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भगवान बिरसा मुंडा की इस पवित्र धरती को प्रणाम करते हुए आप सबको भी, मैं बहुत बहुत शुभकामनाएं देता हूं। हमारे कृषि मंत्री, श्रीमान राधा मोहन सिंह जी ने विस्तार से सौ साल पहले कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में, बिहार की धरती पर कैसे कार्य प्रारंभ हुआ और बाद में इसी काम से ये भूभाग कैसे अछुता रह गया, इसका वर्णन किया है।

मैं देख रहा हूं, आज यंहा सिर्फ झारखंड के ही नहीं दक्षिण बिहार से भी बड़ी संख्या में लोग नज़र आ रहे हैं..क्योंकि दक्षिण बिहार के लोगों को बराबर समझ है कि इस अनुसंधान केंद्र का लाभ सिर्फ झारखंड को ही मिलेगा, ऐसा नहीं, दक्षिण बिहार के लोग भी इसका सर्वाधिक लाभ उठा पाएंगे, ये उनको भली-भांति पता है।

भारत कृषि प्रधान देश है, ये बात हम सदियों से सुनते आए हैं। लेकिन यह भी एक दुर्भाग्य है कि देश के कृषि जगत को किसानों के नसीब पर छोड़ दिया गया है। उसी का नतीजा है कि सारा विश्व कृषि के क्षेत्र में जो प्रगति कर चुका है, भारत आज भी उससे बहुत पीछे है। चाहे ज़मीन का रख-रखाव हो, चाहे अच्छी क्वालिटी के बीज मुहैया कराना हो, चाहे किसान को पानी और बिजली उपलब्ध कराना हो, चाहे किसान जो उत्पादित करता है चीजें, उसके लिए सही बाज़ार मिले, सही दाम मिले, मूल्य वृद्धि की प्रक्रिया हो, कृषि के साथ सहायक उद्योग, पशुपालन हो, मतस्य उद्योग हो, शहद का काम हो..इन सारी बातों को ले करके एक संतुलित, एक comprehensive, integrated जब तक हम प्लान नहीं करते, हम हमारे गांव के आर्थिक जीवन को बदल नहीं सकते, हम किसानों के जीवन में बदलाव नहीं ला सकते हैं।

इसलिए दिल्ली में बैठी हुई वर्तमान सरकार..परंपरागत ये कृषि है, जो हमारे भाई बहन अपने पुरखों से सीख करके आगे बढ़ा रहे हैं। वह .. कृषि आधुनिक कैसे बने, वह कृषि वैज्ञानिक कैसे बने और आज जो प्रति हेक्टेयर उत्पान होता है, वह उत्पादन कैसे बढ़े, ये चिंता का विषय है। इस सबके उपाय नहीं हैं, ऐसा नहीं है। उसके लिए कोई रास्ते नहीं खोजे जा सकते, ऐसा नहीं है। आवश्यकता है कि सरकार की नीतियों के द्वारा, प्रशिक्षण के द्वारा, संसाधन मुहैया कराने की पद्धति से कृषि को आधुनिक और वैज्ञानिक बनाया जा सकता है।

जनसंख्या बढ़ती चली जा रही है, ज़मीन कम होती चली जा रही है। आज से पचास साल पहले जिस परिवार के पास सौ बीघा ज़मीन होगी..परिवार का विस्तार होते होते, बेटे, बेटे के बेटे, चचेरे भाई, उनके बेटे..ज़मीन के टुकड़े होते होते अब परिवार के पास दो बीघा, पांच बीघा ज़मीन रह गई होगी। ज़मीन छोटे छोटे टुकड़ों में बंट रही है, परिवार का विस्तार हो रहा है। जनसंख्या बढ़ रही है, ज़मीन कम हो रही है। ऐसी स्थिति में हमारे पास जो उपलब्ध ज़मीन है, उसमें अगर हमारी उत्पादकता नहीं बढ़ेगी, हम ज़्यादा फसल नहीं प्राप्त करेंगे, न तो देश का पेट भरेगा, न तो किसान का जेब भरेगा।

इसलिए कृषि का विकास ऐसे हो, जो देशवासियों का पेट भी भरे और किसान का जेब भी भरे और इसलिए सबसे पहली आवश्यकता है, हमारी परंपरागत कृषि में पुनः संशोधन करने की, research करने की। भारत इतना विशाल देश है, कि एक कोने में एक laboratory में काम होने से काम चलेगा नहीं। सभी agro climatic zone में, वहां की वायु के अनुसार, ज़मीन के अनुसार, परंपराओं के अनुसार संशोधन करने पड़ेंगे। तब जा करके उन संसाधनों का उपयोग होगा। अगर, केरल में जो प्रयोग सफल होता है, वहीं प्रयोग हम झारखंड में फिट करने जाएंगे तो कभी कभी..न तो किसान उसको स्वीकार करेगा और कभी कोई प्रयोग अगर विफल गया, तो कभी किसान हाथ नहीं लगाएगा।

इसलिए वो जिस भू-भाग में रहता है, जिस प्राकृतिक अवस्था में रहता है, जिस परंपरा से खेती करता है, उसी में अगर हम संशोधन करेंगे, उसी में वैज्ञानिकता लाएंगे, तो किसान उसको सहज रूप में स्वीकार भी करेगा और किसान को वो उपकारक भी होगा। इसलिए हमने दूर-सुदूर इलाकों के विद्यार्थियों को.. कृषि के क्षेत्र में आधुनिक शिक्षा मिले, उनको research करने का अवसर मिले और वो अपने अपने क्षेत्र में, उस भूभाग के किसानों का भला करने की दिशा में नए संशोधन करे, जिसको आगे चल करके लागू किया जाए, उस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास..जिसके तहत आज एक कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक इंस्टीट्यूट झारखंड को मिल रहा है। इसका लाभ इस पूरे इलाके को मिलने वाला है।

हमारे देश ने प्रथम कृषि क्रांति देखी है, लेकिन उसको बहुत साल हो गए। अब समय की मांग है कि देश में दूसरी कृषि क्रांति बिना विलंब होनी चाहिए। ये दूसरी कृषि क्रांति होने की संभावना कहां है? मैं जानकारियों के आधार पर कह सकता हूं कि अब हिंदूस्तान में दूसरी कृषि क्रांति की संभावना अगर कहीं है, तो वह पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, असम, ये भारत के जो पूर्वी इलाके हैं, वहीं पर से दूसरी कृषि क्रांति की संभावना है। इसलिए सरकार ने पूरा अपना ध्यान इस क्षेत्र के विकास की ओर केंद्रित किया है और इस क्षेत्र के विकास के लिए जिस प्रकार से एक research institute का हम आरंभ कर रहे हैं, उसी प्रकार से.. किसान को fertilizer चाहिए, यूरिया चाहिए। इस इलाके में यूरिया के खातर के कारखाने बंद पड़े हैं। हमारी सरकार ने निर्णय किया.. चाहे गोरखपुर का कारखाना हो, चाहे सिंदरी का कारखाना हो, चाहे पश्चिम बंगाल, असम में कारखाने लगाने की बात हो, बिहार में लगाने की बात हो, अरबों, खरबों रूपयों की लागत से इन कारखानों को लगाया जाएगा, चालू किया जाएगा ताकि यहां के किसानों को खाद मिले, यूरिया मिले, उनको खातर मिले और पास में जो उत्पादन होता है, transportation का जो बोझ लगता है, उससे भी उसको मुक्ति मिले और यहां पर खाद के कारखाने लगें तो यहां के नौजवान को रोज़गार भी मिले।

