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We need to make our handloom tradition the centrepiece of fashion for India and the world: PM
We should enlarge the scope of e-commerce for sale of handloom products: PM Modi
Government is committed to extend robust social security cover to weaver families: PM
The handloom sector has inherent strengths that we need to market: PM
Handloom can be our weapon against poverty, says PM Modi
Innovative  design backed by good marketing is essential for promotion of handlooms: PM

वणक्कम्, 

Weaver brothers and sisters Awardees Ladies and Gentlemen 

तमील नाट्टुक्कु वन्ददिल् ।। मीक्क मगील्ची ।

नेशवालअ अन्बरगलै ।। काण्बदिल् ।। मेलूम् मगील्ची


सबसे पहले तमिलनाडु की मुख्यमंत्री आदरणीय डॉक्टर जे. जयललिता जी का, Tamil Nadu Government का और तमिलनाडु के नागरिकों का हृदय से अभिनंदन करता हूं कि आपने एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम को एक host के रूप में तमिलनाडु में मनाया। आज राष्ट्रीय Handloom Day का प्रारंभ हो रहा है और तमिलनाडु से हो रहा है सामान्य रूप से सरकार को सब चीज दिल्ली में करने की आदत है, लेकिन मेरी कोशिश है कि सरकार दिल्ली से बाहर निकले और आज पूरी दिल्ली सरकार तमिलनाडु में मौजूद है। 

I congratulate you and extend my best wishes on the occasion of the first National Handloom Day. 

The Swadeshi movement was launched on 7th August, 1905. It is remembered as one of the major events of our freedom struggle. It was on this day that Indians started to boycott imported textiles. Therefore this day has a special significance for handlooms. Hence we have chosen this day to be celebrated as National Handlooms day.

आजादी का जंग जब चल रहा था, उस समय गुलामी से मुक्ति के लिए handloom एक हथियार था। आज आजाद भारत में गरीबी से मुक्ति के लिए handloom एक हथियार बन सकता है।

India is home to several world famous handloom products. To name a few we have Kanchivaram (कांजीवरम) of Tamil Nadu, Baluchari and Jamdani (बालुचारी and जामदानी) of West Bengal, Chanderi and Maheswari (चंदेरी and महेश्वरी) of Madhya Pradesh, Muga (मूगा) of Assam, Patola (पटोला) of Gujarat, Kani and Shehtoosh (कानी and शहतूश) of Jammu and Kashmir and Pochampally (पोचमपल्ली) of Andhra Pradesh. The handloom sector has inherent strengths that we need to market.

Handloom mainly uses natural fiber like cotton, silk, wool, jute etc. Therefore it is Eco-friendly. We can make it even more Eco-friendly by using vegetable dyes and other organic products.

Today people are very conscious of the environment and holistic healthcare. We need to exploit this in marketing handloom products both domestically and for exports. On 2nd October last year, I had asked people to use one item of Khadi to brighten the lives of artisans. I am informed that since then sale of Khadi has gone up by 60% as compared to the same period last year. मैंने पिछली बार, दिवाली से पहले मन की बात में लोगों से प्रार्थना की थी कि आप घर में पच्चीसों प्रकार की fabric रखते हैं। कोई रिश्तेदार आए तो बताते हैं कि मेरे पास ये है, ये है, ये है लेकिन एक खादी नहीं होता है। कम से कम घर में एकाध-एकाध चीज खादी की रखा करिए। इतनी से मेरी request को देशवासियों ने मान लिया और 60 प्रतिशत बिक्री बढ़ गई, गरीब के घर में दीया जला।

We now also need to give a similar call for handlooms. Can we not enhance use of handlooms in our daily lives? We have many options such as clothes curtains bed sheets table covers door mats and rugs just to name a few. This will not only support handlooms but will also support our weavers.

I am told that handlooms form 15% of total cloth consumption. If we raise this to just 20%, from 15% to 20%, it will give a huge boost to handlooms. Handloom turnover will increase by 33%.

People, especially women, wear handloom clothes on social occasions like marriages and major festivals. We need to popularize this among our youth. This will give the much-needed boost to the handloom sector.

