अंतरराष्ट्रीय सिंधी सम्मेलन

Published By : Admin | December 16, 2011 | 15:29 IST

सिंधु भवन, अहमदाबाद

१६ दिसंबर, २०११

 

मुझे अच्छा लगा कि आप सब के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। मित्रों, मैं मन से आप लोगों का बहुत आदर करता हूँ, आप लोगों का बहुत सम्मान करता हूँ और मनोमन मेरे मन में, मेरे दिल में, एक पूज्य भाव आप लोगों के लिये है। और वह इसलिए नहीं है कि मैं मुख्यमंत्री हूँ इसलिए ऐसा कहना पड़ता है, ऐसा नहीं है। इसके पीछे एक तर्क है, एक हकीकत है। पूरी मानवजात की सांस्कृतिक विकास यात्रा की ओर जब नजर करते हैं और इसके मूल की तरफ़ जब जाते हैं तो एक जगह पर आ करके रूकते हैं, जहाँ से मानव संस्कृति की विकास की यात्रा का आरम्भ हुआ था। वो जगह वो है जहाँ आपके पूर्वजों ने पराक्रम किया था। आप उस महान विरासत के अंश हैं। आपके पूर्वजों ने वे महान काम किये हैं और इसके कारण मेरे दिल में उस परंपरा के प्रति पूज्य भाव है और आप उसके प्रतिनिधि हैं तो सहज रूप से उसका प्रकटीकरण आपकी ओर होता है।

सिंधु ओर सरस्वती के किनारे पर पूरे मानवजात के कल्याण के लिये हमेशा हमेशा सोचा गया। मैं जब विद्यार्थी काल में धोलावीरा देखने गया था। हड़प्पन संस्कृति, मोहें-जो-दरो... और वहाँ की बारीकीयों को वहाँ के लोग मुझे समझा रहे थे, तो मन में इतना बड़ा गर्व होता था कि हमारे पूर्वज कितना लंबा सोचते थे। वहाँ की एक एक ईंट, एक एक पथ्थर इन सिंधु संस्कृति की परंपरा के उन महान सपूतों के पराक्रम की गाथा कहता है। आज दुनिया में ओलिंपिक गेम्स की चर्चा होती है और बड़े बड़े खेल के मैदान, बड़े बड़े स्टेडियम की चर्चा होती है। आप में से यहाँ बैठे हुए कई लोग होंगे जिनको आप ही के पूर्वजों के उस पराक्रम की ओर देखने का शायद सौभाग्य नहीं मिला होगा। अगर आप धोलावीरा जायेंगे तो वहाँ पायेंगे कि वहाँ ५००० साल पहले कितना बड़ा स्टेडियम था और खेलकूद के कितने बड़े समारोह होते थे, उसके सारे चिह्न आज भी वहाँ मौजूद हैं। यानि इन्हें क्या विशालता से देखते होंगे..! आज पूरी दुनिया मे साइनेज की कल्पना है भाई, गली इस तरफ जाती है तो वहाँ लिखा होता है गली का नाम, एरो करके लिखा होता है, साइनेजीस होते है। और साइनेजीस की किसके लिये जरूरत होती है? आप किसी छोटे गाँव में जाओ, तो वहाँ साइनेजीस नहीं होते कि भाई, यहाँ जाओ तो यहाँ पटेलों का मोहल्ला है, यहाँ बनिये का महोल्ला है... ऐसा कुछ लिखा नहीं होता है। क्योंकि गाँव छोटा होता है, सबको पता होता है, क्या कुछ है, इसलिए कोई बोर्ड लगाने की जरूरत नहीं पडती। ५००० साल पहले धोलावीरा दुनिया का पहला शहर था जहाँ साइनेजीस थे, आज भी मौजूद हैं। क्या कारण होगा? कारण दो होंगे, एक, वो एक बहुत बड़ा शहर होगा और दुसरा, वहाँ पर देश-विदेश के लोग आते-जाते होंगे, और तभी तो इन चीज़ों की जरूरत पडी होंगी। ५००० साल पहले ऐसी विरासत, आप कल्पना कर सकते हैं, भाईयों। क्या कभी आप को फील होता है? और मैं चाहूँगा की जब हम इस प्रकार का समारोह कर रहे हैं और इस महान परंपरा के गौरव गान गाते हुए हम इकठ्ठे हुए हैं, तो हमारी नयी पीढ़ी को उस इतिहास और संस्कृति का परिचय कराने के लिये कुछ कार्यक्रम हो तो शायद नयी पीढ़ी तक ये बात पहुंचेगी।

