओ, तो वहाँ साइनेजीस नहीं होते कि भाई, यहाँ जाओ तो यहाँ पटेलों का मोहल्ला है, यहाँ बनिये का महोल्ला है... ऐसा कुछ लिखा नहीं होता है। क्योंकि गाँव छोटा होता है, सबको पता होता है, क्या कुछ है, इसलिए कोई बोर्ड लगाने की जरूरत नहीं पडती। ५००० साल पहले धोलावीरा दुनिया का पहला शहर था जहाँ साइनेजीस थे, आज भी मौजूद हैं। क्या कारण होगा? कारण दो होंगे, एक, वो एक बहुत बड़ा शहर होगा और दुसरा, वहाँ पर देश-विदेश के लोग आते-जाते होंगे, और तभी तो इन चीज़ों की जरूरत पडी होंगी। ५००० साल पहले ऐसी विरासत, आप कल्पना कर सकते हैं, भाईयों। क्या कभी आप को फील होता है? और मैं चाहूँगा की जब हम इस प्रकार का समारोह कर रहे हैं और इस महान परंपरा के गौरव गान गाते हुए हम इकठ्ठे हुए हैं, तो हमारी नयी पीढ़ी को उस इतिहास और संस्कृति का परिचय कराने के लिये कुछ कार्यक्रम हो तो शायद नयी पीढ़ी तक ये बात पहुंचेगी।

मित्रों, मेरा यहाँ मुख्यमंत्री के नाम पे कम, आप के अपने एक साथी के नाम पर बात करने का मेरा मूड़ करता है। मुझे बहुत बार लगता है कि मैं... क्यूंकि यहाँ अहमदाबाद में आधे से अधिक सिंधी परिवार होंगे जिसके घर मैंने रोटी खाई होगी। क्योंकि मैं ३५ साल तक उसी प्रकार का जीवन जीता था, अनेक परिवारों मे मेरा जाना और उन्हीं की रोटी खाना, ये मेरा... और इसलिए मैंने काफी निकटता से इन सब चीज़ों को देखा है। लेकिन आज कभी सिंधी परिवार में जाता हूँ तो बच्चे पास्ता और पिज़्ज़ा के आसपास चलते हैं तो मेरे मन में होता है की मीठा लोल्ला, तीखा लोल्ला, पकवान कौन खिलायेगा? आप सोचिये, ये अब चला जा रहा है। मेरे सिंधी परिवारो में से ये सब चीजे नष्ट हो रही है। क्या ये हमारी जिम्मेवारी नहीं हैं कि हम इन विरासत को बचायें? मैं कई बार मेरे मित्रों से कहता हूँ कि भईया, अहमदबाद में कभी तो सिंधी फूड फेस्टीवल करो। ये नरेन्द्र सारी दुनिया को खिलाता है लेकिन वो सिंधी खाना नहीं खिलाता है। मैंने कहा न कि मुख्यमंत्री के नाम पर नहीं, अपनों के नाते आप के बीच बातें कर रहा हूँ। क्योंकि मैं इतना मिलजुल कर के आप लोगों के बीच पला बड़ा हूँ, इसलिए मुझे पता है। आप युवा पीढ़ी को जा के कहिये, उसे पूछिये कि सिंधी परंपरा का पहनाव क्या था? क्या पहनते थे? दुनिया बदली है, काफी वेस्टर्नाइज़ेशन आप के अन्दर घुस गया हे, मुझे क्षमाँ करना। सिंधी भाषा मे बोलनेवाले परिवार कम होते जा रहे है। माँ-बेटा भी अंग्रेज़ी में बोल रहे हैं। मित्रों, दुनिया के अंदर अपनी मातृभाषा, अपना रहन-सहन, अपना पहेनाव इसको जो संभालता है, वो उसमें फिर से एक बार जान भरने की ताकत रखता है। और एक समाज के नाते जो आप भटके हुए हैं, तो मेरी एक प्रार्थना होगी कि एक बार संकल्प करके जायें कि हमारे घर में हम सिंधी क्यों न बोलें। हम अमरीका में हों, हम हाँगकाँग में रहते हों, हम चाइना गये हों, कहीं पर भी गये हों... क्यों न बोलें? और सिंधी भाषा की, अपनी भाषा की इक ताकत होती है। मुझे अडवाणीजी एक बार सुना रहे थे, बेनजीर भुट्टो यहाँ आई थी, तो उनकी फॉर्मल मीटिंग थी, सारे प्रोटोकॉल होते हैं, लेकिन जैसे ही अडवाणीजी को देखा, बेनजीर सिंधी में चालू हो गई और पूरे माहोल में उन दोनों के बीच में इतना अपनापन था, इतनी खुल कर के बातें हो रही थी... अब देखिये, ये भाषा की कितनी ताकत होती है अगर हम उसको खो देंगे... व्यवसाय के लिये अंग्रेजी की जरूरत होंगी तो ज़रूर इस्तेमाल किजिये, ओर दस भाषायें सीखें, कौन मना करता है? सीखनी भी चाहिये, ये हमारे सुरेशजी के साथ आप बैठिये, वो गुजराती बोलेंगे तो पता नहीं चलता कि वो एक सिंधी भाषा भी जानते होंगे, इतनी बढ़िया गुजराती बोलते हैं। बहुत अच्छी गुजराती बोलते हैं वो, एक शब्द इधर उधर नहीं होगा। मैं प्रसन्न हूँ इस बात से। लेकिन ये मेरे मन में है, यहाँ देखिये ये सिंधी सम्मेलन है, किसी के भी शरीर पर सिंधी कपडे नहीं हैं। इसे आप आलोचना मत समझिये, भईया, इसे आप आलोचना मत समझिये। ये आप की विरासत है, आप की ताकत है, आप इसको क्यों खो रहे हो? मुझे दर्द हो रहा है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि कभी तो ऐसा हो कि सब सिंधी पहनावे में आयें। देखिये, मॉरिशस में १५०-२०० साल पहले हमारे लोग गये थे। मजदूर के नाते गये थे, मजदूर भी नहीं गुलाम के नाते गये थे। उनको हथकड़ियाँ पहना करके जहाजों मे डाल डाल के ले गये थे। लेकिन वो जाते समय अपने साथ रामायण ले गये, तुलसीकृत रामायण, और उनके पास कुछ नहीं था। मॉरिशस में गये, दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहाँ वो गये, यह एक सहारा था उनके पास। आज २०० साल के बाद भी आप जायें, बहुत सारी चीज़ों का बदलाव आया होगा तो भी एक उस रामायण अपने पास होने के कारण इस मिट्टी के साथ उनका नाता वैसा का वैसा रहा है। उन्होनें अपने नाम नहीं बदले हैं, उन्होनें रामायण की चौपाई का गान अविरत चालू रखा है और उसी के कारण उनका नाता... वरना २०० साल में कितनी पीढ़ीयां बदल जाती हैं। यहाँ तो वो लोग मौजूद हैं जिसने वह सिंधु संस्कृति को भी देखा है और बाद मे वह बुरे दिन भी देखे हैं और बाद में हिंदुस्तान में आकर अपना नसीब अजमाया, पूरी पीढ़ी मौजूद है। लेकिन ५० साल के बाद कौन होगा? कौन कहेगा कि तुम्हारे पूर्वजों के पराक्रम वहाँ हुआ करते थे, कौन कहेगा? और इसलिए भाईयों-बहनों, मेरा मत है, वो समाज, वो जाति, वो देश जो इतिहास को भूल जाता है, वो कभी भी इतिहास का निर्माण नहीं कर सकता है। इतिहास वही बना सकते हैं जो इतिहास को जीना जानते हो। जो इतिहास को दफना देते है, वो सिर्फ चादर औढाने से ज्यादा जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते। और इसलिए एक ऐसी महान विरासत जिसके आप संतान हैं, उसको बचाइये, इसको प्यार किजिये। और अगर हम अपनी विरासत को प्यार न करें तो हम कैसे चाहेंगे कि हमारा पडोसी हमारी विरासत को प्यार करे? और ये जजबा किसी के खिलाफ नहीं होता है। हम अपनी अच्छाइयों पर गर्व करें इसका मतलब किसी के लिये दु:ख होने का और किसी का बुरा दिखाने का कोई कारण नहीं होता है। हमें गर्व होना चाहिये, कितना उज्जवल इतिहास है..!