मुझे कभी-कभी लगता है कि हम कभी Five Star Hotel में खाएं, Seven Star Hotel में खाना खाएं, लेकिन जब घर में मां के हाथ का खाना मिलता है तो उसका आनंद कुछ और होता है, एक अलग संतोष होता है, क्यों? क्योंकि मां जब खिलाती है, तब सिर्फ खाना नहीं खिलाती है, उसमें भरपूर प्यार भी मिला हुआ होता है और इसके कारण हमें संतोष भी उतना ही मिलता है। मैं कभी-कभी जब खादी या हैंडलूम पर सोचता हूं तो मुझे लगता है कि दुनिया की चाहे कितनी ही variety क्यों न पहन लें, लेकिन जब हैंडलूम या खादी की चीज लगती है, तो ऐसा ही लगता है, जैसे मां ने परोसा है, प्यार से परोसा है, प्यार से बनाया है। ये जो फर्क है, ये जो फर्क हम महसूस करेंगे तब हमें पता चलेगा कि ये कितनी प्यार से बनाई हुई चीज, मेरे शरीर पर मैंने धारण की है।

किसी बुनकर परिवार में हम जाएं, हम देखेंगे कि पूरे घर में 80% जगह, 80% place वो लूम के लिए देते हैं और 20% place में पूरा परिवार गुजारा करता है और जब एक साड़ी लूम की बनती हुई होती है, पांच महीने-छह महीने, एक-एक ताना-बाना का काम होता है, पूरा परिवार उस साड़ी को ऐसे बनाता है जैसे मां अपनी बेटी को बड़ा बना रही हो, जैसे अपनी बेटी का लालन-पालन करती हो, उस रूप में परिवार के अंदर पूरा परिवार, उस साड़ी को बुनता है और जब वो साड़ी घर से विदाई होकर के किसी दुल्हन के शरीर पर जाने वाली होती है, उस परिवार को भी उतनी ही आनंद होता है और वैसे ही उस साड़ी की विदाई करते हैं, जैसे मां-बाप अपनी लाडली की विदाई करते हैं। इतना प्यार उस बुनकर को उन कपड़ों को बुनते-बुनते हो जाता है।

..और बुनकर परिवार जो साड़ी बनाता है उसका इतना लगाव होता है कि 15-20 साल के बाद कोई मिल जाए और पता चले कि उसने वो साड़ी पहनी है, जो उन्होंने बनाई थी, उसे देखकर के उतना उनका मन भर आता है जैसे अपने परिवार का स्वजन मिला हो, इतना लगाव बुनकर को एक ताने और बाने के साथ होता है।



We need to take several initiatives to make handlooms fashionable. This can be done by bringing new designs and colour schemes, constantly evolving and innovating, ensuring quality. Fashion and design education in India also needs to be re-oriented. We need to make our handloom tradition the centerpiece of fashion for India and the world. 

We are committed to give a rightful place to our famous traditional handloom products. India Handloom Brand has been launched with the sole objective of winning the trust and confidence of customers. 

मुझे अभी किसी ने एक किताब दी थी। उस किताब में, दुनिया में हैंडलूम के भिन्न-भिन्न प्रकार, handicraft के भिन्न-भिन्न प्रकार के, किस शताब्दी में क्या-क्या काम होता है। दुनिया के भिन्न-भिन्न देशों के.. उन्होंने बड़ी ही एक tree बनाया है। कोई 1500 साल पुरानी चीजें थीं उसमें, कोई 1400 साल थी, कोई 1000 साल थी, कोई 200 साल थी। मैं हैरान था छोटे-छोटे देशों का भी उसमें नाम था, लेकिन पूरी उस tree में handicraft औऱ handloom की दुनिया में हिन्दुस्तान का नामो-निशान नहीं था। I was shocked, एक उनकी अज्ञानता के ऊपर और दूसरा हम लोगों ने कभी हमारी बातों को branding नहीं किया। दुनिया को पता तक नहीं कि एक जमाना था कि हमारे देश के बुनकरों और कारीगरों से बनाई हुई चीजें, दुनिया के पांचों खंडों में चाहे अफ्रीका हो, यूरोप हो, चाहे अरब राष्ट्र हो, चाहे China हो सब दूर हमारी चीजें बिकती थीं और उसको लेने के लिए दुनिया लालायित रहती थी। लेकिन आज जो लोग किताबें लिखते हैं उनको पता तक नहीं है कि हमारा कभी इतना भव्य इतिहास रहा है क्योंकि हमने हमारी चीजों का जो global branding करना चाहिए, global marketing करना चाहिए उसमें कहीं न कहीं हम कम पड़े हैं। 

कभी-कभी हम लोग सोचते हैं कि इस काम को कैसे बढाया जाए। छोटे-छोटे प्रयास भी भी हमें बहुत बड़ा परिवर्तन देते हैं। जैसे The film industry has a major role in popularizing fashion in India. And of course I know that Chennai is a big center of the film industry. Can our film makers decide that at least one out of five films will only use handlooms, handicrafts and khadi? 

