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मंत्री परिषद के मेरे साथी श्री राधा मोहन सिंह जी, डाक्टर संजय जी, मंच पर विराजमान सभी महानुभाव, और कृषि और विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े हुए सभी तपस्वीजन.


हम standing ovation उन महानुभावों को दें, जिन्होने आज award भी प्राप्त किया है, और देश में इस प्रकार की गतिविधि से जुड़े हुए हैं.जिनका सम्मान करने का मुझे सौभाग्य मिला है.उन सबको मैं हृदय से अभिनंदन करता हूँ.

अयप्पन जी को मैं सुन रहा था, superfast train चल रही थी. इसी तेज गति से कृषि विकास भी होगा, ऐसा मुझे भरोसा है. जब उन्होने सबको standing ovation के लिए खड़ा किया तो ये कला मेरे ध्यान में आ गयी की लंबी देर तक सुनते समय नींद आ जाती है. तो बीच बीच में standing ovation अच्छा रहता है. लेकिन मैने standing ovation इसके लिए नहीं करवाया था - मैं हृदय से मानता हूँ की देश के कोटि-कोटि किसानों ने भारत के भाग्य को बदलने में बहुत बड़ा योगदान दिया है.

और इसी लिए वैज्ञानिक कितनी ही खोज क्यों न करें, लेकिन अगर उसपर भरोसा करके किसान अपना एक साल खपा नही देता हैं, दो साल खपा नही देता है, तो सिद्धि संभव नही होती है. कभी lab में, कभी छोटी-सी प्रायोगिक व्यवस्था में, सिद्धि प्राप्त करने में expert को सफलता मिल जाती है, लेकिन जब तक उसका सरलीकरण नहीं हो, जाता, सामान्य किसान को पल्ले पड़े, भाषा, परिभाषा और प्रयोगों से उसे जोड़ा नहीं जाता है, तब तक इसका व्याप्त बढ़ता नहीं है.

हमारे देश में कृषि ज़्यादातर पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में दी जाती है. और इसमें परंपराओं को बदलने का साहस बहुत कम लोग रखते हैं. जब तक उसको ये भरोसा ना हो, हाँ भाई, ‘this is the way, ये कुछ होगा, और इसके लिए भी दो, चार, पाँच साल तक सोचता रहता है, क्योंकि उसे मालूम है, कहीं मैं प्रयोग कर गया और मेरी जिंदगी अटक गयी तो क्या होगा, वो हिम्मत नहीं करता. और इसलिए भारत के विज्ञान जगत को, और ख़ास करके कृषि क्षेत्र में अनुसंधान करने वाले महानुभावों के सामने, सरकार के सामने, सामान्य किसान समुदाय के सामने, ये नितांत आवश्यक है के हम बदलते हुए युग में, बदलते हुए परिवेश में, climate change के माहौल में और वैज्ञानिकों के द्वारा किए गये संशोधनो के मध्यम से, progressive farmers के द्वारा किए गये प्रयोगों के मध्यम से ,बदलते हुए climatic zones …. Climatic zones ही बदल रहें हैं हमारे सारे …. … agro-climatic zones जो पहले बनाएँ होंगें आज शायद agro-climatic zones में काफ़ी बदलाव आ रहा है,… उन सारे पाश्र्वभूमि में, हमारा किसान भरोसा करके प्रयोग करने की हिम्मत करे, और इस दिशा में हम कैसे आगे बढ़ें ?

आज इस अनुसंधान केंद्र को 86 साल हो गये. मैं चाहूँगा की आप सब मिलकर के, इसका शताब्दी वर्ष कैसे मनाया जाए उसका planning आज ही करें. और institutional celebration planning नहीं, हम इस अनुसंधान के मध्यम से किसानों तक कैसे पहुचेगें, किन- किन विषयों में पहुँचेगें, किन किन बातों में हम कोई goal set करके acheive करेंगें. और सारी franternity ,all the universities, all the agricultural colleges, इस शताब्दी के साथ research के नये आयाम और उनके साथ सामान्य किसान को जोड़ने का प्रयास, इस दिशा में हम कुछ goal तय करके आनेवाले 14-15 साल जो भी हमें मिलते हैं, और एक century का mission goal बना करके, मैं समझता हूँ , शायद हम 86 साल में जितना कर पाए हैं उसे ज़्यादा 14 साल में कर सकतें हैं. क्योंकि अब ,86 साल पहले हमारी ताक़त थी, 86 साल में वो ताक़त सैंकड़ों गुणा ज़यादा है. विज्ञान ने भी भारी प्रगति की है, वैश्विक संबंधों का वातावरण भी, ज्ञान का आदान-प्रदान भी, बहुत तेज़ी से हुआ हैं, और इसलिए हम अगर ये goal ले कर चलें तो हम कुछ कर सकतें हैं.

हमारे देश के सामने, क्‍योंकि यह सारी जो हमारी मेहनत है, उसमें हमे दो चीज़ों को सिद्ध करना है – एक, हमारा किसान, देश और दुनिया का पेट भरने में सामर्थ्यवान हो, और दूसरा, हमारी कृषि, किसान का जेब भरने में सामर्थ्यवान हो. दुनिया का पेट तो भरे लेकिन किसान की अगर जेब नही भरेगी तो शायद हम जो चाहते हैं उन स्थितियों को प्राप्त नहीं कर सकते. हमारी दिशा, हमारी योजना, उस तरफ कैसे रहे?

हमारी ज़मीन तो बढ़ने वाली नहीं है, परिवार बढ़ते चले जा रहें हैं, माँग बढ़ती चली जा रही है. और इस समय हमें उन challenges को address करना पड़ेगा, और हमारा focus, soil fertility. हमारी soil में सदियों पहले, ज़मीन को सुधारने के प्रयोग होते थे, ऐसा नहीं है की आज ही हो रहे हैं. लेकिन समय के अभाव से आर्थिक दौड़ में किसान अब वो समय नहीं देता है. ज़मीन सुधार के लिए बीच में time देना चाहिए, कुछ प्रक्रियाएँ करनी चाहिए, उसको जानकारी है, लेकिन वो कर नही पता है. तब वैज्ञानिक intervention आवश्यक हो जाता है. उसकी परंपराएँ, पद्यतियाँ, scientific intervention, दोनो की जोड़ करके हम हमारी ज़मीन की fertility के संबंध में, कोई निश्चित goal के साथ कैसे आगे बढ़ सकतें हैं? क्योंकि हमारे सामने आवश्यक हैं - प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाए बिना हमारा कोई चारा ही नहीं हैं. उसी प्रकार से, जो फसल 45 दिन में होती है वो फसल 35 दिन में कैसे हो. वो कौन सी वैज्ञानिक पद्यतियाँ हों , किस प्रकार का time frame हो, और फिर भी quality erosion ना हो. जैसे मूँग में प्रयोग हुआ है, कुछ time तो बचा, लेकिन उसकी साइज़ बदल दी गयी है, साइज़ छोटी कर दी गयी है. और जब साइज़ छोटी होती है, तो मार्केट गिर जाता है, क्योंकि सामान्य मानव ने… मूँग की एक साइज़ set है उसके मन में ,एक छवि तैयार है … उसी में अगर आँखफेर हो गया तो? उसके मन में जो रहता है ठीक है .. उससे अगर थोड़ा इधर- उधर हो गया तो, उसके मन में रहता है अरे भाई शायद ये अच्छा नहीं होगा, और इसलिए quality erosion ना हो, उसके बावजूद भी productivity बढ़ाएँ और time reduce हो. इसपर हम कैसे काम कर सकतें हैं?

