“আধ্যাত্মিকতা বিস্তারের পাশাপাশি বিশ্বাসের কেন্দ্রগুলি সামাজিক চেতনা ছড়িয়ে দেওয়ার ক্ষেত্রে একটি বড় ভূমিকা পালন করে”
“রামনবমী অযোধ্যা এবং সমগ্র দেশে মহা ধুমধামের সঙ্গে পালিত হচ্ছে”
জল সংরক্ষণ এবং প্রাকৃতিক চাষের উপর গুরুত্ব আরোপ
“অপুষ্টির যন্ত্রণা সম্পূর্ণরূপে নির্মূল করা দরকার”
“কোভিড সংক্রমণ খুবই বিভ্রান্তিকর এবং এর বিরুদ্ধে আমাদের সজাগ থাকতে হবে”

सम्बर में माता उमिया धाम मंदिर और उमिया धाम कैम्पस के शिलान्यास का सौभाग्य मुझे मिला था। और आज घाटिला के इस भव्य आयोजन में आप ने मुझे निमंत्रित किया, इसका मुझे आनंद है। प्रत्यक्ष आया होता तो मुझे अधिक खुशी होती, परंतु प्रत्यक्ष नहीं आ सका, फिर भी दूर से पुराने महानुभावों के दर्शन हो सकते हैं, वह भी मेरे लिए खुशी का अवसर है।

आज चैत्र नवरात्र का नौंवा दिन है। मेरी आप सभी को मंगलकामना है कि मां सिद्धदात्री आप सभी की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करें। हमारा गिरनार जप और तप की भूमि है। गिरनार धाम में बिराजमान मां अंबा । और इसी तरह से शिक्षा और दिक्षा का स्थान भी यह गिरनार धाम है। और भगवान दत्तात्रेय जहां बिराजमान है, उस पुण्यभूमि को मैं प्रणाम करता हूं। यह भी मां का ही आशीर्वाद है कि हम सब साथ मिलकर सदैव गुजरात की चिंता करते रहे हैं, गुजरात के विकास के लिए प्रयत्नशील रहे हैं, गुजरात के विकास के लिए हमेशा कुछ न कुछ योगदान देते रहे हैं और साथ मिलकर कर रहे हैं।

मैंने तो इस सामूहिकता की शक्ति का हमेशा अनुभव किया है। आज जब प्रभु रामचंद्र जी का प्रागट्य महोत्सव भी है, अयोध्या में अति भव्यता से उत्सव मनाया जा रहा है, देशभर में मनाया जा रहा है, वह भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण बात है।

मेरे लिए आप सब के बीच आना कोई नई बात नहीं है, माता उमिया के चरणों में जाना भी नई बात नहीं है। शायद पिछले 35 सालों में ऐसा कभी हुआ नहीं कि जहां कहीं न कहीं, कभी न कभी, मेरा आप के बीच आना न हुआ हो। इसी तरह, आज फिर एक बार, मुझे पता है, अभी किसी ने बताया था, 2008 में यहां लोकार्पण के लिए मुझे आने का अवसर मिला था। यह पावन धाम एक तरह से श्रद्धा का केंद्र तो रहा ही, लेकिन मुझे जानकारी मिली है कि यह अभी एक सामाजिक चेतना का केंद्र भी बन गया है। और टूरिज्म का केंद्र भी बन गया है। 60 से ज्यादा कमरे बने हैं, कई सारे मैरिज हॉल बने हैं, भव्य भोजनालय बना है। एक तरह से मां उमिया के आशीर्वाद से मां उमिया के भक्तों को और समाज को चेतना प्रकट करने के लिए जो कोई आवश्यकताएं हैं, वह सब पूरी करने का प्रयास आप सभी के द्वारा हुआ है। और 14 साल के इस कम समय में जो व्याप बढ़ाया है, उसके लिए यहां के सभी ट्रस्टियों, कार्यवाहकों को और मां उमिया के भक्तों को भी बहुत-बहुत अभिनंदन देता हूं।

