देश ने पहली लहर के सर्वोच्च स्तर को पार कर लिया है और विकास की दर पहले से बहुत तेज है : प्रधानमंत्री
अब हमारे पास बेहतर अनुभव और संसाधनों के साथ टीका भी है : प्रधानमंत्री
हमें परीक्षण, पता लगाने, उपचार करने, कोविड एप्रोप्रिएट बिहैवियर और कोविड प्रबंधन पर लगातार ध्यान देना है : प्रधानमंत्री
कोविड थकान के कारण हमारे प्रयासों में किसी भी तरह की शिथिलता नहीं आनी चाहिए : प्रधानमंत्री
अधिक ध्यान वाले जिलों में 45 वर्ष से ऊपर की आयु वाली जनसंख्या का शत प्रतिशत टीकाकरण होना चाहिए : प्रधानमंत्री
ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब की जयंतियों के बीच की अवधि (11-14 अप्रैल) में टीकाकरण पर्व के आयोजन का आह्वान किया

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कोविड-19 की स्थिति पर विचार-विमर्श किया हैI

इस अवसर पर केन्द्रीय गृहमंत्री ने कोविड के विरुद्ध लड़ाई में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी दी। उन्होंने देश में चलाए जा रहे टीकाकरण (वैक्सीनेशन) अभियान का भी विस्तृत विवरण दिया। केन्द्रीय स्वास्थ्य सचिव ने देश में कोविड-19 की स्थिति पर एक प्रस्तुतीकरण दिया जिसमें उन राज्यों पर ध्यान दिया गया है जहां इस समय संक्रमण से पीड़ित रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही हैI इसके साथ ही उन्होंने इन राज्यों में संक्रमण की जांच और परीक्षणों को बढाने की आवश्यकता पर जोर दियाI उन्होंने देश में वैक्सीन के उत्पादन और उसकी आपूर्ति के विवरण भी राज्यों से साझा किएI

मुख्यमंत्रियों ने इस वायरस के संक्रमण के विरुद्ध सामूहिक लड़ाई का नेतृत्व करने के लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद दियाI उन सभी ने अपने-अपने राज्यों में कोविड-19 की स्थिति का विवरण भी दियाI उन्होंने कहा कि सही समय पर टीकाकरण अभियान की शुरुआत होने से लाखों जिंदगियों को बचाया जा सका हैI टीका (वैक्सीन) लगवाने में हिचक और इसकी बर्बादी पर भी चर्चा हुई।

प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के समक्ष कुछ स्पष्ट तथ्यों पर जोर दियाI पहला, देश ने पहली लहर के सर्वोच्च स्तर को पार कर लिया है और विकास की दर पहले से बहुत तेज हैI दूसरा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब, मध्य प्रदेश और गुजरात सहित कई राज्यों ने पहली लहर के सर्वोच्च स्तर को पार कर लिया हैI कई अन्य राज्य इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह बहुत अधिक चिंता की बात है। तीसरा, इस बार लोग इसे बहुत हल्के में ले रहे हैं, और कुछ राज्यों में तो वहां का प्रशासन भी गंभीर नहीं है। ऐसी स्थिति में तजी से बढ़ रहे मामलों के कारण परेशानियां हो रहीं हैं।

हालांकि प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि चुनौतियों के बावजूद इस समय हमारे पास बेहतर अनुभव और संसाधनों के साथ- साथ वैक्सीन भी है। कड़ी मेहनत कर रहे चिकित्सकों और स्वास्थ्य देखरेख कर्मियों के साथ –साथ जन भागीदारी ने इस स्थिति को संभालने में बहुत योगदान दिया है और वे अभी भी इस काम में जुटे हुए हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा “हमें परीक्षण, पता लगाने, उपचार करने, कोविड उचित व्यवहार और कोविड प्रबंधन पर लगातार ध्यान देना है। प्रधानमंत्री ने इंगित किया कि इस वायरस पर नियंत्रण करने के लिए हमें मनुष्यों के संक्रमित होने को रोकना होगा और इसके परीक्षण और प्रसरण का पता लगाने की इस काम में बहुत बड़ी भूमिका होगी। अपनी बात का विस्तार करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि विभिन्न समुदायों में इस संक्रमण के प्रसार की सीमा का पता लगाने में इसकी जांच करना बहुत आवश्यक है, साथ ही हमें उन लोगों को भी चिह्नित करना होगा जो इस संक्रमण को आगे फैला सकते हैं। संक्रमण की दैनिक आधार पर की जा रही जांच को बहुत अधिक बढाने की आवश्यकता है ताकि इसके पुष्ट मामलों की संख्या को 05 प्रतिशत या इससे कम के स्तर तक घटाया जा सके। इसके लिए ऐसे कन्टेनमेंट जोन्स और क्षेत्रों में लक्षित एवं केन्द्रित परीक्षण पर ध्यान देना होगा जहां बड़ी संख्या में संक्रमित रोगी सामने आ रहे हैं। आरटी-पीसीआर परीक्षणों के लिए आवश्यक आधारभूत अवसंरचनाओं को बढ़ा कर कुल परीक्षणों में आरटी-पीसीआर परीक्षणों के हिस्सेदारी को कम से कम 70 प्रतिशत करने के महत्व पर भी जोर दिया गया।