हम जानते हैं की विश्व के सामने पानी का संकट है, water-cycle, weather-cycle, दोनो के बीच में clash हो रहा है, contradiction खड़ी हो गयी है. अब हमारे सामने challenge है, इस weather-cycle के साथ, हमारे water-cycle का scientific management हमकैसे करें. हम नये-नये तरीके से उससे कैसे जोड़ें. चाहे rain harvesting हो, या जल संचय के नये-नये अभियान हों, और हम जन सामान्य को जल संचय के बारें में जितना जागरूक बनाएँगें, जितना भागीदार बनाएँगे, उतना ही फ़ायदा मिलेगा.

Global warming, environment के five star hotel में होने वाले seminar अपनी जगह है, उसका भी एक positive है, लेकिन आख़िर तो ये काम करने वाला सामान्य मानव है. उसके मन में ये भाव कैसे जगे और जब तक ये विश्वास पैदा नहीं होता, की ये पानी परमात्मा का दिया हुआ प्रसाद है. आज जब हम मंदिर में जातें हैं … प्रसाद का एक दाना नीचे ना गिर जाए, इतनी care करते हैं, बहुत सजग रहते हैं कि प्रसाद है, गिरना नहीं चाहिए. ये पानी भी परमात्मा का प्रसाद है, एक बूँद भी बर्बाद नहीं होनी चाहिए …. ये भाव सामान्य व्यक्ति तक कैसे पहुँचे. जब साबरमती नदी लबालब भारी रहती थी, पानी भरपूर बहता था, महात्मा गाँधी साबरमती आश्रम में रहते थे … 1930 का वो कालखंड था … 30 के पहले का कालखंड था, लेकिन कोई अगर, पानी का पूरा ग्लास देता था, तो बापू कहते थे, आधा पीना है, आधा ही ले आओ … आधा पानी वापस करो, पानी बर्बाद मत करो. सामने नदी थी लबालब पानी से भरी थी, लेकिन वो, एक घूँट भी पानी बर्बाद होने से उन्हें पीड़ा हो जाती. ये level of consciousness और ultimately , common man का ये level of consciousness जितना बढ़ता है, उतनी ही success की संभावनाएँ बढ़ती हैं. और इसलिए हम उस दिशा में कैसे आगे बढ़ें.

'per drop more crop', ये हमारा mission statement हो सकता हैI जैसे कम ज़मीन, कम समय, ज़यादा ऊपज …. ‘per drop more crop’ ….. किसान का पेट भी भरे, और किसान को जेब भी भरे. कम भूमि में ज़यादा ऊपज हो.

इसी के साथ हमारी animal husbandry, हमारे पास जितनी मात्रा में पशु हैं, उसकी तुलना में दूध बहुत कम है. दूध की माँग ज़यादा है …… requirement भी ज़यादा है. हमारे पशु ज़्यादा दूध उत्पादन करें, यह हमारे लिए एक सहज, सरल प्रक्रिया होनी चाहिए. ये एक सहज, सामान्य, व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहिए. ऐसा नहीं कि universities , labs, veterinary colleges ने काम नहीं किया है, लेकिन जब तक ये काम, जो पशु-पालक है, उस तक नहीं पहुँचता है, तब तक हमें परिणाम नहीं मिलता. सारे विश्व में ये जो बदलाव आया है, वो scientific intervention से आया है. technology upgradation, और technology के involvement से आया है. हम जब तक उस दिशा में नहीं जातें, हम देश और दुनिया की माँग की पूर्ति के लिए, असक्षम महसूस करेंगे. स्थिति ऐसी है, माँग बहुत बढ़ी है, और ये हमारे लिए तो opportunity है. उस opportunity को कैसे भरें?

हमारे सामने एक सबसे बड़ा challenge है, ‘lab- to- land’, जो lab में है वो land पर कैसे आए, जो universities में है, वो कृषक के पास कैसे पहुचे? जो श्रधा universities के lab में बैठकर एक scientist को है, वो श्रधा एक कृषक के मन मैं कैसे आए? और उसके लिए progressive farmers …. यही हमारी सबसे बड़ी agency होती है. progressive farmer, mentally risk लेने के लिए तैयार होता है … उसके DNA में होता है ये. वो चाहता है, चलो मैं करूँगा . लेकिन ये हमारा कोई संबंध है क्या?

Universities के पास और agricultural colleges के पास अपने इलाक़े के progressive farmers, उनकी expertise, 35 age group के अच्छे पढ़े लिखे farmers, इनका कोई data है क्या? जो पढ़े लिखे हैं, young हैं, progressive हैं, क्या agricultural universities अपने इलाक़े के दो सौ, चार सौ , गाँवों के ऐसे लोग को एक information-bank बना सकता है? एक talent-pool बना सकता है ….they are a real talent …. talent pool बना सकता है क्या? और उस talent-pool के लोगों को address करके, उनके मध्यम से dissemination कार्यक्रम बना सकतें हैं क्या?

हमारे agricultural colleges जो हैं, उस इकाई को एक nodal agency मान कर, कम से कम हम, हिन्दुस्तान के 500-600 districts में आराम से अपना network खड़ा कर सकतें हैं. हमारे तो अनुसंधान होते रहें हैं, हमारी universities हैं, हमारी colleges हैं, और students है, और फिर एक identity है …. उन सबकी एक chain बना करके एक व्यवस्था करी जाए, और एक timeframe पर काम कैसे हो? और एक सहज प्रक्रिया के रूप में कैसे हो?

जितने हमारे agricultural colleges हैं, उनका अपना कोई radio station हो सकता है? Agricultural colleges का radio station है. और मैं इसलिए कहता हूँ agricultural colleges का radio station …. क्योंकि किसान radio बहुत सुनता है.

agriculture college जहां है, उसको उस इलाके की कृषि का पता है। वहां कॉलेज के students को भी --- ज़्यादातर उसी परिवार के बच्चे हैं जो कृषि क्षेत्र से आते हैं। वो परम्परा से भी जानता है। agricultural radio - कॉलेज चलाये, आजकल रेडियो के लिए यह सुविधा है, permission मिलती है। इन-हाउस students को काम दिया जाए - research करो और रेडियो पर आ कर talk दो। एक सहज रूप से ऐसी प्रक्रिया बन सकती है। हमारे agricultural colleges रेडियो के माध्यम से लगातार किसानों को उसी इलाके के किसानों की समस्या - बारिश देर से आये तो क्या करना है, बारिश कम आयी तो क्या करना है, फलाने प्रकार का रोग नज़र आ रहा है तो क्या करना है ? आप देखिये। अरबों खरबों रुपयों के investment से बनी हुई मीडिया वर्ल्ड के सामने एक कॉलेज के बच्चोँ के द्वारा चलाया गया किसान के उपयोग का कार्यक्रम ज़्यादा ताक़तवर होगा, credible होगा, popular होगा.

