Text of PM's address at Parivartan Rally in Muzaffarpur, Bihar

Published By : Admin | July 25, 2015 | 19:23 IST
Bihar must be free from unemployment and Goonda Raaj: PM
Bihar cannot go back to the era of loot and Jungle Raaj, says PM Modi
PM Modi urges people of Bihar to vote wisely and elect a stable BJP Government

भारत माता की जय

कुछ लोग दूसरी मंजिल पर हैं, कुछ लोग तीसरी मंजिल पर हैं, कोई गिर जाएगा तो मैं क्या जवाब दूंगा भैया। एक बार नई सरकार बनने दो आप और नई उंचाईयों पर पहुँचने वाले हो। विश्वास रखिये लेकिन अभी कम-से-कम नीचे उतर जाईये। मुझे चिंता रहेगी कुछ हो गया तो मैं बहुत दुखी हो जाऊंगा।

मंच पर विराजमान केंद्र सरकार में मेरे साथी, श्रीमान अनंत कुमार जी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, श्रीमान मंगल पांडेय जी, राज्य के पूर्व उप-मुख्यमंत्री, श्रीमान सुशील कुमार मोदी जी, विधानसभा के नेता, श्री नंद किशोर यादव जी, भाजपा के प्रभारी श्री भूपेन्द्र यादव जी, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी, श्रीमान राधामोहन सिंह जी, श्री रविशंकर प्रसाद जी, श्री धर्मेन्द्र प्रधान जी, श्रीमान राजीव प्रताप रूडी जी, श्रीमान गिरिराज जी, श्रीमान राम विलास पासवान जी, और हमारे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जिनका चेहरा सदाय हँसता रहता है, ऐसे हमारे जीतन राम मांझी जी, मेरे साथी, श्रीमान उपेन्द्र कुशवाहा जी, हम सबके मार्गदर्शक, हमारे सबसे पुराने वरिष्ठ नेता, डॉ. सी पी ठाकुर जी, हमारे पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, श्रीमान गोपाल नारायण जी, श्रीमान शकुनी चौधरी जी, सांसद श्री अरुण कुमार जी, पूर्व सांसद श्रीमान एम के सिंह, राज्य के पूर्व मंत्री डॉ. प्रेम कुमार जी। बिहार के कोना कोना से आईल हमार भाई और बहन लोग, तोहरा सबके शत शत प्रणाम।

जब मेरे से यहाँ इस कार्यक्रम के लिए समय माँगा गया, मैं कल्पना नहीं कर सकता था कि ऐसा हुजूम मुझे देखने को मिलेगा। जहाँ भी मेरी नज़र पहुँच रही है, माथे ही माथे नज़र आ रहे हैं और सबसे बड़ी बात मुझे जो आपका ज़ज्बा नज़र आ रहा है। सारे पॉलिटिकल पंडित ये एक कार्यक्रम देख लें नतीजा साफ दिखता है अगली सरकार किसकी बनने वाली है। भाईयों-बहनों, जब हम पहले सोशल मीडिया में कभी ट्वीट करते थे तो यहाँ के एक नेता बड़ा मज़ाक उड़ाते थे और वो कहते थे, चहकते हैं, चहकते हैं, और ये चहकना, बड़ा मखौल उड़ाते थे। आज उन्होंने भी चहकने का रास्ता पसंद कर लिया और आज जब मैं उतरा तो उन्होंने ट्वीट किया था कि 14 महीने के बाद आप बिहार आ रहे हैं, आपका स्वागत है। मुख्यमंत्री जी, स्वागत के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूँ। वक्त कैसे बदलता है और बदले हुए वक़्त का अंजाम कैसा होता है। वो भी एक वक़्त था, वो कहा करते थे कि हमारे पास एक मोदी है, दूसरे मोदी की क्या जरुरत है। बिहार में आपको आने की क्या आवश्यकता है। आप बिहार मत आईये और आज देखिये, अपनों का विरह कितना परेशान करता है अपनों की दूरी कैसी बेचैन बनाती है। पिछले दस साल के जो प्रधानमंत्री थे, वो दस साल में एक बार हवाई निरीक्षण करने आये थे और मेरा 14 महीने का विरह भी यहाँ के मुख्यमंत्री को परेशान कर रहा है, दुखी कर रहा है। एक-एक दिन कितना भारी गया होगा उनका। अपनों से जब इतना प्यार होता है, इतना लगाव होता है तो उनकी दूरी मुश्किल ही करती है। लेकिन आप चिंता मत कीजिये, मैं अब आ गया हूँ आपको अब ज्यादा विरह झेलना नहीं पड़ेगा।

भाईयों-बहनों, मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, आप जवाब दोगे, आपको लगता है बिहार में बदलाव होना चाहिए? हालात बदलने चाहिए? स्थिति बदलनी चाहिए? अंधेरे से उजाला होना चाहिए? बेरोजगारी से रोजगारी आनी चाहिए? गुंडागर्दी से मुक्ति चाहिए? सुख-शांति की जिंदगी चाहिए? भाईयों-बहनों, अगर ये चाहिए तो मुझे सेवा करने का अवसर दीजिए। मुझे आपकी सेवा करने का मौका दीजिए और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि देश की आजादी से बिहार के लोगों ने जो सपने सजोये हैं, मैं 60 महीने के भीतर आपको पूरे करके दूंगा। मैं आपको वादा करता हूँ हम जिम्मेवारी से भागने वाले लोग नहीं हैं, हम जिम्मेवारियों को लेने वाले लोग हैं। मैं कभी-कभार समझ सकता हूँ कि एकाध व्यक्ति के प्रति हमारी राजी-नाराजी हो, मैं यह भी समझ सकता हूँ कि किसी का चेहरा हमें पसंद न आता हो, मैं ये भी समझता हूँ कि हमारे राजनीतिक भविष्य में शायद कहीं टकराव नज़र आता हो, लेकिन भाई इतना मैं बुरा था तो एक कमरे में आकर के एक चांटा मर देते, गला घोंट देते। आपने एक व्यक्ति के प्रति गुस्से में आकर के पूरे बिहार की विकास यात्रा का गला घोंट दिया। क्या ये लोकतंत्र होता है? क्या लोकतंत्र के ये तौर-तरीके होते हैं? मैं समझता हूँ कि राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, राजी-नाराजी हो सकती है। अरे गुस्सा निकालने के लिए आकर के मेरा गला भी घोंट देते लेकिन मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि आपने हमारे साथ क्या किया। मुझे दुःख इस बात का है कि आपने बिहार की जनता के साथ क्या किया।

यहाँ के लोग जंगलराज से मुक्ति के लिए आपके पीछे खड़े हो गए, और आज फिर से आप बिहार को उसी जंगलराज की ओर घसीट रहे हो। आप मुझे बताईये मेरे भाईयों-बहनों, क्या बिहार में वो जंगलराज के दिन दोबारा चाहिए? वो मौत का खेल दोबारा चाहिए? ये गुंडागर्दी दोबारा चाहिए? ये लूट-खसोट चाहिए दोबारा? मेरे बिहार के भाईयों-बहनों को इस हालात में छोड़ा नहीं जा सकता और इसलिए भाईयों-बहनों, ये चुनाव किसकी सरकार बने, किसकी न बने, इसके लिए नहीं है। ये चुनाव बिहार के नौजवानों का भविष्य तैयार करने के लिए है, ये चुनाव बिहार के किसानों का भाग्य बदलने के लिए है, ये चुनाव बिहार की माताओं-बहनों की सुरक्षा के लिए है और इसलिए भाईयों-बहनों, विकास के रास्ते पर गए बिना बिहार का भला नहीं होगा। और इसलिए मैं आज आग्रह करने आया हूँ कि आप आईये, अपने हर किसी को आजमा लिया है, हर प्रकार के मॉडल आप देख चुके हो, एक बार हमें भी आजमा कर के देखो। एक बार हमारे एनडीए के मेरे साथियों को बिहार की जनता का सेवा करने का अवसर दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ आज देखिये, हमारी दिल्ली सरकार का जरा लेखा-जोखा लीजिये। मैं नहीं जानता हूँ कि यहाँ के पॉलिटिकल पंडितों ने कभी हिसाब लगाया है या नहीं। दिल्ली में मोदी की सरकार में सबसे ज्यादा मंत्री, सबसे महत्वपूर्ण मंत्री, सबसे महत्वपूर्ण डिपार्टमेंट अगर किसी के पास है तो मेरे इन बिहार के नेताओं के पास है। एक प्रकार से बिहार के नेता आज पूरे हिंदुस्तान को चला रहे हैं। ये ताकत बिहार को कहाँ से कहाँ ले जा सकती है, इसका आप अंदाज कर सकते हैं।

भाईयों-बहनों, आपने मुझे पांच साल के लिए चुनकर के भेजा है और बिहार ने तो भारी समर्थन किया है। मैं बिहार की जनता को शत-शत वंदन करता हूँ, आपने मुझे जो समर्थन दिया है। मुझे बताईये, जो लोग यह कहते रहे हैं कि हम मोदी को बिहार में घुसने नहीं देंगे, हम मोदी को बिहार आने नहीं देंगे, हमें मोदी की बिहार में जरुरत नहीं है, अगर ऐसे लोग सरकार बनाएंगे और केंद्र से कोई नाता ही नहीं रखेंगे तो बिहार का भला होगा क्या? क्या इस देश में एक सरकार दूसरी सरकार से लड़ती रहे? इससे किसी राज्य का भला होगा क्या? ये लड़ाई वाली सरकारें चाहिए या कंधे-से-कंधा मिलाकर चलने वाली सरकार चाहिए? भाईयों-बहनों, मैं दिल्ली में बैठकर के, जो भी पूरे देशभर में संसाधन है, एक बार सेवा का अवसर दीजिए आपके काम आते हैं कि नहीं आते, आप देख लीजिये।

मैं तो यहाँ हैरान हूँ मेरा जन्म गुजरात की धरती पर हुआ था। द्वारकाधीश गुजरात में है, भगवान श्रीकृष्ण गुजरात के लोगों के आराध्य हैं। यदुवंश की उत्तम परंपरा को निभाने का काम गुजरात की धरती पर सदियों से होता आया है लेकिन हम जिस कृष्ण के पुजारी हैं, मैं जरा पूछना चाहता हूँ, मुझे श्रीकृष्ण की एक बात बराबर याद रहती है जब वो बालक थे और कालीनाग के कारण लोग परेशान थे तो बालक कृष्ण ने ताकत दिखाकर के कालीनाग का शिरच्छेद कर दिया था। कालीनाग को ख़त्म किया था कि नहीं किया था और आज यदुवंश की बातें करने वाले लोग रो रहे हैं कि उन्हें जहर पीना पड़ रहा है। अरे कृष्ण का वंशज जहर पीता नहीं, बल्कि कालीनाग के वंश को ही ख़त्म कर देता है। यही तो उसकी ताकत होती है और आपने तो जहर पीया क्योंकि आपका स्वार्थ है। अपने बेटे-बेटियों के लिए आपको कुछ इंतजाम करना है लेकिन आपने सभी यदुवंशियों को जहर पीने के लिए मजबूर क्यों किया? उनको जहर पीने के लिए मजबूर क्यों किया? क्या गुनाह है उनका? और इसलिए मैं तो हैरान हूँ, अख़बारों में पढ़ते हैं, यहाँ पर क्या चर्चा चल रही है, यहाँ के किसानों का भला होगा कि नहीं होगा, चर्चा नहीं हो रही है; नौजवानों को रोजगार मिलेगा कि नहीं मिलेगा, चर्चा नहीं हो रही है; गुंडागर्दी खत्म होगी कि नहीं होगी चर्चा नहीं हो रही है; उद्योग-कारखाने लगेंगे कि नहीं लगेंगे, चर्चा नहीं हो रही है; गाँव में बिजली आएगी कि नहीं आएगी, चर्चा नहीं हो रही है; किसानों को पानी मिलेगा कि नहीं मिलेगा, चर्चा नहीं हो रही है। चर्चा क्या हो रही है, कौन सांप है, कौन सांप नहीं है, कौन जहर पीता है, कौन जहर पिलाता है। अरे भाई ये तुम दोनों तय कर लो कि सांप कौन है, जहर कौन है, कौन जहर पिलाता है, कौन जहर पीता है। आप दोनों का अंदरूनी मामला है एक कमरे में बैठकर के तय कर लो। बिहार की जनता को जहर पीने के लिए मजबूर मत करो। ये आपको अंदरूनी मामला है बिहार की जनता को तो पीने का पानी चाहिए। बिहार के नौजवान को रोजगार चाहिए। बिहार में उद्योगों का विकास चाहिए। बिहार में सड़कें चाहिए।

