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सांसद के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) आज वाराणसी पहुंचे. मौका था वाराणसी में अस्पताल व अंतरराष्ट्रीय स्तर के कन्वेंशन सेंटर रुद्राक्ष सहित कई बड़ी परियोजनाओं के उद्घाटन का. हर–हर महादेव के नाद के साथ शुरुआत करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां एक के बाद एक दो सभाओं को संबोधित किया. ऐसा कम ही होता है, जब पीएम मोदी (PM Modi) के भाषण की शुरुआत इस तरह से होती है. लेकिन मौका खास था. नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा वाराणसी के सांसद के तौर पर काशी नगरी में थे. और अगर आप काशी के मिजाज को समझते हैं, तो हर-हर-महादेव के नाद का दर्जा यहां कुछ वैसा ही है, जैसे शेष भारत में भारत माता की जय के नारे का है, या शायद उससे भी अधिक. ऐसे में अपने क्षेत्र के लोगों के बीच हर-हर महादेव का नाद मोदी के लिए स्वाभाविक ही था.

ऐसा नहीं है कि पीएम मोदी के लिए अपने लोकसभा क्षेत्र में आना कोई असामान्य घटना रही हो, जैसा स्तवंत्र भारत के इतिहास में प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाले ज्यादातर प्रधानमंत्रियों के साथ रही है. मोदी का आज का वाराणसी दौरा पिछले सात साल में उनका सताइसवां दौरा था. यानी साल में चार बार का औसत, जबकि कई प्रधानमंत्री तो साल में एक बार भी अपने लोकसभा क्षेत्र का दौरा नहीं करते थे. अगर पिछले सवा साल से कोरोना की महामारी ने देश और दुनिया को अपनी जकड़ में नहीं लिया होता, तो मोदी के अपने लोकसभा क्षेत्र के दौरे का आंकड़ा शायद तीस के उपर होता. कोरोना की महामारी के सामने देश की लड़ाई की अगुआई करने वाले पीएम मोदी आठ महीने के अंतराल के बाद आज अपने लोकसभा क्षेत्र में पहुंचे थे, ताकि कोरोना की लहर के बीच उनके दौरे के चक्कर में पहले कोई गड़बड़ी न हो जाए और कोरोना के सामने लड़ाई कमजोर न पड़े. जब हालात सामान्य की तरफ बढ़े हैं, तब मोदी ने फैसला किया अपने क्षेत्र में जाने का.

कोरोना काल में लगातार काशी की व्यवस्था देखते रहे मोदी

लेकिन ऐसा नहीं है कि पिछले आठ महीने के दौरान उनका अपने क्षेत्र से कोई संपर्क नहीं रहा हो. कोरोना काल में कई बार उनको वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये वाराणसी के हालात की समीक्षा करते देखा गया. अस्पताल में बेड की चिंता करने से लेकर टीकाकरण और ऑक्सीजन की व्यवस्था अपने क्षेत्र के मतदाताओं के लिए करते नजर आए मोदी, अधिकारियों को इसके लिए निर्देश दिये. लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ अपने दौरों या फिर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये ही अपने लोगो की चिंता करते हैं मोदी.

अमूमन रोजाना हालचाल जानते हैं अपने क्षेत्र का मोदी

यूपी बीजेपी के सह प्रभारी और वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यों की सतत निगरानी रखने वाले सुनील ओझा की मानें, तो कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता, जब अपने लोकसभा क्षेत्र के लोगों से मोदी किसी न किसी संदर्भ में बात नहीं करते, जो शायद ही सार्वजनिक तौर पर किसी के ध्यान में आता है. चाहे विकास कार्यों के बारे में कोई समीक्षा करनी हो या फिर कोई खुशी और गम का मौका हो, मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी अति व्यस्त दिनचर्या के बावजूद अपने लोकसभा क्षेत्र के विकास की चिंता और यहां के लोगों से जुड़े रहने का मौका निकाल ही लेते हैं.

सात साल में बदल गई है वाराणसी की तस्वीर

यही लगातार जुड़ाव और संपर्क है कि पिछले सात साल में वाराणसी की तस्वीर बदल गई है. एक समय रांड, सांढ, सीढ़ी और संन्यासी के तौर पर वाराणसी की पहचान गिनाई जाती थी, जो अपने प्राचीन नाम काशी के तौर पर स्थानीय लोगों के दिल में बसती है. दुनिया के प्राचीनतम जीवंत शहर के तौर पर पहचान रखने वाली काशी की सड़कें और गलियां पतली, चारों तरफ गंदगी का अंबार, माथे के उपर खतरनाक ढंग से लटकते बिजली के तार, बदबू और कूड़े से भरे यहां के घाट और गंगा में बहता नालों का पानी, यही पहचान थी सात साल पहले तक काशी की, जब मोदी वाराणसी से लोकसभा का चुनाव पहली बार लड़ने के लिए आए थे काशी.

क्या मोदी वाराणसी के सांसद बने रहेंगे, लोगों के मन में थी एक समय शंका

मोदी जब 2014 में चुनाव लड़ने के लिए आए, तो बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित ये भविष्यवाणी करने में लगे थे कि सिर्फ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को रिझाने के लिए मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ने आए हैं और सरकार बनने के बाद वो वाराणसी का परित्याग कर बड़ौदा से ही सांसद बने रहेंगे, जहां से भी चुनाव लड़ रहे थे मोदी. दोनों जगह से मोदी की जीत को लेकर किसी के मन में आशंका नहीं थी, क्योंकि बीजेपी के पीएम उम्मीदवार के तौर पर देश का दौरा कर रहे मोदी के लिए चारों तरफ जन समर्थन की लहर थी.