हम इस बदलाव की दिशा में जाने को तैयार हैं क्या? अगर हम बदलाव की दिशा में जाने को तैयार हैं तो हम बहुत कुछ दे सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि हमारे students ने कोई research नहीं किया, creative काम नहीं किया है। क्या हम तय कर सकते हैं - within 4-5 years - सभी universities में अब तक agriculture में जितनी भी research हुई है, चाहे PhD हुआ हो या research paper लिखा गया हो - उन सब को digital करके compile कर सकतें हैं. पूरे हिन्दुस्तान में हमारे नौजवानो ने क्या research किया है , अगर मान लीजिए किसी ने गेहूँ पर research किया है, देश की 25 universities में 200 के करीब छात्रों ने पिछले 50 साल में research किया होगा, आज वो खजाना कहाँ पर है? क्या किसी ने इक्कठा करके दोबारा उसे देखा है, किसी university ने देखा है, की पिछले 50 साल में इस-इस प्रकार के research हुए. इन 50 साल के research को compile करके, पूरा एक digital platform तैयार हो सकता है. PhD कर ली नौकरी कर ली, retire भी हो गये, कहने के लिए हो गया कि बचपन में PhD कर ली थी.

देश को क्या मिला ? और उसका कारण है, हम चीज़ों को उसकी मलकियत बना देते हैं, जो राष्ट्र की धरोहर है. उस गौरव गान के साथ उसे जोड़ते नहीं हैं.

मैं वो चीज़ें बता रहा हूँ आपको , जिसके लिए कोई बहुत बड़ा बजट नहीं लगता है. बहुत बड़ा एकदम कोई सूर्य-चंद्र पर से विज्ञान उतारने की ज़रूरत नही पड़ती, सहज व्यवहार की बातें हैं. और आप देखिए, ये ताक़त इतनी बढ जाएगी… 

आज भी हमारे यहाँ pulses and oilseeds बहुत बड़े challenge हैं . Pulses का उत्पादन - जिसमें प्रोटीन content, ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति के लिए प्रोटीन का source ही , उस ग़रीब आदमी का भला करना है तो उसे वो pulses मिलें , प्रोटीन जिसमे ज़्यादा हो. ताकि उसकी जिंदगी में वो काम आए, हम उसको priority दे सकतें हैं. Oilseeds, भारत कृषि प्रधान देश है, और हमे तेल बाहर से मंगवाना पड़ता है. अगर लाल बहादुर शास्त्री कहें 'जय जवान, जय किसान', और हिन्दुस्तान का किसान खड़ा हो जाए, हिन्दुस्तान का पेट भरने के लिए सामर्थ्य पैदा कर दे, तो क्या हमारे हिन्दुस्तान के किसान के सामने ये challenge नही रख सकते कि हमें कुछ करना है ? खाने का तेल हम बाहर से नहीं लाएँगे. आइए हम सब मिलकर मेहनत करें. देश की आवश्यकतायें हैं, और ये उन आवश्यकतयों की पूर्ति के लिए उठाए गये कदम हैं. हम goal set कर सकतें हैं, goal achieve कर सकतें हैं क्या ? जब तक हम सामान्य मानव की और देश की आवश्यकतयों का अनुसंधान नहीं करते, design strategy workout नहीं करते, resource mobilise नहीं करते, और उसके अनुसार human resource को develop करने की कोशिश नहीं करते, हमें जो चाहिए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर सकतें. और इसलिए मैं आज ,जो इस प्रकार के प्रमुख लोग यहाँ बैठे हैं, "नही होता है" उसका analysis छोड़ कर, "कैसे हो" उसका analysis करना है. इसपर हम कैसे काम कर सकते हैं.

Blue revolution. भारत के तिरंगे झंडे में हम White revolution की बात करतें हैं, Green revolution की बात करतें हैं, लेकिन जो blue colour का अशोक चक्र है उसको भी देखने की ज़रूरत है. और वो blue revolution है हमारी सामुद्रिक संपत्ति. Fisheries, उसके क्षेत्र में development, बहुत बड़ा global market पड़ा हुआ है. हमारे fisherman की जिंदगी बदले. बहुत प्रकार की बातें हो रहीं हैं, fisheries में एक बहुत बड़ा क्षेत्र खुल गया है, अब मोती का खेती हो रही है. बहुत बड़ा काम हो रहा है, हमारी science faculty, हमारे मछुआरे, और हमारे समुद्र तट पर रहने वाले नागरिक, seaweed की खेती, scientific ढंग से कैसे हो, seaweed इन दिनों Pharmaceutical world के लिए सबसे बड़ा raw material input है, global market है seaweed का. पर हमारे समुद्र तट पर हम seaweed की खेती का उतना साहस नहीं कर पा रहे. और seaweed में भी इतनी variety है, और इतना potential है उसके अंदर ,seaweed मनुष्य के काम आए या ना आए, ऐसे ही crush करके उसका रस खेत में छींट दिया जाए तो खेती के लिए वो बहुत बड़ी दवाई, और fertilizer दोनो का काम कर देता है.

क्या कारण है की हिमालय हमारे पास हो और चीन के पास भी हिमालय का कुछ भाग हो, चीन Herbal medicine में बहुत आगे है, और हम medicinal plants के संबंध में धीरे धीरे चिंता के क्षेत्र में चले जाएँ. Medicinal plants के क्षेत्र में हमारी कोशिश क्या है, हम क्या नया दें सकतें हैं, हमारे medicinal plants का maximum utilisation कैसे हो. Pharmaceutical industry, Pharmaceutical department और Agriculture department and research institution, ये चार मिल करके, इस विषय में क्या कर सकतें हैं?

मैं समझता हूँ इतना सारा बड़ा, sky is the limit, इस प्रकार का क्षेत्र हमारे सामने खुला पड़ा है, अगर हम सब मिलकर इस नयी सोच के साथ इस दिशा में आगे बढ़ें, हम आनेवाले दिनो में ना सिर्फ़ भारत को बल्कि विश्व को बहुत कुछ दें सकतें हैं.

जिन महानुभावों ने इस काम में योगदान दिया है, उनका अभिनंदन करने का मुझे अवसर मिला. इसके लिए मैं उन्हे बहुत बहुत बधाई देता हूँ. मुझे आप सबके बीच आने का अवसर मिला, मेरा सौभाग्य है, मेरी बहुत बहुत सुभकामनायें हैं.

बहुत बहुत धन्यवाद.