मित्रों, मेरा यहाँ मुख्यमंत्री के नाम पे कम, आप के अपने एक साथी के नाम पर बात करने का मेरा मूड़ करता है। मुझे बहुत बार लगता है कि मैं... क्यूंकि यहाँ अहमदाबाद में आधे से अधिक सिंधी परिवार होंगे जिसके घर मैंने रोटी खाई होगी। क्योंकि मैं ३५ साल तक उसी प्रकार का जीवन जीता था, अनेक परिवारों मे मेरा जाना और उन्हीं की रोटी खाना, ये मेरा... और इसलिए मैंने काफी निकटता से इन सब चीज़ों को देखा है। लेकिन आज कभी सिंधी परिवार में जाता हूँ तो बच्चे पास्ता और पिज़्ज़ा के आसपास चलते हैं तो मेरे मन में होता है की मीठा लोल्ला, तीखा लोल्ला, पकवान कौन खिलायेगा? आप सोचिये, ये अब चला जा रहा है। मेरे सिंधी परिवारो में से ये सब चीजे नष्ट हो रही है। क्या ये हमारी जिम्मेवारी नहीं हैं कि हम इन विरासत को बचायें? मैं कई बार मेरे मित्रों से कहता हूँ कि भईया, अहमदबाद में कभी तो सिंधी फूड फेस्टीवल करो। ये नरेन्द्र सारी दुनिया को खिलाता है लेकिन वो सिंधी खाना नहीं खिलाता है। मैंने कहा न कि मुख्यमंत्री के नाम पर नहीं, अपनों के नाते आप के बीच बातें कर रहा हूँ। क्योंकि मैं इतना मिलजुल कर के आप लोगों के बीच पला बड़ा हूँ, इसलिए मुझे पता है। आप युवा पीढ़ी को जा के कहिये, उसे पूछिये कि सिंधी परंपरा का पहनाव क्या था? क्या पहनते थे? दुनिया बदली है, काफी वेस्टर्नाइज़ेशन आप के अन्दर घुस गया हे, मुझे क्षमाँ करना। सिंधी भाषा मे बोलनेवाले परिवार कम होते जा रहे है। माँ-बेटा भी अंग्रेज़ी में बोल रहे हैं। मित्रों, दुनिया के अंदर अपनी मातृभाषा, अपना रहन-सहन, अपना पहेनाव इसको जो संभालता है, वो उसमें फिर से एक बार जान भरने की ताकत रखता है। और एक समाज के नाते जो आप भटके हुए हैं, तो मेरी एक प्रार्थना होगी कि एक बार संकल्प करके जायें कि हमारे घर में हम सिंधी क्यों न बोलें। हम अमरीका में हों, हम हाँगकाँग में रहते हों, हम चाइना गये हों, कहीं पर भी गये हों... क्यों न बोलें? और सिंधी भाषा की, अपनी भाषा की इक ताकत होती है। मुझे अडवाणीजी एक बार सुना रहे थे, बेनजीर भुट्टो यहाँ आई थी, तो उनकी फॉर्मल मीटिंग थी, सारे प्रोटोकॉल होते हैं, लेकिन जैसे ही अडवाणीजी को देखा, बेनजीर सिंधी में चालू हो गई और पूरे माहोल में उन दोनों के बीच में इतना अपनापन था, इतनी खुल कर के बातें हो रही थी... अब देखिये, ये भाषा की कितनी ताकत होती है अगर हम उसको खो देंगे... व्यवसाय के लिये अंग्रेजी की जरूरत होंगी तो ज़रूर इस्तेमाल किजिये, ओर दस भाषायें सीखें, कौन मना करता है? सीखनी भी चाहिये, ये हमारे सुरेशजी के साथ आप बैठिये, वो गुजराती बोलेंगे तो पता नहीं चलता कि वो एक सिंधी भाषा भी जानते होंगे, इतनी बढ़िया गुजराती बोलते हैं। बहुत अच्छी गुजराती बोलते हैं वो, एक शब्द इधर उधर नहीं होगा। मैं प्रसन्न हूँ इस बात से। लेकिन ये मेरे मन में है, यहाँ देखिये ये सिंधी सम्मेलन है, किसी के भी शरीर पर सिंधी कपडे नहीं हैं। इसे आप आलोचना मत समझिये, भईया, इसे आप आलोचना मत समझिये। ये आप की विरासत है, आप की ताकत है, आप इसको क्यों खो रहे हो? मुझे दर्द हो रहा है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि कभी तो ऐसा हो कि सब सिंधी पहनावे में आयें। देखिये, मॉरिशस में १५०-२०० साल पहले हमारे लोग गये थे। मजदूर के नाते गये थे, मजदूर भी नहीं गुलाम के नाते गये थे। उनको हथकड़ियाँ पहना करके जहाजों मे डाल डाल के ले गये थे। लेकिन वो जाते समय अपने साथ रामायण ले गये, तुलसीकृत रामायण, और उनके पास कुछ नहीं था। मॉरिशस में गये, दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहाँ वो गये, यह एक सहारा था उनके पास। आज २०० साल के बाद भी आप जायें, बहुत सारी चीज़ों का बदलाव आया होगा तो भी एक उस रामायण अपने पास होने के कारण इस मिट्टी के साथ उनका नाता वैसा का वैसा रहा है। उन्होनें अपने नाम नहीं बदले हैं, उन्होनें रामायण की चौपाई का गान अविरत चालू रखा है और उसी के कारण उनका नाता... वरना २०० साल में कितनी पीढ़ीयां बदल जाती हैं। यहाँ तो वो लोग मौजूद हैं जिसने वह सिंधु संस्कृति को भी देखा है और बाद मे वह बुरे दिन भी देखे हैं और बाद में हिंदुस्तान में आकर अपना नसीब अजमाया, पूरी पीढ़ी मौजूद है। लेकिन ५० साल के बाद कौन होगा? कौन कहेगा कि तुम्हारे पूर्वजों के पराक्रम वहाँ हुआ करते थे, कौन कहेगा? और इसलिए भाईयों-बहनों, मेरा मत है, वो समाज, वो जाति, वो देश जो इतिहास को भूल जाता है, वो कभी भी इतिहास का निर्माण नहीं कर सकता है। इतिहास वही बना सकते हैं जो इतिहास को जीना जानते हो। जो इतिहास को दफना देते है, वो सिर्फ चादर औढाने से ज्यादा जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते। और इसलिए एक ऐसी महान विरासत जिसके आप संतान हैं, उसको बचाइये, इसको प्यार किजिये। और अगर हम अपनी विरासत को प्यार न करें तो हम कैसे चाहेंगे कि हमारा पडोसी हमारी विरासत को प्यार करे? और ये जजबा किसी के खिलाफ नहीं होता है। हम अपनी अच्छाइयों पर गर्व करें इसका मतलब किसी के लिये दु:ख होने का और किसी का बुरा दिखाने का कोई कारण नहीं होता है। हमें गर्व होना चाहिये, कितना उज्जवल इतिहास है..!