प लोगों को कच्छ में जाने का अवसर मिले तो जरूर जाइये। आपने कथा सुनी होंगी, कच्छ के अंदर ४०० साल पहले एक मेकण दादा करके हुआ करते थे। हिंगलाज माता के दर्शन के लिये लोग जाते थे और रण के अंदर पानी के अभाव के कारण कभी कभी रण में ही मर जाते थे। और यात्री भी बड़ा कष्ट उठा कर के रण को पार करत्ते हुए हिंगलाज माता के दर्शन के लिये सिंध की ओर जाते थे। तो वो अपने पास एक गधा और एक कुत्ता रखते थे और वो ऐसे ट्रेइन्ड थे की वो रण में देखते थे कि कहीं कोइ मनुष्य़ परेशान तो नहीं है। वो गधा और कुत्ता रण में जा करके पानी पहुंचाते थे और जरूरत पडी तो उसको उठा करके वहाँ ले आते थे। और वो नसीबवाले थे कि उस रेगिस्तान के किनारे पर उनके पास एक कुंआ था जिसमें शुध्ध मीठा पानी रहता था, आज भी मौजूद है, कभी जाएं तो आप। भूकंप में वो जगह खत्म हो गई थी, हमने फिर से उसको दुबारा बनाया है, दुबारा उसको बनाया है। ४०० साल पहले मेकण दादा ने जो लिखा था वो आज भी उपलब्ध है, उसने एक बात लिखी थी कि एक दिन ऐसा आयेगा... एक इन्सान ४०० साल पहले लिख के गया है, सिंध और गुजरात की सीमा पर बैठा हुआ चौकीदार था, वो मेकण दादा लिखकर गये हैं कि एक दिन ऐसा आयेगा जब सिंधु, सरस्वती और नर्मदा तीनो एक होंगे। तब किसने सोचा था की नर्मदा पर सरदार सरोवर डेम बनेगा और सरदार सरोवर से नर्मदा का पानी सिंध के किनारे तक पहुंचेगा, किसने सोचा था? और आप लोगों को जानकारी होगी, सिंधु नदी में अब बाढ़ आती है तो पाकिस्तान के उस छोर पर समुद्र के पहले एक डेम बना हुआ है, तो सिंधु का पानी ओवरफ्लो होता है और ओवरफ्लो होता है तो अधिकतम पानी हमारे रेगिस्तान में, हिंदुस्तान में गुजरात की तरफ आता है। और वो जगह आप देखें तो मीलों चौड़ा पट है, जहाँ ये पानी आता है लेकिन दुर्भाग्य ये है की वो खारा, नमकीन एकदम समुद्र जैसा पानी हो जाता है, काम में नहीं आता है। लेकिन मैं रेगिस्तान में जहाँ वो पानी आता है, उस जगह के दर्शन करने के लिये गया था और बाद में मैंने भारत सरकार को चिठ्ठी लिखी थी की क्या पाकिस्तान से बात नहीं हो सकती है? कि जो ये फ्ल्ड वोटर है, जो ये समुद्र में जाता है उसको अगर केनाल से इस तरफ ले आयें तो मेरे मेकण दादा का जो सपना था, सिंधु, सरस्वती, नर्मदा को इकठ्ठा करना, हम कर के दिखायेंगे। मित्रों, ये विरासत है जिस पर हमें गर्व होना चाहिये, और हमें उसके साथ जुडना चाहिये।

भाईयों-बहनों, मैं इस समाज का आदर करता हूँ इसका एक कारण और भी है। आप कल्पना कर सकते हो कि १९४७ के वो दिन कैसे होंगे, जब देश का विभाजन हुआ, सब कुछ उजड गया, सब कुछ तबाह हो गया और ईश्वर के भरोसे आप यहाँ आये थे। क्यों आये थे? आप यहाँ क्यों आये थे, मित्रों? कुछ लेने के लिये, कुछ पाने के लिये? क्या नहीं था आपके पास? आप इसलिए आये की इस मिट्टी को आप प्यार करते थे, इस महान विरासत को आप प्यार करते थे। आप आपके पूर्वजों की इस महान संस्कृति छोडने को तैयार नहीं थे, इसलिए आपने कष्ट झेले हैं। क्या ये स्पिरिट आपके बच्चों में पर्कोलेट हो रहा है? अगर नहीं होता है तो कमी हमारे पूर्वजो की नहीं है, कमी हमारी वर्तमान पीढ़ी की है और इसलिए गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। मित्रों, मैं बचपन में मेरे गाँव में एक सिंधी सज्जन को देखा करता था। उस समय उनकी आयु में तो छोटा था, उस समय उनकी आयु करीब ६०-६५ साल होंगी। आर्थिक स्थिति बड़ी खराब थी उनकी... पूरा चेहरा मुझे आज भी बराबर याद है। एकदम दुबला पतला शरीर, कपडों का कोई ठिकाना नहीं, वो बस स्टेशन पर हमेशा दिखते थे और अपने हाथ में पापड या चोकलेट या बिस्कीट पैसेन्जर को एक ट्रे जैसा रखते थे और बेचते थे। मैं जब तक मेरे गाँव में रहा तब तक वो जिंदा थे और मैंने हमेशा उनको यही काम करते देखा। वो एक द्रश्य मेरे मन को आज भी छूता है। कितनी गरीबी थी उनकी, इतनी कंगालियत से जीवन गुजारते थे, शरीर भी साथ नहीं देता था। मेरा गाँव छोटा था, वहाँ बिस्किट कौन खायेगा? चोकलेट कौन खायेगा? कौन खर्चा करेगा? लेकिन उसके बावजूद भी अपने व्यावसायिक स्पिरिट के साथ बस स्टेशन पे जा के खडे हो जाते थे, कुछ बेचकर के कुछ कमाने की कोशिश करते थे लेकिन मैने कभी भी उनको भीख मांगते हुए देखा नहीं। बहुत कम समाज होते हैं जिसमे ये ताकत होती है। और सिंधी समाज के अंदर जीनेटिक्स सिस्टम मे ताकत पडी है, स्वाभिमान की। वो कभी भीख नहीं माँगते..! आप उस विरासत के धनी हैं। ये परंपरा अपने बच्चों पर कैसे पहुंचे, उन लोगों को हम कैसे तैयार करें?

मित्रों, व्यावसायिक क्षमता। हमारे गोपालदास भोजवानी यहाँ बैठे हैं, जब मैं छोटा था तो हम कभी कभी उनकी दुकान पर जा कर बैठा करते थे। तो एक बात हमारे ध्यान में आई थी, आज वो परंपरा है कि नहीं वो मुझे मालूम नहीं। लेकिन मैं
सोश्यो-इकनॉमिक द्रष्टि से कई लोगों के सामने अपने विषय को रख चुका हूँ, कई जगह पर बोला हूँ। अब वो परंपरा है कि नहीं, मुझे मालूम नहीं पर उस समय तो मैंने अपनी आंखो से देखा है। कोई भी सिंधी युवक या कोई व्यक्ति अपना नया व्यवसाय जब शरू करता था तो यार, दोस्त, रिश्तेदार सब उदघाटन के समय आते थे, उसको एक लिफाफा देते थे। उस लिफाफे पर कुछ लिखा हुआ नहीं होता था, लेकिन उसमें कुछ न कुछ धन हुआ करता था, पैसे होते थे। और जो भी आता था उसको देता था। मैने जरा बड़ी बारीकी से पूछा कि ये क्या चल रहा है? तो मेरे ध्यान मे आया की ये परंपरा है समाज में, कि कोई भी एसा नया व्यवसाय करता है तो समाज के लोग मिलने आते हैं और उनको कुछ न कुछ पैसे देते हैं, जो उनको बिजनेस करने के लिए पूंजी के रूप में काम आते हैं। और बाद में कहीं ऐसा अवसर हो तो खुद भी अपने तरीके से जाकर के देके आता है। लेकिन देनेवाले का नाम नहीं होता है। मित्रों, ये जो परंपरा मैने देखी है, अपने ही स्वजन को, अपने ही जाति के व्यक्ति को व्यावसायिक क्षेत्र में अपने पैरो पर खड़ा करने के लिये कितना बढिया सोशल इकोनोमी का कन्सेप्ट था। ये अपने आप में शायद दुनिया में बहुत रेरेस्ट है। हमारे यहाँ शादियों मे होता है, कि शादियों मे इस प्रकार से देते हैं तो शादी के समय खर्च होता है तो चलो, उस परिवार को मदद हो जायेगी, उनका काम निकल जायेगा। लेकिन व्यवसाय मे ये परंपरा मैं सिंधी परिवारो की दुकानों के उदघाटन में जब जाया करता था तब देखता था। और उसमे मुझे लगता है की सोशल इकोनोमी की कितनी बढिया थिंकिंग हमारे पूर्वजों ने बढ़ा कर के हमको दी है..! कोई भी, कोई भी डूबेगा नहीं, हर कोई उसे हाथ पकडकर के उपर लाने की कोशिश करेगा, ऐसी महान परंपरा रही है।