हमारे फिल्म इंडस्ट्री वाले अपनी फिल्म को popular करने के लिए कुछ दृश्यों के विषयों में बताते हैं कि ये वहां का दृश्य है, ये ढिकना का shooting है तो automatic उनको देखने वाले मिल जाते हैं। अगर वे तय करें कि भई मैं पांच फिल्मों से एक फिल्म ऐसी बनाऊंगा,जिसमें हर कोई हैंडलूम का ही उपयोग होगा, सबके कपड़े भी हैंडलूम के होंगे, handicraft का उपयोग होगा, सारी चीजें ऐसी होगी। मैं उनको विश्वास दिलाता हूं, देश के करोड़ों बुनकर, करोड़ों कारीगर उनकी फिल्म देखने के लिए जरूर जाएंगे, अपने आप उनको मार्केट मिल जाएगा। 

आज के मैनेजमेंट गुरु जब industrial development की बात करते हैं तो cluster concept की बात करते हैं तो cluster को promote करने की बात करते हैं। हमारे पूर्वजों ने सदियों पहले अगर हम सिर्फ handloom और handicraft को देखें तो हमें पता चलेगा कि कैसे cluster से हमारे यहां काम होता था। अब देखिए उत्तर प्रदेश जाइए तो बनारस handloom का एक बहुत बड़ा cluster बना हुआ है। अगर आप यहां कांचीपुरम जाइए, आपको handloom का बहुत बड़ा cluster बना हुआ आपको दिखाई देगा, आप देवगिरी जाइए, महाराष्ट्र में आपको बहुत बड़ा हैंडलूम का cluster बना हुआ दिखाई देगा यानि उस समय भी चाहे supply chain की बात हो, चाहे marketing की बात हो, चाहे cluster development की बात हो, चाहे raw material supply की बात हो। आज के जितने भी मैनेजमेंट गुरु जो बातें बताते हैं वो सदियों से handloom-handicraft की दुनिया में हमारे पूर्वजों ने develop किया हुआ था।

Recently, we have launched the “Digital India Movement”. which will soon connect all Indians through the Internet. Young consumers are now buying extensively through e-commerce platforms. Therefore we should enlarge the scope of e-commerce for sale of handloom products.

As we develop markets for handlooms we also need to extend support to our weavers on the production side. I am happy to learn that the National Handloom Development Corporation supplied 27% more yarn during 2014-15 as compared to the previous year.

Assistance to individual weavers for building work sheds and purchasing loom and accessories will now be directly transferred to their bank accounts. We have taken a major step for developing handloom clusters at the block level. Earlier, assistance of only about 60 lakhs rupees was being given for one handloom cluster. This has now been increased up to 2 crore rupees.

पहले बिचौलिये और दलालों की दुनिया चलती थी। अब सीधा बैंक अकाउंट में weaver के पास पैसा पहुंचेगा। दूसरा, पहले जो shed के लिए आपको सात लाख रुपया दिया जाता था, अब दो करोड़ रुपया दिया जाएगा।

The main objective of all our efforts is to increase wages of our weavers. Weaving is a very laborious job. In some cases, a weaver takes months to weave a single saree. We need to put in place systems that will ensure that they are paid their rightful wages. We also need to improve technology to enhance productivity and reduce labour in the pre-loom activity.

This will help enhance income levels. Apart from increasing incomes our Government is also committed to extend robust social security cover to weaver families.

We have launched a national drive for financial inclusion through Jan Dhan Yojana. Recently we have also launched three new social security schemes intended to benefit unorganized sectors.

The Pradhan Mantri Jeevan Jyoti Beema Yojana will provide life insurance. The Pradhan Mantri Suraksha Beema Yojana will give you accident insurance cover. The Atal Pension Yojana will give you a pension from the age of 60. You can protect your future by paying a small amount every month.

I call upon all of you to join these schemes and also ask your friends and relatives to do so.

To address financing problems of Micro, Small & Medium Industries the Government has announced the creation of a MUDRA Bank. This bank has a corpus of Rs. 20,000 crores and a credit guarantee corpus of Rs. 3,000 crores. MUDRA Bank would ensure that at least 60% of the credit flows to loans of less than Rs. 50,000.

I am sure this initiative will benefit handloom weavers in a big way.

I congratulate all those who are being awarded today. Their expertise should be utilized for skill development programmes, as well as for production of master pieces for display.

Innovative design backed by good marketing is essential for promotion of handlooms. In this context I would like the request to the Textile Ministry to consider holding competitions and giving awards for design creation and marketing of handloom products.

National Handloom Day celebrations should not end with just a ceremony today. We have to make this a continuous movement. A movement to popularize Handlooms and to improve the lives of our weavers.

