भारत के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन का निर्माण किया गया है: प्रधानमंत्री
विकसित भारत की ओर बढ़ते हुए यह अनिवार्य है कि भारत औपनिवेशिक मानसिकता के हर अंश को त्याग दे: प्रधानमंत्री
रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग करना केवल नाम का परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह सत्ता की मानसिकता को सेवा के भाव में बदलने का एक प्रयास था: प्रधानमंत्री
नए प्रधानमंत्री कार्यालय को सेवा तीर्थ का नाम दिया गया है; सेवा, या सेवा का भाव, भारत की आत्मा है, यही भारत की पहचान है: प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज नई दिल्ली में सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन-1 एवं 2 के उद्घाटन समारोह को संबोधित किया। इस अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज सभी एक नए इतिहास के निर्माण के साक्षी बन रहे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि विक्रम संवत 2082, फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी, 24 माघ, शक संवत 1947, जो वर्तमान कैलेंडर के अनुसार 13 फरवरी 2026 है, यह दिन भारत की विकास यात्रा में एक नई शुरुआत का गवाह बना है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शास्त्रों में विजया एकादशी का अत्यंत महत्व है, क्योंकि इस दिन लिया गया संकल्प सदैव विजय की ओर ले जाता है। श्री मोदी ने कहा कि आज विकसित भारत के संकल्प के साथ, हम सभी सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस लक्ष्य में विजय प्राप्त करने के लिए दैवीय आशीर्वाद हमारे साथ है। प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ और इन नए भवनों के लिए पीएमओ टीम, कैबिनेट सचिवालय और विभिन्न विभागों के कर्मचारियों सहित सभी को बधाई दी। उन्होंने इनके निर्माण से जुड़े सभी इंजीनियरों और श्रमिक साथियों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रकाश डाला कि स्वतंत्रता के पश्चात देश के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय और नीतियां साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसे भवनों से बनाई गईं। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि इन इमारतों का निर्माण ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतीकों के रूप में किया गया था, जिनका उद्देश्य भारत को सदियों तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रखना था।

श्री मोदी ने स्मरण किया कि कोलकाता कभी देश की राजधानी हुआ करता था, लेकिन 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान वह ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों का एक सशक्त केंद्र बन गया था। इसी कारण, 1911 में अंग्रेजों ने राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। उन्होंने उल्लेख किया कि इसके पश्चात, औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं और मानसिकता को ध्यान में रखते हुए नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक का निर्माण शुरू हुआ। प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष ध्यान दिलाया कि जब रायसीना हिल्स पर इन भवनों का उद्घाटन हुआ था, तब तत्कालीन वायसराय ने कहा था कि ये नई संरचनाएँ ब्रिटिश सम्राट की इच्छाओं के अनुरूप बनाई गई हैं—अर्थात, वे गुलाम भारत की धरती पर ब्रिटेन के राजा की सोच को थोपने का एक माध्यम थीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि रायसीना हिल्स का चयन इसलिए किया गया था ताकि ये इमारतें अन्य सभी से ऊपर रहें और कोई भी इनके बराबर खड़ा न हो सके। श्री मोदी ने इसकी तुलना सेवा तीर्थ परिसर से करते हुए कहा कि यह किसी पहाड़ी पर नहीं, बल्कि सीधे धरातल से जुड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि जहाँ साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक का निर्माण औपनिवेशिक मानसिकता को लागू करने के लिए किया गया था, वहीं आज सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन भारत के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यहाँ लिए जाने वाले निर्णय अब किसी सम्राट की सोच को प्रतिबिंबित नहीं करेंगे, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने की नींव बनेंगे। इसी भावना के साथ, प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन को भारत की जनता को समर्पित किया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी का पहला क्वार्टर अब पूरा हो चुका है और यह आवश्यक है कि विकसित भारत का विजन न केवल नीतियों और योजनाओं में, बल्कि कार्यस्थलों और भवनों में भी प्रतिबिंबित हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जिन स्थानों से देश का शासन चलाया जाता है, वे प्रभावी और प्रेरणादायक, प्रभावशाली और प्रेरक होने चाहिए। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि तेजी से उभरती नई तकनीकों के दौर में, पुराने भवन सुविधाओं के विस्तार और नए उपकरणों को अपनाने के लिए अपर्याप्त सिद्ध हो रहे थे। श्री मोदी ने उल्लेख किया कि साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक में जगह की कमी और सीमित सुविधाएं थीं साथ ही, लगभग सौ साल पुराने होने के कारण वे भीतर से जर्जर हो रहे थे और कई अन्य चुनौतियों का सामना कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्र को इन चुनौतियों के बारे में निरंतर अवगत कराना महत्वपूर्ण है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी, भारत सरकार के कई मंत्रालय दिल्ली में 50 से अधिक अलग-अलग स्थानों से कार्य कर रहे थे। उन्होंने रेखांकित किया कि हर साल इन मंत्रालयों के भवनों के किराए पर ₹1,500 करोड़ खर्च किए जा रहे थे, जबकि कार्यालयों के बीच आवाजाही करने वाले 8,000 से 10,000 कर्मचारियों के लिए दैनिक लॉजिस्टिक लागत भी वहन करनी पड़ती थी। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन के निर्माण से इन खर्चों में कमी आएगी और कर्मचारियों के समय की बचत होगी।