प लोगों को कच्छ में जाने का अवसर मिले तो जरूर जाइये। आपने कथा सुनी होंगी, कच्छ के अंदर ४०० साल पहले एक मेकण दादा करके हुआ करते थे। हिंगलाज माता के दर्शन के लिये लोग जाते थे और रण के अंदर पानी के अभाव के कारण कभी कभी रण में ही मर जाते थे। और यात्री भी बड़ा कष्ट उठा कर के रण को पार करत्ते हुए हिंगलाज माता के दर्शन के लिये सिंध की ओर जाते थे। तो वो अपने पास एक गधा और एक कुत्ता रखते थे और वो ऐसे ट्रेइन्ड थे की वो रण में देखते थे कि कहीं कोइ मनुष्य़ परेशान तो नहीं है। वो गधा और कुत्ता रण में जा करके पानी पहुंचाते थे और जरूरत पडी तो उसको उठा करके वहाँ ले आते थे। और वो नसीबवाले थे कि उस रेगिस्तान के किनारे पर उनके पास एक कुंआ था जिसमें शुध्ध मीठा पानी रहता था, आज भी मौजूद है, कभी जाएं तो आप। भूकंप में वो जगह खत्म हो गई थी, हमने फिर से उसको दुबारा बनाया है, दुबारा उसको बनाया है। ४०० साल पहले मेकण दादा ने जो लिखा था वो आज भी उपलब्ध है, उसने एक बात लिखी थी कि एक दिन ऐसा आयेगा... एक इन्सान ४०० साल पहले लिख के गया है, सिंध और गुजरात की सीमा पर बैठा हुआ चौकीदार था, वो मेकण दादा लिखकर गये हैं कि एक दिन ऐसा आयेगा जब सिंधु, सरस्वती और नर्मदा तीनो एक होंगे। तब किसने सोचा था की नर्मदा पर सरदार सरोवर डेम बनेगा और सरदार सरोवर से नर्मदा का पानी सिंध के किनारे तक पहुंचेगा, किसने सोचा था? और आप लोगों को जानकारी होगी, सिंधु नदी में अब बाढ़ आती है तो पाकिस्तान के उस छोर पर समुद्र के पहले एक डेम बना हुआ है, तो सिंधु का पानी ओवरफ्लो होता है और ओवरफ्लो होता है तो अधिकतम पानी हमारे रेगिस्तान में, हिंदुस्तान में गुजरात की तरफ आता है। और वो जगह आप देखें तो मीलों चौड़ा पट है, जहाँ ये पानी आता है लेकिन दुर्भाग्य ये है की वो खारा, नमकीन एकदम समुद्र जैसा पानी हो जाता है, काम में नहीं आता है। लेकिन मैं रेगिस्तान में जहाँ वो पानी आता है, उस जगह के दर्शन करने के लिये गया था और बाद में मैंने भारत सरकार को चिठ्ठी लिखी थी की क्या पाकिस्तान से बात नहीं हो सकती है? कि जो ये फ्ल्ड वोटर है, जो ये समुद्र में जाता है उसको अगर केनाल से इस तरफ ले आयें तो मेरे मेकण दादा का जो सपना था, सिंधु, सरस्वती, नर्मदा को इकठ्ठा करना, हम कर के दिखायेंगे। मित्रों, ये विरासत है जिस पर हमें गर्व होना चाहिये, और हमें उसके साथ जुडना चाहिये।

भाईयों-बहनों, मैं इस समाज का आदर करता हूँ इसका एक कारण और भी है। आप कल्पना कर सकते हो कि १९४७ के वो दिन कैसे होंगे, जब देश का विभाजन हुआ, सब कुछ उजड गया, सब कुछ तबाह हो गया और ईश्वर के भरोसे आप यहाँ आये थे। क्यों आये थे? आप यहाँ क्यों आये थे, मित्रों? कुछ लेने के लिये, कुछ पाने के लिये? क्या नहीं था आपके पास? आप इसलिए आये की इस मिट्टी को आप प्यार करते थे, इस महान विरासत को आप प्यार करते थे। आप आपके पूर्वजों की इस महान संस्कृति छोडने को तैयार नहीं थे, इसलिए आपने कष्ट झेले हैं। क्या ये स्पिरिट आपके बच्चों में पर्कोलेट हो रहा है? अगर नहीं होता है तो कमी हमारे पूर्वजो की नहीं है, कमी हमारी वर्तमान पीढ़ी की है और इसलिए गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। मित्रों, मैं बचपन में मेरे गाँव में एक सिंधी सज्जन को देखा करता था। उस समय उनकी आयु में तो छोटा था, उस समय उनकी आयु करीब ६०-६५ साल होंगी। आर्थिक स्थिति बड़ी खराब थी उनकी... पूरा चेहरा मुझे आज भी बराबर याद है। एकदम दुबला पतला शरीर, कपडों का कोई ठिकाना नहीं, वो बस स्टेशन पर हमेशा दिखते थे और अपने हाथ में पापड या चोकलेट या बिस्कीट पैसेन्जर को एक ट्रे जैसा रखते थे और बेचते थे। मैं जब तक मेरे गाँव में रहा तब तक वो जिंदा थे और मैंने हमेशा उनको यही काम करते देखा। वो एक द्रश्य मेरे मन को आज भी छूता है। कितनी गरीबी थी उनकी, इतनी कंगालियत से जीवन गुजारते थे, शरीर भी साथ नहीं देता था। मेरा गाँव छोटा था, वहाँ बिस्किट कौन खायेगा? चोकलेट कौन खायेगा? कौन खर्चा करेगा? लेकिन उसके बावजूद भी अपने व्यावसायिक स्पिरिट के साथ बस स्टेशन पे जा के खडे हो जाते थे, कुछ बेचकर के कुछ कमाने की कोशिश करते थे लेकिन मैने कभी भी उनको भीख मांगते हुए देखा नहीं। बहुत कम समाज होते हैं जिसमे ये ताकत होती है। और सिंधी समाज के अंदर जीनेटिक्स सिस्टम मे ताकत पडी है, स्वाभिमान की। वो कभी भीख नहीं माँगते..! आप उस विरासत के धनी हैं। ये परंपरा अपने बच्चों पर कैसे पहुंचे, उन लोगों को हम कैसे तैयार करें?

मित्रों, व्यावसायिक क्षमता। हमारे गोपालदास भोजवानी यहाँ बैठे हैं, जब मैं छोटा था तो हम कभी कभी उनकी दुकान पर जा कर बैठा करते थे। तो एक बात हमारे ध्यान में आई थी, आज वो परंपरा है कि नहीं वो मुझे मालूम नहीं। लेकिन मैं
सोश्यो-इकनॉमिक द्रष्टि से कई लोगों के सामने अपने विषय को रख चुका हूँ, कई जगह पर बोला हूँ। अब वो परंपरा है कि नहीं, मुझे मालूम नहीं पर उस समय तो मैंने अपनी आंखो से देखा है। कोई भी सिंधी युवक या कोई व्यक्ति अपना नया व्यवसाय जब शरू करता था तो यार, दोस्त, रिश्तेदार सब उदघाटन के समय आते थे, उसको एक लिफाफा देते थे। उस लिफाफे पर कुछ लिखा हुआ नहीं होता था, लेकिन उसमें कुछ न कुछ धन हुआ करता था, पैसे होते थे। और जो भी आता था उसको देता था। मैने जरा बड़ी बारीकी से पूछा कि ये क्या चल रहा है? तो मेरे ध्यान मे आया की ये परंपरा है समाज में, कि कोई भी एसा नया व्यवसाय करता है तो समाज के लोग मिलने आते हैं और उनको कुछ न कुछ पैसे देते हैं, जो उनको बिजनेस करने के लिए पूंजी के रूप में काम आते हैं। और बाद में कहीं ऐसा अवसर हो तो खुद भी अपने तरीके से जाकर के देके आता है। लेकिन देनेवाले का नाम नहीं होता है। मित्रों, ये जो परंपरा मैने देखी है, अपने ही स्वजन को, अपने ही जाति के व्यक्ति को व्यावसायिक क्षेत्र में अपने पैरो पर खड़ा करने के लिये कितना बढिया सोशल इकोनोमी का कन्सेप्ट था। ये अपने आप में शायद दुनिया में बहुत रेरेस्ट है। हमारे यहाँ शादियों मे होता है, कि शादियों मे इस प्रकार से देते हैं तो शादी के समय खर्च होता है तो चलो, उस परिवार को मदद हो जायेगी, उनका काम निकल जायेगा। लेकिन व्यवसाय मे ये परंपरा मैं सिंधी परिवारो की दुकानों के उदघाटन में जब जाया करता था तब देखता था। और उसमे मुझे लगता है की सोशल इकोनोमी की कितनी बढिया थिंकिंग हमारे पूर्वजों ने बढ़ा कर के हमको दी है..! कोई भी, कोई भी डूबेगा नहीं, हर कोई उसे हाथ पकडकर के उपर लाने की कोशिश करेगा, ऐसी महान परंपरा रही है।