सरकार ने एक महत्वपूर्ण initiative लिया है। आजकल, अगर हम बिमार होते हैं तो डाक्टर दवाई देने से पहले कहता है कि pathology laboratory में जाइए, रक्त परीक्षण करवाईए, यूरिन टेस्ट करवाइए, ब्लड टेस्ट करवाइए, उसके बाद तय करेंगे कि क्या बिमारी है और उसके बाद दवाई देंगे। गांव के अंदर भी आजकल डाक्टर सीधी दवाई देने के बजाए आपको ब्लड टेस्ट कराने के लिए भेजता है। शरीर के अंदर क्या कमी आई है, उसका पता पहले लगाया जाता है, उसके बाद दवाई दी जाती है। जैसा शरीर का स्वाभाव है, वैसा ही हमारी इस धरती माता का भी स्वभाव है। जैसे हम बिमार होते है, वैसे ही ये हमारी धरती माता भी बिमार होती है। जैसे हम अपने शरीर की चिंता करते हैं, वैसे हमें धरती माता की तबियत की भी चिंता करना ज़रूरी है। हमारी धरती माता को क्या बिमारी है? क्या कमियां आईं हैं? हमने किस प्रकार से हमारी धरती माता का दूरूपयोग किया है? कितना हमने उसको चूस लिया है? इसका अध्ययन ज़रूरी है..और इसलिए सरकार ने पूरे देश में हर खेत के लिए soil health card बनाना तय किया है। धरती के परीक्षण के द्वारा उसका एक कार्ड निकाला जाएगा। जैसे इंसान का health card होता है, वैसे किसान की धरती माता का भी health card होगा। आपकी धरती में क्या कमियां है, क्या बिमारियां हैं, आपकी धरती किस फसल के लिए उपयुक्त है, कौन से pesticide लगाना अच्छा है, कौन से लगाना बुरा है, कौन सा fertilizer डालना ठीक है, कौन सा डालना बुरा है, इसकी पूरी समझ किसान को अगर पहले से मिल जाए तो किसान तय कर सकता है कि मेरी ये धरती है, इसमें धान पैदा होगा, दलहन पैदा होंगे, क्या पैदा होगा, वो तय कर सकता है। एक बार यदि अपनी ज़मीन के हिसाब से फसल बोता है, तो उसको ज्यादा आय भी होती है, ज्यादा फसल पैदा होती है। पूरे हिंदूस्तान में वैज्ञानिक तरीके से हम ये बदलाव लाने के लिए लगे हैं ..और ये काम धीरे धीरे नौजवानों को रोज़गार देने वाला भी काम बन सकता है।

आज हिंदुस्तान में जितनी pathology laboratories हैं, वो सरकार कहां चलाती है? सरकार की तो बहुत कम हैं। लोग चलाते हैं, लोग अपना pathology laboratory बनाते हैं, patient आते हैं, परीक्षण करते हैं, अपना खर्चा वो ले लेते हैं, रोज़ी रोटी कमाते हैं, लोगों की तबियत की भी चिंता करते हैं। धीरे धीरे हम देश में नौजवानों को soil health card तैयार करने की laboratory का जाल बिछाने के लिए तैयार करना चाहते हैं। ताकि नौजवान का अपना व्यवसाय बन जाए..ज़मीन, मिट्टी का परीक्षण करने का उसका रोज़गार शुरू हो जाए और गांव का नौजवान गांव में ही कमाई करने लग जाए। उसके रोज़गार के भी द्वार खुल जाएं और ज़मीन के संबंध में किसान को सही जानकारी मिल जाए ताकि वो सही उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ सके, उस दिशा में हम काम कर रहे हैं।

भाईयों-बहनों, हमारे कृषि के साथ पशुपालन का भी उतना ही महत्व है, मतस्य पालन का भी उतना ही महत्व है, मुर्गी पालन का भी उतना ही महत्व है, शहद का काम करना भी उतने ही महत्व का है। हमारी खेती अगर 6 महीना – 8 महीना चलती है तो बाकी समय में ये चीज़ें किसान की आर्थिक स्थिति में लाभ करते हैं। आज हमारे पास जितने पशु हैं, उसकी तुलना में हमारा दूध कम है। दुनिया में पशु कम हैं, दूध का उत्पादन ज्यादा है। हमारे यहां पशु ज्यादा है, दूध का उत्पादन कम है। ये स्थिति हमें पलटनी है। प्रति पशु ज्यादा से ज्यादा दूध कैसे उत्पादन हो..ताकि जो पशुपालक हैं, जो किसान हैं, उसके लिए पशुपालन कभी मंहगा नहीं होना चाहिए। पशुपालन का जितना खर्चा होता है, उससे ज्यादा आय उसको दूध में से मिलना चाहिए। इसलिए हमने डेयरी के क्षेत्र में, झारखंड को भी सेवाएं मिलें, ये अभी अभी निर्णय कर लिया है। झारखंड में भी डेयरी का विकास हो, पशुपालकों को लाभ हो, किसान को खेती के साथ साथ पशुपालन की भी व्यवस्था मिले, उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

मैं एक बार बिहार में भ्रमण कर रहा था, तो वहां लोगों ने मुझे बताया कि बिहार में हर वर्ष करीब 400 करोड़ रूपए की मछली दूसरे राज्यों में से import करके खाते हैं। अब ये 400 करोड़ रूपया कहीं और चला जाता है। अगर वहीं पर सही तरीके से मतस्य उद्योग हो, वहां के नौजवानों को रोज़गार मिले, वहां के लोगों की आवश्यकता की पूर्ति हो तो 400 करोड़ रूपए वहीं बच जाएंगे। उन 400 करोड़ रूपयों से कितने लोगों को रोजी-रोटी मिल जाएगा।

इसलिए हम व्यवस्थाओं को विकसित करना चाहते हैं। हमारे देश में कुछ इलाके ऐसे हैं कि जहां किसान मधुमक्खी के पालन में लगा हुआ है और कुछ किसान तो ऐसे हैं जो शहद के उत्पादन से, मधु के उत्पादन से लाखों रूपयों की कमाई करते हैं। क्या हम हमारे देश में, हर राज्य में कम से कम एक जिला..वहां के किसानों को तैयार करें, मधु के लिए तैयार करें, शहद के लिए तैयार करें। और हर राज्य का एक जिला..जहां के किसान अपनी खेती, पशुपालन के साथ साथ मधु उत्पादन का भी काम करें। मधु खराब भी नहीं होता है। बोतल में पैक करके रख दिया। सालों तक चलता है। आज दुनिया में उसकी मांग है। हम हमारे किसान को आधुनिक रूप से बदलाव लाने की दिशा में ले जाना चाहते हैं।

आज किसान जागरूक हुआ है, Vermicompost की ओर बढ़ा है। क्या हम तय नहीं कर सकते कि पिछली बार हमारे पास सौ किलो earthworm थे.. पिछली बार अगर हमारे पास सौ किलो केंचुए थे, इस बार अगर हमने दो सौ किए। आपको तो सिर्फ एक गड्ढा खोद कर उसमें कूड़ा कचरा डालना है। बाकी काम अपने आप परमात्मा कर देता है। आपकी ज़मीन को भी वो संभालता है और आजकल केंचुओं का बाज़ार भी बहुत बड़ा होता जा रहा है। हमारी ज़मीन भी बचेगी, यूरिया का खपत भी बचेगा। यूरिया के कारण हमारी ज़मीन बरबाद हो रही है, वो भी बचेगी और Vermi-compost के द्वारा हम उत्पादन में वृद्धि ला सकते हैं, ये अपने घर में बैठ करके करने वाले काम हैं, उसको हम कर सकते हैं। इसलिए हम एक integrated approach के साथ हमारे कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने की दिशा में एक के बाद एक कदम उठाने जा रहे हैं।

हमारे देश में आज भी..जब हमारे देश के प्रधानमंत्री थे, लाल बहादुर शास्त्री, उन्होंने एक बार कहा- जय जवान, जय किसान। देश के किसानों को कहा कि अन्न के भंडार भर दो, फिर इस देश के किसान ने कभी पीछे मुड़ करके देखा नहीं। उसने इतनी मेहनत की, इतनी मेहनत की, अन्न के भंडार भर दिए। अब विदेशों से खाने के लिए अन्न नहीं मंगवाना पड़ता। लेकिन मेरे किसान बहनों, भाईयों हमने अन्न के भंडार तो भर दिए, लकिन आज देश के लोगों को, खास करके गरीब लोगों को अपने खाने में दलहन की बड़ी आवश्यकता होती है। प्रोटीन उसी से मिलता है, दाल से मिलता है। हमारे यहां दाल का उत्पादन बहुत कम है, विदेशों से लाना पड़ता है। मैं देश के किसानों से आग्रह करता हूं कि अगर आपके पास पांच एकड़ भूमि है तो चार एकड़ भूमि में आप परंपरागत जो काम करते हैं, करिए। कम से कम एक एकड़ भूमि में आप दलहन की खेती कीजिए। देश को जो pulses बाहर से लाने पड़ते हैं, वो लाने न पड़ें और गरीब से गरीब व्यक्ति को जो दाल चाहिए, वो दाल हम उपलब्ध करा सकें। इसीलिए सरकार ने.. जो minimum support price देते हैं, उसमें pulses के लिए एक विशेष पैकेज दिया है - जो दाल वगैरह पैदा करेंगे, मूंग, चने वगैरह पैदा करेंगे, उनको अतिरिक्त minimum support price मिलेगा ताकि देश में दाल के उत्पादन को बढ़ावा मिले और देश की आवश्यकता हमारे देश का किसान पूर्ण करे।

