Text of PM's address at 86th ICAR Foundation Day

Published By : Admin | July 30, 2014 | 16:32 IST
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मंत्री परिषद के मेरे साथी श्री राधा मोहन सिंह जी, डाक्टर संजय जी, मंच पर विराजमान सभी महानुभाव, और कृषि और विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े हुए सभी तपस्वीजन.


हम standing ovation उन महानुभावों को दें, जिन्होने आज award भी प्राप्त किया है, और देश में इस प्रकार की गतिविधि से जुड़े हुए हैं.जिनका सम्मान करने का मुझे सौभाग्य मिला है.उन सबको मैं हृदय से अभिनंदन करता हूँ.

अयप्पन जी को मैं सुन रहा था, superfast train चल रही थी. इसी तेज गति से कृषि विकास भी होगा, ऐसा मुझे भरोसा है. जब उन्होने सबको standing ovation के लिए खड़ा किया तो ये कला मेरे ध्यान में आ गयी की लंबी देर तक सुनते समय नींद आ जाती है. तो बीच बीच में standing ovation अच्छा रहता है. लेकिन मैने standing ovation इसके लिए नहीं करवाया था - मैं हृदय से मानता हूँ की देश के कोटि-कोटि किसानों ने भारत के भाग्य को बदलने में बहुत बड़ा योगदान दिया है.

और इसी लिए वैज्ञानिक कितनी ही खोज क्यों न करें, लेकिन अगर उसपर भरोसा करके किसान अपना एक साल खपा नही देता हैं, दो साल खपा नही देता है, तो सिद्धि संभव नही होती है. कभी lab में, कभी छोटी-सी प्रायोगिक व्यवस्था में, सिद्धि प्राप्त करने में expert को सफलता मिल जाती है, लेकिन जब तक उसका सरलीकरण नहीं हो, जाता, सामान्य किसान को पल्ले पड़े, भाषा, परिभाषा और प्रयोगों से उसे जोड़ा नहीं जाता है, तब तक इसका व्याप्त बढ़ता नहीं है.

हमारे देश में कृषि ज़्यादातर पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में दी जाती है. और इसमें परंपराओं को बदलने का साहस बहुत कम लोग रखते हैं. जब तक उसको ये भरोसा ना हो, हाँ भाई, ‘this is the way, ये कुछ होगा, और इसके लिए भी दो, चार, पाँच साल तक सोचता रहता है, क्योंकि उसे मालूम है, कहीं मैं प्रयोग कर गया और मेरी जिंदगी अटक गयी तो क्या होगा, वो हिम्मत नहीं करता. और इसलिए भारत के विज्ञान जगत को, और ख़ास करके कृषि क्षेत्र में अनुसंधान करने वाले महानुभावों के सामने, सरकार के सामने, सामान्य किसान समुदाय के सामने, ये नितांत आवश्यक है के हम बदलते हुए युग में, बदलते हुए परिवेश में, climate change के माहौल में और वैज्ञानिकों के द्वारा किए गये संशोधनो के मध्यम से, progressive farmers के द्वारा किए गये प्रयोगों के मध्यम से ,बदलते हुए climatic zones …. Climatic zones ही बदल रहें हैं हमारे सारे …. … agro-climatic zones जो पहले बनाएँ होंगें आज शायद agro-climatic zones में काफ़ी बदलाव आ रहा है,… उन सारे पाश्र्वभूमि में, हमारा किसान भरोसा करके प्रयोग करने की हिम्मत करे, और इस दिशा में हम कैसे आगे बढ़ें ?

आज इस अनुसंधान केंद्र को 86 साल हो गये. मैं चाहूँगा की आप सब मिलकर के, इसका शताब्दी वर्ष कैसे मनाया जाए उसका planning आज ही करें. और institutional celebration planning नहीं, हम इस अनुसंधान के मध्यम से किसानों तक कैसे पहुचेगें, किन- किन विषयों में पहुँचेगें, किन किन बातों में हम कोई goal set करके acheive करेंगें. और सारी franternity ,all the universities, all the agricultural colleges, इस शताब्दी के साथ research के नये आयाम और उनके साथ सामान्य किसान को जोड़ने का प्रयास, इस दिशा में हम कुछ goal तय करके आनेवाले 14-15 साल जो भी हमें मिलते हैं, और एक century का mission goal बना करके, मैं समझता हूँ , शायद हम 86 साल में जितना कर पाए हैं उसे ज़्यादा 14 साल में कर सकतें हैं. क्योंकि अब ,86 साल पहले हमारी ताक़त थी, 86 साल में वो ताक़त सैंकड़ों गुणा ज़यादा है. विज्ञान ने भी भारी प्रगति की है, वैश्विक संबंधों का वातावरण भी, ज्ञान का आदान-प्रदान भी, बहुत तेज़ी से हुआ हैं, और इसलिए हम अगर ये goal ले कर चलें तो हम कुछ कर सकतें हैं.

हमारे देश के सामने, क्‍योंकि यह सारी जो हमारी मेहनत है, उसमें हमे दो चीज़ों को सिद्ध करना है – एक, हमारा किसान, देश और दुनिया का पेट भरने में सामर्थ्यवान हो, और दूसरा, हमारी कृषि, किसान का जेब भरने में सामर्थ्यवान हो. दुनिया का पेट तो भरे लेकिन किसान की अगर जेब नही भरेगी तो शायद हम जो चाहते हैं उन स्थितियों को प्राप्त नहीं कर सकते. हमारी दिशा, हमारी योजना, उस तरफ कैसे रहे?

