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उपस्थित सभी महानुभाव और नौजवान साथियों।

आज ऊर्जा संगम भी है और त्रिवेणी संगम भी है। त्रिवेणी संगम इस अर्थ में है कि तीन महत्‍वपूर्ण initiative जिनको आज हम Golden Jubilee के रूप में मना रहे हैं। ONGC Videsh Limited, Engineer India Limited and Barauni Refinery Limited इन तीनों क्षेत्र में गत 50 वर्षों में जिन जिन महानुभाव ने योगदान दिया है। इस अभियान को आगे बढ़ाया है और भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में ताकत देने के लिए निरंतर प्रयास किया है। मैं उन तीनों संस्‍थाओं से जुड़े सभी महानुभवों को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और मुझे विश्‍वास है कि जब हम Golden Jubilee Year मना रहे हैं तब पीछे मुड़कर के वो कौन सी हमारी कार्यशैली थी, वो कौन से हमारे निर्णय थे, वो कौन सा हमारा दर्शन था, जिसके कारण हम आगे बढ़े, वो कौन सी कमियां थी, जिसके कारण अगर कोई कमी रह गई थी तो वो क्‍या थी और अब जाकर के जब हम 50 साल के turning point पर खड़े हैं तब आने वाला 50 साल का हमारा लक्ष्‍य क्‍या होगा। हमारा मार्ग क्‍या होगा, हमारी शक्ति संचय के रास्‍ते क्‍या होंगे और राष्‍ट्र को शक्तिवान बनाने के लिए हमारे पुरूषार्थ किस प्रकार का होगा, उसका भी आप लोग रोड मैप तैयार करोगे, इसका मुझे पूरा विश्‍वास है।

कोई देश तब प्रगति करता है, जब विचार के साथ व्‍यवस्‍थाएं जुड़ती है, अगर विचार के साथ व्‍यवस्‍था नहीं रहती है, तो विचार बांझ रह जाते हैं, उससे आगे कुछ निकलता नहीं है और इसलिए देश को अगर प्रगति करनी है तो हर Idea को Institutionalise करना होता है और देश्‍ लम्‍बे स्‍तर से तब स्‍थाई भाव से तब प्रगति करता है जब उसका Institutional Mechanism अधिक मजबूत हो। Institutional Mechanism में auto-pilot ऐसी व्‍यवस्‍था हो कि वो नित्‍य-नूतन प्रयोग करता रहता हो।

मैं समझता हूं कि हमारे पास आने वाले युग के लिए भी, नई व्‍यवस्‍थाओं के निर्माण की आवश्‍यकता है और वर्तमान में जो व्‍यवस्‍थाएं हमारे पास है जो Institutional Mechanism हैं, उस Institutional Mechanism को भी आने वाली शताब्‍दी के लिए किस प्रकार से अधिक आधुनिक बनाया जाए, नए innovation कैसे किये जाए, young man को कैसे incorporate किया जाए और न सिर्फ भारत की सीमाओं तक लेकिन Global Perspective में हम अपने विकास की दिशा कैसे तय करे और उन लक्ष्‍यों को कैसे पार करे, कैसे प्राप्‍त करे? उन बातों पर जितना हम ध्‍यान देंगे, तो विश्‍व की भारत के पास जो अपेक्षाएं हैं और दुनिया का 1/6 population, यह 1/6 population यह कहकर नहीं रोक सकता कि हमारी यह मुसीबत है, हमारी यह कठिनाई है। दुनिया के 1/6 population का तो यह लक्ष्‍य रहना चाहिए कि विश्‍व का 1/6 बोझ हम अकेले अपने कंधों पर उठाएंगे और विश्‍व को सुख-शांति देने में हमारा भी कोई न कोई सकारात्‍मक contribution होगा। यह Global Perspective के साथ भारत को अपने आप को सजग करना होगा, भारत को अपने आप को तैयार करना होगा और मुझे विश्‍वास है जिस देश के पास 65% जनसंख्‍या 35 साल से कम उम्र की हो young mind जिनके पास हो, अच्‍छे सपने देखने का जिन लोगों में सामर्थ्‍य हो ऐसी ऊर्जावान देश के लिए सपने देखना।

…और सपने पूरा करना कठिन नहीं है और मुझे विश्‍वास है कि आज जब हम इस महत्‍वपूर्ण अवसर पर ऊर्जा संगम के समारोह में मिले हैं, तब कल, आज और आने वाले कल का भी संगम हमारे मन-मस्तिष्‍क में स्थिर हो, ताकि हम नई ऊंचाईयों को पार करने के लिए विश्‍व के काम आने वाले भारत को तैयार करने में सफल हो सकें और इस अर्थ में आज मुझे आपके बीच आने का सौभाग्‍य मिला मैं आपको इसके लिए हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और आपके आगे की यात्रा बहुत ही उत्‍तम तरीके से राष्‍ट्र की सेवा में काम आएगी, ऐसा मुझे पूरा विश्‍वास है।

नई सरकार बनने के बाद नये कई initiative लिये गये हैं। हम जानते हैं कि अगर हमें विकास करना है अगर हमें Global Bench Mark को achieve करना है तो हमारे लिये ऊर्जा के क्षेत्र में Self Sufficient होना बहुत अनिवार्य है। हमें किसी क्षेत्र में भी Growth करना है उसकी पहली आवश्‍यकता होती है ऊर्जा। आज Technology Driven society है और जब Technology Driven society है तो ऊर्जा ने अपनी अहम भूमिका स्‍थापित की है। ऊर्जा के स्रोत अलग-अलग हो सकते हैं, जो आज भी हमारे ध्‍यान में नहीं है वो भी शायद आने वाले दिनों में विश्‍व के सामने उजागर हो सकते है, लेकिन पूरे मानव जाति की विकास यात्रा को देखा जाए, तो ऊर्जा का अपना एक स्‍थान है, ऊर्जा एक प्रकार से विकास को ऊर्जा देने की ताकत बन जाती है और उस अर्थ में हमारे लिए ऊर्जा सुरक्षा ये आवश्‍यकता भी है और हमारी जिम्‍मेदारी भी है और उस जिम्‍मेदारी को पूरा करने की दिशा में हमने कुछ कदम उठाए हैं।

पिछले दस महीनों में इस क्षेत्र में हमने जो reform को बल दिया है और reform को बल देने के कारण कई महत्‍वपूर्ण बातें सामने आई है। हमारे यहां सामान्‍य नागरिक की चिंता करना यह हमारा पहला इरादा रहता है। हमारा मकसद है कि देश के common man को अधिक से अधिक सरलता से लाभ कैसे मिले।

