Golden Opportunity as PM Modi launches three gold schemes

Published By : Admin | November 5, 2015 | 15:12 IST
PM Narendra Modi launches three gold schemes
PM Narendra Modi launches first ever Indian gold coin
India has no reason to be described as a poor country; it has 20,000 tonnes of gold: PM Modi
Gold has been a source of women's empowerment in Indian society, says Prime Minister Modi
PM Narendra Modi highlights benefits of three gold schemes

उपस्थित सभी महानुभव।

हम बचपन से सुनते आए थे ‘सोने पे सुहागा’। लेकिन अब तक समझ नहीं था कि ‘सोने पर सुहागा’ होता क्‍या है। आज हमारे वित्‍त मंत्री जी ने हमें समझा दिया ‘सोने पर सुहागा’ क्‍या होता है। देश के लिए योजना सच्‍चे अर्थ में ‘सोने पे सुहागा’ इस भाव को चरित्रार्थ करती है। और हम ऐसे गरीब देश हैं जिसके पास 20 हजार टन सोना यूं ही पड़ा है। और शायद हमारी गरीबी का कारण भी यही है कि 20 हजार टन सोना पड़ा हुआ है। और इसलिए भारत को गरीब रहने का कोई कारण नहीं है, कोई कारण नहीं है। कोई logic नहीं समझा पा रहा कि हमें गरीब क्‍यों रहना चाहिए। अगर हम थोड़ी कोशिश करें, सही दिशा में कोशिश करें, तो हम.. हम पर जो Tag लगा है, उस Tag से मुक्ति पा सकते हैं। और उस रास्‍ते का एक महत्‍वपूर्ण, अहम कदम आज है कि ये Gold संबंधी भिन्‍न-भिन्न योजनाएं।