इन बातों को ले करके हमने एक और काम का बीड़ा उठाया है। वो है- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना। बहुत ही महत्वपूर्ण काम है। अगर हमारे किसान को पानी मिल जाए तो मिट्टी में से सोना पैदा करने की वो ताकत रखता है। आज हमारे देश की ज्यादातर कृषि आसमान पर निर्भर है, ईश्वर पर निर्भर है। बारिश ठीक हो गई तो काम चल जाता है। बारिश अगर ठीक नहीं हुई तो मामला गड़बड़ा जाता है। उसे पानी चाहिए। अगर हम पानी पहुंचाने का प्रबंध ठीक से कर पाते हैं तो सिर्फ एक फसल नहीं, वो दो फसल दे सकता है, कोई तीन फसल ले सकता है और बाकी समय में भी कुछ न कुछ उत्पादन करके वो रोजी-रोटी कमा सकता है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से पूरे हिंदूस्तान में खेतों में पानी पहुंचाने का, एक बहुत बड़ा भगीरथ काम उठाने की दिशा में ये सरकार आगे बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में उस काम को हम पूर्ण करना चाहते हैं।

कितने जलाशय बने हुए हैं। लेकिन उन जलाशयों में खेतों तक पानी ले जाने की व्यवस्था नहीं है। मैं हैरान हूं..बिजली का कारखाना लग जाए लेकिन बिजली वहन करने के लिए जो तार नहीं लगेंगे तो कारखाना किस काम का? जलाशय बन जाए, पानी भर जाए, लेकिन उस पानी को पहुंचाने के लिए अगर नहर नहीं होगी तो उस पानी को देख करके क्या करेंगे? इसलिए देश भर में जलाशयों के बूंद बूंद पानी का उपयोग कैसे हो, हमारा किसान उससे लाभान्वित कैसे हो, उस दिशा में हम काम कर रहे हैं।

भारत जैसे देश में पानी भी बचाना पड़ेगा। इसलिए हमारा आग्रह है- per drop more crop. पानी के हर बूंद से फसल पैदा होनी चाहिए। एक एक बूंद का उपयोग करना चाहिए। micro-irrigation का उपयोग करना चाहिए..टपक सिंचाई, sprinkler, जहां जहां किसानों ने इस आधुनिक technology से पानी का उपयोग किया है, मेहनत भी कम हुई है, खर्चा भी कम हुआ है, उत्पादन ज्यादा बढ़ा है, मुनाफा भी ज्यादा बढ़ा है।

मैं किसानों से आग्रह करता हूं, देश भर के किसानों से आग्रह करता हूं कि आइए, ये हम flood irrigation..क्योंकि किसान का स्वभाव है, जब तक वो खेत में, लबालब पानी से भरा हुआ उसको खेत दिखता नहीं है, तब तक उसको लगता है कि पता नहीं फसल होगी कि नहीं होगी। ये सोच गलत है। फसल को इतने पानी की ज़रूरत नहीं होती है। पानी का प्रभाव भी फसल को नुकसान करता है, पानी का अभाव भी फसल को नुकसान करता है। अगर सही मात्रा में पानी पहुंचे तो उससे सर्वाधिक लाभ होता है। इसलिए micro-irrigation के द्वारा, टपक सिंचाई के द्वारा फसल का लाभ हम कैसे उठाएं, पानी पहुंचा पहुंचा कर कैसे लाभ उठाएं..।

आपने देखा होगा कि अगर कोई बच्चा घर में बीमार रहता है, और आपने अगर सोचा हो कि एक बाल्टी भर दूध ले लें, दूध के अंदर केसर, पिस्ता, बादाम डाल दें और उस बाल्टी भर दूध से रोज़ बच्चे को नहलाना शुरू कर दें। क्योंकि बच्चे की तबियत ठीक नहीं रहती, वजन नहीं बढ़ता है,ढीला ढाला रहता है और पूरे दिन पड़ा रहता है, बच्चे की तरह वो हंसता, खेलता, दौड़ता नहीं है तो एक बाल्टी भर दूध..बादाम हो, पिस्ता हो, केसर हो, उससे उसको नहलाएं, आप मुझे बताएं कि बच्चे को इतने बढि़या दूध से नहलाने से उसकी तबियत ठीक होगी क्या, उसका वजन बढ़ेगा क्या? उसकी सेहत में सुधार होगा क्या? नहीं होगा। लेकिन अगर समझदार मां एक एक चम्मच से एक एक बूंद दूध पिलाती है, शाम तक चाहे 100 ग्राम दूध पिला दे, बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार नज़र आना शुरू हो जाता है। फसल का भी ऐसा ही है, जैसे बच्चे को एक एक चम्मच दूध से बदलाव आता है, फसल को भी, एक एक बूंद पानी अगर उसके मूंह में जाता है तो उसको सचमुच में विकास करने का अवसर मिलता है। जिस प्रकार से हम बच्चे का लालन पालन करते हैं, उसी प्रकार हम फसल का भी लालन पालन कर सकते हैं। इसलिए मैं सभी किसान भाईयों को micro irrigation के लिए, टपक सिंचाई के लिए फ़वारे वाली सिंचाई के लिए आग्रह करता हूं। पानी बचाएंगे, पैसा भी बचेगा और फसल ज्यादा पैदा होगी, इसकी मैं आपको गारंटी देने आया हूं।

सरकार ने एक open university.. किसानों को रोज़मर्रा जानकारियां देने के लिए, रोज़मर्रा प्रशिक्षण करने के लिए, सरकार ने किसान चैनल चालू किया हैं। हमारे देश में कार्टून फिल्मों की चैनल होती है, स्पोर्ट्स की, समाचारों की चैनल होती है, मनोरंजन के लिए चैनल होती है, लेकिन किसानों के लिए चैनल नहीं थी। भारत सरकार ने पिछले महीने सिर्फ और सिर्फ किसानों की आवश्यकताओं के लिए एक किसान चैनल चालू किया। आपने भी अब देखना शुरू किया होगा, उसमें सारी जानकारियां बताई जाती हैं। किसान के सवालों के जवाब दिए जाते हैं, देशभर में कृषि क्षेत्र में क्या क्या प्रगति हुई, उसकी जानकारी दी जाती है। मैं चाहता हूं ये किसान चैनल हमारे देश के किसानों के लिए एक open university के रूप में काम करे। घर घर आ करके हर किसान को वो गाइड करे। किसान और किसान चैनल, कृषि में आधुनिकता कैसे आए कृषि में वैज्ञानिकता कैसे आए, कृषि में बदलाव कैसे आए, उस दिशा में काम करे।

आज जो झारखंड की इस धरती में जो प्रयास आरंभ हुआ है, वो उत्तम स्तर कक्षा के कृषि वैज्ञानिकों को तैयार करेगा, कृषि क्षेत्र के निष्णातों को तैयार करेगा और हमारी कृषि को आधुनिक बनाने की दिशा में झारखंड की धरती पर से एक नया युग प्रारंभ होगा, इसी एक विश्वास के साथ मैं आप सबको, खास करके मेरे किसान भाइयों को हृदय से बहुत बहुत शुभकामनाएं देता हूं। झारखंड को भी बहुत ही जल्द, ये संस्थान निर्माण हो जाए, बहुत तेजी से यहां के विद्यार्थियों को लाभ मिले, उस दिशा में आगे बढ़ें, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद। जय जवान, जय किसान।

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माझ्या प्रिय देशबांधवानो, नमस्कार !