सब्सिडी ट्रांसफर्स दुनिया की सबसे बड़ी गैसे सब्सिडी को ट्रांसफर करने की स्‍कीम में सिर्फ सौ दिन के कालखंड में हमने सफलता पाई है और मैं मानता हूं कि एक तो किसी चीज में शुरू करना, किसी चीज को achieve और किसी चीज को time-bound…समय रहते हुए चीजों को तोलते हुए देखें तो मैं विभाग के सभी मित्रों को सचिव श्री, मंत्री श्री को और उनकी टीम को सौ दिन के अल्‍प समय में दुनिया की सबसे बड़ी सब्सिडी ट्रांसफर स्‍कीम 12 करोड़ लोगों को बैंक खाते में सब्सिडी पहुंचना यह छोटा काम नहीं है। दुनिया का सबसे बड़ा काम है और जनधन Account जब खोल रहे थे तब तो कुछ लोग मजाक करने की हिम्‍मत करते थे, लेकिन अब नहीं करते, क्‍योंकि जनधन, जनधन के लिए नहीं था। जनशक्ति में परिवर्तित करने का प्रयास था और उसमें ऊर्जा शक्ति जोड़ने की प्रारंभ में करना था। कोई कल्‍पना कर सकता है कि beneficially को सीधा लाभ देकर के हमने कितना बड़ा leakage रोका है। मैं विशेषकर के Political पंडितों से आग्रह करूंगा कि जरा उसकी गहराई में जाए। मैं अपनी तरफ से claim करना नहीं चाहता हूं। जिस भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने के खिलाफ बाते तो बहुत होती है लेकिन भ्रष्‍टाचार से लड़ने के लिए Institutional Mechanism, Transparent Mechanism, Policy driven व्‍यवस्‍थाएं अगर निश्चित की जाए तो हम leakage को रोक सकते हैं और यह उत्‍तम उदाहरण cash transfer के द्वारा हमने सिद्ध किया है। पहले कितने सिलेंडर जाते थे अब कितने सिलेंडर जाते हैं, इससे पता चलेगा।

पिछली बार हमने Parliament में एक छोटा सा उल्‍लेख किया था कि जिनको यह affordable है उन्‍होंने सब्सिडी क्‍यों लेनी चाहिए। क्‍या देश में ऐसे लोग नहीं निकल सकते कि जो कहें कि भई ठीक है, अब तो ईश्‍वर ने हमें बहुत दिया है, देश में हमें बहुत दिया है और गैस सिलेंडर के लिए सब्सिडी की जरूरत नहीं है। हम अपने पसीने की कमाई से अपना खाना पका सकते हैं और अपना पेट भर सकते हैं। छोटा सा स्‍पर्श किया था विषय पर लेकिन स्‍पर्श को भी देश के करीब 2 लाख 80 हजार लोगों ने सकारात्‍मक response किया और इस “Give it up” movement में भागीदारी हुए। सवाल यह नहीं है कि दो लाख, तीन लाख इसमें लोग जुड़े, सवाल यह है कि देश हमें चलाना है तो देश भागीदारी करने को तैयार होता है। देश का हर नागरिक भागीदारी करने को तैयार होता है। उनको अवसर देना चाहिए। देश के नागरिकों पर भरोसा करना चाहिए। हमारी सबसे बड़ी पहल यह है कि हम हिंदुस्‍तान के नागरिकों पर भरोसा कर करके आगे बढ़ना चाहते हैं और आपको जानकर के आनंद होगा कि समाज के एक वर्ग ने जिसने कहा कि हां भई हम अब सब्सिडी से गैस अब लेना नहीं चाहते, हम अपना पैसा दे सकते हैं। करीब 2 लाख 80 हजार से ज्‍यादा लोगों ने इसका एक प्रकार से देश को लाभ दिया है। उससे कम से कम 100 करोड़ रुपये की बचत होगी। यह 100 करोड़ रुपया किसी गांव में स्‍कूल बनाने के काम आएगा कि नहीं आएगा। किसी गरीब का बच्‍चा बीमार होगा तो उसके काम आएगा कि नहीं आएगा। जिसने भी यह काम किया है उसने एक प्रकार से गरीबों की सेवा करने का काम किया है। और यह जो सिलेंडर बचे हैं उन सिलेंडरों से हम पैसे बचाना नहीं चाहते, हम इसको गरीबों तक पहुंचाना चाहते हैं ताकि आज वो धुएं में चुल्‍हा जलाते हुए जो मां परेशान रहती है उसको कोई राह मिल जाए, उसके बच्‍चे को आरोग्‍य का लाभ मिल जाए।

गरीब के घर तक गैस का सिलेंडर कैसे पहुंचे इसका हमने अभियान चलाया है और मैं आज विधिवत रूप से यह सफलता देखकर पहले तो हमने ऐसा ही कहा था कि चलो जरा कहे लेकिन जो response देश ने दिया है, मैं उन दो लाख 80 हजार लोगों से अधिक इस काम का जिम्‍मा लिया मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं, अभिनंदन करता हूं और देशवासियों को अपील करता हूं कि जिसके लिए भी यह संभव है अपनी जेब से.. अपना खाना पकाने की जिनकी ताकत है वो कृपया करके यह गैस सिलेंडर में सब्सिडी न लें। देने का भी एक आनंद होता है, देने का भी एक संतोष होता है और जब आप गैस सिलेंडर की सब्सिडी नहीं लेंगे तब मन में याद रखिए यह जो पैसे देश में बचने वाले हैं वो किसी न किसी गरीब के काम आने वाले हैं। वो आपके जीवन का संतोष होगा, आनंद होगा और मैं विधिवत रूप से देशवासियों से आग्रह करता हूं।

जब मैं यह विचार कर रहा था, तब मैंने Department को पूछा था कि पहले जांच करो भई! मोदी के नाम का तो सिलेंडर कोई है नहीं न! मेरा सौभाग्‍य रहा कि मुझे कभी इस दुनिया से उलझना ही नहीं पड़ा है तो उसके कारण न कभी पहले लिया था न आज है तो फिर मैं एक moral ताकत से बोल सकता था हां भई हम यह कर सकते हैं और मैं आज विधिवत रूप से देशवासियों से अपील करता हूं कि अगर आपके पास इस देश ने जहां तक पहुंचाया है, देश का योगदान है। गरीब से गरीब का योगदान है आप यहां तक पहुंचने में, आपकी जेब भरने में गरीब के पसीने की महक है। आइए हम इस “Give it Up” movement में जुड़े, हम गैस सब्सिडी को छोड़ें, सामने से offer करे और इसमें भी नये नये लक्ष्‍य प्राप्‍त करके नये record स्‍थापित करे। मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं जो सिलेंडर, आप सब्सिडी छोड़ेंगे वो हम गरीबों को पहुंचाएंगे। यह गरीबों के काम आएगा।

हमने एक और काम किया है....5kg का सिलेंडर। जो विद्यार्थी पढाई के लिए शहर आता है...अब वो एक पूरा सिलेंडर लेकर के क्‍या करेगा, अब बेचारा एक कमरे में रहता है या तो कोई नौकरी के लिए गये हुए लोग है। यह जो घूमन जाति के लोग है, जो एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं, उनको 5kg का सिलेंडर मिलेगा, तो ऐसे गरीब लोगों को वो affordable भी होगा और उसकी जरूरत पूरी करने की व्‍यवस्‍था होगी। हमने उस दिशा में प्रयास किया है।

हमने एक यह भी काम किया डीजल को deregulate किया। अब डीजल को deregulate करने के कारण reform के लिए एक महत्‍वपूर्ण माना जाता है। International दाम कम हुए थे तो थोड़ी सुविधा भी रही, लेकिन Market को तय करने दो, क्‍योंकि Global Market के दबाव में है और मैंने देखा है कि देश ने सहजता से इसको स्‍वीकार कर लिया है। कभी दाम ऊपर जाते हैं कभी दाम नीचे जाते हैं लेकिन लोगों को मालूम है कि भई इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है। बाजार की जो स्थिति है वो उसी के साथ जुड़ गए है। तो भारत का नागरिक भी एक खरीदार के रूप में भी Global Economic का हिस्‍सा बनकर के अपनी जिम्‍मेदारियों को निभाने के लिए तैयार हुआ है। यह अपने आप में विकास के एक सकारात्‍मक दृश्‍य के रूप में मैं देख रहा हूं। मैं देख रहा हूं कि उसका भी लाभ होगा। हमने एक और महत्‍वपूर्ण निर्णय किया। जब ऊर्जा के क्षेत्र में चर्चा करते समय सभी क्षेत्रों में प्रयास करना पड़ेगा।