अब मैं बचपन से सुनता आया था लोगों से कि भई आधी रात को काम आता है। सोना रखो, आधी रात को काम आता है। कभी जरूरत पड़ जाए तो काम आ जाएगा; लेकिन मैंने सैकड़ों लोगों को पूछा कि भई कभी आपकी जिंदगी में ऐसी नौबत आई है क्‍या? मुझे अभी तक कोई मिला नहीं, जिसको आधी रात उसका उपयोग हुआ हो लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से उसके दिमाग में फिट है कि भई यह रखो कभी आधी रात काम आ जाएगा। और यह जो हमारे बने बनाए कुछ विचार ने घर कर लिया है, उसमें से समाज को बाहर लाना यह आसान काम नहीं है। आप समझा करके कितने ही पढ़े-लिखे व्‍यक्ति को कहोगे कि छोड़ों, आसान नहीं है। Even Reserve Bank के Governor को भी अपनी पत्‍नी कुछ मांगेगी तो Gold लाना ही पड़ेगा। जबकि उनका अर्थशास्‍त्र Gold के संबंध में अलग होगा, लेकिन गृहशास्‍त्र अलग होगा, तो यह जो अवस्‍था है उस अवस्‍था में कोई न कोई innovative, creative हमने व्‍यवस्‍थाएं विकसित करनी पड़ेगी। दूसरी एक सोच बनी हुई हैं हमारे देश में एक ऐसा Perception है दुनिया में कि भारत में महिलाओं के पास कुछ होता नहीं है। मकान है तो पति के नाम पर, पिता के नाम पर, गाड़ी है तो पति या बेटे के नाम पर, खेत है तो पिता के नाम महिलाओं के पास ? लेकिन बारीकी से देखेंगे तो सोना एक होता है जो महिला की ताकत का विषय होता है। यह ऐसे बनी हुई व्‍यवस्‍था नहीं है। कोई सिर्फ एक सामाजिक व्‍यवस्‍था का एक बहुत बड़ा ताकतवर हिस्‍सा रहा है, जो women empowerment बहुत बड़ा पहलू है। उसके नाम पर मकान नहीं होगा, लेकिन उसके पास यह संपत्ति उसके मालिक की होती है। और परिवार भी उसको question नहीं करता, बेटी भी question नहीं करती, यह तो मां का है। यह जो हमारा संस्‍कार का एक उत्‍तम पहलू भी है। जिसने women empowerment के लिए एक ऐसा सामाजिक जीवन में व्‍यवस्‍था विकसित की and with the help of gold यह हमारा structure विकसित हुआ है, तो उसको बरकरार भी रखना है। हमारी माताएं-बहनें उनके अंदर जो सुरक्षा का भाव है यह बरकरार रहना चाहिए। हम इस scheme में ये विश्‍वास अगर पहुंचाते हैं तो शायद इसकी सबसे ज्‍यादा सफलता का कारण महिलाएं बनेगी। दूसरा हमने देखा होगा हमारे यहां सम्‍पन्‍न परिवारों के family डॉक्‍टर होते हैं। even मध्‍यम वर्ग परिवार के भी family डॉक्‍टर होते हैं।लेकिन निम्‍म वर्ग, गरीब वर्ग परिवार के family डॉक्‍टर नहीं होते हैं। लेकिन हमारे देश में हर परिवार का family goldsmith होता है। कितना बड़ा विश्‍वास होता है। तीन-तीन, चार-चार पीढ़ी से वो सुनार, यानी वो अमेरिका में रहने गया होगा, लेकिन अपने गांव का सुनार है उसी को ढूंढेगा कि भई देखो जरा मैं यह भेजता हूं, कर देना। यह विश्‍वसनीयता एक बहुत बड़ी यानी सदियों की तपस्‍या से बनती है। उस ताकत को भी हमें पहचानना होगा। और इसलिए जब योजना के विषय में मेरे से चर्चा हो रही थी, तो श्रीमान दास को मैं कह रहा था कि जो गांव के छोटे-छोटे goldsmith हैं, वे हमारे एजेंड कैसे बन सकते हैं इस योजना के। एक समय ऐसा था 1968 goldsmith सरकार का सबसे बड़ा दुश्‍मन बना हुआ था। मैं गुजरात के पार्टन नामक शहर में बचपन में कुछ समय बिताया था। जिस गली में मैं रहता था वो सोने की गली थी। वहां एक सज्‍जन थे, उनका एक कार्यक्रम रहता था। सुबह अखबार आता था तो सिगरेट जलाते थे और अखबार में जहां भी मौराजी भाई का फोटो हो तो उसको जलाते थे। इतना गुस्‍सा, इतना गुस्‍सा वो करते थे, क्‍यों‍कि उनको लगता था कि भई हमारी तो सारी रोजी-रोटी चली गई। हम इस योजना के द्वारा ऐसी कैसे व्‍यवस्‍था विकसित करें ताकि उसको फिर एक एक बार empower करें। वो हमारा इस profession का एजेंट कैसे बने, क्‍योंकि उसका विश्‍वास है कि मैं किसी के लिए बुराई नहीं कर रहा हूं लेकिन बैंक से ज्‍यादा उसको अपने गांव के सुनार पर ज्‍यादा भरोसा है। वो बड़े से बड़े jewelry की showroom में जाएगा, लाने के बाद अपने सुनार के यहां जरा चैक कर ले भई। कितना ही बड़ा showroom होगा.. हमारे मेहुल भाई यहां बैठे हैं, लेकिन वो जाएगा। जाएगा अपने सुनार के पास जरा चैक तो करो, मैं ले तो आया हूं। ये एक हमारी इस व्‍यवस्‍था की एक बहुत बड़ी कड़ी बन सकती है। और यह स्‍ट्रक्‍चर already available है। हम उनको gold bond के लिए किस प्रकार से प्रेरित कर सकते है, उनको कैसे विश्‍वास दिला सकते हैं। हम एक decent line mechanism कैसे develop कर सकते हैं और मैं चाहूंगा कि Department के लोग इस पर सोचे, अगर यह हम कर पाएं तो शायद एकदम से यह बढ़ेगा। सरकार में कोई योजना बजट में आए और इतने कम समय में यह लागू हो जाए और Target तय किया है धनतेरस के पहले, क्‍योंकि भारत में शादी में सोने का जितना महत्‍व है, उससे ज्‍यादा धनतेरस को है। और सबसे ज्‍यादा import इन्‍हीं दिनों में हुआ होगा। क्‍योंकि लोगों को लगता होगा कि कोई बहुत बड़ा मार्केट खुलने वाला है तो हमको.. अब यह देखिए एक हजार टन सोना हर वर्ष हम import करते हैं और यह इतनी बड़ी शक्ति है हमारी अगर बिना उपयोग के पड़ी रहे किसी ने कोई बहुत बड़ा जलाशय बनाया हो dam बनाया हो, अरबों खरबों रुपये खर्च किये हो। लेकिन अगर canal network न हो और किसानों के पास पहुंचेगा नहीं तो क्‍या करना है उसको। यह हमारे 20 हजार टन सोने की यही हाल है जी। हमें इसको राष्‍ट्र की शक्ति में परिवर्तित करना है और सामाजिक सुरक्षा में अधिक बलवान बनाना है। इसके एक पहलू नहीं संभव है। यह सामाजिक सुरक्षा का जो पहलू है उसको हमें और Strengthen करना है। राष्‍ट्र की विकास यात्रा में वो एक बहुत बड़ा रोल प्‍ले कर सकते उस प्रकार का हमने विश्‍वास जताना है, mechanism बनाना है। आज एक चिंता तो लोगों को रहती है कि भई कहां रखें 15 दिन बाहर जाना है तो यह सब रखे कहां? रिश्‍तेदार के भी यहां रखें तो क्‍या रखें, कैसे उसको.. मन में चिंता रहती है। यह सुरक्षा का सबसे बड़ा Tension है वो इस योजना से मिट जाता है। उसको विश्‍वास बन जाता है कि यहां मेरा पैसा सुरक्षित है। कभी-कभार व्‍यक्ति Gold में इसलिए करता है कि रुपये के थैले कहां रखेंगे? इतनी छोटी जगह में Gold आ जाएगा तो इतने बड़े थैले वाला रुपये.. तो हम जानते है वो क्‍या होता है सब। लेकिन अगर आज वो उसके पास bond आ गया तो अपना चार कागज़ रख लें चोर भी आएगा तो वो हाथ नहीं लगाएगा। वो कहेगा यह कागज़ को क्‍या ले जाना, नहीं ले जाना भई, ये तो बेकार है। यानी सुरक्षा की guarantee है और यह वो बेच भी सकता है। सोना आधी रात को बिका हो, यह मुझे पता नहीं है। लेकिन मैं विश्‍वास से कहता हूं कि Gold Bond जरूरत पड़ने पर आधी रात को बेच सकते हैं, कहीं अस्‍पताल में जाना पड़ा ऑपरेशन करना पड़े, डॉक्‍टर कहता है पहले पैसे लाओ, Gold Bond दे दिया ऑपरेशन हो जाएगा। यह इतनी संभावनाएं तो सोने में नहीं है। यानी plus point है इसमें। हम इन चीजों को बड़ा articulate करके लोगों तक कैसे पहुंचाएं। उसी प्रकार से हमारा जो यह जमा जमाया ऐसे ही Gold पड़ा हुआ है। बैंक में आएगा और लम्‍बे समय के लिए आएगा तो वो jewellry के लिए चला जाएगा।