 

दोन दिवसांपूर्वीची काही अद्भुत छायाचित्रे, काही अविस्मरणीय क्षणांच्या ताज्या आठवणी आताही माझ्या डोळ्यांसमोर आहेत. त्यामुळे, यावेळच्या ‘मन की बात’ ची सुरुवात याच क्षणांनी करुया. टोक्यो ऑलिंपिक मध्ये भारतीय खेळाडूंना तिरंगा घेऊन चालतांना बघून केवळ मीच नाही, तर संपूर्ण देश रोमांचित झाला होता. त्याक्षणी, संपूर्ण देशाने जणू एकत्र येत, आपल्या या योद्ध्यांना म्हटले -

विजयी भव ! विजयी भव !

जेव्हा हे खेळाडू भारतातून गेले, त्याआधी मला त्यांच्याशी बोलण्याची, त्यांचे आयुष्य जाणून घेण्याची आणि देशालाही ते सांगण्याची संधी मिळाली होती. हे खेळाडू, आयुष्यातील अनेक आव्हानांवर मात करत, इथे पोहोचले आहेत.

आज त्यांच्याजवळ आपले प्रेम आणि सर्वांच्या पाठिंब्याची ताकद आहे- त्यामुळे चला, आपण सगळे मिळून आपल्या या सर्व खेळाडूंना शुभेच्छा देऊया, त्यांचा उत्साह वाढवूया. सोशल मीडियावर देखील ऑलिंपिक खेळाडूंना पाठिंबा देण्यासाठी आता व्हिक्टरी पंच कॅम्पेन म्हणजेच विजयी ठोसा अभियान सुरु झाले आहे. आपणही आपल्या चमू सोबत आपला व्हिक्टरी पंच शेयर करा, भारतासाठी चीयर करा !

 मित्रांनो, जो देशासाठी तिरंगा हातात घेतो, त्याच्या सन्मानार्थ आपल्या भावना अभिमानाने उचंबळून येणं स्वाभाविक आहे. देशभक्तीची हीच भावना आपल्या सर्वांना एकमेकांशी बांधून ठेवते. उद्या, म्हणजेच 26 जुलै रोजी, ‘कारगिल विजय दिवस’ही आहे. कारगिलचे युद्ध भारतीय सैन्याच्या शौर्य आणि संयमाचे असे प्रतीक आहे, जे संपूर्ण जगाने पहिले आहे. यावर्षी हा गौरवास्पद दिवस देखील अमृत महोत्सवाच्या दरम्यान साजरा केला जाणार आहे, त्यामुळे तो आणखीनच विशेष आहे. माझी अशी विनंती आहे की तुम्ही सर्वांनी कारगिल युद्धाची रोमांचकारी कथा नक्की वाचा. कारगिलच्या योद्ध्यांना आपण सर्व आधी वंदन करूया.

मित्रांनो

यावर्षी, 15 ऑगस्ट रोजी देश आपल्या स्वातंत्र्याच्या 75 व्या वर्षात प्रवेश करत आहे. आपले हे खूप मोठे भाग्य आहे की जे स्वातंत्र्य मिळवण्यासाठी , देशाने कित्येक शतके वाट पहिली, त्या देशाच्या स्वातंत्र्याला 75 वर्षे पूर्ण होत असतांनाच्या क्षणांचे आपण साक्षीदार बनणार आहोत.

आपल्याला आठवत असेल, स्वातंत्र्याचा हा अमृत महोत्सव आपण 12 मार्चपासून महात्मा गांधींच्या साबरमती आश्रमातून केली होती. याच दिवशी, बापूंच्या दांडी यात्रेचे पुनरुज्जीवन करण्यात आले होते. तेव्हापासून, जम्मू-काश्मीर पासून ते पुडदूचेरीपर्यंत, गुजरातपासून ते ईशान्येकडील राज्यांपर्यंत अमृत महोत्सवासही संबंधित कार्यक्रम होत आहेत. अशा अनेक घटना, ज्यांचे योगदान तर खूप आहेच, मात्र त्यांची म्हणावी तेवढी चर्चा झाली नाही,- आज लोक त्यांच्याविषयीही जाणून घेत आहेत. आता जसे की मोईरांग डे चेच बघा ना! माणिपूरची छोटीशी वस्ती मोईरांग, कधीकाळी नेताजी सुभाषचंद्र बोस यांच्या भारतीय राष्ट्रीय लष्कर म्हणजे आयएनएचे प्रमुख केंद्र होते. इथे स्वातंत्र्याच्या पहिल्याच लढाईआधी, आयएनएच्या शौकत मलिक जी यांनी भारताचा झेंडा फडकवला होता. या अमृत महोत्सवादरम्यान, 14 एप्रिल रोजी याच मोईरांग मध्ये पुन्हा एकदा तिरंगा फडकवण्यात आला. असे कितीतरी स्वातंत्र्य संग्राम सैनिक आणि महापुरुष आहेत ,ज्यांचे आपण यानिमित्ताने स्मरण करत आहोत. सरकार आणि सामाजिक संस्थांकडूनही सातत्याने याच्याशी संबंधित कार्यक्रम आयोजित केले जात आहेत. यंदाच्या 15 ऑगस्टलाही असेच एक आयोजन होणार आहे. हा एक प्रयत्न आहे- राष्ट्रगीताशी संबंधित.  सांस्कृतिक मंत्रालयाचा प्रयत्न आहे की त्या दिवशी, जास्तीत जास्त भारतीयांनी एकाच वेळी राष्ट्रगीत गायचे. यासाठी एक संकेतस्थळ देखील तयार करण्यात आले आहे- Rashtragaan.in

 

या संकेतस्थळाच्या मदतीने आपण राष्ट्रगीत गाऊन ते ध्वनिमुद्रित करु शकाल आणि या अभियानात सहभागी होऊ शकाल. मला आशा आहे, आपण या विशेष उपक्रमात नक्की सहभागी व्हाल. अशाच प्रकारचे अनेक अभियान, अनेक उपक्रम आपल्याला येत्या  काळात बघायला मिळणार आहेत. “अमृत महोत्सव’ हा कुठल्या सरकारचा कार्यक्रम नाही, तर हा कोट्यवधी भारतवासियांचा कार्यक्रम आहे. प्रत्येक स्वतंत्र आणि कृतज्ञ भारतीयाने आपल्या स्वातंत्र्यसैनिकांना केलेले हे वंदन आहे. या महोत्सवाच्या मूळ भावनेचा विस्तार तर बराच मोठा आहे. –ही भावना आहे, आपल्या स्वातंत्र्यसैनिकांच्या मार्गावरुन चालणे, त्यांच्या स्वप्नातल्या देशाची उभारणी करणे. जशाप्रकारे, देशाला स्वातंत्र्य मिळवून देण्यासाठी ते सगळे झपाटलेले लोक एकत्र होऊन लढले होते, तसेच आपल्याला देशाच्या विकासासाठी एकत्र यायचे आहे. आपल्याला देशासाठी जगायचे आहे, देशासाठी काम करायचे आहे. आणि या प्रवासात अगदी छोटी छोटी कामेदेखील मोठा प्रभाव पाडू शकतात. आपली दैनंदिन कामे करतांनाही आपण राष्ट्र निर्मितीचे काम करु शकतो. जसे की ‘व्होकल फॉर लोकल’. आपल्या देशातील स्थानिक उद्योजक, कलाकार, शिल्पकार, विणकर यांना आधार देणे, हे आपल्या रोजच्या सवयीचा भाग बनले पाहिजे. सात ऑगस्ट रोजी येणारा ‘राष्ट्रीय हातमाग दिवस’ आपल्यासाठी अशी एक संधी आहे ज्यावेळी आपण प्रयत्नपूर्वक हे काम करु शकतो. राष्ट्रीय हातमाग दिनामागेही खूप मोठी ऐतिहासिक पार्श्वभूमी आहे.याच दिवशी, 1905 साली स्वदेशी आंदोलनाची सुरुवात झाली होती.  

मित्रांनो,

आपल्या देशातील ग्रामीण आणि आदिवासी भागात, हातमाग, उत्पन्नाचे एक महत्त्वाचे साधन आहे. हे एक असे क्षेत्र आहे, ज्याच्याशी, लाखों महिला, लाखो विणकर, लाखो शिल्पकार जोडलेले आहेत. आपले छोटे छोटे प्रयत्न, वीणकरांमध्ये एक नवी उमेद जागवू शकतात. आपण स्वतः काही ना काही तरी खरेदी करा, आणि आपले अनुभव इतरांनाही सांगा. जेव्हा आपण स्वातंत्र्याचा अमृत महोत्सव साजरा करत आहोत, अशावेळी एवढे काम करणे आपली निश्चितच जबाबदारी आहे, मित्रांनो !