श्री मोदी ने स्वीकार किया कि इस परिवर्तन के बीच, पुराने भवनों में बिताए गए वर्षों की स्मृतियाँ सदैव शेष रहेंगी, क्योंकि वहीं से देश को नई दिशा देने वाले और सुधारों की शुरुआत करने वाले कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि वे परिसर भारत के इतिहास का एक अमर हिस्सा हैं। इसीलिए, प्रधानमंत्री ने पुराने भवन को राष्ट्र के लिए एक संग्रहालय के रूप में समर्पित करने के निर्णय की घोषणा की, जिससे इसे युगे युगीन भारत संग्रहालय का हिस्सा बनाया जाएगा। उन्होंने रेखांकित किया कि यह भवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बनेगा और जब युवा यहाँ आएंगे, तो यह ऐतिहासिक विरासत उनका मार्ग प्रशस्त करेगी।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि विकसित भारत की यात्रा में औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर आगे बढ़ना अनिवार्य है। उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद भी औपनिवेशिक शासन के प्रतीकों को ढोया जाता रहा। उन्होंने ध्यान दिलाया कि प्रधानमंत्री आवास को कभी रेस कोर्स रोड कहा जाता था, उपराष्ट्रपति के लिए कोई निर्धारित निवास नहीं था और लोकतंत्र होने के बावजूद राष्ट्रपति भवन की ओर जाने वाली सड़क को राजपथ कहा जाता था। उन्होंने रेखांकित किया कि स्वतंत्र भारत के पास न तो अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों के लिए कोई स्मारक था और न ही बलिदान देने वाले पुलिसकर्मियों के लिए। श्री मोदी ने जोर देकर कहा कि एक स्वतंत्र राष्ट्र की राजधानी औपनिवेशिक मानसिकता में बुरी तरह उलझी हुई थी, जहाँ दिल्ली की इमारतें, सार्वजनिक स्थान और ऐतिहासिक स्थल ऐसे ही प्रतीकों से भरे हुए थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता और 2014 में देश ने यह संकल्प लिया कि अब औपनिवेशिक मानसिकता और नहीं चलेगी। उन्होंने उल्लेख किया कि इस सोच को बदलने के लिए एक अभियान शुरू किया गया, जिसके परिणामस्वरूप शहीदों के सम्मान में राष्ट्रीय समर स्मारक और पुलिस के शौर्य को मान्यता देने के लिए पुलिस स्मारक का निर्माण हुआ। उन्होंने स्मरण किया कि रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग किया गया, जो केवल नाम का परिवर्तन नहीं था, बल्कि सत्ता के नजरिए को सेवा के भाव में बदलने का एक प्रयास था।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि इन निर्णयों के पीछे एक गहरा भाव और स्पष्ट दृष्टिकोण है, जो भारत के वर्तमान, अतीत और भविष्य को राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ता है। उन्होंने समझाया कि जिस स्थान को कभी राजपथ के रूप में जाना जाता था, वहाँ आम नागरिकों के लिए पर्याप्त सुविधाओं और व्यवस्थाओं का अभाव था। आज उसे कर्तव्य पथ के रूप में पुनर्विकसित किया गया है, जो परिवारों, बच्चों और नागरिकों के लिए एक जीवंत सार्वजनिक स्थल बन चुका है। उन्होंने रेखांकित किया कि इसी परिसर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जो यह सुनिश्चित करती है कि देश की राजधानी अब अपने महान नायकों का सम्मान करती है और नई पीढ़ी को प्रेरित करती है। श्री मोदी ने आगे कहा कि राष्ट्रपति भवन परिसर में भी परिवर्तन किए गए हैं, जहाँ मुगल गार्डन का नाम बदलकर अमृत उद्यान किया गया। उन्होंने उल्लेख किया कि जब नए संसद भवन का निर्माण हुआ, तो पुराने भवन को भुलाया नहीं गया, बल्कि उसे 'संविधान सदन' के रूप में एक नई पहचान दी गई। उन्होंने कहा कि जब मंत्रालयों को एक ही परिसर में साथ लाया गया, तो उन भवनों का नाम 'कर्तव्य भवन' रखा गया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि नाम बदलने की ये पहलें केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं हैं, बल्कि ये एक निरंतर वैचारिक सोच को प्रतिबिंबित करती हैं—एक ऐसा स्वतंत्र भारत जिसकी अपनी पहचान हो और जो औपनिवेशिक स्मृतियों के प्रभाव से मुक्त हो।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नए प्रधानमंत्री कार्यालय को सेवा तीर्थ का नाम दिया गया है, जो इस बात को रेखांकित करता है कि सेवा का भाव भारत की आत्मा और उसकी वास्तविक पहचान है। उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस जी के उन शब्दों को स्मरण किया, जिन्होंने कहा था कि शिव ज्ञान से मानवता की सेवा केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक दर्शन है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यह भवन निरंतर हर किसी को याद दिलाएगा कि शासन का अर्थ सेवा है और उत्तरदायित्व का अर्थ समर्पण है। शास्त्रों की सीख “सेवा परमो धर्मः” अर्थात सेवा ही सर्वोच्च कर्तव्य है पर प्रकाश डालते हुए श्री मोदी ने पुष्टि की कि यही प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकार का दृष्टिकोण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सेवा तीर्थ केवल एक नाम नहीं बल्कि एक संकल्प है—नागरिकों की सेवा के माध्यम से एक पवित्र स्थान और सेवा के प्रण को सिद्धि तक ले जाने का एक केंद्र। उन्होंने तीर्थ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि तीर्थ वह है जिसमें तारने और लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता हो। उन्होंने कहा कि आज भारत के पास भी विकसित राष्ट्र बनने, आत्मनिर्भरता प्राप्त करने, करोड़ों लोगों को गरीबी से मुक्त करने और देश को औपनिवेशिक मानसिकता से आजादी दिलाने के लक्ष्य हैं और ये सभी लक्ष्य सेवा की शक्ति से ही सिद्ध होंगे।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रकाश डाला कि आज जब भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस (सुधारों की गति) पर सवार होकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नया अध्याय लिख रहा है, व्यापार समझौतों के माध्यम से विकास के नए द्वार खोल रहा है और सरकारी योजनाओं के सैचुरेशन यानि शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त करने की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तो ऐसी स्थिति में सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवनों में कार्य की नई गति और बढ़ा हुआ आत्मविश्वास राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक प्रमुख भूमिका निभाएगा।