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ଗୁଜରାଟର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ସହିତ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଭାବ ବିନିମୟ
August 03, 2021
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ପୂର୍ବରୁ ଶସ୍ତା ରାସନ ଯୋଜନାର ପରିସର ଓ ବଜେଟ ବଢି ବଢି ଚାଲି ଥିବାବେଳେ ତୁଳନାତ୍ମକ ଭାବେ କ୍ଷୁଧା ଓ ଅପପୁଷ୍ଟି ହାର ହ୍ରାସ ପାଉ ନଥିଲା : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବକଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାରେ ଏବେ ହିତାଧିକାରୀମାନେ ପୂର୍ବାପେକ୍ଷା ପ୍ରାୟ ଦୁଇଗୁଣ ରାସନ ପାଉଛନ୍ତି: ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ମହାମାରୀ ସମୟରେ ଦେଶର ୮୦କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକ ମାଗଣାରେ ରାସନ (ଖାଦ୍ୟ) ସାମ୍ରଗୀ ପାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ସରକାରଙ୍କୁ ଏଥିପାଇଁ ୨ଲକ୍ଷ କୋଟି ଟଙ୍କାରୁ ଅଧିକ ଖର୍ଚ୍ଚ କରିବାକୁ ପଡୁଛି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଦେଶରେ ଶତାବ୍ଦୀର ସର୍ବବୃହତ ମହାମାରୀ ସତ୍ତ୍ୱେ କୌଣସି ଲୋକ ଭୋକିଲା ନାହାନ୍ତି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗରିବଙ୍କ ସଶକ୍ତୀକରଣକୁ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଅଗ୍ରାଧିକାର ଦିଆଯାଉଛି: ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ଆମ ଖେଳାଳିମାନଙ୍କର ନୂଆ ବିଶ୍ୱାସ ନୂଆ ଭାରତର ନମୁନା ହୋଇଛି : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
୫୦କୋଟି ଡୋଜ ଟିକା ଦେଇ ଏକ ନୂଆ ମାଇଲଖୁଣ୍ଟ ସ୍ଥାପନ ଦିଗରେ ଦେଶ ଆଗେଇ ଚାଲିଛି : ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ଆଜାଦିର ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ପାଳନ ଅବସରରେ ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣପାଇଁ ଆସନ୍ତୁ ସମସ୍ତେ ପବିତ୍ର ଶପଥ ନେବା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ନମସ୍କାର! ଗୁଜରାଟର ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ବିଜୟ ରୂପାଣୀ ମହାଶୟ, ଉପ-ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ନିତୀନ ଭାଇ ପଟେଲ ମହାଶୟ, ସଂସଦରେ ମୋର ସାଥୀ ଏବଂ ଗୁଜରାଟ ଭାଜପା ଅଧ୍ୟକ୍ଷ ଶ୍ରୀମାନ ସି.ଆର ପଟେଲ ମହାଶୟ, ପିଏମ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ସମସ୍ତ ହିତାଧୀକାରୀ, ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ!

ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ଗୁଜରାଟ ବିକାଶ ଏବଂ ବିଶ୍ୱାସର ଯେଉଁ ଅନବରତ ଧାରା ଆରମ୍ଭ କଲା, ତାହା ରାଜ୍ୟକୁ ନୂତନ ଶୀଖରକୁ ନେଇ ଯାଉଛି । ଗୁଜରାଟ ସରକାର ଆମର ଭଉଣୀ, ଆମର କୃଷକ, ଆମର ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଜନାକୁ ସେବା ଭାବ ସହିତ ଏହି ମାଟିକୁ ନେଇ ଆସିଛନ୍ତି । ଆଜି ଗୁଜରାଟର ଲକ୍ଷ-ଲକ୍ଷ ପରିବାରଙ୍କୁ ପିଏମ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନା ମାଧ୍ୟମରେ ଏକ ସଙ୍ଗେ ମାଗଣ ରାସନ ବିତରଣ କରାଯାଉଛି । ଏହି ମାଗଣା ରାସନ ବୈଶ୍ୱିକ ମହାମାରୀର ଏହି ସମୟରେ ଗରିବଙ୍କର ଚିନ୍ତାକୁ କମ୍ କରୁଛି, ସେମାନଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ବଢ଼଼ାଉଛି। ଏହି ଯୋଜନା ଆଜିଠାରୁ ପ୍ରାରମ୍ଭ ହେଉନାହିଁ, ଯୋଜନା ବିଗତ ଏକ ବର୍ଷ ଧରି ପ୍ରାୟତଃ ଚାଲୁ ରହିଛି ଫଳରେ ଏହି ଦେଶର କୌଣସି ଗରିବ ଭୋକରେ ଶୋଇ ଯାଆନ୍ତୁ ନାହିଁ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଗରିବଙ୍କ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଏଥିପାଇଁ ବିଶ୍ୱାସ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଛି। ଏହି ବିଶ୍ୱାସ, ଏଥିପାଇଁ ଆସିଛି କାରଣ ସେମାନଙ୍କୁ ଲାଗୁଛି ଯେ ଆହ୍ୱାନ ହୁଏତ କେତେ ବଡ଼ ହେଉ ନା କାହିଁକି, ଦେଶ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି। କିଛି ସମୟ ପୂର୍ବରୁ ମୋତେ କିଛି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ସହିତ କଥାବାର୍ତା କରିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା, ସେହି ଚର୍ଚ୍ଚା ସମୟରେ ମୁଁ ଅନୁଭବ କଲି ଯେ ଏକ ନୂତନ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଭରି ହୋଇ ରହିଛି ।