हमारी ज़मीन तो बढ़ने वाली नहीं है, परिवार बढ़ते चले जा रहें हैं, माँग बढ़ती चली जा रही है. और इस समय हमें उन challenges को address करना पड़ेगा, और हमारा focus, soil fertility. हमारी soil में सदियों पहले, ज़मीन को सुधारने के प्रयोग होते थे, ऐसा नहीं है की आज ही हो रहे हैं. लेकिन समय के अभाव से आर्थिक दौड़ में किसान अब वो समय नहीं देता है. ज़मीन सुधार के लिए बीच में time देना चाहिए, कुछ प्रक्रियाएँ करनी चाहिए, उसको जानकारी है, लेकिन वो कर नही पता है. तब वैज्ञानिक intervention आवश्यक हो जाता है. उसकी परंपराएँ, पद्यतियाँ, scientific intervention, दोनो की जोड़ करके हम हमारी ज़मीन की fertility के संबंध में, कोई निश्चित goal के साथ कैसे आगे बढ़ सकतें हैं? क्योंकि हमारे सामने आवश्यक हैं - प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाए बिना हमारा कोई चारा ही नहीं हैं. उसी प्रकार से, जो फसल 45 दिन में होती है वो फसल 35 दिन में कैसे हो. वो कौन सी वैज्ञानिक पद्यतियाँ हों , किस प्रकार का time frame हो, और फिर भी quality erosion ना हो. जैसे मूँग में प्रयोग हुआ है, कुछ time तो बचा, लेकिन उसकी साइज़ बदल दी गयी है, साइज़ छोटी कर दी गयी है. और जब साइज़ छोटी होती है, तो मार्केट गिर जाता है, क्योंकि सामान्य मानव ने… मूँग की एक साइज़ set है उसके मन में ,एक छवि तैयार है … उसी में अगर आँखफेर हो गया तो? उसके मन में जो रहता है ठीक है .. उससे अगर थोड़ा इधर- उधर हो गया तो, उसके मन में रहता है अरे भाई शायद ये अच्छा नहीं होगा, और इसलिए quality erosion ना हो, उसके बावजूद भी productivity बढ़ाएँ और time reduce हो. इसपर हम कैसे काम कर सकतें हैं?

हम जानते हैं की विश्व के सामने पानी का संकट है, water-cycle, weather-cycle, दोनो के बीच में clash हो रहा है, contradiction खड़ी हो गयी है. अब हमारे सामने challenge है, इस weather-cycle के साथ, हमारे water-cycle का scientific management हमकैसे करें. हम नये-नये तरीके से उससे कैसे जोड़ें. चाहे rain harvesting हो, या जल संचय के नये-नये अभियान हों, और हम जन सामान्य को जल संचय के बारें में जितना जागरूक बनाएँगें, जितना भागीदार बनाएँगे, उतना ही फ़ायदा मिलेगा.

Global warming, environment के five star hotel में होने वाले seminar अपनी जगह है, उसका भी एक positive है, लेकिन आख़िर तो ये काम करने वाला सामान्य मानव है. उसके मन में ये भाव कैसे जगे और जब तक ये विश्वास पैदा नहीं होता, की ये पानी परमात्मा का दिया हुआ प्रसाद है. आज जब हम मंदिर में जातें हैं … प्रसाद का एक दाना नीचे ना गिर जाए, इतनी care करते हैं, बहुत सजग रहते हैं कि प्रसाद है, गिरना नहीं चाहिए. ये पानी भी परमात्मा का प्रसाद है, एक बूँद भी बर्बाद नहीं होनी चाहिए …. ये भाव सामान्य व्यक्ति तक कैसे पहुँचे. जब साबरमती नदी लबालब भारी रहती थी, पानी भरपूर बहता था, महात्मा गाँधी साबरमती आश्रम में रहते थे … 1930 का वो कालखंड था … 30 के पहले का कालखंड था, लेकिन कोई अगर, पानी का पूरा ग्लास देता था, तो बापू कहते थे, आधा पीना है, आधा ही ले आओ … आधा पानी वापस करो, पानी बर्बाद मत करो. सामने नदी थी लबालब पानी से भरी थी, लेकिन वो, एक घूँट भी पानी बर्बाद होने से उन्हें पीड़ा हो जाती. ये level of consciousness और ultimately , common man का ये level of consciousness जितना बढ़ता है, उतनी ही success की संभावनाएँ बढ़ती हैं. और इसलिए हम उस दिशा में कैसे आगे बढ़ें.

'per drop more crop', ये हमारा mission statement हो सकता हैI जैसे कम ज़मीन, कम समय, ज़यादा ऊपज …. ‘per drop more crop’ ….. किसान का पेट भी भरे, और किसान को जेब भी भरे. कम भूमि में ज़यादा ऊपज हो.

इसी के साथ हमारी animal husbandry, हमारे पास जितनी मात्रा में पशु हैं, उसकी तुलना में दूध बहुत कम है. दूध की माँग ज़यादा है …… requirement भी ज़यादा है. हमारे पशु ज़्यादा दूध उत्पादन करें, यह हमारे लिए एक सहज, सरल प्रक्रिया होनी चाहिए. ये एक सहज, सामान्य, व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहिए. ऐसा नहीं कि universities , labs, veterinary colleges ने काम नहीं किया है, लेकिन जब तक ये काम, जो पशु-पालक है, उस तक नहीं पहुँचता है, तब तक हमें परिणाम नहीं मिलता. सारे विश्व में ये जो बदलाव आया है, वो scientific intervention से आया है. technology upgradation, और technology के involvement से आया है. हम जब तक उस दिशा में नहीं जातें, हम देश और दुनिया की माँग की पूर्ति के लिए, असक्षम महसूस करेंगे. स्थिति ऐसी है, माँग बहुत बढ़ी है, और ये हमारे लिए तो opportunity है. उस opportunity को कैसे भरें?

हमारे सामने एक सबसे बड़ा challenge है, ‘lab- to- land’, जो lab में है वो land पर कैसे आए, जो universities में है, वो कृषक के पास कैसे पहुचे? जो श्रधा universities के lab में बैठकर एक scientist को है, वो श्रधा एक कृषक के मन मैं कैसे आए? और उसके लिए progressive farmers …. यही हमारी सबसे बड़ी agency होती है. progressive farmer, mentally risk लेने के लिए तैयार होता है … उसके DNA में होता है ये. वो चाहता है, चलो मैं करूँगा . लेकिन ये हमारा कोई संबंध है क्या?

Universities के पास और agricultural colleges के पास अपने इलाक़े के progressive farmers, उनकी expertise, 35 age group के अच्छे पढ़े लिखे farmers, इनका कोई data है क्या? जो पढ़े लिखे हैं, young हैं, progressive हैं, क्या agricultural universities अपने इलाक़े के दो सौ, चार सौ , गाँवों के ऐसे लोग को एक information-bank बना सकता है? एक talent-pool बना सकता है ….they are a real talent …. talent pool बना सकता है क्या? और उस talent-pool के लोगों को address करके, उनके मध्यम से dissemination कार्यक्रम बना सकतें हैं क्या?