एक प्रकार से बुनकर परिवार से जुड़े लोग उनका पूरा हिसाब-किताब ताने-बाने के साथ जुड़ा हुआ है। सारा खेल ताना और बाना से बना हुआ है।

अब समय की मांग है कि हम एक नये सिरे से इस चीज का आगे बढ़ाए। हमारे पास जो परंपरागत कला है उस ताने को आधुनिक बाने के साथ कैसे जोड़े?

Handloom में ज्‍यादातर महिलाएं हैं। Handloom गांवो में है। समय की मांग है कि गांव का ताना global बाने के साथ कैसे जुड़े और गांव का ताना और global बाने का मिलन कैसे हम?

समय की मांग है कि गरीबी का ताना और अमीरी का बाना दोनों को जोड़ करके हम आर्थिक समृद्धि की दिशा में handloom को आगे बढ़ाए। उत्‍तर-दक्षिण का ताना और पूरब-पश्चिम का बाना भारत के कोने-कोने में पड़ी इस कला को एक दूसरे से परिचित करा करके एक महाशक्ति के रूप में handloom को कैसे उभारे?

गांव का un-skill से ले करके दुनिया के हर high-skill के साथ एक तरफ un-skill का ताना, तो दूसरी तरफ high skill का बाना। इस ताने और बाने के मिलन से हम handloom के उद्योग को नई ऊंचाईयों पर कैसे ले जाए।

Zero defect का ताना, Zero effect का बाना और हम हमारा ऐसा product करे जो दुनिया को भा जाए और जो environment के लिए सहायक हो, उपकारक हो, environment friendly हो।

मैं फिर एक बार आज सम्‍मान प्राप्‍त करने वाले सभी हमारे कारीगर भाईयों-बहनों का सम्‍मान करता हूं, अभिनंदन करता हूं और तमिलनाडु की सरकार का, नागरिकों का हृदय से अभिनंदन करता हूं। बहुत बहुत धन्‍यवाद।

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Text to PM’s Address at Constitution Day Celebrations organized by Supreme Court
November 26, 2021
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“We all may have different roles, different responsibilities, different ways of working, but the source of our faith, inspiration and energy is the same - our Constitution”
“Sabka Saath-Sabka Vikas, Sabka Vishwas-Sabka Prayas, is the most powerful manifestation of the spirit of the Constitution. Government dedicated to the Constitution, does not discriminate in development”
“India is the only country on course to achieve the goals of the Paris Agreement ahead of time. And yet, in the name of environment, various pressures are created on India. All this is the result of a colonial mentality”
“On the strong foundation of separation of power, we have to pave the path of collective responsibility, create a roadmap, determine goals and take the country to its destination”

नमस्कार !

चीफ जस्टिस एन.वी. रमन्ना जी, जस्टिस यू.यू. ललित जी, कानून मंत्री श्री किरण रिजिजू जी, जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड़ जी, अटॉर्नी जनरल श्री के.के. वेणुगोपाल जी, सुप्रीम कोर्ट बार असोशिएशन के अध्यक्ष श्री विकास सिंह जी, और देश की न्याय व्यवस्था से जुड़े देवियों और सज्जनों!

आज सुबह मैं विधायिका और कार्यपालिका के साथियों के साथ था। और अब न्यायपालिका से जुड़े आप सभी विद्वानों के बीच हूं। हम सभी की अलग-अलग भूमिकाएं, अलग-अलग जिम्मेदारियां, और काम करने के तरीके भी अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी आस्था, प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत एक ही है - हमारा संविधान! मुझे खुशी है कि आज हमारी ये सामूहिक भावना संविधान दिवस पर इस आयोजन के रूप में व्यक्त हो रही है, हमारे संवैधानिक संकल्पों को मजबूत कर रही है। इस कार्य से जुड़े सभी लोग, अभिनंदन के अधिकारी है।

