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PM Narendra Modi launches three gold schemes
PM Narendra Modi launches first ever Indian gold coin
India has no reason to be described as a poor country; it has 20,000 tonnes of gold: PM Modi
Gold has been a source of women's empowerment in Indian society, says Prime Minister Modi
PM Narendra Modi highlights benefits of three gold schemes

उपस्थित सभी महानुभव।

हम बचपन से सुनते आए थे ‘सोने पे सुहागा’। लेकिन अब तक समझ नहीं था कि ‘सोने पर सुहागा’ होता क्‍या है। आज हमारे वित्‍त मंत्री जी ने हमें समझा दिया ‘सोने पर सुहागा’ क्‍या होता है। देश के लिए योजना सच्‍चे अर्थ में ‘सोने पे सुहागा’ इस भाव को चरित्रार्थ करती है। और हम ऐसे गरीब देश हैं जिसके पास 20 हजार टन सोना यूं ही पड़ा है। और शायद हमारी गरीबी का कारण भी यही है कि 20 हजार टन सोना पड़ा हुआ है। और इसलिए भारत को गरीब रहने का कोई कारण नहीं है, कोई कारण नहीं है। कोई logic नहीं समझा पा रहा कि हमें गरीब क्‍यों रहना चाहिए। अगर हम थोड़ी कोशिश करें, सही दिशा में कोशिश करें, तो हम.. हम पर जो Tag लगा है, उस Tag से मुक्ति पा सकते हैं। और उस रास्‍ते का एक महत्‍वपूर्ण, अहम कदम आज है कि ये Gold संबंधी भिन्‍न-भिन्न योजनाएं।

अब मैं बचपन से सुनता आया था लोगों से कि भई आधी रात को काम आता है। सोना रखो, आधी रात को काम आता है। कभी जरूरत पड़ जाए तो काम आ जाएगा; लेकिन मैंने सैकड़ों लोगों को पूछा कि भई कभी आपकी जिंदगी में ऐसी नौबत आई है क्‍या? मुझे अभी तक कोई मिला नहीं, जिसको आधी रात उसका उपयोग हुआ हो लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से उसके दिमाग में फिट है कि भई यह रखो कभी आधी रात काम आ जाएगा। और यह जो हमारे बने बनाए कुछ विचार ने घर कर लिया है, उसमें से समाज को बाहर लाना यह आसान काम नहीं है। आप समझा करके कितने ही पढ़े-लिखे व्‍यक्ति को कहोगे कि छोड़ों, आसान नहीं है। Even Reserve Bank के Governor को भी अपनी पत्‍नी कुछ मांगेगी तो Gold लाना ही पड़ेगा। जबकि उनका अर्थशास्‍त्र Gold के संबंध में अलग होगा, लेकिन गृहशास्‍त्र अलग होगा, तो यह जो अवस्‍था है उस अवस्‍था में कोई न कोई innovative, creative हमने व्‍यवस्‍थाएं विकसित करनी पड़ेगी। दूसरी एक सोच बनी हुई हैं हमारे देश में एक ऐसा Perception है दुनिया में कि भारत में महिलाओं के पास कुछ होता नहीं है। मकान है तो पति के नाम पर, पिता के नाम पर, गाड़ी है तो पति या बेटे के नाम पर, खेत है तो पिता के नाम महिलाओं के पास ? लेकिन बारीकी से देखेंगे तो सोना एक होता है जो महिला की ताकत का विषय होता है। यह ऐसे बनी हुई व्‍यवस्‍था नहीं है। कोई सिर्फ एक सामाजिक व्‍यवस्‍था का एक बहुत बड़ा ताकतवर हिस्‍सा रहा है, जो women empowerment बहुत बड़ा पहलू है। उसके नाम पर मकान नहीं होगा, लेकिन उसके पास यह संपत्ति उसके मालिक की होती है। और परिवार भी उसको question नहीं करता, बेटी भी question नहीं करती, यह तो मां का है। यह जो हमारा संस्‍कार का एक उत्‍तम पहलू भी है। जिसने women empowerment के लिए एक ऐसा सामाजिक जीवन में व्‍यवस्‍था विकसित की and with the help of gold यह हमारा structure विकसित हुआ है, तो उसको बरकरार भी रखना है। हमारी माताएं-बहनें उनके अंदर जो सुरक्षा का भाव है यह बरकरार रहना चाहिए। हम इस scheme में ये विश्‍वास अगर पहुंचाते हैं तो शायद इसकी सबसे ज्‍यादा सफलता का कारण महिलाएं बनेगी। दूसरा हमने देखा होगा हमारे यहां सम्‍पन्‍न परिवारों के family डॉक्‍टर होते हैं। even मध्‍यम वर्ग परिवार के भी family डॉक्‍टर होते हैं।लेकिन निम्‍म वर्ग, गरीब वर्ग परिवार के family डॉक्‍टर नहीं होते हैं। लेकिन हमारे देश में हर परिवार का family goldsmith होता है। कितना बड़ा विश्‍वास होता है। तीन-तीन, चार-चार पीढ़ी से वो सुनार, यानी वो अमेरिका में रहने गया होगा, लेकिन अपने गांव का सुनार है उसी को ढूंढेगा कि भई देखो जरा मैं यह भेजता हूं, कर देना। यह विश्‍वसनीयता एक बहुत बड़ी यानी सदियों की तपस्‍या से बनती है। उस ताकत को भी हमें पहचानना होगा। और इसलिए जब योजना के विषय में मेरे से चर्चा हो रही थी, तो श्रीमान दास को मैं कह रहा था कि जो गांव के छोटे-छोटे goldsmith हैं, वे हमारे एजेंड कैसे बन सकते हैं इस योजना के। एक समय ऐसा था 1968 goldsmith सरकार का सबसे बड़ा दुश्‍मन बना हुआ था। मैं गुजरात के पार्टन नामक शहर में बचपन में कुछ समय बिताया था। जिस गली में मैं रहता था वो सोने की गली थी। वहां एक सज्‍जन थे, उनका एक कार्यक्रम रहता था। सुबह अखबार आता था तो सिगरेट जलाते थे और अखबार में जहां भी मौराजी भाई का फोटो