हमारे agricultural colleges जो हैं, उस इकाई को एक nodal agency मान कर, कम से कम हम, हिन्दुस्तान के 500-600 districts में आराम से अपना network खड़ा कर सकतें हैं. हमारे तो अनुसंधान होते रहें हैं, हमारी universities हैं, हमारी colleges हैं, और students है, और फिर एक identity है …. उन सबकी एक chain बना करके एक व्यवस्था करी जाए, और एक timeframe पर काम कैसे हो? और एक सहज प्रक्रिया के रूप में कैसे हो?

जितने हमारे agricultural colleges हैं, उनका अपना कोई radio station हो सकता है? Agricultural colleges का radio station है. और मैं इसलिए कहता हूँ agricultural colleges का radio station …. क्योंकि किसान radio बहुत सुनता है.

agriculture college जहां है, उसको उस इलाके की कृषि का पता है। वहां कॉलेज के students को भी --- ज़्यादातर उसी परिवार के बच्चे हैं जो कृषि क्षेत्र से आते हैं। वो परम्परा से भी जानता है। agricultural radio - कॉलेज चलाये, आजकल रेडियो के लिए यह सुविधा है, permission मिलती है। इन-हाउस students को काम दिया जाए - research करो और रेडियो पर आ कर talk दो। एक सहज रूप से ऐसी प्रक्रिया बन सकती है। हमारे agricultural colleges रेडियो के माध्यम से लगातार किसानों को उसी इलाके के किसानों की समस्या - बारिश देर से आये तो क्या करना है, बारिश कम आयी तो क्या करना है, फलाने प्रकार का रोग नज़र आ रहा है तो क्या करना है ? आप देखिये। अरबों खरबों रुपयों के investment से बनी हुई मीडिया वर्ल्ड के सामने एक कॉलेज के बच्चोँ के द्वारा चलाया गया किसान के उपयोग का कार्यक्रम ज़्यादा ताक़तवर होगा, credible होगा, popular होगा.

हम इस बदलाव की दिशा में जाने को तैयार हैं क्या? अगर हम बदलाव की दिशा में जाने को तैयार हैं तो हम बहुत कुछ दे सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि हमारे students ने कोई research नहीं किया, creative काम नहीं किया है। क्या हम तय कर सकते हैं - within 4-5 years - सभी universities में अब तक agriculture में जितनी भी research हुई है, चाहे PhD हुआ हो या research paper लिखा गया हो - उन सब को digital करके compile कर सकतें हैं. पूरे हिन्दुस्तान में हमारे नौजवानो ने क्या research किया है , अगर मान लीजिए किसी ने गेहूँ पर research किया है, देश की 25 universities में 200 के करीब छात्रों ने पिछले 50 साल में research किया होगा, आज वो खजाना कहाँ पर है? क्या किसी ने इक्कठा करके दोबारा उसे देखा है, किसी university ने देखा है, की पिछले 50 साल में इस-इस प्रकार के research हुए. इन 50 साल के research को compile करके, पूरा एक digital platform तैयार हो सकता है. PhD कर ली नौकरी कर ली, retire भी हो गये, कहने के लिए हो गया कि बचपन में PhD कर ली थी.

देश को क्या मिला ? और उसका कारण है, हम चीज़ों को उसकी मलकियत बना देते हैं, जो राष्ट्र की धरोहर है. उस गौरव गान के साथ उसे जोड़ते नहीं हैं.

मैं वो चीज़ें बता रहा हूँ आपको , जिसके लिए कोई बहुत बड़ा बजट नहीं लगता है. बहुत बड़ा एकदम कोई सूर्य-चंद्र पर से विज्ञान उतारने की ज़रूरत नही पड़ती, सहज व्यवहार की बातें हैं. और आप देखिए, ये ताक़त इतनी बढ जाएगी… 

आज भी हमारे यहाँ pulses and oilseeds बहुत बड़े challenge हैं . Pulses का उत्पादन - जिसमें प्रोटीन content, ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति के लिए प्रोटीन का source ही , उस ग़रीब आदमी का भला करना है तो उसे वो pulses मिलें , प्रोटीन जिसमे ज़्यादा हो. ताकि उसकी जिंदगी में वो काम आए, हम उसको priority दे सकतें हैं. Oilseeds, भारत कृषि प्रधान देश है, और हमे तेल बाहर से मंगवाना पड़ता है. अगर लाल बहादुर शास्त्री कहें 'जय जवान, जय किसान', और हिन्दुस्तान का किसान खड़ा हो जाए, हिन्दुस्तान का पेट भरने के लिए सामर्थ्य पैदा कर दे, तो क्या हमारे हिन्दुस्तान के किसान के सामने ये challenge नही रख सकते कि हमें कुछ करना है ? खाने का तेल हम बाहर से नहीं लाएँगे. आइए हम सब मिलकर मेहनत करें. देश की आवश्यकतायें हैं, और ये उन आवश्यकतयों की पूर्ति के लिए उठाए गये कदम हैं. हम goal set कर सकतें हैं, goal achieve कर सकतें हैं क्या ? जब तक हम सामान्य मानव की और देश की आवश्यकतयों का अनुसंधान नहीं करते, design strategy workout नहीं करते, resource mobilise नहीं करते, और उसके अनुसार human resource को develop करने की कोशिश नहीं करते, हमें जो चाहिए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर सकतें. और इसलिए मैं आज ,जो इस प्रकार के प्रमुख लोग यहाँ बैठे हैं, "नही होता है" उसका analysis छोड़ कर, "कैसे हो" उसका analysis करना है. इसपर हम कैसे काम कर सकते हैं.