प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है कि हर शुभ कार्य से पहले जनकल्याण का संकल्प होना चाहिए, जो सभी दिशाओं से आने वाले श्रेष्ठ विचारों से निर्देशित हो। श्री मोदी ने जोर देकर कहा कि यही इन भवनों की आत्मा होनी चाहिए, क्योंकि भारत के महान लोकतंत्र में जनता के विचार ही वास्तविक शक्ति हैं, उनके सपने ही असली पूँजी हैं, उनकी अपेक्षाएं ही प्राथमिकता हैं और उनकी आकांक्षाएं ही मार्गदर्शक प्रकाश हैं। उन्होंने कहा कि इन भावनाओं और इन भवनों के बीच न कोई दीवार होनी चाहिए और न ही कोई दूरी, क्योंकि नीतियां तभी जीवंत होती हैं जब लोगों के सपनों को समझा जाए और निर्णय तभी प्रभावी होते हैं जब उनकी आकांक्षाओं को महसूस किया जाए।

प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि पिछले ग्यारह वर्षों में गवर्नेंस का एक नया मॉडल उभर कर सामने आया है, जहाँ निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में नागरिक है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि “नागरिक देवो भवः” केवल एक वाक्यांश नहीं है, बल्कि यह हमारी कार्य-संस्कृति है, जिसे इन नए भवनों में प्रवेश करते समय सभी अधिकारियों को आत्मसात करना चाहिए। श्री मोदी ने घोषणा की कि सेवा तीर्थ में लिया जाने वाला हर निर्णय, आगे बढ़ने वाली हर फाइल और यहाँ बिताया गया हर पल 140 करोड़ नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए समर्पित होना चाहिए। उन्होंने प्रत्येक अधिकारी, कर्मचारी और कर्मयोगी से आग्रह किया कि जब भी वे इस भवन में कदम रखें, तो एक पल के लिए रुकें और स्वयं से पूछें—क्या आज का उनका कार्य करोड़ों नागरिकों के जीवन को आसान बनाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यही आत्म-चिंतन इस स्थान की सबसे बड़ी शक्ति बनेगा।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल देते हुए कहा कि हम यहाँ अधिकार जताने नहीं, बल्कि दायित्व निभाने आए हैं। श्री मोदी ने कहा कि जब शासन सेवा के भाव से प्रेरित होता है, तो परिणाम असाधारण होते हैं। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि इसी सेवा भाव का परिणाम है कि आज 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं और देश की अर्थव्यवस्था ने एक नई गति प्राप्त की है।

प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि विकसित भारत 2047 केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि विश्व के समक्ष भारत का एक अटूट संकल्प है। इसलिए, यहाँ बनने वाली हर नीति और लिया जाने वाला हर निर्णय निरंतर सेवा भाव से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक दिन, जब अधिकारी सेवानिवृत्त होंगे या इस भवन से विदा लेंगे, तो वे अपने यहाँ बिताए दिनों को याद करेंगे और इस संतोष के साथ सुकून पाएंगे कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में उनका हर पल नागरिकों की सेवा के लिए समर्पित था और हर निर्णय राष्ट्रहित में लिया गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि और व्यक्तिगत पूँजी होगी, जो उनके जीवन को गौरव से भर देगी।

महात्मा गांधी के इस विश्वास को स्मरण करते हुए कि कर्तव्य की नींव पर ही अधिकारों का भव्य भवन खड़ा होता है, प्रधानमंत्री ने कहा कि जब कर्तव्य का पालन किया जाता है, तो बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना और समाधान किया जा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यही कारण था कि संविधान निर्माताओं ने कर्तव्यों पर अत्यधिक बल दिया था, क्योंकि करोड़ों नागरिकों के सपने इसी आधार पर टिके हुए हैं। श्री मोदी ने कर्तव्य की व्याख्या करते हुए कहा कि कर्तव्य ही शुरुआत है, यह एक जीवित राष्ट्र की जीवनधारा है, जो करुणा और परिश्रम से बंधी है। यह संकल्पों की आशा है, प्रयासों का शिखर है, हर समस्या का समाधान है और विकसित भारत का विश्वास है। उन्होंने घोषणा की कि कर्तव्य ही समानता है, कर्तव्य ही स्नेह है। यह सार्वभौमिक और सर्वव्यापी है, जो 'सबका साथ, सबका विकास' की भावना में रचा-बसा है। उन्होंने कर्तव्य को राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव, हर जीवन को आलोकित करने वाली इच्छाशक्ति, आत्मनिर्भर भारत का आनंद, आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी, माँ भारती की ऊर्जा का ध्वजवाहक और 'नागरिक देवो भवः' का जाग्रत पथ बताया। उन्होंने आग्रह किया कि कर्तव्य की इसी परम भावना के साथ, हम सभी को सेवा तीर्थ और इन नवनिर्मित परिसरों में प्रवेश करना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि भारत नई ऊँचाइयों और एक नए युग की ओर तेजी से अग्रसर है। श्री मोदी ने कहा कि आने वाले वर्षों में राष्ट्र की पहचान केवल उसकी अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि गवर्नेंस की गुणवत्ता, नीतियों की स्पष्टता और कर्मयोगियों के समर्पण से तय होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में लिया गया हर निर्णय केवल एक फाइल की मंजूरी नहीं होगा, बल्कि वह विकसित भारत 2047 की दिशा निर्धारित करेगा। उन्होंने याद दिलाया कि 2047 केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ सपनों की समयसीमा है, जहाँ हर संस्थान, हर अधिकारी, हर कर्मचारी और हर कर्मयोगी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने अपना विजन साझा करते हुए कहा कि सेवा तीर्थ को सेंसिटिव गवर्नेंस का सिंबल और सिटिज़न-सेंट्रिक एडमिनिस्ट्रेशन का रोल मॉडल बनना चाहिए —एक ऐसा स्थान जहाँ सत्ता के बजाय सेवा, पद के बजाय प्रतिबद्धता और अधिकार के बजाय जिम्मेदारी दिखाई दे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह संकल्प इतिहास लिखेगा और यह सामूहिक प्रयास आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगा। लाल किले की प्राचीर से कहे अपने शब्दों, "यही समय है, सही समय है" को दोहराते हुए उन्होंने सभी से 'राष्ट्र प्रथम' की भावना के साथ हर पल का उपयोग करने का आग्रह किया, ताकि आने वाली सदियां यह कह सकें कि यह वही समय था जब भारत ने अपने भाग्य को पुनर्गठित किया और एक उज्ज्वल भविष्य के अगले हजार वर्षों की ओर अपना पहला कदम बढ़ाया। इसी दृढ़ विश्वास के साथ, उन्होंने एक बार फिर सभी को अपनी शुभकामनाएं देते हुए अपने संबोधन का समापन किया।