बड़ौदा की जगह वाराणसी को वरीयता दी मोदी ने

लेकिन मोदी ने इन अटकलबाजियों को किनारे लगाते हुए अपने गृह राज्य गुजरात की बड़ौदा सीट का जीत के बाद परित्याग करते हुए वाराणसी का ही प्रतिनिधि बनना मंजूर किया और ये साबित किया कि जिस मां गंगा के बुलावे पर वो काशी आने की बात कर रहे थे चुनाव प्रचार के दौरान, उस मां गंगा के चरणों में बने रहने वाले हैं वो, बाबा विश्वनाथ की नगरी का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हुए. वैसे भी भोले बाबा से मोदी का पुराना नाता रहा है, अपनी जन्मभूमि वडनगर में भगवान शिव की आराधना से जो शुरुआत हुई थी, 2019 के चुनावों के दौरान पूरे देश और दुनिया ने केदारनाथ में तपस्यालीन मोदी को देखते हुए उनकी शिवभक्ति को महसूस किया. काशी में तो वो बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद हर मौके पर लेना नहीं ही भूलते

काशी के लोगों के भरोसे पर खरा उतरे मोदी

काशी के लोगों ने जिस तरह का भरोसा मोदी पर दिखाया, पहली बार 2014 में और फिर दूसरी बार 2019 में, मोदी ने बतौर सांसद उस भरोसे पर उतरने का पूरा प्रयास किया. ये उस उत्तर प्रदेश के लिए बिल्कुल नई बात थी, जिस प्रदेश का प्रतिनिधित्व संसद में उनसे पहले एक नहीं, बल्कि आठ-आठ प्रधानमंत्रियों ने किया था, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से इसकी शुरुआत हुई थी, और फिर लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर होते हुए सिलसिला अटलबिहारी वाजपेयी तक पहुंचा था, जो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से चुनकर संसद में जाते रहे बतौर पीएम.

मोदी के उलट पूर्व प्रधानमंत्रियों ने नहीं रखा अपने क्षेत्र का ध्यान

लेकिन इनमें से ज्यादातर ने अपने लोकसभा क्षेत्रों के कुछ नहीं किया, जहां से जनता उन्हें बड़ी उम्मीद और भरोसे के साथ चुनाव जीताकर लगातार भेजती रही. नेहरू के फूलपुर, इंदिरा गांधी की रायबरेली या राजीव गांधी की लोकसभा सीट रही अमेठी में कुछ भी खास नहीं हो पाया, जिन नेताओं ने लंबे समय तक बतौर प्रधानमंत्री देश की बागडोर संभाली. जब इन्होंने नहीं किया, तो चरण सिंह, चंद्रशेखर और वीपी सिंह की बात क्या की जाए, जिनके हाथ में देश की बागडोर बतौर पीएम चार महीने से लेकर डेढ़ साल तक के लिए ही आई. इन सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के लोकसभा क्षेत्रों में आज कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसके लिए उस इलाके के लोग गर्व कर सकें और ये महसूस कर सकें कि सांसद रहते हुए किसी प्रधानमंत्री ने उनके लिए कुछ विशेष किया. वाजपेयी जरूर लखनऊ की थोड़ी चिंता करते नजर आए.

बतौर जन प्रतिनिधि अपनी भूमिका को गंभीरता से लेते हैं मोदी

लेकिन मोदी इस मामले में अलग हैं. मोदी का हमेशा से मानना रहा है कि चाहे आप राज्य के मुख्यमंत्री हों या फिर देश के प्रधानमंत्री, अपनी व्यस्तता और बड़ी जिम्मेदारी का हवाला देते हुए उन मतदाताओं की आकांक्षाओं और उम्मीदो के साथ आप खिलवाड़ नहीं कर सकते, जिन्होंने आपको चुनकर विधानसभा या लोकसभा में अपने प्रतिनिधि के तौर पर भेजा है. यही सोच रही जिसकी वजह से अपने पौने तेरह साल के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान मोदी ने गुजरात में अपनी विधानसभा सीट मणिनगर में चौतरफा विकास किया और उसे एक तरह से अपने गुजरात विकास मॉडल का सबसे बड़ा उदाहरण बना दिया., शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और सड़क से लेकर सफाई, तमाम मामलों पर ध्यान देते हुए.

विधानसभा सीट की तरह ही मोदी ने लोकसभा सीट के लिए भी बनाया ब्लूप्रिंट

यही काम मोदी ने वाराणसी के सांसद के तौर पर पिछले सात वर्षों में किया है. अपने क्षेत्र का कैसे विकास किया जाए, मोदी के पास पहले से ही इसका खाका तैयार था, आखिर मणिनगर में बारह वर्षों तक वो यही करते आए थे, जब पहली बार 2002 में यहां से चुनाव जीते थे और फिर जहां के विधायक के तौर पर उन्होंने मई 2014 में तब इस्तीफा दिया, जब वो वाराणसी से सांसद बनने के साथ ही देश के पीएम बने. अगर फर्क था तो सिर्फ ये कि विधानसभा की जगह उन्हें लोकसभा क्षेत्र का विकास करना था.

काशी का सम्यक विकास करने में कामयाब रहे हैं मोदी

मोदी अपने इरादे में काफी हद तक कामयाब रहे हैं. अगर पिछले सात साल के अंदर सरसरी तौर पर भी वाराणसी के लिए किये गये उनके कामों पर ध्यान दिया जाए, तो इसका अहसास हो जाता है. जिस वाराणसी शहर की सड़कें ट्रैफिक जाम और गंदगी की तस्वीर पेश करती थीं, वहां आज उनकी चौड़ाई बढ़ गई है, गंदगी गायब हो गई है. यही हाल गंगा के घाटों और खुद गंगा का है, जिसके अंदर अब नालों का पानी नहीं बहता.

वाराणसी का हुआ है चौतरफा विकास

शहर के अंदर की सड़कों से लेकर रिंग रोड का विकास, तो बाबतपुर एयरपोर्ट से शहर को आने वाली सड़क को चकाचक और चौड़ा किया गया है. यही नहीं, जिस काशी से प्रयागराज के बीच का सफर पहले पांच से छह घंटो का होता था, आज अपनी काशी से प्रयागराज के लिए छह लेन की सड़क बनवाने में कामयाब रहे हैं मोदी, महज डेढ घंटे में तय हो जाता है रास्ता.

वाराणसी के स्टेशन लगते हैं एयरपोर्ट जैसे

वाराणसी के अंदर आने वाले रेलवे स्टेशनों की तस्वीर भी बदल गई है, रेलवे स्टेशन और इनके प्लेटफार्म हवाई अड्डों की तरह दिखाई देते हैं. गंगा के सभी 84 घाटों का कायाकल्प किया है मोदी ने, बढिया रौशनी से लेकर सफाई की व्यवस्था तक. सड़क के किनारे जहां चारों तरफ बिजली के खंभों पर खतरनाक अंदाज में झूलते तार नजर आते थे, उनमें से ज्यादातर को अंडरग्राउंड, तो जहां तार अब भी रह गये हैं उपर, उन्हें टांगने वाले खंभों को हेरिटेज लुक दिया है मोदी ने.

काशी विश्वनाथ प्रांगण का हुआ है अदभुत विकास

काशी धार्मिक नगरी के तौर पर देश-दुनिया में मशहूर है. और काशी की चर्चा हो, तो बाबा विश्वनाथ से ही शुरुआत होती है. मोदी के सांसद बनने के पहले तक जो विश्वनाथ मंदिर प्रांगण महज चौबीस सौ वर्ग मीटर का होता था, आज वो सुंदर ढंग से विकसित होकर पचास हजार वर्ग मीटर से उपर का हो चुका है. आसपास की तमाम रिहाइशी इमारतें और दुकानें समझा-बुझाकर हटाई गई हैं और उनके अंदर से निकले 67 शिखरबद्ध मंदिरों का भी कायाकल्प किया गया है, जो कभी बाबा विश्वनाथ के विराट दरबार का हिस्सा हुआ करते थे. जिस काशी विश्वनाथ मंदिर से गंगा के तट तक आने में पसीने छूट जाते थे, सात साल के अंदर हालात इतने सुधरे हैं कि आप ललिता घाट से सीधे गंगा स्नान कर बाबा विश्वनाथ तक पहुंच सकते हैं, बीच में कही कोई रुकावट नहीं. और ये सिर्फ बाबा विश्वनाथ के मामले में नहीं हुआ है. पंचकोसी परिक्रमा के मार्ग को भी ठीक किया गया है, आसपास के गांवों को बेहतर किया गया है. खुद मोदी ने बतौर पीएम जिस सांसद आदर्श ग्राम परियोजना को लांच किया था, उसके तहत उनके अपने लोकसभा क्षेत्र में एक दो नहीं, बल्कि आधे दर्जन गांव सांसद आदर्श ग्राम में तब्दील हो चुके हैं, जिसकी शुरुआत हुई थी जयापुर गांव से.

पर्यटन से संबंधित सुविधाओं पर दिया गया है ध्यान

पर्यटन को भी खूब बढ़ावा देने का काम किया गया है मोदी ने. काशी से न सिर्फ सड़क, रेल और हवाई मार्ग के जरिये कनेक्टिविटी बेहतर हुई है, बल्कि खुद वाराणसी में पर्टयन सुविधाओं का जमकर विकास हुआ है. इसके तहत गंगा में क्रुज सेवा शुरु की जा चुकी है, आज के दौरे में पीएम मोदी ने रो-रो फेरी सर्विस की भी शुरुआत कर डाली. शहर में चारों तरफ बड़े-बड़े इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड लगाये जा रहे हैं, जिस पर एक तरफ आपको काशी के पर्टयन स्थानों और महत्व के बारे में हर किस्म की जानकारी मिलेगी, तो आप गंगा आरती और बाबा विश्वनाथ के मंदिर में होने वाली पूजा को भी शहर में कहीं से भी निहार सकेगें.

वाराणसी बन गया है हेल्थ हब

शिक्षा और स्वास्थ्य भी मोदी की प्राथमिकताओं में रहा है. आज के दिन जहां उन्होंने महिला और बाल चिकित्सा के लिए बीएचयू सहित कई जगहों पर सौ बेड से भी अधिक की सुविधाओं वाले हेल्थ ब्लॉक को लांच किया, वहीं आंखों के लिए क्षेत्रीय अस्पताल का भी उद्घाटन किया. इससे पहले भी न सिर्फ बीएचयू में अत्याधुनिक ट्रॉमा सेंटर की शुरुआत की गई है, बल्कि सभी अस्पतालों के स्तर को बेहतर किया जा चुका है. आज हालात ये हैं कि कैंसर जैसी बीमारी के इलाज के लिए भी काशीवासियों को दिल्ली और मुंबई के चक्कर नहीं लगाने पड़ते, उनके अपने शहर वाराणसी में इसकी चिकित्सा की अत्याधुनिक सुविधा मौजूद है. और वाराणसी के ये अस्पताल सिर्फ काशीवासियों का ही ध्यान नहीं रखते, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती इलाकों से आने वाले लाखों लोगों का भी ध्यान रखते हैं. पीएम मोदी कॉ भी इसका अहसास है, इसलिए काशी में लगातार स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया है पिछले सात वर्षों में.

रोजगार के अवसर बढ़ाने की भी हुई है कोशिश

लोगों को रोजगार मिले, इसके लिए आईटीआई से लेकर पॉलिटेक्नीक तक के संस्थान खोले गये हैं, यही नहीं जो काशी अपनी बनारसी साड़ियों और बुनकरों के लिए मशहूर है, उन बुनकरों की सुविधा के लिए दीनदयाल हस्तकला संकुल के तौर पर अत्याधुनिक ट्रेड फैलिसिटेशन सेंटर स्थापित किया गया है. वो भी तब, जबकि मोदी 2014 में यहां पहली बार चुनाव लड़ने आए थे, तो बुनकरों की सांप्रदायिक आधार पर उनके खिलाफ गोलबंद करने की कोशिश की थी अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के उम्मीदवार ने. बुनकरों से आगे मोदी ने किसानों के लिए भी खास हाट और गोदाम की व्यवस्था की है, जिसके जरिये वो अपना सामान देश के किसी भी हिस्से में भेज सकते हैं. अभी हालात ये हैं कि वाराणसी के किसान अपने उत्पादों का निर्यात विदेश में कर रहे हैं, खास तौर पर फल और सब्जियों का.

रुद्राक्ष में होगी अब स्वर साधना

काशी भारतीय संस्कृति की प्रतिनिधि नगरी है, गीत-संगीत इसके दिल में बसता है. तबले से लेकर गायन तक की समृद्ध परंपरा रही है. इसी को ध्यान में रखते हुए मोदी ने आज के दिन रुद्राक्ष नाम वाले उस कन्वेंशन सेंटर का भी उद्घाटन किया, जहां हजार से भी अधिक लोग एक साथ बैठकर न सिर्फ गीत- संगीत का लुत्फ उठा सकते हैं, बल्कि इस सेंटर के अंदर बड़े-बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनार और वर्कशॉप हो सकते हैं, प्रदर्शनियां लग सकती हैं.

आठ हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर चल रहा है काम

मोदी ने आज के दिन करीब पंद्रह सौ करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उदघाटन किया, इससे पहले भी दर्जनों बड़ी परियोजनाएं यहां लग चुकी हैं पिछले सात साल में. खुद मोदी ने अपने भाषण के दौरान कहा कि करीब आठ हजार करोड़ रुपये की परियोजनाएं लागू होने के अलग-अलग स्टेज पर हैं. दरअसल वाराणसी के लोगों को एक बात साफ तौर पर समझ में आ गई है कि मोदी सिर्फ औपचारिकता के लिए शिलान्यास करने नहीं आते, बल्कि परियोनजाओं को पूरा करते हुए उनका उद्घाटन करने की इच्छा और इरादा रखते हैं, अन्यथा पहले होता तो ये था कि एक प्रधानमंत्री किसी परियोजना का शिलान्यास करता था और दूसरा उसका उद्घाटन करने आता था, क्योंकि परियोजना के लागू होने में इतनी देर लग जाती थी.

सिर्फ शिलान्यास नहीं, परियोजना के पूरा होने पर है पीएम मोदी का जोर

मोदी ने ये सुनिश्चित किया है कि जिस परियोजना का वो शिलान्यास करें, उसका उद्घाटन भी वही करें. ये तभी संभव हो सकता है, जबकि परियोजनाओं को लागू करने के पीछे आपका निश्चय दृढ़ हो. मोदी में ये संकल्प पहले से रहा है. जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब भी हमेशा ये पूछा करते थे कि जिस परियोजना का शिलान्यास करने के लिए उन्हें बुलाया जा रहा है, उसका लोकार्पण या उद्घाटन करने के लिए उन्हें कब बुलाया जाएगा, ये साफ तौर पर तय किया जाए.

तेजी से पूरी हो रही है वाराणसी की विकास परियोजनाएं

मोदी ने यही काम न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर किया है, बल्कि अपने लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में भी इसकी मिसाल पेश की है. जिस रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर परियोजना की शुरुआत जापान सरकार की आर्थिक मदद से पांच साल पहले हुई थी, वो कोरोना के सवा साल लंबे कालखंड के बावजूद समय से पूरी हो गई है, जिसका उदघाटन करने आज पहुंचे पीएम मोदी जापानी राजदूत की मौजूदगी में. 2014 में जब बतौर पीएम मोदी ने जापान का दौरा किया था, तो उसकी शुरुआत की थी क्योटो से, जो जापान का प्राचीनतम शहर है और पुरातन को आधुनिकता के साथ कितना सहज ढंग से लेकर आगे बढ़ा जा सकता है, उसकी दुनिया भर में मिसाल है. मोदी ने वही पर क्योटो से काशी का नारा बुलंद किया था और सात साल के अंदर उस नारे को जमीन पर काफी हद तक उतारने में कामयाब रहे हैं वो, जब काशी अपनी अल्हड़ता और पुरातन, सनातन संस्कृति का ध्वजवाहक बनी रहने के साथ ही आधुनिक सुविधाओं और परियोजनाओं को अपनी गोद में तेजी से समेट कर आगे बढ़ रही है, अपने निवासियों का जीवन बेहतर कर रही है.