Blue revolution. भारत के तिरंगे झंडे में हम White revolution की बात करतें हैं, Green revolution की बात करतें हैं, लेकिन जो blue colour का अशोक चक्र है उसको भी देखने की ज़रूरत है. और वो blue revolution है हमारी सामुद्रिक संपत्ति. Fisheries, उसके क्षेत्र में development, बहुत बड़ा global market पड़ा हुआ है. हमारे fisherman की जिंदगी बदले. बहुत प्रकार की बातें हो रहीं हैं, fisheries में एक बहुत बड़ा क्षेत्र खुल गया है, अब मोती का खेती हो रही है. बहुत बड़ा काम हो रहा है, हमारी science faculty, हमारे मछुआरे, और हमारे समुद्र तट पर रहने वाले नागरिक, seaweed की खेती, scientific ढंग से कैसे हो, seaweed इन दिनों Pharmaceutical world के लिए सबसे बड़ा raw material input है, global market है seaweed का. पर हमारे समुद्र तट पर हम seaweed की खेती का उतना साहस नहीं कर पा रहे. और seaweed में भी इतनी variety है, और इतना potential है उसके अंदर ,seaweed मनुष्य के काम आए या ना आए, ऐसे ही crush करके उसका रस खेत में छींट दिया जाए तो खेती के लिए वो बहुत बड़ी दवाई, और fertilizer दोनो का काम कर देता है.

क्या कारण है की हिमालय हमारे पास हो और चीन के पास भी हिमालय का कुछ भाग हो, चीन Herbal medicine में बहुत आगे है, और हम medicinal plants के संबंध में धीरे धीरे चिंता के क्षेत्र में चले जाएँ. Medicinal plants के क्षेत्र में हमारी कोशिश क्या है, हम क्या नया दें सकतें हैं, हमारे medicinal plants का maximum utilisation कैसे हो. Pharmaceutical industry, Pharmaceutical department और Agriculture department and research institution, ये चार मिल करके, इस विषय में क्या कर सकतें हैं?

मैं समझता हूँ इतना सारा बड़ा, sky is the limit, इस प्रकार का क्षेत्र हमारे सामने खुला पड़ा है, अगर हम सब मिलकर इस नयी सोच के साथ इस दिशा में आगे बढ़ें, हम आनेवाले दिनो में ना सिर्फ़ भारत को बल्कि विश्व को बहुत कुछ दें सकतें हैं.

जिन महानुभावों ने इस काम में योगदान दिया है, उनका अभिनंदन करने का मुझे अवसर मिला. इसके लिए मैं उन्हे बहुत बहुत बधाई देता हूँ. मुझे आप सबके बीच आने का अवसर मिला, मेरा सौभाग्य है, मेरी बहुत बहुत सुभकामनायें हैं.

बहुत बहुत धन्यवाद.

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“Exactly 8 years ago we started implementing new mantras of good governance in India following the path of minimum government - maximum governance”
“Technology has helped a lot in furthering the vision of saturation and in ensuring last-mile delivery”
“We have made technology a key tool to impart new strength, speed and scale to the country”
“Today we are making technology available to the masses first”
“When technology goes to the masses, possibilities of its use also increase accordingly”
“Promotion of drone technology is another medium of advancing our commitment to good governance and ease of living”

मंच पर उपस्थित केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे सहयोगीगण, भारत ड्रोन महोत्सव में देशभर से जुटे सभी अतिथिगण, यहां उपस्थित अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सभी को भारत ड्रोन महोत्सव इस आयोजन के लिए मैं बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं देख रहा हूं कि सभी वरिष्ठ लोग यहां मेरे सामने बैठे हैं। मुझे आने में विलंब हो गया। विलंब इसलिए नहीं हुआ कि मैं देर से आया। यहां तो मैं समय पर आ गया था। लेकिन ये ड्रोन की जो प्रदर्शनी लगी है। उसे देखने में मेरा मन ऐसा लग गया कि मुझे समय का ध्यान ही नहीं रहा। इतना लेट आया फिर भी मैं मुश्किल से दस प्रतिशत चीजों को देख पाया और मैं इतना प्रभावित हुआ, अच्छा होता मेरे पास समय होता मैं पूरा एक-एक स्टॉल पर जाता और नौजवानों ने जो काम किया है उसको देखता, उनकी कथा सुनता। सब तो नहीं कर पाया, लेकिन जो भी मैं कर पाया, मैं आप सबसे आग्रह करुंगा, मैं सरकार के भी सभी विभागों से आग्रह करूंगा कि आपके अलग-अलग स्तर के जितने अधिकारी हैं, जो पॉलिसी मेकिंग में जिनका रोल रहता है। वे जरूर दो-तीन घंटे यहां निकालें, एक-एक चीज को समझने की कोशिश करें। यहां उनको टेक्नोलॉजी को देखने को मिलेगा और उनको अपने दफ्तर में ही पता चलेगा कि ये टेक्नोलॉजी अपने यहां ऐसे उपयोग में हो सकती है। यानि गवर्नेंस में भी अनेक ऐसे initiatives हैं, जो हम इसके आधार पर चला सकते हैं। लेकिन मैं वाकई में कहता हूं कि मेरे लिए एक बहुत ही सुखद अनुभव रहा आज, और भारत के नौजवानों और मुझे खुशी इस बात की होती थी कि जिन-जिन स्टॉल पर गया तो बड़े गर्व से कहता था, साहब ये मेक इन इंडिया है, ये सब हमने बनाया है।

साथियों,

इस महोत्सव में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हमारे किसान भाई-बहन भी हैं, ड्रोन इंजीनियर भी हैं, स्टार्ट अप्स भी हैं, विभिन्न कंपनियों के लीडर्स भी यहां मौजूद हैं। और दो दिनों में यहां हज़ारों लोग इस महोत्सव का हिस्सा बनने वाले हैं, मुझे पक्का विश्वास है। और अभी मैं एक तो मैंने प्रदर्शनी भी देखी, लेकिन जो actually ड्रोन के साथ अपना कामकाज चलाते हैं। और उसमें मुझे कई युवा किसानों से मिलने का मौका मिला, जो खेती में ड्रोन टेक्नोलॉजी का उपयोग कर रहे हैं। मैं उन युवा इंजीनियर्स से भी मिला, जो ड्रोन टेक्नोलॉजी को प्रोत्साहित कर रहे हैं। आज 150 drone pilot certificate भी यहां दिए गए हैं। मैं इन सभी drone pilots को और इस काम में जुड़े हुए सभी को अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूं।

