भारत के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन का निर्माण किया गया है: प्रधानमंत्री
विकसित भारत की ओर बढ़ते हुए यह अनिवार्य है कि भारत औपनिवेशिक मानसिकता के हर अंश को त्याग दे: प्रधानमंत्री
रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग करना केवल नाम का परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह सत्ता की मानसिकता को सेवा के भाव में बदलने का एक प्रयास था: प्रधानमंत्री
नए प्रधानमंत्री कार्यालय को सेवा तीर्थ का नाम दिया गया है; सेवा, या सेवा का भाव, भारत की आत्मा है, यही भारत की पहचान है: प्रधानमंत्री

केंद्र सरकार के सभी मंत्रीगण, सभी सांसदगण, सरकार के सभी कर्मचारी, अन्य महानुभाव और मेरे प्यारे साथियों !

आज हम सभी एक नए इतिहास को बनते देख रहे हैं। आज विक्रम संवत दो हजार बयासी, फाल्गुन कृष्ण पक्ष, विजया एकादशी, ये महत्वपूर्ण शुभ दिन माघ चौबीस, शक संवत् उन्नीस सौ सैंतालीस का पुण्य अवसर और आज की प्रचलित भाषा में कहूं तो, 13 फरवरी का ये दिन, भारत की विकास यात्रा में एक नए आरंभ का साक्षी बन रहा है। हमारे यहां शास्त्रों में विजया एकादशी का बहुत महत्व रहा है, इस दिन जिस संकल्प के साथ आगे बढ़ते हैं, उसमें विजय अवश्य प्राप्त होती है। आज हम सभी भी विकसित भारत का संकल्प लेकर सेवा तीर्थ में, कर्तव्य भवन में प्रवेश कर रहे हैं। अपने लक्ष्य में विजयी होने का दैवीय आशीर्वाद हमारे साथ है। मैं आप सभी को, PMO की पूरी टीम को, कैबिनेट सचिवालय और विभिन्न विभागों के सभी कर्मचारियों को सेवातीर्थ और नए भवनों की बधाई देता हूं। मैं इनके निर्माण से जुड़े सभी इंजीनियर्स का और श्रमिक साथियों का आभार व्यक्त करता हूं।

साथियों,

आजादी के बाद साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतों से देश के लिए अनेक अहम निर्णय हुए, नीतियां बनीं। लेकिन ये भी सच है कि ये इमारतें ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतीक के तौर पर बनाई गई थीं। इन इमारतों को बनाने का मकसद भारत को सदियों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखना था।

साथियों,

आप भी जानते हैं, एक समय था, जब कोलकाता शहर देश की राजधानी हुआ करता था। लेकिन 1905 के बंगाल विभाजन के उस दौर में कोलकाता ब्रिटिश विरोधी आंदोलन का प्रबल केंद्र बन चुका था। और इसलिए अंग्रेजों ने 1911 में भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट किया, और उसी के बाद अंग्रेजी हुकूमत की जरूरतों और उसकी सोच को ध्यान में रखकर नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक जैसी इमारतें बनाने का काम शुरू हुआ। इसके बाद जब रायसीना हिल्स के इन भवनों का उद्घाटन हुआ था, तब उस समय के वायसराय ने कहा था, जो नए भवन बने हैं, वो ब्रिटिश सम्राट की इच्छाओं के अनुरूप बने हैं, यानी उस दौर में ये भवन ब्रिटेन के महाराजा की सोच को गुलाम भारत की जमीन पर उतारने का माध्यम थे। रायसीना हिल्स का चुनाव भी इसलिए किया गया कि ये इमारतें, अन्य इमारतों से ऊपर रहें, कोई उनकी बराबरी ना कर सके। अब संयोग से सेवा तीर्थ का ये पूरा परिसर किसी पहाड़ी पर ना होकर, जमीन से ज्यादा जुड़ा है। साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतें, जहां ब्रिटिश हुकूमत की सोच को लागू करने के लिए बनी थीं, वहीं आज मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन जैसे नए परिसर, भारत की, जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बने हैं। यहां से जो फैसले होंगे, वो किसी महाराजा की सोच को नहीं, 140 करोड़ देशवासियों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने का आधार बनेंगे। इसी अमृत भावना के साथ आज मैं ये सेवा तीर्थ, ये कर्तव्य भवन, भारत की जनता को समर्पित कर रहा हूं।