मैं अभी श्रीचंदजी को पूछ रहा था की सिंधी टी.वी. चेनल है क्या कोई? मुझे तो मालूम है, मैंने उनको क्यूं पूछा होगा वो आप को मालूम होना चाहिये ना? मुझे तो मालूम है... नहीं, छोटा मोटा कार्यक्रम होना अलग बात है, वो पूरी चेनल नहीं है, छोटे कार्यक्रम चलते हैं। नहीं, मैने सही जगह पर सवाल पूछ लिया था। अब उन्होंने कहा है कि जमीन दीजिये। वो व्यापारी आदमी है, ये हमारा डिवैल्यूऐशन क्यों कर रहे हो, हिन्दूजाजी? पूरा गुजरात आपका है, मेरे भाईयों-बहनों, पूरा गुजरात आपका है। पूरा गुजरात आपके हवाले है, मौज किजिये..! लेकिन मुंबई से हमारे कुछ बंधु, शायद यहाँ आये होंगे तो, नारायण सरोवर के पास एक ऐसा ही सिंधु सस्कृति परंपरा का कल्चरल सेन्टर बनाने के लिये मुंबई के ही हमारे कुछ मित्र आगे आये हैं और उनको हमने जमीन दी है, बहुत बड़ी मात्रा में। और नारायण सरोवर, यानि एक प्रकार से आज के भारत का वो आखरी छोर है और पाकिस्तान की सीमा के पास पडता है, वहाँ एक काफी अच्छा एक कल्चरल सेन्टर बनेगा, उस दिशा मे काम चल रहा है, उसका लाभ होगा, बहुत बड़ा काम उसके कारण होनेवाला है। जी हाँ, बैठे हैं यहाँ पर... वो काम काफ़ी अच्छा होगा, मुझे विश्वास है।

प लोग गुजरात के विषय में भलीभांति इस बात को जानते हैं कि गुजरात ने काफ़ी तरक्की की है, प्रगति की है। सब को भोजन करना होगा न, कि गुजरात की कथा सुनाएं..? आवाज़ नहीं आ रही है। हाँ, सिंधी बहुत देर से खाना खाते हैं, मैं भी कभी जब दिन भर काम करता था और देर हो जाये तो आप के ही वहाँ खाना खाता था, मैं सिंधी घर में जाता था, कुछ न कुछ मिल जाता था। नहीं, आज की डेट में तो जरूर खा लीजिये। देखिये, बाइ ऐन्ड लार्ज गुजरात की छवि ये रही है कि हम एक ट्रेडर्स स्टेट थे और ट्रेडर्स स्टेट के नाते` हम लोग क्या करते थे? एक जगह से माल लेते थे, दुसरी जगह पे देते थे, और बीच में मलाई निकाल लेते थे। यही था, व्यापारी लोग क्या करेंगे? उसमें से उसका ट्रान्सफोर्मेशन हुआ। आज गुजरात इन्डस्ट्रीअल स्टेट बना है। और इस इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में गुजरात ने जो प्रगति की ऊंचाईयों को पार किया है, अगर कोई गुजरात को एक सैम्पल के रूप में देखें तो उसको विश्वास हो जायेगा कि अगर गुजरात में हो सकता है तो पूरे हिंदुस्तान मे भी हो सकता है और हमारा देश महान बन सकता है। क्योंकि हम वो ही लोग हैं, हिंदुस्तान के कोने कोने में हम एक ही प्रकार के लोग हैं। वो ही कानून है, वो ही व्यवस्था है। तरक्की हो सकती है और प्रगति कर सकते हैं, ये गुजरात ने उदाहरण दिया है।

क समय था, हमारे १६०० कि.मी. के समुद्र किनारे को हम बोझ मानते थे। हम मानते थे अरे भाई, यहाँ क्या होगा? ये पानी, ये खारा पानी, पीने के लिये पानी नहीं... गाँव छोड छोड करके, कच्छ और सौराष्ट्र के लोग गाँव छोड छोड करके चले जाते थे। गाँव के गाँव खाली होते थे। हमने उसे बोझ माना था। मित्रों, हमने आज उस समुंदर को ओपर्च्युनिटी में कन्वर्ट कर दिया है। कभी जो बोझ लगता था उस को हमने अवसर में पलटा और १६०० कि.मी. के समुद्र किनारे पर ४० से अधिक बंदर, एक पूरा नेट्वर्क खड़ा किया है। और पूरे हिंदुस्तान का टोटल जो कार्गो है, प्राइवेट कार्गो, उसका ८५% कार्गो हेन्डलिंग गुजरात के समुद्र किनारे पर होता है।