माननीय,

आजादी के लिए जीने-मरने वाले लोगों ने जो सपने देखे थे, उन सपनों के प्रकाश में, और हजारों साल की भारत की महान परंपरा को संजोए हुए, हमारे संविधान निर्माताओं ने हमें संविधान दिया। सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने, भारत को अनेक मुसीबतों में झोंक दिया था। किसी युग में सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत, गरीबी-भुखमरी और बीमारी से जूझ रहा था। इस पृष्ठभूमि में, देश को आगे बढ़ाने में संविधान हमेशा हमारी मदद करता रहा है। लेकिन आज दुनिया के अन्य देशों की तुलना में देखें, तो जो देश भारत के करीब-करीब साथ ही आजाद हुए, वो आज हमसे काफी आगे हैं। यानि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, हमें मिलकर लक्ष्य तक पहुंचना है। हम सभी जानते हैं, हमारे संविधान में Inclusion पर कितना जोर दिया गया है। लेकिन ये भी सच्चाई रही है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी बड़ी संख्या में देश के लोग exclusion को भोगने के लिए मजबूर रहे हैं। वो करोड़ों लोग, जिनके घरों में शौचालय तक नहीं था, वो करोड़ों लोग जो बिजली के अभाव में अंधेरे में अपनी जिंदगी बिता रहे थे, वो करोड़ों लोग जिनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष, घर के लिए थोड़ा सा पानी जुटाना था, उनकी तकलीफ, उनका दर्द समझकर, उनका जीवन आसान बनाने के लिए खुद को खपा देना, मैं संविधान का असली सम्मान मानता हूं। और इसलिए, आज मुझे संतोष है कि देश में, संविधान की इसी मूल भावना के अनुरूप, exclusion को inclusion में बदलने का भागीरथ अभियान तेजी से चल रहा है। और इसका जो सबसे बड़ा लाभ क्या हुआ है, ये भी हमें समझना होगा। जिन 2 करोड़ से अधिक गरीबों को आज अपना पक्का घर मिला है, जिन 8 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को उज्जवला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन मिला है, जिन 50 करोड़ से अधिक गरीबों को बड़े से बड़े अस्पताल में 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज सुनिश्चित हुआ है, जिन करोड़ों गरीबों को पहली बार बीमा और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं मिली हैं, उन गरीबों के जीवन की बहुत बड़ी चिंता कम हुई है, ये योजनाएं उनके लिए बड़ा संबल बनी हैं। इसी कोरोना काल में पिछले कई महीनों से 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त अनाज सुनिश्चित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना पर सरकार 2 लाख 60 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके गरीबों को मुफ्त अनाज दे रही है। अभी कल ही हमने इस योजना को अगले वर्ष मार्च तक के लिए बढ़ा दिया है। हमारे जो Directive Principles कहते हैं - “Citizens, men and women equally, have the right to an adequate means of livelihood” वो इसी भावना का ही तो प्रतिबिंब हैं। आप सभी ये मानेंगे कि जब देश का सामान्य मानवी, देश का गरीब, विकास की मुख्यधारा से जुड़ता है, जब उसे equality और equal opportunity मिलती है, तो उसकी दुनिया पुरी तरह बदल जाती है। जब रेहड़ी, ठेले, पटरी वाला भी बैंक क्रेडिट की व्यवस्था से जुड़ता है, तो उसको राष्ट्र निर्माण में भागीदारी का ऐहसास होता है। जब दिव्यांगों को ध्यान में रखते हुए पब्लिक प्लेसेस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और दूसरी सुविधाओं का निर्माण होता है, जब उन्हें आजादी के 70 साल बाद पहली बार कॉमन साइन लैंग्वेज मिलती है, तो उनमें आत्मविश्वास जागता है। जब ट्रांसजेंडर्स को कानूनी संरक्षण मिलता है, ट्रांसजेंडर को पद्म पुरस्कार मिलते हैं, उनकी भी समाज पर, संविधान पर आस्था और मज़बूत होती है। जब तीन तलाक जैसी कुरीति के विरुद्ध कड़ा कानून बनता है, तो उन बहनों-बेटियों का संविधान पर भरोसा और सशक्त होता है, जो हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थीं।

