हमारी भाषा हमारी संस्कृति की संवाहक होती है: प्रधानमंत्री
मराठी एक संपूर्ण भाषा है: प्रधानमंत्री
महाराष्ट्र के अनेक संतों ने भक्ति आंदोलन के जरिए मराठी भाषा में समाज को नई दिशा दिखाई: प्रधानमंत्री
भारतीय भाषाओं में कभी कोई आपसी वैर नहीं रहा, बल्कि उन्होंने सदैव एक-दूसरे को अपनाया और समृद्ध किया है: प्रधानमंत्री

कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ नेता श्रीमान शरद पवार जी, महाराष्ट्र के लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस जी, अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ तारा भवालकर जी, पूर्व अध्यक्ष डॉ रविंद्र शोभने जी, सभी सदस्यगण, मराठी भाषा के सभी विद्वतगण और उपस्थित भाइयों और बहनों।

अभी डॉक्टर तारा जी का भाषण पूरा हुआ तो मैंने ऐसे ही कहा थारछाण, तो उन्होंने मुझे गुजराती में जवाब दिया, मुझे भी गुजराती आती है। देशाच्या आर्थिक राजधानीच्या, राज्यातून देशाच्या, राजधानीत आलेल्या सर्व मराठी, सारस्वतांन्ना माझा नमस्कार।

आज दिल्ली की धरती पर मराठी भाषा के इस गौरवशाली कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन एक भाषा या राज्य तक सीमित आयोजन नहीं है, मराठी साहित्य के इस सम्मेलन में आजादी की लड़ाई की महक है, इसमें महाराष्ट्र और राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत है। ज्ञानबा-तुकारामांच्या मराठीला आज राजधानी दिल्ली अतिशय मनापासून अभिवादन करते।

भाइयों-बहनों,

1878 में पहले आयोजन से लेकर अब तक अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन देश की 147 वर्षों की यात्रा का साक्षी रहा है। महादेव गोविंद रानाडे जी, हरि नारायण आप्टे जी, माधव श्रीहरि अणे जी, शिवराम परांजपे जी, वीर सावरकर जी, देश की कितनी ही महान विभूतियों ने इसकी अध्यक्षता की है। शरद जी के आमंत्रण पर आज मुझे इस गौरवपूर्ण परंपरा से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। मैं आप सभी को, देश दुनिया के सभी मराठी प्रेमियों को इस आयोजन की बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आणि आज तर जागतिक मातृभाषा दिवस आहे. तुम्ही दिल्लीतील साहित्य सम्मेलनासाठी दिवस सुद्धा अतिशय चांगला निवडला।

साथियों,

मैं जब मराठी के बारे में सोचता हूं, तो मुझे संत ज्ञानेश्वर का वचन याद आना बहुत स्वाभाविक है। 'माझा मराठीची बोलू कौतुके। परि अमृतातेहि पैजासी जिंके। यानी मराठी भाषा अमृत से भी बढ़कर मीठी है। इसलिए मराठी भाषा और मराठी सांस्कृति के प्रति मेरा जो प्रेम है, आप सब उससे भलीभांति परिचित हैं। मैं आप विद्वानों की तरह मराठी में उतना प्रवीण तो नहीं हूं, लेकिन मराठी बोलने का प्रयास, मराठी के नए शब्दों को सीखने की कोशिश मैंने निरंतर की है।

साथियों,

ये मराठी सम्मेलन एक ऐसे समय हो रहा है, जब छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 350 वर्ष पूरे हुए हैं। जब पूण्यस्लोक अहिल्याबाई होल्कर जी की जन्मजयंति के 300 वर्ष हुए हैं और कुछ ही समय पहले बाबा साहेब अंबेडकर के प्रयासों से बने हमारे संविधान ने भी अपने 75 वर्ष पूरे किए हैं।

साथियों,

आज हम इस बात पर भी गर्व करेंगे कि महाराष्ट्र की धरती पर मराठी भाषी एक महापुरूष ने 100 वर्ष पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का बीज बोया था। आज ये एक वटवृक्ष के रूप में अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। वेद से विवेकानंद तक भारत की महान और पारंपरिक सांस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक संस्कार यज्ञन, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पिछले 100 वर्षों से चला रहा है। मेरा सौभाग्य है कि मेरे जैसे लाखों लोगों को आरएसएस ने देश के लिए जीने की प्रेरणा दी है। और संघ के ही कारण मुझे मराठी भाषा और मराठी परंपरा से जुड़ने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसी कालखंड में कुछ महीने पहले मराठी भाषा को अभिजात भाषा का दर्जा दिया गया है। देश और दुनिया में 12 करोड़ से ज्यादा मराठी भाषी लोग हैं। मराठी को अभिजात भाषा का दर्जा मिले, इसका करोड़ों मराठी भाषियों को दशकों से इंतज़ार था। ये काम पूरा करने का अवसर मुझे मिला, मैं इसे अपने जीवन का बड़ा सौभाग्य मानता हूँ।

माननीय विद्वतजन,

आप जानते हैं, भाषा केवल उसके संवाद का माध्यम भर नहीं होती है। हमारी भाषा हमारी संस्कृति की संवाहक होती है। ये बात सही है कि भाषाएँ समाज में जन्म लेती हैं, लेकिन भाषा समाज के निर्माण में उतनी ही अहम भूमिका निभाती है। हमारी मराठी ने महाराष्ट्र और राष्ट्र के कितने ही मनुष्यों के विचारों को अभिव्यक्ति देकर हमारा सांस्कृतिक निर्माण किया है। इसीलिए, समर्थ रामदास जी कहते थे- मराठा तितुका मेळवावा महाराष्ट्र धर्म वाढवावा आहे तितके जतन करावे पुढे आणिक मेळवावे महाराष्ट्र राज्य करावे जिकडे तिकडे मराठी एक सम्पूर्ण भाषा है। इसीलिए, मराठी में शूरता भी है, वीरता भी है। मराठी में सौंदर्य भी है, संवेदना भी है, समानता भी है, समरसता भी है, इसमें आध्यात्म के स्वर भी हैं, और आधुनिकता की लहर भी है। मराठी में भक्ति भी है, शक्ति भी है, और युक्ति भी है। आप देखिए, जब भारत को आध्यात्मिक ऊर्जा की जरूरत हुई, तो महाराष्ट्र के महान संतों ने ऋषियों के ज्ञान को मराठी भाषा में सुलभ कराया। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत रामदास, संत नामदेव, संत तुकड़ोज़ी महाराज, गाडगे बाबा, गोरा कुम्हार और बहीणाबाई महाराष्ट्र के कितने ही संतों ने भक्ति आंदोलन के जरिए मराठी भाषा में समाज को नई दिशा दिखाई। आधुनिक समय में भी गजानन दिगंबर माडगूलकर और सुधीर फड़के की गीतरामायण ने जो प्रभाव डाला, वो हम सब जानते हैं।

साथियों,

गुलामी के सैकड़ों वर्षों के लंबे कालखंड में, मराठी भाषा, आंक्रांताओं से मुक्ति का भी जयघोष बनी। छत्रपति शिवाजी महाराज, संभाजी महाराज और बाजीराव पेशवा जैसे मराठा वीरों ने दुश्मनों को नाको चने चबवा दिए, उनको मजबूर कर दिया। आज़ादी की लड़ाई में वासुदेव बलवंत फड़के, लोकमान्य तिलक और वीर सावरकर जैसे सेनानियों ने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। उनके इस योगदान में मराठी भाषा और मराठी साहित्य का बहुत बड़ा योगदान था। केसरी और मराठा जैसे समाचार पत्र, कवि गोविंदाग्रज की ओजस्वी कवितायें, राम गणेश गडकरी के नाटक मराठी साहित्य से राष्ट्रप्रेम की जो धारा निकली, उसने पूरे देश में आज़ादी के आंदोलन को सींचने का काम किया। लोकमान्य तिलक ने गीता रहस्य भी मराठी में ही लिखी थी। लेकिन, उनकी इस मराठी रचना ने पूरे देश में एक नई ऊर्जा भर दी थी।

साथियों,

मराठी भाषा और मराठी साहित्य ने समाज के शोषित, वंचित वर्ग के लिए सामाजिक मुक्ति के द्वार खोलने का भी अद्भुत काम किया है। ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, महर्षि कर्वे, बाबा साहेब आंबेडकर, ऐसे कितने ही महान समाज सुधारकों ने मराठी भाषा में नए युग की सोच को सींचने का काम किया था। देश में मराठी भाषा ने बहुत समृद्ध दलित साहित्य भी हमें दिया है। अपने आधुनिक चिंतन के कारण मराठी साहित्य में विज्ञान कथाओं की भी रचनाएँ हुई हैं। अतीत में भी, आयुर्वेद, विज्ञान, और तर्कशास्त्र में महाराष्ट्र के लोगों ने अद्भुत योगदान दिया है। इसी संस्कृति के कारण, महाराष्ट्र ने हमेशा नए विचारों और प्रतिभाओं को भी आमंत्रित किया और महाराष्ट्र ने इतनी प्रगति की है। हमारी मुंबई महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश की आर्थिक राजधानी बनकर उभरी है।

और भाइयों बहनों,

जब मुंबई का ज़िक्र आया है, तो फिल्मों के बिना न साहित्य की बात पूरी होगी, और न मुंबई की! ये महाराष्ट्र और मुंबई ही है, जिसने मराठी फिल्मों के साथ-साथ हिन्दी सिनेमा को ये ऊंचाई दी है। और इन दिनों तो ‘छावा’ की धूम मची हुई है। सांभाजी महाराज के शौर्य से इस रूप में परिचय शिवाजी सावंत के मराठी उपन्यास ने ही कराया है।

साथियों,

कवि केशवसुत का एक पद है- “जुनें जाऊं द्या, मरणालागुनि जाळुनि किंवा, पुरुनि टाकासडत न एक्या ठायी ठाका, यानी हम पुरानी सोच पर थमे नहीं रह सकते। मानवीय सभ्यता, विचार और भाषा लगातार evolve होते रहते हैं। आज भारत दुनिया की सबसे प्राचीन जीवंत सभ्यताओं में से एक है। क्योंकि, हम लगातार evolve हुये हैं, हमने लगातार नए विचारों को जोड़ा है, नए बदलावों का स्वागत किया है। भारत में दुनिया की सबसे बड़ी भाषाई विविधता इसका प्रमाण है। हमारी ये भाषाई विविधता ही हमारी एकता का सबसे बुनियादी आधार भी है। मराठी खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। क्योंकि, हमारी भाषा उस माँ की तरह होती है, जो अपने बच्चों को नए से नया, अधिक से अधिक ज्ञान देना चाहती है। माँ की तरह ही भाषा भी किसी से भेदभाव नहीं करती। भाषा हर विचार का, हर विकास का आलिंगन करती है। आप जानते हैं, मराठी का जन्म संस्कृत से हुआ है। लेकिन, इसमें उतना ही प्रभाव प्राकृत भाषा का भी है। ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी है, इसने मानवीय सोच को और अधिक व्यापक बनाया है। अभी मैंने लोकमान्य तिलक जी की गीता रहस्य का ज़िक्र किया। गीता रहस्य संस्कृत गीता की व्याख्या है। तिलक जी ने मूल गीता के विचारों को लिया, और मराठी बोध से उसे और ज्यादा जन-सुलभ बनाया। ज्ञानेश्वरी गीता में भी संस्कृत पर मराठी में टिप्पणी लिखी गई। आज वही ज्ञानेश्वरी देश भर के विद्वानों और संतों के लिए गीता को समझने के लिए एक मानक बन गई है। मराठी ने दूसरी सभी भारतीय भाषाओं से साहित्य को लिया है, और बदले में उन भाषाओं को भी समृद्ध किया है। जैसे कि भार्गवराम बिट्ठल वरेरकर जैसे मराठी साहित्यकारों ने ‘आनंदमठ’ जैसी कृतियों का मराठी अनुवाद किया। विंदा करंदीकर, इनकी रचनाएँ तो कई भाषाओं में आईं। उन्होंने पन्ना धाय, दुर्गावती और रानी पद्मिनी के जीवन को आधार बनाकर रचनाएँ लिखीं। यानी, भारतीय भाषाओं में कभी कोई आपसी वैर नहीं रहा। भाषाओं ने हमेशा एक दूसरे को अपनाया है, एक दूसरे को समृद्ध किया है।

साथियों,

कई बार जब भाषा के नाम पर भेद डालने की कोशिश की जाती है, तो हमारी भाषाओं की साझी विरासत ही उसका सही जवाब देती है। इन भ्रमों से दूर रहकर भाषाओं को समृद्ध करना, उन्हें अपनाना, ये हम सबका सामूहिक दायित्व है। इसीलिए, आज हम देश की सभी भाषाओं को mainstream language के रूप में देख रहे हैं। हम मराठी समेत सभी प्रमुख भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं। अब महाराष्ट्र के युवा मराठी में हायर एजुकेशन, इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई वहां का युवा आसानी से कर सकेंगे। अंग्रेजी न जानने के कारण प्रतिभाओं की उपेक्षा करने वाली सोच को हमने बदल दिया है।

साथियों,

हम सब कहते हैं कि हमारा साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य समाज का पथप्रदर्शक भी होता है। इसीलिए, साहित्य सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों की, साहित्य से जुड़ी संस्थाओं की देश में बहुत अहम भूमिका होती है। गोविंद रानडे जी, हरिनारायण आप्टे जी, आचार्य अत्रे जी, वीर सावरकर जी, इन महान विभूतियों ने जो आदर्श स्थापित किए, मैं आशा करता हूँ, अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल उन्हें और आगे बढ़ाएगा। 2027 में साहित्य़ सम्मेलन की इस परंपरा को 150 वर्ष पूरे होंगे। और तब 100वां सम्मेलन होगा। मैं चाहूँगा, आप इस अवसर को विशेष बनाएँ, इसके लिए अभी से तैयारी करें। कितने ही युवा आजकल सोशल मीडिया के जरिए मराठी साहित्य की सेवा कर रहे हैं। आप उन्हें मंच दे सकते हैं, उनकी प्रतिभा को पहचान दे सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा लोग मराठी सीखें, इसके लिए आप ऑनलाइन platforms को, भाषिणी जैसे initiatives को बढ़ावा दें। मराठी भाषा और साहित्य को लेकर युवाओं के बीच प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जा सकता है। मुझे विश्वास है, आपके ये प्रयास, और मराठी साहित्य की प्रेरणाएं विकसित भारत के लिए 140 करोड़ देशवासियों को नई ऊर्जा देंगे, नई चेतना देंगे, नई प्रेरणा देंगे। आप सभी महादेव गोविंद रानडे जी, हरि नारायण आप्टे जी, माधव श्रीहरि अणे जी, शिवराम परांजपे जी, जैसे महान व्यक्तित्वों की महान परंपरा को आगे बढ़ाएं, इसी कामना के साथ, आप सभी का एक बार फिर बहुत-बहुत धन्यवाद!

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