Jewellry के लिए चला जाएगा तो मैं मानता हूं jewellry क्षेत्र के लोगों को इस प्रकार से Gold सरलता से मिलेगा उनके सामने कोई question नहीं होंगे। एक jewellry के business वालों के लिए बैंक से direct requirement के अनुसार Gold मिल जाना locally ही मिल जाना यह अपने आप में हमारे jewellry के promotion के लिए बहुत सुविधा का कारण बनेगा और इसलिए जो jewellry की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं क्‍योंकि हम दुनिया के सबसे बड़े आज Gold consumer है। अभी मुझे कल कोई रिपोर्ट बता रहा था कि हमने चाइना को भी इसमें पीछे छोड़ दिया। शायद four-five hundred sixty two टन अब तक नौ महीने में शायद हमने Gold खरीदा है। और चाइना से five hundred forty eight पर खड़ा है। अगर इतना हम तेजी से कर रहे हैं, तो यह व्‍यवस्‍था हम बदलाव ला सकते हैं। monthly monitoring करके हम target तय कर सकते हैं कि इस month घरों का Gold बैंक में आएगा और उतनी मात्रा में बाहर से आना कम होगा। ये हम online monitoring व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते थे, तो शायद हम इस सारी नई व्‍यवस्‍था को एक सचमुच में राष्‍ट्रहित में, राष्‍ट्र के‍ विकास के काम में इसको हम जोड़ सकते हैं। इसके साथ एक राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान का विषय भी है। क्‍या कारण है कि हम अभी भी विदेशी मार्के से सोना.. और आज भी पूछते हैं कि अच्‍छा वो मार्क का है। मुझे तो नाम याद नहीं, क्‍योंकि मेरा कोई ऐसे लेना-देना है नहीं, लेकिन सुनते आए हैं। अब वो विश्‍वास से कहेगा कि भई अशोक चक्र है क्‍या। मेरे देश को इस पर भरोसा है क्‍या। यह हमने brand popular करना चाहिए। अब हमने तय करना चाहिए कि हम अब विदेशी मार्क वाला बाजार में हम खुद ही नहीं देंगे। हम jewelry में होंगे, हम Gold बैचने वाले लोग होंगे, हम नहीं करेंगे। यह ठीक है कि अभी इस धनतेरस तो शायद सौ सवा सौ सेंटर पर ही मिलेगा शायद लेकिन वो धीरे-धीरे बढ़ेगा। तो जिन लोगों को धनतेरस पर सोना खरीदना है उनको कुछ जगह पर तो मिल ही जाएगा लेकिन आगे चल करके होगा, लेकिन एक राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान से जुड़ना चाहिए और हमें इसको बल देना चाहिए। और इतने कम समय में वित्‍त मंत्री और उनकी पूरी टीम ने पूरी scheme को workout किया, उसको launch किया। Technology भी इसमें है और manufacturing भी है। सारी व्‍यवस्‍थाएं नये सिरे से करनी पड़ी है। लेकिन सारी व्‍यवस्‍थाएं की और मैं जब इस coin को देखा शायद मैंने अपने रुपये वगैरह पर जो गांधी जी देखें हैं इसमें बहुत बढि़या उनका चित्र निकला है गांधी जी का, यानी जिसने भी इसका artwork किया है उसको मैं बधाई देता हूं। इतना यानी feeling आता है। आप देखेंगे तो ध्‍यान में आएगा। बहुत ही अच्‍छा artwork किया है यानी इसके लिए.. मेरा स्‍वभाव है, इन चीजों में मेरी रूचि होने के कारण मैं थोड़ा अलग प्रकार से देखता रहता हूं। लेकिन मैं बधाई देता हूं पूरी टीम को, अरूण जी को विशेष बधाई देता हूं। और देशवासियों को शुभकामनाएं देता हूं कि धनतेरस के इस पावन पर्व से और दिवाली के शुभकामनाओं के साथ भारत स्‍वर्णिम युग के लिए आगे बढ़े और आपका 20 हजार टन सोना भारत के स्‍वर्णिम युग की ओर जाने के लिए काफी है। ऐसा मेरा विश्‍वास है आइये भारत को स्‍वर्णिम युग बनाने के लिए जिनके पास सोना है, वो इस सुनहरे अवसर को न छोड़े और सोने पर सुहागा उसको फायदा वो भी उठाए। यही मेरी अपेक्षाएं और शुभकामनाएं हैं।