यह अनुभव करते हुए कि पर्याप्त रक्षात्मक उपायों की अनुपस्थिति में प्रत्येक संक्रमित रोगी दूसरों को भी रोगग्रस्त कर सकता है, विभिन्न समुदायों में इस संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए अन्य लोगों का पता लगाने और उपचार के बाद फ़ॉलो-अप को एक महत्वपूर्ण क्रियाकलाप मानने पर भी चर्चा की गई। प्रधानमंत्री ने कहा कि प्राथमिकता के आधार पर पहले 72 घंटों के भीतर ही किसी भी संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आए हुए कम से कम 30 लोगों का पता लगाकर उनकी जांच करने के साथ ही उन्हें संगरोध (क्वारंटाइन) किया जाना आवश्यक है। इसी प्रकार कन्टेनमेंट जोन्स की सीमाएं सुस्पष्ट होनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘कोविड थकान’ के कारण हमारे प्रयासों में किसी भी प्रकार की शिथिलता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कन्टेनमेंट जोन्स में स्वास्थ्य मंत्रालय की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का पालन करने के लिए कहा। उन्होंने विस्तृत विश्लेषण के साथ इस संक्रमण से हो रही मौतों के समस्त आंकड़ों को सहेजने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने राज्यों से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एआईआईएमएस), दिल्ली द्वारा प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को आयोजित किए जाने वाले वेबिनार में भाग लेने के लिए कहा।

प्रधानमंत्री ने राज्यों से अनुरोध किया कि वे उच्च केन्द्रित जिलों में 45 वर्ष से अधिक आयु वाली जनसंख्या का शत प्रतिशत टीकाकरण (वैक्सीनेशन) करवाएं। प्रधानमंत्री ने 11 अप्रैल को ज्योतिबा फुले और 14 अप्रैल को बाबा साहेब अम्बेडकर की जयंती के बीच की अवधि में टीका उत्सव-वैक्सीनेशन फेस्टिवल आयोजित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस अवधि में अधिक से अधिक लोगों का टीकाकरण किए जाने के प्रयास होने चाहिए। उन्होंने युवाओं से भी आह्वान किया कि वे 45 वर्ष से आधिक आयु के लोगों के टीकाकरण में सहायता करें।

 

प्रधानमंत्री ने लापरवाही के विरुद्ध सचेत किया। उन्होंने कहा कि हमें यह अपने ध्यान में रखना होगा कि टीकाकरण होने के बाद भी प्रतिरक्षा में कमी नहीं आनी चाहिए और निरंतर उचित सावधानी बरती जानी चाहिए। अपने मंत्र “दवाई भी-कड़ाई भी” पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने उचित कोविड व्यवहार के लिए जागरूकता लाने पर भी जोर दिया।

 

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जब राष्ट्र प्रथम के संकल्प वाली सरकार होती है, तो राष्ट्रीय नायकों को भी उचित सम्मान मिलता है: पीएम मोदी
July 06, 2026
हम भारत के उस महान सपूत को श्रद्धांजलि देते हैं, जिनकी राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है: पीएम
जब सरकार, 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प वाली होती है, तो राष्ट्रीय नायकों को भी उचित सम्मान मिलता है: पीएम
डॉ. मुखर्जी ने देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो झंडों की बात का पुरज़ोर विरोध किया: पीएम
वे अच्छी तरह समझते थे कि राष्ट्र-निर्माण का मूल आधार संस्थानों का निर्माण है: पीएम
डॉ. मुखर्जी ने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक ताकत बने: पीएम

