“वृद्धिशील परिवर्तन का समय बीत चुका है; हमें स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक प्रणालियों में बदलाव करने की जरूरत है”
“भारत में हमने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के वित्तपोषण के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है”
“’प्रतिक्रिया की तैयारी’ की तरह, हमें ‘उबरने की तैयारी’ पर जोर देने की जरूरत है”

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव श्री प्रमोद कुमार मिश्र ने आज चेन्नई में जी20 आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यसमूह की तीसरी बैठक को संबोधित किया।

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव ने इस साल मार्च में गांधीनगर में पहली बार हुई बैठक को याद किया और तब से हुई जलवायु-परिवर्तन से संबंधित अभूतपूर्व आपदाओं के बारे में बताया। उन्होंने पूरे उत्तरी गोलार्ध में भीषण गर्मी की लहरों, कनाडा के जंगलों में आग एवं उसके बाद उत्तरी अमेरिका के विभिन्न हिस्सों में स्थित शहरों को प्रभावित करने वाली धुंध और भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तटों पर हुई प्रमुख चक्रवाती हलचलों का उदाहरण दिया। प्रधान सचिव ने दिल्ली द्वारा पिछले 45 वर्षों में बाढ़ की सबसे गंभीर स्थिति का सामना किए जाने के बारे में भी चर्चा की।

प्रधान सचिव ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं के प्रभाव बहुत व्यापक एवं अपनी प्रकृति में परस्पर जुड़े हुए हैं और ये प्रभाव पहले से ही हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। दुनिया के सामने आने वाली चुनौतियों और पूरी धरती पर सभी को प्रभावित करने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, प्रधान सचिव ने जी20 आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यसमूह के महत्व को रेखांकित किया। हालाँकि कार्यसमूह ने काफी प्रगति की है और अच्छी गति पकड़ी है, प्रमुख सचिव ने दुनिया के सामने आने वाली समस्याओं के पैमाने और उससे संबंधित महत्वाकांक्षाओं के बीच उपयुक्त सामंजस्य बैठाने पर जोर दिया। उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि वृद्धिशील परिवर्तन का समय अब ​​बीत चुका है और आपदा संबंधी नए जोखिमों को निर्मित होने से रोकने तथा मौजूदा जोखिमों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने हेतु स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक प्रणालियों में बदलाव के लिए माहौल तैयार हो चुका है।

अपने सामूहिक प्रभाव को अधिकतम करने के लिए भिन्न राष्ट्रीय एवं वैश्विक प्रयासों के बीच समन्वय की जरूरत पर प्रकाश डालते हुए, प्रधान सचिव ने संकीर्ण संस्थागत दृष्टिकोण से प्रेरित विखंडित प्रयासों के बजाय समस्याओं के समाधान वाला दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव की “सभी के लिए प्रारंभिक चेतावनी” पहल की सराहना की और बताया कि जी20 ने “प्रारंभिक चेतावनी और प्रारंभिक कार्रवाई" को पांच प्राथमिकताओं में से एक के रूप में पहचाना है और वह इस दिशा में अपना पूरा जोर लगा रहा है।

आपदा जोखिम न्यूनीकरण से संबंधित वित्तपोषण के संदर्भ में बोलते हुए, प्रधान सचिव ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण से संबंधित सभी पहलुओं के वित्तपोषण के लिए सभी स्तरों पर व्यवस्थित तंत्र को प्रश्रय देने पर जोर दिया। प्रधान सचिव ने कहा कि भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आपदा जोखिम न्यूनीकरण के वित्तपोषण की प्रक्रिया को पूरी तरह से बदल दिया गया है और न केवल आपदा संबंधी प्रतिक्रिया बल्कि आपदा से निपटने, उसकी तैयारी और उबरने की प्रक्रिया के वित्तपोषण के लिए एक पूर्वानुमानित एवं व्यवस्थित तंत्र मौजूद है। प्रधान सचिव ने पूछा, “क्या हम वैश्विक स्तर पर भी ऐसी ही व्यवस्था कर सकते हैं?” उन्होंने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए उपलब्ध वित्तपोषण की विभिन्न धाराओं के बीच और अधिक समन्वय की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु वित्त को आपदा जोखिम न्यूनीकरण से संबंधित वित्तपोषण का एक अभिन्न अंग होना चाहिए। प्रमुख सचिव ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण से संबंधित जरूरतों के लिए निजी वित्त जुटाने की चुनौती का हल निकालने पर जोर दिया। श्री मिश्र ने एक प्रश्न पूछा, “सरकारों को आपदा जोखिम न्यूनीकरण से संबंधित कार्यों के लिए निजी वित्त को आकर्षित करने हेतु किस प्रकार का अनुकूल वातावरण बनाना चाहिए? जी20 कैसे इस दिशा में गति उत्पन्न कर सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण के मामले में निजी निवेश न केवल कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति हो, बल्कि इन फर्मों के मुख्य व्यवसाय का हिस्सा भी बने?”