इस अवसर पर अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ केंद्रीय मंत्री, सांसद और भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

 

पृष्ठभूमि

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज दिन की शुरुआत में सेवा तीर्थ भवन परिसर के नाम का अनावरण किया। इसके पश्चात, उन्होंने औपचारिक रूप से सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन-1 एवं 2 का उद्घाटन किया।

यह उद्घाटन भारत के गवर्नेंस आर्किटेक्चर में एक परिवर्तनकारी बदलाव है और एक आधुनिक, कुशल, सुलभ और नागरिक-केंद्रित गवर्नेंस इकोसिस्टम के निर्माण के प्रति प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

दशकों से, सरकार के कई प्रमुख कार्यालय और मंत्रालय सेंट्रल विस्टा क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर फैले हुए और पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर से संचालित हो रहे थे। इस बिखराव के कारण कार्यकुशलता में कमी, समन्वय की चुनौतियाँ, रखरखाव की बढ़ती लागत और काम करने के प्रतिकूल वातावरण जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही थीं। ये नए भवन परिसर प्रशासनिक कार्यों को आधुनिक और भविष्य के लिए तैयार सुविधाओं के भीतर एकीकृत करके इन समस्याओं का समाधान करते हैं।

सेवा तीर्थ में अब प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय स्थित हैं, जो पहले अलग-अलग स्थानों पर संचालित होते थे।

कर्तव्य भवन-1 और 2 में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय स्थित हैं, जिनमें वित्त मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय शामिल हैं।

दोनों भवन परिसरों में डिजिटल रूप से एकीकृत कार्यालय, व्यवस्थित पब्लिक इंटरफेस जोन और सेंट्रलाइज़्ड रिसेप्शन सुविधाएं उपलब्ध हैं। ये विशेषताएं आपसी सहयोग, कार्यक्षमता, आसान गवर्नेंस, नागरिकों की बेहतर भागीदारी और कर्मचारियों के कल्याण को बढ़ावा देंगी। 4-स्टार गृहा (GRIHA) मानकों के अनुरूप डिजाइन किए गए इन परिसरों में रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम, जल संरक्षण के उपाय, वेस्ट मैनेजमेंट सॉल्यूशन और हाई-परफॉर्मेंस बिल्डिंग एनवेलप शामिल किए गए हैं। ये उपाय ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बढ़ाते हुए पर्यावरणीय प्रभाव को काफी कम करते हैं। इन भवन परिसरों में एक व्यापक सुरक्षा ढांचा भी शामिल है, जैसे स्मार्ट एक्सेस कंट्रोल सिस्टम, निगरानी नेटवर्क और एडवांस्ड इमरजेंसी रिस्पॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर भी शामिल हैं, जो अधिकारियों और आगंतुकों के लिए एक सुरक्षित और सुलभ वातावरण सुनिश्चित करता है।

पूरा भाषण पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए

Explore More
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी
Why global AI leaders are flocking to the India AI Impact Summit in New Delhi

Media Coverage

Why global AI leaders are flocking to the India AI Impact Summit in New Delhi
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
21वीं सदी के इस दशक में भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है: ET Now ग्लोबल बिजनेस समिट में पीएम मोदी
February 13, 2026
Amid numerous disruptions, this decade has been one of unprecedented development for India, marked by strong delivery and by efforts that have strengthened our democracy: PM
In this decade of the 21st century, India is riding the Reform Express: PM
We have made the Budget not only outlay-focused but also outcome-centric: PM
Over the past decade, we have regarded technology and innovation as the core drivers of growth: PM
Today, we are entering into trade deals with the world because today's India is confident and ready to compete globally: PM

आप सभी का इस ग्लोबल बिजनेस समिट में, आप सबका मैं अभिनंदन करता हूं। हम यहां A Decade Of Disruption, A Century Of Change, इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं। विनीत जी का भाषण सुनने के बाद मुझे लगता है कि मेरा काम बहुत सरल हो गया है। लेकिन एक छोटी request करूं, इतना सारा आपको पता है, तो कभी ET में तो दिखना चाहिए।