साथियों,

ड्रोन टेक्नोलॉजी को लेकर भारत में जो उत्साह देखने को मिल रहा है, वो अद्भुत है। ये जो ऊर्जा नज़र आ रही है, वो भारत में ड्रोन सर्विस और ड्रोन आधारित इंडस्ट्री की लंबी छलांग का प्रतिबिंब है। ये भारत में Employment Generation के एक उभरते हुए बड़े सेक्टर की संभावनाएं दिखाती है। आज भारत, स्टार्ट अप पावर के दम पर दुनिया में ड्रोन टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा एक्सपर्ट बनने की ओर तेज गति से आगे बढ़ रहा है।

साथियों,

ये उत्सव, सिर्फ एक टेक्नोलॉजी का नहीं बल्कि नए भारत की नई गवर्नेंस का, नए प्रयोगों के प्रति अभूतपूर्व Positivity का भी उत्सव है। संयोग से 8 वर्ष पहले यही वो समय था, जब भारत में हमने सुशासन के नए मंत्रों को लागू करने की शुरुआत की थी। मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस के रास्ते पर चलते हुए, ease of living, ease of doing business को हमने प्राथमिकता बनाया। हमने सबका साथ, सबका विकास के मंत्र पर चलते हुए देश के हर नागरिक, हर क्षेत्र को सरकार से कनेक्ट करने का रास्ता चुना। देश में सुविधाओं का, पहुंच का, डिलीवरी का एक जो divide हमें अनुभव होता था, उसके लिए हमने आधुनिक Technology पर भरोसा किया, उसे एक महत्वपूर्ण bridge के रूप में व्यवस्था का हिस्सा बनाया। जिस technology तक देश के एक बहुत छोटे से वर्ग की पहुंच थी, हमारे यहां ये मान लिया गया टेक्नोलॉजी यानि एक बड़े रहीस लोगों को कारेबार है। सामान्य मानवीय की जिंदगी में उसका कोई स्थान नहीं है। उस पूरी मानसिकता को बदलकर के हमने टेक्नोलॉजी को सर्वजन के लिए सुलभ करने की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं, और आगे भी उठाने वालें हैं।

साथियों,

जब टेक्नोलॉजी की बात आती है तो हमने देखा है, हमारे यहां कुछ लोग टेक्नोलॉजी का डर दिखाकर उसे नकारने का प्रयास भी करते हैं। ये टेक्नोलॉजी आएगी तो ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा। अब ये बात सही है कि एक जमाने में पूरे शहर में एक टॉवर हुआ करता था। उसकी घड़ी के घंट बजते थे और गांव का समय तय होता था तक किसने सोचा था कि हर गली हर एक की कलाई पर घड़ी लगेगी। तो जब परिवर्तन आया होगा तो उनको भी अजूबा लगा होगा और आज भी कुछ लोग होंगे, जिनको मन करता होगा कि हम भी गांव में एक टॉवर बना दें और वहां हम भी एक घड़ी लगा दें। किसी जमाने में उपयोगी होगा यानि जो बदलाव होता है। उस बदलाव के साथ हमें अपने को बदलना व्यवस्थाओं को बदलना तभी प्रगति संभव होती है। हमने हाल ही में कोरोना वैक्सीनेशन के दौरान भी बहुत अनुभव किया है। पहले की सरकारों के समय टेक्नोलॉजी को problem का हिस्सा समझा गया, उसको anti-poor साबित करने की कोशिशें भी हुईं। इस कारण 2014 से पहले गवर्नेंस में टेक्नोलॉजी के उपयोग को लेकर एक प्रकार से उदासीनता का ही वातावरण रहा। किसी ने इक्के-दुक्के व्यक्ति ने अपनी रूचि के अनुसार कर लिया तो कर लिया, व्यवस्था का स्वभाव नहीं बना। इसका सबसे अधिक नुकसान देश के गरीब को हुआ है, देश के वंचित को हुआ है, देश के मिडिल क्लास को हुआ है, और जो aspirations के जज्बे से भरे हुए लोग थे उनको निराशा की गर्त में जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

साथियों,

हम इस बात का इन्कार नहीं करते कि नई टेक्नोलॉजी disruption लाती है। वो नए माध्यम खोजती है, वो नये अध्याय लिखती है। वो नए रास्ते, नई व्यवस्था भी बनाती है। हम सभी ने वो दौर देखा है कि जीवन से जुड़े कितने ही आसान विषयों को कितना मुश्किल बना दिया गया था। मुझे नहीं पता कि आप में से कितने लोगों ने बचपन में राशन की दुकान पर अनाज के लिए, केरोसीन के लिए, चीनी के लिए लाइन लगाई होगी। लेकिन एक समय ऐसा था कि घंटों इसी काम में लाइन में लगे हुए गुजर जाते थे। और मुझे तो अपना बचपन याद है कि हमेशा एक डर रहता था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा नंबर आने तक अनाज खत्म हो जाएगा, दुकान बंद होने का समय तो नहीं हो जाएगा? ये डर 7-8 साल पहले हर गरीब के जीवन में रहा ही रहा होगा। लेकिन मुझे संतोष है कि आज टेक्नोलॉजी की मदद से हमने इस डर को समाप्त कर दिया है। अब लोगों में एक भरोसा है कि जो उनके हक का है, वो उन्हें मिलेगा ही मिलेगा। टेक्नोलॉजी ने last mile delivery को सुनिश्चित करने में, saturation के विजन को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी मदद की है। और मैं जानता हूं कि हम इसी गति से आगे बढ़कर अंत्योदय के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। बीते 7-8 वर्षों का अनुभव मेरा विश्वास और मजबूत करता है। मेरा भरोसा बढ़ता जा रहा है। जनधन, आधार और मोबाइल की त्रिशक्ति- JAM इस ट्रिनिटी की वजह से आज हम देशभर में पूरी पारदर्शिता के साथ गरीब को उसके हक की चीजें जैसे राशन जैसी बातें हम पहुंचा पा रहे हैं। इस महामारी के दौरान भी हमने 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन सुनिश्चित किया है।