महानुभाव,

सबका साथ-सबका विकास, सबका विश्वास-सबका प्रयास, ये संविधान की भावना का सबसे सशक्त प्रकटीकरण है। संविधान के लिए समर्पित सरकार, विकास में भेद नहीं करती और ये हमने करके दिखाया है। आज गरीब से गरीब को भी क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर तक वही एक्सेस मिल रहा है, जो कभी साधन संपन्न लोगों तक सीमित था। आज लद्दाख, अंडमान और निकोबार, नॉर्थ ईस्ट के विकास पर भी देश का उतना ही फोकस है, जितना दिल्ली और मुंबई जैसे मेट्रो शहरों पर है। लेकिन इन सबके बीच, मैं एक और बात की तरफ आपका ध्यान दिलाउंगा। आपने भी ज़रूर अनुभव किया होगा कि जब सरकार किसी एक वर्ग के लिए, किसी एक छोटे से टुकड़े के लिए कुछ करती है, तो बड़ी उदारवादी कहलाती है, उसकी बड़ी प्रशंसा होती है। कि देखो उनके लिए कुछ किया लेकिन मैं हैरान हूँ कभी कभी हम देखते हैं कोई सरकार एक राज्य के लिए कुछ करे, राज्य का भला हो, तो बड़ी वाहवाही करते हैं। लेकिन जब सरकार सबके लिए करती, हर नागरिक के लिए करती है, हर राज्य के लिए करती है, तो इसे उतना महत्व नहीं दिया जाता, उसका जिक्र तक नहीं होता। सरकार की योजनाओं से कैसे हर वर्ग का, हर राज्य का समान रूप से भला हो रहा है, इस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। पिछले सात वर्षों में हमने बिना भेदभाव के, बिना पक्षपात के, विकास को हर व्यक्ति, हर वर्ग, और देश के हर कोने तक पहुंचाने का प्रयास किया है। इस साल 15 अगस्त को मैंने गरीब कल्याण से जुड़ी योजनाओं के सैचुरेशन की बात कही और इसके लिए हम मिशन मोड पर जुटे भी हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, इस मंत्र को लेकर के कार्य करने का हमारा प्रयास है I आज इससे देश की तस्वीर कैसे बदली है ये हमें हाल के National Family Health Survey report में भी दिखाई देता है। इस रिपोर्ट के बहुत से तथ्य, इस बात को सिद्ध करते हैं कि जब नेक नीयत के साथ काम किया जाए, सही दिशा में आगे बढ़ा जाए, और सारी शक्ति जुटाकर लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया जाए तो, सुखद परिणाम अवश्य आते हैं। Gender Equality की बात करें तो अब पुरुषों की तुलना में बेटियों की संख्या बढ़ रही है। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में डिलिवरी के ज्यादा अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। इस वजह से माता मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर कम हो रही है। और भी बहुत सारे इंडिकेटर्स ऐसे हैं जिस पर हम एक देश के रूप बहुत अच्छा कर रहे है। इन सभी इंडिकेटर्स में हर परसेंटेज पॉइंट की बढ़ोतरी सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है। ये करोड़ों भारतीयों को मिल रहे उनके हक का प्रमाण है। ये बहुत आवश्यक है कि, जन कल्याण से जुड़ी योजनाओं का पूरा लाभ लोगों को मिले, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाएं समय पर पूरी हों। किसी भी कारण से हुई अनावश्यक देरी, नागरिक को उसके हक से वंचित रखती है। मैं गुजरात का रहने वाला हूँ तो मैं सरदार सरोवर डैम का उदाहरण देना चाहता हूं। सरदार पटेल ने मां नर्मदा पर इस तरह के डैम का सपना देखा था। पंडित नेहरू ने इसका शिलान्यास किया था। लेकिन ये परियोजना दशकों तक अपप्रचार में फंसी रही। पर्यावरण के नाम पर चले आंदोलन में फंसी रही। न्यायालय तक इसमें निर्णय लेने में हिचकिचाते रहे। वर्ल्ड बैंक ने भी इसके लिए पैसे देने से मना कर दिया था। लेकिन उसी नर्मदा के पानी से कच्छ में जो विकास हुआ, विकास का कार्य हुआ, आज हिन्‍दुस्‍तान के तेज गति से आगे बढ़ रहे district में कच्‍छ जिला है। कच्‍छ तो एक प्रकार से रेगिस्‍तान जैसा इलाका है, तेज गति से विकसित होने वाले क्षेत्र में उसकी जगह बन गयी। कभी रेगिस्तान के रूप में जाने वाला कच्छ, पलायन के लिए पहचाना जाने वाला कच्छ, आज एग्रो-एक्सपोर्ट की वजह से अपनी पहचान बना रहा है। इससे बड़ा ग्रीन अवार्ड और क्या हो सकता है?

