मेरे प्यारे देशवासियों,

आज फिर मुझे आप से मिलने का सौभाग्य मिला है। आपको लगता होगा कि प्रधानमंत्री ऐसी बातें क्यों करता है। एक तो मैं इसलिए करता हूँ कि मैं प्रधानमंत्री कम, प्रधान सेवक ज्यादा हूँ। बचपन से मैं एक बात सुनते आया हूँ और शायद वही ‘मन की बात’ की प्ररेणा है। हम बचपन से सुनते आये हैं कि दुःख बांटने से कम होता है और सुख बांटने से बढ़ता है। ‘मन की बात’ में, मैं कभी दुःख भी बांटता हूँ , कभी सुख भी बांटता हूँ। मैं जो बातें करता हूँ वो मेरे मन में कुछ पीड़ाएं होती हैं उसको आपके बीच में प्रकट करके अपने मन को हल्का करता हूँ और कभी कभी सुख की कुछ बातें हैं जो आप के बीच बांटकर के मैं उस खुशी को चौगुना करने का प्रयास करता हूँ।

मैंने पिछली बार कहा था कि लम्बे अरसे से मुझे हमारी युवा पीढ़ी की चिंता हो रही है। चिंता इसलिए नहीं हो रही है कि आपने मुझे प्रधानमंत्री बनाया है, चिंता इसलिए हो रही है कि किसी मां का लाल, किसी परिवार का बेटा, या बेटी ऐसे दलदल में फंस जाते हैं तो उस व्यक्ति का नहीं, वो पूरा परिवार तबाह हो जाता है। समाज, देश सब कुछ बरबाद हो जाता है। ड्रग्स, नशा ऐसी भंयकर बीमारी है, ऐसी भंयकर बुराई है जो अच्छों अच्छों को हिला देती है।

मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में काम करता था, तो कई बार मुझे हमारे अच्छे-अच्छे अफसर मिलने आते थे, छुट्टी मांगते थे। तो मैं पूछता था कि क्यों ? पहले तो नहीं बोलते थे, लेकिन जरा प्यार से बात करता था तो बताते थे कि बेटा बुरी चीज में फंसा है। उसको बाहर निकालने के लिए ये सब छोड़-छाड़ कर, मुझे उस के साथ रहना पड़ेगा। और मैंने देखा था कि जिनको मैं बहुत बहादुर अच्छे अफसर मानता था, वे भी सिर्फ रोना ही बाकी रह जाता था। मैंनें ऐसी कई माताएं देखी हैं। मैं एक बार पंजाब में गया था तो वहां माताएं मुझे मिली थी। बहुत गुस्सा भी कर रही थी, बहुत पीड़ा व्यक्त कर रही थीं।

हमे इसकी चिंता समाज के रूप में करनी होगी। और मैं जानता हूँ कि बालक जो इस बुराई में फंसता है तो कभी कभी हम उस बालक को दोशी मानते हैं। बालक को बुरा मानते हैं। हकीकत ये है कि नशा बुरा है। बालक बुरा नही है, नशे की लत बुरी है। बालक बुरा नही है हम अपने बालक को बुरा न माने। आदत को बुरा मानें, नशे को बुरा मानें और उससे दूर रखने के रास्ते खोजें। बालक को ही दुत्कार देगें तो वो और नशा करने लग जाएगा। ये अपने आप में एक Psycho-Socio-Medical problem है। और उसको हमें Psycho-Socio-Medical problem के रूप में ही treat करना पड़ेगा। उसी के रूप में handle करना पड़ेगा और मैं मानता हूँ कि कुछ समस्याओं का समाधान मेडिकल से परे है। व्यक्ति स्वंय, परिवार, यार दोस्त, समाज, सरकार, कानून, सब को मिल कर के एक दिशा में काम करना पड़ेगा। ये टुकड़ों में करने से समस्या का समाधान नहीं होना है।

मैंने अभी असम में डी जी पी की Conference रखी थी। मैंने उनके सामने मेरी इस पीड़ा को आक्रोश के साथ व्यक्त किया था। मैंने पुलिस डिपार्टमेंट में इसकी गम्भीर बहस करने के लिये, उपाय खोजने के लिए कहा है। मैंने डिपार्टमेंट को भी कहा है कि क्यों नहीं हम एक टोल-फ्री हैल्पलाईन शुरू करें। ताकि देश के किसी भी कोने में, जिस मां-बाप को ये मुसीबत है कि उनके बेटे में उनको ये लग रहा है कि ड्रग की दुनिया में फंसा है, एक तो उनको दुनिया को कहने में शर्म भी आती है, संकोच भी होता है, कहां कहें? एक हैल्पलाईन बनाने के लिए मैंने शासन को कहा है। वो बहुत ही जल्द उस दिशा में जरूर सोचेंगे और कुछ करेंगे।

उसी प्रकार से, मैं जानता हूँ ड्रग्स तीन बातों को लाता है और मैं उसको कहूँगा, ये बुराइयों वाला Three D है - मनोरंजन के Three D की बात मैं नहीं कर रहा हूँ।

एक D है Darkness, दूसरा D है Destruction और तीसरा D है Devastation।

नशा अंधेरी गली में ले जाता है। विनाश के मोड़ पर आकर खड़ा कर देता है और बर्बादी का मंजर इसके सिवाय नशे में कुछ नहीं होता है। इसलिये इस बहुत ही चिंता के विषय पर मैंने चर्चा की है।

जब मैंने पिछले ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस बात का स्पर्श किया था, देश भर से करीब सात हजार से ज्यादा चिट्ठियां मुझे आकाशवाणी के पते पर आईं। सरकार में जो चिट्ठियां आईं वो अलग। ऑनलाइन, सरकारी पोर्टल पर, MyGov.in पोर्टल पर, हजारों ई-मेल आए। ट्विटर, फेसबुक पर शायद, लाखों कमेन्ट्स आये हैं। एक प्रकार से समाज के मन में पड़ी हुई बात, एक साथ बाहर आना शुरू हुआ है।

मैं विशेषकर, देश के मीडिया का भी आभारी हूँ कि इस बात को उन्होनें आगे बढ़ाया। कई टी. वी. ने विशेष एक-एक घंटे के कार्यक्रम किये हैं और मैंने देखा, उसमें सिर्फ सरकार की बुराइयों का ही कार्यक्रम नहीं था, एक चिन्ता थी और मैं मानता हूं, एक प्रकार से समस्या से बाहर निकलने की जद्दो-जहद थी और उसके कारण एक अच्छा विचार-विमर्श का तो माहौल शुरू हुआ है। सरकार के जिम्मे जो बाते हैं, वो भी Sensitised हुई हैं। उनको लगता है अब वे उदासीन नहीं रह सकते हैं।

मैं कभी-कभी, नशे में डूबे हुए उन नौजवानों से पूछना चाहता हूँ कि क्या कभी आपने सोचा है आपको दो घंटे, चार घंटे नशे की लत में शायद एक अलग जिन्दगी जीने का अहसास होता होगा। परेशानियों से मुक्ति का अहसास होता होगा, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जिन पैसों से आप ड्रग्स खरीदते हो वो पैसे कहां जाते हैं? आपने कभी सोचा है? कल्पना कीजिये! यही ड्रग्स के पैसे अगर आतंकवादियों के पास जाते होंगे! इन्हीं पैसों से आतंकवादी अगर शस्त्र खरीदते होंगे! और उन्हीं शस्त्रों से कोई आतंकवादी मेरे देश के जवान के सीने में गोलियां दाग देता होगा! मेरे देश का जवान शहीद हो जाता होगा! तो क्या कभी सोचा है आपने? किसी मां के लाल को मारने वाला, भारत मां के प्राण प्रिय, देश के लिए जीने-मरने वाले, सैनिक के सीने में गोली लगी है, कहीं ऐसा तो नहीं है न? उस गोली में कहीं न कहीं तुम्हारी नशे की आदत का पैसा भी है, एक बार सोचिये और जब आप इस बात को सोचेंगे, मैं विश्वास से कहता हूँ, आप भी तो भारत माता को प्रेम करते हैं, आप भी तो देश के सैनिकों को सम्मान करते हैं, तो फिर आप आतंकवादियों को मदद करने वाले, ड्रग-माफिया को मदद करने वाले, इस कारोबार को मदद कैसे कर सकते हैं।

कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि जब जीवन में निराशा आ जाती है, विफलता आ जाती है, जीवन में जब कोई रास्ता नहीं सूझता, तब आदमी नशे की लत में पड़ जाता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जिसके जीवन में कोई ध्येय नहीं है, लक्ष्य नहीं है, उंचे इरादे नहीं हैं, एक वैक्यूम है, वहां पर ड्रग का प्रवेश करना सरल हो जाता है। ड्रग से अगर बचना है, अपने बच्चे को बचाना है तो उनको ध्येयवादी बनाइये, कुछ करने के इरादे वाले बनाइये, सपने देखने वाले बनाइये। आप देखिये, फिर उनका बाकी चीजों की तरफ मन नही लगेगा। उसको लगेगा नहीं, मुझे करना है।

आपने देखा होगा, जो खिलाड़ी होता है...ठण्ड में रजाई लेकर सोने का मन सबका करता है, लेकिन वो नहीं सोता है। वो चला जाता है खुले मैदान में, सुबह चार बजे, पांच बजे चला जाता है। क्यों ? ध्येय तय हो चुका है। ऐसे ही आपके किसी बच्चे में, ध्येयवादिता नहीं होगी तो फिर ऐसी बुराइयों के प्रवेश का रास्ता बन जाता है।

मुझे आज स्वामी विवेकानन्द के वो शब्द याद आते हैं। हर युवा के लिये वो बहुत सटीक वाक्य हैं उनके और मुझे विश्वास है कि वाक्य, बार-बार गुनगुनायें स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है - ‘एक विचार को ले लो, उस विचार को अपना जीवन बना लो। उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो। उस विचार को जीवन में उतार लो। अपने दिमाग, मांसपेशियां, नसों, शरीर के प्रत्येक हिस्से को उस विचार से भर दो और अन्य सभी विचार छोड़ दो’।

विवेकानन्द जी का यह वाक्य, हर युवा मन के लिये है, बहुत काम आ सकता है और इसलिये, मैं युवकों से कहूँगा ध्येयवादी बनने से ही बहुत सी चीजों से बचा जा सकता।

कभी-कभी यार दोस्तों के बीच रहते हैं तो लगता है ये बड़ा Cool है। कुछ लोगों को लगता है कि ये Style statement है और इसी मन की स्थिति में कभी- कभी पता न रहते हुए ही, ऐसी गम्भीर बीमारी में ही फंस जाते हैं। न ये Style statement है और न ये Cool है। हकीकत में तो ये बरबादी का मंजर है और इसलिए हम सब के हृदय से अपने साथियों को जब नशे के गौरव गान होते हो, अब अपने अपने मजे की बाते बताते हो, तालियां बजाते हो, तब ‘No’ कहने की हिम्मत कीजिए, reject करने की हिम्मत कीजिए, इतना ही नही, उनको भी ये गलत कर रहे हो, अनुचित कर रहे हो ये कहने की आप हिम्मत जताइए।

मैं माता- पिता से भी कहना चाहता हूँ। हमारे पास आज कल समय नही हैं दौ़ड़ रहे हैं। जिंदगी का गुजारा करने के लिए दौड़ना पड़ रहा है। अपने जीवन को और अच्छा बनाने के लिये दौड़ना पड़ रहा है। लेकिन इस दौड़ के बीच में भी, अपने बच्चों के लिये हमारे पास समय है क्या ? क्या कभी हमने देखा है कि हम ज्यादातर अपने बच्चों के साथ उनकी लौकिक प्रगति की ही चर्चा करते हैं? कितने marks लाया, exam कैसे गई, ज्यादातर क्या खाना है ? क्या नहीं खाना है ? या कभी कहाँ जाना है? कहां नहीं जाना है , हमारी बातों का दायरा इतना सीमित है। या कभी उसके हृदय के भीतर जाकर के अपने बच्चों को अपने पास खोलने के लिये हमने अवसर दिया है? आप ये जरूर कीजिये। अगर बच्चे आपके साथ खुलेंगे तो वहां क्या चल रहा है पता चलेगा। बच्चे में बुरी आदत अचानक नहीं आती है, धीरे धीरे शुरू होती है और जैसे-जैसे बुराई शुरू होती है तो घर में उसका बदलाव भी शुरू होता है। उस बदलाव को बारीकी से देखना चाहिये। उस बदलाव को अगर बारीकी से देखेंगे तो मुझे विश्वास है कि आप बिल्कुल beginning में ही अपने बालक को बचा लेंगे। उसके यार दोस्तों की भी जानकारी रखिये और सिर्फ प्रगति के आसपास बातों को सीमित न रखें। उसके जीवन की गहराई, उसकी सोच, उसके तर्क, उसके विचार उसकी किताब, उसके दोस्त, उसके मोबाइल फोन्स....क्या हो रहा है? कहां उसका समय बीत रहा है, अपने बच्चों को बचाना होगा। मैं समझता हूं जो काम मां-बाप कर सकते हैं वो कोई नहीं कर सकता। हमारे यहां सदियों से अपने पूर्वजों ने कुछ बातें बड़ी विद्वत्तापूर्ण कही हैं। और तभी तो उनको स्टेट्समैन कहा जाता है। हमारे यहां कहा जाता है -

5 वर्ष लौ लीजिये

दस लौं ताड़न देई

5 वर्ष लौ लीजिये

दस लौं ताड़न देई

सुत ही सोलह वर्ष में

मित्र सरिज गनि देई

सुत ही सोलह वर्ष में

मित्र सरिज गनि देई

कहने का तात्पर्य है कि बच्चे की 5 वर्ष की आयु तक माता-पिता प्रेम और दुलार का व्यवहार रखें, इसके बाद जब पुत्र 10 वर्ष का होने को हो तो उसके लिये डिसिप्लिन होना चाहिये, डिसिप्लिन का आग्रह होना चाहिये और कभी-कभी हमने देखा है समझदार मां रूठ जाती है, एक दिन बच्चे से बात नहीं करती है। बच्चे के लिये बहुत बड़ा दण्ड होता है। दण्ड मां तो अपने को देती है लेकिन बच्चे को भी सजा हो जाती है। मां कह दे कि मैं बस आज बोलूंगी नहीं। आप देखिये 10 साल का बच्चा पूरे दिन परेशान हो जाता है। वो अपनी आदत बदल देता है और 16 साल का जब हो जाये तो उसके साथ मित्र जैसा व्यवहार होना चाहिये। खुलकर के बात होनी चाहिये। ये हमारे पूर्वजों ने बहुत अच्छी बात बताई है। मैं चाहता हूं कि ये हमारे पारिवारिक जीवन में इसका कैसे हो उपयोग।

एक बात मैं देख रहा हूं दवाई बेचने वालों की। कभी कभी तो दवाईयों के साथ ही इस प्रकार की चीज आ जाती हैं जब तक डॉक्टर के Prescription के बिना ऐसी दवाईयां न दी जायें। कभी कभी तो कफ़ सिरप भी ड्रग्स की आदत लेने की शुरूआत बन जाता है। नशे की आदत की शुरूआत बन जाता है। बहुत सी चीजे हैं मैं इसकी चर्चा नहीं करना चाहता हूं। लेकिन इस डिसिप्लिन को भी हमको स्वीकार करना होगा।

इन दिनों अच्छी पढ़ाई के लिये गांव के बच्चे भी अपना राज्य छोड़कर अच्छी जगह पर एडमिशन के लिये बोर्डिंग लाइफ जीते हैं, Hostel में जीते हैं। मैंने ऐसा सुना है कि वो कभी-कभी इस बुराइयों का प्रवेश द्वार बन जाता है। इसके विषय में शैक्षिक संस्थाओं ने, समाज ने, सुरक्षा बलों ने सभी ने बड़ी जागरूकता रखनी पड़ेगी। जिसकी जिम्मेवारी है उसकी जिम्मेवारी पूरा करने का प्रयास होगा। सरकार के जिम्मे जो होगा वो सरकार को भी करना ही होगा। और इसके लिये हमारा प्रयास रहना चाहिये।

मैं यह भी चाहता हूं ये जो चिट्ठियां आई हैं बड़ी रोचक, बड़ी दर्दनाक चिट्ठियां भी हैं और बड़ी प्रेरक चिट्ठियां भी हैं। मैं आज सबका उल्लेख तो नहीं करता हूं, लेकिन एक मिस्टर दत्त करके थे, जो नशे में डूब गये थे। जेल गये, जेल में भी उन पर बहुत बंधन थे। फिर बाद में जीवन में बदलाव आया। जेल में भी पढ़ाई की और धीरे धीरे उनका जीवन बदल गया। उनकी ये कथा बड़ी प्रचलित है। येरवड़ा जेल में थे, ऐसे तो कईयों की कथाएं होंगी। कई लोग हैं जो इसमें से बाहर आये हैं। हम बाहर आ सकते हैं और आना भी चाहिये। उसके लिये हमारा प्रयास भी होना चाहिये, उसी प्रकार से। आने वाले दिनों में मैं Celebrities को भी आग्रह करूंगा। चाहे सिने कलाकार हों, खेल जगत से जुड़े हुए लोग हों, सार्वजनिक जीवन से जुड़े हुए लोग हों। सांस्कृतिक सन्त जगत हो, हर जगह से इस विषय पर बार-बार लोगों को जहां भी अवसर मिले, हमें जागरूक रखना चाहिये। हमें संदेश देते रहना चाहिये। उससे जरूर लाभ होगा। जो सोशल मीडिया में एक्टिव हैं उनसे मैं आग्रह करता हूं कि हम सब मिलकर के Drugs Free India hash-tag के साथ एक लगातार Movement चला सकते हैं। क्योंकि इस दुनिया से जुड़े हुए ज्यादातर बच्चे सोशल मीडिया से भी जुड़े हुए हैं। अगर हम Drugs Free India hash-tag, इसको आगे बढायेंगे तो एक लोकशिक्षा का एक अच्छा माहौल हम खड़ा कर सकते हैं।

मैं चाहता हूं कि इस बात को और आगे बढायें। हम सब कुछ न कुछ प्रयास करें, जिन्होंने सफलता पाई है वो उसको Share करते रहें। लेकिन मैंने इस विषय को इसलिये स्पर्श किया है मैंने कहा कि दुख बांटने से दुख कम होता है। देश की पीड़ा है, ये मैं कोई उपदेश नहीं दे रहा हूं और न ही मुझे उपदेश देने का हक है। सिर्फ अपना दुख बांट रहा हूं, या तो जिन परिवारों में ये दुख है उस दुख में मैं शरीक होना चाहता हूं। और मैं एक जिम्मेवारी का माहौल Create करना चाहता हूं। हो सकता है इस विषय में मत-मतान्तर हो सकते हैं। लेकिन कहीं से तो शुरू करना पड़ेगा।

मैंने कहा था कि मैं खुशियां भी बांटना चाहता हूं। मुझे गत सप्ताह ब्लाइंड क्रिकेट टीम से मिलने का मौका मिला। World Cup जीत कर आये थे। लेकिन जो मैंने उनका उत्साह देखा, उनका उमंग देखा, आत्मविश्वास देखा, परमात्मा ने जिसे आंखें दिये है, हाथ-पांव दिये हैं सब कुछ दिया है लेकिन शायद ऐसा जज्बा हमारे पास नहीं है, जो मैंने उन ब्लांइड क्रिकेटरों में देखा था। क्या उमंग था, क्या उत्साह था। यानि मुझे भी उनसे मिलकर उर्जा मिली। सचमुच में ऐसी बातें जीवन को बड़ा ही आनंद देता है।

पिछले दिनों एक खबर चर्चा में रही। जम्मू कश्मीर की क्रिकेट टीम ने मुम्बई जाकर के मुम्बई की टीम को हराया। मैं इसे हार-जीत के रूप में नहीं देख रहा हूं। मैं इस घटना को दूसरे रूप में देख रहा हूँ। पिछले लम्बे समय से कश्मीर में बाढ़ के कारण सारे मैदान पानी से भरे थे। कश्मीर संकटों से गुजर रहा है हम जानते हैं कठिनाइयों के बीच भी इस टीम ने जो Team- Spirit के साथ, बुलन्दी के के हौसले के साथ, जो विजय प्राप्त किया है वो अभूतपूर्व है और इसलिये कठिनाइंयां हैं, विपरीत परिस्थितियां हो, संकट हो उसके बाद भी लक्ष्य को कैसे प्राप्त किया जा सकता है, ये जम्मू कश्मीर के युवकों ने दिखाया है और इसलिये और इसलिये मुझे इस बात को सुन करके विशेष आनन्द हुआ, गौरव हुआ और मैं इन सभी खिलाडि़यों को बधाई देता हूं।

दो दिन पहले यूनाइटेड नेशन ने, योग को, पूरा विश्व 21 जून को योग दिवस के रूप में माने इसके लिये स्वीकृति दी है। भारत के लिये बहुत ही गौरव का, आनन्द का अवसर है। सदियों से हमारे पूर्वजों ने इस महान परम्परा को विकसित किया था, उससे आज विश्व जुड़ गया। योग व्यक्तिगत जीवन में तो लाभ करता था, लेकिन योग ने ये भी दिखा दिया वो दुनिया को जोड़ने का कारण बन सकता है। सारी दुनिया योग के मुद्दे पर यू.एन. में जुड़ गई। और मैं देख रहा हूं कि सर्वसम्मति से प्रस्ताव दो दिन पहले पारित हुआ। और 177 देश, Hundred and Seventy Seven Countries Co-Sponsor बनी। भूतकाल में नेल्सन मंडेला जी के जन्म दिन को मनाने का निर्णय हुआ था। तब Hundred and Sixty Five Countries Co- Sponsor बनी थी। उसके पूर्व International Toilet Day के लिये प्रयास हुआ था तो Hundred and Twenty Two Countries Co- Sponsor हुई थी। उससे पहले 2 अक्तूबर को Non-Violence Day के लिये Hundred and Forty Countries Co- Sponsor बनी थी। इस प्रकार के प्रस्ताव से Hundred and Seventy Seven Countries ने Co-Sponsor बनना यानि एक World Record हो गया है। दुनिया के सभी देशों का मैं आभारी हूं जिन्होंने भारत की इस भावना का आदर किया। और विश्व योग दिवस मनाने का निर्णय किया। हम सबका दायित्व बनता है कि योग की सही भावना लोगों तक पहुंचे।

पिछले सप्ताह मुझे मुख्यमंत्रियों की मीटिंग करने का अवसर मिला था। मुख्यमंत्रियों की मीटिंग तो 50 साल से हो ही रही है, 60 साल से हो रही है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री के निवास स्थान पर मिलना हुआ और उससे भी अधिक हमने एक Retreat का कार्यक्रम प्रारंभ किया, जिसमें हाथ में कोई कागज नहीं, कोई कलम नहीं, साथ में कोई अफसर नहीं, कोई फाइल नहीं। सभी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बराबर के मित्र के रूप में बैठे। दो ढाई घण्टे तक समाज के, देश के भिन्न भिन्न विषयों पर बहुत गम्भीरतापूर्वक बातें की, हल्के फुल्के वातावरण में बातें कीं। मन खोलकर के बातें कीं। कहीं उसको राजनीति की छाया नहीं दी। मेरे लिये ये बहुत ही आनन्ददायक अनुभूति थी। उसको भी मैं आपके बीच Share करना चाहता हूं।

पिछले सप्ताह मुझे Northeast जाने का अवसर मिला। मैं तीन दिन वहां रहा। मैं देश के युवकों को विशेष आग्रह करता हूं कि आपको अगर ताज महल देखने का मन करता है, आपको अगर सिंगापुर देखने का मन करता है, आपको कभी दुबई देखने का मन करता है। मैं कहता हूं दोस्तो, प्रकृति देखनी है, ईश्वर का प्राकृतिक रूप देखना है तो आप Northeast जरूर जाइये। मैं पहले भी जाता था। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में जब गया, तो वहां की शक्ति को पहचानने का प्रयास किया। अपार शक्तियों की संभावनाओं से भरा हुआ हमारा Northeast है। इतने प्यारे लोग हैं, इतना उत्तम वातावरण है। मैं सचमुच में बहुत आनन्द लेकर आया हूं। कभी कभी लोग पूछते हैं न? मोदी जी आप थकते नहीं हैं क्या? मैं कहता हूं Northeast जाकर के तो लगता है कि कहीं कोने भी थकान हुई होगी, वो भी चली गई। इतना मुझे आनन्द आया। और जो प्यार दिया वहां के लोगों ने जो मेरा स्वागत सम्मान वो तो एक बात है। लेकिन जो अपनापन था वो सचमुच में, मन को छूने वाला था, दिल को छूने वाला था। मैं आपको भी कहूंगा, ये सिर्फ मोदी को ही ये मजा लेने का अधिकार नहीं है भारत के हर देश वासी को है। आप जरूर इसकी मजा लीजिये।

अगली ‘मन की बात’ होगी तब तो 2015 आ जायेगी। 2014 का ये मेरा शायद ये आखिरी कार्यक्रम है। मेरी आप सबको क्रिसमस की बहुत बहुत शुभकामनायें हैं। 2015 के नववर्ष की मैं Advance में आप सबको बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूं। मेरे लिये ये भी खुशी की बात है कि मेरे मन की बात को Regional Channels की जो Radio Channels हैं आपके जो प्रादेशिक चैनल हैं उसमें जिस दिन सुबह मेरे ‘मन की बात’ होती है उस दिन रात को 8 बजे प्रादेशिक भाषा में होती है। और मैंने देखा है कुछ प्रादेशिक भाषा में तो आवाज भी मेरे जैसे कुछ लोग निकालते हैं। मैं भी हैरान हूं कि इतना बढि़या काम हमारे आकाशवाणी के साथ जो कलाकार जुड़े हुए हैं वो कर रहे हैं मैं उनको भी बधाई देता हूं। और ये लोगों तक पहुंचने के लिये मुझे बहुत ही अच्छा मार्ग दिखता है। इतनी बड़ी मात्रा में चिट्ठियां आई हैं। इन चिट्ठियों को देखकर के हमारे आकाशवाणी ने इसका जरा एक तरीका ढूंढा है। लोगों को सहूलियत हो इसलिये उन्होंने पोस्ट-बॉक्स नम्बर ले लिया है। तो ‘मन की बात’ पर अगर आप कुछ बात कहना चाहते हैं तो आप पोस्ट-बॉक्स पर लिख सकते है अब।

मन की बात

पोस्ट बॉक्स 111, आकाशवाणी

नई दिल्ली

मुझे इंतजार रहेगा आपके पत्रों का। आपको पता नहीं है, आपके पत्र मेरे लिये प्रेरणा बन जाते हैं। आपके कलम से निकली एक-आध बात देश के काम आ सकती है। मैं आपका आभारी हूं। फिर हम 2015 में जनवरी में किसी न किसी रविवार को जरूर 11 बजे मिलेंगे बाते करेंगे।

बहुत बहुत धन्यवाद।

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हरिवंश जी देश को प्रगति की राह पर बड़ी छलांग लगाने का भरोसा दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं: राज्यसभा में पीएम मोदी
April 17, 2026
प्रधानमंत्री ने राज्यसभा के उपसभापति के रूप में ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल के लिए श्री हरिवंश को बधाई दी

आदरणीय सभापति जी,

सदन की ओर से, मेरी तरफ से, मैं श्रीमान हरिवंश जी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं और शुभकामनाएं भी देता हूं। राज्यसभा उपसभापति के रूप में लगातार तीसरी बार निर्वाचित होना, यह अपने आप में इस सदन का आपके प्रति जो गहरा विश्वास है और बीते हुए कालखंड में आपके अनुभव का जो सदन को लाभ मिला है, सबको साथ लेकर चलने का आपका जो प्रयास रहा है, उसको एक प्रकार से सदन ने आज एक मोहर लगा दी है और यह अपने आप में यह एक अनुभव का सम्मान है, एक सहज कार्य शैली का सम्मान है और एक सहज कार्य शैली की स्वीकृति भी है। हमने सबने हरिवंश जी के नेतृत्व में सदन की शक्ति को और अधिक प्रभावी होते हुए भी देखा है और मैं कह सकता हूं कि केवल सदन की कार्यवाही का संचालन ही नहीं, वह अपने जीवन के जो भूतकाल के अनुभव हैं, उसको भी बहुत ही सटीक तरीके से सदन को समृद्ध करने में उपयोग लाते हैं। उनका यह अनुभव पूरी कार्यवाही को, संचालन को और सदन के माहौल को और अधिक परिपक्व को बनाता है। मुझे विश्वास है, उपसभापति जी का नया कार्यकाल उसी भावना, संतुलन और समर्पण के साथ आगे बढ़ेगा और हम सबके प्रयासों से सदन की गरिमा को नई ऊंचाई प्राप्त होगी।

आदरणीय सभापति जी,

हरिवंश जी का जन्म यूपी के गांव में हुआ और सहज रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण उन्हें अपने गांव के विकास में विद्यार्थी काल से भी कुछ ना कुछ करते रहे। उनकी शिक्षा-दीक्षा काशी में हुई और इन सारे विषयों पर मुझे भूतकाल में बोलने का अवसर मिला, तो मैं काफी कुछ कह चुका हूं। इसलिए मैं आज इसको दोहराता नहीं हूं। एक बात का उल्लेख आज जरूर मैं करूंगा, आज 17 अप्रैल है और 17 अप्रैल 1927, हमारे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती भी है और विशेषता यह है कि आज 17 अप्रैल को आप जब तीसरी बार इस दायित्व को संभालने जा रहे हैं और वह भी चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर और चंद्रशेखर जी के साथ आपका जुड़ाव, उनके प्रति आपका लगाव और एक प्रकार से आप उनके सहयात्री रहे, उनके पूरे कार्यकाल में, तो यह एक अपने आप में एक बहुत ही बड़ा सुयोग है। अपने चंद्रशेखर जी के जीवन पर किताबें भी लिखी हैं और चंद्रशेखर जी के एक वृहद जीवन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक बहुत बड़ा काम भी आपने किया है और इसलिए आपके लिए एक बहुत बड़ा विशेष अवसर बन जाता है कि चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर आपके तीसरा कार्यकाल का प्रारंभ हो रहा है। हरिवंश जी का सार्वजनिक जीवन केवल संसदीय कामों तक सीमित नहीं रहा है। पत्रकारिता के उच्च मानदंड, यह आज भी आदर्श के रूप में रेखांकित किए जाते हैं। लंबा जीवन पत्रकारिता का रहा है, लेकिन पत्रकारिता में भी उन्होंने उच्च मानदंड को हमेशा आधार माना। हम सब जानते हैं, उनके लेखनी में धार है, लेकिन उनकी वाणी में और व्यवहार में सौम्‍यता और शिष्‍टता भरी-भरी रहती है, यह अपने आप में और मैं जब गुजरात में था, तब भी मैं उनकी लेखों को पढ़ने की मेरी आदत रही थी और मैं देखता था कि वह अपना पक्ष बड़ी दृढ़ता के साथ रखते थे और मैं अनुभव करता था कि उसमें काफी अध्ययन के बाद उसका निचोड़ उसमें प्रकट होता था। पत्रकारिता में भी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का उनका निरंतर प्रयास रहा और एक सफल प्रयास भी रहा और हम देखते हैं, सदन में भी चाहे पॉलिसी हो या प्रोसेस हो, उन बातों का कहीं ना कहीं छाया हमें हमेशा नजर आती है और यह हम सबके लिए सुखद अनुभव है। वह समाज की वास्तविकताओं के साथ गहरे जुड़ाव के साथ काम करने वाले व्यक्ति रहे हैं। मैं तो कहूंगा, जो चाहे लोकसभा हो या राज्यसभा हो, जो नए सांसद आते हैं, जो हरिवंश जी से बहुत कुछ सीख सकते हैं, बहुत कुछ बातें करके उनसे जान सकते हैं, क्योंकि जब वह पत्रकारिता में थे, तो उनकी कॉलम चलती थी, हमारा सांसद कैसा हो, हमारा पार्लियामेंट मेंबर कैसा हो, तब उनको शायद पता नहीं होगा, कभी उनको ही बैठना पड़ेगा। लेकिन वह लिखते थे और वह बातों में बहुत व्यापकता रहती थी। सदन की गरिमा और बैठने वाले सदस्य का दायित्व, अब उसके आचार विचार को लेकर भी बहुत गहरा उनका अध्ययन रहता था और उन बातों का उपयोग आज हमारे सदन के साथी, उनके साथ बैठकर के बहुत कुछ जान सकते हैं, सीख सकते हैं। समय की पाबंदी एक डिसिप्लिन लाइफ में और अपने कर्तव्‍यों के प्रति गंभीरता, यह आपकी विशेषता रही है और शायद इसी के कारण आप सर्व स्वीकृत व्‍यक्‍तित्‍व आपका विकसित हुआ है। हमने देखा होगा जब से वह राज्यसभा के सदस्य बने हैं, मैं कह सकता हूं कि पूर्ण समय वह सदन में होते हैं। सभापति जी की अनुपस्थिति में सदन को संभालने का काम तो करते ही हैं, लेकिन बाकी समय भी यहां कमेटी का कोई भी व्यक्ति बैठा हो, तो भी वह सदन में हमेशा अपनी मौजूदगी रहती है। हर बात को सुनते हैं, उस समय सदन का जो संचालन करते हैं, उनके कार्य को भी देखते हैं और यह इसके पीछे उनको अपना जो दायित्व है, उसके प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता है, उसके कारण यह संभव होता है और यह हम सबके लिए सीखने जैसा है और मैंने देखा है कि वह पूरा समय इन चीजों के लिए वह खपा देते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

उपसभापति के तौर पर सदन को कैसे चलाया, सदन में सदस्य के तौर पर क्या योगदान दिया, इस बारे में हम स्वाभाविक रूप से एक सकारात्मक चर्चा करते रहते हैं। लेकिन सदन के बाहर, जनता के बीच वह कैसे अपने लोकतांत्रिक और सामाजिक दायित्‍वों को निभाते हैं, यह भी हम सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनके लिए सचमुच में ध्यान आकर्षित करने वाले विषय हैं और हमें उसको देखना चाहिए। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि काम सराहनीय तो है ही हैं, अनुकरणीय भी हैं। हमारा देश युवा देश है और मैंने देखा है कि हरिवंश जी ने अपने समय का उपयोग सबसे ज्यादा युवाओं के बीच में बिताना पसंद किया है। युवाओं में लगातार गंभीर विषयों पर जागरूकता बने, एक प्रकार से लोक शिक्षा का काम निरंतर चलता रहे, यह अपने आप में वह लगातार करते रहते हैं, तो देश भर में उनका भ्रमण रहता है। वह मीडिया की नजरों में बहुत ज्यादा रहने का उनका शौक नहीं है, लेकिन भ्रमण और कार्यक्रमों की संख्या उनकी लगातार चलती रहती है। 2018 में, जब उन्होंने राज्यसभा के उपसभापति की भूमिका निभानी शुरू की, उसके बाद जो मेरी जानकारी है, कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीज में 350 कार्यक्रम किए हैं। यह एक बहुत बड़ा काम है। देश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजेस में 350 से अधिक कार्यक्रम, जाना-आना, उनके साथ बैठना, बातें करना, उसके लिए विषयों की तैयारी करना, यह अपने आप में बहुत बड़ा, एक प्रकार से आपने बृहतस्य के रूप में इस काम को किया है और युवाओं से ही जुड़ने के लक्ष्य को आपने जरा भी ओझल नहीं होने दिया है। और विकसित भारत का सपना युवाओं के लिए भी क्यों होना चाहिए, इस मूल विषय को अलग-अलग तरीके से जिस प्रकार से विद्यार्थियों का मूड हों, वह बताते रहते हैं। विद्यार्थियों में, युवा पीढ़ी में एक आत्मविश्वास कैसे पैदा हो, निराशा से वह हमेशा-हमेशा बाहर रहें, इन सारे विषयों की चर्चा वह करते हैं। उनके कुछ ऐतिहासिक रेफरेंस के साथ बात करते हैं कि हम ऐसे क्या कारण हैं कि हम जितनी तेजी से जाना चाहिए था, आगे नहीं जा पाए, अब अवसर क्या आया है, सारी बातें हो और देश इतनी बड़ी छलांग लगा सकता है, उसका आत्मविश्वास भरने का काम उनके द्वारा होता है। आजकल देश में लिटरेचर फेस्टिवल, एक बड़ा सिलसिला चला है और अब तो वह टीयर-2, टीयर-3 सिटीज़ तक भी वह सिलसिला चला है। लिटरेचर फेस्टिवल्स में भी हरिवंश जी का अक्सर जाना होता है और उस समाज का, उस तबके को भी वह अपने विचारों से प्रभावित करते रहते हैं, प्रेरित करते रहते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

मैंने उनके जीवन का एक प्रसंग जो सुना है, शायद हो सकता है, सार्वजनिक तौर में मेरी जानकारी सटीक ना भी हो। मैंने सुना है कि 1994 में हरिवंश जी पहली बार विदेश यात्रा की और वह अमेरिका गए। जब अमेरिका गए, तो अपने सारे कार्यक्रमों के अलावा उनसे पूछा गया कि आप कहीं और जाना चाहते हैं, कुछ करना चाहते हैं। तो उन्होंने आग्रह से कहा कि मैं जरूर यह विकसित देश है, तो मैं उसकी यूनिवर्सिटी को देखना-समझना चाहता हूं और वहाँ की ऐसी कौन सी शिक्षा और कल्चर है, जिसके कारण यह देश इतना आगे बढ़ रहा है और उन्होंने काफी समय अपने निर्धारित कार्यक्रमों के सिवाय वह पहली अमेरिका की यात्रा में सिर्फ और सिर्फ यूनिवर्सिटीज में बिताया, उसका अध्ययन करने का काम किया। यानी यह जो ललक थी उनके मन में, यह अगर यह विकसित देश की यूनिवर्सिटी से जो निकलता है, तो हिंदुस्तान की यूनिवर्सिटीज़ भी ऐसी हों, ताकि विकसित भारत का सपना वहीं से रेखांकित किया जा सके।