Ethanol के लिए पेट्रोल में उसको Mix करने के लिए हमने उसमें initiative लिया, विधिवत रूप से लिया। हमारे गन्‍ने की खेती करने वाले किसान परेशान है, क्‍योंकि उसकी लागत से चीनी की कीमत कम हो रही है, चीनी के कारखाने बंद हो रहे हैं। अगर उसके लिए एक नई व्‍यवस्‍था जोड़ दी जाए। अगर चीनी बनाने वाले चीनी.. उनके पास excess है, चीनी के दाम टूट रहे हैं दुनिया में कोई Import करने वाला नहीं है, तो ऐसी स्थिति में आप चीनी मत बनाइये Ethanol बनाइये, कुछ मात्रा में Ethanol बनाइये, उसको प्रट्रोल में blend कर दिया जाए। किसी समय यह petroleum lobby के बारे में ऐसा कहा जाता था कि इतनी powerful होती है कि कोई निणर्य नहीं कर सकता। हमने निर्णय किया। यहां कई लोग बैठे होंगे, शायद उनको अच्‍छा नहीं भी लगेगा, लेकिन हमने निर्णय किया है और उसके कारण हम climate की भी चिंता करते हैं, environment की भी चिंता करते हैं, at the same time हम economy की भी चिंता करते हैं। और हमारा गरीब किसान, गन्‍ने का किसान है। यह ethanol के द्वारा, अब उसकी बहुत बड़ी मदद कर रहे हैं। हमारा जो sugar sector है उसको ताकत देने का एक उत्‍तम रास्‍ता हमने किया है और पहले ethanol का MSP भी नहीं था। Minimum Support Price का निर्णय नहीं था। उसका कोई Price.. कोई कीमत तय नहीं था। हमने तय कर दिया 48.50 पैसा to 49.50 पैसा तक इसका रहेगा ताकि एक राज्‍य में एक भाव हो, दूसरे राज्‍य में दूसरा हो, तो स्थिति खराब न हो और उसके कारण कोई भी company direct ले सकती है। कोई टेंडर प्रोसेस में जाना नहीं पड़ेगा, मार्केट रेट फिक्‍स कर दिया है। मैं समझता हूं कि उसके कारण भी एक और लाभ होगा।

और एक काम हमने initiative लेने के लिए राज्‍यों से आग्रह किया है। जिन-जिन राज्‍यों में बंजर भूमि है। जहां पर अन्‍य फसल की संभावनाएं कम है, वहां पर Jatropha की खेती बहुत अच्‍छी हो सकती है। Jatropha की पैदावर अच्‍छी हो सकती है और Jatropha जैसे वो तिलहन है जिसमें से खाद्य तेल नहीं निकलता है, लेकिन कोई पदार्थ मिलता है, उसको बढ़ावा देना और उसको बायो डीजल के रूप में develop करना और जितनी मात्रा में हम बायो डीजल को मार्केट में लाएंगे, हमारा किसान जो खेत में पम्‍प चलाता है या ट्रेक्‍टर चलाता है उसको भी उसके कारण लाभ होगा। गरीब आदमी को किस प्रकार से लाभ हो, उस बल देने करने का हमारा प्रयास है।

देश में अगर हमें विकास करना है तो भारत का..और अगर सिर्फ पश्चिमी छोर का विकास हो, तो देश का विकास कभी संभव नहीं होगा। असंतुलित विकास भी कभी-कभी विकास के लिए खुद समस्‍या बन जाता है। विकास संतुलित होना चाहिए। हर राज्‍य का 19-20 का फर्क तो हम समझ सकते हैं। लेकिन 80-20 के फर्क से देश नहीं चल सकता। और इसलिए पश्चिम में तो हमें economic activity दिखती है, लेकिन पूरब जहां सबसे ज्‍यादा प्राकृतिक संपदा है, पूर्वी भारत पूरा, जहां पर समर्थ लोग हैं, उनकी शक्ति कम नहीं होती है, लेकिन उनको अवसर नहीं मिलता। देश को आगे बढ़ाना है तो हमारा लक्ष्‍य है कि भारत का पूर्वी इलाका चाहे पूर्वी उत्‍तर प्रदेश हो, बिहार हो, उड़ीसा हो, असम हो, पश्चिम बंगाल हो, north east के इलाके हों, जहां पर विकास की विशाल-विपुल संभावना है, उस पर हमने बल देने का आग्रह किया है।

Second green revolution से भूमि अगर बनेगी, तो पूर्वी भारत बनेगा, मुझे साफ दिखाई दे रहा है। जहां विपुल मात्रा में पानी है, उसी प्रकार से औद्योगिकी विकास में भी बड़ा contribute करने की संभावना पूर्वी भारत में पड़ी है और इसके लिए गैस ग्रिड नेटवर्क ऊर्जा जरूरत है। अगर पटना के पास गैस पाइप लाइन से मिलेगा, तो पटना में उद्योग आएंगे। बिहार के उन शहरों में भी उद्योग जाएंगे। असम में भी जाएंगे, पश्चिम बंगाल में भी जाएंगे, कलकत्‍ता में भी नई ऊर्जा आएगी और इसलिए हमने गैस ग्रिड का पाइप लाइन के नेटवर्क का एक बहुत अभियान उठाना हमने तय किया है और इतना ही नहीं शहरों में क्‍योंकि शहरों के pollution की बड़ी चर्चा है। और उसके लिए हमने तय किया है कि हम परिवारों में पाइप लाइन से गैस का connection करें। यह हम देना चाहते है। अब तक हिंदुस्‍तान में 27 लाख परिवारों के पास पाइप लाइन से गैस connection है। हम आने वाले चार साल में यह संख्‍या एक करोड़ पहुंचाना चाहते हैं, एक करोड़ परिवार को। अब पूरे-पूरे पूर्वी भारत में गैस ग्रिड से गैस देने का हमारा लक्ष्‍य है। मैं जानता हूं हजारों करोड़ रुपये का हमारा investment है लेकिन यह investment करना है, क्‍योंकि अगर एक बार ऊर्जा के स्रोत वहां विपुल मात्रा में होंगे, तो हमारा पूर्वी भारत में भी उद्योग लगाने वाले लोग पहुंचेंगे, अगर गैस उनको मिलता है तो उद्योग लगाने के लिए जाएंगे और फिर ऊर्जा की गारंटी होनी चाहिए, उसको लेकर के हम आगे बढ़ना चाहते हैं। हमने इस क्षेत्र में विकास करना है तो skill development में भी बल देना पड़ेगा।

इस कार्यक्रम में विशेष रूप से IIT जैसे हमारे Institution के हमारे students को बुलाया है। हमारे देश में यह बहुत बड़ी challenge है कि इस क्षेत्र में innovation कैसे करें। हम अभी भी पुराने ढर्रे से चल रहे हैं। यह young mind की जरूरत है और young mind का एक लाभ है, वो बड़े साहसिक होते हैं वो प्रयोग करने के लिए ताकत रखते हैं। जो अनुभव के किनारे पहुंचे हैं वो 50 बार सोचते है कि करू या न करूं, करूं या न करूं। अच्‍छा कबड्डी का खिलाड़ी भी Retire होने के बाद जब कबड्डी का खेल देखने खड़ा होता है, तो उसको भी डर रहता है कि अरे यह कहीं गिर न जाए, वो चिंता करता रहता है और इसलिए young mind जिसकी risk capacity बहुत होती है। ऐसे young mind को आज विशेष रूप से बुलाया है।