ସାଥୀଗଣ,

ସ୍ୱାଧୀନତା ପରଠାରୁ ହିଁ ପ୍ରାୟତଃ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସରକାର ଗରିବଙ୍କୁ ଶସ୍ତା ଭୋଜନ ଦେବାର କଥା କହିଥିଲେ। ଶସ୍ତା ରାସନର ଯୋଜନାଗୁଡ଼ିକର ପରିସର ଏବଂ ବଜେଟ ବର୍ଷ ପରେ ବର୍ଷ ବଢ଼଼ି ଚାଲିଲା, କିନ୍ତୁ ତାହାର ଯେଉଁ ପ୍ରଭାବ ହେବା ଦରକାର ଥିଲା, ତାହା ସୀମିତ ହୋଇ ହିଁ ରହିଗଲା । ଦେଶର ଖାଦ୍ୟ ଭଣ୍ଡାର ବଢ଼଼ି ଚାଲିଲା, କିନ୍ତୁ ଖାଦ୍ୟାଭାବ ଏବଂ କୁପୋଷଣରେ ସେହି ଅନୁପାତରେ କୌଣସି ହ୍ରାସ ପାଇଲା ନାହିଁ। ଏହାର ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ କାରଣ ଥିଲା ଯେ ପ୍ରଭାବୀ ବିତରଣ ବ୍ୟବସ୍ଥା ନଥିବା ଆଉ ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ କିଛି ରୋଗ ମଧ୍ୟ ଆସିଗଲା, କିଛି ବାଟମାରଣା କରୁଥିବା କମ୍ପାନୀ ମଧ୍ୟ ଆସିଗଲେ, ସ୍ୱାର୍ଥବାଦୀ ତତ୍ୱ ମଧ୍ୟ ପ୍ରବେଶ କରିଗଲେ। ଏହି ସ୍ଥିତିକୁ ବଦଳାଇବା ପାଇଁ ବର୍ଷ 2014 ପରେ ନୂତନ ଭାବେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କରାଗଲା । ନୂତନ ଟେକ୍ନୋଲୋଜିକୁ ଏହି ପରିବର୍ତନର ମାଧ୍ୟମ କରାଗଲା। କୋଟି- କୋଟି ନକଲି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ବ୍ୟବସ୍ଥାରୁ ବାହାର କରାଗଲା। ରାସନ କାର୍ଡକୁ ଆଧାର ସହିତ ସଂଯୋଗ କରାଗଲା ଆଉ ସରକାରୀ ରାସନ ଦୋକାନରେ ଡିଜିଟାଲ ଟେକ୍ନୋଲୋଜିକୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରାଗଲା। ଆଜି ପରିଣାମ ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ରହିଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଶହେ ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ବିପତି କେବଳ ଭାରତ ଉପରେ ନୁହେଁ, ସମଗ୍ର ଦୁନିଆ ଉପରକୁ ଆସିଛି, ସମଗ୍ର ମାନବ ଜାତି ପାଇଁ ଆସିଛି । ଜୀବନ- ଜୀବିକା ଉପରକୁ ସଙ୍କଟ ଆସିଲା, କରୋନା ଲକଡାଉନର କଟକଣା ଯୋଗୁଁ କାମ ଧନ୍ଦା ସବୁକୁ ବନ୍ଦ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଲା। କିନ୍ତୁ ଦେଶ ନିଜର ନାଗରିକମାନଙ୍କୁ ଭୋକରେ ଶୋଇବାକୁ ଦେଇନାହିଁ। ଦୁର୍ଭାଗ୍ୟବଶତଃ ଦୁନିଆର ବହୁ ଦେଶର ଲୋକଙ୍କ ଉପରେ ଆଜି ସଂକ୍ରମଣ ସହିତ ମଧ୍ୟ ଖାଦ୍ୟାଭାବର ମଧ୍ୟ ଭୀଷଣ ସଙ୍କଟ ଆସିଯାଇଛି। କିନ୍ତୁ ଭାରତ ସଂକ୍ରମଣର ସଙ୍କେତ ମିଳିବାର ପ୍ରଥମ ଦିନରୁ ହିଁ, ଏହି ସଙ୍କଟକୁ ଚିହ୍ନିଲା ଆଉ ଏହା ଉପରେ କାର୍ଯ୍ୟ କଲା। ଏଥିପାଇଁ, ଆଜି ସମଗ୍ର ଦୁନିଆରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ପ୍ରଶଂସା ହେଉଛି । ବଡ଼- ବଡ଼ ବିଶେଷଜ୍ଞ ଏହି କଥାର ପ୍ରଶଂସା କରୁଛନ୍ତି ଯେ ଭାରତ ନିଜର 80 କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକଙ୍କୁ ଏହି ମହାମାରୀ ସମୟରେ ମାଗଣା ଶସ୍ୟ ଉପଲବ୍ଧ କରାଉଅଛି। ଏହା ଉପରେ 2 ଲକ୍ଷ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଟଙ୍କା ଏହି ଦେଶ ଖର୍ଚ୍ଚ କରୁଛି । ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ହେଉଛି ମାତ୍ର ଗୋଟିଏ ଯେ- ମୋ ଭାରତର କୌଣସି ଭାଇ ଭଉଣୀ, ମୋର କୌଣସି ଭାରତବାସୀ ଭୋକିଲା ନ ରୁହନ୍ତୁ । ଆଜି 2 ଟଙ୍କାରେ ଏକ କିଲୋ ଗହମ, 3 ଟଙ୍କାରେ ଏକ କିଲୋ ଚାଉଳର କୋଟା ପରେ ମଧ୍ୟ ଅତିରିକ୍ତ 5 କିଲୋ ଗହମ ଏବଂ ଚାଉଳ ମାଗଣାରେ ଦିଆଯାଉଛି । ଅର୍ଥାତ ଏହି ଯୋଜନାରେ ପୂର୍ବ ତୁଳନାରେ ରାସନକାର୍ଡ ଧାରୀଙ୍କୁ ପ୍ରାୟତଃ ଦୁଇଗୁଣା ମାତ୍ରାରେ ରାସନ ଉପଲବ୍ଧ କରାଯାଉଛି। ଏହି ଯୋଜନା ଦୀପାବଳୀ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାଲିବ, ଦୀପାବଳୀ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କୌଣସି ଗରିବଙ୍କୁ ପେଟ ଭରିବା ପାଇଁ ନିଜ ପକେଟରୁ ଟଙ୍କା କାଢ଼ିବାକୁ ପଡ଼ିବ ନାହିଁ। ଗୁଜରାଟରେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାୟତଃ ସାଢ଼େ 3 କୋଟି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ମାଗଣା ରାସନର ଲାଭ ଆଜି ମିଳୁଛି । ମୁଁ ଗୁଜରାଟ ସରକାରଙ୍କୁ ଏହି କଥା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଚାହିଁବି ଯେ, ସେ ଦେଶର ଅନ୍ୟ ଅଞ୍ଚଳରୁ ଏଠାକୁ କାମଧନ୍ଦା କରିବାକୁ ଆସିଥିବା ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଲେ। କରୋନା