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मंत्री परिषद के मेरे साथी श्री राधा मोहन सिंह जी, डाक्टर संजय जी, मंच पर विराजमान सभी महानुभाव, और कृषि और विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े हुए सभी तपस्वीजन.


हम standing ovation उन महानुभावों को दें, जिन्होने आज award भी प्राप्त किया है, और देश में इस प्रकार की गतिविधि से जुड़े हुए हैं.जिनका सम्मान करने का मुझे सौभाग्य मिला है.उन सबको मैं हृदय से अभिनंदन करता हूँ.

अयप्पन जी को मैं सुन रहा था, superfast train चल रही थी. इसी तेज गति से कृषि विकास भी होगा, ऐसा मुझे भरोसा है. जब उन्होने सबको standing ovation के लिए खड़ा किया तो ये कला मेरे ध्यान में आ गयी की लंबी देर तक सुनते समय नींद आ जाती है. तो बीच बीच में standing ovation अच्छा रहता है. लेकिन मैने standing ovation इसके लिए नहीं करवाया था - मैं हृदय से मानता हूँ की देश के कोटि-कोटि किसानों ने भारत के भाग्य को बदलने में बहुत बड़ा योगदान दिया है.

और इसी लिए वैज्ञानिक कितनी ही खोज क्यों न करें, लेकिन अगर उसपर भरोसा करके किसान अपना एक साल खपा नही देता हैं, दो साल खपा नही देता है, तो सिद्धि संभव नही होती है. कभी lab में, कभी छोटी-सी प्रायोगिक व्यवस्था में, सिद्धि प्राप्त करने में expert को सफलता मिल जाती है, लेकिन जब तक उसका सरलीकरण नहीं हो, जाता, सामान्य किसान को पल्ले पड़े, भाषा, परिभाषा और प्रयोगों से उसे जोड़ा नहीं जाता है, तब तक इसका व्याप्त बढ़ता नहीं है.

हमारे देश में कृषि ज़्यादातर पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में दी जाती है. और इसमें परंपराओं को बदलने का साहस बहुत कम लोग रखते हैं. जब तक उसको ये भरोसा ना हो, हाँ भाई, ‘this is the way, ये कुछ होगा, और इसके लिए भी दो, चार, पाँच साल तक सोचता रहता है, क्योंकि उसे मालूम है, कहीं मैं प्रयोग कर गया और मेरी जिंदगी अटक गयी तो क्या होगा, वो हिम्मत नहीं करता. और इसलिए भारत के विज्ञान जगत को, और ख़ास करके कृषि क्षेत्र में अनुसंधान करने वाले महानुभावों के सामने, सरकार के सामने, सामान्य किसान समुदाय के सामने, ये नितांत आवश्यक है के हम बदलते हुए युग में, बदलते हुए परिवेश में, climate change के माहौल में और वैज्ञानिकों के द्वारा किए गये संशोधनो के मध्यम से, progressive farmers के द्वारा किए गये प्रयोगों के मध्यम से ,बदलते हुए climatic zones …. Climatic zones ही बदल रहें हैं हमारे सारे …. … agro-climatic zones जो पहले बनाएँ होंगें आज शायद agro-climatic zones में काफ़ी बदलाव आ रहा है,… उन सारे पाश्र्वभूमि में, हमारा किसान भरोसा करके प्रयोग करने की हिम्मत करे, और इस दिशा में हम कैसे आगे बढ़ें ?

आज इस अनुसंधान केंद्र को 86 साल हो गये. मैं चाहूँगा की आप सब मिलकर के, इसका शताब्दी वर्ष कैसे मनाया जाए उसका planning आज ही करें. और institutional celebration planning नहीं, हम इस अनुसंधान के मध्यम से किसानों तक कैसे पहुचेगें, किन- किन विषयों में पहुँचेगें, किन किन बातों में हम कोई goal set करके acheive करेंगें. और सारी franternity ,all the universities, all the agricultural colleges, इस शताब्दी के साथ research के नये आयाम और उनके साथ सामान्य किसान को जोड़ने का प्रयास, इस दिशा में हम कुछ goal तय करके आनेवाले 14-15 साल जो भी हमें मिलते हैं, और एक century का mission goal बना करके, मैं समझता हूँ , शायद हम 86 साल में जितना कर पाए हैं उसे ज़्यादा 14 साल में कर सकतें हैं. क्योंकि अब ,86 साल पहले हमारी ताक़त थी, 86 साल में वो ताक़त सैंकड़ों गुणा ज़यादा है. विज्ञान ने भी भारी प्रगति की है, वैश्विक संबंधों का वातावरण भी, ज्ञान का आदान-प्रदान भी, बहुत तेज़ी से हुआ हैं, और इसलिए हम अगर ये goal ले कर चलें तो हम कुछ कर सकतें हैं.