जन प्रतिनिधि के तौर पर आदर्श स्थापित किया है मोदी ने

पुल, सड़क, बिजली, पानी, गैस, रौशनी, सफाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पर्यटन, पार्किंग जैसी तमाम सुविधाओं के मामले में काशी नया मानक स्थापित कर रही है अपने जन प्रतिनिधि नरेंद्र मोदी की अगुआई में, जो देश के पीएम के साथ ही वाराणसी के प्रतिनिधि हैं लोकसभा में. एक सांसद चाहे तो कैसे अपने क्षेत्र का विकास कर सकता है, इसकी मिसाल पेश की है मोदी ने. और सिर्फ सुविधाएं ही नहीं, सुनवाई भी. मोदी भले ही वाराणसी में खुद नहीं रहते हों, लेकिन वाराणसी में उनका बतौर सांसद कार्यालय पूरे साल चलता है, बिना छुट्टी के. क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति यहां अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है, जिसका समय सीमा के अंदर समाधान करने की व्यवस्था की है मोदी ने.

काशी में हर-हर महादेव से होती है मोदी के भाषण की शुरुआत

काशी के लोग, जो 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले ये सोचते थे कि बतौर पीएम मोदी कहां ध्यान दे पाएंगे वाराणसी पर, उनको सुखद आश्चर्य में डाल रखा है मोदी ने पिछले सात वर्षों में, बतौर सांसद अपने कामकाज से, अपनी निष्ठा से, मतदाताओं के प्रति अपने प्रेम के इजहार से. यही वो प्रेम है कि अपने आलोचकों की चिंता किये बगैर मोदी अपनी काशी में अपने लोगों के बीच हर-हर महादेव का नाद बड़े गर्व से करते हैं, उससे ही अपने भाषण की शुरुआत और उससे ही खात्मा भी करते हैं और साथ में ठेठ बनारसी में कुछ पंक्तियां भी बोलते हैं. अगर मोदी के इसी अंदाज और कामकाज से बाकी जन प्रतिनिधि भी प्रेरणा लेकर सार्थक काम करें, तो उन्हें चुनाव जीतने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी और सेफ सीट की तलाश में उत्तर से दक्षिण की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी, जैसा कि भारतीय राजनीति में कई दफा देखा गया है, बड़ी राजनीतिक विरासत वालों के सामने ये तकलीफ आई है.

 

Author Name: Brajesh Kumar Singh

Disclaimer:

This article was first published in News 18

It is part of an endeavour to collect stories which narrate or recount people’s anecdotes/opinion/analysis on Prime Minister Shri Narendra Modi & his impact on lives of people

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October 20, 2021
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ഒക്‌റ്റോബര്‍ 7 നാണ് ഒരു സര്‍ക്കാരിന്റെ തലവന്‍ എന്ന നിലയില്‍ നരേന്ദ്രമോദി 20 വര്‍ഷം പൂര്‍ത്തിയാക്കിയത്. നരേന്ദ്രമോദിയുടെ വളര്‍ച്ചയും ഗുജറാത്തിന്റെ ഗതി അദ്ദേഹം എങ്ങനെ മാറ്റിമറിച്ചു എന്നതും ഞങ്ങള്‍ ഗുജറാത്തുകാര്‍ വളരെ അടുത്തുനിന്ന് നോക്കിക്കണ്ടിട്ടുണ്ട്. മോദിയെ വ്യത്യസ്തനാക്കുന്ന ഘടകമെന്താണെന്ന് പലരും പലപ്പോഴും ചോദിക്കാറുണ്ട്. എന്നെ സംബന്ധിച്ചിടത്തോളം, ജോലിയിലായാലും വ്യക്തിബന്ധങ്ങളിലായാലും തന്റേതായ വ്യതിരിക്തമായ മനുഷ്യസ്പര്‍ശമാണ് അദ്ദേഹത്തെ ഉയരങ്ങളിലേക്ക് എത്തിച്ചത്.

ഗുജറാത്തിന്റെ രാഷ്ട്രീയമണ്ഡലത്തിലെ പ്രധാനപ്പെട്ട കാലഘട്ടമായിരുന്നു 1980കള്‍. കേന്ദ്രത്തിലെയും സംസ്ഥാനത്തിലെയും അധികാരം കോണ്‍ഗ്രസിന്റെ കരങ്ങളില്‍ ഭദ്രമായിരുന്നു. ഭരണത്തിലെ പാളിച്ചകളും വിഭാഗീയ പ്രവണതകളും തെറ്റായ മുന്‍ഗണനകളും കോണ്‍ഗ്രസിന്റെ ശോഭ കെടുത്തുമ്പോഴും മറ്റെതെങ്കിലുമൊരു രാഷ്ട്രീയ പാര്‍ട്ടി അധികാരം പിടിക്കുക എന്നത് അന്ന് സങ്കല്‍പ്പിക്കാന്‍ കഴിയാത്ത കാര്യമായിരുന്നു. ബിജെപിയുടെ ശക്തരായ അണികള്‍ക്കും പ്രവര്‍ത്തകര്‍ക്കും വരെ ഇക്കാര്യത്തില്‍ ആത്മവിശ്വാസക്കുറവ് ഉണ്ടായിരുന്നു.

ആ ഘട്ടത്തിലാണ് നരേന്ദ്രമോദി ആര്‍എസ്എസില്‍ നിന്ന് ബിജെപിയിലെ മുഴുവന്‍ സമയ രാഷ്ട്രീയ ജീവിതത്തിലേക്ക് കൂടുമാറുന്നത്. എഎംസി തിരഞ്ഞെടുപ്പിന് പാര്‍ട്ടിയെ തയ്യാറെടുപ്പിക്കുക എന്ന വെല്ലുവിളി അദ്ദേഹം ഏറ്റെടുത്തു. പ്രൊഫഷണലുകളെ ബിജെപിയുടെ ഭാഗമാക്കി മാറ്റുക എന്നതായിരുന്നു അദ്ദേഹം ആദ്യം ചെയ്ത കാര്യങ്ങളിലൊന്ന്. പ്രമുഖരായ ഡോക്റ്റര്‍മാര്‍, അഭിഭാഷകര്‍, എഞ്ചിനീയര്‍മാര്‍, അധ്യാപകര്‍ തുടങ്ങിയവരിലേക്ക് പാര്‍ട്ടിയെ വ്യാപിപ്പിക്കുകയും അവരെ രാഷ്ട്രീയ, തെരഞ്ഞെടുപ്പ് പ്രക്രിയയുടെ ഭാഗമായി അണിനിരത്തുകയും ചെയ്തു. കേവല രാഷ്ട്രീയത്തിന് പുറമെ ഭരണസംബന്ധമായ പ്രശ്‌നങ്ങളെക്കുറിച്ച് സംസാരിക്കുന്നതിനും മോദി വലിയ പ്രാധാന്യം നല്‍കി. ജനങ്ങളുടെ ജീവിതം മെച്ചപ്പെടുത്തുന്നതിനും ജീവിത നിലവാരം ഉയര്‍ത്തുന്നതിനുമുള്ള നൂതന മാര്‍ഗങ്ങളെക്കുറിച്ച് അദ്ദേഹം എപ്പോഴും ചിന്തിച്ചുകൊണ്ടിരുന്നു.

കാര്യങ്ങള്‍ ജനങ്ങളുമായി സംവദിക്കുന്ന കാര്യത്തില്‍ മോദി പ്രഗത്ഭനായിരുന്നു. അഹമ്മദാബാദിലെ ധര്‍ണിധറിലെ നിര്‍മല്‍ പാര്‍ട്ടി പ്ലോട്ടില്‍ വെച്ച് നടന്ന ഒരു പൊതുപരിപാടി ഞാന്‍ ഇപ്പോഴും ഓര്‍ക്കുന്നു. ആദ്യത്തെ ഏതാനും മിനിറ്റുകള്‍ സരസമായ തന്റെ സംഭാഷണശൈലിയിലൂടെ മോദി ജനങ്ങളെ ചിരിപ്പിച്ചു. അതിനുശേഷം അദ്ദേഹം ചോദിച്ചു, 'നമ്മള്‍ തമാശ പറയുന്നത് തുടരണോ അതോ ദേശീയപ്രാധാന്യമുള്ള വിഷയങ്ങളെക്കുറിച്ച് സംസാരിക്കണോ?'. അകാരണമായ ഒരു ധൈര്യത്തിന്റെ പിന്‍ബലത്തില്‍ ഞാന്‍ 'രണ്ടും വേണം' എന്ന് ഉറക്കെ വിളിച്ചു പറഞ്ഞു. ഉടനെ അദ്ദേഹം എന്റെ നേര്‍ക്ക് തിരിഞ്ഞു നോക്കിയിട്ട് പറഞ്ഞു: 'ഇല്ല, രണ്ടും ഒരുമിച്ച് കഴിയില്ല'. തുടര്‍ന്ന് ബിജെപിയുടെ ഭരണപരമായ കാഴ്ചപ്പാടിനെക്കുറിച്ചും ആര്‍ട്ടിക്കിള്‍ 370 നെക്കുറിച്ചും ഷാ ബാനു കേസിനെക്കുറിച്ചുമെല്ലാം അദ്ദേഹം വിശദമായി സംസാരിച്ചു. അദ്ദേഹത്തിന്റെ പ്രത്യയശാസ്ത്രപരമായ വ്യക്തത എന്നെ അത്ഭുതപ്പെടുത്തി.

1990 കളുടെ തുടക്കത്തില്‍ മോദിയുടെ പ്രഭാഷണങ്ങളുടെ കാസറ്റുകള്‍ക്ക് ഗുജറാത്തിന്റെ നഗരകേന്ദ്രങ്ങളില്‍ വലിയ ജനപ്രീതി ഉണ്ടായിരുന്നു എന്ന കാര്യം ഗുജറാത്തിന് പുറത്തുള്ളവര്‍ക്ക് അധികം ആര്‍ക്കും അറിയാന്‍ വഴിയില്ല. നരേന്ദ്രമോദി സംസ്ഥാനത്തിന്റെ വിവിധ ഭാഗങ്ങളില്‍ നടത്തിയ പ്രസംഗങ്ങളുടെ ഭാഗങ്ങളാകും ഈ കാസറ്റുകളില്‍ ഉള്‍ക്കൊള്ളിച്ചിട്ടുണ്ടാവുക.