मैं आग्रह करता हूं कि इस क्षेत्र में बहुत innovation की संभावनाएं है। innovation को हम किस प्रकार से ऊर्जा के क्षेत्र में हमारा mind apply करे। भारत को हम ऊर्जा क्षेत्र में सुरक्षित कैसे करे, स्‍वाबलंबी कैसे करें। उसकी पहली आवश्‍यकता है innovation, technology innovation, technology up-gradation, दूसरा है skill development. हमने skill development का एक अलग department बनाया है, लेकिन skill development को भी हम area specific, need specific and development specific बनाना चाहते हैं, requirement specific बनाना चाहते हैं।

अब हमने एक बार हिसाब लगाया कि सिर्फ हमारे पेट्रोलियम सेक्‍टर में जो काम करते हैं जैसे गैस की पाइप लाइन लगती है, अब गैस की पाइप लाइन लगाने वाला पानी की पाइप लाइन लगाने वाला नहीं चल सकता। उसके लिए एक special skill चाहिए। व्‍यक्ति वही होगा, extra skill की आवश्‍यकता है, value addition की आवश्‍यकता है। हमने ऐसे ही सरसरी नजर से देखा तो करीब-करीब 136 चीजें ऐसी हाथ में आई कि जो field level पर food-soldier जो है उनके skill के लिए करने की आवश्‍यकता है।

हमने एक अभियान चलाया है। आने वाले दिनों में इन सभी sectors में हम skill development को बल दे और सामान्‍य गरीब मजदूर भी है जो यह पेट्रोलियम सेक्‍टर में, ऊर्जा के सेक्‍टर में मान लीजिए solar energy पर हम initiative ले रहे हैं। अगर solar energy में initiative ले तो solar energy में वो wire-man काम करेगा कि solar energy में skill development का नये सिरे से सिलेबस बने, नये सिरे से उनके लिए कहीं एक व्‍यक्ति या दो व्‍यक्ति एक साल के दो साल के जो भी आवश्‍यक हो Skill Development Mission के साथ जोड़कर के हम पेट्रोलियम सेक्‍टर में भी ऊर्जा के सेक्‍टर में भी, ऐसी कितनी भी नई चीजें – और मैं तो चाहूंगा हम कंपनियों के साथ मिलकर के इसको करें। कंपनियां भी पार्टनर बनें और कंपनियों के साथ मिलकर के करेंगे तो Human Resource Development यह भी हमारे लिए उतना ही आवश्‍यक है जिसको लेकर के हम आगे बढ़ना चाहते हैं और मुझे विश्‍वास है कि हम आने वाले दिनों में एक प्रकार से innovation के लिए पूरा-पूरा अवसर, उसी प्रकार से इसको भी पाने का अवसर..।

2022 में भारत की आजादी के 75 साल हो रहे हैं। देश आजादी का अमृत पर्व बनाने वाला है। जिन महापुरूषों ने सपने देखे थे भारत को महान बनाने के और इसके लिए आजादी भी अपने आप को बलि चढ़ा दिया था, जवानी जेल में खपा दी थी, अपने-अपने परिवारों को तबाह कर दिया था, इसलिए कि हम आजादी की सांस ले सके, हम आजाद भारत में पल-बढ़ सके। हम वो भाग्‍यशाली लोग हैं, जो उनकी तपस्‍या और त्‍याग के कारण आज आजादी का आनंद ले रहे हैं। क्‍या हमारा जिम्‍मा नहीं है कि जिन महापुरूषों ने देश के लिए इतना बलिदान दिया हम उनको कैसा भारत समर्पित करेंगे। कैसा भारत देंगे। 2022 जबकि हिंदुस्‍तान की आजादी के 75 साल है। इस ऊर्जा के संगम में जो लोग आएं हैं मैं आपसे आग्रह करता हूं कि 2022 में जब देश आजादी का अमृत पर्व मनाए तब आज हम ऊर्जा के क्षेत्र में करीब 77% import करते हैं। तेल और गैस और पेट्रोलियम सेक्‍टर में। क्‍या आजादी के 2022 के पर्व पर, अमृत पर्व पर हम यह 77 में से कम से कम मैं ज्‍यादा नहीं कर रहा हूं, 10% import कम करेंगे, हम उतना 10% growth करेंगे, स्‍वाबलंबी बनेंगे यह सपना लेकर के आज हम कट कर सकते हैं क्‍या। एक बार हम 2022 में 10% import कमी करने में सफल हो जाते हैं, 10% growth करके हम उस ऊंचाई को पार कर सकते हैं तो मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं कि 2030 में हम यह import को 50% तक ला सकते हैं। लेकिन First Break-through होता है, पहला Break-through और मैं मानता हूं कि आजादी के दीवानों से बड़ी प्रेरणा क्‍या हो सकती है। आजादी के मरने-मिटने वालों को याद करके कह कि मैं इस क्षेत्र में काम कर रहा हूं, मैं मेरे देश को यह देकर के रहूंगा, आने वाले पांच-सात साल मेरे पास हैं। मैं पूरी ताकत लगा दूंगा और मैं देश में यह स्थिति पैदा करूं, ये सपने हम देखे कितने क्षेत्रों में initiative लिये है।

हम मेगावाट से बाहर नहीं निकलते, हम गीगावाट की चर्चा करने लगे हैं। 100 गीगावाट solar energy, 60 giga-watt renewable energy, wind energy की दिशा में जाना यह अपने आप में बहुत बड़े सपने हमने देखे हैं। इन सपनों से आगे बढ़ेंगे तो हमारा import कम होगा। और 10% Growth...वो तो हमारी growth requirement है..लेकिन हमारा जो Growth होगा वो 10% से ज्‍यादा लगेगा, तब जाकर के हम 77% से 10% कम कर सकते हैं। तो हमारे लक्ष्‍य ऊंचे होंगे, तब जाकर के हम इसको पूरा कर सकेंगे और मैं चाहूंगा कि उसके लिए हम प्रयास करें।

एक क्षेत्र की जितनी कंपनियां है, समय की मांग यह है कि हमारी ऊर्जा क्षेत्र की जितनी कंपनियां है Government हो चाहे वो Private कंपनियां हो, हम भारत के दायरे में ही अपने कारोबार को चलाकर के गुजारा करे यह enough नहीं है। हमारी इन कंपनियों को target करना चाहिए, जल्‍द से जल्‍द वो Multinational बने, क्‍योंकि ऊर्जा का एक पूरा Global Market बना हुआ है।

एक मैं देख रहा हूं कि इन दिनों energy diplomacy एक नया क्षेत्र उभर गया। वैश्विक संबंधों में energy diplomacy एक requirement बन गई है। हमारी कंपनियां जितनी Multinational बनेगी, उतना मैं समझता हूं इस क्षेत्र में अपनी पहुंच बना पाएंगे, अपनी जगह बना पाएंगे। उसी प्रकार से ऊर्जा के क्षेत्र में India and Middle East, India and Central Asia, India and South Asia Corridor बनाना और उसको गति देना हमारे लिए बहुत आवश्‍यक है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में काम करने वाले हमारे सभी महानुभव इन चीजों पर focus करके कैसे काम करे। कुछ ऐसे अनछुए क्षेत्र हैं, जिसमें हम अपना पैर पसार सकते हैं, कि North America और Africa में Gas Power के रूप में हम स्‍थापित कर सकते हैं क्‍या? मुझे विश्‍वास है कि अगर इन सपनों को लेकर के हम अगर आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार से हमारे जो बंदरगाह है उसके साथ LNG terminal का network उसके साथ हम कैसे जोड़ सकते हैं। कई ऐसे विषय है कि जिसको अगर हम बल देंगे तो मैं समझता हूं कि हम इन चीजों को पार कर सकते हैं और यह बात निश्चित है कि ऊर्जावान भारत ही विश्‍व को नई ऊर्जा दे सकता है। अगर भारत ऊर्जावान बनेगा तो विश्‍व को नई ऊर्जा मिलने की संभावना है, तो 1/6 population के नाते दुनिया हमारे लिए क्‍या करती है इन सपनों से बाहर निकलकर के हम विश्‍व के लिए क्‍या करते हैं, यह सपने देखकर के चलेंगे तो देश का अपने आप भला होगा।