हमारे देश के सामने, क्‍योंकि यह सारी जो हमारी मेहनत है, उसमें हमे दो चीज़ों को सिद्ध करना है – एक, हमारा किसान, देश और दुनिया का पेट भरने में सामर्थ्यवान हो, और दूसरा, हमारी कृषि, किसान का जेब भरने में सामर्थ्यवान हो. दुनिया का पेट तो भरे लेकिन किसान की अगर जेब नही भरेगी तो शायद हम जो चाहते हैं उन स्थितियों को प्राप्त नहीं कर सकते. हमारी दिशा, हमारी योजना, उस तरफ कैसे रहे?

हमारी ज़मीन तो बढ़ने वाली नहीं है, परिवार बढ़ते चले जा रहें हैं, माँग बढ़ती चली जा रही है. और इस समय हमें उन challenges को address करना पड़ेगा, और हमारा focus, soil fertility. हमारी soil में सदियों पहले, ज़मीन को सुधारने के प्रयोग होते थे, ऐसा नहीं है की आज ही हो रहे हैं. लेकिन समय के अभाव से आर्थिक दौड़ में किसान अब वो समय नहीं देता है. ज़मीन सुधार के लिए बीच में time देना चाहिए, कुछ प्रक्रियाएँ करनी चाहिए, उसको जानकारी है, लेकिन वो कर नही पता है. तब वैज्ञानिक intervention आवश्यक हो जाता है. उसकी परंपराएँ, पद्यतियाँ, scientific intervention, दोनो की जोड़ करके हम हमारी ज़मीन की fertility के संबंध में, कोई निश्चित goal के साथ कैसे आगे बढ़ सकतें हैं? क्योंकि हमारे सामने आवश्यक हैं - प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाए बिना हमारा कोई चारा ही नहीं हैं. उसी प्रकार से, जो फसल 45 दिन में होती है वो फसल 35 दिन में कैसे हो. वो कौन सी वैज्ञानिक पद्यतियाँ हों , किस प्रकार का time frame हो, और फिर भी quality erosion ना हो. जैसे मूँग में प्रयोग हुआ है, कुछ time तो बचा, लेकिन उसकी साइज़ बदल दी गयी है, साइज़ छोटी कर दी गयी है. और जब साइज़ छोटी होती है, तो मार्केट गिर जाता है, क्योंकि सामान्य मानव ने… मूँग की एक साइज़ set है उसके मन में ,एक छवि तैयार है … उसी में अगर आँखफेर हो गया तो? उसके मन में जो रहता है ठीक है .. उससे अगर थोड़ा इधर- उधर हो गया तो, उसके मन में रहता है अरे भाई शायद ये अच्छा नहीं होगा, और इसलिए quality erosion ना हो, उसके बावजूद भी productivity बढ़ाएँ और time reduce हो. इसपर हम कैसे काम कर सकतें हैं?

हम जानते हैं की विश्व के सामने पानी का संकट है, water-cycle, weather-cycle, दोनो के बीच में clash हो रहा है, contradiction खड़ी हो गयी है. अब हमारे सामने challenge है, इस weather-cycle के साथ, हमारे water-cycle का scientific management हमकैसे करें. हम नये-नये तरीके से उससे कैसे जोड़ें. चाहे rain harvesting हो, या जल संचय के नये-नये अभियान हों, और हम जन सामान्य को जल संचय के बारें में जितना जागरूक बनाएँगें, जितना भागीदार बनाएँगे, उतना ही फ़ायदा मिलेगा.

Global warming, environment के five star hotel में होने वाले seminar अपनी जगह है, उसका भी एक positive है, लेकिन आख़िर तो ये काम करने वाला सामान्य मानव है. उसके मन में ये भाव कैसे जगे और जब तक ये विश्वास पैदा नहीं होता, की ये पानी परमात्मा का दिया हुआ प्रसाद है. आज जब हम मंदिर में जातें हैं … प्रसाद का एक दाना नीचे ना गिर जाए, इतनी care करते हैं, बहुत सजग रहते हैं कि प्रसाद है, गिरना नहीं चाहिए. ये पानी भी परमात्मा का प्रसाद है, एक बूँद भी बर्बाद नहीं होनी चाहिए …. ये भाव सामान्य व्यक्ति तक कैसे पहुँचे. जब साबरमती नदी लबालब भारी रहती थी, पानी भरपूर बहता था, महात्मा गाँधी साबरमती आश्रम में रहते थे … 1930 का वो कालखंड था … 30 के पहले का कालखंड था, लेकिन कोई अगर, पानी का पूरा ग्लास देता था, तो बापू कहते थे, आधा पीना है, आधा ही ले आओ … आधा पानी वापस करो, पानी बर्बाद मत करो. सामने नदी थी लबालब पानी से भरी थी, लेकिन वो, एक घूँट भी पानी बर्बाद होने से उन्हें पीड़ा हो जाती. ये level of consciousness और ultimately , common man का ये level of consciousness जितना बढ़ता है, उतनी ही success की संभावनाएँ बढ़ती हैं. और इसलिए हम उस दिशा में कैसे आगे बढ़ें.