धन्‍यवाद।

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एल्लरिगू नन्ना नमस्कारगलु।

रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशनबेलूर मठ के अध्यक्ष परम पूज्य स्वामी गौतमानंद जी महाराज, श्री रामकृष्ण आश्रम, मैसुरू के अध्यक्ष पूज्य स्वामी मुक्तिदानंद जी, रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के ट्रस्टी पूज्य स्वामी यादवेंद्रानंद जी, राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत जी, मुख्यमंत्री श्री डी.के. शिवकुमार जी, सांसद यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वाडियार जी, विधायक विजयेंद्र येदियुरप्पा जी, के. हरीश गौड़ा जी, अन्य महानुभाव, पूज्य संतगण और भाईयों और बहनों।

सर्वप्रथम मैं मैसूरू की अधिष्ठात्री देवी मां चामुंडेश्वरी को प्रणाम करता हूं। अभी दो दिन पहले ही हम सभी ने गुरू पूर्णिमा भी मनाई है। आप सब जानते हैं, मेरी यात्रा जहां से शुरू हुई और आज मैं जहां हूं, इसमें राम कृष्ण मिशन का बहुत अहम योगदान है। मैं तीन महीने पहले हावड़ा में बेलूर मठ गया था। सभी पूज्य संतों से सतसंग करने का अवसर मिला था। मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे फिर मैसूरू में श्री रामकृष्ण आश्रम से जुड़े संतों से, मेरे गुरू बंधुओं से मिलने का, उनसे आशीर्वाद लेने का अवसर मिला है। आप सभी की उपस्थिति की वजह से, आज मैसूरू की इस पवित्र भूमि पर मुझे एक अलग ही ऊर्जा अनुभव हो रही है। मैं आप सभी संतों के चरणों में सादर प्रणाम करता हूं।

साथियों,

मैसूरू भारत की अनादि सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है। यहां के मंदिर, यहां की परंपराएं और उत्सव, मैसूरू का दशहरा, यहां के भव्य महल, इसका संगीत और साहित्य, भारत की विरासत इस शहर के कण-कण में रची बसी है। और यह देखकर बहुत संतोष मिलता है। इस शहर ने इस विरासत को उसी कुशलता से सहेजा भी है, संवारा भी है। श्री रामकृष्ण आश्रम और स्वामी विवेकानंद जी की स्मृतियां भी मैसुरू की विरासत का ही एक समृद्ध हिस्सा हैं। कुछ देर पहले मैं उस ऐतिहासिक भवन में भी गया था, जहां स्वामी विवेकानंद जी ने अपने प्रवास के दौरान कुछ समय बिताया था। कर्नाटका के कितने ही विद्वान और मनीषी इस स्थान से जुड़े रहे हैं। राष्ट्रकवि कुवेम्पु जैसे महापुरुष जब मैसुरू में थे, उनका भी श्रीरामकृष्ण आश्रम से गहरा जुड़ाव था। आज स्वामी विवेकानंद कल्चरल यूथ सेंटर, यानी विवेका स्मारका के उद्घाटन के जरिए, हम इस मिशन को नया विस्तार दे रहे हैं। इसके लिए मैं श्रीरामकृष्ण आश्रम और इससे जुड़े सभी विद्वानों को हार्दिक बधाई देता हूं।

साथियों,

व्यक्ति से विभूति का निर्माण एकाएक नहीं होता। इसके लिए हमें जीवन की अनगिनत परीक्षाएँ देनी होती हैं। साधना करनी होती है, तप करना होता है, खुद को तपाना पड़ता है, खपाना पड़ता है। ख्याति के बाद तो संसार पीछे खड़ा होता है। लेकिन, तप के समय महान विभूतियों को पहचानना आसान नहीं होता। जो साधक को तपस्या में पहचानता है, वो उसकी सिद्धि का सहभागी भी होता है।

इसलिए भाइयों बहनों,

स्वामी विवेकानंद के जीवन में मैसुरू का इतना अहम योगदान था। करीब 130 वर्ष पहले, स्वामी जी, एक युवा संन्यासी के रूप में भ्रमण करते हुए मैसुरू आए थे। तब उनकी प्रसिद्धि वैसी नहीं थी। लेकिन, विचार उतने ही ऊंचे थे। उस समय उन्हें जिन लोगों ने पहचाना, जो उनके साथ जुड़े, उनमें से एक प्रमुख नाम मैसुरू के तत्कालीन महाराजा का भी था। जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में थे, तो उन्होंने वहाँ से मैसुरू के तत्कालीन महाराजा को एक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने स्वयं महाराजा के सहयोग का उल्लेख किया था।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय चेतना को आत्मसात किया था। उन्होंने शास्त्रों को आत्मसात किया था जो कहते हैं- “परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति”। अर्थात्, वास्तव में वही जीता है जो दूसरों के लिए जीता है। इसी मंत्र पर चलते हुए, मैसुरू के इस श्री रामकृष्ण आश्रम ने पिछले वर्ष अपने सौ साल पूरे किए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएँ हों, या प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य, श्री रामकृष्ण आश्रम ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत को जीवंत रखा है। मुझे विश्वास है विवेका स्मारका साधकों और श्रद्धालुओं के लिए आत्मिक उत्थान का तीर्थ बनेगा। स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरणा थी- ‘शिव ज्ञाने जीव सेवा’। यानी जीव की सेवा ही शिव की सेवा है। हमें इस विवेका स्मारक में इसलिए, ऐसे युवाओं को गढ़ना है, जिनके लिए समाज और राष्ट्र के हित, गरीब-वंचित के दुःख, अपने सुख-दुःख से ऊपर हों। जिन युवाओं के लिए राष्ट्र प्रथम ही सर्वोपरि मंत्र हो, मां भारती की सेवा ही जिनका जीवन लक्ष्य हो।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी युवाओँ की शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार मानते थे। उन्होंने स्वयं ये देखा था कि कैसे दुनिया के देश अपने युवाओं को शिक्षित बना रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से तब भारत गुलाम था। भारत के युवा भी गुलामी की जंजीरों में जक़ड़े हुए थे। उस दौर से लेकर अब तक, भारत के युवा ने एक लंबी यात्रा तय की है। भारत का जो युवा कभी जंजीरों में था, आज वो युवा दुनिया के विकास को गति दे रहा है।

· आज भारत की अर्थव्यवस्था, सबसे तेजी से आगे बढ़ रही है।

· किसकी वजह से? भारत के युवाओँके सामर्थ्य से।

· आज भारत में दुनिया की तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम है।

· किसकी वजह से? भारत के युवाओँ के सामर्थ्य से।

· आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत से बने Digital Solutions, दुनिया के अनेक देशों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की नई यात्रा पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत AI, Deep Tech, Space Technology और Innovation के नए अध्याय लिख रहा है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

अभी कुछ दिन पहले ही हमने देखा है, भारत के युवाओं ने अंतरिक्ष में कमाल कर दिया है। पहली बार युवाओं का बनाया हुआ एक प्राइवेट कंपनी का रॉकेट, अंतरिक्ष तक पहुंचा है। आज कोई भी सेक्टर हो, भारत युवा अपना दम-खम दिखा रहा है। हम सभी अपने आसपास देख रहे हैं, आज छोटे से छोटे व्यवसाय में लगा युवा, भारत की डिजिटल इकॉनमी को आगे बढ़ा रहा है। वो मुद्रा लोन के जरिए नई शुरुआत कर रहा है। वो देश की स्टार्टअप revolutionको लीड कर रहा है। आत्मनिर्भर भारत का अभियान हो, मेक इन इंडिया का अभियान हो, इसकी सफलता के पीछे भारत के युवाओं की ही ताकत है।

साथियों,

किसी भी देश में, युवाओं का सामर्थ्य तभी उस राष्ट्र की शक्ति बनता है, जब उसे सही अवसर मिले, जब उसे सही दिशा मिले, और जब उसे अपनी ही धरती पर बड़े सपने देखने, उन्हें पूरा करने का भरोसा मिले। और इसमें बहुत बड़ी भूमिका हमारे शिक्षा संस्थानों की होती है। मुझे खुशी है कि आज भारत में शिक्षण संस्थाओँ की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले 12 वर्षों में, 650 से ज्यादा नई यूनिवर्सिटीज बनी हैं। पिछले 12 वर्षों में करीब 14 हजार नए कॉलेज बने हैं। 4 हजार से ज्यादा नई ITI बनाई गई हैं। 9 नए आई.आई.एम, 7 नई आई.आई.टी, और13 नए एम्स भी स्थापित किए गए हैं। आज देश में MBBS की सीटें करीब 1 लाख 40 हजार हो चुकी हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 823 हो गई है।

साथियों,

एक ओर हम एजुकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर को modernize कर रहे हैं। साथ ही, शिक्षा व्यवस्था को भी आधुनिक जरूरतों के हिसाब से ढाला जा रहा है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी, भारत के युवाओँ को 21वीं सदी के अनुरूप तैयार करने का माध्यम बन रही है।