साथियों,

21वीं सदी का बीता दशक अभूतपूर्व डिसरप्शन का रहा है। ग्लोबल Pandemic, ग्लोब के अलग-अलग हिस्सों में तनाव, युद्ध और ग्लोब के संतुलन को हिला देने वाले Supply Chain Breakdowns, दुनिया ने एक दशक के भीतर काफी कुछ देख लिया। लेकिन साथियों, कहते हैं, संकट के समय ही किसी देश के सामर्थ्य पता चलता है और मुझे बहुत गर्व है, अनेक Disruptions के बीच भी भारत के लिए यह दशक, अभूतपूर्व डेवलपमेंट का रहा है, शानदार डिलीवरी का रहा है और डेमोक्रेसी को मजबूत करने वाला रहा है। जब पिछला दशक शुरू हुआ था, तो भारत ग्यारहवें नंबर की अर्थव्यवस्था था। इतनी उथल-पुथल में पूरी आशंका थी कि भारत और नीचे चला जाएगा, लेकिन आज भारत, बहुत तेजी के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने जा रहा है। और आप जिस Century Of Change की बात कर रहे हैं, उसका बहुत बड़ा आधार और यह मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं, इसका बहुत बड़ा आधार भारत ही होने जा रहा है। आज भारत, दुनिया की ग्रोथ में 16 परसेंट से ज्यादा योगदान दे रहा है। और मुझे विश्वास है, इस सेंचुरी के हर आने वाले साल में हमारा योगदान और भी बढ़ता रहेगा, निरंतर बढ़ता रहेगा। मैं वह मदान की तरह astrologer के रूप में नहीं आया हूं। भारत, दुनिया की ग्रोथ को ड्राइव करेगा, दुनिया की ग्रोथ का नया इंजन बनेगा।

साथियों,

दुनिया में सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद एक नई वैश्विक व्यवस्था बनी थी, एक नए वर्ल्ड ऑर्डर ने आकार लिया था। लेकिन सात दशक के बाद, वो व्यवस्था टूट रही है। दुनिया आज एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ बढ़ रही है। आखिर यह क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब जो व्यवस्था बनी थी, उसकी नींव One Size Fits All, इसी सोच पर टिकी थी। तब ये माना गया कि World Economy Core में होगी, Supply Chains मजबूत और विश्वसनीय हो जाएगी। इस व्यवस्था में नेशन्स को केवल कंट्रीब्यूटर्स के रूप में ही देखा गया। लेकिन आज, इस मॉडल को चुनौती मिल रही है। यह अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। आज हर देश को यह पता चल रहा है कि उसे अपनी रज़ीलियन्स खुद बनानी होगी।

साथियों,

आज दुनिया जिसकी चर्चा कर रही है। उसको भारत ने 2015 में, आज से 10 साल से पहले, 2015 में ही अपनी नीति का हिस्सा बना लिया था। दस साल पहले जब नीति आयोग बना, तो उसके फाउंडिंग डॉक्यूमेंट में ही भारत ने अपना विजन क्लीयर कर दिया था और विजन यह कि भारत किसी दूसरे देश से कोई सिंगल डेवलपमेंट मॉडल इंपोर्ट नहीं करेगा। हम भारत के विकास के लिए भारतीय अप्रोच को लेकर ही चलेंगे। इस नीति ने भारत को अपने हिसाब से, अपनी रिक्वायरमेंट के हिसाब से, अपने हित में फैसले लेने का आत्मविश्वास दिया और यह एक बड़ा कारण है कि डिसरप्शन के दशक में भी भारत की इकोनॉमी कमजोर नहीं पड़ी, निरंतर मजबूत होती गई।

साथियों,

आज 21वीं सदी के इस दशक में भारत Reform Express पर सवार है और इस Reform Express की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हम इसे compulsion में नहीं, बल्कि conviction के साथ, Reform के कमिटमेंट के साथ गति दे रहे हैं। यहां तो बहुत बड़ी-बड़ी संख्या में बड़े-बड़े expert बैठे हैं, अर्थजगत के दिग्गज बैठे हैं। आपने भी 2014 से पहले का दौर देखा है। जब तक हालात मजबूर न कर दें, जब तक कोई संकट न आ जाए, जब कोई और रास्ता न बचे, तब मजबूरन रिफॉर्म्स किए जाते थे। आप याद करिए, 1991 का रिफॉर्म्स भी तब हुआ, जब देश पर दिवालिया होने का खतरा आ गया था। जब देश को सोना गिरवी रखना पड़ा था। पहले की सरकारों का यही तरीका था, वो reforms compulsion में ही किया करती थीं। जब 26/11 का आतंकी हमला हुआ, कांग्रेस सरकार की कलई खुल गई, तो NIA का गठन किया गया। जब पावर सेक्टर बर्बाद हो गया, ग्रिड फेल होने लगे, तब मजबूरी में कांग्रेस को पावर सेक्टर में याद आई।

साथियों,

ऐसी एक लंबी सूची है, जो याद दिलाती है कि जब compulsion में, मजबूरी में reform होता है, तो न सही नतीजे मिलते हैं, न देश को सही परिणाम मिलते हैं।

साथियों,

आज मुझे गर्व है कि बीते 11 वर्षों में हमने पूरे conviction के साथ रिफॉर्म किए हैं और यह रिफॉर्म Policy में हुए हैं, Process में हुए, Delivery में हुए और इतना ही नहीं, Mindset में भी reform हुआ है। क्योंकि साथियों, अगर पॉलिसी बदले, लेकिन प्रोसेस वही रहे, माइंडसेट वही रहे, डिलीवरी ठीक से ना हो, तो रिफॉर्म्स सिर्फ और सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। इसलिए हमने पूरे सिस्टम को बदलने के लिए ईमानदारी से कोशिश की है।