अभी हमारे मुख्यमंत्री जी ने काफी भावनात्मक बात की। उन्होंने कहा कि यह धरती हमारी माता है, और मैं अगर उमिया माता का भक्त हूं, तो मुझे इस धरती माता को पीड़ा देने की कोई वजह नहीं है। घर में हम हमारी मां को बिना वजह दवाई खिलायेंगे क्या? बिना वजह खून चढ़ाना वगैरह करेंगे क्या ? हमें पता है कि मां को जितना चाहिए, उतना ही देना होता है। पर हमने धरती मां के लिए ऐसा मान लिया कि उनको ये चाहिए, वो चाहिए... फिर मां भी ऊब जाए कि न ऊब जाए...?

और उसके चलते हम देख रहे हैं कि कितनी सारी मुसीबतें आ रही है। इस धरती मां को बचाना एक बड़ा अभियान है। हम भूतकाल में पानी की संकट में जीवन व्यतीत कर रहे थे। सूखा हमारी हमेशा की चिंता का विषय था। पर जब से हमने चेकडैम का अभियान शुरू किया, जलसंचय का अभियान शुरू किया, Per Drop More Crop, Drip Irrigation का अभियान चलाया, सौनी योजना लागू की, पानी के लिए खूब प्रयास किए।

गुजरात में मैं जब मुख्यमंत्री था और किसी और राज्य के मुख्यमंत्री से बात करता था कि हमारे यहां पानी के लिए इतना ज्यादा खर्च करना पड़ता है और इतनी सारी मेहनत करनी पड़ती है। हमारी ज्यादातर सरकार का समय पानी पहुंचाने में व्यतीत होता है। तो और राज्यों को आश्चर्य होता था, क्योंकि उनको इस मुसीबत का अनुमान नहीं था। उस मुसीबत से हम धीरे-धीरे बाहर निकले, कारण, हमने जनआंदोलन शुरू किया। आप सभी के साथ-सहकार से जन आंदोलन किया। और जनआंदोलन, जनकल्याण के लिए किया। और आज पानी के लिए जागरूकता आई है। पर फिर भी मेरा मानना है कि जल संचय के लिए हमें जरा भी उदासीन नहीं रहना चाहिए। क्योंकि यह हर बारिश से पहले करने का काम है। तालाब गहरे बनाने हैं, नालें साफ करने हैं, यह सब जितने काम करेंगे, तो ही पानी का संचय होगा और पानी धरती में उतरेगा। इसी तरह से अब कैमिकल से कैसे मुक्ति मिलें वह सोचना पड़ेगा। नहीं तो एक दिन धरती माता कहेगी कि अब बहुत हो गया.. तुम जाओ.. मुझे तुम्हारी सेवा नहीं करनी है। और कितना भी पसीना बहायेंगे, कितने ही महंगे बीज बोएंगे, कोई उपज नहीं होगी। इस धरती मां को बचाना ही पड़ेगा। और इसके लिए अच्छा है गुजरात में हमें ऐसे गवर्नर मिले हैं, जो पूरी तरह प्राकृतिक कृषि के लिए समर्पित है। मुझे तो जानकारी मिली है कि उन्होंने गुजरात के हर तालुका में जाकर प्राकृतिक कृषि के लिए अनेक किसान सम्मेलन किए। मुझे आनंद है - रुपाला जी बता रहे थे कि लाखों की संख्या में किसान प्राकृतिक कृषि की ओर बढ़े हैं और उनको प्राकृतिक कृषि अपनाने में गर्व हो रहा है। यह बात भी सही है कि खर्च भी बचता है। अब जब मुख्यमंत्री जी ने आह्वाहन किया है, कोमल और दृढ़ मुख्यमंत्री मिले हैं, तब हम सब की जिम्मेदारी है कि उनकी भावना को हम साकार करें। गुजरात के गांव-गांव में किसान प्राकृतिक कृषि के लिए आगे आये। मैंने और केशुभाई ने जिस तरह से पानी के लिए काफी परिश्रम किया, ऐसे ही भूपेन्द्र भाई अभी धरती माता के लिए परिश्रम कर रहे हैं।