मैं फिर एक बार इन तीनों संस्‍थाओं को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं, विभाग के इन सभी साथियों को उनके achievement के लिए हृदय से अभिनंदन करता हूं, बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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December 04, 2021
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उत्तराखंड का, सभी दाणा सयाणौ, दीदी-भूलियौं, चच्ची-बोडियों और भै-बैणो। आप सबु थैं, म्यारू प्रणाम ! मिथै भरोसा छ, कि आप लोग कुशल मंगल होला ! मी आप लोगों थे सेवा लगौण छू, आप स्वीकार करा !

उत्तराखंड के गवर्नर श्रीमान गुरमीत सिंह जी, यहां के लोकप्रिय, ऊर्जावान मुख्यमंत्री श्रीमान पुष्कर सिंह धामी जी, केंद्रीय मंत्रिपरिषद के मेरे सहयोगी प्रह्लाद जोशी जी, अजय भट्ट जी, उत्तराखंड में मंत्री सतपाल महाराज जी, हरक सिंह रावत जी, राज्य मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यगण, संसद में मेरे सहयोगी निशंक जी, तीरथ सिंह रावत जी, अन्य सांसदगण, भाई त्रिवेंद्र सिंह रावत जी, विजय बहुगुणा जी, राज्य विधानसभा के अन्य सदस्य, मेयर श्री, जिला पंचायत के सदस्यगण, भाई मदन कौशिक जी और मेरे प्‍यारे भाइयों और बहनों,

आप सभी इतनी बड़ी संख्या में हमें आशीर्वाद देने आए हैं। आपके स्नेह, आपके आशीर्वाद का प्रसाद पाकर हम सभी अभीभूत हैं। उत्तराखंड, पूरे देश की आस्था ही नहीं बल्कि, कर्म और कर्मठता की भूमि है। इसीलिए, इस क्षेत्र का विकास, यहां को भव्य स्वरूप देना डबल इंजन की सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी भावना से सिर्फ बीते 5 वर्षों में उत्तराखंड के विकास के लिए केंद्र सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की हैं। यहां की सरकार इनको तेज़ी से ज़मीन पर उतार रही है। इसी को आगे बढ़ाते हुए, आज 18 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं का लोकापर्ण और शिलान्यास किया गया है। इनमें कनेक्टिविटी हो, स्वास्थ्य हो, संस्कृति हो, तीर्थाटन हो, बिजली हो, बच्चों के लिए विशेष तौर पर बना चाइल्ड फ्रेंडली सिटी प्रोजेक्ट हो, करीब-करीब हर सेक्टर से जुड़े प्रोजेक्ट इसमें शामिल हैं। बीते वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, अनेक जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद, आखिरकार आज ये दिन आया है। ये परियोजनाएं, मैंने केदारपुरी की पवित्र धरती से कहा था, आज मैं देहरादून से दोहरा रहा हूं। ये परियोजनाएं इस दशक को उत्तराखंड का दशक बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी। इन सभी प्रोजेक्ट्स के लिए उत्तराखंड के लोगों का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं, बहुत-बहुत बधाई देता हूं। जो लोग पूछते हैं कि डबल इंजन की सरकार का फायदा क्या है, वो आज देख सकते हैं कि डबल इंजन की सरकार कैसे उत्तराखंड में विकास की गंगा बहा रही है।

भाइयों और बहनों,

इस शताब्दी की शुरुआत में, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत में कनेक्टिविटी बढ़ाने का अभियान शुरू किया था। लेकिन उनके बाद 10 साल देश में ऐसी सरकार रही, जिसने देश का, उत्तराखंड का, बहुमूल्य समय व्यर्थ कर दिया। 10 साल तक देश में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर घोटाले हुए, घपले हुए। इससे देश का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई के लिए हमने दोगुनी गति से मेहनत की और आज भी कर रहे हैं। आज भारत, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश के इरादे से आगे बढ़ रहा है, आज भारत की नीति, गतिशक्ति की है, दोगुनी-तीन गुनी तेजी से काम करने की है। सालों-साल अटकी रहने वाली परियोजनाओं, बिना तैयारी के फीता काट देने वाले तौर-तरीकों को पीछे छोड़कर आज भारत नव-निर्माण में जुटा है। 21वीं सदी के इस कालखंड में, भारत में कनेक्टिविटी का एक ऐसा महायज्ञ चल रहा है, जो भविष्य के भारत को विकसित देशों की श्रंखला में लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। इस महायज्ञ का ही एक यज्ञ आज यहां देवभूमि में हो रहा है।

भाइयों और बहनों,

इस देवभूमि में श्रद्धालु भी आते हैं, उद्यमी भी आते हैं, प्रकृति प्रेमी सैलानी भी आते हैं। इस भूमि का जो सामर्थ्य है, उसे बढ़ाने के लिए यहां आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर अभूतपूर्व काम किया जा रहा है। चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना के तहत आज देवप्रयाग से श्रीकोट और ब्रह्मपुरी से कौड़ियाला, वहां के प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण किया गया है। भगवान बद्रीनाथ तक पहुंचने में लाम-बगड़ लैंड स्लाइड के रूप में जो रुकावट थी, वो भी अब दूर हो चुकी है। इस लैंड स्लाइड ने देशभर के न जाने कितने तीर्थ यात्रियों को बद्रीनाथ जी की यात्रा करने से या तो रोका है या फिर घंटों इंतज़ार करवाया है और कुछ लोग तो थक कर के वापस भी चले गए। अब बद्रीनाथ जी की यात्रा, पहले से ज्यादा सुरक्षित और सुखद हो जाएगी। आज बद्रीनाथ जी, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में अनेक सुविधाओं से जुड़े नए प्रोजेक्ट्स पर भी काम आरंभ हुआ है।

भाइयों और बहनों,

बेहतर कनेक्टिविटी और सुविधाओं से पर्यटन और तीर्थाटन को कितना लाभ होता है, बीते वर्षों में केधारधाम में हमने अनुभव किया है। केदारनाथ त्रासदी से पहले, 2012 में 5 लाख 70 हजार लोगों ने दर्शन किया था और ये उस समय का एक रिकॉर्ड था, 2012 में यात्रियों की संख्या का एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड था। जबकि कोरोना काल शुरू होने से पहले, 2019 में 10 लाख से ज्यादा लोग केदारनाथ जी के दर्शन करने पहुंचे थे। यानि केदार धाम के पुनर्निर्माण ने ना सिर्फ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ाई बल्कि वहां के लोगों को रोजगार-स्वरोजगार के भी अनेकों अवसर उपलब्ध कराए हैं।

साथियों,

पहले जब भी मैं उत्तराखंड आता था, या उत्तराखंड आने-जाने वालों से मिलता था, वो कहते थे- मोदी जी दिल्ली से देहरादून की यात्रा गणेशपुर तक तो बड़ी आसानी से हो जाती है, लेकिन गणेशपुर से देहरादून तक बड़ी मुश्किल होती है। आज मुझे बहुत खुशी है कि दिल्ली-देहरादून इकॉनॉमिक कॉरिडोर का शिलान्यास हो चुका है। जब ये बनकर तैयार हो जाएगा तो, दिल्ली से देहरादून आने-जाने में जो समय लगता है, वो करीब-करीब आधा हो जाएगा। इससे न केवल देहरादून के लोगों को फायदा पहुंचेगा बल्कि हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत और मेरठ जाने वालों को भी सुविधा होगी। ये आर्थिक गलियारा अब दिल्ली से हरिद्वार आने-जाने के समय को भी कम कर देगा। हरिद्वार रिंग रोड परियोजना से हरिद्वार शहर को जाम की बरसों पुरानी समस्या से मुक्ति मिलेगी। इससे कुमांऊ क्षेत्र के साथ संपर्क भी और आसान होगा। इसके अलावा ऋषिकेश की पहचान, हमारे लक्ष्मण झूला पुल के समीप, एक नए पुल का शिलान्यास भी आज हुआ है।

भाइयों और बहनों,

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर्यावरण सुरक्षा के साथ विकास के हमारे मॉडल का भी प्रमाण होगा। इसमें एक तरफ उद्योगों का कॉरिडोर होगा तो इसी में एशिया का सबसे बड़ा elevated wildlife corridor भी बनेगा। ये कॉरिडोर यातायात तो सरल करेगा ही, जंगली जीवों को भी सुरक्षित आने-जाने में मदद करेगा।

साथियों,

उत्तराखंड में औषधीय गुण वाली जो जड़ी-बूटिया हैं, जो प्राकृतिक उत्पाद हैं, उनकी मांग दुनिया भर में है। अभी उत्तराखंड के इस सामर्थ्य का भी पूरा उपयोग नहीं हो सका है। अब जो आधुनिक इत्र और सुगंध प्रयोगशाला बनी है, वो उत्तराखंड के सामर्थ्य को और बढ़ाएगी।

भाइयों और बहनों,

हमारे पहाड़, हमारी संस्कृति-हमारी आस्था के गढ़ तो हैं ही, ये हमारे देश की सुरक्षा के भी किले हैं। पहाड़ों में रहने वालों का जीवन सुगम बनाना देश की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है। लेकिन दुर्भाग्य से दशकों तक जो सरकार में रहे, उनकी नीति और रणनीति में दूर-दूर तक ये चिंतन कहीं नहीं था। उनके लिए उत्तराखंड हो या हिन्‍दुस्‍तान के और क्षेत्र, उनका एक ही इरादा रहता था, अपनी तिजोरी भरना, अपने घर भरना, अपनों का ही खयाल रखना।

भाईयों और बहनों,

हमारे लिए उत्तराखंड, तप और तपस्या का मार्ग है। साल 2007 से 2014 के बीच जो केंद्र की सरकार थी, उसने सात साल में उत्तराखंड में केवल, हमारे पहले जो सरकार थी उसने 7 साल में क्‍या काम किया? पहले की सरकार ने 7 साल में उत्तराखंड में केवल 288, 300 किलोमीटर भी नहीं, केवल 288 किलोमीटर नेशनल हाईवे बनाए थे। जबकि हमारी सरकार ने अपने सात साल में उत्तराखंड में 2 हजार किलोमीटर से अधिक लंबाई के नेशनल हाईवे का निर्माण किया है। आज बताइए भाईयों-बहनों, इसे आप काम मानते हैं या नहीं मानते हैं? क्‍या इसमें लोगों की भलाई है कि नहीं है? इससे उत्तराखंड का भला होगा कि नहीं होगा? आपकी भावी पीढ़ियों का भला होगा कि नहीं होगा? उत्तराखंड के नौजवानों का भाग्‍य खुलेगा कि नहीं खुलेगा? इतना ही नहीं, पहले की सरकार ने उत्तराखंड में नेशनल हाईवे पर 7 साल में 600 करोड़ के आसपास खर्च किया। अब जरा सुन लीजिए जबकि हमारी सरकार इन सात साढ़े सात साल में 12 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर चुकी है, कहां 600 करोड़ और कहां 12000 करोड़ रुपया। आप मुझे बताइए, हमारे लिये उत्तराखंड प्राथमिकता है कि नहीं है? आपको विश्‍वास हो रहा है कि नहीं हो रहा है? हमने करके दिखाया है कि नहीं दिखाया? हम जी-जान से उत्तराखंड के लिये काम करते हैं कि नहीं करते हैं?

और भाइयों और बहनों,

ये सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है। जब इंफ्रास्ट्रक्चर के इतने बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम होता है, तो कितनी चीजों की जरूरत होती है। सीमेंट चाहिए, लोहा चाहिए, लकड़ी चाहिए, ईंट चाहिए, पत्‍थर चाहिए, मजदूरी करने वाले लोग चाहिए, उद्यमी लोग चाहिए, स्थानीय युवाओं को अनेक प्रकार का लाभ का अवसर पैदा होता है। इन कामों में जो श्रमिक लगते हैं, इंजीनियर लगते हैं, मैनेजमेंट लगता है, वो भी अधिकतर स्थानीय स्तर पर ही जुटाए जाते हैं। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर के ये प्रोजेक्ट, अपने साथ उत्तराखंड में रोजगार का एक नया इकोसिस्टम बना रहे हैं, हजारों युवाओं को रोजगार दे रहे हैं। आज मैं गर्व से कह सकता हूं, पांच साल पहले मैंने कहा था, जो कहा था उसको दोबारा याद कराने की ताकत राजनेताओं में जरा कम होती है, मुझ में है। याद कर लेना मैंने क्‍या कहा था और आज मैं गर्व से कह सकता हूं उत्तराखंड क पाणी और जवनि उत्तराखंड क काम ही आली !

साथियों,

सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी पहले की सरकारों ने उतनी गंभीरता से काम नहीं किया, जितना करना चाहिए था। बॉर्डर के पास सड़कें बनें, पुल बनें, इस ओर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वन रैंक वन पेंशन हो, आधुनिक अस्त्र-शस्त्र हो, या फिर आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देना हो, जैसे उन लोगों ने हर स्तर पर सेना को निराश करने की, हतोत्साहित करने की मानो कसम खा रखी थी। लेकिन आज जो सरकार है, वो दुनिया के किसी देश के दबाव में नहीं आ सकती। हम राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम के मंत्र पर चलने वाले लोग हैं। हमने सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में सैकड़ों किलोमीटर नई सड़कें बनाई हैं। मौसम और भूगोल की कठिन परिस्थितियों के बावजूद ये काम तेजी से किया जा रहा है। और ये काम कितना अहम है, ये उत्तराखंड का हर परिवार, फौज में अपने बच्चों को भेजने वाला परिवार, ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है।

साथियों,

एक समय पहाड़ पर रहने वाले लोग, विकास की मुख्य धारा से जुड़ने का सपना ही देखते रह जाते थे। पीढ़ियां बीत जाती थीं,वो यही सोचते थे हमें कब पर्याप्त बिजली मिलेगी, हमें कब पक्के घर बनकर मिलेंगे? हमारे गांव तक सड़क आएगी या नहीं? अच्छी मेडिकल सुविधा मिलेगी या नहीं और पलायन का सिलसिला आखिरकार कब रुकेगा? जाने कितने ही प्रश्न यहां के लोगों के मन में थे।