साथियों,

ये हमारे टेक्नोल़ॉजी सॉल्यूशन को Correctly डिजाइन करने, Efficiently डेवलप करने और Properly Implement करने की शक्ति है कि आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान सफलता से चला रहा है। आज देश ने जो Robust, UPI फ्रेमवर्क डेवलप किया है, उसकी मदद से लाखों करोड़ रुपए गरीब के बैंक खाते में सीधे ट्रांसफर हो रहे हैं। महिलाओं को, किसानों को, विद्यार्थियों को अब सीधे सरकार से मदद मिल रही है। 21वीं सदी के नए भारत में, युवा भारत में हमने देश को नई strength देने के लिए, speed और scale देने के लिए, टेक्नोलॉजी को अहम टूल बनाया है। आज हम टेक्नोलॉजी से जुड़े सही Solutions डेवलप कर रहे हैं और उनको Scale Up करने का कौशल भी हमने विकसित किया है। देश में ड्रोन टेक्नोलॉजी को प्रोत्साहन good governance के ease of living के इसी कमिटमेंट को आगे बढ़ाने का एक और माध्यम है। ड्रोन के रूप में हमारे पास एक और ऐसा स्मार्ट टूल आ गया है, जो बहुत जल्द सामान्य से सामान्य भारतीय के जीवन का हिस्सा बनने जा रहा है। हमारे शहर हों या फिर देश के दूर-दराज गांव-देहात वाले इलाके, खेत के मैदान हों या फिर खेल के मैदान, डिफेंस से जुड़े कार्य हों या फिर डिज़ास्टर मैनेजमेंट, हर जगह ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ने वाला है। इसी तरह टूरिज्म सेक्टर हो, मीडिया हो, फिल्म इंडस्ट्री हो, ड्रोन इन क्षेत्रों में क्वालिटी और Content, दोनों को बढ़ाने में मदद करेगा। अभी जितना इस्तेमाल हो रहा है, ड्रोन का उससे कहीं ज्यादा इस्तेमाल हम आने वाले दिनों में देखने वाले हैं। मैं सरकार में हर महीने एक प्रगति कार्यक्रम चलाता हूं। सभी राज्यों के मुख्य सचिव स्क्रीन पर होते हैं टीवी के और अनेक विषयों की चर्चा होती है, और मैं उनसे आग्रह करता हूं कि ड्रोन से जो प्रोजेक्ट चल रहा है। मुझे वहां का पूरा लाइव demonstration दीजिए। तो मैं बड़ी आसानी से चीजों को coordinate करके वहां निर्णय करने की सुविधा बढ़ जाती है। जब केदारनाथ के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ, अब हर बार तो मेरे लिए केदारनाथ जाना मुश्किल था तो मैं regularly केदारनाथ में कैसे काम चल रहा है, कितनी तेज गति से तो वहां से ड्रोन के द्वारा regularly मेरे दफ्तर में बैठकर के उसकी जब भी रिव्यू मिटिंग होती थी तो मैं ड्रोन की मदद से केदारनाथ के डेवलपमेंट के काम को regular मॉनिटर करता था। यानि आज सरकारी कामों की क्वालिटी को भी देखना है। तो मुझे जरूरी नहीं की मैं पहले से बता दूं कि मुझे वहां इंस्पेक्शन के लिए जाना है, तो फिर तो सबकुछ ठीक-ठाक हो ही जाएगा। मैं ड्रोन भेज दूं, पता वो ही लेकर के आ जाता है और उनको पता तक नहीं चलता है कि मैंने जानकारी ले ली है।

साथियों,

गांव में भी किसान के जीवन को आधुनिक सुविधाजनक, अधिक संपन्न बनाने में भी ड्रोन टेक्नोलॉजी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली है। आज गांवों में अच्छी सड़कें पहुंची हैं, बिजली-पानी पहुंचा है, ऑप्टिकल फाइबर पहुंच रहा है, डिजिटल टेक्नोलॉजी का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। लेकिन फिर भी गांव में ज़मीन से जुड़े, खेती से जुड़े अधिकतर काम के लिए पुराने सिस्टम से काम चलाना पड़ता है। उस पुराने सिस्टम में हर प्रकार का wastage है, परेशानियां भी बहुत हैं, और productivity तो पता नहीं तय ही नहीं कर पाते कुछ हुआ कि नहीं हुआ। इसका सबसे अधिक नुकसान हमारे गांव के लोगों को होता है, हमारे किसानों को होता है, और उसमें भी ज्यादा हमारे छोटे किसानों को होता है। छोटे किसान की ज़मीन और उसके संसाधन इतने नहीं होते कि वो विवादों को चुनौती दे पाएं और कोर्ट कचहरी के चक्कर काट पाएं। अब देखिए, लैंड रिकॉर्ड से लेकर सूखा-बाढ़ राहत में फसल के डैमेज तक हर जगह रैवेन्यू डिपार्टमेंट के कर्मचारियों पर ही व्यवस्था निर्भर है। Human Interface जितना अधिक है, उतना ही अधिक भरोसे की भी कमी हो जाती है, और उसी में से विवाद पैदा होते हैं। विवाद होते हैं तो समय और धन की बर्बादी भी होती है। इंसान के अंदाज़े से आकलन होते हैं तो उतना सटीक अंदाज़ा भी नहीं लग पाता। इन सारी मुश्किलों से पार पाने का ड्रोन अपने आप में एक सशक्त प्रभावी माध्यम के रूप में एक नया टूल हमारे सामने आया है।

साथियों,

ड्रोन टेक्नोलॉजी कैसे एक बड़ी क्रांति का आधार बन रही है, इसका एक उदाहरण पीएम स्वामित्व योजना भी है। इस योजना के तहत पहली बार देश के गांवों की हर प्रॉपर्टी की डिजिटल मैपिंग की जा रही है, डिजिटल प्रॉपर्टी कार्ड लोगों को दिए जा रहे हैं। इसमें Human Intervention कम हुआ है, और भेदभाव की गुंजाइश खत्म हुई है। इसमें बड़ी भूमिका ड्रोन की रही है। थोड़ी देर पहले मुझे भी स्वामित्व ड्रोन उड़ाने का, उसकी टेक्नोलॉजी समझने का अवसर मिला है। थोड़ी देर उसके कारण भी हो गई। मुझे खुशी है कि ड्रोन की मदद से अभी तक देश में लगभग 65 लाख प्रॉपर्टी कार्ड generate हो चुके हैं। और जिसको ये कार्ड मिल गया है, उसको संतोष है कि हां मेरे पास मेरी जितनी जमीन है, मेरे पास सही डिटेल मिल गई है। पूरे संतोष के साथ उन्होंने इस बात को कहा है। वरना हमारे यहां अगर छोटी सी जगह की नाप-नपाई भी होती है, तो उसमें सहमति बनाने के लिए सालों-साल लग जाते हैं।