भाईयों-बहनों, बिहार में चुनाव तो अब आया है। ये पिछले चुनाव में जब वोट लेने निकले थे, अभी राम विलास जी बता रहे थे, उन्होंने अपने भाषण में भी कहा। उन्होंने आपको कहा था कि 2015 में अगर मैं आपको बिजली न पहुंचाऊं तो मैं वोट मांगने के लिए नहीं आऊंगा ऐसा कहा था? याद करो कहा था? बिजली नहीं दूंगा तो वोट नहीं मांगूंगा, ऐसा कहा था? उन्होंने कहा था ना? बिजली आई? बिजली आई? नहीं आई न, वो वोट मांगने आये कि नहीं आये? आपका भरोसा तोड़ा कि नहीं तोड़ा? आपकी पीठ में छूरा भोंका कि नहीं भोंका? अरे हमारी छोडो, आपकी पीठ में छूरा भोंकना जिन लोगों के कारनामे रहे हैं, ऐसे लोगों पर दोबारा भरोसा नहीं किया जा सकता। और इसलिए भाईयों-बहनों, मैं आज आपसे आग्रह करने आया हूँ, बिहार का भाग्य बदलने के लिए। बिहार के पास न सिर्फ़ बिहार का भाग्य बदलने का बल्कि पूरे हिंदुस्तान का भाग्य बदलने की ताकत है। इतने प्राकृतिक संसाधन हैं, इतने उत्तम प्रकार का मानव बल है, इतनी महान शक्ति का स्त्रोत है। जो सदियों पहले पूरा देश जिस धरती के लिए गर्व करता था, उस धरती के संतानों में आज भी वो ताकत है हिंदुस्तान को गर्व दिलाने की और इसे मुझे पुनः वापस लाना है और इसलिए मैं आपके पास आया हूँ।

भाईयों-बहनों, ये सब परेशानियां ज्यादा-से-ज्यादा 100 दिन हैं। 100 दिन के बाद बिहार की जनता इनकी छुट्टी कर देगी। बिहार की जनता अब इस प्रकार के लोगों को कभी स्वीकार नहीं करेगी। मैं तो हैरान हूँ। एक बार मैं पटना आया था। हमारी पार्टी की कार्यसमिति की मीटिंग थी और यहाँ के मुख्यमंत्री ने हमको खाने पर बुलाया था। अब हमारी थाली उन्होंने छीन ली। भोजन पर बुला कर के कभी कोई थाली छीन लेता है क्या? ये लालू जी कह रहे हैं, मैं आज जहर पी रहा हूँ, मैंने तो उस दिन भी जहर पीया था और तब मेरे मन को जरा चोट पहुंची थी। क्या राजनीति में इतनी छुआछूत? सार्वजनिक जीवन के ये संस्कार कि टेबल पर परोसी हुई थाली खींच लेना, मेरे मन को बड़ी चोट पहुंची थी, मैंने कभी बोला नहीं न ही मैंने कभी मन में इसका मलाल रखा, चलो ठीक है भाई लेकिन जब जीतन राम मांझी पर जुल्म हुआ तो मैं बेचैन हो गया। मुझे लगा कि अरे मोदी की क्या औकाद है, उसकी तो थाली खींच ली, एक चाय वाले के बेटे की थाली खींच लें, एक गरीब के बेटे की थाली खींच लें लेकिन एक महादलित की तो सारी की सारी पूँजी ले ली, सारा पुण्य खींच कर के ले लिया। भाईयों और बहनों, तब मुझे लगा कि शायद डीएनए में ही कुछ गड़बड़ है क्योंकि लोकतंत्र का डीएनए ऐसा नहीं होता है। लोकतंत्र का डीएनए अपने विरोधियों को भी आदर और सत्कार देने का होता है लेकिन इन्होंने जो लोकतंत्र सीखा और चलाया है, उसमें जॉर्ज फ़र्नान्डिस का क्या हुआ? इसी धरती से जुड़े थे, उनके साथ क्या किया गया? सुशील मोदी जो कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे उनके साथ क्या किया? ये सारे नेता जो कभी न कभी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले, उनके साथ क्या किया? क्या आप अब भी लोकतंत्र के इस डीएनए को नहीं समझ पाएंगे क्या? क्या ऐसे लोगों को माफ़ करेंगे क्या?

भाईयों-बहनों, और इसलिए आज मैं आग्रह से कहने आया हूँ कि बिहार को हम ऐसे तत्वों के भरोसे नहीं छोड़ सकते। बिहार में दोबारा जंगलराज नहीं आने देंगे ये बिहार की जनता को शपथ लेनी चाहिए। आरजेडी का पूरा अर्थ मालूम है क्या? आरजेडी का पूरा अर्थ मालूम है क्या? आरजेडी का पूरा अर्थ होता है – रोजाना जंगलराज का डर, आरजेडी का मतलब होता है – रोजाना जंगलराज का डर। क्या ये रोजाना जंगलराज का डर चाहिए आपको? इस डर से मुक्ति चाहिए कि नहीं चाहिए? और इसलिए भाईयों-बहनों, ये चुनाव रोजाना जंगलराज के डर से मुक्ति का चुनाव है और इसलिए मैं यह कहने आया हूँ। आप देखिये पहले भी सरकारें हुईं, बिहार के साथ क्या हुआ है और हम बिहार के साथ क्या करेंगे। आज मैं अनेक कार्यक्रमों का उद्घाटन करके आया हूँ, शिलान्यास करके आया हूँ, हज़ारों-करोड़ की सौगात बिहार की धरती को देकर के आया हूँ।

भाईयों-बहनों, एक झूठ फैलाया जा रहा है तेरहवें फाइनेंस कमीशन और चौदहवें फाइनेंस कमीशन के संबंध में। 2010 से 2015, किसकी सरकार थी आपको मालूम है, उस सरकार ने बिहार को फाइनेंस कमीशन के माध्यम से जो पैसा दिया, वो था करीब-करीब ढेढ़ लाख करोड़। अब 2015 से 2020, हमारी बारी है, हमने क्या देना तय किया, पौने चार लाख करोड़ रुपये। पहले क्या मिलता था - ढेढ़ लाख करोड़, अब कितना मिलेगा - पौने चार लाख करोड़ रुपये। बिहार की जनता की झोली में पौने चार लाख करोड़ रुपये आएंगे। मुझे बताईये कि विकास के काम आगे बढ़ेंगे कि नहीं बढ़ेंगे? इन्होने वादा किया था कि बिजली नहीं तो वोट नहीं। उन्होंने तो कुछ किया नहीं और न कभी मेरे पास आकर के कहा। लेकिन मेरी सरकार बनने के बाद मैं जब विदेश यात्रा के लिए गया तो सबसे पहले मैं भूटान गया। बहुत छोटा देश है बिहार से तो बहुत कम आबादी है, बहुत कम पटना से भी कम। भूटान में जाकर कौन सा करार किया – भूटान के अन्दर भारत सरकार धन लगाएगी और पानी से पैदा होने वाली बिजली, जल विद्युत् के लिए करार किया, शिलान्यास किया और इस तरह भूटान में जो बिजली पैदा होगी, उसका सबसे ज्यादा हिस्सा ये मेरी बिहार की जनता को मिलेगा। ये निर्णय हमने किया और सरकार बनने के बाद मेरी पहली विदेश यात्रा में हमने यह काम किया। दूसरी विदेश यात्रा मेरी नेपाल की थी। नेपाल में भी जल विद्युत् का करार किया और वहां से बिजली बन करके कहाँ आएगी, इसी इलाके में आएगी। मुझे बताईये, आज इतना बड़ा बिहार, 300 मेगावाट बिजली के भी आप मालिक नहीं हो जबकि आपको 5000 मेगावाट बिजली की जरुरत है। इन सरकारों ने केवल 300 मेगावाट बिजली बनाई है, बाकि बिजली ये बना पाएंगे क्या? इतने सालों में जो बिजली नहीं दे पाए, वो अब दे पाएंगे क्या? मैं वादा करता हूँ, मेरा अनुभव है और मैंने करके दिखाया है। मैं बिहार में 24 घंटे घरों में बिजली देने का वादा करने आया हूँ। और बिजली आती है तो अकेली बिजली नहीं आती। बिजली आती है तो सिर्फ़ घर में रोशनी आती है, ऐसा नहीं है। बिजली आती है तो इसके साथ जीवन बदलना शुरू हो जाता है। अगर बच्चों को पढ़ाई करनी है, कंप्यूटर सीखना है तो बिजली आने के साथ वो भी शुरू हो जाता है। अरे मोबाइल फ़ोन चार्ज करना हो तो भी दूसरे गाँव जाना पड़ता है। जाना पड़ता है ना? मोबाइल फ़ोन कितना ही महंगा क्यों न लाए हो लेकिन आपके काम नहीं आता है क्योंकि पटना में बैठी हुई सरकार आपको बिजली नहीं देती है। मुझे बताईये, आपको भी अच्छे टीवी शो देखने का मन करता है कि नहीं करता है? सास भी कभी बहू थी, देखने को मन करता है कि नहीं करता है; टीवी पर अच्छे गाने सुनने का मन करता है कि नहीं करता है? अगर बिजली नहीं होगी तो कहाँ से देखोगे? इन्होने आपको पिछली सदी में धकेल करके रखा है। बिहार को उन्होंने आधुनिक नहीं बनने दिया है। बिजली आएगी, कारखाने लगेंगे। हम कारखाने लगाना चाहते हैं, हम उद्योग लगाना चाहते हैं।