ଲକ୍ ଡାଉନ୍ କାରଣରୁ ପ୍ରଭାବିତ ହୋଇଥିବା ଲକ୍ଷ-ଲକ୍ଷ ଶ୍ରମିକଙ୍କୁ ଏହି ଯୋଜନାର ଲାଭ ମିଳିଛି। ଏଥିରେ ବହୁତ ଜଣ ସାଥୀ ଏଭଳି ଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କ ପାଖରେ ହୁଏତ ରାସନ କାର୍ଡ ହିଁ ନଥିଲା, କିମ୍ବା ତାଙ୍କର ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟର ରାସନ କାର୍ଡ ଥିଲା। ଗୁଜରାଟ ହେଉଛି ସେହି ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ ଯିଏ ସର୍ବପ୍ରଥମେ ଏକ ରାଷ୍ଟ୍ର, ଏକ ରାସନ୍ କାର୍ଡର ଯୋଜନାକୁ ଲାଗୁ କଲେ। ଏକ ରାଷ୍ଟ୍ର, ଏକ ରାସନ୍ କାର୍ଡର ଲାଭ ଗୁଜରାଟର ଲକ୍ଷ- ଲକ୍ଷ ଶ୍ରମିକ ସାଥୀମାନଙ୍କୁ ହୋଇଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଏକ ସମୟ ଥିଲା ଯେତେବେଳେ ଦେଶରେ ବିକାଶର କଥା କେବଳ ବଡ଼- ବଡ଼ ସହର ମଧ୍ୟରେ ସୀମିତ ହୋଇ ରହିଥିଲା । ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ, ବିକାଶର ଅର୍ଥ କେବଳ ମାତ୍ର ଏତିକି ଥିଲା ଯେ ବିଶେଷ- ବିଶେଷ ଅଞ୍ଚଳରେ ବଡ଼- ବଡ଼ ଫ୍ଲାଏ ଓଭର ତିଆରି କରିଦେବା, ସଡ଼କ ତିଆରି କରିଦେବା, ମେଟ୍ରୋ ହୋଇଯିବା! ଅର୍ଥାତ, ଗାଁ- ଗଣ୍ଡାରୁ ଦୂରରେ, ଆଉ ଆମ ଘର ବାହାରେ ଯେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଥିଲା, ଯାହାକି ସାଧାରଣ ନାଗରିକଙ୍କ ସହିତ ନେଣ- ଦେଣ ନଥିଲା, ତାହାକୁ ବିକାଶ ବୋଲି ମାନି ନିଆଗଲା । ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ଦେଶ ଏହି ଚିନ୍ତାଧାରାକୁ ବଦଳାଇଛି । ଆଜି ଦେଶ ଦୁଇଟି ଦିଗରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଦୁଇଟି ଧାରଣାରେ ଚାଲିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଦେଶକୁ ନୂତନ ଭିତିଭୂମିର ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି। ଭିତିଭୂମି ଉପରେ ମଧ୍ୟ ଲକ୍ଷ- ଲକ୍ଷ କୋଟି- କୋଟି ଟଙ୍କା ଖର୍ଚ୍ଚ କରାଯାଉଛି, ତାହାଦ୍ୱାରା ଲୋକମାନଙ୍କୁ ରୋଜଗାର ମଧ୍ୟ ମିଳି ପାରୁଛି, କିନ୍ତୁ ଏହା ସହିତ ହିଁ, ସାଧାରଣ ମାନବଙ୍କର ଗୁଣବତାକୁ ସୁଧାରିବା ପାଇଁ, ସହଜରେ ସହବସ୍ଥାନ ପାଇଁ ମାନଦଣ୍ଡ ମଧ୍ୟ ସ୍ଥାପିତ କରାଯାଉଛି। ଗରିବଙ୍କ ସଶକ୍ତୀକରଣ ପାଇଁ ଆଜି ସର୍ବାଧିକ ପ୍ରାଥମିକତା ଦିଆଯାଉଛି । ଯେତେବେଳେ 2 କୋଟି ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କୁ ଘର ଦିଆଯାଇଥାଏ ସେତେବେଳେ ଏହାର ଅର୍ଥ ଏହା ହୋଇଥାଏ ଯେ ସେମାନେ ଏବେ ଶୀତ, ଗରମ, ବର୍ଷା ଡରରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ବଞ୍ଚି ପାରିବେ, କେବଳ ଏତିକି ହିଁ ନୁହେଁ, ଯେତେବେଳେ ନିଜର ଘର ରହିଥାଏ ନା ତେବେ ଆତ୍ମସମ୍ମାନରେ ତାହାର ଜୀବନ ଭରି ଯାଇଥାଏ । ନୂତନ ସଂକଳ୍ପ ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇ ଯାଇଥାଏ ଆଉ ସେହି ସଂକଳ୍ପ ଗୁଡ଼ିକୁ ସାକାର କରିବା ପାଇଁ ଗରିବ ପରିବାର ସମେତ ମନପ୍ରାଣ ଦେଇ ଲାଗି ପଡ଼ନ୍ତି, ଦିନରାତି ପରିଶ୍ରମ କରନ୍ତି। ଯେତେବେଳେ 10 କୋଟି ପରିବାରଙ୍କୁ ଶୌଚ ପାଇଁ ଘର ବାହାରକୁ ଯିବାର ବାଧ୍ୟବାଧକତାରୁ ମୁକ୍ତି ମିଳିଥାଏ ତେବେ ତାହାର ଅର୍ଥ ଏହା ହୋଇଥାଏ ଯେ ତାଙ୍କ ଜୀବନସ୍ତର ଉନ୍ନତ ହୋଇଛି। ସେ ପୂର୍ବରୁ ଚିନ୍ତା କରୁଥିଲା ଯେ ସୁଖୀ ପରିବାରଗୁଡ଼ିକର ଘରେ ହିଁ ଶୌଚାଳୟ ରହିଥାଏ, ଶୌଚାଳୟ ସେହିମାନଙ୍କର ଘରେ ହିଁ ରହିଥାଏ। ଗରିବଙ୍କୁ, ବିଚରାମାନଙ୍କୁ ଅନ୍ଧାର କେବେ ହେବ ସେଥିପାଇଁ ଅପେକ୍ଷା କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ, ଖୋଲାସ୍ଥାନକୁ ଯିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ । କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ଗରିବଙ୍କୁ ଶୌଚାଳୟ ମିଳିଥାଏ ତେବେ ସିଏ ନିଜକୁ ନିଜେ ଧନୀ ଲୋକଙ୍କ ସହିତ ସମାନ ଭାବେ ନିଜକୁ ଦେଖିଥାଏ, ଏକ ନୂତନ ବିଶ୍ୱାସ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଥାଏ। ଏହିଭଳି ଭାବେ, ଯେତେବେଳେ ଦେଶର ଗରିବ ଜନ-ଧନ ଖାତା ମାଧ୍ୟମରେ ବ୍ୟାଙ୍କିଙ୍ଗ ବ୍ୟବସ୍ଥା ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଥାଏ, ମୋବାଇଲ ବ୍ୟାଙ୍କିଙ୍ଗ ମଧ୍ୟ ଗରିବଙ୍କ ହାତରେ ରହିଥାଏ ତେବେ ତାହାଙ୍କୁ ଶକ୍ତି ମିଳିଥାଏ, ତାହାଙ୍କୁ ନୂତନ ଅବସର ମିଳିଥାଏ। ଆମର ଏଠାରେ କୁହାଯାଏ –