आदरणीय सभापति जी,

MPs को MPLAD फंड के संबंध में तो काफी चर्चा रहती है और एक बड़ा प्रसंगी का विषय भी रहता है MPs में और कभी-कभी तो यह भी संघर्ष रहता है कि MPLAD फंड इतना है और वहां उधर एमएलए फंड ज्यादा है, उसकी चर्चा रहती है। लेकिन एमपी फंड का उपयोग कैसे हो, MPLAD जो फंड की बातें हैं, उसमें हरिवंश जी के विचारों को तो मैंने स्वयं भी सुना है, मैं प्रभावित हूं इससे, लेकिन हमारी भी कुछ मजबूरी रही है। शायद हम उनकी अपेक्षा के अनुसार उसको कर नहीं पाए हैं, क्योंकि सबको ऐसे विषय में साथ लेना जरा कठिन होता है। लेकिन उन्होंने खुद की उस जिम्मेदारी को कैसे निभाया है, मैं समझता हूं वह भी हम लोगों ने, उन्होंने यह MPLAD फंड था, जो अपने जो विचार हैं, उसके विचार को भी नीचे धरातल पर उतारने के लिए उपयोग किया, शिक्षा क्षेत्र और युवा पीढ़ी, यह उसके सारे केंद्र में रहा, MPLAD फंड उन्होंने इस्तेमाल करने के लिए एक मिसाल पेश की है। उन्होंने विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थानों में ऐसे अध्ययन केंद्र स्थापित किया और उसका प्रभाव लंबे अरसे तक रहने वाला है और उसमें भी उन्होंने प्रोजेक्ट ओरिएंटेड, समस्या के समाधान को केंद्र में रखा। जैसे लुप्त होती जा रही भारतीय भाषाओं, उनके संरक्षण के लिए उन्होंने आईआईटी पटना में एक अध्ययन केंद्र के लिए MPLAD फंड का उपयोग किया, तो उस काम को वह लगातार वहां हो रहा है। एक और उन्होंने काम किया, जो बिहार में कुछ क्षेत्र हैं, जहां भयावह भूकंप की घटनाएं रोज घटती रहती हैं, नेपाल में भी एक छोटा सा भूकंप आ जाए, तो भी उस क्षेत्र का प्रभावित करता है। इस काम को ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से सेंटर फॉर अर्थक्वेक इंजीनियरिंग के रूप में एक स्टडी सेंटर रिसर्च के लिए खुलवाया है। यानी वह स्टडी का काम करना, रिसर्च करना, उस पर लगातार काम कर रहा है। हम जानते हैं कि जैसा मैंने कहा है, जय प्रकाश जी का गांव सिताब दियारा हरिवंश जी वहीं हैं और वहां गंगा और घाघरा दो नदी के बीच में एक गांव है, तो हमेशा ही जल के कारण जो कटाव की समस्या रहती है, वो गांव परेशान रहता है और नदी धारा भी बदलती रहती है, तो विनाश भी बहुत होता रहता है। उसको भी ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से इसके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उन्होंने पटना की आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी में एक नदी अध्ययन केंद्र खुलवाया है। पटना के ही चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्था में वो बिजनेस इनक्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर बनवा रहे हैं। एआई के इस दौर में मगध विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर बनाया है। यानी MPLAD फंड का एक निर्धारित दिशा में काम कैसे किया जा सकता है, इसका एक उदाहरण आपने प्रस्तुत किया है।

आदरणीय सभापति जी,

हम सभी ने अनुभव किया है कि लोग जब अपने गांव से स्थानांतरण करते हैं, एक दूसरे शहर में जाते हैं, तो जीवन में एक प्रकार से गांव से कट जाते हैं। हरिवंश जी का जीवन आज भी गांव से जुड़ा रहता है, अपने गांव से जुड़ा रहता है। वह लगातार वहां के सुख दुख के साथी बन करके वह अपना जो भी कंट्रीब्यूशन कर सकते हैं, वह करते रहते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

जिस संसद की नई इमारत में बैठे हैं, उसका जब निर्माण कार्य चल रहा था, तब मुझे उनके साथ निकट से काम करने का अवसर आया। और मैं अनुभव कर रहा था कि जो विचार मेरे मन में आते थे, मैं हरिवंश जी से कहता था, हम ऐसा करें तो कैसा होगा, दो दिन में वो बराबर परफेक्ट उसको लेकर आते थे, कहीं नामकरण करना है, उसके पहचान इस सदन की कैसे बने, तो काफी कुछ कंट्रीब्यूशन सदन के निर्माण में, उसकी आर्ट गैलरी में, विभिन्न द्वार के नाम रखने हों, यानी हर प्रकार से मेरे एक साथी के रूप में हम दोनों को और मुझे बड़ा आनंददायक रहा वो अनुभव काम का।

आदरणीय सभापति जी,

हरिवंश जी के सदन को चलाने की कुशलता को तो हम भली भांति देखे हैं, लेकिन साथ-साथ उन्होंने राज्यों की विधानसभाएं, विधान परिषदें और वहां जो प्रीसाइडिंग ऑफिसर्स हैं, उनको भी कैसे मदद रूप होना, उनके लिए किस प्रकार से आवश्यक उनके ट्रेनिंग के लिए काम किया जाना, उसके लिए भी काफी समय दिया और उन्होंने लगातार उनके लिए समय दिखाया। कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन में भी उन्होंने भारत की डेमोक्रेटिक व्यवस्था की छाप छोड़ने में बहुत बड़ी सक्रिय भूमिका निभाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि 21वीं सदी का यह दूसरा क्वार्टर यह सदन को बहुत कुछ कंट्रीब्यूट करना है। देश को प्रगति के पथ पर ले जाने में, विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में, मुझे विश्वास है कि सदन के द्वारा बहुत कुछ होगा और उसके कारण पीठाधीश सबका दायित्व बहुत बड़ा होता है। हम सबका बड़े विश्वास से मैं कह सकता हूं कि सभी साथी आप जो चाहते होंगे, उसको पूरा करने के लिए सहयोग करते रहेंगे और आपके काम को कठिनाइयों में ना परिवर्तित करें इसके लिए ताकि आप ज्यादा आउटकम दे सकते हैं और मुझे विश्वास है सब लोग इसको करेंगे और मैंने पहले भी कहा था कि हरि कृपा पर है सब कुछ और हरि तो यहां के भी है, हरि वहां के भी है और हरि यही बैठेंगे। तो हरि कृपा बनी रहे। इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं।

बहुत-बहुत धन्यवाद!