च्छ। २००१ में भयानक भूकंप आया, ऐसा लगता था की अब गुजरात खत्म हो जायेगा। और वो भीषण भूकंप था, १३,००० से अधिक लोग मारे गये थे, लाखों मकान ध्वस्त हो गये थे, सारा इन्फ्रास्ट्रक्चर खत्म हो चुका था। स्कूल, कोलेज कुछ नहीं, अस्पताल तक नहीं बचे थे। ईश्वर ऐसा रूठा था जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। एक प्रकार से गुजरात मौत की चादर ओढ़ कर के सोया था और सारा देश मानता था कि अब गुजरात खड़ा नहीं होगा। मित्रों, वर्ल्ड बैंक का रिकॉर्ड कहता है की समृद्ध देश को भी भूकंप जैसी आपदा के बाद बहार निकलना है तो ७ साल लग जाते हैं, मिनिमम ७ साल। मित्रों, गुजरात ३ साल के भीतर भीतर दौडने लग गया। एक समय था जब कच्छ का ग्रोथ नेगेटिव था, ईवन पोप्युलेशन भी। लोग बाहर चले जाते थे, जनसंख्या कम होती जा रही थी। आज कच्छ जो २००१ में मौत की चादर ओढ़ के सोया था, वो आज हिंदुस्तान का फास्टेस्ट ग्रोइंग डिस्ट्रिक्ट है, फास्टेस्ट ग्रोइंग इन दस साल में कच्छ के अंदर २० कि.मी. के रेडियस में, मुंद्रा के आसपास २० कि.मी. के रेडियस में, ८००० मेगावॉट बिजली का उत्पादन का काम शरू हो चूका है, यानि बिजली पैदा होना शुरु हो गई है। विदिन २० कि.मी. रेडियस। हिंदुस्तान के कई राज्य होंगे की पूरे राज्य के पास ८००० मेगावॉट बिजली नहीं होंगी। यहाँ २० कि.मी. के रेडियस में ८००० मेगावॉट बिजली का उत्पादन..! अंजार के पास १५ कि.मी. रेडियस में स्टील पाइप का उत्पादन होता है और दुनियाँ की सबसे ज्यादा स्टील पाइप मॅन्युफेक्चरिंग इस १५ कि.मी. रेडियस में अंजार में होगा।

मित्रों, गुजरात एक ऐसा प्रदेश है जिसके पास रॉ मटिरियल नहीं है, माइन्स और मिनरल्स हमारे पास नहीं है, आयर्न ऑर हमारे पास नहीं है... लेकिन स्टील का सबसे ज्यादा उत्पादन हम करते हैं। हमारे पास डाइमंड के खदान नहीं है, लेकिन दुनिया के अंदर १० में से ९ डाइमंड हमारे यहाँ तैयार होते हैं। दुनिया की कोई नटी ऐसी नहीं होगी जिसके शरीर पर डायमंड हो और मेरे गुजराती का हाथ न लगा हो। ईश्वर ने हमें नहीं दिया, हमें वो सौभाग्य नहीं मिला, हमारे पास नहीं है। हमारे पास कोयला नहीं है, हमारे पास पानी नहीं है, उसके बाद भी हिंदुस्तान में गुजरात एक अकेला ऐसा राज्य है जो २४ अवर्स, २४x७ बिजली घर घर पहुंचाता है, २४ घंटे बीजली मिलती है। मेरे यहाँ कभी ५ मिनट भी बिजली चली जाये न, तो बहुत बड़ी खबर बन जाती है कि मोदी के राज्य में आज ५ मिनट अंधेरा हो गया..! हिंदुस्तान के और राज्य ऐसे है की जहाँ बिजली आये तो खबर बनती है कि मंगल को बिजली आयी थी..! मित्रों, विकास के पैमाने में इतना बड़ा फर्क है।

फार्मास्युटीकल दुनिया में, करीब ४५% दवाईयों का उत्पादन गुजरात मे होता है। दुनिया के हर देश में हम उसे एक्सपॉर्ट करते हैं। अब हम केमिकल की दुनियाँ में थे, आप लोगों को कभी दहेज जाने का अवसर मिले, हिंदुस्तान का एकमात्र लिक्विड केमिकल का पोर्ट है हमारे पास और एक नया एस.आई.आर. जहाँ बना है हमारा, दहेज में। शंघाई की बराबरी कर रहा है, उसकी तुलना होती है, शंघाई जैसे दहेज के केमिकल पोर्ट हैं हमारे और एस.आई.आर. अब वहाँ बन रहा है। तो हमारी गुजरात की पहचान ज्यादातर केमिकल के प्रोडक्शन की दुनिया में थी, अब उसमें से हम इंजीनीयरिंग फिल्ड मे गये हैं। और जब ‘नैनो’ यहाँ आयी तो दुनिया को पहली बार पता चला कि गुजरात नाम की भी कोई जगह है, वरना कोई जानता नहीं था। और मित्रों, नैनो तो अभी अभी आई है और परिणाम ये हुआ है की शायद गाड़ियों की कंपनीयों के जितने जाने-माने नाम हैं, वो सारी की सारी गुजरात मे आ रही हैं। आनेवाले दिनों में हम ५ मिलियन कार्स बनायेंगे गुजरात में, ५ मिलियन कार्स। आप कल्पना कर सकते हैं कि यहाँ ईकोनोमी किस प्रकार से काम करती होगी, किस तेजी से हम लोग आगे बढ़ते होंगे..! औद्योगिक विकास के अंदर हमने एक और क्षेत्र में पदार्पण किया है।