माननीय,

भारत के लिए, और विश्व के अनेक देशों के लिए, हमारी अनेक पीढ़ियों के लिए, उपनिवेशवाद की बेड़ियों में जकड़े हुए जीना एक मजबूरी थी। भारत की आज़ादी के समय से, पूरे विश्व में एक post-Colonial कालखंड की शुरुआत हुई, अनेकों देश आज़ाद हुए। आज पूरे विश्व में कोई भी देश ऐसा नहीं है जो प्रकट रूप से किसी अन्य देश के उपनिवेश के रूप में exist करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उपनिवेशवादी मानसिकता, Colonial Mindset  समाप्त हो गया  है। हम देख रहे हैं कि यह मानसिकता अनेक विकृतियों को जन्म दे रही है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हमें विकासशील देशों की विकास यात्राओं में आ रही बाधाओं में दिखाई देता है। जिन साधनों से, जिन मार्गों पर चलते हुए, विकसित विश्व आज के मुकाम पर पहुंचा है, आज वही साधन, वही मार्ग, विकासशील देशों के लिए बंद करने के प्रयास किए जाते हैं। पिछले दशकों में इसके लिए अलग-अलग प्रकार की शब्दावली का जाल रचाया जाता है। लेकिन उद्देश्य एक ही रहा है - विकासशील देशों की प्रगति को रोकना। आजकल हम देखते हैं, कि पर्यावरण के विषय को भी इसी काम के लिए हाईजैक करने के प्रयास हो रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले हमने COP-26 समिट में इसका जीवंत उदाहरण देखा है। अगर absolute cumulative emissions की बात करें, तो, विकसित देशों ने मिलकर 1850 से अब तक, भारत से 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अगर हम per capita basis की बात करें तो भी विकसित देशों ने भारत के मुकाबले 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मिलकर भारत की तुलना में 11 गुना अधिक absolute cumulative emission किया है। इसमें भी per capita basis को आधार बनाएं तो अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भारत की तुलना में 20 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। फिर भी आज, आज हमें गर्व है भारत जिसकी सभ्यता और संस्कृति में ही प्रकृति के साथ जीने की प्रवृति है, जहाँ पत्थरों में, पेड़ों में, और प्रकृति के कण-कण में, जहां पत्‍थर में भगवान देखा जाता है, उसका स्वरुप देखा जाता है, जहाँ धरती को माँ के रूप में पूजा जाता है, उस भारत को पर्यावरण संरक्षण के उपदेश सुनाए जाते हैं। और हमारे लिए ये मूल्य सिर्फ़ किताबी नहीं हैं, किताबी बातें नहीं हैं। आज भारत में Lion), Tiger, Dolphin आदि की संख्या, और अनेक प्रकार की biodiversity के मानकों में लगातार सुधार हो रहा है। भारत में वन क्षेत्र बढ़ रहा है। भारत में Degraded Land का सुधार हो रहा है। गाड़ियों के ईंधन के मानकों को हमने स्वेच्छा से बढ़ाया है। हर प्रकार की renewable ऊर्जा में हम विश्व के अग्रणी देशों में हैं। और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त करने की ओर अग्रसर अगर कोई है तो एकमात्र हिन्‍दुस्‍तान है। G20 देशों के समूह में अच्‍छे से अच्‍छा काम करने वाला कोई देश है, दुनिया ने माना है वो हिन्‍दुस्‍तान है और फ़िर भी, ऐसे भारत पर पर्यावरण के नाम पर भाँति-भाँति के दबाव बनाए जाते हैं। यह सब, उपनिवेशवादी मानसिकता का ही परिणाम है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में भी ऐसी ही मानसिकता के चलते अपने ही देश के विकास में रोड़े अटकाए जाते है। कभी freedom of expression के नाम पर तो कभी किसी और चीज़ का सहारा लेकर। हमारे देश की परिस्थितियाँ, हमारे युवाओं की आकांक्षाओ, सपनों को बिना जाने समझे, बहुत सी बार दूसरे देशों के benchmark पर भारत को तौलने का प्रयास होता है और इसकी आड़ में विकास के रास्ते बंद करने की कोशिशें होती हैं। इसका नुकसान, ये जो करते हैं ऐसे लोगों को भुगतना नहीं पड़ता है। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस माँ को, जिसका बच्चा बिजली प्लांट स्थापित न होने के कारण पढ़ नहीं पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस पिता को, जो रुके हुए सड़क प्रोजेक्ट के कारण अपनी संतान को समय पर अस्पताल नहीं पहुँचा पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस मध्यम वर्गीय परिवार को जिसके लिए आधुनिक जीवन की सुविधाएं पर्यावरण के नाम पर उसकी आमदनी से बाहर पहुंचा दी गई हैं। इस कोलोनियल माइंडसेट की वजह से, भारत जैसे देश में, विकास के लिए प्रयास कर रहे देश में, करोड़ों आशाएं टूटती हैं, आकांक्षाएं दम तोड़ देती हैं। आजादी के आंदोलन में जो संकल्पशक्ति पैदा हुई, उसे और अधिक मजबूत करने में ये कोलोनियल माइंडसेट बहुत बड़ी बाधा है। हमें इसे दूर करना ही होगा। और इसके लिए, हमारी सबसे बड़ी शक्ति, हमारा सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत, हमारा संविधान ही है।

माननीय,

सरकार और न्यायपालिका, दोनों का ही जन्म संविधान की कोख से हुआ है। इसलिए, दोनों ही जुड़वां संतानें हैं। संविधान की वजह से ही ये दोनों अस्तित्व में आए हैं। इसलिए, व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो अलग-अलग होने के बाद भी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