हो तो उसको जलाते थे। इतना गुस्‍सा, इतना गुस्‍सा वो करते थे, क्‍यों‍कि उनको लगता था कि भई हमारी तो सारी रोजी-रोटी चली गई। हम इस योजना के द्वारा ऐसी कैसे व्‍यवस्‍था विकसित करें ताकि उसको फिर एक एक बार empower करें। वो हमारा इस profession का एजेंट कैसे बने, क्‍योंकि उसका विश्‍वास है कि मैं किसी के लिए बुराई नहीं कर रहा हूं लेकिन बैंक से ज्‍यादा उसको अपने गांव के सुनार पर ज्‍यादा भरोसा है। वो बड़े से बड़े jewelry की showroom में जाएगा, लाने के बाद अपने सुनार के यहां जरा चैक कर ले भई। कितना ही बड़ा showroom होगा.. हमारे मेहुल भाई यहां बैठे हैं, लेकिन वो जाएगा। जाएगा अपने सुनार के पास जरा चैक तो करो, मैं ले तो आया हूं। ये एक हमारी इस व्‍यवस्‍था की एक बहुत बड़ी कड़ी बन सकती है। और यह स्‍ट्रक्‍चर already available है। हम उनको gold bond के लिए किस प्रकार से प्रेरित कर सकते है, उनको कैसे विश्‍वास दिला सकते हैं। हम एक decent line mechanism कैसे develop कर सकते हैं और मैं चाहूंगा कि Department के लोग इस पर सोचे, अगर यह हम कर पाएं तो शायद एकदम से यह बढ़ेगा। सरकार में कोई योजना बजट में आए और इतने कम समय में यह लागू हो जाए और Target तय किया है धनतेरस के पहले, क्‍योंकि भारत में शादी में सोने का जितना महत्‍व है, उससे ज्‍यादा धनतेरस को है। और सबसे ज्‍यादा import इन्‍हीं दिनों में हुआ होगा। क्‍योंकि लोगों को लगता होगा कि कोई बहुत बड़ा मार्केट खुलने वाला है तो हमको.. अब यह देखिए एक हजार टन सोना हर वर्ष हम import करते हैं और यह इतनी बड़ी शक्ति है हमारी अगर बिना उपयोग के पड़ी रहे किसी ने कोई बहुत बड़ा जलाशय बनाया हो dam बनाया हो, अरबों खरबों रुपये खर्च किये हो। लेकिन अगर canal network न हो और किसानों के पास पहुंचेगा नहीं तो क्‍या करना है उसको। यह हमारे 20 हजार टन सोने की यही हाल है जी। हमें इसको राष्‍ट्र की शक्ति में परिवर्तित करना है और सामाजिक सुरक्षा में अधिक बलवान बनाना है। इसके एक पहलू नहीं संभव है। यह सामाजिक सुरक्षा का जो पहलू है उसको हमें और Strengthen करना है। राष्‍ट्र की विकास यात्रा में वो एक बहुत बड़ा रोल प्‍ले कर सकते उस प्रकार का हमने विश्‍वास जताना है, mechanism बनाना है। आज एक चिंता तो लोगों को रहती है कि भई कहां रखें 15 दिन बाहर जाना है तो यह सब रखे कहां? रिश्‍तेदार के भी यहां रखें तो क्‍या रखें, कैसे उसको.. मन में चिंता रहती है। यह सुरक्षा का सबसे बड़ा Tension है वो इस योजना से मिट जाता है। उसको विश्‍वास बन जाता है कि यहां मेरा पैसा सुरक्षित है। कभी-कभार व्‍यक्ति Gold में इसलिए करता है कि रुपये के थैले कहां रखेंगे? इतनी छोटी जगह में Gold आ जाएगा तो इतने बड़े थैले वाला रुपये.. तो हम जानते है वो क्‍या होता है सब। लेकिन अगर आज वो उसके पास bond आ गया तो अपना चार कागज़ रख लें चोर भी आएगा तो वो हाथ नहीं लगाएगा। वो कहेगा यह कागज़ को क्‍या ले जाना, नहीं ले जाना भई, ये तो बेकार है। यानी सुरक्षा की guarantee है और यह वो बेच भी सकता है। सोना आधी रात को बिका हो, यह मुझे पता नहीं है। लेकिन मैं विश्‍वास से कहता हूं कि Gold Bond जरूरत पड़ने पर आधी रात को बेच सकते हैं, कहीं अस्‍पताल में जाना पड़ा ऑपरेशन करना पड़े, डॉक्‍टर कहता है पहले पैसे लाओ, Gold Bond दे दिया ऑपरेशन हो जाएगा। यह इतनी संभावनाएं तो सोने में नहीं है। यानी plus point है इसमें। हम इन चीजों को बड़ा articulate करके लोगों तक कैसे पहुंचाएं। उसी प्रकार से हमारा जो यह जमा जमाया ऐसे ही Gold पड़ा हुआ है। बैंक में आएगा और लम्‍बे समय के लिए आएगा तो वो jewellry के लिए चला जाएगा।

Jewellry के लिए चला जाएगा तो मैं मानता हूं jewellry क्षेत्र के लोगों को इस प्रकार से Gold सरलता से मिलेगा उनके सामने कोई question नहीं होंगे। एक jewellry के business वालों के लिए बैंक से direct requirement के अनुसार Gold मिल जाना locally ही मिल जाना यह अपने आप में हमारे jewellry के promotion के लिए बहुत सुविधा का कारण बनेगा और इसलिए जो jewellry की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं क्‍योंकि हम दुनिया के सबसे बड़े आज Gold consumer है। अभी मुझे कल कोई रिपोर्ट बता रहा था कि हमने चाइना को भी इसमें पीछे छोड़ दिया। शायद four-five hundred sixty two टन अब तक नौ महीने में शायद हमने Gold खरीदा है। और चाइना से five hundred forty eight पर खड़ा है। अगर इतना हम तेजी से कर रहे हैं, तो यह व्‍यवस्‍था हम बदलाव ला सकते हैं। monthly monitoring करके हम target तय कर सकते हैं कि इस month घरों का Gold बैंक में आएगा और उतनी मात्रा में बाहर से आना कम होगा। ये हम online monitoring व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते थे, तो शायद हम इस सारी नई व्‍यवस्‍था को एक सचमुच में राष्‍ट्रहित में, राष्‍ट्र के‍ विकास के काम में इसको हम जोड़ सकते हैं। इसके साथ एक राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान का विषय भी है। क्‍या कारण है कि हम अभी भी विदेशी मार्के से सोना.. और आज भी पूछते हैं कि अच्‍छा वो मार्क का है। मुझे तो नाम याद नहीं, क्‍योंकि मेरा कोई ऐसे लेना-देना है नहीं, लेकिन सुनते आए हैं। अब वो विश्‍वास से कहेगा कि भई अशोक चक्र है क्‍या। मेरे देश को इस पर भरोसा है क्‍या। यह हमने brand popular करना चाहिए। अब हमने तय करना चाहिए कि हम अब विदेशी मार्क वाला बाजार में हम खुद ही नहीं देंगे। हम jewelry में होंगे, हम Gold बैचने वाले लोग होंगे, हम नहीं करेंगे। यह ठीक है कि अभी इस धनतेरस तो शायद सौ सवा सौ सेंटर पर ही मिलेगा शायद लेकिन वो धीरे-धीरे बढ़ेगा। तो जिन लोगों को धनतेरस पर सोना खरीदना है उनको कुछ जगह पर तो मिल ही जाएगा लेकिन आगे चल करके होगा, लेकिन एक राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान से जुड़ना चाहिए और हमें इसको बल देना चाहिए। और इतने कम समय में वित्‍त मंत्री और उनकी पूरी टीम ने पूरी scheme को workout किया, उसको launch किया। Technology भी इसमें है और manufacturing भी है। सारी व्‍यवस्‍थाएं नये सिरे से करनी पड़ी है। लेकिन सारी व्‍यवस्‍थाएं की और मैं जब इस coin को देखा शायद मैंने अपने रुपये वगैरह पर जो गांधी जी देखें हैं इसमें बहुत बढि़या उनका चित्र निकला है गांधी जी का, यानी जिसने भी इसका artwork किया है उसको मैं बधाई देता हूं। इतना यानी feeling आता है। आप देखेंगे तो ध्‍यान में आएगा। बहुत ही अच्‍छा artwork किया है यानी इसके लिए.. मेरा स्‍वभाव है, इन चीजों में मेरी रूचि होने के कारण मैं थोड़ा अलग प्रकार से देखता रहता हूं। लेकिन मैं बधाई देता हूं पूरी टीम को, अरूण जी को विशेष बधाई देता हूं। और देशवासियों को शुभकामनाएं देता हूं कि धनतेरस के इस पावन पर्व से और दिवाली के शुभकामनाओं के साथ भारत स्‍वर्णिम युग के लिए आगे बढ़े और आपका 20 हजार टन सोना भारत के स्‍वर्णिम युग की ओर जाने के लिए काफी है। ऐसा मेरा विश्‍वास है आइये भारत को स्‍वर्णिम युग बनाने के लिए जिनके पास सोना है, वो इस सुनहरे अवसर को न छोड़े और सोने पर सुहागा उसको फायदा वो भी उठाए। यही मेरी अपेक्षाएं और शुभकामनाएं हैं।

धन्‍यवाद।

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ଗୁଜରାଟର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ସହିତ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଭାବ ବିନିମୟ
August 03, 2021
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ପୂର୍ବରୁ ଶସ୍ତା ରାସନ ଯୋଜନାର ପରିସର ଓ ବଜେଟ ବଢି ବଢି ଚାଲି ଥିବାବେଳେ ତୁଳନାତ୍ମକ ଭାବେ କ୍ଷୁଧା ଓ ଅପପୁଷ୍ଟି ହାର ହ୍ରାସ ପାଉ ନଥିଲା : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବକଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାରେ ଏବେ ହିତାଧିକାରୀମାନେ ପୂର୍ବାପେକ୍ଷା ପ୍ରାୟ ଦୁଇଗୁଣ ରାସନ ପାଉଛନ୍ତି: ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ମହାମାରୀ ସମୟରେ ଦେଶର ୮୦କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକ ମାଗଣାରେ ରାସନ (ଖାଦ୍ୟ) ସାମ୍ରଗୀ ପାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ସରକାରଙ୍କୁ ଏଥିପାଇଁ ୨ଲକ୍ଷ କୋଟି ଟଙ୍କାରୁ ଅଧିକ ଖର୍ଚ୍ଚ କରିବାକୁ ପଡୁଛି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଦେଶରେ ଶତାବ୍ଦୀର ସର୍ବବୃହତ ମହାମାରୀ ସତ୍ତ୍ୱେ କୌଣସି ଲୋକ ଭୋକିଲା ନାହାନ୍ତି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗରିବଙ୍କ ସଶକ୍ତୀକରଣକୁ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଅଗ୍ରାଧିକାର ଦିଆଯାଉଛି: ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ଆମ ଖେଳାଳିମାନଙ୍କର ନୂଆ ବିଶ୍ୱାସ ନୂଆ ଭାରତର ନମୁନା ହୋଇଛି : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
୫୦କୋଟି ଡୋଜ ଟିକା ଦେଇ ଏକ ନୂଆ ମାଇଲଖୁଣ୍ଟ ସ୍ଥାପନ ଦିଗରେ ଦେଶ ଆଗେଇ ଚାଲିଛି : ଶ୍ରୀ ମୋଦୀ
ଆଜାଦିର ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ପାଳନ ଅବସରରେ ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣପାଇଁ ଆସନ୍ତୁ ସମସ୍ତେ ପବିତ୍ର ଶପଥ ନେବା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ନମସ୍କାର! ଗୁଜରାଟର ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ବିଜୟ ରୂପାଣୀ ମହାଶୟ, ଉପ-ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ନିତୀନ ଭାଇ ପଟେଲ ମହାଶୟ, ସଂସଦରେ ମୋର ସାଥୀ ଏବଂ ଗୁଜରାଟ ଭାଜପା ଅଧ୍ୟକ୍ଷ ଶ୍ରୀମାନ ସି.ଆର ପଟେଲ ମହାଶୟ, ପିଏମ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ସମସ୍ତ ହିତାଧୀକାରୀ, ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ!

ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ଗୁଜରାଟ ବିକାଶ ଏବଂ ବିଶ୍ୱାସର ଯେଉଁ ଅନବରତ ଧାରା ଆରମ୍ଭ କଲା, ତାହା ରାଜ୍ୟକୁ ନୂତନ ଶୀଖରକୁ ନେଇ ଯାଉଛି । ଗୁଜରାଟ ସରକାର ଆମର ଭଉଣୀ, ଆମର କୃଷକ, ଆମର ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଜନାକୁ ସେବା ଭାବ ସହିତ ଏହି ମାଟିକୁ ନେଇ ଆସିଛନ୍ତି । ଆଜି ଗୁଜରାଟର ଲକ୍ଷ-ଲକ୍ଷ ପରିବାରଙ୍କୁ ପିଏମ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନା ମାଧ୍ୟମରେ ଏକ ସଙ୍ଗେ ମାଗଣ ରାସନ ବିତରଣ କରାଯାଉଛି । ଏହି ମାଗଣା ରାସନ ବୈଶ୍ୱିକ ମହାମାରୀର ଏହି ସମୟରେ ଗରିବଙ୍କର ଚିନ୍ତାକୁ କମ୍ କରୁଛି, ସେମାନଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ବଢ଼଼ାଉଛି। ଏହି ଯୋଜନା ଆଜିଠାରୁ ପ୍ରାରମ୍ଭ ହେଉନାହିଁ, ଯୋଜନା ବିଗତ ଏକ ବର୍ଷ ଧରି ପ୍ରାୟତଃ ଚାଲୁ ରହିଛି ଫଳରେ ଏହି ଦେଶର କୌଣସି ଗରିବ ଭୋକରେ ଶୋଇ ଯାଆନ୍ତୁ ନାହିଁ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଗରିବଙ୍କ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଏଥିପାଇଁ ବିଶ୍ୱାସ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଛି। ଏହି ବିଶ୍ୱାସ, ଏଥିପାଇଁ ଆସିଛି କାରଣ ସେମାନଙ୍କୁ ଲାଗୁଛି ଯେ ଆହ୍ୱାନ ହୁଏତ କେତେ ବଡ଼ ହେଉ ନା କାହିଁକି, ଦେଶ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି। କିଛି ସମୟ ପୂର୍ବରୁ ମୋତେ କିଛି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ସହିତ କଥାବାର୍ତା କରିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା, ସେହି ଚର୍ଚ୍ଚା ସମୟରେ ମୁଁ ଅନୁଭବ କଲି ଯେ ଏକ ନୂତନ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଭରି ହୋଇ ରହିଛି ।

ସାଥୀଗଣ,

ସ୍ୱାଧୀନତା ପରଠାରୁ ହିଁ ପ୍ରାୟତଃ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସରକାର ଗରିବଙ୍କୁ ଶସ୍ତା ଭୋଜନ ଦେବାର କଥା କହିଥିଲେ। ଶସ୍ତା ରାସନର ଯୋଜନାଗୁଡ଼ିକର ପରିସର ଏବଂ ବଜେଟ ବର୍ଷ ପରେ ବର୍ଷ ବଢ଼଼ି ଚାଲିଲା, କିନ୍ତୁ ତାହାର ଯେଉଁ ପ୍ରଭାବ ହେବା ଦରକାର ଥିଲା, ତାହା ସୀମିତ ହୋଇ ହିଁ ରହିଗଲା । ଦେଶର ଖାଦ୍ୟ ଭଣ୍ଡାର ବଢ଼଼ି ଚାଲିଲା, କିନ୍ତୁ ଖାଦ୍ୟାଭାବ ଏବଂ କୁପୋଷଣରେ ସେହି ଅନୁପାତରେ କୌଣସି ହ୍ରାସ ପାଇଲା ନାହିଁ। ଏହାର ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ କାରଣ ଥିଲା ଯେ ପ୍ରଭାବୀ ବିତରଣ ବ୍ୟବସ୍ଥା ନଥିବା ଆଉ ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ କିଛି ରୋଗ ମଧ୍ୟ ଆସିଗଲା, କିଛି ବାଟମାରଣା କରୁଥିବା କମ୍ପାନୀ ମଧ୍ୟ ଆସିଗଲେ, ସ୍ୱାର୍ଥବାଦୀ ତତ୍ୱ ମଧ୍ୟ ପ୍ରବେଶ କରିଗଲେ। ଏହି ସ୍ଥିତିକୁ ବଦଳାଇବା ପାଇଁ ବର୍ଷ 2014 ପରେ ନୂତନ ଭାବେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କରାଗଲା । ନୂତନ ଟେକ୍ନୋଲୋଜିକୁ ଏହି ପରିବର୍ତନର ମାଧ୍ୟମ କରାଗଲା। କୋଟି- କୋଟି ନକଲି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ବ୍ୟବସ୍ଥାରୁ ବାହାର କରାଗଲା। ରାସନ କାର୍ଡକୁ ଆଧାର ସହିତ ସଂଯୋଗ କରାଗଲା ଆଉ ସରକାରୀ ରାସନ ଦୋକାନରେ ଡିଜିଟାଲ ଟେକ୍ନୋଲୋଜିକୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରାଗଲା। ଆଜି ପରିଣାମ ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ରହିଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଶହେ ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ବିପତି କେବଳ ଭାରତ ଉପରେ ନୁହେଁ, ସମଗ୍ର ଦୁନିଆ ଉପରକୁ ଆସିଛି, ସମଗ୍ର ମାନବ ଜାତି ପାଇଁ ଆସିଛି । ଜୀବନ- ଜୀବିକା ଉପରକୁ ସଙ୍କଟ ଆସିଲା, କରୋନା ଲକଡାଉନର କଟକଣା ଯୋଗୁଁ କାମ ଧନ୍ଦା ସବୁକୁ ବନ୍ଦ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଲା। କିନ୍ତୁ ଦେଶ ନିଜର ନାଗରିକମାନଙ୍କୁ ଭୋକରେ ଶୋଇବାକୁ ଦେଇନାହିଁ। ଦୁର୍ଭାଗ୍ୟବଶତଃ ଦୁନିଆର ବହୁ ଦେଶର ଲୋକଙ୍କ ଉପରେ ଆଜି ସଂକ୍ରମଣ ସହିତ ମଧ୍ୟ ଖାଦ୍ୟାଭାବର ମଧ୍ୟ ଭୀଷଣ ସଙ୍କଟ ଆସିଯାଇଛି। କିନ୍ତୁ ଭାରତ ସଂକ୍ରମଣର ସଙ୍କେତ ମିଳିବାର ପ୍ରଥମ ଦିନରୁ ହିଁ, ଏହି ସଙ୍କଟକୁ ଚିହ୍ନିଲା ଆଉ ଏହା ଉପରେ କାର୍ଯ୍ୟ କଲା। ଏଥିପାଇଁ, ଆଜି ସମଗ୍ର ଦୁନିଆରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ପ୍ରଶଂସା ହେଉଛି । ବଡ଼- ବଡ଼ ବିଶେଷଜ୍ଞ ଏହି କଥାର ପ୍ରଶଂସା କରୁଛନ୍ତି ଯେ ଭାରତ ନିଜର 80 କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକଙ୍କୁ ଏହି ମହାମାରୀ ସମୟରେ ମାଗଣା ଶସ୍ୟ ଉପଲବ୍ଧ କରାଉଅଛି। ଏହା ଉପରେ 2 ଲକ୍ଷ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଟଙ୍କା ଏହି ଦେଶ ଖର୍ଚ୍ଚ କରୁଛି । ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ହେଉଛି ମାତ୍ର ଗୋଟିଏ ଯେ- ମୋ ଭାରତର କୌଣସି ଭାଇ ଭଉଣୀ, ମୋର କୌଣସି ଭାରତବାସୀ ଭୋକିଲା ନ ରୁହନ୍ତୁ । ଆଜି 2 ଟଙ୍କାରେ ଏକ କିଲୋ ଗହମ, 3 ଟଙ୍କାରେ ଏକ କିଲୋ ଚାଉଳର କୋଟା ପରେ ମଧ୍ୟ ଅତିରିକ୍ତ 5 କିଲୋ ଗହମ ଏବଂ ଚାଉଳ ମାଗଣାରେ ଦିଆଯାଉଛି । ଅର୍ଥାତ ଏହି ଯୋଜନାରେ ପୂର୍ବ ତୁଳନାରେ ରାସନକାର୍ଡ ଧାରୀଙ୍କୁ ପ୍ରାୟତଃ ଦୁଇଗୁଣା ମାତ୍ରାରେ ରାସନ ଉପଲବ୍ଧ କରାଯାଉଛି। ଏହି ଯୋଜନା ଦୀପାବଳୀ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାଲିବ, ଦୀପାବଳୀ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କୌଣସି ଗରିବଙ୍କୁ ପେଟ ଭରିବା ପାଇଁ ନିଜ ପକେଟରୁ ଟଙ୍କା କାଢ଼ିବାକୁ ପଡ଼ିବ ନାହିଁ। ଗୁଜରାଟରେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାୟତଃ ସାଢ଼େ 3 କୋଟି ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ମାଗଣା ରାସନର ଲାଭ ଆଜି ମିଳୁଛି । ମୁଁ ଗୁଜରାଟ ସରକାରଙ୍କୁ ଏହି କଥା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଚାହିଁବି ଯେ, ସେ ଦେଶର ଅନ୍ୟ ଅଞ୍ଚଳରୁ ଏଠାକୁ କାମଧନ୍ଦା କରିବାକୁ ଆସିଥିବା ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଲେ। କରୋନା ଲକ୍ ଡାଉନ୍ କାରଣରୁ ପ୍ରଭାବିତ ହୋଇଥିବା ଲକ୍ଷ-ଲକ୍ଷ ଶ୍ରମିକଙ୍କୁ ଏହି ଯୋଜନାର ଲାଭ ମିଳିଛି। ଏଥିରେ ବହୁତ ଜଣ ସାଥୀ ଏଭଳି ଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କ ପାଖରେ ହୁଏତ ରାସନ କାର୍ଡ ହିଁ ନଥିଲା, କିମ୍ବା ତାଙ୍କର ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟର ରାସନ କାର୍ଡ ଥିଲା। ଗୁଜରାଟ ହେଉଛି ସେହି ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ ଯିଏ ସର୍ବପ୍ରଥମେ ଏକ ରାଷ୍ଟ୍ର, ଏକ ରାସନ୍ କାର୍ଡର ଯୋଜନାକୁ ଲାଗୁ କଲେ। ଏକ ରାଷ୍ଟ୍ର, ଏକ ରାସନ୍ କାର୍ଡର ଲାଭ ଗୁଜରାଟର ଲକ୍ଷ- ଲକ୍ଷ ଶ୍ରମିକ ସାଥୀମାନଙ୍କୁ ହୋଇଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଏକ ସମୟ ଥିଲା ଯେତେବେଳେ ଦେଶରେ ବିକାଶର କଥା କେବଳ ବଡ଼- ବଡ଼ ସହର ମଧ୍ୟରେ ସୀମିତ ହୋଇ ରହିଥିଲା । ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ, ବିକାଶର ଅର୍ଥ କେବଳ ମାତ୍ର ଏତିକି ଥିଲା ଯେ ବିଶେଷ- ବିଶେଷ ଅଞ୍ଚଳରେ ବଡ଼- ବଡ଼ ଫ୍ଲାଏ ଓଭର ତିଆରି କରିଦେବା, ସଡ଼କ ତିଆରି କରିଦେବା, ମେଟ୍ରୋ ହୋଇଯିବା! ଅର୍ଥାତ, ଗାଁ- ଗଣ୍ଡାରୁ ଦୂରରେ, ଆଉ ଆମ ଘର ବାହାରେ ଯେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଥିଲା, ଯାହାକି ସାଧାରଣ ନାଗରିକଙ୍କ ସହିତ ନେଣ- ଦେଣ ନଥିଲା, ତାହାକୁ ବିକାଶ ବୋଲି ମାନି ନିଆଗଲା । ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ଦେଶ ଏହି ଚିନ୍ତାଧାରାକୁ ବଦଳାଇଛି । ଆଜି ଦେଶ ଦୁଇଟି ଦିଗରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଦୁଇଟି ଧାରଣାରେ ଚାଲିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଦେଶକୁ ନୂତନ ଭିତିଭୂମିର ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକତା ରହିଛି। ଭିତିଭୂମି ଉପରେ ମଧ୍ୟ ଲକ୍ଷ- ଲକ୍ଷ କୋଟି- କୋଟି ଟଙ୍କା ଖର୍ଚ୍ଚ କରାଯାଉଛି, ତାହାଦ୍ୱାରା ଲୋକମାନଙ୍କୁ ରୋଜଗାର ମଧ୍ୟ ମିଳି ପାରୁଛି, କିନ୍ତୁ ଏହା ସହିତ ହିଁ, ସାଧାରଣ ମାନବଙ୍କର ଗୁଣବତାକୁ ସୁଧାରିବା ପାଇଁ, ସହଜରେ ସହବସ୍ଥାନ ପାଇଁ ମାନଦଣ୍ଡ ମଧ୍ୟ ସ୍ଥାପିତ କରାଯାଉଛି। ଗରିବଙ୍କ ସଶକ୍ତୀକରଣ ପାଇଁ ଆଜି ସର୍ବାଧିକ ପ୍ରାଥମିକତା ଦିଆଯାଉଛି । ଯେତେବେଳେ 2 କୋଟି ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କୁ ଘର ଦିଆଯାଇଥାଏ ସେତେବେଳେ ଏହାର ଅର୍ଥ ଏହା ହୋଇଥାଏ ଯେ ସେମାନେ ଏବେ ଶୀତ, ଗରମ, ବର୍ଷା ଡରରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ବଞ୍ଚି ପାରିବେ, କେବଳ ଏତିକି ହିଁ ନୁହେଁ, ଯେତେବେଳେ ନିଜର ଘର ରହିଥାଏ ନା ତେବେ ଆତ୍ମସମ୍ମାନରେ ତାହାର ଜୀବନ ଭରି ଯାଇଥାଏ । ନୂତନ ସଂକଳ୍ପ ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇ ଯାଇଥାଏ ଆଉ ସେହି ସଂକଳ୍ପ ଗୁଡ଼ିକୁ ସାକାର କରିବା ପାଇଁ ଗରିବ ପରିବାର ସମେତ ମନପ୍ରାଣ ଦେଇ ଲାଗି ପଡ଼ନ୍ତି, ଦିନରାତି ପରିଶ୍ରମ କରନ୍ତି। ଯେତେବେଳେ 10 କୋଟି ପରିବାରଙ୍କୁ ଶୌଚ ପାଇଁ ଘର ବାହାରକୁ ଯିବାର ବାଧ୍ୟବାଧକତାରୁ ମୁକ୍ତି ମିଳିଥାଏ ତେବେ ତାହାର ଅର୍ଥ ଏହା ହୋଇଥାଏ ଯେ ତାଙ୍କ ଜୀବନସ୍ତର ଉନ୍ନତ ହୋଇଛି। ସେ ପୂର୍ବରୁ ଚିନ୍ତା କରୁଥିଲା ଯେ ସୁଖୀ ପରିବାରଗୁଡ଼ିକର ଘରେ ହିଁ ଶୌଚାଳୟ ରହିଥାଏ, ଶୌଚାଳୟ ସେହିମାନଙ୍କର ଘରେ ହିଁ ରହିଥାଏ। ଗରିବଙ୍କୁ, ବିଚରାମାନଙ୍କୁ ଅନ୍ଧାର କେବେ ହେବ ସେଥିପାଇଁ ଅପେକ୍ଷା କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ, ଖୋଲାସ୍ଥାନକୁ ଯିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ । କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ଗରିବଙ୍କୁ ଶୌଚାଳୟ ମିଳିଥାଏ ତେବେ ସିଏ ନିଜକୁ ନିଜେ ଧନୀ ଲୋକଙ୍କ ସହିତ ସମାନ ଭାବେ ନିଜକୁ ଦେଖିଥାଏ, ଏକ ନୂତନ ବିଶ୍ୱାସ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଥାଏ। ଏହିଭଳି ଭାବେ, ଯେତେବେଳେ ଦେଶର ଗରିବ ଜନ-ଧନ ଖାତା ମାଧ୍ୟମରେ ବ୍ୟାଙ୍କିଙ୍ଗ ବ୍ୟବସ୍ଥା ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଥାଏ, ମୋବାଇଲ ବ୍ୟାଙ୍କିଙ୍ଗ ମଧ୍ୟ ଗରିବଙ୍କ ହାତରେ ରହିଥାଏ ତେବେ ତାହାଙ୍କୁ ଶକ୍ତି ମିଳିଥାଏ, ତାହାଙ୍କୁ ନୂତନ ଅବସର ମିଳିଥାଏ। ଆମର ଏଠାରେ କୁହାଯାଏ –

ସାମର୍ଥ୍ୟ ମୂଳମ୍

ସୁଖମେବ ଲୋକେ!

ଅର୍ଥାତ, ଆମର ସାମର୍ଥ୍ୟର ଆଧାର ଆମ ଜୀବନର ସୁଖ ହିଁ ହୋଇଥାଏ। ଯେପରି ଆମେ ସୁଖ ପଛରେ ଦୌଡ଼ି ସୁଖ ହାସଲ କରି ପାରିବା ନାହିଁ ବରଂ ସେଥିପାଇଁ ଆମକୁ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ, କିଛି ହାସଲ କରିବାକୁ ପଡ଼ିଥାଏ। ସେପରି ହିଁ ସଶକ୍ତିକରଣ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ, ଶିକ୍ଷା, ସୁବିଧା ଏବଂ ଗରିମା ବଢ଼଼ିବା ଦ୍ୱାରା ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ କୋଟି- କୋଟି ଲୋକଙ୍କୁ ଆୟୂଷ୍ମାନ ଯୋଜନା ଯୋଗୁଁ ମାଗଣାରେ ଚିକିତ୍ସା ସୁବିଧା ମିଳେ, ସେତେବେଳେ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟରେ ସେମାନଙ୍କର ସଶକ୍ତୀକରଣ ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ଦୁର୍ବଳ ବର୍ଗର ଲୋକଙ୍କୁ ସଂରକ୍ଷଣର ସୁବିଧା ସୁନିଶ୍ଚିତ କରାଯାଇଥାଏ, ସେତେବେଳେ ଏହି ବର୍ଗଙ୍କୁ ଶିକ୍ଷାର ସଶକ୍ତୀକରଣ ହୋଇଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ସଡ଼କଗୁଡ଼ିକ ସହରରୁ ଗାଁଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ଯୋଡ଼ିଥାଏ, ଯେତେବେଳେ ଗରିବ ଲୋକଙ୍କୁ ମାଗଣା ଗ୍ୟାସ ସଂଯୋଗ, ମାଗଣା ବିଜୁଳି ସଂଯୋଗ ମିଳିଥାଏ ସେତେବେଳେ ଏହିସବୁ ସୁବିଧା ସେମାନଙ୍କର ସଶକ୍ତୀକରଣ କରିଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ଲୋକଙ୍କୁ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ, ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ସୁବିଧା ସବୁ ମିଳିଥାଏ ସେତେବେଳେ ସେ ନିଜର ଉନ୍ନତି ବିଷୟରେ, ଦେଶର ପ୍ରଗତି ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କରିଥାଆନ୍ତି। ଏହି ସ୍ୱପ୍ନ ସବୁକୁ ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ ଆଜି ଦେଶରେ ମୁଦ୍ରା ଯୋଜନା ରହିଛି, ସ୍ୱନିଧି ଯୋଜନା ରହିଛି। ଭାରତରେ ଏଭଳି ଅନେକ ଯୋଜନା ସବୁ ଗରିବଙ୍କୁ ସମ୍ମାନପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନର ମାର୍ଗ ଦେଉଛି, ସମ୍ମାନରୁ ସଶକ୍ତୀକରଣର ମାଧ୍ୟମ ହେଉଛି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଯେତେବେଳେ ସାଧାରଣ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କର ସ୍ୱପ୍ନକୁ ସୁଯୋଗ ମିଳିଥାଏ, ଯେତେବେଳେ ବ୍ୟବସ୍ଥା ସବୁ ନିଜେ ଘର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚିବାକୁ ଲାଗେ ସେତେବେଳେ କିଭଳି ଭାବେ ଜୀବନ ବଦଳିଯାଏ, ଏହାକୁ ଖୁବ ଭଲ ଭାବେ ଗୁଜରାଟ ବୁଝିଛି। କେବେ ଗୁଜରାଟର ଏକ ବଡ଼ ଅଞ୍ଚଳର ଲୋକମାନଙ୍କୁ, ମାଆ- ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ପାଣି ଭଳି ମୌଳିକ ଆବଶ୍ୟକତା ପାଇଁ କେତେ- କେତେ କିଲୋମିଟର ପାଦରେ ଚାଲି ଚାଲି  ଯିବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। ଆମର ସମସ୍ତ ମାଆ- ଭଉଣୀମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ଏହାର ସାକ୍ଷୀ। ଏହି ରାଜକୋଟକୁ ପାଣି ପାଇଁ ଟ୍ରେନ ପଠାଇବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। ରାଜକୋଟକୁ ପାଣି ପାଇଁ ଘର ବାହାରେ ଗାତ ଖୋଳି ତଳୁ ପାଇପରୁ ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ଗିନାରେ ଭରି ବାଲଟି ଭର୍ତି କରିବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଆଜି, ସର୍ଦ୍ଦାର ସରୋବର ସେତୁ ଦ୍ୱାରା, ସାଉନୀ ଯୋଜନା ଦ୍ୱାରା, କେନାଲର ନେଟୱର୍କ ଦ୍ୱାରା ସେହି କଚ୍ଛରେ ମଧ୍ୟ ମାଆ ନର୍ମଦାଙ୍କ ପାଣି ପହଞ୍ଚି ପାରୁଛି, ଯାହା କେହି କେବେ ଚିନ୍ତା ମଧ୍ୟ କରି ପାରୁ ନଥିଲେ ଆଉ ଆମର ଏଠାରେ ତ କୁହା ଯାଉଥିଲା ଯେ ମାଆ ନର୍ମଦାଙ୍କ ସ୍ମରଣ ମାତ୍ରକେ ପୂଣ୍ୟ ମିଳେ, ଆଜି ତ ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ଗୁଜରାଟର ଗାଁ- ଗାଁକୁ ଯାଉଛନ୍ତି, ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ପ୍ରତିଟି ଘରକୁ ଯାଉଛନ୍ତି, ସ୍ୱୟଂ ମାଆ ନର୍ମଦା ଆପଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରକୁ ଆସି ଆପଣଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଉଛନ୍ତି। ଏହି ପ୍ରୟାସ ଗୁଡ଼ିକର ପରିଣାମ ହେଉଛି ଯେ ଆଜି ଗୁଜରାଟ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ପାଇପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ପାନୀୟ ଜଳ ଉପଲବ୍ଧ କରାଇବାର ଲକ୍ଷ୍ୟଠାରୁ ଏବେ ଆଉ ଅଧିକ ଦୂରରେ ନାହିଁ । ଏହି ଗତି, ସାଧାରଣ ଜନତାଙ୍କ ଜୀବନରେ ଏହି ପରିବର୍ତନ, ଏବେ ଧୀରେ- ଧୀରେ ସମଗ୍ର ଦେଶ ଅନୁଭବ କରୁଛି । ସ୍ୱାଧୀନତାର ଦଶକ- ଦଶକ ପରେ ମଧ୍ୟ ଦେଶରେ କେବଳ 3 କୋଟି ଗ୍ରାମୀଣ ପରିବାର ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ପାନୀୟ ଜଳ ସୁବିଧା ସହିତ ଯୋଡ଼ି ହୋଇଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ମିଳୁଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଆଜି ଜଳ ଜୀବନ ଅଭିଯାନ ମାଧ୍ୟମରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ କେବଳ ଦୁଇ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟରେ, ଦୁଇ ବର୍ଷ ଭିତରେ ସାଢ଼େ 4 କୋଟିରୁ ଅଧିକ ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ୍ ପାଣି ସହିତ ସଂଯୋଗ କରାଯାଇ ସାରିଛି, ଆଉ ଏଥିପାଇଁ ମୋ ମାଆ- ଭଉଣୀମାନେ ମୋତେ ଭରପୂର ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଉଛନ୍ତି।

ଭାଇ  ଭଉଣୀମାନେ,

ଡବଲ ଇଂଜିନର ସରକାର ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଗୁଜରାଟ କ୍ରମାଗତ ଭାବେ ଲାଭ ଦେଖୁଛି। ଆଜି ସର୍ଦ୍ଦାର ସରୋବର ସେତୁ ଦ୍ୱାରା ବିକାଶର ନୂତନ ଧାରା ହିଁ ପ୍ରବାହିତ ହେଉ ନାହିଁ, ବରଂ ଷ୍ଟାଚ୍ୟୁ ଅଫ୍ ୟୁନିଟି ଭାବେ ବିଶ୍ୱର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଆକର୍ଷଣ ମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ ଆଜି ଗୁଜରାଟରେ ଅଛି । କଚ୍ଛରେ ସ୍ଥାପିତ ହେଉଥିବା ନବୀକରଣୀୟ ଶକ୍ତି ପାର୍କ, ଗୁଜରାଟକୁ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର ନବୀକରଣୀୟ ଶକ୍ତି ମାନଚିତ୍ରରେ ସ୍ଥାପିତ କରିବାକୁ ଯାଉଛି। ଗୁଜରାଟରେ ରେଳ ଏବଂ ବିମାନ ଯୋଗାଯୋଗର ଆଧୁନିକ ଏବଂ ଭବ୍ୟ ଭିତିଭୂମି ପ୍ରକଳ୍ପ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି। ଗୁଜରାଟର ଅହମ୍ମଦାବାଦ ଏବଂ ସୁରଟ ଭଳି ସହରଗୁଡ଼ିକରେ ମେଟ୍ରୋ ସଂଯୋଗର ସମ୍ପ୍ରସାରଣ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ହେଉଛି। ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ମେଡିକାଲ ଶିକ୍ଷାରେ ମଧ୍ୟ ଗୁଜରାଟରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ଗୁଜରାଟରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଥିବା ଉନ୍ନତ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ଭିତିଭୂମି 100 ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ମେଡିକାଲ ଜରୁରୀକାଳୀନ ପରିସ୍ଥିତିକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବାରେ ବଡ଼ ଭୂମିକା ତୁଲାଇଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୁଜରାଟ ସହିତ ସମଗ୍ର ଦେଶରେ ଏପରି ଅନେକ କାର୍ଯ୍ୟ ଅଛି, ଯେଉଁଥି ପାଇଁ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କର, ପ୍ରତ୍ୟେକ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ବୃଦ୍ଧି ପାଉଛି । ଆଉ ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ହିଁ ହେଉଛି ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଆହ୍ୱାନକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବା ପାଇଁ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସ୍ୱପ୍ନକୁ  ପୂରଣ କରିବା ପାଇଁ ହେଉଛି ଏକ ବହୁତ ବଡ଼ ସୂତ୍ର । ଏବେ ଏହାର ତାଜା ଉଦାହରଣ ହେଉଛି ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ଆମ ଖେଳାଳୀମାନଙ୍କର ପ୍ରଦର୍ଶନ । ଚଳିତ ଥର ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ଭାଗନେବା ପାଇଁ ଭାରତର ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ ଖେଳାଳୀ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିଛନ୍ତି। ଏହା ସ୍ମରଣ ରଖିବାର କଥା ଯେ 100 ବର୍ଷରେ ଆସିଥିବା ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ବିପର୍ପ୍ୟୟ ସହିତ ମୁକାବିଲା କରି ଆମେ ଏହା କରି ପାରିଛେ । ଏପରି ଅନେକ ଖେଳ ଅଛି ଯେଉଁଥିରେ ଆମେ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିଛେ । କେବଳ ଯୋଗ୍ୟତା ହାସଲ କରିନାହୁଁ ବରଂ କଡ଼ା ଟକ୍କର ମଧ୍ୟ ଦେଇଛୁ। ଆମ ଖେଳାଳୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଖେଳରେ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରୁଛନ୍ତି । ଚଳିତ ଅଲିମ୍ପିକ୍ସରେ ନୂତନ ଭାରତର ଦୃଢ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ପ୍ରତ୍ୟକ ଖେଳରେ ଦୃଷ୍ଟି ଗୋଚର ହେଉଛି । ଅଲିମ୍ପିକ୍ସ ଖେଳିବାକୁ ଯାଇଥିବା ଆମର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଖେଳାଳୀ, ନିଜଠାରୁ ଉନ୍ନତ ମାନ୍ୟତା ପ୍ରାପ୍ତ ଖେଳାଳୀମାନଙ୍କୁ, ସେମାନଙ୍କ ଦଳକୁ ଚାଲେଞ୍ଜ ଦେଉଛନ୍ତି । ଭାରତୀୟ ଖେଳାଳୀଙ୍କର ଉତ୍ସାହ, ଉଦ୍ଦିପନା ଏବଂ ହାସଲ କରିବାର ଲକ୍ଷ୍ୟ ଆଜି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ସ୍ତରରେ ରହିଛି । ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେତେବେଳେ ଆସିଥାଏ ଯେତେବେଳେ ଉପପୁକ୍ତ ପ୍ରତିଭାଙ୍କର ଚିହ୍ନଟ ହୋଇଥାଏ, ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହନ ମିଳିଥାଏ।        ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ସେତେବେଳେ ଆସିଥାଏ ଯେତେ ବେଳେ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଗୁଡିକ ବଦଳିଥାଏ, ପାରଦର୍ଶୀ ହୋଇଥାଏ । ଏହି ନୂତନ  ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ନ୍ୟୁ ଇଣ୍ଡିଆର ପରିଚୟ ପାଲଟିଛି । ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ଆଜି ଦେଶର କୋଣ-ଅନୁ-କୋଣରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ଛୋଟ-ଛୋଟ, ବଡ଼ ଗାଁ  ଜନବସତିରେ, ଗରିବ, ମଧ୍ୟମ ବର୍ଗର  ଯୁବ ଭାରତର ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଣରେ ଏହି ବିଶ୍ୱାସ ଆସୁଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଏହି ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସକୁ ଆମକୁ କରୋନା ସହିତ ଲଢେଇରେ ଏବଂ ଆମ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ ଜାରି ରଖିବାକୁ ହେବ । ବୈଶ୍ୱିକ ମହାମାରୀର ଏହି ବାତାବରଣରେ ଆମକୁ କ୍ରମାଗତ ଭାବେ ଆମର ସତର୍କତା ବଜାୟ ରଖିବାକୁ ହେବ। ଦେଶ ଆଜି 50 କୋଟି ଟିକାକରଣ ଦିଗକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି,  ଗୁଜରାଟ ମଧ୍ୟ ସାଢେ 3 କୋଟି ଡୋଜ ଟିକାର ସୋପାନ ପାଖରେ ପହଞ୍ଚୁଛି । ଆମକୁ ଟିକା ନେବାର ଅଛି, ମାସ୍କ ମଧ୍ୟ ପିନ୍ଧିବାର ଅଛି ଏବଂ ଯେତେ ସମ୍ଭବ ହେବ ଜନଗହଳି ବା ଭିଡ ଠାରୁ ଦୂରେଇ ରହିବାକୁ ହେବ । ଆମେ ବିଶ୍ୱରେ ଦେଖୁଛେ । ଯେଉଁଠାରେ ମଧ୍ୟ ମାସ୍କ ପିନ୍ଧିବା କଟକଣା ହଟାଇ ଦିଆଇଥିଲା, ସେଠାରେ ପୁଣି ମାସ୍କ ପିନ୍ଧିବାକୁ ଅନୁରୋଧ କରାଯାଉଛି। ସତର୍କତା ଏବଂ ସୁରକ୍ଷା ସହିତ ଆମକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାର ଅଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଯେତେବେଳେ ଆମେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଗରିବ କଲ୍ୟାଣ ଅନ୍ନ ଯୋଜନା ଉପରେ ଏତେ ବଡ଼ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ କରୁଛେ ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ଆଉ ଏକ ସଂକଳ୍ପ ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି ସଂକଳ୍ପ ହେଉଛି ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣ ପାଇଁ ନୂତନ ପ୍ରେରଣା ଜାଗ୍ରତ କରିବାର । ସ୍ୱାଧୀନତାର 75 ବର୍ଷରେ, ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତ ମହେତ୍ସବରେ, ଆମକୁ ଏହି ପବିତ୍ର ସଂକଳ୍ପ ନେବାର ଅଛି। ଏହି ସଂକଳ୍ପ ଗୁଡିକରେ, ଏହି ଅଭିଯାନରେ ଗରିବ-ଧନୀ, ମହିଳା-ପୁରୁଷ, ଦଳିତ-ବଞ୍ଚିତ ସମସ୍ତଙ୍କର ସମାନ ଭାବେ ଯୋଗଦାନ ରହିବ। ଗୁଜରାଟ ଆଗାମୀ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ନିଜର ସମସ୍ତ ସଂକଳ୍ପ ସିଦ୍ଧ କରୁ, ବିଶ୍ୱରେ ନିଜର ଗୌରବମୟ ପରିଚୟକୁ ଆହୁରି ସୁଦୃଢ କରୁ, ଏହି କାମନା ସହିତ ମୁଁ  ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା ଜଣାଉଛି । ପୁଣି ଥରେ ଅନ୍ନ ଯୋଜନାର ସମସ୍ତ ହିତାଧିକାରୀଙ୍କୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଶୁଭକାମନା!!! ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ!!!