आपण पहिले असेल 2014 पासूनच आपल्या ‘मन की बात’ मध्ये आपण नेहमीच खादीवर चर्चा करतो. आपल्याच प्रयत्नांमुळे आज देशात खादीची विक्री कित्येक पटीने वाढली आहे. कोणी कधी विचार केला असेल का, की खादीच्या कुठल्या दुकानात एकाच दिवशी, एक कोटींपेक्षा अधिक विक्री होऊ शकते ! मात्र, आपण हे देखील करुन दाखवले आहे. आपण जेव्हाही कधी खादीचे कोणतेही उत्पादन खरेदी करता, तेव्हा त्याचा लाभ, आपल्या गरीब  वीणकर बंधू-भगिनींना होतो.

यामुळेच, खादीची खरेदी करणे एकप्रकारे लोकसेवाही आहे आणि देशसेवाही आहे. माझी आपल्याला आग्रही विनंती आहे, की आपण सर्व, माझे प्रिय बंधू-भगिनी, ग्रामीण भागात तयार होणाऱ्या हातमागाच्या वस्तू जरूर खरेदी करा. आणि त्या वस्तू #MyHandloomMyPride वर शेयर करा.  

मित्रांनो, जेव्हा आपण स्वातंत्र्य आंदोलन आणि खादीविषयी बोलतो आहोत, त्यावेळी बापूंचे स्मरण होणे स्वाभाविक आहे. जसे बापूंच्या नेतृत्वाखाली ‘भारत छोडो आंदोलन’ झाले होते, तसेच आज प्रत्येक भारतीयाला ‘भारत जोडो’ आंदोलनाचे नेतृत्व करायचे आहे. हे आपले कर्तव्य आहे, की आपण आपले काम अशाप्रकारे करावे, जे विविधतांनी भरलेल्या आपल्या भारताला एकत्र आणण्यासाठी उपयुक्त ठरेल. चल तर मग, आपण अमृत महोत्सवानिमित्त हा अमृत संकल्प  घेऊया, की देशच कायम आपली सर्वात मोठी ‘आस्था’ आणि सर्वात मोठी प्राथमिकता असेल. “Nation First, Always First”, हा मंत्र घेऊनच आपल्याला पुढे वाटचाल करायची आहे.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो, आज मी ‘मन की बात’ ऐकणाऱ्या माझ्या युवा मित्रांचे विशेष आभार मानू इच्छितो. अगदी काही दिवसांपूर्वी, माय गव्ह च्या वतीने ‘मन की बात’ च्या श्रोत्यांविषयी एक अध्ययन करण्यात आले होते. या अध्ययनात असे आढळले की ‘मन की बात’ साठी संदेश आणि सूचना पाठवणाऱ्या लोकांमध्ये प्रामुख्याने कोणते लोक आहेत?

 तर अध्ययनातून ही माहिती पुढे आली की, मला संदेश आणि सूचना पाठवणाऱ्या लोकांमध्ये सुमारे 75 टक्के लोक 35 वर्षांपेक्षा कमी वयाचे आहेत. म्हणजेच, भारताच्या युवा शक्तिच्या सूचना ‘मन की बात’ ला दिशा देत आहेत. मी हा खूप चांगला संकेत आहे, असे मानतो. ‘मन की बात’ हे एक असे माध्यम आहे, जिथे सकारात्मकता आहे, संवेदनशीलता आहे. ‘मन की बात’ मध्ये आपण अनेक सकारात्मक गोष्टी करतो. या कार्यक्रमांचे स्वरूप एकोप्याचे आहे. सकारात्मक विचार आणि सूचनांसाठी, भारताच्या युवकांची सक्रियता मला आनंदीत करते आहे. मला याचाही आनंद आहे, की मन की बात च्या माध्यमातून मला युवकांचे मन जाणण्याची देखील संधी मिळते आहे.

मित्रांनो, आपल्याकडून मिळालेल्या सूचना, हीच ‘मन की बात’ ची खरी ताकद आहे. आपल्या सूचनाच, ‘मन की बात’ च्या माध्यमातून भारताची विविधता प्रकट करत असतात. भारतवासियांच्या सेवा आणि त्यागाचा सुगंध, चारी दिशांना पसरवत असतात. आपल्या परिश्रमी युवकांची संशोधने सर्वाना प्रेरित करत असतात. ‘मन की बात’ मध्ये आपण कितीतरी प्रकारच्या कल्पना पाठवत असता.आपण सर्वांवर तर चर्चा करु शकत नाही, मात्र त्यातील बहुतांश कल्पना मी संबंधित विभागांना नक्कीच पाठवत असतो. जेणेकरुन, त्या कल्पना प्रत्यक्षात अमलात आणल्या जाव्यात.

मित्रांनो, मी आज आपल्याला साई-प्रनीथ यांच्या प्रयत्नाविषयी सांगणार आहे. साई-प्रनीथ जी, एक सॉफ्टवेअर इंजिनियर आहेत, आंध्रप्रदेशचे रहिवासी आहेत. गेल्या वर्षी त्यांनी पहिले की त्यांच्या भागात खराब हवामानामुळे अनेक शेतकऱ्यांचे खूप नुकसान झाले. हवामान शास्त्र विषयात त्यांना पूर्वीपासूनच रस होता, आणि म्हणूनच, त्यांनी आपल्या या रुचिचा आणि कौशल्याचा वापर शेतकऱ्यांच्या कल्याणासाठी घेण्याचा निर्णय घेतला. ते आता वेगवेगळ्या डेटा स्त्रोतांकडून हवामानाचा डेटा विकत घेतात, त्याचे विश्लेषण करतात आणि स्थानिक भाषेत, वेगवेगळ्या माध्यमांच्या मदतीने शेतकऱ्यांपर्यंत आवश्यक ती माहिती पोचवतात. हवामानाच्या माहितीशिवाय, प्रणीथजी वेगवेगळ्या हवामानात लोकांनी काय करायला हवे, याचेही मार्गदर्शन करतात. विशेषतः पूरापासून संरक्षण करण्यासाठी किंवा वादळ  आणि वीज पडल्यावर, त्यापासून कसे संरक्षण करायचे, याची माहितीही ते लोकांना देतात.

मित्रांनो,

एकीकडे, या तरुण सॉफ्टवेअर अभियंत्याचा हा प्रयत्न मनाला स्पर्शून जाणारा आहे. तर दुसरीकडे आमच्या एका मित्राकडून होणारा तंत्रज्ञानाचा वापरही, आपल्याला थक्क करुन सोडेल.

 हे मित्र आहेत, ओडिशाच्या संबलपूर जिल्ह्यात एका गावात राहणारे श्री इसाक मुंडा जी. ईसाक जी एकेकाळी रोजंदारी स्वरुपात काम करत होते, मात्र आता ते इंटरनेटवर गाजत आहेत. त्यांच्या यू ट्यूब चॅनेल मधून ते उत्तम पैसे कमावत आहेत. ते आपल्या व्हिडिओ मधून स्थानिक पदार्थ, पारंपरिक स्वयंपाक बनवण्याच्या पद्धती, आपले गाव, आपली जीवनशैली, कुटुंब आणि आहारविहाराच्या सवयी, अशा गोष्टी दाखवत असतात. एक YouTuber म्हणून त्यांनी आपला प्रवास, मार्च 2020 पासून सुरु केला होता. त्यावेळी, त्यांनी ओडिशातीळ सुप्रसिद्ध स्थानिक पदार्थ, ‘पखाल’ शी संबंधित, एक व्हिडिओ पोस्ट केला होता. तेव्हापासून त्यांनी शेकडो व्हिडिओ पोस्ट केले आहेत. त्यांचा हा प्रयत्न अनेक कारणांनी सर्वात वेगळा आहे. विशेषतः यासाठी की या उपक्रमामुळे शहरात राहणाऱ्या लोकांना ती जीवनशैली बघण्याची संधी मिळते, ज्याविषयी त्यांना विशेष काही माहिती नसते. ईसाक मुंडा जी संस्कृती आणि पदार्थ या दोघांना एकत्रित घेऊन, त्याचा उत्सव साजरा करतात आणि त्यातून आपल्या सर्वांना प्रेरणाही देतात.