पूरा विश्व ग्लोबल वॉर्मिंग की चर्चा कर रहा है, क्लाइमेट चेन्ज की चर्चा कर रहा है। दुनिया मे चार सरकार ऐसी है जिसका अपना क्लाइमेट चेन्ज डिपार्टमेन्ट है और सरकार उस हिसाब से काम करती है। पूरे विश्व मे चार, उस चार में एक सरकार है, गुजरात की सरकार। हमारा अलग क्लाइमेट चेन्ज डिपार्टमेन्ट है और हम एन्वायरमेन्ट फ्रेन्ड्ली डेवलपमेन्ट पर बल दे रहे हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि गुजरात जिस प्रकार से तरक्की कर रहा है, तो मानव जीवन की भी रक्षा होनी चाहिए और दोनों का मेल होना चाहिये। और उसमे हमने इनिश्येटीव लिया है, सोलार एनर्जी का। मित्रों, मैं बड़े गर्व के साथ कहता हूँ कि आज गुजरात दुनिया का सोलार कैपिटल’ बन गया है, वी आर दी वर्ल्ड कैपिटल ऑफ सोलार एनर्जी। आनेवाले दिनों में सोलार एनर्जी के क्षेत्र में, सोलार एनर्जी इक्वीपमेन्ट मेन्युफेक्चरिंग के क्षेत्र में, हमारा रुतबा रहने वाला है और भविष्य में हम इसको और आगे बढ़ाने वाले हैं। रूफ-टॉप सोलार सिस्टम के लिये हम पोलिसी ला रहे हैं। जो भी मकान बनायेगा, उस के छत पे सोलार सिस्टम होगी, सरकार उसके साथ बिजली खरीदने के लिये तय करेगी क्योंकि दुनिया मे जिस प्रकार से पेट्रोलियम के दाम और कोयले के दाम बढ़ते जा रहे हैं, तो बिजली का बहुत बड़ा संकट पैदा हो सकता है। और मित्रों, मैं विश्वास से कहता हूँ, कितना ही संकट क्यों न आये, गुजरात इस संकट से बच जायेगा। और एनर्जी के बिना विकास रूक जायेगा, जहाँ भी ये संकट होगा, विकास रूक जायेगा। लेकिन हमने इसके लिये काफी सोच कर काम किया है। हम बायोफ्युअल में बहुत काम कर रहे हैं इन दिनों। और मित्रों, बायोफ्युअल में काम कर रहे हैं तो एक दिन ऐसा आयेगा कि आज हम खाड़ी के तेल पर जिंदगी गुजार रहे हैं, एक दिन ऐसा आयेगा कि झाड़ी के तेल से हमारा काम चल जायेगा। बायोफ्युअल होगा तो खेत में तेल पैदा होगा। हम उस दिशा में बहुत बड़ी मात्रा में काम कर रहे हैं और एक मंत्र ले कर के चल रहे हैं कि अब खाड़ी का तेल नहीं झाड़ी का तेल चाहिये। उस दिशा में हम काम कर रहे हैं, उससे बहुत बड़ा बदलाव आने वाला है, ऐसी स्थिति बनने वाली है।

मित्रों, एक जमाना ऐसा था की हमारे ४००० गाँव ऐसे थे कि जहाँ फरवरी महिने के बाद करीब ६ महिने तक टैंकर से पानी जाता था। जब तक टैंकर गाँव मे नहीं आता था, पीने का पानी उपलब्ध नहीं होता था। ये हालत गुजरात की इस इक्कीसवीं सदी में २००१-०२ मे थी। हमने नर्मदा योजना की पाइप लाइन से पीने का पानी गाँव मे पहुंचाने की योजना बनाई और १४०० कि.मी. पाइप लाइन हमने ७०० दिनों में लगा दी, ७०० दिनों में १४०० कि.मी. पाइप लाइन। हमारे देश मे आदत ऐसी है की एक शहर के अंदर २ इंच की पाइप लगाते है तो भी ३-३ साल तक, ४-४ साल तक काम चलता है और गढ्ढे वैसे के वैसे होते हैं। क्यों? तो बोले पानी की पाइप लाइन लगानी है। हमने ७०० दिनों में १४०० कि.मी. पाइप लाइन लगाई और पाइप की साइज़ ऐसी है कि आप परिवार के साथ मारूती कार में बैठ कर उस पाइप में से गुजर सकते हैं, उस साइज की पाइप है। ७०० दिनों में १४०० कि.मी. पाइप लाइन। गुजरात अकेला राज्य है देश मे जहाँ २२०० कि.मी. का गैस ग्रिड है। मेरे यहाँ घरों में किचन में टेप से गैस मिलता है, बोटल, सिलिन्डर की जरूरत नहीं पडती। कई शहरों में हुआ है, और भी अनेक शहरों में आगे बढ़ने वाला है। यानि हमने इन्फ़्रास्ट्रक्चर के नये रूप को पकडा है। पहले इन्फ़्रास्ट्रक्चर का रूप होता था कि कोई रोड बन जाये, बस स्टोप बन जाये, धीरे धीरे आया कि रेल्वे स्टेशन हो जाये, थोडा आगे आये तो एअरपोर्ट हो जाये... हमारे इन्फ़्रास्ट्रक्चर की सोच इक्कीसवीं सदी को ध्यान मे रखते हुए गैस ग्रिड, पानी की ग्रिड... उस दिशा में है। और दूसरा एक काम हमने जो किया है, वो है ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क। हम दुनिया मे ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क की लैंथ के संबंध में दुनिया में नं. १ पर हैं। और मित्रों, मानव संस्कृति की विकास यात्रा जो रही है इसमे बहुत बड़ा बदलाव आया है। एक जमाना था, जहाँ नदी होती थी, वहाँ मानव संस्कृति का विकास होता था। फिर एक बदलाव आया, जहाँ से हाईवेज गुजरते थे उसके बगल में मानव संस्कृति विकास करने लग जाती थी। अब तो लोग मंदिर भी बनाते हैं तो हाईवे के पास बनाते हैं, ताकि क्लायन्ट को तकलीफ न हो। लेकिन वक्त बदल रहा है मित्रों, अब जहाँ से ऑप्टिकल फायबर गुजरता होगा, वहीं पर मानव वस्ती रहने वाली है। और गुजरात एक ऐसा स्टेट है जहाँ दुनिया में लैंथ वाइज़ सब से बड़ा ऑप्टिकल फायबर नेटवर्क है। पिछले बजट के अंदर, २०११-१२ के बजट में, भारत सरकार ने अपने बजट में कहा कि वे हिंदुस्तान में ३००० गाँव में ब्रॉड बैंड कनेक्टिविटी का पायलट प्रोजेक्ट करेंगे। ये दिल्ली की भारत सरकार थी, यहाँ कोई किसी दल से जुड़े मित्र हों तो मुझे क्षमा करना, मैं किसी दल की आलोचना नहीं करता हूँ। लेकिन भारत सरकार ने ये घोषणा की थी बजेट के समय कि ३००० गाँव मे ब्रॉड बैंड कनेक्टिविटी का पायलट प्रोजेक्ट करेंगे। भाईयों-बहनों, आपको ये जानकर आनन्द होगा कि गुजरात के १८,००० गाँव में तीन साल से ब्रॉड बैंड कनेक्टिविटी है और उसके कारण आज मैं मेरे गांधीनगर से किसी भी गाँव में वीडियो कॉन्फरन्स से बात कर सकता हूँ, हम गाँव के दूर सूदूर स्कूलों के अंदर लॉंग डिस्टन्स एज्युकेशन से पढ़ा सकते हैं, एक अच्छा टीचर गांधीनगर में बैठ कर के ५०० कि.मी. की दूरी के गाँव की स्कूल के बच्चों को पढ़ा सकता है, ये नेटवर्क गुजरात में है..!