'per drop more crop', ये हमारा mission statement हो सकता हैI जैसे कम ज़मीन, कम समय, ज़यादा ऊपज …. ‘per drop more crop’ ….. किसान का पेट भी भरे, और किसान को जेब भी भरे. कम भूमि में ज़यादा ऊपज हो.

इसी के साथ हमारी animal husbandry, हमारे पास जितनी मात्रा में पशु हैं, उसकी तुलना में दूध बहुत कम है. दूध की माँग ज़यादा है …… requirement भी ज़यादा है. हमारे पशु ज़्यादा दूध उत्पादन करें, यह हमारे लिए एक सहज, सरल प्रक्रिया होनी चाहिए. ये एक सहज, सामान्य, व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहिए. ऐसा नहीं कि universities , labs, veterinary colleges ने काम नहीं किया है, लेकिन जब तक ये काम, जो पशु-पालक है, उस तक नहीं पहुँचता है, तब तक हमें परिणाम नहीं मिलता. सारे विश्व में ये जो बदलाव आया है, वो scientific intervention से आया है. technology upgradation, और technology के involvement से आया है. हम जब तक उस दिशा में नहीं जातें, हम देश और दुनिया की माँग की पूर्ति के लिए, असक्षम महसूस करेंगे. स्थिति ऐसी है, माँग बहुत बढ़ी है, और ये हमारे लिए तो opportunity है. उस opportunity को कैसे भरें?

हमारे सामने एक सबसे बड़ा challenge है, ‘lab- to- land’, जो lab में है वो land पर कैसे आए, जो universities में है, वो कृषक के पास कैसे पहुचे? जो श्रधा universities के lab में बैठकर एक scientist को है, वो श्रधा एक कृषक के मन मैं कैसे आए? और उसके लिए progressive farmers …. यही हमारी सबसे बड़ी agency होती है. progressive farmer, mentally risk लेने के लिए तैयार होता है … उसके DNA में होता है ये. वो चाहता है, चलो मैं करूँगा . लेकिन ये हमारा कोई संबंध है क्या?

Universities के पास और agricultural colleges के पास अपने इलाक़े के progressive farmers, उनकी expertise, 35 age group के अच्छे पढ़े लिखे farmers, इनका कोई data है क्या? जो पढ़े लिखे हैं, young हैं, progressive हैं, क्या agricultural universities अपने इलाक़े के दो सौ, चार सौ , गाँवों के ऐसे लोग को एक information-bank बना सकता है? एक talent-pool बना सकता है ….they are a real talent …. talent pool बना सकता है क्या? और उस talent-pool के लोगों को address करके, उनके मध्यम से dissemination कार्यक्रम बना सकतें हैं क्या?

हमारे agricultural colleges जो हैं, उस इकाई को एक nodal agency मान कर, कम से कम हम, हिन्दुस्तान के 500-600 districts में आराम से अपना network खड़ा कर सकतें हैं. हमारे तो अनुसंधान होते रहें हैं, हमारी universities हैं, हमारी colleges हैं, और students है, और फिर एक identity है …. उन सबकी एक chain बना करके एक व्यवस्था करी जाए, और एक timeframe पर काम कैसे हो? और एक सहज प्रक्रिया के रूप में कैसे हो?

जितने हमारे agricultural colleges हैं, उनका अपना कोई radio station हो सकता है? Agricultural colleges का radio station है. और मैं इसलिए कहता हूँ agricultural colleges का radio station …. क्योंकि किसान radio बहुत सुनता है.

agriculture college जहां है, उसको उस इलाके की कृषि का पता है। वहां कॉलेज के students को भी --- ज़्यादातर उसी परिवार के बच्चे हैं जो कृषि क्षेत्र से आते हैं। वो परम्परा से भी जानता है। agricultural radio - कॉलेज चलाये, आजकल रेडियो के लिए यह सुविधा है, permission मिलती है। इन-हाउस students को काम दिया जाए - research करो और रेडियो पर आ कर talk दो। एक सहज रूप से ऐसी प्रक्रिया बन सकती है। हमारे agricultural colleges रेडियो के माध्यम से लगातार किसानों को उसी इलाके के किसानों की समस्या - बारिश देर से आये तो क्या करना है, बारिश कम आयी तो क्या करना है, फलाने प्रकार का रोग नज़र आ रहा है तो क्या करना है ? आप देखिये। अरबों खरबों रुपयों के investment से बनी हुई मीडिया वर्ल्ड के सामने एक कॉलेज के बच्चोँ के द्वारा चलाया गया किसान के उपयोग का कार्यक्रम ज़्यादा ताक़तवर होगा, credible होगा, popular होगा.