साथियों,

मैं प्रोसेस की बात करूं, तो एक साधारण लेकिन बहुत जरूरी प्रोसेस है, कैबिनेट नोट्स का। यहां कई लोगों को अंदाजा होगा कि पहले की सरकारों में एक कैबिनेट नोट बनने में ही कुछ महीने लग जाते थे, महीने। अब इस स्पीड से देश का विकास कैसे होता? इसलिए हमने इस process को बदला। हमने डिसीजन मेकिंग को time-bound और technology-driven बनाया। हमने यह तय कर दिया कि इस अफसर की टेबल पर यह कैबिनेट नोट इतने घंटे से ज्यादा रहेगा ही नहीं। या तो रिजेक्ट करो या निर्णय लो और इसका नतीजा आज देश देख रहा है।

साथियों,

मैं आपको रेलवे ओवर ब्रिज के अप्रूवल का भी उदाहरण दूंगा। पहले R.O.B का एक डिजाइन अप्रूव कराने के लिए कई वर्ष लग जाते थे, कई सारी क्लीयरेंस की ज़रूरत थीं, कई जगह चिट्ठियां लिखनी पड़ती थीं और यह मैं प्राइवेट के लिए नहीं कह रहा हूं, सरकार को। हमने इसको भी बदला और आज देखिए कितनी तेजी से रोड और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है। विनीत जी ने बहुत विस्तार से इस बात को बताया।

साथियों,

एक बड़ा Interesting उदाहरण बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर का है। अब बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर देश की security से जुड़ा हुआ होता है। आप कल्पना कर सकते हैं, एक समय था, जब बॉर्डर एरियाज़ में एक साधारण सी सड़क बनाने के लिए भी कुछ परमिशन दिल्ली से लेनी पड़ती थी। जिला स्तर पर निर्णय लेने के यानी इसके सामने एक प्रकार से उसका कोई अधिकारी ही नहीं थे, दीवार ही दीवार थीं, वो निर्णय नहीं कर सकता था और इसलिए तो दशकों बाद भी हमारे देश में बॉर्डर इंफ्रा इतना बेहाल रहा। 2014 के बाद हमने इस प्रोसेस में भी रिफॉर्म किया, हमने स्थानीय प्रशासन को Empower किया और आज हम देश के बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से डेवलप होते देख रहे हैं।

साथियों,

बीते दशक में भारत के जिस Reform ने दुनिया में हलचल मचा दी है, वो है UPI, भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम। यह सिर्फ एक App नहीं है, यह policy, process और delivery के एक शानदार कन्वर्जेंस का प्रमाण है। जो लोग कभी बैंकिंग और फाइनेंस से जुड़े बेनिफिट्स के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, UPI देश के ऐसे नागरिकों को सर्व कर रहा है। यह जो डिजिटल इंडिया है, डिजिटल पेमेंट सिस्टम है, जनधन आधार मोबाइल की ट्रिनिटी है, यह रिफॉर्म किसी compulsion से नहीं हुआ, यह हमारा कन्विक्शन था। और कन्विक्शन यह था कि जिन लोगों तक पहले की सरकारें कभी नहीं पहुंची, हमें ऐसे नागरिकों का इंक्लूजन करना है। जिसे कोई नहीं पूछता, उसे मोदी पूजता है। और इसलिए यह रिफॉर्म्स किए गए हैं और आज भी हमारी सरकार इसी सोच के साथ चल रही है।

साथियों,

भारत का यह जो नया मिज़ाज है, वो हमारे बजट में भी रिफ्लेक्ट होता है। पहले जब बजट की चर्चा होती थी, तो फोकस सिर्फ Outlay पर होता था। कितना पैसा आवंटित हुआ, क्या सस्ता हुआ, क्या महंगा हुआ और उस दिन टीवी देखेंगे, तो पूरी टीवी एक ही यानी इनके लिए, बजट मतलब इंकम टैक्‍स ऊपर गया कि नीचे गया, इसके आगे उनको देश दिखता ही नहीं है। और होता क्‍या था, कितनी नई ट्रेनें घोषित हुईं, यही चलता रहता था, उन घोषणाओं का बाद में क्या हुआ, कोई पूछने वाला ही नहीं था। और इसलिए हमने बजट को Outlay के साथ-साथ Outcome सेंट्रिक बनाया।

साथियों,

बजट में एक और बड़ा बदलाव आया है। 2014 से पहले Off-Budget Borrowing पर बहुत अधिक चर्चा होती थी। लेकिन अब Off-Budget Reforms की चर्चा होती है। बजट से बाहर, नेक्स्ट जनरेशन GST रिफॉर्म्स हुए, प्लानिंग कमीशन की जगह नीति आयोग बनाया, आर्टिकल 370 की दीवार गिरा दी, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया, नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया।

साथियों,

बजट में घोषित हों, या बजट से बाहर, रिफॉर्म एक्सप्रेस लगातार गति पकड़ रही है। अगर मैं पिछले एक साल की ही बात करूं तो हमने Ports & Maritime सेक्टर में Reform किया, शिप बिल्डिंग इंडस्ट्री के लिए अनेक Initiative लिए, जन-विश्वास एक्ट के तहत रिफॉर्म्स को और आगे बढ़ाया, Energy Security के लिए Shanti Act बनाया, लेबर कानूनों से जुड़े रिफॉर्म्स को लागू किया, भारतीय न्याय संहिता लेकर आए, वक्फ कानून में Reform किया गया है, गांव में रोजगार के लिए नया G RAM G कानून बनाया, ऐसे अनेक Reforms साल भर होते रहे हैं।