मैं अभी श्रीचंदजी को पूछ रहा था की सिंधी टी.वी. चेनल है क्या कोई? मुझे तो मालूम है, मैंने उनको क्यूं पूछा होगा वो आप को मालूम होना चाहिये ना? मुझे तो मालूम है... नहीं, छोटा मोटा कार्यक्रम होना अलग बात है, वो पूरी चेनल नहीं है, छोटे कार्यक्रम चलते हैं। नहीं, मैने सही जगह पर सवाल पूछ लिया था। अब उन्होंने कहा है कि जमीन दीजिये। वो व्यापारी आदमी है, ये हमारा डिवैल्यूऐशन क्यों कर रहे हो, हिन्दूजाजी? पूरा गुजरात आपका है, मेरे भाईयों-बहनों, पूरा गुजरात आपका है। पूरा गुजरात आपके हवाले है, मौज किजिये..! लेकिन मुंबई से हमारे कुछ बंधु, शायद यहाँ आये होंगे तो, नारायण सरोवर के पास एक ऐसा ही सिंधु सस्कृति परंपरा का कल्चरल सेन्टर बनाने के लिये मुंबई के ही हमारे कुछ मित्र आगे आये हैं और उनको हमने जमीन दी है, बहुत बड़ी मात्रा में। और नारायण सरोवर, यानि एक प्रकार से आज के भारत का वो आखरी छोर है और पाकिस्तान की सीमा के पास पडता है, वहाँ एक काफी अच्छा एक कल्चरल सेन्टर बनेगा, उस दिशा मे काम चल रहा है, उसका लाभ होगा, बहुत बड़ा काम उसके कारण होनेवाला है। जी हाँ, बैठे हैं यहाँ पर... वो काम काफ़ी अच्छा होगा, मुझे विश्वास है।

प लोग गुजरात के विषय में भलीभांति इस बात को जानते हैं कि गुजरात ने काफ़ी तरक्की की है, प्रगति की है। सब को भोजन करना होगा न, कि गुजरात की कथा सुनाएं..? आवाज़ नहीं आ रही है। हाँ, सिंधी बहुत देर से खाना खाते हैं, मैं भी कभी जब दिन भर काम करता था और देर हो जाये तो आप के ही वहाँ खाना खाता था, मैं सिंधी घर में जाता था, कुछ न कुछ मिल जाता था। नहीं, आज की डेट में तो जरूर खा लीजिये। देखिये, बाइ ऐन्ड लार्ज गुजरात की छवि ये रही है कि हम एक ट्रेडर्स स्टेट थे और ट्रेडर्स स्टेट के नाते` हम लोग क्या करते थे? एक जगह से माल लेते थे, दुसरी जगह पे देते थे, और बीच में मलाई निकाल लेते थे। यही था, व्यापारी लोग क्या करेंगे? उसमें से उसका ट्रान्सफोर्मेशन हुआ। आज गुजरात इन्डस्ट्रीअल स्टेट बना है। और इस इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में गुजरात ने जो प्रगति की ऊंचाईयों को पार किया है, अगर कोई गुजरात को एक सैम्पल के रूप में देखें तो उसको विश्वास हो जायेगा कि अगर गुजरात में हो सकता है तो पूरे हिंदुस्तान मे भी हो सकता है और हमारा देश महान बन सकता है। क्योंकि हम वो ही लोग हैं, हिंदुस्तान के कोने कोने में हम एक ही प्रकार के लोग हैं। वो ही कानून है, वो ही व्यवस्था है। तरक्की हो सकती है और प्रगति कर सकते हैं, ये गुजरात ने उदाहरण दिया है।

क समय था, हमारे १६०० कि.मी. के समुद्र किनारे को हम बोझ मानते थे। हम मानते थे अरे भाई, यहाँ क्या होगा? ये पानी, ये खारा पानी, पीने के लिये पानी नहीं... गाँव छोड छोड करके, कच्छ और सौराष्ट्र के लोग गाँव छोड छोड करके चले जाते थे। गाँव के गाँव खाली होते थे। हमने उसे बोझ माना था। मित्रों, हमने आज उस समुंदर को ओपर्च्युनिटी में कन्वर्ट कर दिया है। कभी जो बोझ लगता था उस को हमने अवसर में पलटा और १६०० कि.मी. के समुद्र किनारे पर ४० से अधिक बंदर, एक पूरा नेट्वर्क खड़ा किया है। और पूरे हिंदुस्तान का टोटल जो कार्गो है, प्राइवेट कार्गो, उसका ८५% कार्गो हेन्डलिंग गुजरात के समुद्र किनारे पर होता है।

च्छ। २००१ में भयानक भूकंप आया, ऐसा लगता था की अब गुजरात खत्म हो जायेगा। और वो भीषण भूकंप था, १३,००० से अधिक लोग मारे गये थे, लाखों मकान ध्वस्त हो गये थे, सारा इन्फ्रास्ट्रक्चर खत्म हो चुका था। स्कूल, कोलेज कुछ नहीं, अस्पताल तक नहीं बचे थे। ईश्वर ऐसा रूठा था जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। एक प्रकार से गुजरात मौत की चादर ओढ़ कर के सोया था और सारा देश मानता था कि अब गुजरात खड़ा नहीं होगा। मित्रों, वर्ल्ड बैंक का रिकॉर्ड कहता है की समृद्ध देश को भी भूकंप जैसी आपदा के बाद बहार निकलना है तो ७ साल लग जाते हैं, मिनिमम ७ साल। मित्रों, गुजरात ३ साल के भीतर भीतर दौडने लग गया। एक समय था जब कच्छ का ग्रोथ नेगेटिव था, ईवन पोप्युलेशन भी। लोग बाहर चले जाते थे, जनसंख्या कम होती जा रही थी। आज कच्छ जो २००१ में मौत की चादर ओढ़ के सोया था, वो आज हिंदुस्तान का फास्टेस्ट ग्रोइंग डिस्ट्रिक्ट है, फास्टेस्ट ग्रोइंग इन दस साल में कच्छ के अंदर २० कि.मी. के रेडियस में, मुंद्रा के आसपास २० कि.मी. के रेडियस में, ८००० मेगावॉट बिजली का उत्पादन का काम शरू हो चूका है, यानि बिजली पैदा होना शुरु हो गई है। विदिन २० कि.मी. रेडियस। हिंदुस्तान के कई राज्य होंगे की पूरे राज्य के पास ८००० मेगावॉट बिजली नहीं होंगी। यहाँ २० कि.मी. के रेडियस में ८००० मेगावॉट बिजली का उत्पादन..! अंजार के पास १५ कि.मी. रेडियस में स्टील पाइप का उत्पादन होता है और दुनियाँ की सबसे ज्यादा स्टील पाइप मॅन्युफेक्चरिंग इस १५ कि.मी. रेडियस में अंजार में होगा।

मित्रों, गुजरात एक ऐसा प्रदेश है जिसके पास रॉ मटिरियल नहीं है, माइन्स और मिनरल्स हमारे पास नहीं है, आयर्न ऑर हमारे पास नहीं है... लेकिन स्टील का सबसे ज्यादा उत्पादन हम करते हैं। हमारे पास डाइमंड के खदान नहीं है, लेकिन दुनिया के अंदर १० में से ९ डाइमंड हमारे यहाँ तैयार होते हैं। दुनिया की कोई नटी ऐसी नहीं होगी जिसके शरीर पर डायमंड हो और मेरे गुजराती का हाथ न लगा हो। ईश्वर ने हमें नहीं दिया, हमें वो सौभाग्य नहीं मिला, हमारे पास नहीं है। हमारे पास कोयला नहीं है, हमारे पास पानी नहीं है, उसके बाद भी हिंदुस्तान में गुजरात एक अकेला ऐसा राज्य है जो २४ अवर्स, २४x७ बिजली घर घर पहुंचाता है, २४ घंटे बीजली मिलती है। मेरे यहाँ कभी ५ मिनट भी बिजली चली जाये न, तो बहुत बड़ी खबर बन जाती है कि मोदी के राज्य में आज ५ मिनट अंधेरा हो गया..! हिंदुस्तान के और राज्य ऐसे है की जहाँ बिजली आये तो खबर बनती है कि मंगल को बिजली आयी थी..! मित्रों, विकास के पैमाने में इतना बड़ा फर्क है।