हम इस बदलाव की दिशा में जाने को तैयार हैं क्या? अगर हम बदलाव की दिशा में जाने को तैयार हैं तो हम बहुत कुछ दे सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि हमारे students ने कोई research नहीं किया, creative काम नहीं किया है। क्या हम तय कर सकते हैं - within 4-5 years - सभी universities में अब तक agriculture में जितनी भी research हुई है, चाहे PhD हुआ हो या research paper लिखा गया हो - उन सब को digital करके compile कर सकतें हैं. पूरे हिन्दुस्तान में हमारे नौजवानो ने क्या research किया है , अगर मान लीजिए किसी ने गेहूँ पर research किया है, देश की 25 universities में 200 के करीब छात्रों ने पिछले 50 साल में research किया होगा, आज वो खजाना कहाँ पर है? क्या किसी ने इक्कठा करके दोबारा उसे देखा है, किसी university ने देखा है, की पिछले 50 साल में इस-इस प्रकार के research हुए. इन 50 साल के research को compile करके, पूरा एक digital platform तैयार हो सकता है. PhD कर ली नौकरी कर ली, retire भी हो गये, कहने के लिए हो गया कि बचपन में PhD कर ली थी.

देश को क्या मिला ? और उसका कारण है, हम चीज़ों को उसकी मलकियत बना देते हैं, जो राष्ट्र की धरोहर है. उस गौरव गान के साथ उसे जोड़ते नहीं हैं.

मैं वो चीज़ें बता रहा हूँ आपको , जिसके लिए कोई बहुत बड़ा बजट नहीं लगता है. बहुत बड़ा एकदम कोई सूर्य-चंद्र पर से विज्ञान उतारने की ज़रूरत नही पड़ती, सहज व्यवहार की बातें हैं. और आप देखिए, ये ताक़त इतनी बढ जाएगी… 

आज भी हमारे यहाँ pulses and oilseeds बहुत बड़े challenge हैं . Pulses का उत्पादन - जिसमें प्रोटीन content, ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति के लिए प्रोटीन का source ही , उस ग़रीब आदमी का भला करना है तो उसे वो pulses मिलें , प्रोटीन जिसमे ज़्यादा हो. ताकि उसकी जिंदगी में वो काम आए, हम उसको priority दे सकतें हैं. Oilseeds, भारत कृषि प्रधान देश है, और हमे तेल बाहर से मंगवाना पड़ता है. अगर लाल बहादुर शास्त्री कहें 'जय जवान, जय किसान', और हिन्दुस्तान का किसान खड़ा हो जाए, हिन्दुस्तान का पेट भरने के लिए सामर्थ्य पैदा कर दे, तो क्या हमारे हिन्दुस्तान के किसान के सामने ये challenge नही रख सकते कि हमें कुछ करना है ? खाने का तेल हम बाहर से नहीं लाएँगे. आइए हम सब मिलकर मेहनत करें. देश की आवश्यकतायें हैं, और ये उन आवश्यकतयों की पूर्ति के लिए उठाए गये कदम हैं. हम goal set कर सकतें हैं, goal achieve कर सकतें हैं क्या ? जब तक हम सामान्य मानव की और देश की आवश्यकतयों का अनुसंधान नहीं करते, design strategy workout नहीं करते, resource mobilise नहीं करते, और उसके अनुसार human resource को develop करने की कोशिश नहीं करते, हमें जो चाहिए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर सकतें. और इसलिए मैं आज ,जो इस प्रकार के प्रमुख लोग यहाँ बैठे हैं, "नही होता है" उसका analysis छोड़ कर, "कैसे हो" उसका analysis करना है. इसपर हम कैसे काम कर सकते हैं.

Blue revolution. भारत के तिरंगे झंडे में हम White revolution की बात करतें हैं, Green revolution की बात करतें हैं, लेकिन जो blue colour का अशोक चक्र है उसको भी देखने की ज़रूरत है. और वो blue revolution है हमारी सामुद्रिक संपत्ति. Fisheries, उसके क्षेत्र में development, बहुत बड़ा global market पड़ा हुआ है. हमारे fisherman की जिंदगी बदले. बहुत प्रकार की बातें हो रहीं हैं, fisheries में एक बहुत बड़ा क्षेत्र खुल गया है, अब मोती का खेती हो रही है. बहुत बड़ा काम हो रहा है, हमारी science faculty, हमारे मछुआरे, और हमारे समुद्र तट पर रहने वाले नागरिक, seaweed की खेती, scientific ढंग से कैसे हो, seaweed इन दिनों Pharmaceutical world के लिए सबसे बड़ा raw material input है, global market है seaweed का. पर हमारे समुद्र तट पर हम seaweed की खेती का उतना साहस नहीं कर पा रहे. और seaweed में भी इतनी variety है, और इतना potential है उसके अंदर ,seaweed मनुष्य के काम आए या ना आए, ऐसे ही crush करके उसका रस खेत में छींट दिया जाए तो खेती के लिए वो बहुत बड़ी दवाई, और fertilizer दोनो का काम कर देता है.