साथियों,

आज हम देख रहे हैं कि हमारे किसान ड्रोन टेक्नोलॉजी की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, उनमें एक उत्साह दिख रहा है, वो इसे अपनाने के लिए तैयार हैं। ये ऐसे ही नहीं हुआ है। ये इसलिए है क्योंकि पिछले 7-8 साल में जिस तरह कृषि क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाया गया है, उस वजह से टेक्नोलॉजी किसानों के लिए हौव्वा नहीं रह गई है, और एक बार किसान उसको देखता है थोड़ा अपने हिसाब से उसका लेखा जोखा कर लेता है और अगर उसका विश्वास बैठ गया तो स्वीकार करने में देर नहीं करता है। अभी मैं बाहर जब किसानों से बात कर रहा था तो मध्यप्रदेश के एक इंजीनियर मुझे बता रहे थे कि मुझे तो लोग अब ड्रोन वाला करके बुलाते हैं। बोले मैं इंजीनियर हुआ, लेकिन अब तो मेरी पहचान ड्रोन वाले की हो गई है। उन्होंने मुझे कहा कि साहब देखिए मैनें उनको कहा कि आप क्या भविष्य क्या देखते हैं? तो उन्होंने मुझे कहा कि साहब देखिए जब pulses मामला है ना हमारे यहां उसकी खेती बढ़ेगी। और उसमें कारण एक ड्रोन होगा, मैनें कहा कैसे? उन्होंने कहा साहब pulses की खेती होती है तब उसकी फसल की ऊंचाई ज्यादा हो जाती है तो किसान अंदर जाकर के दवाई ववाई के लिए उसका मन नहीं करता है, मैं कहां जाऊंगा, वो छिड़काव करता आधी तो मेरे शरीर पर पड़ती है, और बोले इसलिए वो उस फसल की तरफ वो जाता ही नहीं है। बोले अब ड्रोन के कारण ऐसी जो फसलें हैं, जो मनुष्य के ऊंचाई से भी कभी-कभी ऊंची होती हैं। ड्रोन के कारण उसकी देखभाल, उसकी दवाई का छिड़काव, बोले इतना आसान होने वाला है कि हमारे देश का किसान आसानी से pulses की खेती की तरफ जाएगा। अब एक व्यक्ति गांव के अंदर किसानों के साथ जुड़ने के साथ काम करता है। तो चीज़ों में कैसे बदलाव आता है। उसका अनुभव उसको सुनने को मिलता है।

साथियों,

आज हमने जो agriculture sector में टेक्नोलॉजी को लाने का प्रायास किया है। Soil Health Cards ये अपने आप में हमारे किसानों के लिए बहुत बड़ी ताकत बनकर के उभरा है। और मैं तो चाहुंगा जैसे ये ड्रोन की सेवाएं हैं, गांव-गांव soil tasting के लैब बन सकती है, नए रोजगार के क्षेत्र खुल सकते हैं। और किसान अपना हर बार soil tasting कराकर के तय कर सकता है कि मेरी इस मिट्टी में ये आवश्यकता है, ये जरूरत है। माइक्रो इरीगेशन, स्प्रिंकल ये सारी बातें आधुनिक सिंचाई व्यवस्था का हिस्सा बन रही हैं। अब देखिए फसल बीमा योजना, फसल बीमा योजना के अंदर सबसे बड़ा काम हमारी GPS जैसी तकनीक का उपयोग हो, e-NAM जैसी डिजिटल मंडी की व्यवस्था हो, नीम कोटेड यूरिया हो या फिर टेक्नोलॉजी के माध्यम से सीधे किसानों के खाते में पैसा जमा करने की बात हो। बीते 8 साल में जो ये प्रयास हुए हैं, उसने किसानों का टेक्नोलॉजी के प्रति भरोसा बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। आज देश का किसान टेक्नोलॉजी के साथ कहीं ज्यादा Comfortable है, उसे ज्यादा आसानी से अपना रहा है। अब ड्रोन टेक्नोलॉजी हमारे कृषि सेक्टर को दूसरे लेवल पर ले जाने वाली है। किस ज़मीन पर कितनी और कौन सी खाद डालनी है, मिट्टी में किस चीज़ की कमी है, कितनी सिंचाई करनी है, ये भी हमारे यहां अंदाज़े से होता रहा है। ये कम पैदावार और फसल बर्बाद होने का बड़ा कारण रहा है। लेकिन स्मार्ट टेक्नोलॉजी आधारित ड्रोन यहां भी बहुत काम आ सकते हैं। यही नहीं, ड्रोन ये भी पहचानने में सफल होते हैं कि कौन सा पौधा, कौन सा हिस्सा बीमारी से प्रभावित है। और इसलिए वो अंधाधुंध-स्प्रे नहीं करता, बल्कि स्मार्ट-स्प्रे करता है। इससे महंगी दवाओं का खर्च भी बचता है। यानि ड्रोन तकनीक से छोटे किसान को ताकत भी मिलेगी, तेज़ी भी मिलेगी और छोटे किसान की तरक्की भी सुनिश्चित होगी। औऱ आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तो मेरा भी यही सपना है कि भारत में हर हाथ में स्मार्टफोन हो, हर खेत में ड्रोन हो और हर घर में समृद्धि हो।

साथियों,

हम देश के गांव-गांव में हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स का नेटवर्क सशक्त कर रहे हैं, टेलीमेडिसिन को प्रमोट कर रहे हैं। लेकिन गांवों में दवाओं और दूसरे सामान की डिलीवरी एक बड़ी चुनौती रही है। इसमें भी ड्रोन से डिलीवरी बहुत कम यानि बहुत कम समय में और तेज गति से डिलीवरी होने की संभावना बनने वाली है। ड्रोन से कोविड वैक्सीन की डिलीवरी से इसका फायदा हमने अनुभव भी किया है। ये दूर-सुदूर के आदिवासी, पहाड़ी, दुर्गम क्षेत्रों तक उत्तम स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में बहुत मददगार सिद्ध हो सकता है।