प्रधान सचिव ने कुछ साल पहले विभिन्न जी20 देशों, संयुक्त राष्ट्र और अन्य के साथ साझेदारी में स्थापित ‘आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे से संबंधित गठबंधन’ के लाभों पर प्रकाश डाला। इस गठबंधन के कामकाज के बारे में बोलते हुए, प्रधान सचिव ने कहा कि यह छोटे द्वीपीय विकासशील देशों सहित विभिन्न देशों को बुनियादी ढांचे के विकास में अधिक जोखिम-सूचित निवेश करते हुए अपने मानकों को उन्नत करने के लिए बेहतर जोखिम मूल्यांकन और मेट्रिक्स बनाने के बारे में सूचित करता है। उन्होंने ऐसे पहलों को डिजाइन करते समय इन विचारों को आगे बढ़ाने और प्रायोगिक परीक्षणों से परे जाकर सोचने की दिशा में काम करने पर जोर दिया। उन्होंने आपदाओं के बाद ‘बेहतर तरीके से फिर से निर्माण करने’ से जुड़ी कुछ अच्छी कार्यप्रणालियो को संस्थागत बनाने और ‘प्रतिक्रिया की तैयारी’ की तरह ही वित्तीय व्यवस्था, संस्थागत तंत्र और क्षमताओं द्वारा समर्थित ‘उबरने की तैयारी’ को अपनाने की जरूरत को रेखांकित किया।

प्रधान सचिव ने इस कार्यसमूह द्वारा अपनाई गई सभी पांच प्राथमिकताओं से संबंधित प्रदेयों पर हुई महत्वपूर्ण प्रगति पर संतोष व्यक्त किया। अगले कुछ दिनों के दौरान चर्चा की जाने वाली विज्ञप्ति के शून्य मसौदे के बारे में बोलते हुए, श्री मिश्र ने बताया कि यह जी20 देशों के लिए आपदा जोखिम न्यूनीकरण के संबंध में एक बहुत ही स्पष्ट और रणनीतिक एजेंडा सामने रखता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पिछले चार महीनों में इस कार्यसमूह के विचार-विमर्श के दौरान जो समन्वय, सर्वसम्मति और सह-निर्माण की भावना विकसित हुई है, वह अगले तीन दिनों के दौरान और उसके बाद भी प्रबल रहेगी।

प्रधान सचिव ने इस प्रयास में ज्ञान से जुड़े भागीदारों से प्राप्त होने वाले निरंतर समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया और विशेष रूप से इस कार्यसमूह के कार्य में सहयोग करने में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि सुश्री ममी मिज़ुटोरी की व्यक्तिगत भागीदारी की सराहना की। उन्होंने इस कार्यसमूह के एजेंडे को आकार देने में ट्रोइका की भागीदारी पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि भारत ने इंडोनेशिया, जापान और मैक्सिको सहित पहले के अध्यक्ष देशों द्वारा रखी गई नींव पर आधारित एजेंडा को आगे बढ़ाया है और ब्राजील में भी इसे आगे बढ़ाए जाने की आशा व्यक्त की। प्रधान सचिव ने इस बैठक में ब्राजील के सचिव वोल्नेई का स्वागत किया और आगे बढ़ने की प्रक्रिया में भारत के पूर्ण समर्थन एवं जुड़ाव का आश्वासन भी दिया।

प्रधान सचिव ने कहा कि जी20 की भारत की अध्यक्षता के पिछले आठ महीनों के दौरान पूरे देश ने बेहद उत्साह से भाग लिया है और अब तक देश भर में 56 स्थानों पर 177 बैठकें आयोजित की गई हैं। उन्होंने भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विविधता की झलक पाने के साथ-साथ विचार-विमर्श में प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी पर प्रकाश डाला। अपने संबोधन को समाप्त करते हुए, प्रधान सचिव ने कहा, “जी20 के एजेंडे के महत्वपूर्ण पहलुओं में काफी प्रगति हुई है। मुझे यकीन है कि डेढ़ महीने बाद होने वाली शिखर बैठक एक ऐतिहासिक कार्यक्रम होगा। इसकी परिणति में आप सभी का योगदान बेहद महत्वपूर्ण होगा।”

इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि सुश्री ममी मिज़ुटोरी; भारत के जी20 शेरपा श्री अमिताभ कांत; जी20 के साथ-साथ आमंत्रित देशों के सदस्यों; अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अधिकारी; कार्यसमूह के अध्यक्ष श्री कमल किशोर; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान और गृह मंत्रालय के अधिकारी उपस्थित थे।

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INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक का सेवा में शामिल होना भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता का प्रतीक: कोलकाता में पीएम मोदी
June 21, 2026
भारतीय नौसेना में आईएनएस अग्रय, आईएनएस दूनागिरी और आईएनएस संशोधक को शामिल किया गया है: प्रधानमंत्री
आज 21 जून को वर्ल्ड हाइड्रो-ग्राफीडे के रूप में भी मनाया जाता है और ये बहुत ही अद्भुत संयोग है, कि आज के दिन हमने भारत के सबसे एडवांस्ड हाइड्रो-ग्राफीक जहाज, INS संशोधक को कमीशन किया है: पीएम मोदी
जिस देश का समुद्री सामर्थ्य मजबूत होगा, उसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत होगा; भारत इस सच्चाई को समझता है और उसी के अनुसार खुद को तैयार कर रहा है: पीएम मोदी
INS विक्रांत से लेकर INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक के कमीशनिंग होने तक की यात्रा भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता का प्रतिबिंब है: पीएम मोदी
भारत ने शिपबिल्डिंग के क्षेत्र के लिए एक नई सोच के साथ आगे बढ़ना शुरू किया है; घरेलू निर्माण क्षमता को बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं: पीएम मोदी
शिपबिल्डिंग, शिप रिपेयर, शिप रिसाईक्लिंग तथा MRO को एक बड़े राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखा जा रहा है: पीएम मोदी
भारत समुद्र को सहयोग के माध्यम के रूप में देखता है, लेकिन यह भी जानता है कि ताकत शांति की रक्षा करती है, सुरक्षा समृद्धि की रक्षा करती है और आत्मनिर्भरता भविष्य का निर्माण करती है: पीएम मोदी
आज, आईएनएस अग्रय, आईएनएस दूनागिरी और आईएनएस संशोधक इसी भावना के प्रतीक के रूप में भारतीय नौसेना में शामिल किए गए: प्रधानमंत्री

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर एन रवि जी, यहां के ऊर्जावान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी जी, चीफ ऑफ नेवल स्टाफ कृष्णा स्वामीनाथन जी, उपस्थित देवियों और सज्जनों!

 

आज का दिन कई मायनों में विशेष है। आज पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है। मुझे प्रसन्नता है कि इसी अवसर पर मुझे बंगाल की इस महान भूमि पर आने का अवसर मिला। यह वह भूमि है, जिसने भारत के विचारों को नई दिशा दी है। जिसने भारत के पुनर्जागरण को गति दी है, और जिसने सदियों तक भारत को समुद्र के रास्ते दुनिया से जोड़ा है। आज इसी धरती पर आत्मनिर्भर भारत, सुरक्षित भारत और विकसित भारत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम हो रहा है। कुछ देर पहले INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया है। वैसे आज 21 जून को “वर्ल्ड हाइड्रो-ग्राफीडे” के रूप में भी मनाया जाता है। और यह बहुत ही अद्भुत संयोग है, कि आज के दिन हमने भारत का सबसे एडवांस्ड हाइड्रो-ग्राफी जहाज़ “INS संशोधक” कमीशन किया है। मैं भारतीय नौसेना को, इन परियोजनाओं से जुड़े सभी वैज्ञानिकों को, इंजीनियरों को, श्रमिकों को और मेरे प्यारे देशवासियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं, बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

 

