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डॉ. मार्टिन लुथर किंग जूनियर जब 1959 में भारत आए तो उन्होंने कहा, ‘दूसरे देशों में मैं एक पर्यटक की तरह जा सकता हूं, लेकिन भारत में मैं एक तीर्थयात्री हूं।’ उन्होंने कहा, ‘शायद अन्य बातों से बढ़कर भारत ऐसी भूमि है जहां अहिंसक सामाजिक बदलाव की तकनीकें विकसित की गईं, जिन्हें मेरे लोगों ने अलाबामा के मोंटगोमेरी और अमेरिका के पूरे दक्षिण में आजमाया है। हमने उन्हें प्रभावी पाया है- वे काम करती हैं!’

जिसके कारण डॉ. किंग भारत आए,वह राह दिखाने वाली रोशनी मोहन दास करमचंद गांधी, महात्मा थे। बुधवार को हमने उनकी 150वीं जयंती मनाई। बापू दुनियाभर में करोड़ों लोगों को आज भी हौसला दे रहे हैं। प्रतिरोध के गांधीवादी तरीकों ने कई अफ्रीकी देशों में उम्मीद की भावना प्रज्वलित की। डॉ. किंग ने कहा था, ‘जब मैं पश्चिम अफ्रीका में घाना गया तो प्रधानमंत्री नक्रुमाह ने मुझसे कहा कि उन्होंने गांधीजी के काम के बारे में पढ़ा है और महसूस किया कि अहिंसक प्रतिरोध का वहां विस्तार किया जा सकता है। हमें याद आता है कि दक्षिण अफ्रीका में भी बस बॉयकाट हुए हैं।’

नेल्सन मंडेला ने गांधीजी को ‘पवित्र योद्धा’ कहते हुए लिखा, ‘असहयोग की उनकी रणनीति, उनका इस बात पर जोर देना कि हम पर किसी का प्रभुत्व तभी चलेगा जब हम हमें अधीन रखने वाले से सहयोग करेंगे। और उनके अहिंसक प्रतिरोध ने हमारी सदी में कई उपनिवेश और नस्लवाद विरोधी आंदोलनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रेरित किया।’ मंडेला के लिए गांधी भारतीय और दक्षिण अफ्रीकी थे। गांधीजी भी उनसे सहमत होते। उनमें मानव समाज के सबसे बड़े विरोधाभासों में पुल बनने की अनूठी योग्यता थी। 1925 में गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा : ‘किसी व्यक्ति के लिए राष्ट्रवादी हुए बगैर अंतरराष्ट्रीयवादी होना असंभव है। अंतरराष्ट्रीयवाद तभी संभव होता है जब राष्ट्रवाद एक तथ्य बन जाता है अर्थात जब अलग-अलग देशों के लोग संगठित होते हैं और फिर मिलकर कार्य करने में कामयाब होते हैं।’ उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की इस रूप में कल्पना की थी कि जो संकुचित न हो बल्कि ऐसा हो जो पूरी मानवता की सेवा करे।

महात्मा गांधी समाज के सभी वर्गों में भरोसे के प्रतीक भी थे। 1917 में गुजरात के अहमदाबाद में कपड़ा मील की बड़ी हड़ताल हुई। जब मिल मालिकों और श्रमिकों के बीच टकराव बहुत बढ़ गया तो गांधीजी ने मध्यस्थता करके न्यायसंगत समझौता कराया। गांधीजी ने श्रमिकों के अधिकारों के लिए मजूर महाजन संघ गठित किया था। इससे उजागर होता है कि कैसे छोटे कदम बड़ा प्रभाव छोड़ते हैं। उन दिनों ‘महाजन’ शब्द का उपयोग श्रेष्ठिवर्ग के लिए आदर स्वरूप प्रयोग किया जाता था। गांधीजी ने ‘महाजन’ के साथ ‘मजूर’ जोड़कर सामाजिक संरचना को उलट दिया। श्रमिकों के गौरव को बढ़ा दिया था। और गांधीजी ने साधारण चीजों को व्यापक जनमानस की राजनीति से जोड़ा। चरखे और खादी को राष्ट्र की आत्म-निर्भरता और सशक्तिकरण से और कौन जोड़ सकता था? चुटकी भर नमक से कौन विशाल जन-आंदोलन खड़ा कर सकता था! औपनिवेशिक राज में नमक कानून के तहत भारतीय नमक पर लगाया नया टैक्स बोझ था। 1930 की दांडी यात्रा के माध्यम से गांधीजी ने नमक कानून को चुनौती दी अौर ऐतिहासिक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया। दुनिया में कई जन-आंदोलन हुए हैं, कई तरह के स्वतंत्रता संघर्ष, भारत में भी। लेकिन जनता की व्यापक भागीदारी गांधीवादी संघर्ष या उनसे प्रेरित संघर्षों को उनसे अलग करती है।

उनके लिए स्वाधीनता विदेशी शासन की गैर-मौजूदगी का नाम नहीं था। उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सशक्तिकरण में गहरा संबंध देखा। उन्होंने ऐसी दुनिया की कल्पना की थी, जिसमें हर नागरिक के लिए गरिमा व समृद्धि हो। जब दुनिया अधिकारों की बात करती है तो गांधी कर्तव्यों पर जोर देते हैं। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा : ‘कर्तव्य ही अधिकारों का सच्चा स्रोत है। यदि हम सब अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें तो अधिकार ज्यादा दूर नहीं रहेंगे।’ ‘हरिजन’ पत्रिका में उन्होंने लिखा, ‘जो अपने कर्तव्यों को व्यवस्थित ढंग से अंजाम देता है उसे अधिकार अपने आप मिल जाते हैं।’ धरती के उत्तराधिकारी के रूप में हम इसके कल्याण के लिए भी जिम्मेदार हैं, जिसमें इसकी वनस्पतियां और जीव शामिल हैं। गांधीजी के रूप में हमें मार्गदर्शन देने वाला सर्वश्रेष्ठ शिक्षक उपलब्ध है। मानवता में भरोसा रखने वालों को एकजुट करने से लेकर टिकाऊ विकास को आगे बढ़ाने और आर्थिक स्वावलम्बन सुनिश्चित करने तक गांधी ने हर समस्या का समाधान देते हैं। हम भारतीय इस दिशा में अपना दायित्व निभा रहे हैं। जहां तक गरीबी मिटाने की बात है भारत सबसे तेजी से काम करने वाले देशों में है। स्वच्छता के हमारे प्रयासों ने दुनिया का ध्यान खींचा है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस जैसे प्रयासों के माध्यम से भारत अक्षय ऊर्जा स्रोतों के दोहन में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इस अलायंस ने कई देशों को टिकाऊ भविष्य की खातिर सौर ऊर्जा के दोहन के लिए एक किया है। हम दुनिया के साथ मिलकर और दुनिया के लिए और भी बहुत कुछ करना चाहते हैं।

गांधीजी को शृद्धांजलि देेने के लिए मैं उस बात की पेशकश करता हूं जिसे मैं आइंस्टीन चैलेंज कहता हूं। हम गांधीजी के बारे में अल्बर्ट आइंस्टीन का प्रसिद्ध वक्तव्य जानते हैं, ‘आने वाली पीढ़ियां मुश्किल से ही विश्वास करेगी कि रक्त-मांस का जीता-जागता ऐसा कोई व्यक्ति धरती पर हुआ था।’ हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि गांधीजी के आदर्श भावी पीढ़ियां भी याद रखें? मैं विचारकों, उद्यमियों और टेक्नोलॉजी लीडर्स को आमंत्रित करता हूं कि वे इनोवेशन के जरिये गांधीजी के विचारों को फैलाने में अग्रणी भूमिका निभाएं।

आइए, हमारी दुनिया को समृद्ध बनाने और नफरत और तकलीफों से मुक्त करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम करें। तभी हम महात्मा गांधी के सपने को पूरा करेंगे, जो उनके प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो’ में व्यक्त हुआ है। यह कहता है कि सच्चा मानव वह है जो दूसरे के दर्द को महसूस कर सके, तकलीफों को दूर करें और इसका उसे कभी अहंकार न हो।
दुनिया का आपको नमन, प्रिय बापू!

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डॉ. लोहिया की याद में...
March 26, 2019
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आज का दिन देश के महान क्रांतिकारियों के सम्मान का दिन है। 

मां भारती के अमर सपूतों वीर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उनके सर्वोच्च बलिदान के लिए देश उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हैं।  

इसके साथ ही अद्वितीय विचारक, क्रांतिकारी तथा अप्रतिम देशभक्त डॉ. राम मनोहर लोहिया को उनकी जयंती पर सादर नमन। 

प्रखर बुद्धि के धनी डॉ. लोहिया में जन सरोकार की राजनीति के प्रति गहरी आस्था थी।

जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, तब युवा लोहिया ने आंदोलन की कमान संभाली और डटे रहे। उन्होंने भूमिगत रहते हुए अंडरग्राउंड रेडियो सेवा शुरू की, ताकि आंदोलन की गति धीमी न पड़े।

गोवा मुक्ति आंदोलन के इतिहास में डॉ. लोहिया का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

जहां कहीं भी गरीबों, शोषितों, वंचितों को मदद की जरूरत पड़ती, वहां डॉ. लोहिया मौजूद होते थे।   

डॉ. लोहिया के विचार आज भी हमें प्रेरित करते हैं। उन्होंने कृषि को आधुनिक बनाने तथा अन्नदाताओं के सशक्तीकरण को लेकर काफी कुछ लिखा। उनके इन्हीं विचारों के अनुरूप एनडीए सरकार प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, कृषि सिंचाई योजना, e-Nam, सॉयल हेल्थ कार्ड और अन्य योजनाओं के माध्यम से किसानों के हित में काम कर रही है।   