मित्रांनो, आता आपण जेव्हा तंत्रज्ञानाविषयी बोलतो आहोत, तेव्हा मी आणखी एका रोचक विषयावर चर्चा करु इच्छितो.

आपण अलीकडेच वाचले असेल, पहिले असेल की आयआयटी मद्रास च्या माजी विद्यार्थ्यानी स्थापन केलेल्या एक स्टार्ट-अप ने एक थ्री-डी प्रिंटेड हाऊस तयार केले आहे. या थ्री-डी प्रिंटिंग ने घराची निर्मिती कशी शक्य झाली? तर, या स्टार्ट अप ने सर्वात आधी, थ्री-डी प्रिंटर मध्ये एक त्रिमीतीय चित्र भरले आणि एका विशिष्ट प्रकारच्या काँक्रीटच्या माध्यमातून, थरावर थर चढवत, एक  थ्री-डी संरचना तयार केली. आपल्याला हे जाणून अत्यंत आनंद होईल, की देशात अशाप्रकारचे अनेक प्रयोग सुरु आहेत. एक काळ असा होता, जेव्हा छोट्या छोट्या बांधकामालाही कित्येक वर्षे लागत असत. मात्र, आता तंत्रज्ञानामुळे भारतातील परिस्थिति बदलली आहे. काही काळापूर्वी, आपण जगभरातील अशा नवोन्मेषी कंपन्यांना आमंत्रित करण्यासाठी एक जागतिक गृहनिर्माण तंत्रज्ञान आव्हान स्पर्धा आयोजित केली होती. हा देशातील अशा वेगळ्या प्रकारचा पहिलाच प्रयोग होता, ज्याला आम्ही लाईट हाऊस प्रयोग असे नाव दिले होते. सध्या देशात सहा विविध ठिकाणी, लाईट हाऊस प्रकल्पांवर अत्यंत वेगाने काम सुरु आहे. या लाईट हाऊस प्रकल्पांमध्ये अत्याधुनिक तंत्रज्ञान आणि अभिनव कार्यपद्धतींचा वापर केला जातो. यामुळे बांधकामाचा कालावधी कमी होतो. त्यासोबतच, जी घरे तयार होतात, ती अधिक टिकावू, किफायतशीर आणि आरामदायी असतात. मी अलिकडेच, ड्रोन च्या माध्यमातून या प्रकल्पांचा आढावा घेतला आणि त्यांच्या कामाची प्रगती देखील प्रत्यक्ष पाहिली.

इंदौरच्या प्रकल्पात विटा आणि सीमेंट काँक्रीटच्या भिंतीच्या ऐवजी प्री- फॅब्रिकेटेड सँडविच पॅनल सिस्टिमचा वापर केला जात आहे. राजकोट इथे, लाईट हाऊस फ्रेंच तंत्रज्ञानाच्या मदतीने तयार केले जात आहेत. ज्यात, बोगद्याच्या माध्यमातून, मोनोलिथिक काँक्रीट बांधकाम तंत्रज्ञानाचा वापर केला जात आहे. या तंत्रज्ञानाने तयार झालेली घरे, संकटांचा सामना करण्यासाठी अधिक सक्षम असतील. चेन्नईत, अमेरिका आणि फिनलंडचे तंत्रज्ञान, प्री-कास्ट काँक्रीट सिस्टिमचा  वापर होत आहे. त्यामुळे घरे लवकर बनतील आणि त्यासाठी खर्च देखील कमी येईल. रांची इथे जर्मनीच्या थ्री-डी बांधकाम तंत्रज्ञानाचा वापर करुन घरे बांधली जाणार आहेत. यात प्रत्येक खोली वेगवगेळया जागी बनवली जाईल.  आणि त्यानंतर हे पूर्ण बांधकाम एकमेकांशी जोडले जाईल. अगरतला इथे न्यूझीलैंड च्या तंत्रज्ञानाचा वापर करत पोलादी चौकटी वापरुन घरे बनवली जात आहेत, ही घरे मोठ्या भूकंपाचाही सामना करु शकतील. तसेच, लखनौ इथे, कॅनडाच्या तंत्रज्ञानाचा वापर केला जात आहेत, यात प्लास्टर आणि पेंटची गरज पडत नाही. आणि जलद गतीने घरे तयार करण्यासाठी आधीपासूनच तयार असलेल्या भिंतींचा वापर केला जात आहे.

मित्रांनो, आज देशात हे सगळे जे प्रयोग होत आहेत, ते प्रकल्प मूळ, इनक्युबेशन केंद्र म्हणून कामी येतील. यामुळे आमचे गृहनिर्माण नियोजनकर्ते, स्थापत्यतज्ञ, अभियंते आणि विद्यार्थी नवे तंत्रज्ञान समजू  शकतील आणि त्याचे प्रत्यक्ष प्रयोगही करु शकतील. मी मुद्दामच या सगळ्या गोष्टी, युवकांना सांगतो आहे, जेणेकरुन आमचे युवक, राष्ट्रहितासाठी तंत्रज्ञानाच्या नवनवीन क्षेत्रांना प्रोत्साहन देऊ शकतील.

 मी या गोष्टी विशेषत आपल्या युवकांसाठी सांगत आहे , जेणेकरून आपले  युवक राष्ट्रहितासाठी  तंत्रज्ञानाच्या नवनवीन क्षेत्रांकडे प्रोत्साहित होऊ शकतील .  माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,

 तुम्ही इंग्रजीत एक म्हण ऐकली असेल – “To Learn is to Grow” अर्थात  शिकणं म्हणजेच  पुढे जाणे आहे.  जेव्हा आपण काही नवीन शिकतो , तेव्हा आपल्यासाठी प्रगतीचे नवनवीन मार्ग आपोआप खुले होतात.  जेव्हा कधी  काहीतरी वेगळं नवीन करण्याचा प्रयत्न झाला आहे,  मानवतेसाठी नवीन कवाडे खुली झाली आहेत,  एका नवीन युगाचा प्रारंभ झाला आहे . आणि तुम्ही पाहिलं असेल,  जेव्हा काही नवीन घडते,  तेव्हा त्याचा परिणाम प्रत्येकालाच आश्चर्यचकित करतो. आता जसे की मी  तुम्हाला विचारलं की असं कोणते  राज्य आहे , ज्याचा संबंध तुम्ही सफरचंदाशी जोडाल?  सर्वांनाच माहित आहे , तुमच्या मनात सर्वप्रथम हिमाचल प्रदेश , जम्मू-काश्मीर , उत्तराखंडचे नाव येईल. मात्र  जेव्हा मी म्हणेन की या यादीत तुम्ही मणिपूरला देखील जोडा तेव्हा कदाचित तुम्हाला आश्चर्य वाटेल . काही तरी नवीन करण्याची उर्मी घेऊन युवकांनी मणिपूरमध्ये ही कामगिरी करून दाखवली आहे.  सध्या मणिपूरच्या उखरुल जिल्ह्यात सफरचंदाची शेती मोठ्या प्रमाणात सुरू आहे. इथले शेतकरी आपल्या बागांमध्ये सफरचंद पिकवत  आहेत. सफरचंद पिकवण्यासाठी इथल्या  लोकांनी खास हिमाचल प्रदेशात जाऊन प्रशिक्षण देखील घेतले आहे. यापैकीच एक आहेत  टी एस रिंगफामी योंग . योंग हे व्यवसायाने एरोनॉटिकल इंजिनीअर आहेत . त्यांनी पत्नी टी.एस. एंजेल यांच्या मदतीने सफरचंदाची शेती केली आहे . त्याचप्रमाणे अवुन्गशी शिमरे ऑगस्टीना  यांनी देखील आपल्या बागांमध्ये सफरचंदाचे  उत्पादन घेतले आहे . अवुन्गशी दिल्लीमध्ये नोकरी करत होत्या . ही नोकरी सोडून त्या आपल्या गावात परत गेल्या आणि सफरचंदाची शेती सुरू केली. मणिपूरमध्ये आज असे अनेक सफरचंद उत्पादक आहेत, ज्यांनी काही वेगळे आणि नवीन करून दाखवले आहे.