ସାମର୍ଥ୍ୟ ମୂଳମ୍

ସୁଖମେବ ଲୋକେ!

ଅର୍ଥାତ, ଆମର ସାମର୍ଥ୍ୟର ଆଧାର ଆମ ଜୀବନର ସୁଖ ହିଁ ହୋଇଥାଏ। ଯେପରି ଆମେ ସୁଖ ପଛରେ ଦୌଡ଼ି ସୁଖ ହାସଲ କରି ପାରିବା ନାହିଁ ବରଂ ସେଥିପାଇଁ ଆମକୁ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ, କିଛି ହାସଲ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ। ସେପରି ହିଁ ସଶକ୍ତିକରଣ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ, ଶିକ୍ଷା, ସୁବିଧା ଏବଂ ଗରିମା ବଢ଼଼ିବା ଦ୍ୱାରା ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ କୋଟି- କୋଟି ଲୋକଙ୍କୁ ଆୟୂଷ୍ମାନ ଯୋଜନା ଯୋଗୁଁ ମାଗଣାରେ ଚିକିତ୍ସା ସୁବିଧା ମିଳେ, ସେତେବେଳେ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟରେ ସେମାନଙ୍କର ସଶକ୍ତୀକରଣ ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ଦୁର୍ବଳ ବର୍ଗର ଲୋକଙ୍କୁ ସଂରକ୍ଷଣର ସୁବିଧା ସୁନିଶ୍ଚିତ କରାଯାଇଥାଏ, ସେତେବେଳେ ଏହି ବର୍ଗଙ୍କୁ ଶିକ୍ଷାର ସଶକ୍ତୀକରଣ ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ସଡ଼କଗୁଡ଼ିକ ସହରରୁ ଗାଁଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ଯୋଡ଼ିଥାଏ, ଯେତେବେଳେ ଗରିବ ଲୋକଙ୍କୁ ମାଗଣା ଗ୍ୟାସ ସଂଯୋଗ, ମାଗଣା ବିଜୁଳି ସଂଯୋଗ ମିଳିଥାଏ ସେତେବେଳେ ଏହିସବୁ ସୁବିଧା ସେମାନଙ୍କର ସଶକ୍ତୀକରଣ କରିଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ଲୋକଙ୍କୁ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ, ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ସୁବିଧା ସବୁ ମିଳିଥାଏ ସେତେବେଳେ ସେ ନିଜର ଉନ୍ନତି ବିଷୟରେ, ଦେଶର ପ୍ରଗତି ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କରିଥାଆନ୍ତି। ଏହି ସ୍ୱପ୍ନ ସବୁକୁ ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ ଆଜି ଦେଶରେ ମୁଦ୍ରା ଯୋଜନା ରହିଛି, ସ୍ୱନିଧି ଯୋଜନା ରହିଛି। ଭାରତରେ ଏଭଳି ଅନେକ ଯୋଜନା ସବୁ ଗରିବଙ୍କୁ ସମ୍ମାନପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନର ମାର୍ଗ ଦେଉଛି, ସମ୍ମାନରୁ ସଶକ୍ତୀକରଣର ମାଧ୍ୟମ ହେଉଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଯେତେବେଳେ ସାଧାରଣ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କର ସ୍ୱପ୍ନକୁ ସୁଯୋଗ ମିଳିଥାଏ, ଯେତେବେଳେ ବ୍ୟବସ୍ଥା ସବୁ ନିଜେ ଘର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚିବାକୁ ଲାଗେ ସେତେବେଳେ କିଭଳି ଭାବେ ଜୀବନ ବଦଳିଯାଏ, ଏହାକୁ ଖୁବ ଭଲ ଭାବେ ଗୁଜରାଟ ବୁଝିଛି। କେବେ ଗୁଜରାଟର ଏକ ବଡ଼ ଅଞ୍ଚଳର ଲୋକମାନଙ୍କୁ, ମାଆ- ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ପାଣି ଭଳି ମୌଳିକ ଆବଶ୍ୟକତା ପାଇଁ କେତେ- କେତେ କିଲୋମିଟର ପାଦରେ ଚାଲି ଚାଲି  ଯିବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। ଆମର ସମସ୍ତ ମାଆ- ଭଉଣୀମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ଏହାର ସାକ୍ଷୀ। ଏହି ରାଜକୋଟକୁ ପାଣି ପାଇଁ ଟ୍ରେନ ପଠାଇବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। ରାଜକୋଟକୁ ପାଣି ପାଇଁ ଘର ବାହାରେ ଗାତ ଖୋଳି ତଳୁ ପାଇପରୁ ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ଗିନାରେ ଭରି ବାଲଟି ଭର୍ତି କରିବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଆଜି, ସର୍ଦ୍ଦାର ସରୋବର ସେତୁ ଦ୍ୱାରା, ସାଉନୀ ଯୋଜନା ଦ୍ୱାରା, କେନାଲର ନେଟୱର୍କ ଦ୍ୱାରା ସେହି କଚ୍ଛରେ ମଧ୍ୟ ମାଆ ନର୍ମଦାଙ୍କ ପାଣି ପହଞ୍ଚି ପାରୁଛି, ଯାହା କେହି କେବେ ଚିନ୍ତା ମଧ୍ୟ କରି ପାରୁ ନଥିଲେ ଆଉ ଆମର ଏଠାରେ ତ କୁହା ଯାଉଥିଲା ଯେ ମାଆ ନର୍ମଦାଙ୍କ ସ୍ମରଣ ମାତ୍ରକେ ପୂଣ୍ୟ ମିଳେ, ଆଜି ତ ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ଗୁଜରାଟର ଗାଁ- ଗାଁକୁ ଯାଉଛନ୍ତି, ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ପ୍ରତିଟି ଘରକୁ ଯାଉଛନ୍ତି, ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ଆପଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରକୁ ଆସି ଆପଣଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଉଛନ୍ତି। ଏହି ପ୍ରୟାସ ଗୁଡ଼ିକର ପରିଣାମ ହେଉଛି ଯେ ଆଜି ଗୁଜରାଟ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ପାଇପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ପାନୀୟ ଜଳ ଉପଲବ୍ଧ କରାଇବାର ଲକ୍ଷ୍ୟଠାରୁ ଏବେ ଆଉ ଅଧିକ ଦୂରରେ ନାହିଁ । ଏହି ଗତି, ସାଧାରଣ ଜନତାଙ୍କ ଜୀବନରେ ଏହି ପରିବର୍ତନ, ଏବେ ଧୀରେ- ଧୀରେ ସମଗ୍ର ଦେଶ ଅନୁଭବ କରୁଛି । ସ୍ୱାଧୀନତାର ଦଶକ- ଦଶକ ପରେ ମଧ୍ୟ ଦେଶରେ କେବଳ 3 କୋଟି ଗ୍ରାମୀଣ ପରିବାର ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ପାନୀୟ ଜଳ ସୁବିଧା ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ମିଳୁଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଆଜି ଜଳ ଜୀବନ ଅଭିଯାନ ମାଧ୍ୟମରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ କେବଳ ଦୁଇ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ, ଦୁଇ ବର୍ଷ ଭିତରେ ସାଢ଼େ 4 କୋଟିରୁ ଅଧିକ ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ୍ ପାଣି ସହିତ ସଂଯୋଗ କରାଯାଇ ସାରିଛି, ଆଉ ଏଥିପାଇଁ ମୋ ମାଆ- ଭଉଣୀମାନେ ମୋତେ ଭରପୂର ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଉଛନ୍ତି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଡବଲ ଇଂଜିନର ସରକାର ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଗୁଜରାଟ କ୍ରମାଗତ ଭାବେ ଲାଭ ଦେଖୁଛି। ଆଜି ସର୍ଦ୍ଦାର ସରୋବର ସେତୁ ଦ୍ୱାରା ବିକାଶର ନୂତନ ଧାରା ହିଁ ପ୍ରବାହିତ ହେଉ ନାହିଁ, ବରଂ ଷ୍ଟାଚ୍ୟୁ ଅଫ୍ ୟୁନିଟି ଭାବେ ବିଶ୍ୱର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଆକର୍ଷଣ ମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ ଆଜି ଗୁଜରାଟରେ ଅଛି । କଚ୍ଛରେ ସ୍ଥାପିତ ହେଉଥିବା ନବୀକରଣୀୟ ଶକ୍ତି ପାର୍କ, ଗୁଜରାଟକୁ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର ନବୀକରଣୀୟ ଶକ୍ତି ମାନଚିତ୍ରରେ ସ୍ଥାପିତ କରିବାକୁ ଯାଉଛି। ଗୁଜରାଟରେ ରେଳ ଏବଂ ବିମାନ ଯୋଗାଯୋଗର ଆଧୁନିକ ଏବଂ ଭବ୍ୟ ଭିତିଭୂମି ପ୍ରକଳ୍ପ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି। ଗୁଜରାଟର ଅହମ୍ମଦାବାଦ ଏବଂ ସୁରଟ ଭଳି ସହରଗୁଡ଼ିକରେ ମେଟ୍ରୋ ସଂଯୋଗର ସମ୍ପ୍ରସାରଣ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ହେଉଛି। ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ମେଡିକାଲ ଶିକ୍ଷାରେ ମଧ୍ୟ ଗୁଜରାଟରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ଗୁଜରାଟରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଥିବା ଉନ୍ନତ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ଭିତିଭୂମି 100 ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ମେଡିକାଲ ଜରୁରୀକାଳୀନ ପରିସ୍ଥିତିକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବାରେ ବଡ଼ ଭୂମିକା ତୁଲାଇଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୁଜରାଟ ସହିତ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ଏପରି ଅନେକ କାର୍ଯ୍ୟ ଅଛି, ଯେଉଁଥି ପାଇଁ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କର, ପ୍ରତ୍ୟେକ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ବୃଦ୍ଧି ପାଉଛି । ଆଉ ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ହିଁ ହେଉଛି ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଆହ୍ୱାନକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବା ପାଇଁ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସ୍ୱପ୍ନକୁ  ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ ହେଉଛି ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ ସୂତ୍ର । ଏବେ ଏହାର ତାଜା ଉଦାହରଣ ହେଉଛି ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ଆମ ଖେଳାଳୀମାନଙ୍କର ପ୍ରଦର୍ଶନ । ଚଳିତ ଥର ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ଭାଗନେବା ପାଇଁ ଭାରତର ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ ଖେଳାଳୀ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିଛନ୍ତି। ଏହା ସ୍ମରଣ ରଖିବାର କଥା ଯେ 100 ବର୍ଷରେ ଆସିଥିବା ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ବିପର୍ପ୍ୟୟ ସହିତ ମୁକାବିଲା କରି ଆମେ ଏହା କରି ପାରିଛେ । ଏପରି ଅନେକ ଖେଳ ଅଛି ଯେଉଁଥିରେ ଆମେ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିଛେ । କେବଳ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିନାହୁଁ ବରଂ କଡ଼ା ଟକ୍କର ମଧ୍ୟ ଦେଇଛୁ। ଆମ ଖେଳାଳୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଖେଳରେ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରୁଛନ୍ତି । ଚଳିତ ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ନୂତନ ଭାରତର ଦୃଢ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ପ୍ରତ୍ୟକ ଖେଳରେ ଦୃଷ୍ଟି ଗୋଚର ହେଉଛି । ଅଲିମ୍ପିକ୍ସ ଖେଳିବାକୁ ଯାଇଥିବା ଆମର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଖେଳାଳୀ, ନିଜଠାରୁ ଉନ୍ନତ ମାନ୍ୟତା ପ୍ରାପ୍ତ ଖେଳାଳୀମାନଙ୍କୁ, ସେମାନଙ୍କ ଦଳକୁ ଚାଲେଞ୍ଜ ଦେଉଛନ୍ତି । ଭାରତୀୟ ଖେଳାଳୀଙ୍କର ଉତ୍ସାହ, ଉଦ୍ଦିପନା ଏବଂ ହାସଲ କରିବାର ଲକ୍ଷ୍ୟ ଆଜି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ସ୍ତରରେ ରହିଛି । ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେତେବେଳେ ଆସିଥାଏ ଯେତେବେଳେ ଉପପୁକ୍ତ ପ୍ରତିଭାଙ୍କର ଚିହ୍ନଟ ହୋଇଥାଏ, ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହନ ମିଳିଥାଏ।        ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେତେବେଳେ ଆସିଥାଏ ଯେତେ ବେଳେ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଗୁଡିକ ବଦଳିଥାଏ, ପାରଦର୍ଶୀ ହୋଇଥାଏ । ଏହି ନୂତନ  ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ନ୍ୟୁ ଇଣ୍ଡିଆର ପରିଚୟ ପାଲଟିଛି । ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ଆଜି ଦେଶର କୋଣ-ଅନୁ-କୋଣରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ଛୋଟ-ଛୋଟ, ବଡ଼ ଗାଁ  ଜନବସତିରେ, ଗରିବ, ମଧ୍ୟମ ବର୍ଗର  ଯୁବ ଭାରତର ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଣରେ ଏହି ବିଶ୍ୱାସ ଆସୁଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସକୁ ଆମକୁ କରୋନା ସହିତ ଲଢେଇରେ ଏବଂ ଆମ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ ଜାରି ରଖିବାକୁ ହେବ । ବୈଶ୍ୱିକ ମହାମାରୀର ଏହି ବାତାବରଣରେ ଆମକୁ କ୍ରମାଗତ ଭାବେ ଆମର ସତର୍କତା ବଜାୟ ରଖିବାକୁ ହେବ। ଦେଶ ଆଜି 50 କୋଟି ଟିକାକରଣ ଦିଗକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି,  ଗୁଜରାଟ ମଧ୍ୟ ସାଢେ 3 କୋଟି ଡୋଜ ଟିକାର ସୋପାନ ପାଖରେ ପହଞ୍ଚୁଛି । ଆମକୁ ଟିକା ନେବାର ଅଛି, ମାସ୍କ ମଧ୍ୟ ପିନ୍ଧିବାର ଅଛି ଏବଂ ଯେତେ ସମ୍ଭବ ହେବ ଜନଗହଳି ବା ଭିଡ ଠାରୁ ଦୂରେଇ ରହିବାକୁ ହେବ । ଆମେ ବିଶ୍ୱରେ ଦେଖୁଛେ । ଯେଉଁଠାରେ ମଧ୍ୟ ମାସ୍କ ପିନ୍ଧିବା କଟକଣା ହଟାଇ ଦିଆଇଥିଲା, ସେଠାରେ ପୁଣି ମାସ୍କ ପିନ୍ଧିବାକୁ ଅନୁରୋଧ କରାଯାଉଛି। ସତର୍କତା ଏବଂ ସୁରକ୍ଷା ସହିତ ଆମକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାର ଅଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଯେତେବେଳେ ଆମେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନା ଉପରେ ଏତେ ବଡ଼ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ କରୁଛେ ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ଆଉ ଏକ ସଂକଳ୍ପ ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି ସଂକଳ୍ପ ହେଉଛି ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣ ପାଇଁ ନୂତନ ପ୍ରେରଣା ଜାଗ୍ରତ କରିବାର । ସ୍ୱାଧୀନତାର 75 ବର୍ଷରେ, ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତ ମହେତ୍ସବରେ, ଆମକୁ ଏହି ପବିତ୍ର ସଂକଳ୍ପ ନେବାର ଅଛି। ଏହି ସଂକଳ୍ପ ଗୁଡିକରେ, ଏହି ଅଭିଯାନରେ ଗରିବ-ଧନୀ, ମହିଳା-ପୁରୁଷ, ଦଳିତ-ବଞ୍ଚିତ ସମସ୍ତଙ୍କର ସମାନ ଭାବେ ଯୋଗଦାନ ରହିବ। ଗୁଜରାଟ ଆଗାମୀ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ନିଜର ସମସ୍ତ ସଂକଳ୍ପ ସିଦ୍ଧ କରୁ, ବିଶ୍ୱରେ ନିଜର ଗୌରବମୟ ପରିଚୟକୁ ଆହୁରି ସୁଦୃଢ କରୁ, ଏହି କାମନା ସହିତ ମୁଁ  ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା ଜଣାଉଛି । ପୁଣି ଥରେ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ସମସ୍ତ ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଶୁଭକାମନା!!! ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ!!!