केंद्रीय मंत्रिमंडल में मेरे सहयोगी अमित भाई शाह, गजेंद्र सिंह शेखावत, पश्चिम बंगाल के ऊर्जावान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, भाजपा के वरिष्ठ सदस्य, हम जैसे लाखों कार्यकर्ताओं की प्रेरणा, श्रीमान माखनलाल जी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, श्री शॉमिक भट्टाचार्य, उपस्थित जनप्रतिनिधिगण, अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सबको मेरा नमस्कार!

मैं अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के कारण, इस समय प्रवास पर हूं। लेकिन टेक्नोलॉजी की मदद से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में आपसे जुड़ रहा हूं।

साथियों,

आज देश की धरती, पश्चिम बंगाल की धरती, अपने एक महान सपूत, एक महान देशभक्त, भारत की अखंडता के लिए समर्पित एक युगदृष्टा को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रही है। आज हम उस विचार बीज का गुणगान कर रहे हैं, जो वर्तमान समय में चारों तरफ फल-फूल रहा है। जो, आधुनिक भारत को दिशा देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

साथियों,

जहाँ जमीन से जुड़ी हुई वैचारिक शक्ति हो, साथ-साथ इरादे मजबूत हो और नीयत साफ़ हो और जब नए संकल्प के साथ संपूर्ण समर्पण हो और ये सारी कड़ियां जब आपस में जुड़ जाती हैं, तो संकल्प की सिद्धि होती ही होती है। और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ऐसा ही जीवन जी करके दिखाया है। मैं डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती के अवसर पर उन्हें नमन करता हूं, अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

साथियों,

आज का यह कार्यक्रम इस बात का भी साक्षी है कि जब राष्ट्र प्रथम के संकल्प वाली सरकार होती है, तो राष्ट्र नायकों को सम्मान भी मिलता है और उनके विजन पर चलने का भी प्रयास होता है। डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती को, हमारी सरकार दो वर्षों के राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मना रही है। यह पिछले वर्ष 6 जुलाई को शुरू हुए थे और अगले साल 6 जुलाई तक चलेंगे। और अब तो बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद इस राष्ट्रीय सम्मान को, एक प्रेरणा पुरुष को याद करने में बंगाल ने अपने आप में रौनक बढ़ा दी है। कुछ दिन पहले ही 20 जून को भव्य तरीके से पश्चिम बंग दिवस का आयोजन किया गया था। यह बंगाल की धरती, बंगाल की विरासत को प्रणाम था। आज का यह कार्यक्रम अपनी विरासत के प्रति उसी सम्मान का हिस्सा है। मैं पश्चिम बंगाल सरकार को इतने भव्य कार्यक्रम के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी का जीवन, एक विचार से जन-आंदोलन तक की परिणति का प्रेरक है। उन्होंने भारत में एक वैचारिक आंदोलन को जन्म दिया। आप देखिए, जिस समय जनसंघ की स्थापना हुई थी, तब हर तरफ कांग्रेस का ही बोलबाला था, कांग्रेस का ही वर्चस्व दिखाई देता था। एक ऐसे दौर में, जब अलग विचार के लिए कोई जगह ही नहीं थी, बड़ी मुश्किल था पैर रखने के लिए भी जगह मिल जाए, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन सारी परिस्थितियों को चुनौती देते हुए एक नए विचार का साहस किया। यह केवल एक संगठन बनाने का निर्णय नहीं था, एक राजनीतिक दल को जन्म देने का काम नहीं था। यह लोकतंत्र में वैचारिक विविधता, राष्ट्रीय चिंतन और जनभागीदारी पर उनके अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति थी। इसी विश्वास से भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ। और साथियों, कोई भी विचार केवल स्थापना से अमर नहीं होता। विचार तब अमर होता है, जब पीढ़ियाँ उसे अपने जीवन से सींचती हैं। भारतीय जनसंघ के उस छोटे से दीये को जलाए रखने के लिए लक्षावधि कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन खपा दिया। पल-पल, तिल-तिल, लाखों कार्यकर्ताओं के तप, त्याग और समर्पण ने, उस दीये की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। आज वह दीया अपने मूल स्वरूप में भले न दिखाई देता हो, भारतीय जनसंघ आज उसी रूप में भले न हो, लेकिन उस दीये का जो प्रकाश-पुंज था, वो आज करोड़ों देशवासियों के विश्वास का प्रकाश बनकर फैल रहा है। उसी प्रकाश का विस्तार आज पूरे देश में खिले हुए करोड़ों कमल के रूप में दिखाई देता है। कभी जो भारतीय जनसंघ था, वही आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बनकर जनसेवा कर रहा है।