साथियों,

टेक्नोलॉजी का एक और पक्ष है, जिस पर मैं आपका ध्यान जरूर आकर्षित करना चाहता हूं। पहले के समय में टेक्नोलॉजी और उससे हुए Invention, Elite Class के लिए माने जाते थे। आज हम टेक्नोलॉजी को सबसे पहले Masses को उपलब्ध करा रहे हैं। ड्रोन टेक्नोलॉजी भी एक उदाहरण है। कुछ महीने पहले तक ड्रोन पर बहुत सारे restrictions थे। हमने बहुत ही कम समय में अधिकतर restrictions को हटा दिया है। हम PLI जैसी स्कीम्स के जरिए भारत में ड्रोन मैन्यूफेक्चरिंग का एक सशक्त इकोसिस्टम बनाने की तरफ भी बढ़ रहे हैं। टेक्नोलॉजी जब Masses के बीच में जाती है, तो उसके इस्तेमाल की संभावनाएं भी ज्यादा से ज्यादा बढ़ जाती हैं। आज हमारे किसान, हमारे स्टूडेंट, हमारे स्टार्ट अप्स, ड्रोन से क्या-क्या कर सकते हैं, इसकी नई-नई संभावनाओं को तलाशने लगे हुए हैं। ड्रोन अब किसानों के पास जा रहा है, गांवों में जा रहा है तो भविष्य में विभिन्न कार्यों में ज्यादा इस्तेमाल की संभावना भी बढ़ी है। आप देखिएगा अब शहरों में ही नहीं गांव-देहात में भी ड्रोन के तरह-तरह के उपयोग निकलेंगे, हमारे देशवासी इसमें और इनोवेशन करेंगे। मुझे विश्वास है, आने वाले दिनों में ड्रोन टेक्नोलॉजी में और Experiment होंगे, इसके नए-नए इस्तेमाल होंगे।

साथियों,

भारत की ऐसी ही संभावनाओं, ऐसी ही scale को tap करने के लिए आज मैं देश और दुनिया के सभी investors को फिर आमंत्रित करता हूं। ये भारत के लिए भी और दुनिया के लिए यहां से बेहतरीन ड्रोन टेक्नोलॉजी के निर्माण का सही समय है। मैं एक्सपर्ट्स से, टेक्नोलॉजी की दुनिया के लोगों से भी अपील करूंगा कि ड्रोन टेक्नोलॉजी का ज्यादा से ज्यादा विस्तार करें, उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक लेकर जाएं। मैं देश के सभी युवाओं से भी आह्वान करुंगा कि ड्रोन के क्षेत्र में नए स्टार्ट अप्स के लिए आगे आएं। हम मिलकर ड्रोन टेक से सामान्य जन को empower करने में अपनी भूमिका निभाएंगे, और मुझे विश्वास है अब मैं पुलिस के काम में भी सुरक्षा की दृष्टि से ड्रोन बहुत बड़ी सेवा कर पाएगा। बड़े-बड़े जैसे कुंभ मेले जैसे अवसर होते हैं। बहुत बड़ी मात्रा में ड्रोन से मदद मिल सकती है। कहीं ट्रैफिक जाम की समस्याएं हैं, ड्रोन से सोल्यूशन निकाले जा सकते हैं। यानि इतनी आसानी से इन चीजों को उपयोग होने वाला है। हमें इन टेक्नोलॉजी के साथ अपनी व्यवस्थाओं को जोड़ना है, और जितना इन व्यवस्थाओं को साथ जुड़ेंगे। मुझे बराबर याद है, मैं आज यहां देख रहा था कि वो ड्रोन से जंगलों में पेड़ उगाने के लिए जो seeds हैं, उसकी गोली बनाकर के ऊपर से ड्रॉप करते हैं। जब ड्रोन नहीं था, तो मैंने एक प्रयोग किया था। मेरे तो सारे देसी प्रयोग होते हैं। तो उस समय तो टेक्नोलॉजी नहीं थी। मैं चाहता था, जब मैं गुजरात में मुख्यमंत्री था, तो जो ये हमारे कुछ पहाड़ हैं लोग वहां जाएंगे, पेड़-पैधे लगाएंगे तो जरा मुश्किल काम है आशा करना। तो मैंने क्या किया, मैंने जो गैस के गुब्बारे होते हैं, जो हवा में उड़ते हैं। मैंने गैस के गुब्बारे वालों की मदद ली और मैंने कहा कि उस गुब्बारे में seeds डाल दीजिए और ये जो पहाड़ी हैं, वहां जाकर के गुब्बारे छोड़ दीजिए, गुब्बारे जब नीचे गिरेंगे तो seeds फैल जाएंगे और जब आसमान से बारिश आएगी, अपना नसीब होगा तो उसमें से पेड़ निकल आएगा। आज ड्रोन से वो काम बड़ी आसानी से हो रहा है। जियो ट्रेकिंग हो रहा है। वो बीज कहां पर गया, उसका जियो ट्रेकिंग हो रहा है और वो बीज वृक्ष में परिवर्तित हो रहा है कि नहीं हो रहा है। उसका हिसाब-किताब किया जा सकता है। यानि एक प्रकार से मानों forest fire हम आसानी से ड्रोन की मदद से उसे मॉनिटर कर सकते हैं, एक छोटी सी भी घटना नजर आती है तो हम तुरंत एक्शन ले सकते हैं। यानि कल्पना भर की चीजें हम उसके भी द्वारा कर सकते हैं, हमारी व्यवस्थाओं को विस्तार कर सकते हैं। मुझे विश्वास है कि आज ये ड्रोन महोत्सव जिज्ञासा की दृष्टि से तो अनेकों के काम आएगा ही आएगा, लेकिन जो भी इसको देखेंगे जरूर कुछ नया करने के लिए सोचेंगे, जरूर उसमें परिवर्तन लाने के लिए प्रयास करेंगे, व्यवस्थाओं में जोड़ने के लिए प्रयास करेंगे और ultimately हम technology driven delivery हम बहुत तेजी से कर पाएंगे। इस विश्वास के साथ मैं फिर से एक बार आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

बहुत-बहुत धन्यवाद।