आज बिहार का एक संतान, एक युवा मेरी सरकार में मंत्री है और मैंने उसे इतना बड़ा काम दिया है, स्किल डेवलपमेंट का। ये स्किल डेवलपमेंट बिहार का भाग्य बदलने वाला है, यह मैं आपको कहने आया हूँ। यहाँ उद्योग लगे, यहाँ के नौजवानों का स्किल डेवलपमेंट हो और यहाँ का जीवन बदल जाए, बिहार के नौजवान को बिहार में अपने बूढ़े मां-बाप को छोड़कर रोजी-रोटी कमाने कहीं जाना न पड़े, ऐसा बिहार बनाने का मेरा इरादा है और उसके लिए मुझे आपको आशीर्वाद चाहिए और वो आशीर्वाद लेने के लिए मैं आया हूँ। भाईयों-बहनों, आज वक़्त इतना बदल चुका है, रोड कनेक्टिविटी चाहिए, रेल कनेक्टिविटी चाहिए, एयर कनेक्टिविटी चाहिए। लेकिन अब जैसे-जैसे युग बदला है लोग कहते हैं हमें तो गैस ग्रिड चाहिए। चाहिए कि नहीं चाहिए? सूरत में मेरे यहाँ बिहार के लोग रहते हैं, वो जब यहाँ वापिस आते हैं तो यहाँ झगड़ा होता है जब वो कहते हैं कि जैसे यहाँ नलके में पानी आता है ना वैसे गुजरात में नलके में गैस आता है। यहाँ के लोग भरोसा नहीं करते। बिहार के लोग जब मुझे मिलते है तो बताते हैं कि मोदी जी मेरे गाँव के लोग तो मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि ऐसा भी होता है। बिहार के भाईयों-बहनों, वो दिन अब दूर नहीं है जब मैं पटना तक शुरुआत करूँगा और सैंकड़ों किमी गैस की लंबी पाइपलाइन लगा करके पटना में घरों में गैस देना प्रारंभ कर दूंगा और आगे बिहार के और स्थानों पर भी गैस जाएगा। रसोईघर में टैब चालू करते ही गैस आएगा। अब गैस का सिलिंडर लेने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। किसी दलाल को पैसा नहीं देना पड़ेगा। ये काम हम करते हैं और हजारों करोड़ रूपया लगता है इन कामों के लिए। आज मैं इसका शिलान्यास करके आया हूँ। काम शुरू हो जाएगा, बजट मंजूर कर दिया है। आपके यहाँ बरौनी में फ़र्टिलाइज़र का कारखाना बंद पड़ा हुआ है। यहाँ के नौजवानों को रोजगार चाहिए कि नहीं चाहिए? रोजगार मिलने चाहिए कि नहीं मिलने चाहिए? अगर कारखाने नहीं होंगे तो रोजगार कहाँ से मिलेगा और इसलिए हमने उस फ़र्टिलाइज़र का कारखाना, जो बंद पड़ा था, उसको चालू करने का निर्णय किया है ताकि यहाँ के किसानों को सस्ता खाद मिल जाए और यहाँ के नौजवान को रोजगार मिल जाए। और करीब 5 हजार करोड़ रूपया लगने वाला है, कोई कम पैसा नहीं है यह।

भाईयों-बहनों, कुछ लोग होते हैं जो वादे की खातिर वादे करते हैं, फिर वादे भुला देने की कोशिश करते हैं और इनको वादे की याद दिला दें तो मुकर जाने की आदत रहती है। जैसे आपको कहा गया था कि बिजली दूंगा तभी तो वोट मांगने आऊंगा। मैं भी चुनाव के समय यहाँ आया था। मैंने भी वादे किये थे लेकिन मैं वादे भुलाने के लिए नहीं आया हूँ। मैंने जो वादे किये थे, उन वादों को मैं खुद दोबारा याद करने यहाँ आया हूँ और मुकर जाने का तो सवाल ही नहीं उठता है। लोकसभा के चुनाव में पटना की धरती पर जब बम धमाके चल रहे थे, लोग मौत के घाट उतार दिये जा रहे थे, हिंसा के मातम से लोकतंत्र का गला दबोचा जा रहा था, उस समय बम धमाकों के बीच डरे बिना, विचलित हुए बिना, गुस्सा व्यक्त किये बिना, नाराजगी व्यक्त किये बिना पूरे शांत मन से उस सभा को मैंने संबोधित किया था। मौत अंगड़ाई ले रहा था उस मैदान में, लेकिन पूरी स्वस्थता के साथ मैंने बिहार की जनता से संवाद किया था और ऐसे संकट की घड़ी में भी मैंने कहा था कि दिल्ली में जब हमारी सरकार बनेगी और जब पूरी योजना बनने लगेगी, हम बिहार को 50 हजार करोड़ रुपये का पैकेज देंगे। आपको याद है, नहीं है न? मैंने ये वादा किया था और आज जब मैं बिहार की धरती पर आया हूँ तो मैं आपको मैं कहता हूँ, वो वादा मैं निभाऊंगा और सिर्फ़ 50 हजार करोड़ से बात बनेगी नहीं अब तो क्योंकि दिल्ली सरकार में बैठने के बाद बिहार को मैंने बारीकी से अध्ययन किया है। बिहार में क्या अच्छा हो सकता है, उस पर मैं सोचने लगा, बिहार के सभी नेताओं से बातचीत करने लगा, सुझाव लेने लगा और मेरे मन में धीरे-धीरे एक समृद्ध बिहार का चित्र बनने लगा, एक विकास वाले बिहार का चित्र खड़ा होने लगा। मुझे लगा ये अगर सपना मुझे पूरा करना है तो 50 हजार करोड़ से पूरा नहीं होगा और इसलिए मैंने उससे भी ज्यादा बड़ा पैकेज देने का विचार कर लिया है। लेकिन अभी पार्लियामेंट चालू है मेरे जुबान पर थोड़ा ताला लगा हुआ है। मैं बोल नहीं पा रहा हूँ लेकिन जैसे ही पार्लियामेंट समाप्त हो जाएगी, मैं आपको खुद आकर बता दूंगा कि कितना बड़ा पैकेज आपको मिलने वाला है।

आजकल कुछ ऐसे झूठ फैलाये जाते हैं, किसी ने हमसे माँगा नहीं था लेकिन जब बजट आया तो हमारा सपना था बिहार को आगे ले जाने का, बिहार में औद्योगिक क्रांति लाने का, बिहार के नौजवानों को रोजगार मिले, इसलिए हमने बजट के अन्दर एक योजना बनाई स्पेशल स्टेटस वाला राज्य, उसमें सबसे फायदा होने वाली बातें कौन सी हैं और हमने पाया कि स्पेशल स्टेटस में दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें हैं। हमने तय किया कि जो सबसे बड़ा फायदा है, वो बिहार को मिलना चाहिए और इसलिए हमने बिहार के लिए, नए इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट करने के लिए 15% इन्वेस्टमेंट अलाउंस और 15% का एडिशनल डेप्रिसिएशन अलाउंस इसमें रिडक्शन की हमने घोषणा कर दी और मैं समझता हूँ कि हिंदुस्तान में स्पेशल केटेगरी का इतना बड़ा लाभ, बिहार अगर दम हो तो ले सकता है। कितना बड़ा लाभ मिलेगा, इसका आप अंदाज कर सकते हो। बिहार के नौजवानों को कितना रोजगार मिल सकता है, इसका आप अंदाज कर सकते हो।

भाईयों-बहनों, अभी तो ये शुरुआत है लेकिन मैं जो ये नजारा देख रहा हूँ इससे मुझे साफ लगता है कि जैसे लोकसभा में अपने मेरा साथ दिया, विधानसभा में उससे भी बढ़कर आप मेरा साथ दोगे। बिहार में इस बार आप निर्णय कर लीजिये कि दो-तिहाई बहुमत के साथ ही सरकार बनाएंगे। दो-तिहाई बहुमत के साथ ही एक मजबूत सरकार बनाईये। मुझे बताईये कि किसी ट्रेक्टर को एक इंजन लगा हो तो ज्यादा तेज चलता है कि दो इंजन लगा हो तो ज्यादा तेज चलता है? बताईये, कितने इंजन चाहिए? आपने दिल्ली में तो आपने इंजन दे दिया है अब बिहार में इंजन दे दीजिए। दो इंजन से बिहार की गाड़ी ऐसी तेज चलेगी भाईयों कि पिछले 60 सालों में जो नहीं हुआ, वो तेज गति से हमारी विकास की यात्रा आगे बढ़ेगी। इसी एक संकल्प के साथ मैं एक बार फिर एनडीए के मेरे सभी साथियों का हृदय से अभिनन्दन करता हूँ और बिहार का भाग्य बदलेगा इस विश्वास के साथ आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।                  

Explore More
ଶ୍ରୀରାମ ଜନ୍ମଭୂମି ମନ୍ଦିର ଧ୍ଵଜାରୋହଣ ସମାରୋହରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଅଭିଭାଷଣ

ଲୋକପ୍ରିୟ ଅଭିଭାଷଣ

ଶ୍ରୀରାମ ଜନ୍ମଭୂମି ମନ୍ଦିର ଧ୍ଵଜାରୋହଣ ସମାରୋହରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଅଭିଭାଷଣ
PM Modi Praises Farmers For Taking India's Rich Mango Heritage To Global Markets

Media Coverage

PM Modi Praises Farmers For Taking India's Rich Mango Heritage To Global Markets
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
In the National Senior Athletics Federation Competition held in Ranchi, Jharkhand, four national records were broken in four different events: PM Modi
My dear countrymen, it is very hot in most parts of the country right now. Strong sun, hot winds, it is very important to take care of yourself in such weather: PM Modi
Sattu sherbet in Bihar, Jharkhand and Eastern Uttar Pradesh is simply amazing – it fills the stomach and provides strength: PM Modi
Service doesn't require vast resources - what's needed is a good intent and consistent effort: PM Modi
In a special ceremony held in the Netherlands, ancient copper plates from the Chola period were returned to India: PM Modi
Astronomy has aroused curiosity in every generation in our country. It has inspired exploration; a lot of enthusiasm is visible in today’s youth: PM Modi
Dolphin rescue ambulance has been designed like a mobile hospital. It has arrangements for keeping the dolphin safe: PM Modi
Friends, when we save the Gangetic dolphin, we don't just save a species; we save the biodiversity of the Ganga: PM Modi
Girija Amma ji’s patriotic spirit inspires every Indian. Inspired by 'Mann Ki Baat', she pledged to contribute to many soldiers in the country: PM Modi

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ନମସ୍କାର ।

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ପୁଣିଥରେ ଆପଣମାନଙ୍କ ସହ ଯୋଡ଼ିହୋଇ ମୋତେ ବହୁତ ଖୁସି ଲାଗୁଛି । ଦେଶର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳରେ ଆମ ଦେଶର ଲୋକେ ଦେଶ ହିତ, ସମାଜର ହିତ ପାଇଁ ଏଭଳି ଚମତ୍କାର କରୁଛନ୍ତି ଯେ ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଶୁଣିଲେ ଆମକୁ ନୂତନ ପ୍ରେରଣା ମିଳୁଛି । ଆଜିର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଆରମ୍ଭ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସରେ ଦେଶର ଏଭଳି ଗୋଟିଏ ଉପଲବ୍ଧିରୁ କରୁଛି । କିଛିଦିନ ପୂର୍ବେ ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡର ରାଞ୍ଚିରେ ଜାତୀୟ ସିନିୟର ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଫେଡେରେସନ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୋଇଥିଲା । ଏଥିରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ପ୍ରାୟ ୮୦୦ ଖେଳାଳି ଅଂଶଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ । ଏଥିରେ ଚାରୋଟି ଭିନ୍ନ ଇଭେଣ୍ଟରେ ଚାରୋଟି ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ସିଂ, ବିଶାଳ ଟିକେ, ତେଜସ୍ୱୀନ ଶଙ୍କର, ଦେବ୍ ମୀଣା ଏବଂ କୂଲଦୀପ କୁମାର । ଏହି ବନ୍ଧୁମାନେ ବିଭିନ୍ନ ଶ୍ରେଣୀରେ ନୂତନ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କଲେ । ସର୍ବପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗୋଟିଏ ଘଟଣା, ଯାହା ସାରାଦେଶରେ ଚର୍ଚ୍ଚିତ ହୋଇଛି ତାହା ହେଉଛି ୧୦୦ ମିଟର ରେସ୍ । ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତା । ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ପୁରୁଷ ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଯେଉଁ ଦୁଇ କ୍ରୀଡ଼ାବିତ୍ ଏହି ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଲେ ସେମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ଗୁରିନ୍ଦରବୀର୍ ସିଂ ଏବଂ ଅନିମେଷ କୁଜୁର । ମୁଁ ଭାବିଲି, ଏଥର ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହି ଦୁଇ ଖେଳାଳିଙ୍କ ସହ କଥା ହେବା ।

