थीम - 'अमृत काल: जीवंत भारत के लिए सहयोग के माध्यम से समृद्धि'

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस के अवसर पर 1 जुलाई को सुबह 11 बजे प्रगति मैदान, नई दिल्ली में 17वीं भारतीय सहकारी कांग्रेस को संबोधित करेंगे।

प्रधानमंत्री के "सहकार से समृद्धि" के विज़न में दृढ़ विश्वास से प्रेरणा लेकर, सरकार देश में सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए लगातार कदम उठा रही है। इस प्रयास को सशक्त बनाने के लिए सरकार ने एक अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन किया है। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की भागीदारी इस दिशा में एक और कदम है।

17वीं भारतीय सहकारी कांग्रेस का आयोजन 1-2 जुलाई, 2023 को किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सहकारी आंदोलन में विभिन्न रुझानों पर चर्चा करना, अपनाये जा रहे सर्वोत्तम तौर-तरीकों को प्रदर्शित करना, उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर विचार-विमर्श करना और भारत के सहकारी आंदोलन के विकास के लिए भविष्य की नीतिगत दिशा तैयार करना है। "अमृत काल: जीवंत भारत के लिए सहयोग के माध्यम से समृद्धि" के मुख्य विषय पर सात तकनीकी सत्र आयोजित होंगे। इसमें प्राथमिक स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की सहकारी समितियों, अंतर्राष्ट्रीय सहकारी संगठनों के प्रतिनिधियों, अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन के प्रतिनिधियों, तथा मंत्रालयों, विश्वविद्यालयों व प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रतिनिधियों समेत 3600 से अधिक हितधारकों की भागीदारी होगी।

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प्रधानमंत्री ने सत्य की विजय पर जोर देते हुए संस्कृत सुभाषितम् साझा किया
March 12, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने उन सभी महान विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने वर्ष 1930 में आज ही के दिन शुरू हुए दांडी मार्च में भाग लिया था।

प्रधानमंत्री ने सत्य की विजय पर बल देने वाले एक संस्कृत सुभाषितम् को भी साझा किया:

“सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।

येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥”

सुभाषितम् का संदेश है कि सत्य की सदैव विजय होती है और असत्य अंततः नष्ट हो जाता है। इसलिए, उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जिस पर चलकर ऋषियों ने परमानंद प्राप्त किया और परम सत्य को जाना।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर पोस्‍ट में लिखा;

“सन् 1930 में आज ही के दिन दांडी मार्च की शुरुआत हुई थी। इसमें शामिल सभी विभूतियों को श्रद्धापूर्वक स्मरण!

सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।

येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥”