मैं दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता में जोहान्सबर्ग में आयोजित हो रहे 20वें जी-20 लीडर्स समिट में भाग लेने के लिए राष्ट्रपति श्री सिरिल रामफोसा के निमंत्रण पर 21 से 23 नवंबर, 2025 तक दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर जा रहा हूं।

यह शिखर सम्मेलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा क्योंकि यह अफ्रीका में आयोजित होने वाला पहला जी-20 शिखर सम्मेलन होगा। 2023 में भारत की जी-20 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ जी-20 का सदस्य बना था।

यह शिखर सम्मेलन प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर चर्चा का एक अवसर होगा। इस वर्ष के जी-20 का विषय 'एकजुटता, समानता और स्थिरता' है, जिसके माध्यम से दक्षिण अफ्रीका ने नई दिल्ली, भारत और रियो डी जेनेरियो, ब्राज़ील में आयोजित पिछले शिखर सम्मेलनों के परिणामों को आगे बढ़ाया है। मैं इस शिखर सम्मेलन में 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य' के हमारे दृष्टिकोण के अनुरूप अपने देश का दृष्टिकोण प्रस्तुत करूंगा।

मैं भागीदार देशों के नेताओं से मुलाकात और शिखर सम्मेलन के दौरान आयोजित होने वाले छठे आईबीएसए शिखर सम्मेलन में भागीदारी की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा हूं।

इस यात्रा के दौरान मैं दक्षिण अफ्रीका में भारतीय प्रवासियों के साथ बातचीत करने के लिए भी उत्सुक हूं, जो भारत के बाहर सबसे बड़े प्रवासियों में से एक है।

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प्रधानमंत्री ने पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित करने वाले संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया
March 10, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने संस्कृत में रचित सुभाषितम् को साझा किया, जिसमें पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित किया गया है।

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”

सुभाषितम् का अर्थ है कि पृथ्वी, जो महासागरों के रूप में जल से परिपूर्ण है और बाहरी रूप से जल से घिरी है, जिसे विद्वानों ने अपने ज्ञान से जाना है और जिसका हृदय विशाल आकाश में शाश्वत सत्य से ओत-प्रोत है - वह पृथ्वी एक महान राष्ट्र के रूप में हमारी ऊर्जा और शक्ति को बनाए रखे।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर अपनी पोस्‍ट में लिखा;

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”