साथियों,

अक्सर हम देखते हैं कि समय के साथ कुछ विचारों का आकर्षण फीका पड़ता जाता है। लेकिन आप सोचिए, यह कितना सशक्त विचार-बीज डॉक्टर मुखर्जी ने रोपा है कि आज इतने साल बाद भी उसका इतनी तेजी से विस्तार हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है, जब आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय जनता पार्टी की इस यात्रा का इतिहास लिखेंगी, इसका अध्ययन करेंगी, तब वह निश्चित रूप से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों, उनके साहस और उनकी दूरदृष्टि का उल्लेख करेंगी। और मैं फिर कहूंगा, बंगाल के लिए तो यह डबल खुशी की बात है। एक तो डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती और दूसरा, बंगाल में यह आयोजन, उनके विचार पुंज से निकली भाजपा सरकार में ये भव्य उत्सव हो रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता की तरफ से अपने महान सपूत को ये बहुत ही आत्मीय श्रद्धांजलि है।

साथियों,

संसद में अपने एक भाषण में डॉक्टर मुखर्जी ने कहा था और यह डॉक्टर मुखर्जी का यह वाक्य आज भी हमें प्रेरणा देता है। डॉक्टर मुखर्जी ने पार्लियामेंट में कहा था- राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है। और देखिए, आज देश गर्व से कह सकता है कि डॉक्टर मुखर्जी अंतिम सांस तक इसी विश्वास को वो जीते थे, उन्होंने इसे जीया था। 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, लगभग तय हो चुका था, तब एक और संकट सामने था। पूरे के पूरे बंगाल को ही भारत से अलग करने की साजिशें रची जा रही थीं। तब डॉक्टर मुखर्जी इन साजिशों के सामने चट्टान बनकर खड़े हो गए। उन्होंने जनमत तैयार किया, राजनीतिक संघर्ष किया और यह सुनिश्चित किया कि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहे और तब डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हुंकार भरी थी। उनके शब्द थे- कांग्रेस देश भाग कोरेछे, आमी पाकिस्तान के भाग कोरेछी। यानि कांग्रेस ने देश का बंटवारा किया, और मैंने पाकिस्तान का ही बंटवारा कर दिया।

साथियों,

यह जो हुंकार है, इसकी जो ताकत है, इसमें जिस बड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति के दर्शन होते हैं, उसका एहसास हमें तब भी होता है, जब हम आज की परिस्थितियों को देखते हैं।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी, एक भारत श्रेष्ठ भारत के लिए पूरी तरह से समर्पित थे। और इसलिए, जब देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान की बात हुई, तो डॉक्टर मुखर्जी ने इसका भी जमकर विरोध किया। उन्होंने देश को मंत्र दिया- एक देशे दुई बिधान, दुई प्रोधान एबॉन्ग दुई निशान, आमरा कोखोनो मेने नेबो ना यानि "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान— नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे।" यह केवल एक नारा नहीं था। यह समान अधिकार, समान संविधान और समान राष्ट्रीय चेतना का आह्वान था। उन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया, जेल गए और अंततः कश्मीर के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। आज हमारी सरकार को इस बात का गर्व है कि आर्टिकल 370 की दीवार गिराकर हमने डॉक्टर मुखर्जी का सपना पूरा किया है।