इस धरती माता को बचाने की उनकी जो मेहनत है, उनमें गुजरात के सभी लोग जुड़ जाएं। और मैंने देखा है कि आप जो काम हाथ में लेते हो, उसमें कभी पीछे हटा नहीं करते। मुझे याद है कि उंझा में बेटी बचाओ की मुझे काफी चिंता थी। मां उमिया का तीर्थ हो और बेटियों की संख्या कम होती जा रही थी। फिर मैंने एक बार माता उमिया के चरणों में जाकर समाज के लोगों को इकट्ठा किया और कहा कि आप सब मुझे वचन दो कि बेटियों को बचाना है। और मुझे गर्व है कि गुजरात में मां उमिया के भक्तों ने, मां खोडल धाम के भक्तों ने और पूरे गुजरात ने इस बात को उठा लिया । और गुजरात में बेटियों को बचाने के लिए, मां के गर्भ में बेटियों की हत्या न हो, इसके लिए काफी जागरूकता आई। आज आप देख रहे हैं कि गुजरात की बेटियां क्या कमाल कर रही हैं, हमारी महेसाणा की बेटी, दिव्यांग, ओलम्पिक में जाकर झंडा लहरा के आई। इस बार ओलम्पिक में जो खिलाड़ी गये थे, उनमें 6 गुजरात की बेटियां थीं। किस को गर्व नहीं होगा-- इसलिए मुझे लगता है कि माता उमिया की सच्ची भक्ति है कि यह शक्ति हममें आती है, और इस शक्ति के सहारे हम आगे बढ़ें। प्राकृतिक कृषि पर हम जितना जोर देंगे, जितना भूपेन्द्रभाई की मदद करेंगे, हमारी यह धरती माता हरी-भरी हो उठेगी। गुजरात खिल उठेगा। आज आगे तो बढ़ा ही है, पर और खिल उठेगा।

और मेरे मन में एक दूसरा विचार भी आता है, हमारे गुजरात में बच्चें कुपोषित हो, वह अच्छा नहीं है। घर में मां कहती है कि यह खा ले, पर वो नहीं खाता। गरीबी नहीं है, पर खाने की आदतें ऐसी हैं कि शरीर पोषित ही नहीं होता। बेटी को एनिमिया हो, और बीस-बाईस-चौबीस साल में शादी करती है तो उसके पेट में कैसी संतान बड़ी होगी। अगर मां सशक्त नहीं है तो संतान का क्या होगा। इसलिए बेटियों के स्वास्थ्य की चिंता ज्यादा करनी चाहिए, और सामान्य तौर पर सभी बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता करनी चाहिए।

मैं मानता हूं कि माता उमिया के सभी भक्तों ने गांव-गांव जाकर पांच-दस बच्चे मिल जाएंगे - किसी भी समाज के हो -- वह अब कुपोषित नहीं रहेंगे - ऐसा निर्धारण हमें करना चाहिए। क्योंकि बच्चा सशक्त होगा, तो परिवार सशक्त होगा और समाज सशक्त होगा और देश भी सशक्त होगा। आप पाटोत्सव कर रहे हैं, आज ब्लड़ डोनेशन वगैरह कार्यक्रम भी किये। अब ऐसा कीजिये गांव-गांव में मां उमिया ट्रस्ट के माध्यम से तंदुरस्त बाल स्पर्धा करें। दो, तीन, चार साल के सारे बच्चों की तपास हो और जो तंदुरस्त है, उसे इनाम दिया जाए। सारा माहौल बदल जाएगा। छोटा काम है, पर हम अच्छे से कर सकेंगे।