क्या कारण है की हिमालय हमारे पास हो और चीन के पास भी हिमालय का कुछ भाग हो, चीन Herbal medicine में बहुत आगे है, और हम medicinal plants के संबंध में धीरे धीरे चिंता के क्षेत्र में चले जाएँ. Medicinal plants के क्षेत्र में हमारी कोशिश क्या है, हम क्या नया दें सकतें हैं, हमारे medicinal plants का maximum utilisation कैसे हो. Pharmaceutical industry, Pharmaceutical department और Agriculture department and research institution, ये चार मिल करके, इस विषय में क्या कर सकतें हैं?

मैं समझता हूँ इतना सारा बड़ा, sky is the limit, इस प्रकार का क्षेत्र हमारे सामने खुला पड़ा है, अगर हम सब मिलकर इस नयी सोच के साथ इस दिशा में आगे बढ़ें, हम आनेवाले दिनो में ना सिर्फ़ भारत को बल्कि विश्व को बहुत कुछ दें सकतें हैं.

जिन महानुभावों ने इस काम में योगदान दिया है, उनका अभिनंदन करने का मुझे अवसर मिला. इसके लिए मैं उन्हे बहुत बहुत बधाई देता हूँ. मुझे आप सबके बीच आने का अवसर मिला, मेरा सौभाग्य है, मेरी बहुत बहुत सुभकामनायें हैं.

बहुत बहुत धन्यवाद.

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Text to PM’s interaction with beneficiaries of Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana in Gujarat
August 03, 2021
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Earlier, the scope and budget of cheap ration schemes kept on increasing but starvation and malnutrition did not decrease in that proportion: PM
Beneficiaries are getting almost double the earlier amount of ration after Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana started: PM
More than 80 crore people people are getting free ration during the pandemic with an expenditure of more than 2 lakh crore rupees: PM
No citizen went hungry despite the biggest calamity of the century: PM
Empowerment of the poor is being given top priority today: PM
New confidence of our players is becoming the hallmark of New India: PM
Country is moving rapidly towards the vaccination milestone of 50 crore: PM
Let's take holy pledge to awaken new inspiration for nation building on Azadi ka Amrit Mahotsav: PM

नमस्‍कार! गुजरात के मुख्यमंत्री श्री विजय रुपाणी जी, उप-मुख्यमंत्री श्री नितिन भाई पटेल जी, संसद में मेरे साथी और गुजरात भाजपा के अध्यक्ष श्रीमान सी. आर. पाटिल जी, पी एम गरीब कल्याण अन्न योजना के सभी लाभार्थी, भाइयों और बहनों!

बीते वर्षों में गुजरात ने विकास और विश्वास का जो अनवरत सिलसिला शुरु किया, वो राज्य को नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। गुजरात सरकार ने हमारी बहनों, हमारे किसानों, हमारे गरीब परिवारों के हित में हर योजना को सेवाभाव के साथ ज़मीन पर उतारा है। आज गुजरात के लाखों परिवारों को पी एम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत एक साथ मुफ्त राशन वितरित किया जा रहा है। ये मुफ्त राशन वैश्विक महामारी के इस समय में गरीब की चिंता कम करता है, उनका विश्वास बढ़ाता है। ये योजना आज से प्रारंभ नहीं हो रही है, योजना तो पिछले एक साल से करीब-करीब चल रही है ताकि इस देश का कोई गरीब भूखा ना सो जाए।

मेरे प्‍यारे भाईयों और बहनों,

गरीब के मन में भी इसके कारण विश्‍वास पैदा हुआ है। ये विश्वास, इसलिए आया है क्योंकि उनको लगता है कि चुनौती चाहे कितनी भी बड़ी हो, देश उनके साथ है। थोड़ी देर पहले मुझे कुछ लाभार्थियों के साथ बातचीत करने का अवसर मिला, उस चर्चा में मैंने अनुभव भी किया कि एक नया आत्‍मविश्‍वास उनके अन्‍दर भरा हुआ है।