म तौर पर राज्य केन्द्र से कुछ न कुछ माँगते रहते हैं। हमेशा अखबार में आता रहता है कि रोड के लिये माँग की, फलाने के लिये माँग की, अस्पताल के लिये पैसे माँगे, गेहूँ ज्यादा माँगे, कहीं आता है कि नमक हम को दो, ये भी आता है... तो ये है हमारे देश में। लेकिन गुजरात क्या माँगता है? गुजरात का माँगने का दायरा ही कुछ और है। मैंने एक साल पहले प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखी थी। मैंने कहा साहब, हमारे सेटलाइट इतने हैं, मुझे ये सेटलाइट का उपयोग करने का अधिकार दिजिये, ये चिठ्ठी लिखी थी मैंने। क्योंकि मेरे यहाँ टेक्नोलोजी का इतना उपयोग हो रहा है कि मुझे इस नेटवर्क की आवश्यकता है। और मित्रों, मुझे खुशी है कि तीन दिन पहले भारत सरकार ने हमें सेटलाइट में से एक ट्रांसपोंडर, यानि ३६ मेगा हर्ट्ज़, इतनी यूटिलिटी का हमें अधिकार दिया है। आज मेरे यहाँ लॉंग डिस्टन्स के लिये एक चेनल चला पाता हूँ, अब मैं चौदह चेनल चला पाउंगा, चौदह। आप कल्पना कर सकते हैं कि विकास को किस ऊँचाइयों और किस दायरे पर मैं ले जा रहा हूँ..! हमारे यहाँ कितने बड़े कैन्वस पर काम हो रहा है। मैंने कुछ ही चीज़ों की आप को थोड़ी झलक दी है।

मित्रों, हम कुछ काम ऐसे करते हैं जिनको सुनकर के आप को हैरानी होगी। इस दस साल में गुजरात में मिल्क प्रोडक्शन में ६०% ग्रोथ है, केन यू इमेजिन? ६०% ग्रोथ है। और उसके पीछे जो मेहनत की इसका परिणाम आया है। हमारे यहाँ पशु आरोग्य मेला हम करते हैं। और किसी पशु को ३ कि.मी. से ज्यादा जाना न पडे, क्योंकि जब बीमार पशु को उस से ज्यादा ले जाना क्राइम है, ईश्वर का अपराध है। तो हम करीब ३०००-३५०० केटल कैम्प लगाते हैं, उनकी हेल्थ के चेक-अप के लिये। और ये हम लगातार करते हैं पिछले सात साल से। और वेक्सीनेशन, दवाईयां, उसकी देखभाल... इसका परिणाम यह हुआ है कि आम तौर पर जैसे ठंड ज्यादा हो गयी तो हमें ज़ुकाम हो जाता है, बारिश ज्यादा हो गयी तो हमें ज़ुकाम हो जाता है, वैसे पशु को भी होता है। कुछ डिज़ीज़ ऐसे होते हैं कि थोडा सा भी वेदर चेन्ज होगा तो पशु को भी हो जाता है। लेकिन रेग्युलर देखभाल के कारण मेरे राज्य में से ११२ डिज़ीज़ ऐसे थे, वो आज टोटली इरेडिकेट हो गये, खत्म हो गये मेरे राज्य से और इसका पशु की हेल्थ पर बहुत बड़ा प्रभाव हुआ। इतना ही नहीं, हम पशु की केयर कैसी करते हैं..? हमारे यहाँ मोतीया बिंदु का ऑपरेशन होता है, कैटरेक्ट का ऑपरेशन होता है और कुछ गरीब इलाक़ों में तो लोग चेरिटी के नाते नेत्र यज्ञ करते हैं और गरीब लोगों को मुफ्त में नेत्रमणि लगाने का काम करते हैं। हम सब ने सुना है कैटरेक्ट ऑपरेशन का, नेत्रबिंदु के ऑपरेशन, नेत्रमणि का ऑपरेशन सुना है... आज पहली बार मैं आप को सुना रहा हूँ कि सारे विश्व के अंदर गुजरात अकेला राज्य ऐसा है जहाँ मैं केटल के कैटरेक्ट का ऑपरेशन करता हूँ। पशु के नेत्रमणि के ऑपरेशन मेरे राज्य मे होते हैं, मेरे राज्य मे पशु की डेन्टल ट्रीटमेन्ट होती है, इतनी बारीकी से केयर करने के कारण आज मिल्क प्रोड्क्शन मे हम यहाँ पहुंचे हैं। और मित्रों, जो यहाँ सिंगापुर से आये होंगे उन्हें मैं विश्वास से कहता हूँ कि आज अगर आप सिंगापुर में इंडियन स्टाइल की चाय पीते होंगे, तो लिख करके रखिये, दूध मेरे गुजरात का होगा। मित्रों, हमने एग्रीकल्चर सेक्टर में जो काम किया है, आज दुनिया के किसी भी देश में अगर भिंडी की सब्जी खाते हो, आप लिख कर रखना वो भिंडी मेरे बारडोली से आयी होगी। मित्रों, एक जमाना था जब गीर की केसर प्रसिद्ध थी। आज कच्छ की केसर, कच्छ जो रेगिस्तान था... कच्छ के अंदर मैंगो का उत्पादन होता है और आज मेरी कच्छ की केसर दुनिया के देशों मे एक्सपोर्ट होती है।

मित्रों, दस साल के भीतर भीतर क्या किया जा सकता है इसका सिर्फ एक छोटा सा सैम्पल मैने दिखाया है आप को, पूरी फिल्म देखनी होगी तो महीने भर की कथा लगानी पडेगी। सभी क्षेत्रों मे विकास हुआ है और विकास यहीं एक मंत्र है। और भाईयों-बहनों, सारी समस्याओं का समाधान विकास है, सारे संकटो का समाधान विकास है, उसी एक मंत्र को ले करके हम चल रहे हैं।

मुझे आप सब के बीच आने का अवसर मिला, मैं आप का आभारी हूँ। शुरू में जो मैंने बातें बतायी थीं, सिर्फ आपके प्रति अतिशय प्रेम होने के कारण, आपके प्रति मेरे मन मे भीतर से आदरभाव है उसी के चलते मेरी आप सब से फिर एक बार प्रार्थना है, इस महान परंपरा को नष्ट मत होने देना, इस संस्कृति को नष्ट मत होने देना। आप बच्चों में ये भाषा, ये संस्कार, ये खान-पान इस को जीवित रखने की कोई न कोई योजना हो जाये तो मैं मानता हूँ कि देश की बहुत बड़ी सेवा होगी।

 

हुत बहुत धन्यवाद..!