साथियों,

दुनिया गवाह है कि मैरीटाइम क्षमता के बिना कोई भी राष्ट्र बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। समुद्र से विकास जुड़ा है, सुरक्षा जुड़ी है, समृद्धि जुड़ी है। आज दुनिया का अधिकांश व्यापार समुद्री मार्गों से ही होता है। दुनिया को जोड़ने वाले डेटा के विशाल नेटवर्क समुद्र के नीचे से गुजरते हैं। आने वाले समय में, क्रिटिकल मिनरल्स, डीप-सी रिसोर्सेज और नई ऊर्जा के स्रोत भी समुद्र से ही जुड़ेंगे। इसलिए जिस देश का समुद्री सामर्थ्य मजबूत होगा, उसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत होगा। और भारत इस वास्तविकता को अच्छी तरह से समझता है। भारत इसके लिए स्वयं को तैयार कर रहा है। और आज का ये दिन इस बात का साक्षी है कि हमारी क्षमता क्या है, हमारा कौशल क्या है।

साथियों,

कुछ वर्ष पहले जब हमने INS विक्रांत को राष्ट्र को समर्पित किया था, तब भारत ने अपने समुद्री सामर्थ्य के नए अध्याय का उद्घोष किया था, विश्वभर के सामने हमारे सामर्थ्य का वो उद्घोष था। INS विक्रांत से लेकर आज तक की यात्रा केवल नए युद्धपोतों की यात्रा नहीं है। यह भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता की यात्रा भी है। आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक उसी यात्रा को नई गति दे रहे हैं। ये तीनों पोत, भारत के तीन महत्वपूर्ण संकल्पों के भी प्रतीक हैं। इनका निर्माण भारत में हुआ है। इनकी डिज़ाइन भारत में तैयार हुई है। इनके निर्माण में भारतीय उद्योगों की प्रतिभा लगी है। भारतीय इंजीनियरों का कौशल लगा है। भारतीय श्रमिकों का परिश्रम लगा है। और यही नए भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

साथियों,

आज भारत रक्षा क्षेत्र में केवल खरीदार बनकर नहीं रहना चाहता। हमारी सैन्य शक्ति दुनिया के लिए बाजार नहीं बन सकती। मेरी शक्ति की पहचान विश्व के बाजार बनने से नहीं है, मेरी शक्ति की सामर्थ्य की पहचान मेरी आत्मनिर्भरता पर है। भारत निर्माता बनना चाहता है। और जिस दिन निर्माता होंगे ना, उस दिन हम निर्णायक भी होंगे। और इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। बीते वर्षों में 40 से अधिक मेड इन इंडिया युद्धपोत और पनडुब्बियां नौसेना में शामिल हुई हैं। यानी लगभग हर कुछ सप्ताह में भारतीय नौसेना को एक नई शक्ति मिली है। वर्तमान में भी 45 बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्माणाधीन हैं। यह केवल संख्या नहीं है। यह भारत की औद्योगिक क्षमता का प्रमाण है। यह भारत के भविष्य का संकेत है।

साथियों,

आने वाले वर्षों में भारत का Maritime Sector लाखों नए रोजगार तैयार करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि हम Maritime Sector को केवल एक सेक्टर, isolated sector नहीं मानते। हम इसे विकसित भारत के रोजगार इंजन के रूप में देखते हैं। एक आधुनिक जहाज़ में सैकड़ों टन स्टील लगता है, इलेक्ट्रॉनिक्स लगते हैं, मशीनरी लगती है, हजारों पुर्जे लगते हैं। और इन सबके पीछे हजारों कंपनियां काम करती हैं, यानी हजारों युवाओं को रोजगार भी मिलता है। आज जिन तीन जहाजों की कमीशनिंग हुई है, उनके निर्माण में 200 से अधिक MSMEs ने योगदान दिया है। हम कल्पना कर सकते हैं कि कितनी बड़ी संख्या में इन 200 MSME में, इन लघु उद्योगों में रोजगार पैदा हुआ होगा।

साथियों,

अब समय आ गया है कि भारत समुद्री शक्ति के अगले चरण में प्रवेश करे। इसलिए भारत ने शिपबिल्डिंग के क्षेत्र के लिए एक नई दृष्टि के साथ आगे बढ़ना शुरू किया है। हाल के वर्षों में अनेक पॉलिसी रिफॉर्म्स किए गए हैं। घरेलू निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। और शिपबिल्डिंग, शिप रिपेयर, शिप रिसाईक्लिंग तथा MRO को एक बड़े राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखा जा रहा है।

साथियों,

शिपिंग सेक्टर के लिए 70 हजार करोड़ रुपये का जो प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया गया है, वह केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं है। वह भारत के समुद्री भविष्य में निवेश है।वह भारत के औद्योगिक विस्तार में निवेश है।