साथियों,

आज़ादी के बाद से ही करीब-करीब हर सरकार ने गरीबों को सस्ता भोजन देने की बात कही थी। सस्ते राशन की योजनाओं का दायरा और बजट साल दर साल बढ़ता गया, लेकिन उसका जो प्रभाव होना चाहिए था, वो सीमित ही रहा। देश के खाद्य भंडार बढ़ते गए, लेकिन भुखमरी और कुपोषण में उस अनुपात में कमी नहीं आ पाई। इसका एक बड़ा कारण था कि प्रभावी डिलिवरी सिस्टम का ना होना और कुछ बिमारियाँ भी आ गईं व्‍यवस्‍थाओं में, कुछ cut की कंपनियाँ भी आ गईं, स्‍वार्थी तत्‍व भी घुस गये। इस स्थिति को बदलने के लिए साल 2014 के बाद नए सिरे से काम शुरु किया गया। नई technology को इस परिवर्तन का माध्यम बनाया गया। करोड़ों फर्ज़ी लाभार्थियों को सिस्टम से हटाया। राशन कार्ड को आधार से लिंक किया और सरकारी राशन की दुकानों में digital technology को प्रोत्साहित किया गया। आज परिणाम हमारे सामने है।

भाइयों और बहनों,

सौ साल की सबसे बड़ी विपत्ति सिर्फ भारत पर नहीं, पूरी दुनिया पर आई है, पूरी मानव जाति पर आई है। आजीविका पर संकट आया, कोरोना लॉकडाउन के कारण काम-धंधे बंद करने पड़े। लेकिन देश ने अपने नागरिकों को भूखा नहीं सोने दिया। दुर्भाग्य से दुनिया के कई देशों के लोगों पर आज संक्रमण के साथ-साथ भुखमरी का भी भीषण संकट आ गया है। लेकिन भारत ने संक्रमण की आहट के पहले दिन से ही, इस संकट को पहचाना और इस पर काम किया। इसलिए, आज दुनियाभर में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की प्रशंसा हो रही है। बड़े-बड़े expert इस बात की तारीफ कर रहे हैं कि भारत अपने 80 करोड़ से अधिक लोगों को इस महामारी के दौरान मुफ्त अनाज उपलब्ध करा रहा है। इस पर 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक ये देश खर्च कर रहा है। मकसद एक ही है- कोई भारत का मेरा भाई-बहन, मेरा कोई भारतवासी भूखा ना रहे। आज 2 रुपए किलो गेहूं, 3 रुपए किलो चावल के कोटे के अतिरिक्त हर लाभार्थी को 5 किलो गेहूं और चावल मुफ्त दिया जा रहा है। यानि इस योजना से पहले की तुलना में राशन कार्ड धारकों को लगभग डबल मात्रा में राशन उपलब्ध कराया जा रहा है। ये योजना दीवाली तक चलने वाली है, दिवाली तक किसी गरीब को पेट भरने के लिये अपनी जेब से पैसा नहीं निकालना पड़ेगा। गुजरात में भी लगभग साढ़े 3 करोड़ लाभार्थियों को मुफ्त राशन का लाभ आज मिल रहा है। मैं गुजरात सरकार की इस बात के लिए भी प्रशंसा करूंगा कि उसने देश के दूसरे हिस्सों से अपने यहां काम करने आए श्रमिकों को भी प्राथमिकता दी। कोरोना लॉकडाउन के कारण प्रभावित हुए लाखों श्रमिकों को इस योजना का लाभ मिला है। इसमें बहुत सारे ऐसे साथी थे, जिनके पास या तो राशन कार्ड था ही नहीं, या फिर उनका राशन कार्ड दूसरे राज्यों का था। गुजरात उन राज्यों में है जिसने सबसे पहले वन नेशन, वन राशन कार्ड की योजना को लागू किया। वन नेशन, वन राशन कार्ड का लाभ गुजरात के लाखों श्रमिक साथियों को हो रहा है।

भाइयों और बहनों,

एक दौर था जब देश में विकास की बात केवल बड़े शहरों तक ही सीमित होती थी। वहाँ भी, विकास का मतलब बस इतना ही होता था कि ख़ास-ख़ास इलाकों में बड़े बड़े flyovers बन जाएं, सड़कें बन जाएं, मेट्रो बन जाएं! यानी, गाँवों-कस्बों से दूर, और हमारे घर के बाहर जो काम होता था, जिसका सामान्‍य मानवी से लेना-देना नहीं था उसे विकास माना गया। बीते वर्षों में देश ने इस सोच को बदला है। आज देश दोनों दिशाओं में काम करना चाहता है, दो पटरी पर चलना चाहता है। देश को नए infrastructure की भी जरूरत है। Infrastructure पर भी लाखों-करोड़ों खर्च हो रहा है, उससे लोगों को रोजगार भी मिल रहा है, लेकिन साथ ही, सामान्य मानवी के जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए, Ease of Living के लिए नए मानदंड भी स्थापित कर रहे हैं। गरीब के सशक्तिकरण, को आज सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। जब 2 करोड़ गरीब परिवारों को घर दिये जाते हैं तो इसका मतलब होता है कि वो अब सर्दी, गर्मी, बारिश के डर से मुक्त होकर जी पायेगा, इतना ही नहीं, जब खुद का घर होता है ना तो आत्‍मसम्‍मान से उसका जीवन भर जाता है। नए संकल्‍पों से जुड़ जाता है और उन संकल्‍पों को साकार करने के लिये गरीब परिवार समेत जी जान से जुट जाता है, दिन रात मेहनत करता है। जब 10 करोड़ परिवारों को शौच के लिए घर से बाहर जाने की मजबूरी से मुक्ति मिलती है तो इसका मतलब होता है कि उसका जीवन स्तर बेहतर हुआ है। वो पहले सोचता था कि सुखी परिवारों के घर में ही toilet होता है, शौचालय उन्‍हीं के घर में होता है। गरीब को तो बेचारे को अंधेरे का इंतजार करना पड़ता है, खुले में जाना पड़ता है। लेकिन जब गरीब को शौचालय मिलता है तो वो अमीर की बराबरी में अपने आप को देखता है, एक नया विश्‍वास पैदा होता है। इसी तरह, जब देश का गरीब जन-धन खातों के जरिए बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ता है, मोबाइल बैंकिंग गरीब के भी हाथ में होती है तो उसे ताकत मिलती है, उसे नए अवसर मिलते हैं। हमारे यहाँ कहा जाता है-