 मित्रांनो आपल्या आदिवासी समुदायात बोरे  खूप लोकप्रिय आहेत.  आदिवासी समुदायाचे लोक नेहमीच बोरांची  शेती करतात . मात्र कोविड -19 महामारी नंतर याची शेती विशेष  वाढली आहे. त्रिपुराच्या उनाकोटी येथील असेच 32 वर्षांचे युवक मित्र आहेत विक्रमजीत चकमा. त्यांनी बोरांची लागवड  करून खूप नफा कमावला आणि आता ते लोकांना बोरांचे पीक घेण्यासाठी  देखील प्रेरित करत आहेत.  राज्य सरकार देखील अशा लोकांच्या मदतीसाठी पुढे आले आहे सरकारकडून यासाठी अनेक विशेष बागा तयार केल्या जात आहेत, जेणेकरून बोरांच्या लागवडी संबंधित लोकांची मागणी पूर्ण करता येईल. शेती मध्ये संशोधन होत आहे,  तर शेतीच्या इतर दुय्यम उत्पादनांमध्ये देखील सर्जनशीलता पाहायला मिळत आहे.

मित्रांनो मला उत्तर प्रदेशच्या लखीमपुर-खीरी मध्ये करण्यात आलेल्या एका प्रयत्नाबद्दल माहिती समजली आहे . कोविडच्या काळात लखीमपुर-खिरी  मध्ये एक अनोखा उपक्रम हाती घेण्यात आला. तिथल्या महिलांना केळ्याच्या तणांपासून फायबर बनवण्याचे प्रशिक्षण देण्याचं काम सुरू करण्यात आले आहे . कचऱ्यापासून टिकाऊ सर्वोत्तम वस्तू  बनवण्याचा मार्ग. केळ्यांचे तण कापून मशीनच्या मदतीने हे फायबर तयार केलं जातं , जे ज्यूट  प्रमाणे असतं .  या फायबरपासून  हॅन्ड बॅग,  सतरंजी असे कितीतरी वस्तू बनवल्या जातात .

 यामुळे एक तर पिकांचा कचर्‍याचा वापर सुरू झाला आहे आणि दुसरीकडे गावात राहणाऱ्या आपल्या भगिनी आणि मुलींना उत्पन्नाचे एक साधन देखील मिळाले आहे . बनाना फायबरच्या या कामात एका स्थानिक महिलेची  रोजची 400 ते 600 रुपये कमाई होते.  लखीमपुर-खीरी मध्ये शेकडो एकर जमिनीवर केळ्याची शेती होते . केळ्यांचे पीक घेतल्यानंतर  साधारणपणे शेतकऱ्यांना तण फेकण्यासाठी वेगळा खर्च करावा लागत होता . आता त्यांचे पैसे देखील वाचतात.  म्हणजेच आम के आम , गुठलियो  के दाम ही म्हण इथे अगदी चपखल बसते.

 मित्रांनो एकीकडे बनाना फायबर पासून वस्तू  बनवल्या जात आहेत  तर दुसरीकडे केळ्याच्या पिठापासून डोसे आणि गुलाबजाम सारखे स्वादिष्ट पदार्थ देखील तयार होत आहेत.  कर्नाटकच्या उत्तर कन्नड आणि दक्षिण कन्नड जिल्ह्यांमध्ये महिला हे वैशिष्ट्यपूर्ण कार्य करत आहेत.

त्याची सुरुवात देखील कोरोना काळातच  झाली . या महिलांनी  केळ्याचा पिठापासून केवळ डोसा ,  गुलाबजाम सारखे पदार्थ नुसते बनवले नाहीत तर त्याची  छायाचित्रे देखील सोशल मीडियावर शेअर केली आहेत . जेव्हा जास्तीत जास्त लोकांना या पीठाबाबत समजले  तेव्हा  त्यांची मागणी आणखी वाढली आणि  या महिलांचे उत्पन्न देखील. लखीमपुर-खीरी प्रमाणेच इथेही ही नावीन्यपूर्ण कल्पना महिलाच राबवत आहेत.

मित्रांनो अशी  उदाहरणे  आयुष्यात काही तरी नवीन करण्याची प्रेरणा देतात . तुमच्या आसपास देखील असे अनेक लोक असतील.  जेव्हा तुमचं कुटुंब मनातल्या गुजगोष्टी सांगत असेल तेव्हा तुम्ही या गोष्टीदेखील तुमच्या गप्पांमध्ये समाविष्ट करा.

कधीतरी वेळ काढून मुलांबरोबर असे उपक्रम पहायला जा आणि  संधी मिळाली तर स्वतःदेखील असं काहीतरी करून दाखवा. आणि हो आणि हे सगळं तुम्ही माझ्याबरोबर NamoApp किंवा  MyGov वर  शेअर केलं तर मला खूप छान वाटेल.

माझ्या प्रिय देशबांधवांनो,  आपल्या संस्कृत ग्रंथांमध्ये एक श्लोक आहे-

आत्मार्थम् जीव लोके अस्मिन्, को न जीवति मानवः |

        परम् परोपकारार्थम्, यो जीवति स जीवति ||

अर्थात स्वतःसाठी या जगात प्रत्येक जण जगत असतो मात्र वास्तवात खरेतर ती व्यक्ती जगत असते जी परोपकारासाठी जगते.  भारत मातेच्या सुपुत्रांच्या परोपकारी प्रयत्नांच्या गोष्टी हीच तर आहे मन की बात. आज देखील अशाच काही अन्य मित्रांबाबत आपण बोलणार आहोत . एक मित्र चंदीगड शहरातलेआहेत.  चंदीगड मध्ये मी देखील काही वर्ष राहिलो आहे . खूपच आनंदी आणि सुंदर शहर आहे.  तिथे राहणारे लोक देखील दिलदार आहेत . आणि हो, तुम्ही जर खाण्याचे शौकीन असाल तर इथे तुम्हाला आणखी मजा येईल. या चंदिगडमधील सेक्टर 29 मध्ये संजय राणा फुड स्टॉल चालवतात.

आणि सायकलवर  छोले भटूरे विकतात.  एक दिवस त्यांची मुलगी रिद्धिमा आणि भाची रिया एक कल्पना घेऊन त्यांच्याकडे आल्या.  दोघींनीही त्यांना कोविड लस  घेणाऱ्यांना मोफत छोले-भटूरे खायला द्यायला  सांगितलं. ते  आनंदाने तयार झाले आणि त्यांनी लगेच हे उत्तम आणि नेक कार्य सुरु केले. संजय राणा यांचे छोले-भटूरे मोफत खाण्यासाठी तुम्हाला दाखवावे लागेल कि तुम्ही त्यादिवशी लस घेतलेली आहे.  लसीकरणाचा संदेश दाखवला की लगेचच  ते तुम्हाला स्वादिष्ट छोले-भटूरे देतील. असे म्हणतात समाजाच्या कल्याणासाठी काम करण्यासाठी पैशांपेक्षा जास्त सेवाभाव, कर्तव्य भावनेची अधिक गरज असते . आपले संजय भाऊ हेच सिद्ध करत आहे.

मित्रांनो अशाच आणखी एका कामाची चर्चा मला करायची आहे. हे काम  तामिळनाडूच्या निलगिरी मध्ये होत आहे. तिथे राधिका शास्त्री यांनी एम्बुरेक्स प्रकल्पाची सुरुवात केली आहे.  डोंगराळ भागातल्या रुग्णांना उपचारासाठी सहजपणे वाहतुकीचे  साधन उपलब्ध करून देणे हा या प्रकल्पाचा  उद्देश आहे. राधिका कून्नूरमध्ये एक कॅफे चालवतात . त्यांनी आपल्या कॅफेच्या सहकाऱ्यांच्या मदतीने एम्बुरेक्स साठी निधी जमा केला. निलगिरी डोंगरावर आज सहा एम्बुरेक्स कार्यरत आहे आणि दुर्गम भागातल्या आपत्कालीन स्थितीत रुग्णांसाठी उपयुक्त ठरत आहेत. एम्बुरेक्समध्ये स्ट्रेचर,  ऑक्सीजन सिलेंडर , फर्स्ट एड बॉक्स यासारख्या अनेक गोष्टींची व्यवस्था केली आहे.

मित्रांनो संजय असोत किंवा राधिका , त्यांच्या उदाहरणातून असं दिसून येतं की आपण आपलं कार्य आपला व्यवसाय , नोकरी करता करता सेवाकार्य  देखील करू शकतो.