साथियों,

आज जब हम एक भारत, श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं, तो यह उसी राष्ट्रीय दृष्टि का विस्तार है, जिसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने जीवन से परिभाषित किया। एक ऐसा भारत-जहाँ उत्तर और दक्षिण के बीच कोई दूरी न हो, जहाँ पूर्व और पश्चिम, समान अवसरों के सहभागी हों, जहाँ हर राज्य अपनी विशिष्ट पहचान के साथ भारत की सामूहिक शक्ति बने। जहाँ हर नागरिक एक ही संविधान, एक ही राष्ट्रीय भावना और एक ही भविष्य के संकल्प से जुड़ा हो। मुझे खुशी है कि डॉक्टर मुखर्जी की प्रेरणा से आज भारत का संविधान पूरे देश में आन-बान-शान के साथ लागू है और कोटि-कोटि देशवासियों को प्रेरणा दे रहा है।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी, इस बात को अच्छे से समझते थे कि संस्थाओं के निर्माण में ही राष्ट्र निर्माण का तत्व छुपा है। मात्र 33 वर्ष की आयु में डॉ. मुखर्जी, कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। लेकिन उन्होंने उस पद को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं माना। उन्होंने विश्वविद्यालय को भारत के भविष्य का निर्माण करने वाली संस्था के रूप में देखा। उन्होंने शिक्षा को गुलामी की सोच के दायरे के बाहर निकालने का प्रयास किया। उन्होंने कहा- बोंगो-जातिर आत्तोशोम्मान पुनोर-उद्धार, एबॉन्ग मातृ-भाषार माध्योमे शिख्खार प्रोशार एई आमादेर प्रोधान लोक्खो होवा उचित! यानि बंगाल के लोगों का आत्मसम्मान लौटाना और मातृभाषा में पढ़ाई, यह हमारा प्रथम उद्देश्य है। उनका विश्वास था कि यदि भारत को आत्मविश्वासी राष्ट्र बनना है, तो उसकी शिक्षा भी भारतीय आत्मा से जुड़ी होनी चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया। आज हमें इस बात का भी गर्व है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर बल दिया जा रहा है। जो सपना डॉक्टर मुखर्जी ने देखा था, वो हमारी सरकार ने पूरा किया है।

साथियों,

स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने औद्योगिक विकास का वृहद विजन रखा था। उन्होंने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक शक्ति बनें। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स ने भारत की रेल व्यवस्था को नई गति दी। सिंदरी फर्टिलाइजर प्लांट ने कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया। दामोदर वैली कॉरपोरेशन ने ऊर्जा और सिंचाई का नया अध्याय लिखा। इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (IFCI) ने भारतीय उद्योगों को वित्तीय आधार दिया।

साथियों,

उनके लिए उद्योग, फैक्ट्रियां, यह केवल कुछ कल कारखाने नहीं थे। विश्वविद्यालय, केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं थे। रिसर्च इंस्टीट्यूशंस, केवल वैज्ञानिक प्रयोगों की जगह नहीं थे। उनके लिए ये सभी, राष्ट्र निर्माण के साधना केंद्र थे। डॉक्टर मुखर्जी, ऐसी संस्थाओं के पक्षधर थे, जो टैलेंट को अवसर दें। ऐसी शिक्षा, जो इनोवेशन को प्रोत्साहन दे। ऐसे उद्योग, जो आत्मनिर्भरता का आधार बने। और ऐसी व्यवस्था, जो आने वाली पीढ़ियों को और अधिक सशक्त भारत सौंप सके। और यही स्पिरिट, आज विकसित भारत की भी प्रेरणा है।

साथियों,

आज के इस अवसर पर मैं, बंगाल के, पूरे देश के मेरे युवा साथियों से कहूंगा, डॉक्टर मुखर्जी ने एक भारत के लिए अपना जीवन समर्पित किया। हम सबको श्रेष्ठ भारत के लिए जीना है, हमें मिलकर विकसित भारत का संकल्प सिद्ध करना है। हमें देश को आत्मनिर्भर बनाना है। इसी आह्वान के साथ, एक बार फिर से मैं डॉक्टर मुखर्जी को नमन करता हूं। मैं उनके ही शब्दों में अपनी बात समाप्त करूंगा। यह डॉक्टर मुखर्जी के शब्द हैं, यह उनकी भाव भंगिमा है- जे काज एई हाते नाओ ना केनो, ता अत्योंतों गुरुत्तो शहोकारे कोरते होबे जो भी काम आरंभ करो, उसे पूरी गंभीरता से करो, तन्मयता से करो, पूरी निष्ठा से करो, कोई भी काम अधूरा ना छोड़ो, उसे जरूर पूरा करो। डॉक्टर मुखर्जी के शब्दों में यह प्रवाहित भावना के साथ, इनके ही इन शब्दों के साथ आप सभी को भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

बहुत-बहुत धन्यवाद!