साथियों,

इस साल के बजट ने रिफॉर्म एक्सप्रेस को और आगे बढ़ाया है। वैसे तो बजट के बहुत सारे आयाम हैं, लेकिन मैं दो Important फैक्टर्स की बात करूंगा। Capex और Technology, बीते वर्षों की भांति इस बजट में भी, इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को बढ़ाकर करीब 17 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। और आप जानते हैं कि कैपेक्स का मल्टीप्लायर effect कितना बड़ा होता है। इससे देश की कैपेसिटी और प्रोडक्टिविटी बढ़ती है। अनेकों सेक्टर्स में बहुत बड़ी संख्या में जॉब क्रिएशन भी होती है। पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप का निर्माण, देश के टीयर-2, टीयर-3 शहरों के लिए सिटी इकोनॉमिक रीजन्स का निर्माण और सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, ऐसे बजट अनाउंसमेंट्स, सही मायने में युवाओं पर, देश के फ्यूचर पर, यह इन्वेस्टमेंट हैं।

साथियों,

बीते दशक में हमने टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को ग्रोथ का कोर ड्राइवर माना है। इसी सोच के साथ, देश में स्टार्टअप कल्चर, हैकाथॉन कल्चर, उसको हमने प्रमोट किया। आज देश में, दो लाख से अधिक स्टार्टअप, रजिस्टर्ड स्टार्टअप्स हैं और यह डायवर्स सेक्टर्स में काम कर रहे हैं। हमने युवाओं को प्रोत्साहित किया, देश में रिस्क टेकिंग कल्चर को पुरस्कृत करने का भाव जगाया और परिणाम हमारे सामने है। इस साल का बजट, हमारी इसी प्राथमिकता को और मजबूत करता है। विशेष तौर पर बायोफार्मा, सेमीकंडक्टर और AI जैसे सेक्टर के लिए, इस बजट में महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं।

साथियों,

आज जब देश की आर्थिक ताकत बढ़ी है, तो हम राज्यों को भी उतना ही ज्यादा सशक्त कर रहे हैं। मैं एक और आंकड़ा आपको देना चाहता हूं। 2004 से 2014, 10 साल, इस दरमियान राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के तौर पर 18 लाख करोड़ रुपए के आसपास ही मिले थे, 2004 से 2014 तक। जबकि 2014 से लेकर 2025 तक, राज्यों को 84 लाख करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। अगर मैं इस साल बजट में प्रस्तावित लगभग 14 लाख करोड़ का आंकड़ा और जोड़ दूं, तो हमारी सरकार में राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के करीब-करीब 100 लाख करोड़ रुपए मिलने तय हुए हैं। यह राशि केंद्र सरकार की तरफ से अलग-अलग राज्य सरकारों को मिली है, ताकि वो अपने यहां विकास के कार्यों को आगे बढ़ा सकें।

साथियों,

आजकल आप लोग भारत के FTA’s यानि फ्री ट्रेड डील्स पर काफी चर्चा कर रहे हैं और मैं यहां enter हुआ, वहीं से शुरू हो गए लोग। दुनियाभर में इसका एनालिसिस हो रहा है। लेकिन मैं आज इसका एक और इंटरेस्टिंग एंगल आपको बताता हूं, मीडिया को जो चाहिए, वो तो इसमें नहीं होगा शायद, लेकिन हो सकता है कि कुछ काम में आ जाए। और मैं पक्का मानता हूं, जो बात मैं कहने जा रहा हूं, आपने भी इसके बारे में विचार नहीं किया होगा। क्या आपने कभी सोचा है कि आज इतने सारे विकसित देशों के साथ फ्री-फ्री ट्रेड डील्स हो रहे हैं, क्या यही काम 2014 से पहले क्यों नहीं हो पाए? देश वही, युवा शक्ति वही, सरकारी सिस्टम वही, तो बदला क्या? बदलाव, सरकार के विजन में आया है, नीति और नीयत में बदलाव आया है, भारत के सामर्थ्य में बदलाव आया है।

साथियों,

आप ज़रा सोचिए, फ्रेजाइल फाइव इकोनॉमी जब थी, तब कौन हमारे साथ डील करता? गांव में भी गरीब की बेटी को कोई रईस के परिवार वाला शादी करता है क्या? वो उसको छोटा मानता है, हमारा भी यही हाल था भाई दुनिया में। जब देश पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा था, चारों तरफ घोटाले और घपले थे, तब कौन भारत पर भरोसा कर पाता? 2014 से पहले भारत में मैन्युफैक्चरिंग का बेस बहुत कमजोर था और जिसके कारण, पहले की सरकारें भी डरती थी, एक तो कोई आता नहीं था और जरा सा भी कोई कोशिश करें, तो यह लोग भी डरते थे और डर यह था कि अगर विकसित देशों के साथ डील हो गई, तो वो हमारे बाजार पर कब्जा कर लेंगे, वो यहां अपने प्रोडक्ट डंप करने लगेंगे, हताशा-निराशा के उस माहौल में 2014 से पहले यूपीए सरकार सिर्फ चार देशों के साथ ही कॉम्प्रिहेंसिव ट्रेड एग्रीमेंट कर पाई थी। जबकि, बीते दशक में भारत ने जो ट्रेड डील्स की हैं, उनमें दुनिया के 38 कंट्री कवर होते हैं, 38 कंट्री। और यह दुनिया के अलग-अलग रीजन्स में हैं। आज हम इसलिए दुनिया के साथ ट्रेड डील्स कर रहे हैं क्योंकि आज का भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ है। आज का भारत, दुनिया के साथ कंपीट करने के लिए तैयार है। बीते 11 वर्षों में भारत ने मैन्युफैक्चरिंग का एक मजबूत इकोसिस्टम देश में विकसित किया है। इसलिए, आज भारत समर्थ है, सशक्त है और इसलिए दुनिया भी हम पर भरोसा करती है। यही बदलाव हमारी Trade Policy में आए Paradigm Shift का आधार बने और यही Paradigm Shift विकसित भारत की हमारी यात्रा का अनिवार्य स्तंभ बना है।