साथियों,

इस समय 21वीं सदी का पहला क्वार्टर पूरा हो चुका है। ये आवश्यक है कि विकसित भारत की हमारी कल्पना केवल नीतियों और योजनाओं में ही नहीं, हमारे कार्यस्थलों, हमारी इमारतों में भी दिखाई दे। जहां से देश का संचालन होता है, वो जगह प्रभावी भी होनी चाहिए और प्रेरणादायी भी होनी चाहिए। वो इम्प्रेसिव भी हो और इंस्पायरिंग भी हो। आज नई-नई टेक्नोलॉजी तेजी से हमारे बीच जगह बना रही है। लेकिन, इन सुविधाओं के विस्तार के लिए , नए टूल्स के उपयोग के लिए पुरानी इमारतें नाकाफी पड़ रही थीं। साउथ ब्लॉक, नॉर्थ ब्लॉक, पुराने भवनों में जगह की कमी थी, सुविधाओं की भी अपनी सीमाएं थीं, करीब-करीब सौ साल पुरानी ये इमारतें भीतर से जर्जर होती जा रही थीं, इसके अलावा भी कई चुनौतियां थीं। मैं समझता हूं, इन चुनौतियों के बारे में भी देश को निरंतर बताया जाना जरूरी है। जैसे आजादी के इतने दशकों के बाद भी भारत सरकार के अनेकों मंत्रालय दिल्ली के 50 से ज्यादा अलग-अलग स्थानों से चल रहे हैं। हर साल, इन मंत्रालयों की इमारतों के किराए पर ही प्रति वर्ष डेढ़ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो रहे थे। हर रोज 8 से 10 हजार कर्मचारियों को एक इमारत से दूसरी इमारत में जाने का लॉजिस्टिक्स खर्च अलग होता था। अब सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवनों के निर्माण से ये खर्च कम होगा, समय बचेगा और कर्मचारियों के समय की इस बचत से प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी।

साथियों,

इस बदलाव के बीच, निश्चित तौर पर पुराने भवन में बिताए गए वर्षों की स्मृतियां हमारे साथ रहेंगी। अलग-अलग समय की चुनौतियों से जूझते हुए, वहां से कई महत्वपूर्ण फैसले किए गए हैं। वहां से देश को नई दिशा मिली, सुधार की अनेक पहलें हुई। वो परिसर, वो इमारत, भारत के इतिहास का अमर हिस्सा है। इसीलिए, हमने उस भवन को देश के लिए समर्पित म्यूज़ियम बनाने का फैसला किया है। वो युगे युगीन भारत म्यूजियम का ही हिस्सा होगी, वो इमारत देश की आने वाली पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा केंद्र बनेगी। नई पीढ़ी के युवा जब वहां जाएंगे, तो ऐतिहासिक लीगेसी उनका मार्गदर्शन करेगी।

साथियों,

विकसित भारत की इस यात्रा में, ये बहुत जरूरी है कि भारत गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर आगे बढ़े। दुर्भाग्य है, आजादी के बाद भी हमारे यहां गुलामी के प्रतीकों को ढोया जाता रहा। आप देखिए, पहले क्या स्थिति थी? प्रधानमंत्री निवास जहां है, उसे रेस कोर्स कहा जाता था। उप राष्ट्रपति के लिए कोई निवास स्थान तय ही नहीं था। राष्ट्रपति भवन तक आने वाले रास्ते को लोकतंत्र में राजपथ कहा जाता था। आजाद भारत में जो सैनिक शहीद हुए, उनके लिए कोई स्मारक ही नहीं था। जो सुरक्षाबल, जो पुलिकर्मी शहीद हुए, उनके लिए भी कोई स्मृति स्थल नहीं था। यानी, 1947 में स्वतंत्र हुए देश की राजधानी, जहां से देश के बड़े-बड़े निर्णय होते थे, वो पूरी तरह गुलामी की मानसिकता में जकड़ी हुई थी। दिल्ली की इमारतों, सार्वजनिक स्थानों, ऐतिहासिक स्थलों पर गुलामी के चिह्न ही भरे पड़े हैं ।

लेकिन साथियों,

कहते हैं ना, समय का चक्र कभी भी एक जैसा नहीं रहता। 2014 में, देश ने तय किया कि गुलामी की मानसिकता अब और नहीं चलेगी। हमने गुलामी की इस मानसिकता को बदलने का अभियान शुरू किया। हमने वीरों के नाम ‘नेशनल वॉर मेमोरियल’ बनाया। हमने पुलिस की वीरता को सम्मान देने के लिए ‘पुलिस स्मारक’ बनाई। रेस कोर्स रोड, उसका नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया। और ये केवल नाम बदलने का निर्णय ही नहीं था, ये सत्ता के मिजाज को सेवा की भावना में बदलने का पवित्र प्रयास था।

साथियों,

हमारे इन फैसलों के पीछे एक गहरी भावना है, एक विजन है। ये हमारे वर्तमान, हमारे अतीत और भविष्य को भारत के गौरव से जोड़ती है। जिस जगह को पहले राजपथ के नाम से जाना जाता था, वहां ना पर्याप्त सुविधाएं थीं, ना आम नागरिकों के लिए समुचित व्यवस्था। हमने उसे कर्तव्य पथ के रूप में विकसित किया, आज वही स्थान परिवारों, बच्चों, देशभर से आने वाले नागरिकों के लिए एक जीवंत सार्वजनिक स्थल बन चुका है। इसी परिसर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई। लंबे समय तक हमारी राजधानी में अपने महान नायकों की स्मृति को इस रूप में स्थान नहीं मिला था। हमने यह तय किया कि देश की नई पीढ़ी राजधानी के केंद्र में अपने नायकों से प्रेरणा ले। राष्ट्रपति भवन परिसर में भी परिवर्तन किए गए। मुगल गार्डन का नाम बदलकर, अमृत उद्यान किया गया। जब पुरानी संसद के पास नए संसद भवन का निर्माण हुआ, तो हमने पुराने भवन को भुलाया नहीं, हमने उसे ‘संविधान सदन’ के रूप में नई पहचान दी। जब अलग-अलग मंत्रालयों को एक परिसर में लाया गया, तो उन भवनों को ‘कर्तव्य भवन’ का नाम दिया गया। नाम बदलने की ये पहल, केवल शब्दों का बदलाव नहीं है, इन सभी प्रयासों के पीछे वैचारिक सूत्रता एक ही है- स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र पहचान, गुलामी से मुक्त निशान।

साथियों,

नए प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम है- सेवा तीर्थ। सेवा की भावना ही भारत की आत्मा है, सेवा की भावना ही भारत की पहचान है। श्री रामकृष्ण परमहंस जी कहते थे- शिव ज्ञान से जीव ज्ञान सेवा, यह विचार केवल आध्यात्मिक नहीं है, यह राष्ट्र निर्माण का दर्शन है। यह भवन हमें हर क्षण याद दिलाएगा कि शासन का अर्थ सेवा है, दायित्व का अर्थ समर्पण है। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है- ‘सेवा परमो धर्मः’। अर्थात्, सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। भारतीय संस्कृति का यही विचार प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकार का विज़न है। इसीलिए, सेवातीर्थ, ये केवल एक नाम नहीं, ये एक संकल्प है। सेवा तीर्थ यानी- नागरिक की सेवा से पवित्र हुआ स्थल! सेवा के संकल्प को सिद्धि तक ले जाने का स्थल! तीर्थ का अर्थ भी होता है- “तरति अनेन इति तीर्थ” अर्थात्, जो तारने की, पार करने की क्षमता रखे, जो लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक हो, वो तीर्थ है। आज भारत के सामने भी विकसित भारत का लक्ष्य है, आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य है। हमें करोड़ों देशवासियों को गरीबी से मुक्ति दिलानी है, हमें देश को गुलामी की मानसिकता से मुक्ति दिलानी है, और ये काम सेवा के सामर्थ्य से ही सिद्ध होगा।

साथियों,

आज जब भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है, आज जब भारत अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक नई गाथा लिख रहा है, आज जब नए-नए ट्रेड एग्रीमेंट्स संभावनाओं के नए दरवाजे खोल रहे हैं, जब देश saturation के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तो सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवनों में, आप सबके काम की नई गति और आपका नया आत्मविश्वास, देश के लक्ष्यों को प्राप्त करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा।

साथियों,

हमारी संस्कृति कहती है, हर शुभ कार्य से पहले स्वस्तिवाचन, मंगल की कामना, शुभ का संकल्प, वेद का मंत्र हमें दिशा देता है, “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।” अर्थात्, कल्याणकारी विचार हर दिशा से हम तक आते रहें। यही इस भवन की आत्मा होनी चाहिए। भारत के महान लोकतंत्र में जनता के विचार ही हमारी शक्ति है, जनता के सपने ही हमारी पूंजी है, जनता की अपेक्षाएँ ही हमारी प्राथमिकता है, जनता की आकांक्षाएँ ही हमारा मार्गदर्शन है। इन भावनाओं और इस भवन के बीच कोई दीवार नहीं होनी चाहिए, कोई दूरी नहीं होनी चाहिए। जब आप जनता के सपनों को समझेंगे, तभी नीतियाँ जीवंत होंगी, जब आप जनता की आकांक्षाओं को महसूस करेंगे, तभी निर्णय प्रभावी होंगे। पिछले 11 वर्षों में हमने Governance का एक नया मॉडल देखा है, एक ऐसा मॉडल जहाँ निर्णय, निर्णय का केंद्र भारत का नागरिक है। “नागरिक देवो भव” यह केवल वाक्य नहीं है, यह हमारी कार्य-संस्कृति है। इसे आत्मसात कर आपको इन नए भवनों में प्रवेश करना है। सेवा तीर्थ में लिया गया हर निर्णय, यहाँ चलने वाली हर फाइल, यहाँ बिताया गया हर क्षण, 140 करोड़ देशवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए। मैं हर अधिकारी से, हर कर्मचारी से, हर कर्मयोगी से कहना चाहता हूँ, जब भी आप इस भवन में कदम रखें, पलभर के लिए रूक जाएं, कुछ क्षण ठहरें, अपने आप से पूछें, क्या आज का मेरा कार्य करोड़ों देशवासियों के जीवन को आसान बनाएगा? यही आत्ममंथन इस स्थान की सबसे बड़ी शक्ति बनेगा।

साथियों,

हम यहाँ अधिकार दिखाने नहीं आए हैं, हम यहाँ जिम्मेदारी निभाने आए हैं, और हमने देखा है जब शासन सेवा भाव से चलता है, तो परिणाम भी असाधारण होते हैं, और तभी तो 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकलते हैं, तभी तो अर्थव्यवस्था नई गति पकड़ती है।

साथियों,

आज विकसित भारत 2047 सिर्फ हमारा लक्ष्य नहीं है, यह विश्व की निगाहों में भारत की प्रतिज्ञा है। और इसलिए यहाँ बनने वाली हर नीति, यहाँ होने वाला हर निर्णय, सेवा की निरंतर भावना से प्रेरित होना चाहिए। और एक दिन, जब आप सेवा-निवृत्त होकर या स्थानांतरण के बाद इस भवन से विदा लेंगे, आप पीछे मुड़कर देखेंगे, अपने आज के दिनों को गर्व के साथ याद करेंगे। तब आप स्वयं से कह सकेंगे कि हाँ, जितने दिन मैं सेवा तीर्थ में रहा, कर्तव्य भवन में रहा, हर दिन मैंने देश के नागरिकों की सेवा की, हर निर्णय राष्ट्र के हित में लिया। वह क्षण आपको सुकून देगा, वह क्षण आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगा, वह क्षण आपकी व्यक्तिगत पूंजी होगा, और वही पूंजी आपके जीवन को गौरव से भर देगी।

साथियों,

महात्मा गांधी की भावना थी, कर्तव्य की बुनियाद पर ही अधिकार की भव्य इमारत का निर्माण होता है, जब हम अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो बड़ी से बड़ी चुनौती से टकरा सकते हैं, उसका समाधान कर सकते हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने इसलिए ही कर्तव्य पर बहुत जोर दिया है। और इसलिए हमें याद रखना है, कोटि-कोटि देशवासियों के सपनों को साकार करने का आधार है- कर्तव्य ! कर्तव्य आरंभ है, कर्तव्य इस जीवंत राष्ट्र की प्राणवायु है। करुणा और कर्मठता के स्नेह-सूत्र में बंधा कर्म है– कर्तव्य ! संकल्पों की आस है– कर्तव्य ! परिश्रम की पराकाष्ठा है– कर्तव्य ! हर समस्या का समाधान है- कर्तव्य, विकसित भारत का विश्वास है- कर्तव्य ! कर्तव्य समता है, कर्तव्य ममता है, कर्तव्य सार्वभौमिक है, कर्तव्य सर्वस्पर्शी है। सबका साथ-सबका विकास के भाव में पिरोया मंत्र है- कर्तव्य ! राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव है– कर्तव्य ! हर जीवन में ज्योति जगा दे, वो इच्छाशक्ति है– कर्तव्य ! आत्मनिर्भर भारत का उल्लास है- कर्तव्य ! भावी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है– कर्तव्य ! मां भारती की प्राण-ऊर्जा का ध्वजवाहक है– कर्तव्य ! राष्ट्र के प्रति भक्ति-भाव से किया हर कार्य है- कर्तव्य! ‘नागरिक देवो भव’ की साधना का जागृत पथ है- कर्तव्य !

साथियों,

कर्तव्य की इसी भावना से, इस भावना को सर्वोपरि रखते हुए, हमें सेवातीर्थ और नए बने भवनों में कर्तव्य भाव से प्रवेश करना है।

साथियों,

आज भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, एक नई ऊँचाई की ओर, एक नए युग की ओर। आने वाले वर्षों में हमारी पहचान केवल अर्थव्यवस्था से नहीं होगी, हमारी पहचान होगी, Governance की गुणवत्ता से, नीतियों की स्पष्टता से, और कर्मयोगियों की निष्ठा से। सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवनों में लिया गया हर निर्णय, केवल एक फाइल का फैसला नहीं होगा, 2047 के विकसित भारत की दिशा तय करेगा। याद रखिए 2047 का लक्ष्य सिर्फ एक तारीख नहीं है, वो 140 करोड़ सपनों की समय-सीमा है। इस यात्रा में हर संस्थान महत्वपूर्ण है, हर अधिकारी महत्वपूर्ण है, हर कर्मचारी, हर कर्मयोगी महत्वपूर्ण है। मैं चाहता हूँ, सेवातीर्थ संवेदनशील शासन का प्रतीक बने, नागरिक-केंद्रित व्यवस्था का रोल मॉडल बने, ऐसा स्थान, जहाँ सत्ता नहीं, सेवा दिखे, जहाँ पद नहीं, प्रतिबद्धता दिखे, जहाँ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व दिखे। मुझे पूरा विश्वास है, हमारा संकल्प इतिहास लिखेगा, हमारा परिश्रम पीढ़ियों को दिशा देगा। मैंने लाल किले से कहा था- ‘यही समय है, सही समय है’। आइए, हम हर पल, हर क्षण का सही इस्तेमाल करें। हम राष्ट्र प्रथम की भावना से ऐसे पुण्य कार्य करें कि आने वाली शताब्दियाँ कहें, यही वह समय था, जब भारत ने स्वयं के भाग्य को पुन: परिभाषित किया। यही वह समय था, जब भारत ने अगले एक हजार साल के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना मजबूत कदम नई ऊर्जा, नई गति के साथ उठाया था। इसी विश्वास के साथ,आप सभी को मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। बहुत-बहुत धन्यवाद।

वंदे मारतम् !

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Prime Minister shares address by Shri Amit Shah in Lok Sabha on India’s decisive fight against Naxalism
March 30, 2026

The Prime Minister, Shri Narendra Modi shared the outstanding speech delivered by Union Home Minister Shri Amit Shah ji, noting that it was filled with important facts, historical context, and a detailed account of the Government’s efforts over the past decade. Shri Modi highlighted that for decades, the retrograde Maoist ideology had an adverse impact on the development of several regions, with Left Wing Extremism severely affecting the future of countless youngsters.

He further underlined that over the last ten years, the Government has worked towards uprooting this menace, while simultaneously ensuring that the benefits of development reach areas affected by Naxalism. The Prime Minister reaffirmed that the Government will continue to focus on strengthening good governance and ensuring peace and prosperity for all.

The Prime Minister posted on X:

“This is an outstanding speech by the Home Minister, Shri Amit Shah Ji, filled with important facts, historical context and the efforts of our Government in the last decade.

For decades, the retrograde Maoist ideology had an adverse impact on the development of several regions. Left Wing Extremism has ruined the future of countless youngsters.

In the last decade, our Government has worked towards uprooting this menace and at the same time ensuring the fruits of development reach areas affected by Naxalism. We will keep focusing on furthering good governance and ensuring peace and prosperity for all.”