हमारे यहाँ शास्त्रों में भी कहा गया है-

ऐक्यम् बलम् समाजस्य, तत् अभावे स दुर्बलः।

तस्मात् ऐक्यम् प्रशंसन्ति, दॄढम् राष्ट्र हितैषिण:॥

अर्थात्, किसी समाज की, देश की ताकत उसकी एकता और एकजुट प्रयासों में होती है। इसलिए, जो मजबूत राष्ट्र के हितैषी होते हैं, वो एकता की प्रशंसा करते हैं, उस पर ज़ोर देते हैं। राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि रखते हुये यही एकता देश की हर संस्था के प्रयासों में होनी चाहिए। आज जब देश अमृतकाल में अपने लिए असाधारण लक्ष्य तय कर रहा है, दशकों पुरानी समस्याओं के समाधान तलाशकर नए भविष्य के लिए संकल्प ले रहा है, तो ये सिद्धि सबके साथ से ही पूरी होगी। इसीलिए, देश ने आने वाले 25 सालों के लिए जब देश आजादी की 25वीं शताब्‍दी मनाता होगा और इसलिए ‘सबका प्रयास’ इसका देश ने आह्वान किया है। निश्चित तौर पर इस आह्वान में एक बड़ी भूमिका judiciary की भी है।

महोदय,

हमारी चर्चा में बिना भूले हुए एक बात लगातार सुनने को आती है, बार-बार उसे दोहराया जाता है - Separation of power । Separation of power की बात, न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका, अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण रही है। इसके साथ ही, आजादी के इस अमृत काल में, भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक, ये जो अमृत काल है, ये अमृत कालखंड में, संविधान की भावना के अनुरूप, Collective Resolve दिखाने की आवश्यकता है। आज देश के सामान्य मानवी के पास जो कुछ है, वो उससे ज्यादा का हकदार है। जब हम देश की आज़ादी की शताब्दी मनायेंगे, उस समय का भारत कैसा होगा, इसके लिए हमें आज ही काम करना है। इसलिए, देश की उसकी आकांक्षाओं  को पूरा करने की collective responsibility के साथ चलना बहुत ज़रूरी है। Separation of Power के मज़बूत अधिष्ठान पर हमें collective responsibility का मार्ग निर्धारित करना है, Roadmap बनाना है, लक्ष्य तय करने है और मंज़िल तक देश को पहुंचना है।

माननीय,

कोरोना काल ने justice delivery में technology के इस्तेमाल को लेकर नया भरोसा पैदा किया है। डिजिटल इंडिया के मेगा मिशन में न्यायपालिका की सहभागिता है। 18 हजार से ज्यादा कोर्ट्स का computerize होना, 98 प्रतिशत कोर्ट कॉम्प्लेक्स का वाइड एरिया नेटवर्क से जुड़ जाना, रियल टाइम में judicial data के transmission के लिए national judicial data grid का functional होना, e-court platform का लाखों लोगों तक पहुँचना, ये बताता है कि आज technology हमारे जस्टिस सिस्टम की कितनी बड़ी ताकत बन चुकी है, और आने वाले समय में हम एक advanced judiciary को काम करते हुये देखेंगे। समय परिवर्तनीय है, दुनिया बदलती रहती है, लेकिन ये बदलाव मानवता के लिए evolution का जरिया बने हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मानवता ने इन बदलावों को स्वीकार किया, और साथ ही मानवीय मूल्यों को शाश्वत बनाए रखा। न्याय की अवधारणा इन मानवीय मूल्यों का सबसे परिष्कृत विचार है। और, संविधान न्याय की इस अवधारणा की सबसे परिष्कृत व्यवस्था है। इस व्यवस्था को गतिशील और प्रगतिशील बनाए रखने का दायित्व हम सभी पर है। अपनी इन भूमिकाओं का निर्वहन हम सब पूरी निष्ठा से करेंगे, और आज़ादी के सौ साल से पहले एक नए भारत का सपना पूरा होगा। हम लगातार इन बातों से प्रेरित हैं, जिस बात के लिए हम गर्व करते हैं और वो मंत्र हमारे लिये है- संगच्छध्वं, संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। हमारे लक्ष्य समान हों, हमारे मन समान हों और हम साथ मिलकर उन लक्ष्यों को प्राप्त करें। इसी भावना के साथ मैं आज संविधान दिवस के इस पवित्र माहौल में आप सबको, देशवासियों को भी अनेकअनेक शुभकामनाएं देते हुए मेरी बात को समाप्‍त करता हूं। फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई।

बहुत बहुत धन्यवाद!