साथियों,

स्कूली शिक्षा में भी बड़े स्तर पर काम हुआ है। देशभर में 14 हजार से ज्यादा पीएम श्री स्कूल विकसित किए गए हैं। शिक्षा केवल किताबी न रहे, बच्चों में इनोवेशन और साइंटिफिक टेंपरामेंट विकसित हो, इसके लिए,10 हजार से ज्यादा अटल टिंकरिंग लैब्स स्थापित हुई हैं।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी, राष्ट्र उत्थान के लिए शिक्षा के साथ-साथ समानता को भी उतना ही अहम मानते थे। शिक्षा में भेदभाव न हो, अवसरों में भेदभाव न हो, आज ये देश का विज़न बन गया है। आज बेटियाँ भी सैनिक स्कूलों में एड्मिशन ले रहीं हैं। एनडीए में बेटियां राष्ट्र के लिए योगदान दे रही हैं। आज मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई मातृभाषा में करने की सुविधा हो गई है। इससे, भाषा के आधार पर अवसरों में होने वाले भेदभाव पर लगाम लग रही है।

साथियों,

युवा शक्ति का स्वस्थ, अनुशासित और आत्मविश्वास से भरे रहना उतना ही जरूरी है। जो देश खेलों को महत्व देते हैं, वहां के युवाओं में इन तीनों गुणों का तेजी से विकास होता है। इसलिए आज खेलों को राष्ट्र निर्माण की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जा रहा है। खेलो इंडिया यूथ गेम्स, यूनिवर्सिटी गेम्स, पैरा गेम्स और विंटर गेम्स जैसे आयोजनों ने देशभर के युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दिया है। आज देशभर में आधुनिक स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है, खेलो इंडिया सेंटर के माध्यम से सुविधाएं बढ़ रही हैं, गांवों से लेकर छोटे शहरों तक नई प्रतिभाओं की पहचान की जा रही है।

और साथियों,

आज इस अभियान के परिणाम भी साफ - साफ दिखाई दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का प्रदर्शन बेहतर होता जा रहा है। हमारे खिलाड़ी नए-नए कीर्तिमान बना रहे हैं, हमारी बेटियां देश का गौरव बढ़ा रही हैं।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी की तरह, हमें विवेका स्मारका, बड़े उद्देश्य के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है। ऐसे स्थान पर मैं हमारे युवाओं से कुछ आग्रह करना चाहता हूं।

साथियों,

मैसुरू को अक्सर भारत के सबसे स्वच्छ शहरों में स्थान मिला है। मैं इसके लिए यहां के लोगों को हृदय से बधाई देता हूं। क्या इस अवसर पर हम ये संकल्प ले सकते हैं, कि भविष्य में स्वच्छता के संकल्प को निरंतर मजबूत करते रहेंगे। हमें यहाँ की प्राकृतिक संपदाओं को संरक्षित करना चाहिए। हमें पर्यावरण से जुड़े संकल्प लेने चाहिए। हमें पानी की हर बूंद बचाने के लिए मिशन मोड में काम करना होगा।

साथियों,

आज ही यहां ‘वाल्मीकि रामायण’ के कन्नड़ा अनुवाद का विमोचन भी हुआ है। मैं कन्नड़ा भाषा से जुड़ी एक अपील भी करना चाहता हूं। कर्नाटका महान लेखकों और कवियों की धरती है। कन्नड़ा भाषी लोग हमेशा से पढ़ने की संस्कृति के लिए जाने जाते हैं। स्मार्टफोन के इस युग में इस स्वभाव को और बढ़ावा मिलना चाहिए। क्या हम युवा पीढ़ी को कन्नड़ा साहित्य से गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

साथियों,

मैसुरू अपने सिल्क, चंदन और हस्तशिल्प के लिए प्रसिद्ध है। जब भी हम किसी को उपहार दें, तो क्या हम ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि वो किसी भारतीय के हाथों और पसीने से बनी चीज हो? इससे हमारी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही, एक और परिवार को आर्थिक सहायता भी मिलेगी।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी ने जिस तरह के भारत का सपना देखा था, उसे पूरा करने का दायित्व आज की पीढ़ी पर है। मुझे विश्वास है, विवेका स्मारका इसके लिए एक ऊर्जा स्रोत का काम करेगा। मैं एक बार फिर, यहां एकत्र पूज्य संतजनों गुरू बंधुओं और मैसुरू के लोगों को नमन करते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं। आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।