फार्मास्युटीकल दुनिया में, करीब ४५% दवाईयों का उत्पादन गुजरात मे होता है। दुनिया के हर देश में हम उसे एक्सपॉर्ट करते हैं। अब हम केमिकल की दुनियाँ में थे, आप लोगों को कभी दहेज जाने का अवसर मिले, हिंदुस्तान का एकमात्र लिक्विड केमिकल का पोर्ट है हमारे पास और एक नया एस.आई.आर. जहाँ बना है हमारा, दहेज में। शंघाई की बराबरी कर रहा है, उसकी तुलना होती है, शंघाई जैसे दहेज के केमिकल पोर्ट हैं हमारे और एस.आई.आर. अब वहाँ बन रहा है। तो हमारी गुजरात की पहचान ज्यादातर केमिकल के प्रोडक्शन की दुनिया में थी, अब उसमें से हम इंजीनीयरिंग फिल्ड मे गये हैं। और जब ‘नैनो’ यहाँ आयी तो दुनिया को पहली बार पता चला कि गुजरात नाम की भी कोई जगह है, वरना कोई जानता नहीं था। और मित्रों, नैनो तो अभी अभी आई है और परिणाम ये हुआ है की शायद गाड़ियों की कंपनीयों के जितने जाने-माने नाम हैं, वो सारी की सारी गुजरात मे आ रही हैं। आनेवाले दिनों में हम ५ मिलियन कार्स बनायेंगे गुजरात में, ५ मिलियन कार्स। आप कल्पना कर सकते हैं कि यहाँ ईकोनोमी किस प्रकार से काम करती होगी, किस तेजी से हम लोग आगे बढ़ते होंगे..! औद्योगिक विकास के अंदर हमने एक और क्षेत्र में पदार्पण किया है।

पूरा विश्व ग्लोबल वॉर्मिंग की चर्चा कर रहा है, क्लाइमेट चेन्ज की चर्चा कर रहा है। दुनिया मे चार सरकार ऐसी है जिसका अपना क्लाइमेट चेन्ज डिपार्टमेन्ट है और सरकार उस हिसाब से काम करती है। पूरे विश्व मे चार, उस चार में एक सरकार है, गुजरात की सरकार। हमारा अलग क्लाइमेट चेन्ज डिपार्टमेन्ट है और हम एन्वायरमेन्ट फ्रेन्ड्ली डेवलपमेन्ट पर बल दे रहे हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि गुजरात जिस प्रकार से तरक्की कर रहा है, तो मानव जीवन की भी रक्षा होनी चाहिए और दोनों का मेल होना चाहिये। और उसमे हमने इनिश्येटीव लिया है, सोलार एनर्जी का। मित्रों, मैं बड़े गर्व के साथ कहता हूँ कि आज गुजरात दुनिया का सोलार कैपिटल’ बन गया है, वी आर दी वर्ल्ड कैपिटल ऑफ सोलार एनर्जी। आनेवाले दिनों में सोलार एनर्जी के क्षेत्र में, सोलार एनर्जी इक्वीपमेन्ट मेन्युफेक्चरिंग के क्षेत्र में, हमारा रुतबा रहने वाला है और भविष्य में हम इसको और आगे बढ़ाने वाले हैं। रूफ-टॉप सोलार सिस्टम के लिये हम पोलिसी ला रहे हैं। जो भी मकान बनायेगा, उस के छत पे सोलार सिस्टम होगी, सरकार उसके साथ बिजली खरीदने के लिये तय करेगी क्योंकि दुनिया मे जिस प्रकार से पेट्रोलियम के दाम और कोयले के दाम बढ़ते जा रहे हैं, तो बिजली का बहुत बड़ा संकट पैदा हो सकता है। और मित्रों, मैं विश्वास से कहता हूँ, कितना ही संकट क्यों न आये, गुजरात इस संकट से बच जायेगा। और एनर्जी के बिना विकास रूक जायेगा, जहाँ भी ये संकट होगा, विकास रूक जायेगा। लेकिन हमने इसके लिये काफी सोच कर काम किया है। हम बायोफ्युअल में बहुत काम कर रहे हैं इन दिनों। और मित्रों, बायोफ्युअल में काम कर रहे हैं तो एक दिन ऐसा आयेगा कि आज हम खाड़ी के तेल पर जिंदगी गुजार रहे हैं, एक दिन ऐसा आयेगा कि झाड़ी के तेल से हमारा काम चल जायेगा। बायोफ्युअल होगा तो खेत में तेल पैदा होगा। हम उस दिशा में बहुत बड़ी मात्रा में काम कर रहे हैं और एक मंत्र ले कर के चल रहे हैं कि अब खाड़ी का तेल नहीं झाड़ी का तेल चाहिये। उस दिशा में हम काम कर रहे हैं, उससे बहुत बड़ा बदलाव आने वाला है, ऐसी स्थिति बनने वाली है।

मित्रों, एक जमाना ऐसा था की हमारे ४००० गाँव ऐसे थे कि जहाँ फरवरी महिने के बाद करीब ६ महिने तक टैंकर से पानी जाता था। जब तक टैंकर गाँव मे नहीं आता था, पीने का पानी उपलब्ध नहीं होता था। ये हालत गुजरात की इस इक्कीसवीं सदी में २००१-०२ मे थी। हमने नर्मदा योजना की पाइप लाइन से पीने का पानी गाँव मे पहुंचाने की योजना बनाई और १४०० कि.मी. पाइप लाइन हमने ७०० दिनों में लगा दी, ७०० दिनों में १४०० कि.मी. पाइप लाइन। हमारे देश मे आदत ऐसी है की एक शहर के अंदर २ इंच की पाइप लगाते है तो भी ३-३ साल तक, ४-४ साल तक काम चलता है और गढ्ढे वैसे के वैसे होते हैं। क्यों? तो बोले पानी की पाइप लाइन लगानी है। हमने ७०० दिनों में १४०० कि.मी. पाइप लाइन लगाई और पाइप की साइज़ ऐसी है कि आप परिवार के साथ मारूती कार में बैठ कर उस पाइप में से गुजर सकते हैं, उस साइज की पाइप है। ७०० दिनों में १४०० कि.मी. पाइप लाइन। गुजरात अकेला राज्य है देश मे जहाँ २२०० कि.मी. का गैस ग्रिड है। मेरे यहाँ घरों में किचन में टेप से गैस मिलता है, बोटल, सिलिन्डर की जरूरत नहीं पडती। कई शहरों में हुआ है, और भी अनेक शहरों में आगे बढ़ने वाला है। यानि हमने इन्फ़्रास्ट्रक्चर के नये रूप को पकडा है। पहले इन्फ़्रास्ट्रक्चर का रूप होता था कि कोई रोड बन जाये, बस स्टोप बन जाये, धीरे धीरे आया कि रेल्वे स्टेशन हो जाये, थोडा आगे आये तो एअरपोर्ट हो जाये... हमारे इन्फ़्रास्ट्रक्चर की सोच इक्कीसवीं सदी को ध्यान मे रखते हुए गैस ग्रिड, पानी की ग्रिड... उस दिशा में है। और दूसरा एक काम हमने जो किया है, वो है ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क। हम दुनिया मे ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क की लैंथ के संबंध में दुनिया में नं. १ पर हैं। और मित्रों, मानव संस्कृति की विकास यात्रा जो रही है इसमे बहुत बड़ा बदलाव आया है। एक जमाना था, जहाँ नदी होती थी, वहाँ मानव संस्कृति का विकास होता था। फिर एक बदलाव आया, जहाँ से हाईवेज गुजरते थे उसके बगल में मानव संस्कृति विकास करने लग जाती थी। अब तो लोग मंदिर भी बनाते हैं तो हाईवे के पास बनाते हैं, ताकि क्लायन्ट को तकलीफ न हो। लेकिन वक्त बदल रहा है मित्रों, अब जहाँ से ऑप्टिकल फायबर गुजरता होगा, वहीं पर मानव वस्ती रहने वाली है। और गुजरात एक ऐसा स्टेट है जहाँ दुनिया में लैंथ वाइज़ सब से बड़ा ऑप्टिकल फायबर नेटवर्क है। पिछले बजट के अंदर, २०११-१२ के बजट में, भारत सरकार ने अपने बजट में कहा कि वे हिंदुस्तान में ३००० गाँव में ब्रॉड बैंड कनेक्टिविटी का पायलट प्रोजेक्ट करेंगे। ये दिल्ली की भारत सरकार थी, यहाँ कोई किसी दल से जुड़े मित्र हों तो मुझे क्षमा करना, मैं किसी दल की आलोचना नहीं करता हूँ। लेकिन भारत सरकार ने ये घोषणा की थी बजेट के समय कि ३००० गाँव मे ब्रॉड बैंड कनेक्टिविटी का पायलट प्रोजेक्ट करेंगे। भाईयों-बहनों, आपको ये जानकर आनन्द होगा कि गुजरात के १८,००० गाँव में तीन साल से ब्रॉड बैंड कनेक्टिविटी है और उसके कारण आज मैं मेरे गांधीनगर से किसी भी गाँव में वीडियो कॉन्फरन्स से बात कर सकता हूँ, हम गाँव के दूर सूदूर स्कूलों के अंदर लॉंग डिस्टन्स एज्युकेशन से पढ़ा सकते हैं, एक अच्छा टीचर गांधीनगर में बैठ कर के ५०० कि.मी. की दूरी के गाँव की स्कूल के बच्चों को पढ़ा सकता है, ये नेटवर्क गुजरात में है..!

म तौर पर राज्य केन्द्र से कुछ न कुछ माँगते रहते हैं। हमेशा अखबार में आता रहता है कि रोड के लिये माँग की, फलाने के लिये माँग की, अस्पताल के लिये पैसे माँगे, गेहूँ ज्यादा माँगे, कहीं आता है कि नमक हम को दो, ये भी आता है... तो ये है हमारे देश में। लेकिन गुजरात क्या माँगता है? गुजरात का माँगने का दायरा ही कुछ और है। मैंने एक साल पहले प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखी थी। मैंने कहा साहब, हमारे सेटलाइट इतने हैं, मुझे ये सेटलाइट का उपयोग करने का अधिकार दिजिये, ये चिठ्ठी लिखी थी मैंने। क्योंकि मेरे यहाँ टेक्नोलोजी का इतना उपयोग हो रहा है कि मुझे इस नेटवर्क की आवश्यकता है। और मित्रों, मुझे खुशी है कि तीन दिन पहले भारत सरकार ने हमें सेटलाइट में से एक ट्रांसपोंडर, यानि ३६ मेगा हर्ट्ज़, इतनी यूटिलिटी का हमें अधिकार दिया है। आज मेरे यहाँ लॉंग डिस्टन्स के लिये एक चेनल चला पाता हूँ, अब मैं चौदह चेनल चला पाउंगा, चौदह। आप कल्पना कर सकते हैं कि विकास को किस ऊँचाइयों और किस दायरे पर मैं ले जा रहा हूँ..! हमारे यहाँ कितने बड़े कैन्वस पर काम हो रहा है। मैंने कुछ ही चीज़ों की आप को थोड़ी झलक दी है।

मित्रों, हम कुछ काम ऐसे करते हैं जिनको सुनकर के आप को हैरानी होगी। इस दस साल में गुजरात में मिल्क प्रोडक्शन में ६०% ग्रोथ है, केन यू इमेजिन? ६०% ग्रोथ है। और उसके पीछे जो मेहनत की इसका परिणाम आया है। हमारे यहाँ पशु आरोग्य मेला हम करते हैं। और किसी पशु को ३ कि.मी. से ज्यादा जाना न पडे, क्योंकि जब बीमार पशु को उस से ज्यादा ले जाना क्राइम है, ईश्वर का अपराध है। तो हम करीब ३०००-३५०० केटल कैम्प लगाते हैं, उनकी हेल्थ के चेक-अप के लिये। और ये हम लगातार करते हैं पिछले सात साल से। और वेक्सीनेशन, दवाईयां, उसकी देखभाल... इसका परिणाम यह हुआ है कि आम तौर पर जैसे ठंड ज्यादा हो गयी तो हमें ज़ुकाम हो जाता है, बारिश ज्यादा हो गयी तो हमें ज़ुकाम हो जाता है, वैसे पशु को भी होता है। कुछ डिज़ीज़ ऐसे होते हैं कि थोडा सा भी वेदर चेन्ज होगा तो पशु को भी हो जाता है। लेकिन रेग्युलर देखभाल के कारण मेरे राज्य में से ११२ डिज़ीज़ ऐसे थे, वो आज टोटली इरेडिकेट हो गये, खत्म हो गये मेरे राज्य से और इसका पशु की हेल्थ पर बहुत बड़ा प्रभाव हुआ। इतना ही नहीं, हम पशु की केयर कैसी करते हैं..? हमारे यहाँ मोतीया बिंदु का ऑपरेशन होता है, कैटरेक्ट का ऑपरेशन होता है और कुछ गरीब इलाक़ों में तो लोग चेरिटी के नाते नेत्र यज्ञ करते हैं और गरीब लोगों को मुफ्त में नेत्रमणि लगाने का काम करते हैं। हम सब ने सुना है कैटरेक्ट ऑपरेशन का, नेत्रबिंदु के ऑपरेशन, नेत्रमणि का ऑपरेशन सुना है... आज पहली बार मैं आप को सुना रहा हूँ कि सारे विश्व के अंदर गुजरात अकेला राज्य ऐसा है जहाँ मैं केटल के कैटरेक्ट का ऑपरेशन करता हूँ। पशु के नेत्रमणि के ऑपरेशन मेरे राज्य मे होते हैं, मेरे राज्य मे पशु की डेन्टल ट्रीटमेन्ट होती है, इतनी बारीकी से केयर करने के कारण आज मिल्क प्रोड्क्शन मे हम यहाँ पहुंचे हैं। और मित्रों, जो यहाँ सिंगापुर से आये होंगे उन्हें मैं विश्वास से कहता हूँ कि आज अगर आप सिंगापुर में इंडियन स्टाइल की चाय पीते होंगे, तो लिख करके रखिये, दूध मेरे गुजरात का होगा। मित्रों, हमने एग्रीकल्चर सेक्टर में जो काम किया है, आज दुनिया के किसी भी देश में अगर भिंडी की सब्जी खाते हो, आप लिख कर रखना वो भिंडी मेरे बारडोली से आयी होगी। मित्रों, एक जमाना था जब गीर की केसर प्रसिद्ध थी। आज कच्छ की केसर, कच्छ जो रेगिस्तान था... कच्छ के अंदर मैंगो का उत्पादन होता है और आज मेरी कच्छ की केसर दुनिया के देशों मे एक्सपोर्ट होती है।

मित्रों, दस साल के भीतर भीतर क्या किया जा सकता है इसका सिर्फ एक छोटा सा सैम्पल मैने दिखाया है आप को, पूरी फिल्म देखनी होगी तो महीने भर की कथा लगानी पडेगी। सभी क्षेत्रों मे विकास हुआ है और विकास यहीं एक मंत्र है। और भाईयों-बहनों, सारी समस्याओं का समाधान विकास है, सारे संकटो का समाधान विकास है, उसी एक मंत्र को ले करके हम चल रहे हैं।

मुझे आप सब के बीच आने का अवसर मिला, मैं आप का आभारी हूँ। शुरू में जो मैंने बातें बतायी थीं, सिर्फ आपके प्रति अतिशय प्रेम होने के कारण, आपके प्रति मेरे मन मे भीतर से आदरभाव है उसी के चलते मेरी आप सब से फिर एक बार प्रार्थना है, इस महान परंपरा को नष्ट मत होने देना, इस संस्कृति को नष्ट मत होने देना। आप बच्चों में ये भाषा, ये संस्कार, ये खान-पान इस को जीवित रखने की कोई न कोई योजना हो जाये तो मैं मानता हूँ कि देश की बहुत बड़ी सेवा होगी।

 

हुत बहुत धन्यवाद..!

Explore More
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी
Proud Moment For Every Indian: PM Modi On Sarnath Being Inscribed On UNESCO World Heritage List

Media Coverage

Proud Moment For Every Indian: PM Modi On Sarnath Being Inscribed On UNESCO World Heritage List
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
आज 'कारगिल विजय दिवस' पर मैं सभी बहादुर शहीदों और सैनिकों को नमन करता हूं: पीएम मोदी
इस साल एक खास ‘शौर्य विजय यात्रा’ आयोजित की गई है, जिसका संदेश है - "वन राइड, वन नेशन, वन सैल्यूट": पीएम मोदी
चाहे रक्षा उत्पादन हो, रक्षा निर्यात हो या मित्र देशों के साथ रणनीतिक सहयोग—भारत लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है: पीएम मोदी
'कैच द रेन' का संदेश बेहद सरल है—जहां और जब बारिश हो, वहीं वर्षा जल का संरक्षण करें: पीएम मोदी
आज बचाई गई पानी की हर बूंद आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी पूंजी है: पीएम मोदी
लंदन के लॉर्ड्स मैदान पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार टेस्ट मैच जीतकर इतिहास रच दिया, यह एक ऐतिहासिक जीत है: पीएम मोदी
पिछले रविवार 'विक्रम-1' के सफल प्रक्षेपण ने हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है: पीएम मोदी
भारत में ओलंपियाड और हैकाथॉन का कल्चर लगातार बढ़ रहा है, यह देखकर खुशी होती है: पीएम मोदी
सीतामढ़ी की पहल बताती है कि 'रिड्यूस, रीयूज, रीसाइकिल' अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली का हिस्सा बनता जा रहा है: पीएम मोदी
आज मणिपुर की लोकटक झील केवल देश के मैप पर ही नहीं, बल्कि विशाल ब्रह्मांड में भी अपनी चमक बिखेर रही है : पीएम मोदी
मैं आप सभी से आग्रह करता हूं कि आने वाले त्योहारों के मौसम में खादी, हैंडलूम या हस्तशिल्प से बना कम-से-कम एक उत्पाद जरूर खरीदें: पीएम मोदी

मेरे प्यारे देशवासियो,

नमस्कार | हमारे जीवन में कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिन्हें याद रखने के लिए कैलेंडर देखने की जरूरत नहीं पड़ती | आज, 26 जुलाई ऐसी ही एक तारीख है | आज ‘कारगिल विजय दिवस’ है | ये दिन हमें गर्व से भर देता है | ये दिन हमें अपने वीर जवानों के अद्भुत साहस की याद दिलाता है | कारगिल की ऊंची-ऊंची चोटियाँ, कठिन मौसम, दुश्मन की चुनौती, हर परिस्थिति हमारे सैनिकों के सामने थी, लेकिन उनका हौंसला हर चुनौती से बड़ा था | उन्होंने माँ भारती की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया | आज ‘कारगिल विजय दिवस’ पर मैं सभी वीर शहीदों और वीर सैनिकों को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ |

साथियो,

आज का भारत अपने वीरों को सिर्फ याद ही नहीं करता, बल्कि नई पीढ़ी तक उनकी गाथा भी पहुंचाता है | इसी भावना से इस वर्ष एक विशेष ‘शौर्य विजय यात्रा’ निकाली गई है | 14 जुलाई को दिल्ली के ‘National War Memorial’ से शुरू हुई यह मोटरसाइकिल यात्रा, द्रास के कारगिल वॉर मेमोरियल तक पहुंचेगी | इसका संदेश है - “One Ride, One Nation, One Salute.” यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि राष्ट्र के लिए दिया गया बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता |

साथियो,

आज भारत अपने सैनिकों के साहस के साथ-साथ अपनी तकनीकी क्षमता को भी लगातार मजबूत कर रहा है | कुछ दिन पहले भारतीय नौ-सेना में INS महेंद्रगिरि शामिल किया गया | यह आधुनिक जंगी जहाज भारत में ही design किया गया है, भारत में ही बना है | इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है | यह आत्मनिर्भर भारत की बढ़ती शक्ति का प्रतीक है | इसी महीने DRDO ने Pinaka Long Range Guided Rocket का भी सफल परीक्षण किया | इस सफलता के पीछे हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का सामूहिक परिश्रम है | दो-तीन दिन पूर्व ही DRDO ने कुशा मिसाइल का भी सफल परीक्षण किया है |

साथियो,

आज रक्षा उत्पादन हो, रक्षा निर्यात हो या मित्र देशों के साथ राजनीतिक सहयोग - भारत लगातार नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है | इस महीने की शुरुआत में, मैं, इंडोनेशिया में था, जहाँ, ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों के लिए एक बड़ा समझौता हुआ है |

दुनिया का भरोसा भारत के रक्षा उपकरणों और तकनीक पर बढ़ रहा है | आइए, इस ‘कारगिल विजय दिवस’ पर हम अपने अमर शहीदों को नमन करें, और एक सुरक्षित, सक्षम और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का अपना संकल्प और मजबूत करें |

मेरे प्यारे देशवासियो,

‘मन की बात’ के पिछले Episode में मैंने आपसे ‘Catch The Rain’ अभियान की चर्चा की थी | मैंने आग्रह किया था कि बारिश की हर बूँद को सहेजने के इस अभियान को जन-आंदोलन बनाएं | ‘Catch The Rain’ का संदेश बहुत सीधा है – जहाँ बारिश गिरे, जब बारिश गिरे, पानी को वहीं सहेजिए, इसलिए 04 जुलाई से देश-भर में एक विशेष अभियान भी चलाया जा रहा है | इसके तहत बारिश के पानी के संचयन, Ground Water Recharge, पुराने जल-स्त्रोतों के पुनर्जीवन और वृक्षारोपण को नई गति दी जा रही है | मुझे बहुत खुशी है कि गाँव हों या शहर, पंचायतें हों या सामाजिक संस्थाएं हर जगह लोगों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की है | कहीं पुराने तालाबों से गाद निकाली जा रही है, कहीं कुओं और बावड़ियों को फिर से जीवन दिया जा रहा है | बंद पड़े Borewell अब Ground Water Recharge का माध्यम बन रहे हैं |

साथियो,

मध्य-प्रदेश के सीधी जिले में करीब डेढ़ हजार तालाब बनाए गए हैं | नरसिंहपुर में अमृत सरोवरों को संवारा गया है | महाराष्ट्र के नासिक में बड़ी मात्रा में पानी सहेजने की क्षमता विकसित हुई है | आंध्र-प्रदेश के नंद्याल में सभी ग्राम पंचायतें इस अभियान से जुड़ी हैं और पुराने तालाबों को फिर से उपयोगी बनाया गया है | हमारे शहर भी पीछे नहीं हैं | छत्तीसगढ़ के कोरबा, ओडिशा के भुवनेश्वर और आंध्र-प्रदेश के विजयनगरम - इस अभियान के उत्साहजनक परिणाम दिखाई दे रहे हैं | आइए, हम भी अपने आस-पास किसी एक तालाब, कुएं या बावड़ी की जिम्मेदारी लें - पानी की हर बूँद बचाएं | आज बचाई गई हर बूँद, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है |

मेरे प्यारे देशवासियो,

कुछ ही दिन पहले Glasgow में Commonwealth Games शुरू हुए हैं | हर देशवासी भारतीय दल को निरंतर अपनी शुभकामनाएं दे रहा है | उनकी कामना है कि सभी खिलाड़ी और athlete बेहतरीन प्रदर्शन करें और लोगों का दिल भी जीतें |

साथियो,

हमारे युवाओं ने हाल के दिनों में sports में कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं | PV Sindhu Badminton में Japan Open का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय बन गई हैं | उनकी इस उपलब्धि पर पूरे देश को गर्व है | भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने भी लंदन में Lord’s Stadium में अपना पहला Test Match जीता है | यह एक ऐतिहासिक जीत है | हमारी टीम ने 270 रनों के बड़े अंतर से यह मुकाबला जीता है | लेकिन बात सिर्फ इतनी सी नहीं है | Lord’s के लंबे इतिहास में यह महिलाओं की टीम का पहला Test Match था | 1983 में इसी मैदान पर भारत ने अपना पहला क्रिकेट विश्व कप जीता था | अब हमारी नारी शक्ति ने यहां देश का नाम रोशन किया है |

साथियो,

कुछ छोटे प्रयास ऐसे भी होते हैं, जो बहुत मायने रखते हैं | मुझे केरलम में एर्णाकुलम के साउथ चित्तूर में sports के ऐसे ही एक प्रयास के बारे में पता चला है | वहां के एक स्कूल में संस्कृत club है | यहां के teacher अभिलाष जी बड़े अनूठे तरीके से संस्कृत को लोकप्रिय बना रहे हैं | इस project को ‘अक्षरकंदुक’ नाम दिया गया है | इसमें संस्कृत के अक्षरों को football में इस्तेमाल होने वाले शब्दों से जोड़कर आसान तरीके से समझाया जाता है | इससे सीखने में आनंद मिलता है, साथ ही खेलों से लोगों का जुड़ाव भी बढ़ता है |

मेरे प्यारे देशवासियो,

पिछले रविवार Vikram-1 इसके सफल launch से हर देशवासी गौरव से भरा हुआ है | हम सभी भारतीय space sector के इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने | ये private sector द्वारा विकसित भारत का पहला rocket है | हमारे युवा innovators ने वो कर दिखाया, जिसकी कल्पना तक मुश्किल थी | उन्होंने गजब की skill, passion और patience दिखाया | लंबे समय तक हमारा space sector निजी क्षेत्र के लिए बंद रहा था | इस sector में रुचि रखने वाले काफी युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पा रहा था | युवा हित को देखते हुए हमने space sector को private sector के लिए खोला | आज इसका परिणाम दुनिया देख रही है |

साथियो,

हमारे युवा साथी science में भी भारत का मस्तक ऊंचा कर रहे हैं| Science Olympiads दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण competition में से एक हैं | इनमें बड़ी संख्या में students हिस्सा लेते हैं | इसी महीने Physics, Chemistry, Biology और Mathematics के Olympiad हुए | इन competitions में भारतीय दल का प्रदर्शन शानदार रहा | Physics Olympiad में हमारे सभी पाँच students ने Gold Medal जीते और भारत ने पहली rank हासिल की | पिछले एक दशक में हुए हर Physics Olympiad में हमारे देश के students ने Gold या Silver Medal जरूर जीता है | Chemistry Olympiad में भी हमारे सभी students ने Gold Medal जीता | यह अब तक की best performance रही है | Biology Olympiad में भी हमारे सभी students ने medal जीते, इनमें एक Gold Medal भी शामिल है | वहीं, Mathematics Olympiad में हमारे students ने दो Gold और चार Silver Medals अपने नाम किए | मुझे देश की युवा शक्ति पर बहुत गर्व है | यह देखकर खुशी होती है कि भारत में Olympiads और Hackathons का culture निरंतर बढ़ रहा है| मुझे विश्वास है कि देश के अधिक से अधिक युवा ऐसे forums में अपना interest दिखाएंगे और भारत का परचम भी लहराएंगे |