साथियों,

आज हमारी सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ देश के हर नागरिक को विकास में सहभागी बनाते हुए कार्य कर रही है। जो विकास की दौड़ में पीछे छूट गया, हम उसके विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। पहले की सरकारों ने दिव्यांग जनों के लिए सिर्फ घोषणाएं कीं, हम भी उसी रास्ते को जारी रख सकते थे, लेकिन ये सरकार की संवेदनशीलता का उदाहरण है। आप में से शायद जो बातें मैं बता रहा हूं, आप जिस लेवल के लोग हैं, शायद उसमें फिट नहीं बैठती होगी। हमारे दिव्यांग जनों के लिए जैसे हमारे यहां Language में बिखराव है ना, Sign Language का भी वही हाल था जी। तमिलनाडु में जाओ तो एक Sign Language, उत्तर प्रदेश में जाओ तो दूसरी, गुजरात में जाओ तो तीसरी, असम में जाओ तो चौथी, अगर यहां का दिव्‍यांग असम गया, तो बेचारा समझ ही नहीं पाता था। अब यह कोई बड़ा काम तो नहीं था। अगर संवेदनशील सरकार होती है ना, तो उसको यह काम छोटा नहीं लगता है। और देश ने पहली बार Indian Sign Language को institutionalise किया, common किया, व्यवस्था बनाई है। ऐसे ही, देश की Transgender community कब से अपने अधिकारों के लिए लड़ रही थी। हमने उनके लिए भी कानून बनाकर उन्हें सम्मान से जीने का कवच दिया है। बीते दशक में ही देश की करोड़ों बहनों को तीन-तलाक की कुरीति से मुक्ति मिली, लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण पक्का हुआ।

साथियों,

आज सरकारी मशीनरी की सोच भी बदली है, उसमें संवेदनशीलता आई है। सोच का अंतर क्या होता है, यह हम जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज देने वाली स्कीम में भी देखते हैं। विपक्ष के कुछ लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं और कुछ अखबारों में जरा छपता भी ज्यादा है। कोई मजाक उड़ाता है कि जब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल ही गए हैं, तो उनको मुफ्त राशन क्यों मिलता है? अजीबोगरीब सवाल है। अगर आप बीमार हैं, अस्पताल में गए और अस्पताल से आपको छुट्टी मिली, तो भी डॉक्टर कहता है कि सात दिन तक यह-यह संभालना, पंद्रह दिन तक यह-यह संभालना, कहता है कि नहीं कहता है? गरीबी से बाहर निकले हैं, लेकिन यह सवाल पूछ रहे हैं कि निकले हैं, तो फिर अनाज क्यों देते हो? ऐसी संकीर्ण मानसिकता वाले लोग, यह नहीं सोचते कि सिर्फ गरीबी से बाहर निकालना काफी नहीं होता, बल्कि जो व्यक्ति नियो मिडिल क्लास में आया है, वो फिर गरीबी के चंगुल में न फंस जाए, यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है। इसलिए उसे आज अनाज मुफ्त की सुविधा मिल रही है, यह आवश्यक है। बीते वर्षों में केंद्र सरकार ने इस योजना पर लाखों करोड़ रुपए खर्च किए हैं, इससे गरीब और नियो मिडिल क्लास को बहुत बड़ा संबल मिला है।

साथियों,

सोच का एक और फर्क हम अपने आसपास भी देखते हैं। कुछ लोग हैं, जो कहते हैं कि ये मोदी 2047 की बात क्यों करता है? 2047 में विकसित भारत बनेगा, नहीं बनेगा, किसने देखा? हम रहें या ना रहें, उससे हमारा लेना देना क्या है? अब देखिए, यह सोच है और यह बड़े-बड़े लोगों की सोच है, यह कोई मैं अपने शब्द नहीं बता रहा हूं।

साथियों,

जिन लोगों ने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, लाठियां खाईं, कालापानी की सज़ाएं पड़ी, फांसी के तख्त पर चढ़ गए, अगर वो भी यही सोचते कि आजादी पता नहीं कब मिले, हम क्यों आज आजादी के लिए लाठी खाएं, तो सोचिए, क्या उस सोच के साथ देश कभी आजाद हो पाता क्या? जब राष्ट्र प्रथम का भाव हो, जब देश हित सर्वोपरि हो, तो हर निर्णय देश के लिए होता है, हर नीति देश के लिए बनती है। हमारी सोच स्पष्ट है, विजन साफ है, हमें देश को विकसित बनाने के लिए निरंतर काम करना है। 2047 तक हम रहें न रहें, लेकिन यह देश रहेगा, इस देश की संतानें रहेंगी। इसलिए हमें और इसलिए हमें अपना आज खपाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का कल सुरक्षित रहे, उज्ज्वल रहे। मैं आज अपनी आज बो रहा हूं क्योंकि कल की पीढ़ी को फल खाने को मौका मिले।

साथियों,

दुनिया को अब डिसरप्शन के साथ जीने के लिए तैयार रहना होगा। समय के साथ इनके नेचर में बदलाव आएगा, लेकिन यह तय है कि अब व्यवस्थाएं बहुत तेजी से बदलेंगी। AI से जो Disruption हो रहे हैं, वो तो आप देख ही रहे हैं। आने वाले समय में AI और भी क्रांतिकारी बदलाव लेकर आने वाली है, भारत इसके लिए भी तैयार है। कुछ ही दिनों में भारत में ग्लोबल AI इम्पैक्ट समिट होने जा रही है। दुनिया के अनेक देश, दुनियाभर के टेक लीडर्स, इस समिट में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रहे हैं। सभी के साथ मिलकर, हम एक बेहतर विश्व बनाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। इसी भरोसे के साथ, एक बार फिर इस Summit के लिए आप सभी को बहुत सारी मेरी शुभकामनाएं।

बहुत-बहुत धन्यवाद!

वंदे मातरम!