ലാത്തൂരില്‍ ഭൂകമ്പമുണ്ടായ ഘട്ടത്തില്‍ 1994 ലാണ് അദ്ദേഹം ശ്രദ്ധേയമായ മറ്റൊരു പ്രസംഗം നടത്തുന്നത്. അഹമ്മദാബാദിലെ ആര്‍ എസ് എസ് കാര്യാലയത്തില്‍ നിന്ന് ദുരിതാശ്വാസ സാമഗ്രികളുമായി ഏതാനും സന്നദ്ധപ്രവര്‍ത്തകര്‍ ലാത്തൂരിലേക്ക് പോകാന്‍ തുടങ്ങുകയായിരുന്നു. ആ അവസരത്തില്‍ മോദി മറ്റ് മുന്നൊരുക്കങ്ങളൊന്നും കൂടാതെ പ്രസംഗിക്കുകയുണ്ടായി. അദ്ദേഹത്തിന്റെ വാക്കുകള്‍ ദുരിതാശ്വാസ പ്രവര്‍ത്തകരില്‍ വലിയ ആവേശം സൃഷ്ടിച്ചു. പ്രസംഗം കേട്ടവരില്‍ കുറഞ്ഞത് അമ്പത് പേരെങ്കിലും ഉടന്‍ തന്നെ ലാത്തൂരിലേക്ക് പോകാനുള്ള സന്നദ്ധത പ്രകടിപ്പിച്ചു. കൂടുതല്‍ ആളുകള്‍ പോവുക എന്നതിനേക്കാള്‍ പ്രധാനം ദുരിതാശ്വാസ പ്രവര്‍ത്തനങ്ങള്‍ കൃത്യമായി നടക്കുക എന്നതാണെന്നും നിങ്ങളെല്ലാവരും തുടര്‍ന്നും രാജ്യത്തിന് വേണ്ടിയുള്ള സേവനത്തില്‍ മുഴുകണമെന്നും പറഞ്ഞ് മോദി അവരെ ലാത്തൂരിലേക്ക് പോകുന്നതില്‍ നിന്ന് പിന്തിരിപ്പിക്കുകയായിരുന്നു.

സമൂഹത്തിലെ വിവിധ വിഭാഗങ്ങളുമായി നരേന്ദ്രമോദി പുലര്‍ത്തുന്ന ബന്ധം ശ്രദ്ധേയമാണ്. 2013-14 കാലഘട്ടത്തില്‍ ലോകം മുഴുവന്‍ അദ്ദേഹത്തിന്റെ 'ചായ് പേ ചര്‍ച്ച' കണ്ടു. പക്ഷേ, പ്രഭാത സവാരി നടത്തുന്ന വ്യത്യസ്തരായ ആളുകളുമായി ഒരു കപ്പ് ചായ പങ്കുവെച്ചുകൊണ്ട് അദ്ദേഹം സൃഷ്ടിക്കുന്ന ആത്മബന്ധം എനിക്ക് മറക്കാന്‍ കഴിയാത്തതാണ്. 1990 കളില്‍ ഒരിക്കല്‍ അഹമ്മദാബാദിലെ പ്രശസ്തമായ പരിമള്‍ ഉദ്യാനത്തില്‍ വെച്ച് ഞാന്‍ അദ്ദേഹത്തെ കണ്ടുമുട്ടി. അവിടെ അദ്ദേഹം പ്രഭാതസവാരി നടത്തുന്ന ഏതാനും വ്യക്തികളെ അഭിസംബോധന ചെയ്ത് സംസാരിക്കുകയായിരുന്നു. അവര്‍ തമ്മില്‍ രൂപപ്പെട്ട ആത്മബന്ധം എനിക്ക് തല്‍ക്ഷണം തിരിച്ചറിയാന്‍ കഴിഞ്ഞു. സമകാലിക പ്രശ്‌നങ്ങളെക്കുറിച്ച് അവബോധം സൃഷ്ടിക്കാന്‍ മോദിയുമായുള്ള ഇത്തരം കൂടിക്കാഴ്ചകള്‍ സഹായിച്ചതായി സുഹൃത്തായ ഒരു ഡോക്ടര്‍ ഒരിക്കല്‍ എന്നോട് പറഞ്ഞിട്ടുണ്ട്.

നരേന്ദ്രമോദിയുടെ മനുഷ്യസ്നേഹത്തിന്റെ ദൃഷ്ടാന്തങ്ങളായി രണ്ടു സംഭവങ്ങള്‍ എനിക്ക് ഓര്‍ത്തെടുത്ത് പറയാന്‍ കഴിയും. അതിലൊന്ന് നടന്നത് 2000 ങ്ങളുടെ തുടക്കത്തിലാണ്. അന്ന് ചരിത്രകാരന്‍ റിസ്വാന്‍ കദ്രിയും ഞാനും ചേര്‍ന്ന് ഗുജറാത്തിലെ പ്രഗത്ഭ സാഹിത്യകാരനായ കേക ശാസ്ത്രിയുടെ ചില കൃതികള്‍ ഡോക്യുമെന്റ് ചെയ്യുകയായിരുന്നു. അതിന്റെ ഭാഗമായി അദ്ദേഹത്തെ പോയി നേരിട്ട് കണ്ടപ്പോഴാണ് അദ്ദേഹത്തിന്റെ ആരോഗ്യസ്ഥിതി മോശമാണെന്ന് മനസിലായത്. ഉടന്‍ തന്നെ ഞാന്‍ അദ്ദേഹത്തിന്റെ ഒരു ഫോട്ടോ മോദിയുടെ ഓഫീസിലേക്ക് അയച്ചുകൊടുത്തു. ഒട്ടും വൈകാതെ കേക ശാസ്ത്രിയെ പരിചരിക്കാനായി ഒരു നഴ്‌സ് അവിടെയെത്തി.