लेकिन साथियों,

जब कुछ करने का जूनून हो तो सूरत भी बदलती हैं और सीरत भी बदलती हैं। और आपका ये सपना पूरा करने के लिए हम दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। आज सरकार इस बात का इंतजार नहीं करती कि नागरिक उसके पास अपनी समस्या लेकर आएंगे तब सरकार कुछ सोचेगी और कदम उठाएगी। अब सरकार ऐसी है जो सीधे नागरिकों के पास जाती हैं। आप याद करिए, एक समय था जब उत्तराखंड में सवा लाख घरों में नल से जल पहुंचता था। आज साढ़े 7 लाख से भी अधिक घरों में नल से जल पहुंच रहा है। अब घर में किचन तक नल से जल आए हैं तो ये माताएं-बहनें मुझे आशीर्वाद देंगी कि नहीं देंगी? हम सबको आशीर्वाद देंगे कि नहीं देंगे? नल से जल आता है तो माताओं-बहनों का कष्ट दूर होता है कि नहीं होता है? उनको सुविधा मिलती है कि नहीं मिलती है? और ये काम, जल जीवन मिशन शुरू होने के दो साल के भीतर-भीतर हमने कर दिया है। इसका बहुत बड़ा लाभ उत्तराखंड की माताओं को बहनों को, यहां की महिलाओं को हुआ है। उत्तराखंड की माताओं-बहनों-बेटियों ने हमेशा हम सभी पर इतना स्नेह दिखाया है। हम सभी दिन रात परिश्रम करके, ईमानदारी से काम करके, हमारी इन माताओं-बहनों का जीवन आसान बनाकर, उनका ऋण चुकाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

साथियों,

डबल इंजन की सरकार में उत्तराखंड के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी अभूतपूर्व काम हो रहा है। उत्तराखंड में 3 नए मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए गए हैं। इतने छोटे से राज्‍य में तीन नए मेडिकल कॉलेज आज हरिद्वार मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास भी किया गया है। ऋषिकेश एम्स तो सेवाएं दे ही रहा है, कुमाऊं में सैटेलाइट सेंटर भी जल्द ही सेवा देना शुरु कर देगा। टीकाकरण के मामले में भी उत्तराखंड आज देश के अग्रणी राज्यों में है और इसके लिये मैं धामी जी को, उनके साथियों को पूरी उत्तराखंड की सरकार को बधाई देता हूं। और इसके पीछे भी बेहतर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की बहुत बड़ी भूमिका है। इस कोरोना काल में उत्तराखंड में 50 से अधिक नए ऑक्सीजन प्लांट्स भी लगाए गए हैं।

साथियों,

बहुत से लोग चाहते हैं, आप में से सबके मन में विचार आता होगा, हर कोई चाहता होगा उसकी संतान डॉक्टर बने, उसकी संतान इंजीनियर बने, उनकी संतान मैनेजमेंट के क्षेत्र में जाए। लेकिन अगर नए संस्थान बने ही नहीं, सीटों की संख्या बढ़े ही नहीं, तो आपका सपना पूरा हो सकता है क्‍या, आपका बेटा डॉक्‍टर बन सकता है क्‍या, आपका बेटी डॉक्‍टर बन सकती है क्‍या? आज देश में बन रहे नए मेडिकल कॉलेज, नई IIT, नए IIM, विद्यार्थियों के लिए प्रोफेशनल कोर्स की बढ़ रही सीटें, देश की वर्तमान और भावी पीढ़ी के भविष्य को मजबूत करने का काम कर रही हैं। हम सामान्य मानवी के सामर्थ्य को बढ़ाकर, उसे सशक्त करके, उसकी क्षमता बढ़ाकर, उसे सम्मान के साथ जीने के नए अवसर दे रहे हैं।

साथियों,

समय के साथ हमारे देश की राजनीति में अनेक प्रकार की विकृतियां आ गई है और आज इस बारे में भी मैं उत्तराखंड की पवित्र धरती पर कुछ बात बताना चाहता हूं। कुछ राजनीतिक दलों द्वारा, समाज में भेद करके, सिर्फ एक तबके को, चाहे वो अपनी जाति का हो, किसी खास धर्म का हो, या अपने छोटे से इलाके के दायरे का हो, उसी की तरफ ध्‍यान देना। यही प्रयास हुए हैं और उसमें ही उनको वोटबैंक नजर आती है। इतना संभाल लो, वोटबैंक बना दो, गाड़ी चलती रहेगी। इन राजनीतिक दलों ने एक और तरीका भी अपनाया है। उनकी विकृतियों का एक रूप ये भी है और वो रास्‍ता है जनता को मजबूत नहीं होने देना, बराबर कोशिश करना कि जनता कभी मजबूत ना हो जाए। वे तो यही चाहते रहे, ये जनता-जनार्दन हमेशा मजबूर बनी रहे, मजबूर बनाओ, जनता को अपना मोहताज बनाओ ताकि उनका ताज सलामत रहे। इस विकृत राजनीति का आधार रहा कि लोगों की आवश्यकताएं पूरी ना करो। उन्‍हें आश्रित बनाकर रखो। इनके सारे प्रयास इसी दिशा में हुए कि जनता-जनार्दन को ताकतवर नहीं बनने देना है। दुर्भाग्य से, इन राजनीतिक दलों ने लोगों में ये सोच पैदा कर दी कि सरकार ही हमारी माई-बाप है, अब जो कुछ भी मिलेगा सरकार से ही मिलेगा, तभी हमारा गुजारा होगा। लोगों के मन में भी ये घर कर गया। यानि एक तरह से देश के सामान्य मानवी का स्वाभिमान, उसका गौरव सोची-समझी रणनीति के तहत कुचल दिया गया, उसे आश्रित बना दिया गया और दुखद ये कि ये सब करते रहे और कभी किसी को भनक तक नहीं आने दी। लेकिन इस सोच, इस अप्रोच से अलग, हमने एक नया रास्ता चुना है। हमने जो रास्‍ता चुना है वो मार्ग कठिन है, वो मार्ग मुश्किल है, लेकिन देशहित में है, देश के लोगों के हित में है। और हमारा मार्ग है - सबका साथ-सबका विकास। हमने कहा कि जो भी योजनाएं लाएंगे सबके लिए लाएंगे, बिना भेदभाव के लाएंगे। हमने वोटबैंक की राजनीति को आधार नहीं बनाया बल्कि लोगों की सेवा को प्राथमिकता दी। हमारी अप्रोच रही कि देश को मजबूती देनी है। हमारा देश कब मजबूत होगा? जब हर परिवार मजबूत होगा। हमने ऐसे समाधान निकाले, ऐसी योजनाएं बनाईं जो भले वोटबैंक के तराजू में ठीक नहीं बैठें लेकिन वो बिना भेदभाव आपका जीवन आसान बनाएंगी, आपको नए अवसर देंगी, आपको ताकतवर बनाएंगी। और आप भी नहीं चाहेंगे कि आप अपने बच्चों के लिए एक ऐसा वातावरण छोड़ें जिसमें आपके बच्चे भी हमेशा आश्रित जीवन जीएं। जो मुसीबतें आपको विरासत में मिलीं, जिन कठिनाइयों में आपको जिन्‍दगी गुजारनी पड़ी आप भी नहीं चाहेंगे कि आप वो विरासतें, वो मुसीबतें बच्चों को वैसे ही देकर के जाएं। हम आपको आश्रित नहीं, आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। जैसे हमने कहा था कि जो हमारा अन्नदाता है, वो ऊर्जादाता भी बने। तो इसके लिए हम खेत के किनारे मेढ पर सोलर पैनल लगाने की कुसुम योजना लेकर के आए। इससे किसान को खेत में ही बिजली पैदा करने की सुविधा हुई। ना तो हमने किसान को किसी पर आश्रित किया और ना ही उसके मन में ये भाव आया कि मैं मुफ्त की बिजली ले रहा हूं। और इस प्रयास में भी उसको बिजली भी मिली और देश पर भी भार नहीं आया और वो एक तरह से आत्मनिर्भर बना और ये योजना देश के कई जगह पर हमारे किसानों ने लागू की है। इसी तरह से हमने देशभर में उजाला योजना शुरू की थी। कोशिश थी कि घरों में बिजली का बिल कम आए। इसके लिए देशभर में और यहां उत्तराखंड में करोड़ों LED बल्ब दिए गए और पहले LED बल्ब, 300-400 रुपए के आते थे, हम उनको 40-50 रुपए तक लेकर के आ गए। आज लगभग हर घर में LED बल्ब इस्तेमाल हो रहे हैं और लोगों का बिजली का बिल भी कम हो रहा है। अनेकों घरों में जो मध्‍यम वर्ग, निम्‍न मध्‍यम वर्ग के परिवार हैं, हर महीने 500-600 रुपए तक बिजली बिल कम हुआ है।