सामर्थ्य मूलम्
सुखमेव लोके!

अर्थात्, हमारे सामर्थ्य का आधार हमारे जीवन का सुख ही होता है। जैसे हम सुख के पीछे भागकर सुख हासिल नहीं कर सकते बल्कि उसके लिए हमें निर्धारित काम करने होते हैं, कुछ हासिल करना होता है। वैसे ही सशक्तिकरण भी स्वास्थ्य, शिक्षा, सुविधा और गरिमा बढ़ने से होता है। जब करोड़ों गरीबों को आयुष्मान योजना से मुफ्त इलाज मिलता है, तो स्वास्थ्य से उनका सशक्तिकरण होता है। जब कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की सुविधा सुनिश्चित की जाती है तो इन वर्गों का शिक्षा से सशक्तिकरण होता है। जब सड़कें शहरों से गाँवों को भी जोड़ती हैं, जब गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन, मुफ्त बिजली कनेक्शन मिलता है तो ये सुविधाएं उनका सशक्तिकरण करती हैं। जब एक व्यक्ति को स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सुविधाएं मिलती हैं तो वो अपनी उन्नति के बारे में, देश की प्रगति में सोचता है। इन सपनों को पूरा करने के लिए आज देश में मुद्रा योजना है, स्वनिधि योजना है। भारत में ऐसी अनेकों योजनाएं गरीब को सम्मानपूर्ण जीवन का मार्ग दे रही हैं, सम्मान से सशक्तिकरण का माध्यम बन रही हैं।

भाइयों और बहनों,

जब सामान्य मानवी के सपनों को अवसर मिलते हैं, व्यवस्थाएं जब घर तक खुद पहुँचने लगती हैं तो जीवन कैसे बदलता है, ये गुजरात बखूबी समझता है। कभी गुजरात के एक बड़े हिस्से में लोगों को, माताओं-बहनों को पानी जैसी जरूरत के लिए कई-कई किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। हमारी सभी माताएं-बहनें साक्षी हैं। ये राजकोट में तो पानी के लिये ट्रेन भेजनी पड़ती थी। राजकोट में तो पानी लेना है तो घर के बाहर गड्ढा खोदकर के नीचे पाइप में से पानी एक-एक कटोरी लेकर के बाल्‍टी भरनी पड़ती थी। लेकिन आज, सरदार सरोवर बांध से, साउनी योजना से, नहरों के नेटवर्क से उस कच्छ में भी मां नर्मदा का पानी पहुंच रहा है, जहां कोई सोचता भी नहीं था और हमारे यहां तो कहा जाता था कि मां नर्मदा के स्‍मरण मात्र से पूण्‍य मिलता है, आज तो स्‍वयं मां नर्मदा गुजरात के गांव-गांव जाती है, स्‍वयं मां नर्मदा घर-घर जाती है, स्‍वयं मां नर्मदा आपके द्वार आकर के आपको आशीर्वाद देती है। इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज गुजरात शत-प्रतिशत नल से जल उपलब्ध कराने के लक्ष्य से अब ज्यादा दूर नहीं है। यही गति, आम जन के जीवन में यही बदलाव, अब धीरे धीरे पूरा देश महसूस कर रहा है। आज़ादी के दशकों बाद भी देश में सिर्फ 3 करोड़ ग्रामीण परिवार पानी के नल की सुविधा से जुड़े हुए थे, जिनको नल से जल मिलता था। लेकिन आज जल जीवन अभियान के तहत देशभर में सिर्फ दो साल में, दो साल के भीतर साढ़े 4 करोड़ से अधिक परिवारों को पाइप के पानी से जोड़ा जा चुका है और इसलिये मेरी माताएं-बहनें मुझे भरपूर आशीर्वाद देती रहती हैं।