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Your Excellency, My Friend, Mister President,
दोनों देशों के delegates,
मीडिया के साथियों,
नमस्कार !

ताशकेंट में मेरे और मेरे delegation के जिस आत्मीयता से स्वागत हुआ, जिस गर्मजोशी से स्वागत हुआ इसके लिए मैं राष्ट्रपति जी और उज़्बेकिस्तान के जनता का ह्रदय से बहुत बहुत आभार व्यक्त करता हूँ।

उज़्बेकिस्तान की यह मेरी चौथी यात्रा है। यह हमारे संबंधों की निकटता, करीबी समन्वय और हमारी गहरी मित्रता को दर्शाता है।

पिछले लगभग एक दशक से मुझे राष्ट्रपति जी के साथ काम करने का सौभाग्य मिला है। इस दौरान मैं उन्हें दस से ज्यादा बार मिल चुका हूँ, मुझे मिलने का अवसर मिला है।

उनकी सकारात्मक और दूरदर्शी सोच, और निरंतर सीखते रहने की भावना वाकई बहुत ही प्रेरणादायक है। भारत के प्रति उनकी गहरी मित्रता और अटूट प्रतिबद्धता के लिए मैं उनका हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।

Friends,

Uzbekistan is at the heart of Central Asia, and at the heart of India’s engagement with the region.

भारत और उज़्बेकिस्तान की सोच और आकांक्षाओं में गहरी समानता है। “Yangi Uzbekistan” और “विकसित भारत 2047”, दोनों के केंद्र में youth, innovation, inclusive growth और modern technology हैं। इस साझा vision पर चलते हुए हम दोनों देशों के लोगों की भलाई के लिए काम कर रहे हैं।

इस वर्ष हमारी Strategic Partnership के 15 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस विशेष अवसर पर हमने संबंधों को Comprehensive Strategic Partnership का दर्जा देने का निर्णय लिया है। आज हमने हमारी साझेदारी के इस नए स्वरूप में तेज़ गति और ठोस परिणामों के साथ आगे बढ़ने का ambitious agenda तैयार किया है।

हमारा द्विपक्षीय व्यापार एक बिलियन डॉलर पार कर चुका है। अब हमने 2030 तक पाँच बिलियन डॉलर व्यापार का लक्ष्य रखा है। इसके लिए हम market access, connectivity, banking और payment से जुड़े विषयों पर व्यवस्थागत रूप से आगे बढ़ेंगे।

Infrastructure development में win-win सहयोग बढ़ाने के लिए हम मिलकर काम करेंगे। Digital Public Infrastructure, AI, critical minerals, clean energy, स्पेस और नूक्लीअर एनर्जी में सहयोग हमारे संबंधों को future-ready बना रहा है।

दोस्तों,

कृषि और स्वास्थ्य में हमारी ताकतें एक-दूसरे की पूरक हैं। उज़्बेकिस्तान के horticulture अनुभव और भारत की आधुनिक agricultural practices को जोड़कर हम दोनों देशों की खाद्य सुरक्षा में योगदान देंगे।

उज़्बेकिस्तान की medicinal herbs और भारत की आयुर्वेद एक्स्पर्टीज़ भी एक natural combination हैं। आज Traditional Medicine पर हुए समझौते से हमारे साझा प्रयासों को बल मिलेगा।

हमारा प्रयास है कि हमारी साझेदारी केवल दो राजधानियों तक सीमित न रहे। इसलिए हम अपने cities और states के बीच partnerships स्थापित करने जा रहे हैं। इन partnerships से urban management, industry, education, tourism और culture में direct connections निरंतर बढ़ते रहेंगे।

दोनों देशों के बीच करीबी रक्षा और सुरक्षा सहयोग हमारे गहरे आपसी विश्वास को दर्शाता है। आने वाले समय में हम दोनों देशों की defence industries के बीच direct linkages, co-production और co-development को बढ़ावा देंगे।

हमारा मानना है कि terrorism, extremism और separatism पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती हैं। इनके विरुद्ध zero tolerance हमारा साझा संकल्प रहा है, और आगे भी रहेगा।

दोस्तों,

हमारे संबंधों की सबसे गहरी जड़ें हमारी साझा विरासत में हैं। आज हमने इन्हें और मज़बूत बनाने पर विशेष बल दिया।

उज़्बेकिस्तान की Buddhist heritage sites के संरक्षण के लिए हम मिलकर काम करेंगे। दोनों देशों के युवाओं, विशेषकर students और professionals के बीच exchanges को बढ़ावा देना हमारी उच्च प्राथमिकता है। दोनों देशों के बीच टुरिज़म बढ़ाने के लिए आज Program of Cooperation पर सहमति बनी है। मुझे खुशी है कि उज़्बेकिस्तान में हिन्दी भाषा को promote करने के लिए आज हम Scholarships की घोषणा करने जा रहे हैं।

Sports भी हमारे सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम के रूप में उभर रहा है। पिछले वर्ष गोवा में बीस वर्षीय Uzbek Grandmaster सिंदारोव ने FIDE World Cup जीता। अब नवंबर में उनका मुकाबला भारत के बीस वर्षीय chess champion गुकेश के साथ होने वाला है। एक बिसात पर जब ये दो युवा सितारे आमने-सामने होंगे, तो ज़ाहिर है- इस मुकाबले पर पूरी दुनिया की नज़र होगी। अगले महीने समरकन्द में होने जा रहे Chess Olympiad के लिए भी मैं बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूँ। आने वाले समय में कुराश और कबड्डी जैसे traditional games भी हमारी स्पोर्ट्स साझेदारी को नई ऊर्जा देंगे।

आज की चर्चा ने हमारे संबंधों के भविष्य की एक स्पष्ट दिशा तय की है।

A stronger India-Uzbekistan partnership will be a powerful force for peace, progress and prosperity in Central Asia.

Excellency,

आपकी मित्रता और आज की सार्थक चर्चा के लिए एक बार फिर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

दो दिन बाद उज़्बेकिस्तान अपनी स्वतंत्रता की 35वीं वर्षगांठ मनाएगा। मैं 140 करोड़ भारतवासियों की ओर से आपको और सभी नागरिकों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद।