हर राज्य में कई जिले ऐसे हैं जिनका विकास का मापदंड मजबूत है, हम उनसे सीखकर कमजोर जिलों के लिए काम कर सकते हैं: प्रधानमंत्री मोदी 
प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद की भावना देश के लिए बहुत अच्छी है: पीएम मोदी 
देश के पिछड़े जिलों के विकास के लिए जनभागीदारी बहुत जरूरी है: प्रधानमंत्री 
हमें उन क्षेत्रों की पहचान करना जरूरी है जहां जिलों को सुधार की जरूरत है और फिर उनकी कमियों से निपटा जाना चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज संसद के केंद्रीय हॉल में राष्ट्रीय जनप्रतिनिधि सम्मेलन को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘ प्रत्येक राज्य में ऐसे कुछ जिले हैं जहां विकास मानक मजबूत हैं। हमें उनसे सीखना चाहिए और कमजोर जिलों पर काम करना चाहिए।

प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद की भावना देश के लिए बहुत अच्छी है।

जन सहभागिता से हमेशा सहायता मिलती है। जहां कहीं भी अधिकारियों  ने लोगों के साथ मिल कर काम किया है और उन्हें विकास की प्रक्रिया से जोड़ा है, परिणाम रूपांतरकारी रहे हैं।

 

यह अनिवार्य है कि ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जाए जहां जिलों में सुधार की आवश्यकता है और फिर कमियों को दूर किया जाए।

अगर हमने जिलों के एक पहलू में भी बदलाव लाने का फैसला कर लिया तो हमें दूसरी कमियों पर कार्य करने की गति प्राप्त होने लगेगी।

हमारे पास श्रम शक्ति है, हमारे पास कौशल और संसाधन हैं, हमें एक मिशन मोड में काम करने और एक सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है। हमारा लक्ष्य सामाजिक न्याय है।

आकांक्षापूर्ण जिलों में काम करने से एचडीआई में भारत की स्थिति में सुधार आएगा।

जनप्रतिनिधियों का यह सम्मेलन सभापति सुमित्रा महाजन जी द्वारा एक सराहनीय पहल है। यह बहुत अच्छी बात है कि विभिन्न जिलों के जनप्रतिनिधि महत्वपूर्ण मुद्वों पर चर्चा करने के लिए एक साथ आएं।‘

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प्रधानमंत्री ने सुव्यवस्थित मानकों से मानवीय आचरण के मार्गदर्शन को दर्शाने वाले एक संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया
May 20, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया। इसका अभिप्राय है कि श्रेष्ठ आचरण एक दीपक की तरह है जो न केवल एक व्यक्ति को बल्कि पूरे समाज को आलोकित करता है। श्री मोदी ने कहा कि इसी आदर्श को अपनाकर हमारे देश के लोग आज पूरे संयम, क्षमता और कर्तव्य परायणता के साथ राष्ट्र निर्माण में जुटे हुए हैं।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा:

"श्रेष्ठ आचरण वह दीपक है, जिससे व्यक्ति के साथ-साथ समाज भी आलोकित होता है। इसी आदर्श को अपनाते हुए हमारे देशवासी आज पूरे संयम, सामर्थ्य और कर्तव्यनिष्ठा से राष्ट्र निर्माण में जुटे हुए हैं।”

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।"

क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका निर्धारण व्यक्तिपरक राय या क्षणिक आवेग पर नहीं, बल्कि शास्त्र आधारित एक सुव्यवस्थित मानक के अनुसार होना चाहिए, जो आचरण को दिशा और अनुशासन प्रदान करता है। इसलिए, व्यक्ति को स्थापित मानकों की उस प्रणाली के अनुसार कार्य करना चाहिए, ताकि उसका आचरण संतुलित, मान्य और सार्थक हो सके।