मेरे प्यारे देशवासियो,

जब हुनर भी हो और कुछ करने का जज्बा भी हो, तो हर राह, आसान हो जाती है | कश्मीर की पारंपरिक चटाई ‘वगू’ को लेकर आज जो प्रयास हो रहे हैं उसमें इसी की झलक मिलती है | इसे सरकंडे और धान के पुआल से, straw से, तैयार किया जाता है | इस चटाई को बनाने की परंपरा बरसों पुरानी है | इसके लिए सबसे पहले कश्मीर के दलदली इलाकों की घास और सरकंडे की कटाई की जाती है | धूप में सुखाने के बाद छंटाई होती है और फिर शुरू होता है हाथों से बुनाई का काम | दो कारीगरों को एक चटाई बनाने में करीब-करीब चार दिन लगते हैं | यह चटाई अनूठी भी है और eco-friendly भी है | एक बड़ी खासियत ये है कि आपको गर्मियों में इससे ठंडक मिलेगी और सर्दियों में गर्माहट| पहले यह कश्मीर के हर घर में दिखती थी, लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में इसका उपयोग कम होने लगा था | ऐसे में श्रीनगर के गुलाम हुसैन जी और उनकी बेटी तंजीला जी ने एक संकल्प लिया | दोनों ‘वगू’ craft की परंपरा को एक नया जीवन देने में जुट गए | गुलाम हुसैन जी बहुत ही साधारण परिवार से आते हैं | उन्हें इस काम में कई तरह की चुनौतियां भी आई | लेकिन ‘वगू’ के संरक्षण का उनका संकल्प अडिग था | देखते ही देखते उनके इस प्रयास से बहुत सारे लोग जुड़ते चले गए | गुलाम हुसैन जी ने इस कौशल को खूब बढ़ाया | अपने मिशन में उन्हें स्थानीय स्तर पर सरकारी सहयोग भी मिला | आज तेजी से लोकप्रिय हो रहा, ‘वगू’ देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंच रहा है | मुझे इस प्रयास से जुड़े सभी लोगों पर बहुत गर्व है | आज हम सभी का Local products पर जोर है | हम Vocal for Local के मंत्र को लेकर चल रहे हैं | ऐसे में कश्मीर का ‘वगू’ भी आपके घर का हिस्सा बने, इस पर एक बार जरूर सोचिएगा |

साथियो,

हमारे देश में चाय सिर्फ एक पेय नहीं है - ये अपनापन भी है | सुबह की शुरुआत हो, दोस्तों की मुलाकात हो या परिवार के साथ कुछ पल बिताने हों ‘चाय’ हर मौके का हिस्सा बन जाती है | वैसे तो आप भी भलीभाँति जानते हैं मेरा चाय से रिश्ता क्या है | लेकिन आज मैं जिस चाय की चर्चा कर रहा हूं, उसने सिर्फ स्वाद ही नहीं दिया, बल्कि अनेक बहनों के जीवन में, आत्मनिर्भरता की नई खुशबू भी घोल दी है | उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के लखीवाला गांव में Self Help Group से जुड़ी महिलाओं ने ‘विदुर प्रेरणा स्वदेशी हर्बल टी’ तैयार की है | इसमें lemongrass, गिलोय, मुलेठी, तुलसी, कच्ची हल्दी, दालचीनी, इलायची और सौंफ जैसी प्राकृतिक सामग्रियां शामिल हैं | अपने अनोखे स्वाद और गुणों की वजह से इस चाय ने बहुत कम समय में लोगों के बीच खास पहचान बना ली | प्रयागराज के महाकुंभ और दिल्ली के International Food Festival में इस हर्बल चाय को खूब सराहना मिली है | विदेशों से आए लोगों ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है |

साथियो,

सबसे प्रेरक बात इसकी शुरुआत है | यह पूरा प्रयास सिर्फ एक लाख रुपये से शुरू हुआ था | आज यह brand देश के बड़े संस्थानों तक पहुंच चुका है | ये पहल हमें बताती है कि जब स्थानीय ज्ञान, प्रकृति और महिलाओं का आत्मविश्वास साथ आते हैं, तो एक छोटा-सा प्रयास भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन जाता है |


मेरे प्यारे देशवासियो,

आज देश-भर में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के माध्यम से लोग प्रकृति के प्रति अपना दायित्व निभा रहे हैं| जब समाज इस भावना से जुड़ता है, तो बहुत सुन्दर और प्रेरक उदाहरण सामने आते हैं | साथियो, अमदाबाद (अहमदाबाद) में जन-भागीदारी की अद्भुत शक्ति दिखाई दी है | भाड़ज़ क्षेत्र में एक घंटे के भीतर साढ़े 3 लाख से अधिक पौधे रोपे गए, इसमें, 25 हजार से अधिक लोग जुटे | स्कूली बच्चे, NCC Cadets, स्वयंसेवक और आम नागरिक - सभी ने इस अभियान में हिस्सा लिया | आने वाले वर्षों में यही पौधे एक घने शहरी वन का रूप लेंगे | इस प्रयास को Guinness Book of World Record में दर्ज किया गया है | साथियो ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत यूपी में भी जन-शक्ति का अद्भुत संकल्प देखने को मिला है | वहां एक ही दिन में 12 जुलाई को 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए हैं | UP का सांसद होने के नाते मेरे लिए ये भी विशेष गर्व की बात है |

मेरे प्यारे देशवासियो,

पेड़ केवल मनुष्यों के लिए नहीं होते, वे अनगिनत जीवों के घर भी होते हैं | गुजरात के गिर के जंगलों में करीब 60 वर्षों बाद Indian Grey Hornbill फिर से बसेरा बना रहा है | ये गिर में बरसों से हो रहे संरक्षण और पुनर्स्थापन के प्रयासों का परिणाम है | Hornbill को जंगलों का किसान कहा जाता है | ये फल खाते हैं और बीजों को दूर-दूर तक पहुंचाते हैं, उन्हीं बीजों से, जंगल में नए पेड़ उगते है इस तरह एक पक्षी जंगल को फिर से हरा-भरा बनाने में मदद करता है | मैं आप सभी से कहूँगा, हम सभी अपने जीवन के किसी विशेष अवसर को, प्रकृति से जरूर जोड़ें | एक पेड़ माँ के नाम लगाएं | आज का लगाया एक छोटा सा पौधा, आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली, स्वच्छ हवा और सुंदर भविष्य की विरासत बन सकता है |

मेरे प्यारे देशवासियो,

हम सभी जानते हैं कि आज plastic प्रदूषण पूरी दुनियाँ के पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है | Single use plastic का कचरा कई वर्षों तक प्रकृति को नुकसान पहुंचाता रहता है, इसलिए, plastic का सही निस्तारण बहुत जरूरी है | साथियो, बिहार के सीतामढ़ी में ‘Waste to Wealth’ का शानदार उदाहरण सामने आया है | यहां कचरे की recycling कर उससे आकर्षक bench बनाई जा रही है | एक bench तैयार होने में करीब 40 किलो single use plastic खप जाती है | यह मजबूत, टिकाऊ और आरामदायक होने के साथ-साथ eco-friendly भी होती है | इसे सरकारी स्कूलों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर लगाया जाता है | इसके जरिए लोगों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता भी बढ़ रही है | इस प्रयास में स्थानीय इकाई के साथ ही जिला प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका है | इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं | सीतामढ़ी का ये प्रयास हमें बताता है कि Reduce, Reuse और Recycle आज केवल एक नारा नहीं बल्कि हमारा जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है |

साथियो,

आपको याद होगा पिछली बार ‘मन की बात’ में, मैंने ‘गणेश उत्सव’ की बात की थी | मैंने आग्रह किया था कि हमें अपने देश की मिट्टी से ही बने गणेश जी की पूजा करनी चाहिए | जो POP (पी.ओ.पी.) से बने गणेश जी होते हैं या विदेश से आई गणेश जी की प्रतिमा होती है, उसके बजाय हमें देश की मिट्टी से बने गणेश जी को घर में स्थापित करना चाहिए | इस विषय पर अनेक लोगों ने मुझे संदेश भेजा है और अपने विचार रखे हैं | लोगों ने बताया कि उन्होंने मेरे आग्रह को अपनाया है | उन्होंने स्थानीय मिट्टी से तैयार होने वाले गणेश जी को स्थापित करने का संकल्प लिया है | लोगों ने लिखा है कि ‘मन की बात’ में पहले ही इस पर चर्चा हुई, इससे उन्हें सही वक्त पर सही कदम उठाने में मदद मिली | मैं एक बार फिर अपना आग्रह दोहराता हूं, इस बार गणपति पूजा में देश की मिट्टी से बने गणेश जी को अपने घर पर स्थापित करें, उनकी पूजा करें | आपका ये प्रयास भी एक तरह से प्रकृति की ही पूजा होगा |