 मित्रांनो काही दिवसांपूर्वी एक खूपच रोचक आणि खूपच भावनिक घटना घडली, ज्यामुळे  भारत जॉर्जिया मैत्रीला बळकटी मिळाली.  या कार्यक्रमात भारताने सेंट क्वीन केटेवानच्या  होली रेलिक म्हणजेच त्यांचे पवित्र स्मृतिचिन्ह जॉर्जियाचे  सरकार आणि तिथल्या जनतेकडे सुपूर्द केले. यासाठी आपले परराष्ट्रमंत्री स्वतः तिथे गेले होते . अतिशय भावनिक वातावरणात झालेल्या कार्यक्रमात जॉर्जियाचे राष्ट्रपती,  पंतप्रधान अनेक धर्मगुरू आणि मोठ्या संख्येने जॉर्जियाची जनता उपस्थित होती. या कार्यक्रमात भारताची प्रशंसा करताना जे गौरवोद्गार काढण्यात आले ते कायम स्मरणात  राहतील . या एका कार्यक्रमाने दोन्ही देशांबरोबरच गोवा आणि जॉर्जिया  दरम्यान संबंध देखील अधिक दृढ केले आहेत. असं यासाठी कारण सेंट क्वीन केटेवान यांचे हे अवशेष  २००५ मध्ये गोव्याच्या सेंट ऑगस्टीन चर्च येथे सापडले होते .

मित्रानो, तुमच्या मनात प्रश्न निर्माण झाला असेल हे सगळं काय  आहे आणि हे सगळं केव्हा झाले?  खरं तर ही चारशे पाचशे  वर्षांपूर्वीची गोष्ट आहे .क्वीन केटेवान जॉर्जियाच्या राज परिवारातील मुलगी होती . दहा वर्षांच्या तुरुंगवासानंतर  १६२४ मध्ये ती शहीद झाली होती . एका प्राचीन पोर्तुगाल दस्तावेनुसार सेंट  क्वीन केटेवानच्या  अस्थी जुन्या गोव्याच्या सेंट ऑगस्टीन कॉन्व्हेंट मध्ये ठेवण्यात आल्या होत्या. मात्र  दीर्घकाळ असे मानले जात होते की गोव्यामध्ये दफन करण्यात आलेले तिचे अवशेष 1930 च्या भूकंपात गायब झाले होते .

भारत सरकार आणि जॉर्जियाचे इतिहासकार,  संशोधक पुरातत्व शास्त्रज्ञ  आणि जॉर्जियन चर्चच्या अनेक दशकांच्या अथक प्रयत्नानंतर 2005 मध्ये ते पवित्र अवशेष शोधण्यात यश मिळाले होते. हा विषय जॉर्जियाच्या लोकांसाठी खूपच भावनात्मक आहे . म्हणून  त्यांचं ऐतिहासिक धार्मिक आणि अध्यात्मिक भावना लक्षात घेऊन भारत सरकारने या  अवशेषांचा एक भाग जॉर्जियाच्या जनतेला  भेट देण्याचा निर्णय घेतला. भारत आणि जॉर्जियाचा सामायिक इतिहासातील  या बाबी जपून ठेवल्याबद्दल मी आज गोव्याच्या जनतेचे मनः पूर्वक आभार मानतो . गोवा अनेक महान आध्यात्मिक वारसांची भूमी आहे.  सेंट ऑगस्टीन चर्च युनेस्कोच्या जागतिक वारसा स्थळ (गोव्याचे चर्चेस आणि कॉन्व्हेंट) चा  एक भाग आहे .

माझ्या प्रिय देश बांधवांनो,  जॉर्जिया मधून आता मी तुम्हाला थेट सिंगापूरला घेऊन जातो , जिथे या महिन्याच्या सुरुवातीला आणखी एक गौरवशाली संधी समोर आली. पंतप्रधान आणि माझे मित्र ली सेन लुंग यांनी अलीकडेच नूतनीकरण केलेल्या सिलाट रोड गुरुद्वाराचे  उद्घाटन केलं. त्यांनी पारंपारिक पगडी देखील घातली होती . हा गुरूद्वारा  सुमारे शंभर वर्षांपूर्वी बांधण्यात आला होता. आणि तिथे  भाई महाराज यांना समर्पित स्मारक देखील आहे. भाई महाराजजी  भारताच्या स्वातंत्र्याच्या लढ्यात सहभागी झाले होते. आणि हा क्षण स्वातंत्र्याची 75 वर्ष साजरी करताना अधिक प्रेरक ठरतो. दोन्ही देशांदरम्यान लोकांमधील संबंध अशाच प्रयत्नांतून अधिक बळकट होतात. यातून हे देखील समजतं की सौहार्दपूर्ण  वातावरणात राहणे आणि एक दुसऱ्याची संस्कृती समजून घेणे  किती महत्त्वाचे आहे .

माझ्या देशबांधवांनो,  आज मन की बात मध्ये आपण अनेक विषयांवर चर्चा केली. आणखी एक विषय आहे जो माझ्या मनाच्या अत्यंत जिव्हाळ्याचा विषय आहे .

हा विषय आहे जलसंरक्षणाचा . माझं बालपण जिथे गेलं तिथे पाण्याची नेहमी टंचाई असायची. आम्ही पावसासाठी आसुसलेले असायचो आणि म्हणूनच पाण्याचा एक एक थेंब वाचवणे  आमच्या संस्कारांचा एक भाग बनला आहे . आता 'जन  भागीदारीतून जल  संरक्षण ' या मंत्राने तिथले चित्र पालटून टाकले आहे. पाण्याचा प्रत्येक  थेंब वाचवणे आणि पाणी कुठल्याही प्रकारे वाया जाणार नाही याची काळजी घेणे  हा आपल्या जीवनशैलीचा एक सहज भाग असायला हवा. आपल्या कुटुंबाची परंपरा बनायला  हवी ज्याचा  प्रत्येक सदस्यांना अभिमान वाटेल .

मित्रानो, निसर्ग आणि पर्यावरण संरक्षण भारताच्या सांस्कृतिक जीवनात  आपल्या दैनंदिन जीवनात वसलेले आहे. पाऊस हा  नेहमीच आपले विचार, आपलं  तत्वज्ञान आणि आपल्या संस्कृतीला आकार देत आला आहे. ऋतुसंहार आणि मेघदूत मध्ये महाकवी कालिदास यांनी पावसाचे खूप सुंदर वर्णन केलं आहे . साहित्यप्रेमीमध्ये या कविता आजही खूप लोकप्रिय आहेत. ऋग्वेदातील पर्जन्यसूक्त मध्ये देखील पावसाच्या सौंदर्याचे खूप सुंदर वर्णन केलं आहे. त्याचप्रमाणे श्रीमद्भागवत मध्ये देखील काव्यात्मक स्वरूपात पृथ्वी, सूर्य आणि पाऊस यामधील संबंध विस्ताराने सांगितला आहे

अष्टौ मासान् निपीतं यद्, भूम्याः च, ओद-मयम् वसु |

        स्वगोभिः मोक्तुम् आरेभे, पर्जन्यः काल आगते ||

अर्थात सूर्याने 8 महीने पाण्याच्या रूपात पृथ्वीच्या संपत्तीचा वापर केला  होता. आता पावसाळ्याच्या ऋतूत सूर्य संचित संपत्ती पृथ्वीला परत करत आहे . खरंच  पावसाचा ऋतू केवळ सुंदर आणि आनंददायी नाही तर  पोषण देणारा,  जीवन देणारा देखील असतो. पावसाचे पाणी जे आपल्याला मिळत आहे ते आपल्या भावी पिढ्यांसाठी आहे हे आपण कधीही विसरू नये .

आज माझ्या मनात हा विचार आला कि रोचक संदर्भानेच  मी आज आपली आजची मन कि बात  समाप्त करावी. तुम्हा सर्वांना आगामी सण -उत्सवांच्या खूप खूप  शुभेच्छा . सण उत्सवांच्या काळात हे जरूर लक्षात ठेवा की कोरोना  अजूनही आपल्यातून गेलेला नाही. कोरोनाशी  संबंधित नियम विसरायचे नाहीत. तुम्ही सगळे निरोगी आणि प्रसन्न रहा .  खूप खूप धन्यवाद!