अभी मुझे बताया गया यहां कई सारे मैरिज हॉल बनाये गए हैं। बारह महीनों शादियाँ नहीं होती। उस जगह का क्या उपयोग होता है। हम वहां कोचिंग क्लास चला सकते हैं, गरीब बच्चे यहां आये, समाज के लोग अध्यापन करें। एक घंटे के लिए, दो घंटे के लिए, जगह का काफी उपयोग होगा। इसी तरह योग का केंद्र हो सकता है। हर सुबह मां उमिया के दर्शन भी हो जाये, घंटे-दो घंटे योग के कार्यक्रम हों, और जगह का अच्छा उपयोग हो सकता है। जगह का ज्यादा से ज्यादा उपयोग हो, तभी यह सही मायने में सामाजिक चेतना का केंद्र बनेगा। इसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए।

यह आज़ादी के अमृत महोत्सव का समय है - एक तरह से हमारे लिए यह काफी महत्त्वपूर्ण कालखंड है। 2047 में जब देश आज़ादी के सौ साल का उत्सव मना रहा होगा, तब हम कहां होंगे, हमारा गांव कहां होगा, हमारा समाज कहां होगा, हमारा देश कहां पहुंचा होगा, यह स्वप्न और संकल्प हरेक नागरिक में पैदा होना चाहिए। और आज़ादी के अमृत महोत्सव से ऐसी चेतना हम ला सकते हैं, जिससे समाज में अच्छे कार्य हो, जिसे करने का संतोष हमारी नई पीढ़ी को मिले। और इसलिए मेरे मन में एक छोटा सा विचार आया है, कि आज़ादी के अमृत महोत्सव पर हरेक जिले में आज़ादी के 75 साल हुए हैं, इसलिए - 75 अमृत सरोवर बनाए जा सकते हैं। पुराने सरोवर है, उन्हें बड़े, गहरे और अच्छे बनाएं। एक जिले में 75. आप सोचिए, आज से 25 साल बाद जब आज़ादी की शताब्दी मनाई जा रही होगी तब वह पीढ़ी देखेगी, कि 75 साल हुए तब हमारे गांव के लोगों ने यह तालाब बनाया था। और कोई भी गांव में तालाब हो, तो ताकत होती है। पाटीदार पाणीदार तभी बनता है, जब पानी होता है। इसीलिए हम भी इस 75 तालाबों का अभियान, मां उमिया के सांनिध्य में हम उठा सकते हैं। और बड़ा काम नहीं है, हमने तो लाखों की संख्या में चेकडैम बनाए हैं, ऐसे लोग हैं हम। आप सोचिए, कितनी बड़ी सेवा होगी। 15 अगस्त 2023 से पहले काम पूरा करेंगे। समाज को प्रेरणा मिले, ऐसा कार्य होगा। मैं तो कहता हूं कि हर 15 अगस्त को तालाब के पास झंडा लहराने का कार्यक्रम भी गांव के वरिष्ठ को बुलाकर करवाना चाहिए - हम जैसे नेताओं को नहीं बुलाना। गांव के वरिष्ठ को बुलाना और ध्वजवंदन का कार्यक्रम करना।