भाइयों और बहनों,

डबल इंजन की सरकार के लाभ भी गुजरात लगातार देख रहा है। आज सरदार सरोवर बांध से विकास की नई धारा ही नहीं बह रही, बल्कि Statue of Unity के रूप में विश्व के सबसे बड़े आकर्षण में से एक आज गुजरात में है। कच्छ में स्थापित हो रहा Renewable Energy Park, गुजरात को पूरे विश्व के Renewable Energy Map में स्थापित करने वाला है। गुजरात में रेल और हवाई कनेक्टिविटी के आधुनिक और भव्य Infrastructure Project बन रहे हैं। गुजरात के अहमदाबाद और सूरत जैसे शहरों में मेट्रो कनेक्टिविटी का विस्तार तेज़ी से हो रहा है। Healthcare और Medical Education में भी गुजरात में प्रशंसनीय काम हो रहा है। गुजरात में तैयार हुए बेहतर Medical Infrastructure ने 100 साल की सबसे बड़ी Medical Emergency को हैंडल करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

साथियों,

गुजरात सहित पूरे देश में ऐसे अनेक काम हैं, जिनके कारण आज हर देशवासी का, हर क्षेत्र का आत्मविश्वास बढ़ रहा है। और ये आत्मविश्वास ही है जो हर चुनौती से पार पाने का, हर सपने को पाने का एक बहुत बड़ा सूत्र है। अभी ताज़ा उदाहरण है ओलंपिक्स में हमारे खिलाड़ियों का प्रदर्शन। इस बार ओलंपिक्स में भारत के अब तक के सबसे अधिक खिलाड़ियों ने क्वालीफाई किया है। याद रहे ये 100 साल की सबसे बड़ी आपदा से जूझते हुए हमने किया है। कई तो ऐसे खेल हैं जिनमें हमने पहली बार qualify किया है। सिर्फ qualify ही नहीं किया बल्कि कड़ी टक्कर भी दे रहे हैं। हमारे खिलाड़ी हर खेल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। इस ओलिंपिक में नए भारत का बुलंद आत्मविश्वास हर game में दिख रहा है। ओलंपिक्स में उतरे हमारे खिलाड़ी, अपने से बेहतर रैंकिंग के खिलाड़ियों को, उनकी टीमों को चुनौती दे रहे हैं। भारतीय खिलाड़ियों का जोश, जुनून और जज़्बा आज सर्वोच्च स्तर पर है। ये आत्मविश्वास तब आता है जब सही टैलेंट की पहचान होती है, उसको प्रोत्साहन मिलता है। ये आत्मविश्वास तब आता है जब व्यवस्थाएं बदलती हैं, transparent होती हैं। ये नया आत्मविश्वास न्यू इंडिया की पहचान बन रहा है। ये आत्मविश्वास आज देश के कोने-कोने में, हर छोटे-छोटे बड़े गांव-कस्बे, गरीब, मध्यम वर्ग के युवा भारत के हर कोने में ये विश्‍वास में आ रहा है।

साथियों,

इसी आत्मविश्वास को हमें कोरोना से लड़ाई में और अपने टीकाकरण अभियान में भी जारी रखना है। वैश्विक महामारी के इस माहौल में हमें अपनी सतर्कता लगातार बनाए रखनी है। देश आज 50 करोड़ टीकाकरण की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा है तो, गुजरात भी साढ़े 3 करोड़ वैक्सीन डोसेज के पड़ाव के पास पहुंच रहा है। हमें टीका भी लगाना है, मास्क भी पहनना है और जितना संभव हो उतना भीड़ का हिस्सा बनने से बचना है। हम दुनिया में देख रहे हैं। जहां मास्क हटाए भी गए थे, वहां फिर से मास्क लगाने का आग्रह किया जाने लगा है। सावधानी और सुरक्षा के साथ हमें आगे बढ़ना है।

साथियों,

आज जब हम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्नयोजना पर इतना बड़ा कार्यक्रम कर रहे हैं तो मैं एक और संकल्प देशवासियों को दिलाना चाहता हूँ। ये संकल्प है राष्ट्र निर्माण की नई प्रेरणा जगाने का। आज़ादी के 75 वर्ष पर, आजादी के अमृत महोत्सव में, हमें ये पवित्र संकल्प लेना है। इन संकल्पों में, इस अभियान में गरीब-अमीर, महिला-पुरुष, दलित-वंचित सब बराबरी के हिस्सेदार हैं। गुजरात आने वाले वर्षों में अपने सभी संकल्प सिद्ध करे, विश्व में अपनी गौरवमयी पहचान को और मजबूत करे, इसी कामना के साथ मैं आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। एक बार फिर अन्न योजना के सभी लाभार्थियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं !!! आप सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद !!!