മറ്റൊരു സംഭവം എഴുത്തുകാരന്‍ പ്രിയാകാന്ത് പരീഖുമായി ബന്ധപ്പെട്ടതാണ്. തന്റെ നൂറാമത്തെ പുസ്തകം നരേന്ദ്രമോദി പ്രകാശനം ചെയ്യണമെന്ന ആഗ്രഹം അദ്ദേഹത്തിനുണ്ടായിരുന്നു. പക്ഷേ, ഗുരുതരമായ ഒരു അപകടത്തില്‍പ്പെട്ട് ചലനരഹിതനായി എവിടെയും പോകാന്‍ കഴിയാതെ അദ്ദേഹം വീട്ടില്‍ തന്നെ കഴിയുകയായിരുന്നു. നരേന്ദ്രമോദി നേരിട്ട് ആശ്രം റോഡിലെ പരീഖിന്റെ വീട്ടിലെത്തി അദ്ദേഹത്തിന്റെ പുസ്തകം പ്രകാശനം ചെയ്തത് ഞാന്‍ ഇപ്പോഴും ഓര്‍ക്കുന്നു. മുഖ്യമന്ത്രി നേരിട്ട് അസുഖബാധിതനായി കിടക്കുന്ന ഒരു എഴുത്തുകാരന്റെ വീട്ടിലെത്തി പുസ്തകപ്രകാശനം നടത്തിയത് ഗുജറാത്തിലെ സാഹിത്യസദസുകളെ അമ്പരപ്പിച്ച കാര്യമായിരുന്നു.

കാര്യങ്ങള്‍ കേള്‍ക്കാനും ഗ്രഹിക്കാനുമുള്ള ശേഷിയും സാങ്കേതികവിദ്യയോടുള്ള ഇഷ്ടവും മോദിയുടെ പ്രധാനപ്പെട്ട ഗുണങ്ങളാണ്. പാര്‍ട്ടിയുടെ തന്ത്രങ്ങള്‍ മെനയാനും ഏകോപിപ്പിക്കാനുമുള്ള ഉത്തരവാദിത്തം മോദി നിര്‍വഹിച്ചിരുന്ന കാലത്ത് ഒരു തെരഞ്ഞെടുപ്പില്‍ പോലും ബിജെപി പരാജയപ്പെട്ടില്ല എന്നതില്‍ അത്ഭുതപ്പെടാന്‍ ഒന്നുമില്ല. ബിജെപി തെരഞ്ഞെടുപ്പില്‍ തിരിച്ചടി ഏറ്റുവാങ്ങിയ 2000 ത്തില്‍ അദ്ദേഹം സംസ്ഥാനത്തിന് പുറത്തായിരുന്നു എന്ന കാര്യവും ഓര്‍ക്കണം.

മാധ്യമപ്രവര്‍ത്തകര്‍ എന്ന നിലയില്‍ പലരെയും നമുക്ക് കാണേണ്ടി വരും. എന്നാല്‍, ഇത്തരം കൂടിക്കാഴ്ചകള്‍ ജീവിതകാലം മുഴുവന്‍ നിലനില്‍ക്കുന്ന ആത്മബന്ധങ്ങളാക്കി മാറ്റണമെന്ന് പത്രപ്രവര്‍ത്തനത്തിന്റെ യൗവനകാലത്ത് മോദി എന്നോട് പറഞ്ഞിട്ടുണ്ട്. 1998 ല്‍ ഹോളിയുടെ സമയത്ത് ഞാന്‍ ഡല്‍ഹിയിലായിരുന്നു. അന്ന് ഞാന്‍ ഒരിക്കലും മറക്കാത്ത ഒരു കാര്യം മോദി എന്നോട് പറഞ്ഞു. 'നിങ്ങളുടെ ടെലിഫോണ്‍ ഡയറിയില്‍ അയ്യായിരത്തോളം നമ്പറുകള്‍ ഉണ്ടാകുമായിരിക്കും, അവരെയെല്ലാം ഔപചാരികമായല്ലെങ്കില്‍ പോലും ഒരു തവണയെങ്കിലും നേരിട്ട് കണ്ടിട്ടുമുണ്ടാകും. ഒരു സ്രോതസ് എന്ന നിലയില്‍ മാത്രമല്ല, മറിച്ച് ഒരു സുഹൃത്ത് അല്ലെങ്കില്‍ പരിചയക്കാരന്‍ എന്ന നിലയ്ക്ക് കൂടി അവരെയെല്ലാം അറിഞ്ഞിരിക്കണം'. മനുഷ്യ സ്പര്‍ശത്തിന്റെ വിലയെന്തെന്ന് അദ്ദേഹം എന്നെ പഠിപ്പിക്കുകയായിരുന്നു. ആ മനുഷ്യസ്പര്‍ശമാണ് നരേന്ദ്രമോദിയെ എന്നും വിജയത്തിലേക്ക് നയിക്കുന്നത്.

 

Author Name: Japan K Pathak

Disclaimer:

This article was first published in News 18

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