डॉ. लोहिया समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था और महिलाओं एवं पुरुषों के बीच की असमानता को देखकर बेहद दुखी होते थे।सबका साथ, सबका विकासका हमारा मंत्र तथा पिछले पांच सालों का हमारा ट्रैक रिकॉर्ड यह दिखाता है कि हमने डॉ. लोहिया के विजन को साकार करने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। अगर आज वे होते तो एनडीए सरकार के कार्यों को देखकर निश्चित रूप से उन्हें गर्व की अनुभूति होती।

जब कभी भी डॉ. लोहिया संसद के भीतर या बाहर बोलते थे, तो कांग्रेस में इसका भय साफ नजर आता था।

देश के लिए कांग्रेस कितनी घातक हो चुकी है, इसे डॉ. लोहिया भलीभांति समझते थे। 1962 में उन्होंने कहा था, कांग्रेस शासन में कृषि हो या उद्योग या फिर सेना, किसी भी क्षेत्र में कोई सुधार नहीं हुआ है।

उनके ये शब्द कांग्रेस की बाद की सरकारों पर भी अक्षरश: लागू होते रहे। बाद के कांग्रेस शासनकालों में भी किसानों को परेशान किया गया, उद्योगों को हतोत्साहित किया गया (सिर्फ कांग्रेस नेताओं के दोस्तों और रिश्तेदारों के उद्योगों को छोड़कर) और राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी की गई।

कांग्रेसवाद का विरोध डॉ. लोहिया के हृदय में रचा-बसा था। उनके प्रयासों की वजह से ही 1967 के आम चुनावों में सर्वसाधन संपन्न और ताकतवर कांग्रेस को करारा झटका लगा था। उस समय अटल जी ने कहा था - डॉ. लोहिया की कोशिशों का ही परिणाम है कि हावड़ा-अमृतसर मेल से पूरी यात्रा बिना किसी कांग्रेस शासित राज्य से गुजरे की जा सकती है !

दुर्भाग्य की बात है कि राजनीति में आज ऐसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, जिन्हें देखकर डॉ. लोहिया भी विचलित, व्यथित हो जाते।  

वे दल जो डॉ. लोहिया को अपना आदर्श बताते हुए नहीं थकते, उन्होंने पूरी तरह से उनके सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी है। यहां तक कि ये दल डॉ. लोहिया को अपमानित करने का कोई भी कोई मौका नहीं छोड़ते। 

ओडिशा के वरिष्ठ समाजवादी नेता श्री सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी ने कहा था,डॉ. लोहिया अंग्रेजों के शासनकाल में जितनी बार जेल गए, उससे कहीं अधिक बार उन्हें कांग्रेस की सरकारों ने जेल भेजा।

आज उसी कांग्रेस के साथ तथाकथित लोहियावादी पार्टियां अवसरवादी महामिलावटी गठबंधन बनाने को बेचैन हैं। यह विडंबना हास्यास्पद भी है और निंदनीय भी है।

डॉ. लोहिया वंशवादी राजनीति को हमेशा लोकतंत्र के लिए घातक मानते थे। आज वे यह देखकर जरूर हैरान-परेशान होते कि उनके ‘अनुयायी’ के लिए अपने परिवारों के हित देशहित से ऊपर हैं।

डॉ. लोहिया का मानना था कि जो व्यक्ति ‘समता’, ‘समानता’ और ‘समत्व भाव’ से कार्य करता है, वह योगी है। दुख की बात है कि स्वयं को लोहियावादी कहने वाली पार्टियों ने इस सिद्धांत को भुला दिया। वे‘सत्ता’, ‘स्वार्थ’ और ‘शोषण’ में विश्वास करती हैं। इन पार्टियों को जैसे तैसे सत्ता हथियाने, जनता की धन-संपत्ति को लूटने और शोषण में महारत हासिल है। गरीब, दलित, पिछड़े और वंचित समुदाय के लोगों के साथ ही महिलाएं इनके शासन में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, क्योंकि ये पार्टियां अपराधी और असामाजिक तत्त्वों को खुली छूट देने का काम करती हैं।

डॉ. लोहिया जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों और महिलाओं के बीच बराबरी के पक्षधर रहे। लेकिन, वोट बैंक की पॉलिटिक्स में आकंठ डूबी पार्टियों का आचरण इससे अलग रहा। यही वजह है कि तथाकथित लोहियावादी पार्टियों ने तीन तलाक की अमानवीय प्रथा को खत्म करने के एनडीए सरकार के प्रयास का विरोध किया।

इन पार्टियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इनके लिए डॉ. लोहिया के विचार और आदर्श बडे़ हैं या फिर वोट बैंक की राजनीति?

आज 130 करोड़ भारतीयों के सामने यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि - जिन लोगों ने डॉ. लोहिया तक से विश्वासघात किया, उनसे हम देश सेवा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

जाहिर है, जिन लोगों ने डॉ. लोहिया के सिद्धांतों से छल किया है, वे लोग हमेशा की तरह देशवासियों से भी छल करेंगे।