मेरे प्यारे देशवासियो,

अब मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताऊँगा, जिनके बारे में सुनकर आपको बहुत गर्व होगा | एक ऐसे व्यक्ति जो science और innovation के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम कर रहे हैं, दुनिया में जिनकी पहचान बन रही है, लेकिन इसके बाद भी वो अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े हुए हैं, अवसर मिलते ही वो अपनी मिट्टी का सम्मान करना नहीं भूलते - वो व्यक्ति हैं, मणिपुर के Dr. Ronaldo Laishram जी | नाम उनका Ronaldo है लेकिन काम से वो एक Astrophysicist हैं | वे जापान में काम करते हैं और young galaxies के एक विशाल समूह की खोज करने वाली टीम का हिस्सा रहे हैं | आप जानना चाहेंगे कि उन्होंने आखिर किया क्या है? दरअसल, उन्होंने इस पूरे समूह का नाम मणिपुर की एक खूबसूरत झील से जोड़कर Loktak proto-cluster रखा है | Loktak ताजे पानी की बहुत बड़ी झील है | Loktak लेक में तैरती हुई फूमडी मिलकर एक अनोखा landscape बनाती है | ऐसा लगता है कि विशाल समंदर में छोटे-छोटे द्वीप तैर रहे हों | उसी प्रकार universe में ये young galaxies भी एक विशाल संरचना का निर्माण करती हैं | आज मणिपुर की Loktak केवल देश के Map पर ही नहीं, बल्कि विशाल ब्रह्मांड में भी अपनी चमक बिखेर रही है | यह उपलब्धि हर भारतीय का गौरव बढ़ाने वाली है | इससे हमारे युवा साथियों को सीख मिलती है कि वे अपनी परंपरा से जुड़े रहकर भी नई ऊंचाइयों को छू सकते हैं | ये ऐसी जड़ें हैं, जो सितारों की दुनिया को भी जगमगा सकती हैं |

मेरे प्यारे देशवासियो,

कुछ ही दिनों बाद, 7 अगस्त को हमारा देश ‘National Handloom Day’ मनाएगा | इस अवसर पर हम अपने बुनकर भाई-बहनों के कौशल और उनकी सृजनशीलता का उत्सव मनाते हैं | हमारे ये साथी पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं |

साथियो,

हथकरघे से बना हर परिधान किसी-न-किसी क्षेत्र, समुदाय और इससे जुड़े असंख्य लोगों की कहानी को सामने लाता है | ये वो लोग हैं, जो गर्व के साथ भारत की सांस्कृतिक विरासत को संजोने में जुटे हैं | आज के दिन मेरा आग्रह है कि हम हस्तकला को प्रोत्साहित कर, अपने बुनकर साथियो का सम्मान करें | आइए, हम vocal for local की भावना को और सशक्त करें |

साथियो,

आज देश में जिस तरह handloom को बढ़ावा दिया जा रहा है | उससे बड़ी संख्या में लोगों का जीवन बेहतर हो रहा है | पोचमपल्ली से पटना और कुथमपल्ली से कच्छ तक इसके कई उदाहरण देखने को मिलते हैं | आज ऐसे कई लोग और समूह हैं, जो, handloom की हमारी गौरवशाली परंपरा को नई ऊर्जा और पहचान दे रहे हैं | कोई ‘पोचमपल्ली इकत’ की सुंदर परंपरा को आगे बढ़ा रहा है, तो कोई महिला बुनकरों को जोड़कर wool products बना रहा है | कुछ लोग केरलम की पारंपरिक ‘कसावु कला’ को संरक्षित कर रहे हैं | इससे हमारी माताओं-बहनों को रोजगार भी मिल रहा है |

साथियो,

एक और विषय जिसका मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा, वह है ‘खादी’ | हम सभी जानते हैं कि ‘खादी’ महात्मा गांधी को बहुत प्रिय थी | बीते कुछ वर्षों में ‘खादी’ काफी लोकप्रिय हुई है | पिछले 12 वर्षों में इसकी बिक्री 6 गुना बढ़ी है | बिक्री का यह आंकड़ा अब 8,000 करोड़ रुपये के करीब पहुंच चुका है | मेरा आप सभी से आग्रह है कि आने वाले त्योहार में ‘खादी’ का कोई-न-कोई, handloom का कोई-न- कोई, handicraft का कोई-न-कोई product जरूर खरीदें|

मेरे प्यारे देशवासियो,

अगर आपसे पूछा जाए कि भारत के कितने तरह के musical instruments हैं, तो आप सोच में पड़ जाएंगे | ऐसा इसलिए, क्योंकि हमारे यहां बहुत से वाद्ययंत्र और उनसे जुड़ी परम्पराएं हैं | इसी तरह का एक instrument है - त्रिपुरा का ‘चौंगप्रेंग’ | यह वहां की tribal communities में काफी लोकप्रिय है | बांस से बने इस वाद्ययंत्र में तीन तार होते हैं | इससे निकली धुन बहुत मधुर होती है, जो सरोद से मिलती-जुलती है | कुछ वजहों से युवाओं के बीच इसकी लोकप्रियता कम होने लगी थी | ऐसे में सूरज कुमार देबबर्मा जी ने इसे फिर से लोकप्रिय बनाने का संकल्प लिया | आज उनका प्रयास रंग ला रहा है | वे चौंगप्रेंग के साथ ही वहां के अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर भी perform करते रहे हैं | Kokborok folk songs, Baul songs, Bangali Folk उन्हें खूब भाता है | अब मैं आपको एक छोटी सी clip सुनाना चाहता हूं | इस संगीत को आप कभी भूल नहीं पाएंगे |

साथियो,

मुझे विश्वास है इसे सुनकर आपके मन को बहुत अच्छा लगा होगा | मुझे देबबर्मा जी पर बहुत गर्व है | पारंपरिक संगीत को लोकप्रिय बनाने का उनका प्रयास बहुत ही सराहनीय है | मेरा आग्रह है कि आप भी अपने आस-पास के पारंपरिक वाद्ययंत्र की जानकारी social media पर जरूर share करें | आपकी यह कोशिश दूसरों को भी पारंपरिक भारतीय संगीत से जरूर जोड़ेगी |

मेरे प्यारे देशवासियो,

कल 27 जुलाई को, भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की पुण्यतिथि है | डॉ. कलाम के व्यक्तित्व में कई प्रेरक रूप थे, लेकिन, उनके हृदय के सबसे करीब एक शिक्षक की भूमिका थी | वे बच्चों और युवाओं को बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करते थे | संयोग से, इसी हफ्ते हम ‘गुरु पूर्णिमा’ का पावन पर्व मनाएंगे | हमारे माता-पिता हमारे पहले गुरु होते हैं | स्कूल के शिक्षक हमें अक्षर ज्ञान देते हैं | गुरु पूर्णिमा ऐसे सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता जताने का अवसर है | मैं देश के सभी शिक्षकों और गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता हूं |

साथियो,

कुछ ही सप्ताह बाद हम अपनी स्वतंत्रता का महापर्व भी मनाएंगे | 15 अगस्त हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है | ये उन असंख्य वीरों को याद करने का दिन है, जिन्होंने ‘भारत माता’ की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया | उनके त्याग और तपस्या की वजह से आज हमारे हाथ में तिरंगा है | इस तिरंगे में हमारे संविधान के आदर्श हैं |

साथियो,

पिछले कुछ वर्षों में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान ने पूरे देश को एक अद्भुत भावना से जोड़ा है | हर घर, हर गली में तिरंगे का उत्सव दिखाई देता है | इस वर्ष भी हमें ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ाना है | अपने घर पर पूरे सम्मान के साथ तिरंगा फहराना है |

साथियो,

हर वर्ष 15 अगस्त से पहले आप मुझे बहुत से विचार और सुझाव भेजते हैं | इस वर्ष भी आप अपने विचार MyGov पर जरूर साझा कीजिए | मुझे आपके सुझावों का इंतजार है |

साथियो,

‘मन की बात’ में आज इतना ही | अगले महीने हम फिर मिलेंगे देशवासियों की अनेक नई उपलब्धियां, और, प्रेरक प्रयासों के साथ, तब तक के लिए मुझे अनुमति दीजिए | बहुत-बहुत धन्यवाद, नमस्कार |