आज भगवान रामचंद्र जी का जन्मदिवस है। हम भगवान रामचंद्र जी को याद करते हैं तो हमें शबरी याद आती है, हमें केवट याद आता है, हमें निषाद राजा याद आते हैं, समाज के ऐसे छोटे-छोटे लोगों का नाम पता चलता है कि भगवान राम मतलब ये सब। इसका मतलब ये हुआ कि समाज के पिछड़े समुदाय को जो संभालता है, वह भविष्य में लोगों के मन में आदर का स्थान प्राप्त करता है। मां उमिया के भक्त समाज के पिछड़े लोगों को अपना मानें - दुःखी, गरीब - जो भी हो, किसी भी समाज के। भगवान राम भगवान और पूर्ण पुरुषोत्तम कहलाए, उसके मूल में वे समाज के छोटे-छोटे लोगों के लिए जिस तरह से और उनके बीच में कैसे जिए उसकी महिमा कम नहीं है। मां उमिया के भक्त भी, खुद तो आगे बढ़े ही, परंतु कोई पीछे न छूट जाये, इसकी भी चिंता करें। तभी हमारा आगे बढ़ना सही रहेगा, नहीं तो जो पीछे रह जायेगा, वह आगे बढ़ने वाले को पीछे खींचेगा। तब हमें ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी, इसलिए आगे बढ़ने के साथ-साथ पीछे वालों को भी आगे लाते रहेंगे तो हम भी आगे बढ़ जाएंगे।

मेरा आप सभी को अनुरोध है कि यह आज़ादी का अमृत महोत्सव, आज भगवान राम का प्रागट्य महोत्सव और मां उमिया का पाटोत्सव और इतनी विशाल संख्या में लोग इकट्ठा हुए हैं, तब हम जिस वेग से आगे बढ़ना चाहते हैं, आप देखिए, कोरोना - कितना बड़ा संकट आया, और अभी संकट टला है, ऐसा हम मानते नहीं, क्योंकि अभी भी वह कहीं कहीं दिखाई दे जाता है। काफी बहुरूपी है, यह बीमारी। इसके सामने टक्कर लेने के लिए करीब 185 करोड़ डोज़। विश्व के लोग जब सुनते हैं तो उनको आश्चर्य होता है। यह कैसे संभव हुआ - आप सभी समाज के सहकार के कारण। इसीलिए हम जितने बड़े पैमाने पर जागरुकता लाएंगे। अब स्वच्छता का अभियान, सहज, हमारा स्वभाव क्यों न बनें, प्लास्टिक नहीं यूज करेंगे - हमारा स्वभाव क्यों न बनें, सिंगल यूज प्लास्टिक हम उपयोग में नहीं लेंगे। गौ पूजा करते हैं, मां उमिया के भक्त हैं, पशु के प्रति आदर है, पर वही अगर प्लास्टिक खाती है, तो मां उमिया के भक्त के तौर पर यह सही नहीं। यह सब बातें लेकर अगर हम आगे बढ़ते हैं, तो.. और मुझे आनंद हुआ कि आप ने सामाजिक कार्यों को जोड़ा है। पाटोत्सव के साथ पूजापाठ, श्रद्धा, आस्था धार्मिक जो भी होता है, वह होता है, पर इससे आगे बढ़कर आपने समग्र युवा पीढ़ी को साथ में लेकर जो ब्लड़ डोनेशन वगैरह जो भी कार्य किये हैं। मेरी ढ़ेर सारी शुभकामनाएं हैं। आप के बीच भले दूर से ही, पर आने का मौका मिला, मेरे लिए काफी आनंद का विषय है।

आप सबका बहुत-बहुत अभिनन्दन। मां उमिया के चरणों में प्रणाम!

धन्यवाद!

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President’s address on the eve of 80th Independence Day reflects the nation’s strength and inspires renewed determination for a Viksit Bharat: PM
August 14, 2026

Prime Minister Shri Narendra Modi today lauded the address delivered by President of India, Smt. Droupadi Murmu, on the eve of 80th Independence Day noting that it was motivating and thoughtful.

The Prime Minister observed that her thoughts reflect the strength of our nation and the aspirations of every Indian. He stated that her message inspires us all to work with renewed determination for a Viksit Bharat.

In a post on X, the Prime Minister shared:

"A motivating and thoughtful address by Rashtrapati Ji on the eve of Independence Day.

Her thoughts reflect the strength of our nation and the aspirations of every Indian.

Her message inspires us all to work with renewed determination for a Viksit Bharat.

@rashtrapatibhvn"