(ଫୋନ୍ କଲ୍)

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ: ଅନିମେଷ ଜୀ ନମସ୍କାର । ଗୁରୀନ୍ଦରବୀର ଆପଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନମସ୍କାର । ସତଶ୍ରୀ ଅକାଲ୍ ।

ଅନିମେଷ, ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର, ନମସ୍କାର ସାର ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଚ୍ଛା ଭାଇ ଆପଣମାନେ ତ ବହୁତ ବଡ଼ ଉପଲବଧି ହାସଲ କରିଛନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ଯୋଡ଼ି ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି । ଆମେ ସଙ୍ଗୀତରେ ତ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ଦେଖିଥିଲୁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ତ ଆହ୍ୱାନରେ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ହେଉଛି । ଜଣେ ଗୋଟିଏ ଆହ୍ୱାନ ଦେଉଛି, ଅନ୍ୟ ଜଣକ ଏହାକୁ ଗ୍ରହଣ କରୁଛି । ପୁଣି ତୃତୀୟ ଥର ହେଉଛି । ଆପଣଙ୍କ ବିଷୟଟି ଖୁବ୍ କୌତୁହଳପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଚାହୁଁଛି ଯେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ଆପଣମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣନ୍ତୁ । ଆପଣମାନେ କରିଦେଖାଇଥିବା ପରାକ୍ରମ ସମ୍ପର୍କରେ ଜାଣନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର ନମସ୍କାର । ମୋ ନାଁ ଅନିମେଷ କୁଜୁର୍ । ମୁଁ ୨୦୦ ମିଟର ଓ ୪୦୦ ମିଟରର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡଧାରୀ ଏବଂ ମୁଁ ଛତିଶଗଡ଼ର ବାସିନ୍ଦା ଆଉ ଏବେ ମୁଁ ଓଡ଼ିଶା ତରଫରୁ ଖେଳୁଛି । ଗତବର୍ଷ ମୁଁ ଏସୀୟ ପଦକ ଆଉ ବିଶ୍ୱ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ ଖେଳ ପଦକ ପାଇଥିଲି ଆଉ ସ୍କୁଲ ଛାଡ଼ିବା ପରେ ୨୦୨୧ରେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ସ୍କୁଲରୁ ପାସ୍ କରିଥିଲି । ମୁଁ ସୈନିକ ସ୍କୁଲ ଅମ୍ବିକାପୁରରୁ ପାସ୍ କରିଛି ଆଉ ଆଗରୁ ମୁଁ ଫୁଟବଲ ଖେଳୁଥିଲି । ମୋ ବାପା ମା’ କୋଭିଡ୍ ସମୟରେ ମୋତେ ଖେଳକୁଦ ପାଇଁ ଟିକିଏ ଅନୁମତି ଦେଉଥିଲେ କି ମୁଁ ଟିକେ ବାହାରେ ଯାଇ ଖେଳାବୁଲା କରିବି । କୋଭିଡ୍ ସରିବା ପରେ ମୋ ସହିତ ଫୁଟବଲ୍ ଖେଳୁଥିବା ସାଙ୍ଗମାନେ ମୋତେ କହିଲେ ଯେ, “ରାଜ୍ୟ ସମ୍ମିଳନୀ ହେଉଛି, ତୁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କର” ଆଉ ମୁଁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କଲି, କିନ୍ତୁ ସେଠି ଜାତୀୟ ସ୍ତର ପାଇଁ ଚୟନ ହେବ ସେକଥା ମୁଁ ଜାଣିନଥିଲି । ସେଠୁ ମୁଁ ଜାତୀୟକୁ ସିଲେକ୍ଟ ହେଲି ଆଉ ଆଜି ମୁଁ ଆନ୍ତର୍ଜାତିକ ସ୍ତରରେ ଭାରତର ପ୍ରତିନିଧିତ୍ୱ କରୁଛି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଉ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଜୀ ? ଆପଣଙ୍କ ଖବର କ’ଣ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର୍ । ମୋ ନାଁ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଆଉ ମୁଁ ଭାରତୀୟ ନୌସେନାର ଜଣେ Patty Officer। ମୁଁ ଭାରତର ସବୁଠାରୁ ଦ୍ରୁତ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟର । ଏଥର ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟରରେ ୧୦.୦୯ର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କରିଛି । ୧୦.୧୦ର ସୀମା ତଳକୁ ଯିବାରେ ମୁଁ ପ୍ରଥମ ଭାରତୀୟ । ମୁଁ ଉଭୟ ଟ୍ରାକ୍ ଓ ୟୁନିଫର୍ମରେ ନିଜ ଦେଶର ସେବା କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛି । ମୋ ବାପା ଓ ଜେଜେବାପା ଦୁହେଁ ଖେଳାଳି ଥିଲେ । ଆମ ଭାରତୀୟ ସଂସ୍କୃତିରେ ପର୍ବପର୍ବାଣୀ ଯେମିତିକି ଦୀପାବଳୀ, ନୂଆବର୍ଷ ଆଦି ସମୟରେ ଆମେ ନିଜ ଘରକୁ ସଫାସୁତୁରା କରିଥାଉ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ମୋ ବାପାଙ୍କ ଟ୍ରଫି ଓ ମେଡ଼ାଲଗୁଡ଼ିକ ମୁଁ ସଫା କରୁଥିଲି ମୋତେ ବହୁତ ଭଲ ଲାଗୁଥିଲା । ମୁଁ ବହୁତ ଖୁସି ହେଉଥିଲି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ କୌଣସି ଟ୍ରଫି ବା ମେଡାଲ ସଫା କରୁଥିଲି କିମ୍ବା କୌଣସି ଫଟୋ ଦେଖୁଥିଲି ତାହା ବିଷୟରେ ମୁଁ ବାପାଙ୍କୁ ପଚାରୁଥିଲି ସେତେବେଳେ ସେ ତାଙ୍କ କାହାଣୀ ଶୁଣାଉଥିଲେ । “ମୁଁ ସେଠିକି ଖେଳିବାକୁ ଯାଇଥିଲି । ସେଇଠି ମୁଁ ଏହି ଜାତୀୟ ପଦକ ପାଇଲି, ଏଥିରେ ମୁଁ ମୋ ଦଳକୁ ଜିତାଇଥିଲି ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ମୁଁ ବି କିଛି ଗୋଟେ ଖେଳ ଖେଳିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ସେ ସକାଳୁ ସକାଳୁ ଦୌଡ଼ିବାକୁ ଯାଉଥିଲେ । ମୋତେ ତାଙ୍କ ସାଙ୍ଗରେ ନେଇଯିବାକୁ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଲି । ସେ ମୋତେ ବି ସାଙ୍ଗରେ ନେବା ଆରମ୍ଭ କରିଦେଲେ । ଖେଳ ବିଷୟରେ ସେ ଯାହାସବୁ ଶିଖିଥିଲେ ସେସବୁ ସେ ମୋତେ ଶିଖାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ । ତେଣୁ ମୋର ଆଗ୍ରହ ବଢ଼ିଚାଲିଲା । ମୁଁ ଉସେନ ବୋଲ୍ଟଙ୍କର ବିଶ୍ୱରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବା ଦେଖିଲି । ଗୋଟିଏ କୌତୁକିଆ କାହାଣୀ ରହିଛି । ଥରେ ମୁଁ ଟିଭି ଦେଖୁଥିଲି, ମା’ ଟିଭି ବନ୍ଦ କରି କହିଲେ “ପୁଅ, ପାଠ ପଢ଼ିବା ସମୟ ହେଲାଣି, ତୁ ପାଠ ପଢ଼ ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଥିଲି ଯେ ଆପଣ ସିନା ମୋତେ ଟିଭି ଦେଖିବାକୁ ଦେଉନାହାଁନ୍ତି କିନ୍ତୁ ଦିନେ ଆପଣ ଟିଭିରେ ମୋତେ ଖୋଜି କହିବେ ହେଇ ଦେଖ ଗୁରିନ୍ଦର ଦୌଡ଼ୁଛି । ତେଣୁ ମୋ ମା’ ଯେତେବେଳେ ଟିଭି ପରଦାରେ ମୋତେ ଦୌଡ଼ୁଥିବା ଦେଖନ୍ତି ସେତେବେଳେ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଖୁସି ଲାଗେ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବାଃ ବାଃ ବାଃ । ଆପଣଙ୍କ କଥା ତ ବଡ଼ ଚମତ୍କାର!

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ହଁ ସାର୍ । ଆମର ହେଉଛି ଏକ ମଧ୍ୟବିତ୍ତ ପରିବାର, ମୋ ବାପା ଭଲିବଲ ଖେଳୁଥିଲେ ହେଲେ ଘରର ସମସ୍ୟାଗୁଡ଼ିକ ଯୋଗୁଁ ସେ ନିଜର ଖେଳାଖେଳି ଛାଡ଼ିଦେଲେ । ତାଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନ ଅସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ରହିଗଲା । ତେଣୁ ସେ ମୋ ଭିତରେ ସେହି ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିଲେ ଯେ, ସେହି ସ୍ୱପ୍ନକୁ ମୋ ପୁଅ ପୂରଣ କରିବ । ମୁଁ ତାଙ୍କ ସହିତ ଅନେକ ଥର କଥା ହୋଇଥିଲି । ତାଙ୍କଠୁ ଶୁଣୁଥିଲି ମିଲଖା ସିଂ କେତେ ପରିଶ୍ରମ କରୁଥିଲେ, ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ଦିନେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନକୁ ପୂରଣ କରିବି । ସେତେବେଳେ ସେ କହୁଥିଲେ ଯେ ସ୍ୱପ୍ନ ସେମିତି ପୂରଣ ହୋଇଯାଏନି, ତାହାପାଇଁ କଠିନ ପରିଶ୍ରମ କରିବାକୁ ପଡିଥାଏ । ମିଲଖା ସିଂ ଜୀ ରକ୍ତବାନ୍ତି କରୁଥିଲେ, ଖରାରେ ଦୌଡ଼ୁଥିଲେ । ଦିନସାରା ତାଲିମ ନେଉଥିଲେ । ଏହି କଥାଗୁଡ଼ିକ ମୋତେ ପ୍ରେରିତ କରୁଥିଲା । ମୋ ବାପା ମୋତେ ପ୍ରେରଣା ଦେଉଥିଲେ ଯେ, ଏହାଦ୍ୱାରା ମୁଁ ମୋ ଦେଶ ପାଇଁ ପଦକ ଆଣିପାରିବି । ଆଉ ପୁଣି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟର ରେସକୁ ନିଜ ଇଭେଣ୍ଟ ଭାବେ ଚୟନ କଲି ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତେ ମୋତେ ସେଥିପାଇଁ ମନା କରି କହିଥିଲେ ଯେ ୧୦୦ ମିଟର ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଇଭେଣ୍ଟ ନୁହେଁ । ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ୧୦୦ ମିଟର ପାଇଁ ତିଆରି ହୋଇନାହିଁ । ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଉ ମୋ ବାପା କହୁଥିଲୁ ଯେ, ଏବେ ଗୁରିନ୍ଦର ଆଉ ମୁଁ ଏହାକୁ ବାଛିଛୁ ଆଉ ଏଥିରେ ପଛଘୁଞ୍ଚା ଦେବାର ନାହିଁ । ଆମେ ଯାହାକୁ ଅସମ୍ଭବ ବୋଲି ଭାବୁଛୁ ତାହା ଆମେ କରି ଦେଖାଇବୁ । ବାପା କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହା କରି ଦେଖାଇବୁ, ତୋ ଉପରେ ମୋର ବିଶ୍ୱାସ ରହିଛି । ବାପା ଯେତେବେଳେ ମୋ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ କଲେ ତାଙ୍କର ସେହି ବିଶ୍ୱାସକୁ ମୁଁ ନିଜର ସାହସରେ ପରିଣତ କରିଦେଲି । ଆଉ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟ କହୁଛି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରନ୍ତୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ, ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛନ୍ତି ଆଉ ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣ ଦୁହେଁ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଛନ୍ତି । ୧୦୦ ମିଟର ରେସରେ ଦୌଡ଼ିବା, ଯାହା ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କହିଲେ ଯେ ଲୋକେ କହନ୍ତି ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ଏଥିପାଇଁ ଗଢ଼ା ହୋଇନାହିଁ । ଏତେ କଷ୍ଟ ହୋଇଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ଆପଣ ଏହି କାମ କରି ଦେଖାଇଲେ । ଆପଣ ଦୁଇଜଣଙ୍କଠାରୁ ମୁଁ ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଆଉ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହିଁବେ ଯେ, ଏହା କିଭଳି ଉତ୍ସାହ ଥିଲା, କ’ଣ ଜିଦ୍ଦି ଥିଲା, କ’ଣ ଭାବିଥିଲେ, ଆଉ କ’ଣ କରୁଥିଲେ? ଏହା କେତେ କଷ୍ଟ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆଜ୍ଞା, ମୁଁ ଗୁରିନ୍ଦର, ଆରମ୍ଭରେ ଏହା ଖୁବ୍ ସଂଘର୍ଷପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ କରୁଛି କି ନାହିଁ ସେ ବିଷୟରେ ବହୁତ ଥର ସନ୍ଦେହ ମଧ୍ୟ ହେଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ ଜିନିଷକୁ ବାଛିଲି କାରଣ ସବୁବେଳେ ଆପଣ ଜିଣିନଥାନ୍ତି, ବେଳେବେଳେ ଆପଣ ଶିଖିଥାନ୍ତି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ହାରୁଥିଲି, ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଠିକ୍ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିପାରୁନଥିଲି, କୌଣସି ଆଘାତ ଲାଗୁଥିଲା ସେତେବେଳେ ମୋ ଘର ଲୋକେ ମୋତେ ସହଯୋଗ କରି କହୁଥିଲେ ଯେ ଦିନେଅଧେ ବେଳ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା କିମ୍ବା ବର୍ଷେ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା ସେଥିରେ ସାରାଜୀବନ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ ନାହିଁ । ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିବା ବନ୍ଦ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ । ମୋ କୋଚ୍ ବି ମୋତେ ଏହି କଥା କହିଲେ ଯେ ଯଦି ତୁ ନ କରିପାରିବୁ ତାହାଲେ ଆଉ କେହି ପାରିବ ନାହିଁ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ଆମ ନିଜ ଲୋକ, ଆମ ଆଖପାଖର ଲୋକ ଆମକୁ ଉତ୍ସାହିତ କରନ୍ତି ତେବେ ମନୋବଳ କେବେହେଲେ ଭାଙ୍ଗେନାହିଁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଅନିମେଷ ଜୀ ...

ଅନିମେଷ : ସାର, ୨୦୨୧ରେ ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କଲି ମୋତେ ତ ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ, ଦେଖ୍ ଇଏ ଗୋଟିଏ ନୂଆ କ୍ଷେତ୍ର ତୁ କରିପାରିବୁ କି ନାହିଁ? ସେତେବେଳେ ମୁଁ କହୁଥିଲି ଯେ ଯଦି ଏ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ବାଛିଛି ତାହାଲେ ଯେମିତି ହେଲେ ବି କରିବି । ମୋ ବାପା ମଧ୍ୟ କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହି କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେଣୁ କେବେହେଲେ ପଛକୁ ଚାହିଁବୁ ନାହିଁ । କାରଣ ଅନେକ ଲୋକ ବହୁତ କଥା କରିବା ଭାବନ୍ତି କିନ୍ତୁ ବହୁତ କମ ଲୋକ କରିଦେଖାନ୍ତି । ତୁ ଏ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେବେ ଏଥିରେ ଦୃଢ଼ ହୋଇ ରହିବୁ, ଏଥିରେ ଆଗେଇ ଚାଲିବୁ । ତୋତେ ଆମେ ପରିବାର ତରଫରୁ ଆର୍ଥିକ ଆଉ ଅନ୍ୟ ସବୁ ପ୍ରକାର ସହଯୋଗ ଓ ସୁବିଧାସୁଯୋଗ ଯୋଗାଇବୁ, କେବଳ ତୁ ପରିଶ୍ରମ କର ଆଉ ଭାରତକୁ ଦେଖାଇଦେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୌଡ଼ିପାରନ୍ତି କାରଣ ମୋତେ ବି ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଜିନ୍ ୧୦ କିମ୍ବା ୧୦.୧ରୁ କମ୍ ଦୌଡ଼ିବା କିମ୍ବା ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରିବା ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ଆମେ ଦୁହେଁ ପ୍ରମାଣିତ କରିଦେଇଛୁ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମପାଇଁ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ କଠିନ ନୁହେଁ । ଆମେ ସବୁକିଛି କରିପାରୁ । ତେଣୁ ସାର୍ ଏହି ସବୁକଥା ମୋତେ ବହୁତ ପ୍ରେରଣା ଯୋଗାଇଥାଏ ଆଉ ଆମେ ଯେମିତି ତାଲିମ ଗ୍ରହଣ କରିଚାଲିଛୁ ଆଉ ସମୟ ଭଙ୍ଗ କରିଚାଲିଛୁ ଏହାଦେଖି ଅନ୍ୟମାନେ ଅନୁଭବ କରୁଛନ୍ତି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମେ ଆହୁରି ପରିଶ୍ରମ କରିବା । ଏବେ ଆମ ଦୁହିଁଙ୍କ ଚୟନ ରାଜ୍ୟଗୋଷ୍ଠୀ ଖେଳ ପାଇଁ ହୋଇଛି । ସେଠାରେ ହେବାକୁ ଥିବା ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ଆମେ ଆହୁରି ଭଲ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିବୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଠିକ୍ ଅଛି, ଶୁଣ । ମୋ ମନରେ ବି କୌତୁହଳ ରହିଛି । ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ମନରେ ବି ଥିବ । ମୁଁ ଶୁଣିଛି ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଭଲ ସାଙ୍ଗ । ଆପଣ ଉଭୟ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିଛନ୍ତି ଯେ ଯଦି ତୁ ମୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବୁ ତେବେ ମୁଁ ବି ତୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବି । କଥା କ’ଣ, ପ୍ରଥମେ ଅନିମେଷ କୁହନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର୍, ପ୍ରଥମ ୧୦.୧୮ ରେକର୍ଡ ଥିଲା ଯାହା ମୁଁ ହିଁ କରିଥିଲି । ଏବଂ ତା’ପରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ରେ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଭାଇ ୧୦.୧୭ କରି ତାହାକୁ ଭାଙ୍ଗିଥିଲେ । ତା’ପରେ ପୁଣିଥରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍-୨ରେ ୧୦.୧୫ କରି ମୁଁ ତାଙ୍କର ସେହି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲି । ତା’ପରେ ଯେତେବେଳେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ ହେଲା ସେତେବେଳେ ଆମେ ଦୁହେଁ ଖୁସି ଥିଲୁ । ଯାହାହେଉ ଠିକ୍ ଅଛି, ଆଜି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲା ଏବଂ ଆମେ ଦୁହେଁ ଏହା ଭାଙ୍ଗିଲୁ । ପ୍ରତିଯୋଗିତା ସମୟରେ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା ରହେ କିନ୍ତୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଆମେ ବହୁପୂର୍ବରୁ କରିଥିଲୁ । ଏହାପୂର୍ବରୁ ଆମେ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ପାଇଁ ସାଉଦି ଆରବ ଯାଇଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ ରୁମମେଟ୍ ଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ କଥାହେଉଥିଲୁ ଯେ ଇଣ୍ଡିଆର ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟିଂକୁ ବହୁ ଆଗକୁ ନେବାର ଅଛି ଏବଂ ଏସବୁ ଜିନିଷ ଆମ ହାତରେ ହିଁ ଅଛି । ଆମେ ଯାହା କରିବା ତାହା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା କରିବ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କିଛି କହିବେ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆମେ ଦୁହେଁ ନିଷ୍ପତ୍ତି କରିଥିଲୁ ଯେ ଆମେ ଖୁବ୍ ଭଲ ଦୌଡ଼ିବୁ । ସାର୍ ଯେତେବେଳେ ବି ଜଣଙ୍କୁ ଅନ୍ୟ ଜଣଙ୍କର ସାହାଯ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ ହୁଏ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପର ସହ ଛିଡ଼ାହେଉ । ଯେମିତିକି ଏବେ ରେକର୍ଡ କରିବା ପୂର୍ବରୁ ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ରେକର୍ଡ କଲି, ତା’ପରେ ଅନିମେଷ କହିଲେ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରୁଥିଲୁ ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଅନିମେଷକୁ ବତାଉଥିଲି, ଅନିମେଷ, ଏବେ ସେହି ବ୍ଲକଟି ଠିକ୍ ଅଛି । ସେଇଠି ଯାଇ ବସ । ସେଠାରେ ଯାଇ ଷ୍ଟ୍ରାଇଡ୍ କର । ଆମେ ଦୁହେଁ ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରିବା । ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ ଠିକ୍ ହେବ । ତେବେ ଜଣେ ଅନ୍ୟଜଣକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ । ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କଲେ, ଜଣେ ଉନ୍ନତ କଲେ ଅନ୍ୟଜଣେ ମଧ୍ୟ ଉନ୍ନତ କରିଥାନ୍ତି । ହଁ, ସାଙ୍ଗ ବି ଦରକାର । କିନ୍ତୁ ସାର୍ ଆମେ ଯେତେବେଳେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ବାହାରେ ଥାଉ, ପ୍ରତିଯୋଗିତାରୁ ବାହାରେ ଥାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ସାଙ୍ଗ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ଭିତରକୁ ଯାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପରର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀ ହୋଇଯାଉ । ସେତେବେଳେ ଭାବୁ ଯେ ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି, ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଯେଉଁ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା କରିଛନ୍ତି ତାହା ଦେଶର ସମ୍ମାନ ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଭବିଷ୍ୟତରେ ଦେଶକୁ ସେହି ଜାଗାରେ ପହଞ୍ଚାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଆଉ ଏକ ସକାରାତ୍ମକ ସ୍ପିରିଟ୍ ସହ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ମତରେ ଆପଣଙ୍କର ଏ ଯେଉଁ ସ୍ପୋର୍ଟସମ୍ୟାନ ସ୍ପିରିଟ୍ ଅଛି, ଖେଳିବା ହେଉ, ପରସ୍ପରକୁ ଚୁନୌତି ଦେବା ହେଉ, ଆଉ ପୁଣି ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉ, ଅବା ଆଗକୁ ଯିବାପାଇଁ ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବା ହେଉ, ସତରେ ଆପଣମାନେ ଅଦ୍ଭୁତ କାମ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ତରଫରୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ, ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା। ମୋର ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱାସ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଦେଶର ନାଁ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ କରିବେ । ଆପଣ ଏପରି ପରିଶ୍ରମ କରିଚାଲନ୍ତୁ । ବହୁତ ଉନ୍ନତି କରିବେ । ମୋର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର

ଅନିମେଷ : ଧନ୍ୟବାଦ ସାର୍, ଆପଣଙ୍କୁ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ସମ୍ପ୍ରତି ଦେଶର ଅଧିକାଂଶ ଭାଗରେ ବହୁତ ଗ୍ରୀଷ୍ମପ୍ରବାହ ହେଉଛି । ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଖରା, ଗରମ ପବନ ଏପରି ପାଣିପାଗରେ ନିଜର ଧ୍ୟାନ ରଖିବା ଖୁବ୍ ଜରୁରୀ । ପାଣି ପିଅନ୍ତୁ । ଖରାରେ ଯଦି ଯିବାର ହୁଏ ତେବେ ଦେଖିଚାହିଁ ବାହାରନ୍ତୁ । ଖରାକୁ ଆଖି ଆଗରେ ରଖି ସରକାରଙ୍କର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ବିଭାଗର ଯେଉଁ ମାର୍ଗଦର୍ଶିକା ଜାରି କରିଛନ୍ତି ତାକୁ ଆଦୌ ଭୁଲନ୍ତୁ ନାହିଁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମର ଏଠି ଗରମ ସହ ଲଢ଼ିବାର ଉପାୟ ଅନେକ ଥର ରୋଷେଇରେ ବି ମିଳିଥାଏ । ଆପଣମାନେ ଦେଖିଥିବେ ଯେମିତି ଗରମ ବଢ଼ି ବଢ଼ି ଚାଲେ, ସେମିତି ଘରର ରୋଷେଇର ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ରୋଷେଇର ପ୍ରକାର ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । କେଉଁଠି ମାଠିଆରୁ ପାଣି ଆସେ, କେଉଁଠି ଦହି ବସାହୁଏ, ଆଉ କେଉଁଠି କଞ୍ଚା ଆମ୍ବକୁ ଶିଝାଯାଏ - ଆଉ ତା’ପରେ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ସମୟ । ଦେଶୀ ପାନୀୟ ସହ ଆପଣମାନେ ବି ପରିଚିତ । ଯଦି ଆପଣ ଉତ୍ତର-ଭାରତ ଯିବେ ତେବେ ଆପଣଙ୍କୁ ଅନେକ ସ୍ଥାନରେ ଆମ୍ବପଣା, କଞ୍ଚା ଆମ୍ବର ସ୍ୱାଦ ମିଳିବ ଏବଂ ଏହାଛଡ଼ା ଗରମରୁ ନିସ୍ତାର ମଧ୍ୟ ମିଳିବ । ପଞ୍ଜାବ-ହରିୟାଣା ଗଲେ ଲସି ପାଇବେ । ବଡ଼ ବଡ଼ ଗିଲାସବାଲା ଲସି । ରାଜସ୍ଥାନ ଓ ଗୁଜରାଟରେ ଘୋଳଦହି ସତେଯେମିତି ସବୁ ଭୋଜନର ସାଥୀ ହୋଇଯାଏ । ବିହାର, ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡ ଓ ପୂର୍ବ ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶରେ ସତ୍ତୁ ସରବତ – ତା’ କଥା ତ ନିଆରା – ପେଟ ପୁରିବ, ବଳ ବି ଦେବ । କୋଙ୍କଣ ଓ ଗୋଆରେ କୋକମ ସରବତ, ସୋଲ କଢ଼ି । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତରେ ପାନକମ, ନୀର ମୋର, ସାମ୍ବରମ୍ ଓ ଓଡ଼ିଶାରେ ବେଲପଣା । ଏସବୁ କେବଳ ପାନୀୟ ନୁହେଁ, ଏହା ହେଉଛି ଭାରତର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳର ପରମ୍ପରାର ଅଂଶବିଶେଷ ମଧ୍ୟ । ଆଉ ଏହାରି ଭିତରେ ‘ଏକ ଭାରତ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’ର ଝଲକ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଆଉ ଗୋଟିଏ କଥା ନିଶ୍ଚୟ ମନେରଖିବେ, ଏଥିରୁ ଅଧିକାଂଶ ଜିନିଷ ଆମ ରୋଷେଇଘରୁ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଛି, ଆମ ବିଲବାଡ଼ିରୁ ବାହାରିଛି । ଏହା କୌଣସି ବଡ଼ ବ୍ରାଣ୍ଡିଂ ନୁହେଁ । କିନ୍ତୁ ପିଢ଼ୀ ପିଢ଼ୀର ଅନୁଭବ ଏହା ଭିତରେ ସମାହିତ ହୋଇରହିଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଗରମରେ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ଖୁବ୍ ଆନନ୍ଦ ଉଠାନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଆସିବା ସମୟ ଆଉ ଏକ ଚର୍ଚ୍ଚା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଘରେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଏ, ଆଉ ତାହା ହେଉଛି ଆମ୍ବ । ଆମ୍ବ ସାଧାରଣ ଚର୍ଚ୍ଚାର ବିଷୟ ପାଲଟିଯାଏ । ଭାରତରେ ବୋଧହୁଏ ଏପରି କୌଣସି ଘର ନ ଥିବ ଯେଉଁଠି ଗରମ ଦିନେ ଆମ୍ବର କଥା ପଡୁନଥିବ । ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅଞ୍ଚଳର ନିଜସ୍ୱ ଆମ୍ବ, ନିଜସ୍ୱ ସ୍ୱାଦ ଓ ନିଜସ୍ୱ ସୁଗନ୍ଧ ରହିଛି । ମହାରାଷ୍ଟ୍ର ଓ କୋଙ୍କଣର ହାପୁସ୍, ଆଲଫୋନ୍ସୋ । ଗୁଜୁରାଟର କେସର, ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ଦଶହରି, ଓ ମୋ କାଶିର ଲଙ୍ଗଡା – ଏମାନେ ତ ଆମ୍ବ ଭିତରେ ରାଜା । ଦେଖିବାକୁ ଗଲେ ଲଙ୍ଗଡା ଆମ୍ବର ଏକ ବିଶେଷତ୍ୱ ରହିଛି - ପାଚିବା ପରେ ମଧ୍ୟ ତା’ର ରଙ୍ଗ ସବୁଜ ଦେଖାଯାଏ । ବିହାରର ଜର୍ଦ୍ଦାଲୁ – ବାସ୍ନାରୁ ଯାହାକୁ ଦୂରରୁ ଥାଇ ଚିହ୍ନିହୁଏ । ଚୌଷା, ମାଲଦା - ପ୍ରତ୍ୟେକ ନାଁ ସହ ଲୋକମାନଙ୍କ ସ୍ମୃତି ଜଡ଼ିତ । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତ ଯାଆନ୍ତୁ, ସେଠି ବେଗନ୍ ପଲ୍ଲୀ, ତୋତାପୁରୀ, ନିଲମ୍, ମଲଗୋବା, ବେଙ୍ଗଲରେ ହିମସାଗର, ଓଡ଼ିଶା ଓ ଆନ୍ଧ୍ରପ୍ରଦେଶରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେଖା ପାଇବେ । ଅର୍ଥାତ୍ ସ୍ଥାନ ବଦଳିବା ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ଆମ୍ବର ରଙ୍ଗ, ରୂପ ଓ ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ଆଉ ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ୍ବର ଏହି ଯାତ୍ରା ଏବେ ଗାଁରୁ ବିଶ୍ୱ ବଜାର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଂଚିପାରିଛି । ଆଜି ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଜରିଆରେ ଆମ୍ବ ଚାଷ ସହ ଜଡ଼ିତ ମୋ କୃଷକ ଭାଇଭଉଣୀଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରିବି । ଆପଣ ଦେଶର କୃଷିଭିତ୍ତିକ ଅର୍ଥନୀତି ପାଇଁ ଜଣେ ସାଧାରଣ ଚାଷୀ ନୁହଁନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ସ୍ଥାନ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର । ଏହିପରି ଲାଗି ରୁହନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗରମ ଦିନେ ଏମିତି ତ ସ୍କୁଲ ଛୁଟି ହୋଇଥାଏ । କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏପରି ଏକ କ୍ଲାସର କଥା କହିବି ଯେଉଁଠି ଆପଣ ପ୍ରବେଶ ନେବାପାଇଁ ମନ କରିବେ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏପରି ଏକ ସ୍ଥିତିର କଳ୍ପନା କରନ୍ତୁ – ଏପରି ଏକ ସ୍କୁଲ ଯେଉଁଠି ପିଲା ବି ଆସନ୍ତି, ଯୁବକମାନେ ବି ଆସନ୍ତି ଓ ବୟସ୍କମାନେ ବି ଆସନ୍ତି । ଯେଉଁଠି କିଛି ଫିସ ନାହିଁ । କୌଣସି ବଡ କୋଠା ନାହିଁ, କୌଣସି ଶ୍ରେଣୀଗୃହ ମଧ୍ୟ ନାହିଁ । ଆଉ ସବୁଠାରୁ ମଜାକଥା ହେଲା ଏହି କ୍ଲାସ ନଦୀରେ ହିଁ ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହା କୌଣସି କାହାଣୀ ନୁହେଁ । ଏହା ହେଉଛି ଏକ ସତପ୍ରୟାସ । କେରଳମର ଆଲୁୱାରେ, ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀ ଏପରି ଏକ ସ୍ବିମିଂଗ କ୍ଲବ ଚଳାଉଛନ୍ତି ଯେଉଁଠାରେ ବର୍ତ୍ତମାନ ସୁଦ୍ଧା ୧୫ ହଜାରରୁ ଊର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ଲୋକ ପହଁରା ଶିଖିସାରିଲେଣି । ସାଜି ଜୀ ଦିବ୍ୟାଙ୍ଗ ପିଲାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପହଁରା ଶିଖାଇଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ପଛରେ ଏକ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଲୁଚିରହିଛି । କିଛିବର୍ଷ ତଳେ ଏକ ନୌକା ଦୁର୍ଘଟଣାରେ ଅନେକ ଛାତ୍ର ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରିଥିଲେ । ଏହି ଘଟଣା ସାଜି ଜୀଙ୍କୁ ଖୁବ୍ ଆନ୍ଦୋଳିତ କରିଥିଲା । ସେ ଚିନ୍ତା କଲେ, ଯଦି ପିଲାମାନେ ପହଁରା ଜାଣିଥାନ୍ତେ, ତେବେ ବୋଧହୁଏ କିଛି ଜୀବନ ବଞ୍ଚିଯାଇଥାନ୍ତା, ବାସ୍, ଏହିଠାରୁ ଆରମ୍ଭ ହେଲା ଏହି ଅଭିଯାନ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀଙ୍କ ଜୀବନ ଆମକୁ ବହୁତ ବଡ଼ ଶିକ୍ଷା ଦିଏ । ସେବା କରିବା ପାଇଁ ବହୁତ ବଡ଼ ସାଧନ ଦରକାର ହୁଏନାହିଁ । ଦରକାର ହୁଏ ସଦିଚ୍ଛା ଓ ନିରନ୍ତର ପ୍ରୟାସ । ଏହା ବଳରେ ହଜାର ହଜାର ଲୋକଙ୍କ ଜୀବନରେ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଅଣାଯାଇପାରେ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ବିଗତ ଦିନରେ ମୋତେ ୟୁରୋପର ନେଦରଲାଣ୍ଡସ୍ ଯିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା । ସେଠି ମୁଁ ଅନେକ ମିଟିଂରେ ସାମିଲ ହେଲି । ଆଉ ସେତେବେଳେ ଏପରି ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଆସିଲା, ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କୁ ଗର୍ବିତ କରିଥିଲା । ନେଦରଲାଣ୍ଡସରେ ଆୟୋଜିତ ଏକ ବିଶେଷ ସମାରୋହରେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ପ୍ରାଚୀନ ତାମ୍ରଫଳକ ଭାରତକୁ ଫେରାଇ ଦିଆଗଲା । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ନେଦରଲାଣ୍ଡର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକକୁ ନେଇ ଦେଶବିଦେଶରୁ ମୋ ପାଖକୁ ନିରନ୍ତର ବାର୍ତ୍ତା ଆସିବାରେ ଲାଗିଛି । ଲୋକମାନେ ଆନନ୍ଦ ପ୍ରକାଶ କରୁଛନ୍ତି । ଗର୍ବ ବ୍ୟକ୍ତ କରୁଛନ୍ତି । ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର ତାମିଲ ସମୁଦାୟ ମଧ୍ୟରେ ଏହାକୁ ନେଇ ଖୁବ୍ ଉତ୍ସାହ ପରିଲକ୍ଷିତ ହେଉଛି।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଖୁବ ଜିଜ୍ଞାସା ରହିଛି । ସେଥିପାଇଁ ଆଜି ମୁଁ ଏହାସହ ଜଡ଼ିତ କିଛି କଥା ଆପଣମାନଙ୍କୁ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରୁ ୨୧ଟି ବଡ଼ ଓ ୩ଟି ଛୋଟ ତାମ୍ରଫଳକ ରହିଛି । ଏହା ମୁଖ୍ୟତଃ ରାଜା ରାଜେନ୍ଦ୍ର ଚୋଳ-ପ୍ରଥମଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ନିଜ ପିତା ରାଜା ରାଜରାଜା ଚୋଳଙ୍କ ଏକ ବଚନକୁ ପୂରଣ କରିବା ସହ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିରେ ଆନଇମଙ୍ଗଲମ୍ ଗାଁକୁ ଏକ ବୌଦ୍ଧବିହାରକୁ ଦାନ ଦେଇଥିବାର ଉଲ୍ଲେଖ ରହିଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକରେ ଚୋଳବଂଶର ଉପଲବଧିର ବର୍ଣ୍ଣନା ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଏଥିରୁ ଜଣାପଡ଼େ ଯେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସାମୁଦ୍ରିକ ଶକ୍ତି କେତେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଥିଲା । ଏଥିରୁ ଦକ୍ଷିଣ ପୂର୍ବ ଏସିଆ ଦେଶମାନଙ୍କ ସହ ଚୋଳ ଶାସକଙ୍କ ସମ୍ପର୍କ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଜଣାପଡ଼େ ।

ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସମୃଦ୍ଧ ଇତିହାସ ଓ ସଂସ୍କୃତିକୁ ନେଇ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଗର୍ବିତ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ ସରକାର ଭାରତର ଏପରି ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟର ସଂରକ୍ଷଣ ପାଇଁ ନିରନ୍ତର ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରତ । ଏହି କ୍ରମରେ ‘ଜ୍ଞାନଭାରତମ୍ ଅଭିଯାନ’ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଛତିଶଗଡ଼ର ମହ୍ଲାରରେ ମଧ୍ୟ ଏକ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଅନୁସନ୍ଧାନ କରାଯାଇଛି । ସେଠାରୁ ତିନୋଟି ଦୁର୍ଲ୍ଲଭ ତାମ୍ରଫଳକ ମିଳିଛି । ଏଗୁଡ଼ିକ ପାଣ୍ଡୁବଂଶୀ ରାଜବଂଶର ମହର୍ଷି ବାଲାର୍ଜୁନଙ୍କ ଶାସନକାଳ ସହ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ମତ ପ୍ରକାଶ ପାଉଛି । ବିଶେଷଜ୍ଞଙ୍କ ମତରେ ଏହି ଶିଳାଲେଖ ଷଷ୍ଠ-ସପ୍ତମ ଶତାବ୍ଦୀର । ୧୪୦୦-୧୫୦୦ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରାଚୀନ ବ୍ରାହ୍ମୀଲିପି ଓ ପାଲି ଭାଷାରେ ଲିଖିତ । ଏଥିରୁ ସେ ସମୟର ଶାସନ ବ୍ୟବସ୍ଥା, ଧର୍ମ ଓ ସଂସ୍କୃତି ବିଷୟରେ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ତଥ୍ୟ ମିଳୁଛି । 

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଅଥବା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ପ୍ରତି ବିଶେଷ ଆକର୍ଷଣ ଥାଏ । ଆଜି ବି ଆମ ଦେଶରେ ଶହଶହ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣାଗାର ରହିଛି । ଏଠାରେ ଅଦ୍ଭୁତ ଗାଣିତିକ ଉଦ୍ଭାବନ ହୋଇଛି । ନାଭିଗେସନ୍ ହେଉ, ପଞ୍ଜିକା ହେଉ କିମ୍ବା ଆମର ପର୍ବପର୍ବାଣୀ, ଏସବୁର ସମ୍ପର୍କ ଆକାଶ ଏବଂ ତାରାମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି । ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଆମ ଦେଶରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁଗରେ କୌତୂହଳ ସୃଷ୍ଟି କରିଆସିଛି ତାକୁ ଆବିଷ୍କାର କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରେରିତ କରିଛି ତଥା ଆଜିର ଯୁବକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ ନେଇ ବହୁତ ଉତ୍ସାହ ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଥିବେ ଆଜିକାଲି ସାରାଦେଶରେ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଦ୍ରୁତ ବେଗରେ ଲୋକପ୍ରିୟ ହେଉଛନ୍ତି । ବଡ଼ ସହରଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଛୋଟ ପଡ଼ା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ, ସ୍କୁଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ପାର୍କ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହାର ଗତିବିଧି ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ମୋତେ ବାଙ୍ଗାଲୋର ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମିକାଲ୍ ସୋସାଇଟି ସମ୍ପର୍କରେ ସୂଚନା ମିଳିଛି । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଅଧିବେଶନ ଆୟୋଜିତ ହେଉଛି । ଏହି ସଂସ୍ଥା ଗ୍ରାମାଞ୍ଚଳରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନକୁ ଲୋକପ୍ରିୟ କରିବାର ଅଭିଯାନ ଆରମ୍ଭ କରିଛି । ‘ଖଗୋଳ ମଣ୍ଡଳ’ ନାମକ ଏକ ଦଳ ୩୦ ଘଣ୍ଟାର ଗୋଟିଏ ଅଭିନବ ପାଠ୍ୟକ୍ରମ ଆରମ୍ଭ କରିଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ରାତିରେ ତାରାମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବା ସ୍ୱତଃ ଗୋଟିଏ ଅଦ୍ଭୁତ ଅନୁଭବ ହୋଇଥାଏ । ଆଷ୍ଟ୍ରୋ କେରଳ ନାମକ ଗୋଟିଏ ସଂସ୍ଥା ରାତ୍ରି ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଶିବିର ଏବଂ କର୍ମଶାଳା ଆୟୋଜିତ କରେ । ଏଠାରେ ଯୁବବନ୍ଧୁମାନେ ଟେଲିସ୍କୋପ ତିଆରି କରିବା ଏବଂ ତାରା ମାନଚିତ୍ରର ପ୍ରୟୋଗ ଶିଖନ୍ତି । ରାଜକୋଟର ବିଗ୍ ବ୍ୟାଙ୍ଗ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଗିରର ଜଙ୍ଗଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି କଚ୍ଛର ରଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅନେକ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଇଭେଣ୍ଟ ଆୟୋଜିତ କରିଛନ୍ତି । ‘ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଦ୍ୟା ପରିସଂସ୍ଥା’ ମଧ୍ୟ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନର ପୁରୁଣା ସଂସ୍ଥାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗୋଟିଏ । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ସୁବିଧା ସହିତ ବହି, ଲାଇବ୍ରେରୀ ଏବଂ ଟେଲିସ୍କୋପ ଲାଇବ୍ରେରୀର ସୁବିଧା ମଧ୍ୟ ଅଛି । ମୁଁ ଆଇଏସଏଏସି (ଆଇସାକ୍) ସମ୍ପର୍କରେ ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହେଁ । ଏହା ଏକ ଛାତ୍ର-ନେତୃତ୍ୱାଧୀନ ଦେଶବ୍ୟାପୀ ନେଟୱାର୍କ,, ଯାହା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଏବଂ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ କ୍ଲବକୁ ପରସ୍ପର ମଧ୍ୟରେ ଯୋଡ଼ିଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ ନିଜର ହବି ପାଇଁ ସମୟ ବାହାର କରିବା ଏବଂ ସବୁବେଳେ କିଛି ନା କିଛି ନୂଆ ଶିଖିବା ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ । ମୁଁ ଯୁବକମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କରିବି ଯେ ସେମାନେ କୌଣସି ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ସହିତ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ, ଏବଂ ଏହି ଛୁଟିରେ କୌଣସି ପ୍ଲାନେଟୋରିୟମ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ଯାଆନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମକୁ ଯେଉଁମାନେ ଟିଭିରେ ଦେଖୁଛନ୍ତି, ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ କହିବି – ଗୋଟିଏ ଭିଡିଓକୁ ନିଶ୍ଚିତ ଦେଖନ୍ତୁ । ଏହି ଭିଡିଓ ବିଗତ ଦିନରେ ଖୁବ୍ ଚର୍ଚ୍ଚାରେ ଥିଲା । ଏଥିରେ କିଛି ଲୋକ ଖୁବ୍ ଧୈର୍ଯ୍ୟର ସହିତ, ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଇବାର ଚେଷ୍ଟା କରୁଥିଲେ । ଏହା ଜାଣି ଆପଣ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହେବେ ଯେ ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରେ ପାଖାପାଖି ୧୩ ଘଣ୍ଟା ଲାଗିଲା ଏବଂ ପରିଶେଷରେ ସେହି ଡଲଫିନ୍ ବଞ୍ଚିଗଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରଥମ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ନେଇଥିଲା । ଘଟଣାଟି ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର । ସେଠାରେ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ କେନାଲରେ ଫଶିଯାଇଥିଲା । ଏହି ସମୟରେ ‘ନମାମି ଗଙ୍ଗେ ଅଭିଯାନ’ରେ ତିଆରି ହୋଇଥିବା ଏହି ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ତା’ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ଆଶାର କିରଣ ନେଇ ପହଞ୍ଚିଲା । ତା’ପରେ ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ତାକୁ ବାହାରକୁ ଅଣାଗଲା । ତା’ର ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟପରୀକ୍ଷା କରାଗଲା, ତା’ର ଚିକିତ୍ସା କରାଗଲା ଏବଂ ଏହାପରେ ତାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ଭାବେ ରାପ୍ତି ନଦୀରେ ଛାଡ଼ିଦିଆଗଲା । ଯଦି କହିବା ଏହିଭଳି ଭାବରେ ଗୋଟିଏ ଜୀବନ ପୁଣି ନିଜ ଘରକୁ ଫେରିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ବହୁତ ଅନନ୍ୟ । ଏହାକୁ ଗୋଟିଏ ଚଳମାନ ଚିକିତ୍ସାଳୟ ଭଳି ତିଆରି କରାଯାଇଛି । ଏଥିରେ ଡଲଫିନ୍କୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖିବାର ବ୍ୟବସ୍ଥା ଅଛି । ଅମ୍ଳଜାନର ସୁବିଧା ଅଛି, ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଷ୍ଟ୍ରେଚର ଅଛି, ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ଉପକରଣ ଅଛି, ଅର୍ଥାତ୍ ଯଦି କୌଣସି ଡଲଫିନ୍ ଆହତ ହୋଇଯାଏ, କେନାଲରେ ଫଶିଯାଏ ବା ନଦୀରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ, ତେବେ ଯଥାଶୀଘ୍ର ତାକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରାଯାଇପାରିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି, ତେବେ ଆମେ ଖାଲି ଗୋଟିଏ ପ୍ରଜାତିକୁ ବଞ୍ଚାଉନାହୁଁ, ଆମେ ଗଙ୍ଗାର ଜୈବ ବିବିଧତାକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । ନଦୀର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନତନ୍ତ୍ରକୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ଆଗାମୀ ପିଢ଼ୀ ପାଇଁ ପ୍ରକୃତିର ଗୋଟିଏ ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । 

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ଆପଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଅନେକ ଲୋକଙ୍କର ନଦୀ, ପୋଖରୀ ଅଥବା କୂଅ ପାଣି ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସ୍ମୃତି ନିଶ୍ଚୟ ଥିବ । କାହାକୁ ପୋଖରୀରେ ପହଁରିବା ମନେଥିବ, କେହି ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ସହିତ ପୋଖରୀ କୂଳରେ ଖେଳିବା ବା କାହାର ସେହି ମାଟିର ସୁଗନ୍ଧ ମଧ୍ୟ ମନେପଡୁଥିବ । ବାଲ୍ୟକାଳର ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିଗୁଡ଼ିକ ସାରାଜୀବନ ମନରେ ସାଇତା ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିକୁ ବଞ୍ଚାଇ ରଖିବାର ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରକ କଥା ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ବସ୍ତୀ ଜିଲ୍ଲାରୁ ଆସିଛି । ବସ୍ତୀର ଆକାଶଗୁପ୍ତା ନିଜ ଗାଁର ମନୋରମା ନଦୀକୁ ଦେଖି ବହୁତ ଦୁଃଖୀ ହେଉଥିଲେ । କାରଣ ଯେଉଁ ନଦୀକୁ ସେ ବାଲ୍ୟକାଳରୁ ସଫା ଏବଂ ଜୀବନ୍ତ ଦେଖିଥିଲେ, ସମୟ ପରିବର୍ତ୍ତନ ସଙ୍ଗେସଙ୍ଗେ ସେ ନଦୀରେ ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଜମା ହେବାରେ ଲାଗିଛି । ଆବର୍ଜନା ବଢ଼ିଚାଲିଥିଲା । ଶ୍ରୀମାନ ଆକାଶ ସ୍ଥିର କଲେ ଯେ ସେ ଅଭିଯୋଗ କରିବେ ନାହିଁ, ଗୋଟିଏ ନୂତନ ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିବେ । ଅଭିଯୋଗ ନୁହେଁ, ଶୁଭାରମ୍ଭ ଏକ ମନ୍ତ୍ର ହୋଇଗଲା । ସେ ନିଜର ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ସାଥୀରେ ନେଲେ । ଖାଲି ଜାଲ ଥିଲା, ଫାଉଡା ଥିଲା, ଟୋକେଇ ଥିଲା ଆଉ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଶକ୍ତି ଥିଲା କିଛି ପରିବର୍ତ୍ତନର ସଂକଳ୍ପ । ଏ ଯୁବକମାନେ ନଦୀରେ ବୁଡ଼ି ଦଳ ବାହାର କରୁଥିଲେ । ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଆବର୍ଜନା ବାହାରକୁ ଆଣୁଥିଲେ । ଅନେକ ଥର ଦିନକୁ ପ୍ରାୟ ୫୦-୬୦ କିଲୋ ଆବର୍ଜନା ନଦୀରୁ ବାହାର କରାଗଲା । ଧିରେ ଧିରେ ମନୋରମା ନଦୀର ସେହି ଅଂଶ ପୁଣି ସଫା ଦେଖାଯିବାକୁ ଲାଗିଲା । ଏହି କାମ ପ୍ରତି ଆଖପାଖର ଲୋକମାନଙ୍କ ଧ୍ୟାନ ମଧ୍ୟ ଆକର୍ଷିତ ହେଲା । ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ପ୍ରତି ସଚେତନତା ବଢ଼ିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରଣାଦାୟୀ କଥା ଗୋଆରେ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଛି । ଗୋଆର ବାଳକୃଷ୍ଣ ଅଇୟା ଜଣେ ଅବସରପ୍ରାପ୍ତ ଶିକ୍ଷକ । କିନ୍ତୁ ସମାଜ ପାଇଁ କାମ କରିବା ପାଇଁ ଆଜି ବି ତାଙ୍କର ଉତ୍ସାହ ସେହିଭଳି ରହିଛି । ତାଙ୍କୁ ମଡ୍ଡୀ-ତୋଲାପ୍ ଅଞ୍ଚଳର ପାଣିର ସମସ୍ୟା ବହୁତ କଷ୍ଟ ଦେଉଥିଲା । ସେ ମଧ୍ୟ ସମାଧାନ ପାଇଁ କାମ ଆରମ୍ଭ କଲେ । ବାଳକୃଷ୍ଣ ଜୀ ପାଇପଲାଇନ୍ ବିଛାଇବାରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କଲେ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଅନେକ ଘର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପାଣି ପହଂଚିପାରିଲା । ଯେଉଁ ପରିବାରକୁ ପାଣି ପାଇଁ ପ୍ରତିଦିନ ସଂଘର୍ଷ କରିବାକୁ ପଡୁଥିଲା, ସେମାନେ ଏହାଦ୍ୱାରା ବହୁତ ଉପକୃତ ହେଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗତ ମାସରେ ମୋର ଗୋଟିଏ ବହୁତ ଭଲ ଅନୁଭୂତି ହୋଇଥିଲା । ତା’ର ସମ୍ପର୍କ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ସହିତ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିପାଇଁ ଆଜି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସେ ବିଷୟ ଚର୍ଚ୍ଚା କରିବାକୁ ଚାହେଁ । ତାମିଲନାଡୁର ନାଗରକୋଇଲରେ ଜଣେ ଶିକ୍ଷକଙ୍କ ସହିତ ମୋର ସାକ୍ଷାତ ହୋଇଥିଲା । ପ୍ରାୟ ତିନିଦଶକ ପୂର୍ବେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ଭେଟିଥିଲି । ମୁଁ ଗିରିଜା ଅମ୍ମାଙ୍କ କଥା କହିବାକୁ ଯାଉଛି । ଏହି ସାକ୍ଷାତ ସମୟରେ କିଛି ଯୁବଛାତ୍ର ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ସହିତ ଥିଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ପ୍ରାୟ ୧୫ଟି ସ୍କୁଲ ଚଳାଉଛନ୍ତି । ସେଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ ଚେନ୍ନାଇର ଜୟଗୋପାଲ ଗରୋଡିଆ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ବହୁତ ପ୍ରମୁଖ । ତାଙ୍କର ଦେଶଭକ୍ତିର ଭାବନା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତବାସୀ ପାଇଁ ପ୍ରେରଣାଦାୟକ । ସେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଦେଶର ଅନେକ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ କିଛି କରିବାର ସଂକଳ୍ପ ନେଲେ । ସେଥିପାଇଁ ସେ ନିଜ ସମସ୍ତ ସ୍କୁଲର ପିଲାମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା ଦେଲେ । ସେ ପିଲାମାନଙ୍କୁ କହିଲେ ଯେ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସେମାନେ ପ୍ରତିଦିନ ଗୋଟିଏ ଟଙ୍କା ଦିଅନ୍ତୁ । ଅର୍ଥାତ୍ ଗୋଟିଏ ବର୍ଷରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ପିଲା ଦ୍ୱାରା ୩୬୫ ଟଙ୍କା ଜମା ହେଲା । ଏହିଭଳି ଛୋଟ ଛୋଟ ଅଂଶଦାନ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାୟ ୪୦ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ଏକତ୍ର ହେଲା । ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ଏହି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟଙ୍କାର ଚେକ୍ ମୋତେ ଅର୍ପଣ କଲେ । ତାଙ୍କସହିତ କଥାବାର୍ତ୍ତା ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ଅନୁଭବ କଲି ଯେ ମା’ ଭାରତୀଙ୍କ ପାଇଁ ତାଙ୍କର ସମର୍ପଣ ଭାବ କେତେ ଗଭୀର । ଗତବର୍ଷ ହିଁ ଚେନ୍ନାଇର ପ୍ରଥମ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ତା’ର ୫୦ ବର୍ଷ ପୂରଣ କଲା । ଦେଶର ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ସାଂସ୍କୃତିକ ଗୌରବକୁ ଆଗେଇନେବାରେ ଏହି ସ୍କୁଲ ନେଟୱାର୍କର ଭୂମିକା ବହୁତ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ମୁଁ ଏହା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେଉଛି । ଏବଂ ସେହି ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବିଶେଷ ଭାବେ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛି । ଯେଉଁମାନେ ଦେଶର ବୀର ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହିଭଳି ଯୋଗଦାନ ଦେଇଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗାଁରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସହରରେ, କିଛି ନା କିଛି ଏଭଳି ଘଟୁଛି ଯାହା ଆମକୁ ପ୍ରେରଣା ଦିଏ । ଅନେକ ଥର, ଏହି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକର ବିଶେଷ ଚର୍ଚ୍ଚା ହୁଏନାହିଁ । କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଜାଣନ୍ତି ସେତେବେଳେ ଆମର ଏହି ବିଶ୍ୱାସ ଆହୁରି ଦୃଢ଼ ଏବଂ ମଜଭୁତ ହୁଏ ଯେ ଆମର ଦେଶ ଲୋକମାନଙ୍କ ଶକ୍ତିରେ ଆଗକୁ ଚାଲିଛି । ମୋର ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ ନିଜ ଆଖପାଖର ଏହିଭଳି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକୁ ଦେଖନ୍ତୁ । ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ସମାଜ ପାଇଁ ଭଲ କାମ କରୁଛନ୍ତି ତାଙ୍କୁ ଚିହ୍ନନ୍ତୁ, ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତୁ, ତାଙ୍କଠାରୁ ଶିଖନ୍ତୁ ଏବଂ ହେଇପାରେ ତ ନିଜେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଏକ ଭଲ କାମରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ । ଆସନ୍ତା ମାସ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହିଭଳି ଆଉକିଛି ପ୍ରେରକ କଥା ସହିତ ପୁଣି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସାକ୍ଷାତ ହେବ । ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ । ନମସ୍କାର ।