साथियों,

इसी प्रकार से हमने मोबाइल फोन सस्ता किया, इंटरनेट सस्ता किया, गांव-गांव में कॉमन सर्विस सेंटर खोले जा रहे हैं, अनेक सुविधाएं गांव में पहुंची हैं। अब गांव के आदमी को रेलवे का रिजर्वेशन कराना हो तो उसे शहर नहीं आना पड़ता, एक दिन खराब नहीं करना पड़ता, 100-200-300 रुपया बस का किराया नहीं देना पड़ता। वो अपने गांव में ही कॉमन सर्विस सेंटर से ऑनलाइन रेलवे का बुकिंग करवा सकता है। उसी प्रकार से आपने देखा होगा अब उत्तराखंड में होम स्टे, लगभग हर गांव में उसकी बात पहुंच चुकी है। अभी कुछ समय पहले मुझे उत्तराखंड के लोगों से बात करने का मौका भी मिला था, जो बहुत सफलता के साथ होम स्टे चला रहे हैं। जब इतने यात्री आएंगे, पहले की तुलना में दोगुना-तीन गुना यात्री आना शुरू हुआ है। जब इतने यात्री आएंगे, तो होटल की उपलब्धता का सवाल भी स्वाभाविक है और रातों रात इतने होटल भी नहीं बन सकते लेकिन हर घर में एक कमरा बनाया जा सकता है अच्छी सुविधाओं के साथ बनाया जा सकता है। और मुझे विश्वास है, उत्तराखंड, होमस्टे बनाने में, सुविधाओं के विस्तार में, पूरे देश को एक नई दिशा दिखा सकता है।

साथियों,

इसी तरह का परिवर्तन हम देश के हर कोने में ला रहे हैं। इस तरह के परिवर्तन से देश 21वीं सदी में आगे बढ़ेगा, इसी तरह का परिवर्तन उत्तराखंड के लोगों को आत्मनिर्भर बनाएगा।

साथियों,

समाज की जरूरत के लिए कुछ करना और वोटबैंक बनाने के लिए कुछ करना, दोनों में बहुत बड़ा फर्क होता है। जब हमारी सरकार गरीबों को मुफ्त घर बनाकर देती है, तो वो उसके जीवन की सबसे बड़ी चिंता दूर करती है। जब हमारी सरकार गरीबों को 5 लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा देती है, तो वो उसकी जमीन बिकने से बचाती है, उसे कर्ज के कुचक्र में फंसने से बचाती है। जब हमारी सरकार कोरोना काल में हर गरीब को मुफ्त अनाज सुनिश्चित करती है तो वो उसे भूख की मार से बचाने का काम करती है। मुझे पता है कि देश का गरीब, देश का मध्यम वर्ग, इस सच्चाई को समझता है। तभी हर क्षेत्र, हर राज्य से हमारे कार्यों को, हमारी योजनाओं को जनता जनार्दन का आशीर्वाद मिलता है और हमेशा मिलता रहेगा।

साथियों,

आज़ादी के इस अमृत काल में, देश ने जो प्रगति की रफ़्तार पकड़ी है वो अब रुकेगी नहीं, अब थमेगी नहीं और ये थकेगी भी नहीं, बल्कि और अधिक विश्वास और संकल्पों के साथ आगे बढ़ेगी। आने वाले 5 वर्ष उत्तराखंड को रजत जयंती की तरफ ले जाने वाले हैं। ऐसा कोई लक्ष्य नहीं जो उत्तराखंड हासिल नहीं कर सकता। ऐसा कोई संकल्प नहीं जो इस देवभूमि में सिद्ध नहीं हो सकता। आपके पास धामी जी के रूप में युवा नेतृत्व भी है, उनकी अनुभवी टीम भी है। हमारे पास वरिष्‍ठ नेताओं की बहुत बड़ी श्रृंखला है। 30-30 साल, 40-40 साल अनुभव से निकले हुए नेताओं की टीम है जो उत्तराखंड के उज्‍जवल भविष्‍य के लिए समर्पित है।

और मेरे प्‍यारे भाईयों-बहनों,

जो देशभर में बिखर रहे हैं, वो उत्तराखंड को निखार नहीं सकते हैं। आपके आशीर्वाद से विकास का ये डबल इंजन उत्तराखंड का तेज़ विकास करता रहेगा, इसी विश्वास के साथ, मैं फिर से आप सबको बधाई देता हूं। आज जब देव भूमि में आया हूँ, वीर माताओ की भूमि में आया हूँ, तो कुछ भाव पुष्प, कुछ श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ, मैं कुछ पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं-

जहाँ पवन बहे संकल्प लिए,

जहाँ पर्वत गर्व सिखाते हैं,

जहाँ ऊँचे नीचे सब रस्ते

बस भक्ति के सुर में गाते हैं

उस देव भूमि के ध्यान से ही

उस देव भूमि के ध्यान से ही

मैं सदा धन्य हो जाता हूँ

है भाग्य मेरा,

सौभाग्य मेरा,

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

और धन्य धन्य हो जाता हूँ।

तुम आँचल हो भारत माँ का

जीवन की धूप में छाँव हो तुम

बस छूने से ही तर जाएँ

सबसे पवित्र वो धरा हो तुम

बस लिए समर्पण तन मन से

मैं देव भूमि में आता हूँ

मैं देव भूमि में आता हूँ

है भाग्य मेरा

सौभाग्य मेरा

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ।

और धन्य धन्य हो जाता हूँ।

जहाँ अंजुली में गंगा जल हो

जहाँ हर एक मन बस निश्छल हो

जहाँ गाँव गाँव में देश भक्त

जहाँ नारी में सच्चा बल हो

उस देवभूमि का आशीर्वाद लिए

मैं चलता जाता हूँ

उस देवभूमि का आशीर्वाद लिए

मैं चलता जाता हूँ

है भाग्य मेरा

सौभाग्य मेरा

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मंडवे की रोटी

हुड़के की थाप

हर एक मन करता

शिवजी का जाप

ऋषि मुनियों की है

ये तपो भूमि

कितने वीरों की

ये जन्म भूमि

में देवभूमि में आता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मैं तुमको शीश नवाता हूँ

और धन्य धन्य हो जाता हूँ

मेरे साथ बोलिये, भारत माता की जय ! भारत माता की जय ! भारत माता की जय !

बहुत-बहुत धन्यवाद !