साथियों,

भारत आज अपने पूरे Maritime Ecosystem को सशक्त बना रहा है। इसलिए, आज भारत अपने बंदरगाहों का आधुनिकीकरण कर रहा है। नई क्षमता तैयार कर रहा है। नई कनेक्टिविटी बना रहा है। नदी जलमार्गों का विस्तार कर रहा है। मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित कर रहा है। सागरमाला जैसे अभियान इसी व्यापक सोच का हिस्सा हैं। इससे व्यापार की लागत कम हो रही है। उद्योगों को नई गति मिल रही है और तटीय क्षेत्रों में नए अवसर बन रहे हैं।

साथियों,

एक समय था, जब भारत की पहचान दुनिया के सबसे बड़े डिफेंस इंपोर्टर्स, आयातकों में होती रही है। इस निर्भरता के कारण हमारे सामने रणनीतिक और सुरक्षा, दोनों तरह की चुनौतियां भी थीं। 2014 में सरकार बनने के बाद हमने स्थिति को बदलने का संकल्प लिया। इसके लिए नीतियों के स्तर पर बड़े रिफॉर्म किए गए, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी गई। इन प्रयासों का परिणाम है कि आज रक्षा क्षेत्र में डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट की नई संभावनाएं बनी हैं। 2014 तक देश का कुल डिफेंस प्रोडक्शन 40 हजार करोड़ रुपये के आसपास था। आज यह बढ़कर लगभग 1 लाख 80 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

और साथियों,

एक तरफ देश में रक्षा उत्पादन तेजी से बढ़ा है, दूसरी तरफ हमारा डिफेंस एक्सपोर्ट अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है। 2014 तक भारत करीब 700 करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादों का निर्यात करता था, Seven Hundred Crore। आज यह आंकड़ा बढ़कर करीब 40 हजार करोड़ रुपये पहुंच रहा है। भारत में बने रक्षा उपकरण अब दुनिया के 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं।

साथियों,

आत्मनिर्भरता की यात्रा में, अभी बहुत कुछ करना बाकी है। मेरे हिसाब से तो अभी ये शुरूआत है, लेकिन 12 साल में जो प्रगति हुई है, वो ये बताती है कि जब नीति स्पष्ट हो, जब दिशा ठीक हो, जब साथ साथ मिलकर काम करें तो देश में कितना बड़ा परिवर्तन हो सकता है।

साथियों,

जब समुद्री विरासत की बात होती है, तो बंगाल का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। यह भारत के समुद्री संपर्कों की भी महत्वपूर्ण भूमि रही है। हुगली की धाराओं ने इतिहास को बदलते हुए देखा है। व्यापार के नए अध्याय देखे हैं। विकास की नई यात्राएं देखी हैं। और संयोग देखिए, ये पोर्ट बंगाल के ही सपूत, देश के पहले उद्योग मंत्री, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर है।

साथियों,

भारत आज जिस नए समुद्री युग की ओर बढ़ रहा है। उसमें पश्चिम बंगाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है। यहां बंदरगाहों की क्षमता है, यहां उद्योगों की क्षमता है, यहां प्रतिभा है, यहां कौशल है, यहां समुद्री अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता है। मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षों में पश्चिम बंगाल, भारत की Blue Economy, Maritime Manufacturing, Logistics और Coastal Development का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।

साथियों,

भारत ने हमेशा से समुद्र को सहयोग का माध्यम माना है। लेकिन भारत ये भी जानता है कि शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी उतना ही आवश्यक है। समृद्धि की रक्षा के लिए सुरक्षा आवश्यक है। और भविष्य के निर्माण के लिए आत्मनिर्भरता अनिवार्य है। आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक इसी भावना के प्रतीक बनकर भारतीय नौसेना में शामिल हुए हैं। ये उस भारत के प्रतीक हैं जो 21वीं सदी में अपने सामर्थ्य को पहचान रहा है, जो अपनी क्षमताओं पर विश्वास कर रहा है, और जो दुनिया के सामने नए आत्मविश्वास के साथ तेज गति से ऊर्जा से भरे हुए संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है।

साथियों,

इस शुभ अवसर पर, मैं नेवी के सभी साथियों को, देश के सभी साथियों को, अनेक अनेक शुभकामनाएं देता हूं। मैं एक बार फिर भारतीय नौसेना को, सभी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, श्रमिकों और देशवासियों को हृदयपूर्वक बहुत-बहुत बधाई देता हूं। धन्यवाद।